Wednesday, 11 April 2018

बजट सत्र से उभरे कुछ संकेतक

                
संसद का बजट सत्र बीते शुक्रवार 6 अप्रैल को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गया। इस सत्र के दूसरे चरण में कोई कामकाज नहीं हुआ और दोनों सदनों का सारा समय शोर-शराबे और हंगामे में डूब गया। आम जनता ने मीडिया से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर यही राय कायम की है। हम इससे अलग हटकर उन कुछ सूत्रों को पेश करना चाहेंगे जो बजट सत्र के दौरान हुई घटनाओं से हासिल हुए हैं। इन्हें क्रमवार रखा जा सकता है-
1. वित्त विधेयक याने कि बजट बिना किसी चर्चा के आनन-फानन में पारित हो गया। 2. विपक्ष के द्वारा अविश्वास प्रस्ताव लाया गया, लेकिन सभापति ने उसे चर्चा के लिए मंजूर नहीं किया। 3. इसी बीच सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग लाने की सुगबुगाहट भी सुनाई दी। 4. राज्यसभा के मनोनीत सदस्य क्रिकेट के भगवान भारत रत्न सचिन तेंदुलकर ने अपने कार्यकाल की समूची वेतन राशि राज्यसभा अध्यक्ष को वापिस भेज दी। 5. सत्तारूढ़ भाजपा ने तय किया कि जितने दिन काम नहीं हुआ उसके सांसद उतने दिनों का वेतन नहीं लेंगे। 6. फेक न्यूज़ या फर्जी खबरों पर रोक लगाने की दृष्टि से केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्रालय ने एक अधिसूचना जारी की, जो कथित तौर पर अगले ही दिन प्रधानमंत्री के निर्देश पर वापिस ले ली गई।
हम इन घटनाओं के प्रकाश में चर्चा को आगे बढ़ाएंगे। सरकार के सामने ऐसी कोई मजबूरी नहीं थी कि वित्त विधेयक को बिना चर्चा किए पारित किया जाता। गिलोटिन करने या खटाखट पारित करने की नौबत तब आती है जब समय की कमी हो अथवा जब सरकार विभागीय मांगों पर बहस से कतराना चाहती हो। वैसे तो बजट की प्रासंगिकता धीरे-धीरे कर खत्म हो रही है फिर भी एक स्वांग तो हर साल रचा ही जाता है। सदन में बजट जब पेश होता है तो देश की अर्थव्यवस्था ही नहीं, संविधान के दिशानिर्देशों को लेकर भी गंभीर चर्चा के अवसर मिलते हैं। एक कल्याणकारी राज्य में सरकार की क्या भूमिका होना चाहिए, कैसी योजनाएं और कार्यक्रम बनना चाहिए- इन सब पर बात हो सकती है। चर्चा का अवसर न देने का यही अर्थ निकलता है कि सरकार मनमर्जी चलाएगी, विपक्ष से जो बने सो कर ले। ध्यान दीजिए कि सरकार ने बजट ऐसे समय पारित किया जब विपक्ष की ओर से हंगामे की कोई स्थिति नहीं थी। चर्चा शुरू होने के बाद हंगामा खड़ा होता तब सरकार के बजाय विपक्ष को दोष दिया जा सकता था। 
अविश्वास प्रस्ताव का पूरा प्रसंग अवास्तविक या अतिवास्तविक प्रतीत होता है। यह तो सब जानते थे कि लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पारित होने की दूर-दूर तक आशंका नहीं थी। लेकिन इसके माध्यम से विपक्ष को एक अवसर मिलना था जब वह सरकार की नाकामियों, गलतियों और कमजोरियों को उजागर कर सकता था। उल्लेखनीय है कि लोकसभा में तेरह बार अविश्वास प्रस्ताव रखा गया और हर बार सभापति सुमित्रा महाजन ने उसे यह कहकर स्वीकार नहीं किया कि शोर-शराबे के कारण निर्धारित न्यूनतम सांसदों की गिनती करना असंभव है। सुमित्रा ताई वरिष्ठ संसदवेत्ता हैं और सभी पक्षों की समादर की पात्र रही हैं, लेकिन उनका यह तर्क किसी की समझ में नहीं आया। आदर्श स्थिति में सभापति से तटस्थ रहने की उम्मीद की जाती है। यहां सवाल उठ रहा है कि क्या वे पार्टी की सोच से ऊपर नहीं उठ सकीं।  इस प्रसंग में एक और दिलचस्प तथ्य है कि जिन दलों ने अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था उनमें से दो-तीन दल खुद हंगामा करते रहे और इस तरह सभापति को मौका दे दिया कि वे प्रस्ताव को बहस के लिए स्वीकार न करें।
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग लाने की चर्चा तो खूब हुई, लेकिन वह पेश नहीं हुआ। इस बीच बार कौंसिल ऑफ इंडिया ने प्रस्ताव तक पारित कर दिया कि जो सांसद-वकील महाभियोग पर दस्तखत करेंगे उन्हें सर्वोच्च न्यायाधीश के इजलास में पैरवी नहीं करने दी जाएगी। बीसीआई का यह निर्णय वकीलों पर बंधनकारी होता, लेकिन यहां तो प्रस्ताव आया ही नहीं। यदि महाभियोग लाया जाता तो देश के संसदीय इतिहास की यह एक दुर्भाग्यजनक घटना होती। यह तो सब जान रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। मेरी समझ में तो न्यायमूर्ति मिश्रा को नैतिक आधार पर उसी दिन त्यागपत्र दे देना चाहिए था जिस दिन उनके साथी चार वरिष्ठ जजों ने बाकायदा पत्रवार्ता लेकर उन पर आरोप लगाए थे। न्यायमूर्ति चलमेश्वर ने बीते शनिवार न्यायमूर्ति मिश्रा से हुई असहमतियों को नए सिरे से दर्ज किया है। कुल मिलाकर यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है, जिसमें देश की न्यायपालिका का प्रमुख ही आरोपों के घेरे में खड़ा कर दिया गया हो। सुना यह है कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कांग्रेस पार्टी को इस दिशा में आगे बढ़ने से रोक दिया। यह उनकी गरिमापूर्ण छवि के अनुकूल था।
राज्यसभा के मनोनीत सदस्य सचिन तेंदुलकर ने सदन की गतिविधियों में छह साल लंबी अवधि के दौरान कोई भागीदारी नहीं की। वे चाहते तो देश की युवा नीति और खेल नीति के बारे में अपने अनुभवों के आधार पर बातें कर सकते थे और शायद मनवा भी सकते थे। उन्होंने छह साल की वेतन राशि राज्यसभा के अध्यक्ष को भेजकर अपनी अकर्मण्यता की ग्लानि से मुक्त होना चाहा है। मेरा मानना है कि कांग्रेस ने सचिन और रेखा इन दोनों को राज्यसभा में भेजकर बुद्धिहीनता का परिचय दिया था। लेकिन स्वयं सचिन को सोचना चाहिए था कि जिस पद के साथ वे न्याय नहीं कर सकते उसे क्यों स्वीकार करें। अगर वे मना करते तो उस जगह पर शायद कोई दूसरा विद्वान या विशेषज्ञ बैठता, जिससे सदन और देश दोनों को लाभ होता। हमें तो भारतीय जनता पार्टी का वेतन वापसी का निर्णय भी समझ नहीं आया। यदि आपने एक माह का वेतन वापिस कर भी दिया तो इससे क्या फर्क पड़ता है। मजे की बात है कि पार्टी के ही मुखर नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इस निर्णय को मानने से इंकार कर दिया है। भाजपा अपने इस फैसले पर खुद अपनी पीठ थपथपा सकती है, लेकिन फिर तो उसे 2004 से 2014 की अवधि में लिए गए वेतन-भत्ते लौटा देना चाहिए, जब भाजपा ने संसद को ठप कर रखा था। उसके नेता तब कहते थे कि सदन को चलाना सरकार का काम है। अब जब टोपी इनके सिर पर आ गई है तो इस तरह का प्रहसन खेला जा रहा है।
संसद के इसी सत्र के दौरान कैम्ब्रिज एनालिटिका का प्रकरण उछला। इसी के साथ-साथ फेक न्यूज याने फर्जी खबरें फैलने-फैलाने के बारे में भी हर तरफ चिंता व्यक्त की गई। सरकार ने आनन-फानन में अधिसूचना जारी कर दी जिसमें पत्रकारों के अधिकार व उन्हें प्राप्त सुविधाओं पर बंदिश लगाने का प्रावधान किया गया था। इसके जारी होते साथ मीडिया जगत में हड़कंप मच गया। पत्रकारों को  राजीव गांधी के समय 1986 में लाए गए प्रेस विधेयक की नए सिरे से याद आई। उस समय पूरे देश में पत्रकारों ने एकजुट होकर विधेयक का विरोध किया था। जगह-जगह पर जुलूस, प्रदर्शन और आंदोलन हुए थे और विधेयक वापिस ले लिया गया था। शायद ऐसा ही वातावरण इस बार भी बनता। सरकार के चहेते चैनल, अखबार और पत्रकार इस अधिसूचना के खिलाफ सामने आ गए थे। सरकार ने शायद आसन्न चुनावों को देखते हुए अपने कदम वापिस खींच लिए हैं। लेकिन मामला अंतिम रूप से खत्म नहीं हुआ है। रविवार को ही भाजपा सांसद पत्रकार स्वप्न दासगुप्ता ने अपने एक लेख में दलील दी है कि फेक न्यूज तो पहले भी होते थे। आशय यह कि पत्रकारों को सतर्क रहना होगा।
इस बीच एक ऐसा मामला सामने आया है जो मीडिया की चिंतनीय स्थिति को सामने लाता है। रियाज़ अहमद नाम के सज्जन हैं जो ट्विटर पर शायद कांग्रेस के पक्ष में पोस्ट करते रहते हैं। टाइम्स नाउ चैनल ने उनका प्रोफाइल एक ट्वीट जारी किया कि ये राहुल गांधी की ट्रोल आर्मी के सदस्य हैं। इस पर बवाल मचा। रियाज़ जिस कंपनी में काम करते हैं उन्हें वहां से निकाल दिया गया। चैनल ने उनके निजता के अधिकार का हनन किया और प्रकारांतर से उनकी रोजी-रोटी छीनी वे अब चैनल पर मुकदमा दायर करने जा रहे हैं। इसमें उन्हें भारी समर्थन मिल रहा है। एक तरफ स्मृति ईरानी पत्रकारों के अधिकार छीनने का कदम उठाती हैं, दूसरी तरफ भाजपा समर्थक मीडिया और सोशल मीडिया इस तरह के गैरजिम्मेदाराना काम करते हैं। इनसे सतर्क रहने की आवश्यकता है।
 देशबंधु में 12 अप्रैल 2018 को प्रकाशित 

Wednesday, 4 April 2018

एक्ज़ाम वारियर्स


जैसी कि जानकारी है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 'एक्ज़ाम वारियर्स' शीर्षक से एक किताब लिखी है। अभी दो माह पहले 3 फरवरी 2018 को बड़ी धूमधाम से छात्रों की एक सभा के बीच इसका लोकार्पण हुआ।  यह पुस्तक दूकानों पर और ऑनलाइन धड़ल्ले से बिक रही है। मोदीजी के इस पुस्तक लेखन से कुछ नए बिन्दु प्रकट होते हैं। एक तो यह कि नरेन्द्र मोदी को लेखक मान लेना चाहिए जैसे कि हमने बड़ी आसानी से अटल बिहारी वाजपेयी को कवि मान लिया है। दूसरे, एक पुस्तक लेखक के रूप में नरेन्द्र मोदी ने अपना नाम डेल कार्नेगी, स्वेड मार्टेन, दीपक चोपड़ा, शिव खेड़ा और हरीश बिजूर जैसे व्यक्तियों की सूची में दर्ज करा लिया है जो आम लोगों को जीवन में सफल होनेे के गुर सिखाते हैं चाहे भाषण देकर, चाहे किताब लिखकर। मैंने जो आखिरी के दो-तीन नाम लिए वे मोटी फीस लेकर पांच सितारा होटलों में अज्ञानियों के लिए सेमीनार, वर्कशॉप वगैरह करते हैं। इन्हें रोटरी क्लब जैसी संस्थाएं भी अपने कार्यक्रमों में आवभगत के साथ बुलाती है। वैश्वीकरण की शब्दावली में इन्हें मोटीवेटर वगैरह कहकर बुलाया जाता है। मोदीजी अगर किसी दिन रिटायर हुए तो वे इस दिशा में व्यस्त रह सकते हैं।
प्रधानमंत्री की लिखी पुस्तक से यह भी पता चलता है कि वे परीक्षा को युद्ध मानते हैं और परीक्षार्थी को योद्धा। सवाल उठता है कि इस युद्ध में जो हार जाए उसे क्या कहेंगे? क्या माननीय प्रधानमंत्री फेल होने वाले छात्रों को युद्ध क्षेत्र का भगोड़ा मानेंगे? और जो बहुत से नवयुवा हताश होकर जीवन से हाथ धो बैठते हैं क्या उन्हें परीक्षा के रणक्षेत्र का शहीद माना जाएगा? इसके साथ-साथ यह प्रश्न भी उठता है कि जो लोग पर्चा लीक करते हैं, पास करवाने के लिए जोड़-तोड़ का सहारा लेते हैं, उन्हें क्या माना जाए? क्या वे देशद्रोही कहलाएंगे? यहां एक तर्क दिया जा सकता है कि युद्ध और प्रेम में सब जायज होता है। इस पुरानी कहावत को मान्य करें तो फिर व्यापम से लेकर सीबीएसई तक जो कुछ हुआ है वह सब जायज और स्वीकार्य है। उस पर किसी को आपत्ति नहीं होना चाहिए। शायद यही कारण है कि व्यापम के बारे में सवाल उठाने वाले लोग या तो मार दिए जाते हैं या मारे जाने के खतरे के बीच जीते हैं। जबकि जो इस युद्ध को साम, दाम, दंड, भेद सारी युक्तियां अपना कर जीत लेते हैं उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। और अगर होती है तो इतनी निष्प्रभावी कि वह कोई मिसाल नहीं बन पाती। उसे कोई याद भी नहीं कर पाता। 
नरेन्द्र मोदी की किताब पढ़ने की कोई जरूरत मैंने नहीं समझी, लेकिन शीर्षक से यह ध्वनित होता है कि प्रधानमंत्री शिक्षा पद्धति में परीक्षा को बहुत महत्व देते हैं। शायद यही कारण है कि उनकी सरकार ने पिछले चार सालों के दौरान शिक्षा के अधिकार कानून याने आरटीई को लगातार कमजोर करने के निर्णय लिए हैं। शिक्षकों और पालकों के एक वर्ग की मांग थी कि बिना परीक्षा लिए बच्चे की प्रतिभा और क्षमता का पता नहीं चलता। उनके इस तर्क को मानकर पांचवीं, आठवीं, दसवीं की जो परीक्षाएं आरटीई में बंद की जा रही थीं उन्हें नए सिरे से वापिस लागू कर दिया गया। कहने की आवश्यकता नहीं पड़ना चाहिए कि परीक्षा के माध्यम से प्रतिभा की परख करना एक अभिजातवर्गीय सोच है। इसमें अनेक कोटियों में विभक्त भारत की सामाजिक विषमता को ही पुष्ट करने का यत्न है। प्रसंगवश कहना उचित होगा कि एक एनजीओ द्वारा प्रतिवर्ष जो असर (एएसईआर) नामक रिपोर्ट प्रकाशित की जाती है वह भी इसी अभिजात मानसिकता को प्रतिबिंबित करती है।
एक दौर था जब अभिजात वर्ग या उच्च मध्यम वर्ग के बच्चे ही स्कूल जा पाते थे। बहुत से लोग आपको बताएंगे कि वे तो गांव के हिन्दी मीडियम वाले सरकारी स्कूल में पढ़ते थे। इसमें कोई कमाल नहीं है। अमूमन सारे विद्यार्थी एक ही सामाजिक श्रेणी के होते थे और इन पाठशालाओं के दरवाजे समाज के एक बड़े वर्ग के नौनिहालों के लिए बंद थे। जैसे-जैसे जनतांत्रिक संविधान और कल्याणकारी राज्य व्यवस्था के अंतर्गत शिक्षा का प्रसार होना शुरू हुआ, वैसे-वैसे निजी स्कूल खुलने लगे। अब तो हाल यह है कि कितने ही निजी स्कूलों में पहली कक्षा से ए.सी. लगे कमरों में बैठकर बच्चे पढ़ते हैं। इन स्कूलों की सालाना फीस लाखों में होती है। ये वे स्कूल हैं जिनमें आरटीई के तहत किए गए प्रावधानों की धज्जियां उड़ाई जाती हैं। एक तरफ ये पांच सितारा, चार सितारा, तीन सितारा, शालाएं हैं और दूसरी तरफ शासकीय विद्यालय जिनमें किसी तरह की सुविधाएं नहीं हैं। यहां तक कि शिक्षक भी नहीं हैं क्योंकि वर्ल्ड बैंक के आदेश से 1995-96 से शासकीय विद्यालयों में पूर्णकालिक शिक्षकों की नियुक्ति पर पाबंदी लगी हुई है। जहां ऐसी विषमता  हो वहां परीक्षा की कसौटी पर प्रतिभा को परखना सत्ताधारी वर्ग का पाखंड नहीं तो और क्या है?
जहां तक योद्धाओं की बात है तो हम याद करना चाहेंगे कि परीक्षा में हर तरह से उत्तीर्ण होने की चाहत लंबे समय से चली आ रही है। वह इसीलिए कि परीक्षा में उत्तीर्ण होने को ही छात्र के बुद्धि का पर्याय मान लिया गया है। यह साठ के दशक की बात है जब लोकप्रिय पत्रिका सरिता में एक दुष्यंत की हत्या या ऐसी ही कुछ शीर्षक से एक कहानी छपी थी जिसमें एक छात्र नकल रोकने वाले शिक्षक की हत्या कर देता है। तब कोई एक साल तक इस कहानी पर चर्चा होती रही थी। तब से अब तक स्थितियां बहुत बदल गई हैं। परीक्षा पद्धति में चाहे जितने परिवर्तन कर लें, नकल रोकना असंभव सा हो गया है। दो साल पहले बिहार के किसी स्कूल की तस्वीर छपी थी जिसमें तीन मंजिल के स्कूल भवन में दीवार पर चढ़कर नकल करवाई जा रही थी। मोबाइल फोन इत्यादि के कारण भी नकल करना आसान हो गया है। यहीं यह भी ध्यान देने योग्य है कि न कॉलेजों में शिक्षक हैं, न स्कूलों में। सरकार ने भर्ती पर पाबंदी जो लगा रखी है। इस स्थिति में परीक्षा कक्ष में इनविजिलेटरों का भी टोटा पड़ जाता है। जो शिक्षक हैं भी वे परीक्षा ड्यूटी करने से कतराते हैं कि बैठे ठाले मुसीबत क्यों मोल ली जाए। परिचित डॉक्टर ऐसे समय काम आते हैं और मेडिकल सर्टीफिकेट दे देते हैं। 
विगत कुछ दिनों से सीबीएसई के जो परीक्षार्थी दिल्ली में आंदोलन कर रहे हैं और इसके पहले मध्यप्रदेश में व्यापम, छत्तीसगढ़ में मेडिकल भर्ती घोटाला, दिल्ली में एमएससी परीक्षा का घपला- ये सब एक गहरी बीमारी के ऊपरी लक्षण हैं और उनकी जड़ में जाने की जरूरत है। केन्द्रीय शिक्षा सचिव अनिल स्वरूप का बयान खेदजनक और किसी सीमा तक आपत्तिजनक है कि परीक्षाओं में नकल रोकना किसी के वश का नहीं है। दूसरी तरफ केन्द्रीय शिक्षा मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का कथन कि हम व्यवस्था को सुधारेंगे, एक खोखले वायदे के अतिरिक्त कुछ नहीं है। मेरा मानना है कि अब तक जितने उपाय किए गए हैं उनमें समस्या की जड़ की तरफ ध्यान ही नहीं दिया गया है। मेरा आरोप है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था जिस कुलीनतंत्र और अभिजात मानसिकता की गिरफ्त में है उसकी कोई रुचि समस्या के निदान में नहीं है। उसका ध्यान तो शिक्षा के निजीकरण की ओर है। जितने जल्दी हमारे स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, कारपोरेट घरानों के हवाले किए जा सके उतने जल्दी अपने सिर से बला टले।  सरकारी शिक्षण संस्थाओं की अरबों-खरबों की रीयल एस्टेट मिट्टी के मोल पूंजीपतियों को देने की तैयारी है इसमें किसके कितने वारे-न्यारे होंगे, कल्पना करना कठिन नहीं है।
यदि सरकार की मंशा सचमुच शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा प्रणाली को दुरुस्त करने की है तो उसे तीन-चार कदम फौरी तौर पर उठाना चाहिए। अव्वल तो पूरे देश में हर स्तर पर शिक्षकों की पूर्णकालिक नियुक्तियां होना लाजमी है। उनके चयन और नियुक्ति की प्रक्रिया में भी पारदर्शिता लाना होगी। मुझे कहने में संकोच नहीं है कि आज शिक्षकों के एक बड़े वर्ग की रुचि विद्यार्थियों का भविष्य गढ़ने में नहीं है। इस पर शिक्षक संगठनों को विचार करना पड़ेगा। दूसरे, शिक्षा का अधिकार कानून सही तरह से लागू करना आवश्यक है। उसमें परीक्षा पद्धति को लेकर जो प्रावधान किए गए हैं उन्हें बदलने के बजाय सही भावना से लागू करना होगा। इस हेतु शिक्षकों की मानसिकता भी बदलना पड़ेगी। तीसरे, पाठ्यक्रम में इतना लचीलापन होना चाहिए कि बच्चे की जिन विषयों में रुचि हो वह उन्हें पढ़ सके। चौथे, परीक्षाओं का विकेन्द्रीकरण होना परम आवश्यक है। अगर अकेले महाराष्ट्र में चार माध्यमिक शिक्षा मंडल हो सकते हैं तो वहीं विकेन्द्रीकृत व्यवस्था पूरे देश में लागू क्यों नहीं हो सकती? पांचवे, कोचिंग स्कूलों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए। फिलहाल, इतना ही।
देशबंधु में 05 अप्रैल 2018 को प्रकाशित 

 

Saturday, 31 March 2018

आम जनता पर इंटरनेट की खुफिया निगाह



यह संचार प्रौद्योगिकी का युग है। तेजी के साथ एक के बाद एक नए उपकरण सामने आ रहे हैं। जैसे कोई जादूगर अपने हैट में से निकालकर नई-नई चीजें दर्शकों की ओर फेंक रहा हो। जादू का खेल देखते हुए जैसे दर्शक अचरज से भर जाते हैं वैसे ही आज पूरा समाज नई प्रौद्योगिकी के नए-नए उपकरण देखकर आश्चर्य विमुग्ध है। कम्प्यूटर को आए अभी कितने साल हुए हैं! उसके लगातार नए और उन्नत मॉडल लगभग हर माह बाजार में आ जाते हैं। इंटरनेट को भी तो लगभग दो दशक का समय हुआ है। उसमें भी नित नए परिवर्तन और संवर्द्धन उपभोक्ताओं को पेश किए जा रहे हैं। मोबाइल फोन का तो कहना ही क्या! एक समय अनेक लोगों ने कुछ अनिच्छा से, कुछ कौतुक से इस खिलौने को अपनाया था। नोकिया का बेसिक टेलीफोनी वाला बाबा आदम के जमाने का वह फोन न जाने कहां खो गया जो हथेली में समा जाता था! आज स्मार्टफोन हाथों में है। उसके एक से बढ़कर एक मॉडल हैं, एप्स हैं, और हैं संवाद के नए-नए मंच, नए-नए प्लेटफार्म।
विगत सप्ताह कैम्ब्रिज एनालिटिका का जो स्कैण्डल सामने आया है उसके बाद से स्कूल के दिनों में निबंध लिखने का एक प्रचलित विषय बारंबार याद आ रहा है। विज्ञान वरदान है या अभिशाप। यह कैसे कहें कि विज्ञान अभिशाप है! मनुष्य सभ्यता की हजारों वर्ष की यात्रा आखिरकार विज्ञान की ही तो देन है। अगर आदिमानव ने अग्नि का आविष्कार न किया होता, अगर उसके बाद चक्के का आविष्कार न हुआ होता तो क्या हम वहां पहुंच पाते जहां आज हैं? छपाई मशीन, टेलीफोन, बिजली, भाप का इंजन, एक्स-रे- ये तमाम वैज्ञानिक आविष्कार ही तो हैं जिन्होंने मनुष्य जीवन को सुखद बनाने में भूमिका निभाई। ऐसे में यही कहना पड़ता है कि आविष्कार तो मूल्यनिरपेक्ष है। उसका अच्छा या बुरा होना, वरदान या अभिशाप होना उपयोगकर्ता पर निर्भर करता है। जिस माचिस की तीली से रोटी पकाने के लिए चूल्हा जलता है उसी से घर भी जलाया जा सकता है। यही बात चाकू से लेकर नाभिकीय ऊर्जा तक पर लागू होती है।
कैम्बिज एनालिटिका ने जो घनघोर अपराध किया है उसे इस पृष्ठभूमि में एक सीमा तक समझा जा सकता है। लेकिन सूचना प्रौद्योगिकी और संचार प्रौद्योगिकी की प्रगति का एक सौ-सौ परतों के नीचे दबा हुआ, आम जनता की आंखों से ओझल और खतरनाक पक्ष भी है जिस पर भी आज चर्चा होना चाहिए। इसमें कोई रहस्य नहीं है कि मीडिया के परपंरागत रूपों का उपयोग सत्ताधीश और श्रेष्ठिवर्ग अपने एजेंडे के मुताबिक करते आए हैं। अखबारों का प्रकाशन जब शुरू हुआ तब से उन्होंने सामंतों और पूंजीपतियों का हित संरक्षण किया हैं। यद्यपि भारत में स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा निकाले गए अखबार इसका अपवाद थे, जिसकी कीमत भी उन्हें चुकाना पड़ी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जब विश्व में जनतांत्रिक शक्तियों का उदय हुआ तब भी अखबारों ने जनहितैषी भूमिका निभाने की ओर ध्यान दिया। वैसे पूंजीवादी जनतंत्र में जनता को आश्वस्त करने और भुलावे में रखने की दृष्टि से भी मीडिया पर अंकुश लगाने से काफी हद तक बचा जाता है। इसे ही हम प्रेस की स्वाधीनता कहते हैं।
पारंपरिक मीडिया अर्थात अखबार, रेडियो और टीवी की कोई तुलना नए मीडिया याने इंटरनेट माध्यमों से नहीं की जा सकती। इस नए मीडिया के आम जनता के लिए लाभ कम नहीं है, लेकिन वे तभी तक हैं जब तक जनता पूंजीवादी जनतंत्र की सीमाओं से बंधी हुई है। मैंने जिस गोपन पक्ष का उल्लेख किया है उसकी बात यहां उठती है। ध्यानयोग्य है कि इंटरनेट का आविष्कार और विकास अमेरिका के सैन्य-पूंजी गठजोड़ की हिफाजत और उसके उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए हुआ है। यदि कोई व्यक्ति या समूह इस एजेंडा के दाएं-बाएं जाने की कोशिश करेगा तो उसके बारे में इंटरनेट के माध्यम से संकलित सूचनाओं का उपयोग उसी पर चट्टान पटक देने जैसी कार्रवाई में किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में जिनका इंटरनेट पर नियंत्रण है वे आपके बारे में राई-रत्ती खबर रखते हैं। आपने यदि व्यवस्था का विरोध किया तो एक सीमा तक ही आपकी हरकतें बर्दाश्त की जाएंगी।
मानवाधिकारों के लिए सचेष्ट अनेक समूह पिछले कुछ वर्षों में इस बारे में चिंता प्रकट करते रहे हैं। क्योंकि इंटरनेट और उसके उपकरण मनुष्य की निजता का, उसके गोपनीयता के अधिकार का अतिक्रमण और हनन करते हैं। ट्विटर या फेसबुक पर की गई एक लापरवाह पोस्ट किसी व्यक्ति को आनन-फानन में जेल के सींखचों के पीछे पहुंचा सकती है। भारत में ही उदाहरण है कि राजनेता का कार्टून बनाने पर या हल्के ढंग से की गई टिप्पणी पर किसी फेसबुक उपयोगकर्ता को गिरफ्तार कर लिया गया। व्यक्ति अपनी सफाई देता रहे, बाद में भले ही निर्दोष सिद्ध हो जाए, लेकिन जब उसे प्रताड़ित किया जाता है, तो शेष समाज में भय का संचार होना स्वाभाविक हो जाता है। कहने का आशय यह है कि सूचना प्रौद्योगिकी को लेकर व्यक्ति को कोई रूमानी धारणाएं नहीं पालनी चाहिए। इसमें डाकिया डाक लाया या चिट्ठी आई है जैसे गाना गाने की गुंजाइश नहीं है।
यह तो एक पक्ष हुआ। कैम्ब्रिज एनालिटिका ने जो किया उससे तस्वीर का दूसरा रूप सामने आता है। अभी तक मिली खबरों के अनुसार इस कंपनी ने फेसबुक से पांच करोड़ अमेरिकी मतदाताओं के प्रोफाइल याने निजी जानकारियां हासिल कीं।  जुआघरों के खरबपति मालिक डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति चुने जाने की मुहिम में उनका उपयोग किया। कंपनी ने चुने हुए मतदाताओं को ऐसी सूचनाएं प्रसारित कीं जिनके प्रभाव में आकर वे ट्रंप के पक्ष में आ जाएं। हमें याद है कि एक और खरबपति जार्ज बुश जूनियर ने फ्लोरिडा के अपने गवर्नर भाई और फिर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट की मदद से अल गोर को राष्ट्रपति चुनाव में पराजित किया था। उसमें सीधे-सीधे धोखाधड़ी थी, न्यायपालिका का पक्षपात था, लेकिन पूंजीतंत्र के आगे किसी की नहीं चली थी। बराक ओबामा को राष्ट्रपति बनाने में मुद्रा बाजार के सट्टेबाज खरबपति जार्ज सोरोस ने मदद की थी। लेकिन ट्रंप का किस्सा इन सबसे अलग है।
कैम्ब्रिज एनालिटिका ने फेसबुक उपयोगकर्ताओं की निजी जानकारियों को अवैध रूप से हासिल कर उनका अवैध उपयोग किया। इस कंपनी ने इंग्लैण्ड के ब्रेक्सिट से अलग होने के प्रसंग में भी मतदाताओं को प्रभावित किया। खबरें ये भी हैं कि इस कंपनी और इसकी सहयोगी कंपनियों ने भारत में भी ऐसी कार्रवाईयों को अंजाम दिया। इन्होंने 2010 में नीतीश-भाजपा गठबंधन को जीतने में मदद की, इसके बाद उसने 2014 के चुनावों के पहले कांग्रेस में घुसपैठ कर, उसे ध्वस्त करने की योजना बनाई और भाजपा का सहयोग किया। भारत के निर्वाचन आयोग ने फेसबुक के साथ मतदाताओं का प्रोफाइल साझा करने के लिए बाकायदा समझौता भी किया, लेकिन मतदाताओं से उसकी अनुमति नहीं ली। अब कनाडा, अमेरिका, इंग्लैण्ड, भारत सब जगह फेसबुक और कैम्ब्रिज एनालिटिका दोनों के खिलाफ जांच शुरू हो गई है। व्हाट्सअप और ट्विटर ने फेसबुक की निंदा की है; उसके शेयर के भाव टूट गए हैं; टेस्ला के मालिक उद्योगपति एलोन मस्क ने अपना फेसबुक खाता बंद कर दिया है। आगे क्या होता है, देखना बाकी है।
हमारे लिए गहरी चिंता का विषय है कि नया मीडिया या सोशल मीडिया का यह दुरुपयोग मनुष्य जाति के लिए कितना घातक होगा। अगर इस पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो वह दिन शायद बहुत दूर नहीं होगा जब पूंजीवादी जनतंत्र कभी भी अधिनायक तंत्र में बदल सकता है। जब आप उपग्रह से, ड्रोन से, स्मार्टफोन से हर व्यक्ति के क्रियाकलाप पर, उसकी दैनंदिन गतिविधियों पर निगाह रखे हुए है तो इसका अर्थ यह है कि वह चौबीस घंटे आपके निशाने पर है। उसे आप कभी भी जेल में डाल सकते हैं। यहां तक कि उसकी हत्या भी कर सकते हैं।  हॉलीवुड की अनेक रोमांचकारी फिल्मों में इस तरह के चित्रण हुए हैं। ये कल्पनाएं सच साबित हो रही हैं। आज हमें उसी का सबसे ज्यादा डर है। सोशल मीडिया के दुरुपयोग के दीगर आयाम भी हैं। उन पर कभी अलग से चर्चा होगी। 
देशबंधु में 29 मार्च 2018 को प्रकाशित 

Tuesday, 27 March 2018

हिंदी साहित्य के डिजिटल संग्रहण की आवश्यकता

                   
 
काग भुशुंडि गरुड़ से बोले, आओ हो लें दो-दो चोंचे।
चलो किसी मंदिर में चलकर, प्रतिमा का सिंदूर खरोंचे।।
मैंने अपने बचपन में सुनी एक बहुचर्चित कविता से उपरोक्त पंक्तियां उद्धृत की है। इनको सुनकर या पढ़कर किसी भी साहित्यप्रेमी को लग सकता है कि हो न हो यह बाबा नागार्जुन की कविता है। उनकी अनेक कविताओं के तेवर इसी ढब के हैं। मसलन, बहुत दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास या फिर शासन के सत्य कुछ और हैं, जनता के कुछ और परवर्ती काल में लिखी कविता इंदु जी, इंदु जी क्या हुआ आपको अथवा खिचड़ी विप्लव देखा हमने जैसी कविताओं में भी ऐसी ही वाक्विद्ग्धता है। इसलिए अगर कोई पाठक ऊपर उद्धृत कविता को भी नागार्जुन रचित माने तो इसमें आश्चर्य क्या? दरअसल हुआ भी ऐसा ही। अक्टूबर-नवंबर में फेसबुक पर यह कविता एकाएक प्रकट हुई; इसके लिखने का श्रेय बाबा नागार्जुन को दिया गया; और जब कहीं प्रतिवाद हुआ कि यह किसी और की रचना है तो उस बात को एक सिरे से नकार दिया गया। कुल मिलाकर एक रोचक विवाद खड़ा हो गया। रोचक इसलिए कहूंगा क्योंकि कुल मिलाकर बातों का ही जमाखर्च था। वादी-प्रतिवादी दोनों कुछ समय बाद इस प्रकरण को भूल भी गए।
मैंने जब फेसबुक पर कविता पढ़ी और नागार्जुन का नाम देखा तो विस्मयपूर्वक प्रश्न किया कि क्या यह कविता सचमुच नागार्जुन की है? मैं जानता था कि यह उनकी कविता नहीं है, लेकिन जिन्होंने कविता पोस्ट की थी उनसे टकराव मोल लेने के बजाय चाहता था कि मेरा प्रश्न पढ़कर वे स्वयं इस बारे में आश्वस्त हो लें। बहरहाल, इसके बाद मैंने अपने कई मित्रों को फोन किया, उनको कविता की आधी पंक्ति सुनाकर ही पूछा कि इसका लेखक कौन है? सारे मित्रों का उत्तर वही था जो मुझे पता था। इसके बाद भी लिखित प्रमाण की आवश्यकता थी ताकि फेसबुक पर कविता के असली लेखक का परिचय दे सकूं। इधर-उधर खोजा। अंत में सागर में प्रोफेसर कांतिकुमार को फोन किया, उन्होंने आश्वस्त किया कि ढूंढकर बताऊंगा। यहां उनकी सहधर्मिणी श्रीमती साधना जैन ने सहायता की। उन्हें कुछ याद आया, अपनी हजारों पुस्तकों वाली लाइब्रेरी से उन्होंने वह पुस्तक निकाली जिसमें यह कविता छपी थी और यह कृपा भी की कि पूरी पुस्तक ही मुझे पंजीकृत डाक से भेज दी।
आपके इतना पढऩे तक प्लॉट अगर गहरा गया हो और आप रहस्य से परदा उठाकर कवि का नाम जानने व्यग्र हों तो मैं अधिक प्रतीक्षा करवाए बिना बताऊं कि यह कविता मध्यप्रदेश के कवि जीवन लाल वर्मा विद्रोही की है। जिस काव्य संग्रह में मुझे यह प्राप्त हुई उसका शीर्षक है- जबलपुर की काव्यधारा।  पंडित कुंजीलाल दुबे स्मारक समिति जबलपुर ने 1999 में इसका प्रकाशन किया। इसमें जबलपुर से संबंध रखने वाले पचहत्तर कवियों की कविताएं, उनके जीवन परिचय के साथ प्रकाशित हैं। छह सौ पृष्ठ के इस काव्य संकलन का संपादक जबलपुर के ही प्रोफेसर हरिकृष्ण त्रिपाठी ने किया। जबलपुर की अपने समय की सुप्रसिद्ध साहित्य संस्था मिलन ने भी इसी तरह का एक संकलन नर्मदा के स्वर शीर्षक से कुछ वर्ष पूर्व प्रकाशित किया था। इतनी जानकारी यह सोचकर दी कि शायद साहित्यिक इतिहास के पाठकों को इसमें रुचि हो!
जीवनलाल वर्मा विद्रोही नागार्जुन और मुक्तिबोध के समवयस्क और समकालीन थे। उनकी एक लंबी कविता चरवाहा अपने समय में अत्यन्त लोकप्रिय हुई थी। 1915 में जबलपुर में जन्मे विद्रोही जी पत्रकार, बाद में मध्यप्रदेश जनसंपर्क में अधिकारी थे। पहले नागपुर, फिर भोपाल में उनका वास रहा। 1989 में भोपाल में ही उनका निधन हुआ। वे फक्कड़ स्वभाव और विद्रोही तेवर के कवि थे। अपना उपनाम उन्होंने सोच-समझकर ही रखा था। साहित्य जगत के बाहर भी वे अपने चुटीलेपन के लिए जाने जाते थे। मेरा अभिनंदन शीर्षक से उन्होंने कविता लिखी जिसमें वे कहते हैं:-
जिस दिन था मेरा अभिनंदन
सूरदास सिर पीट रहे थे, कालिदास करते थे क्रन्दन।
हुआ एक्स-रे था तुलसी का
मीरा थी अण्डर आपरेशन,
हिन्दी को केंसर होने का-
हुआ उसी दिन कनफरमेशन।
सीधे दिल्ली चले कबीरा लाद गधे पर नौ मन चंदन।।

उनकी एक और कविता दृष्टव्य है:-
सुनते हैं अजगर-युग है,
तो फिर दास मलूका हूं मैं।।
अब तक संत बन गया होता,
एक चिलम से चूका हूं मैं।।

नागार्जुन बनाम विद्रोही की चर्चा को प्रस्थान बिन्दु मानकर मैं पाठकों को एक वृहत्तर प्रश्न की ओर ले जाना चाहता हूं। यह पहला अवसर नहीं है जब एक कवि की रचना दूसरे कवि की लिखी मान ली गई हो या उस तरह प्रचलित हो गई हो। और ऐसा नहीं कि सिर्फ हिन्दी में ही ऐसे प्रसंग घटित होते थे। कोई दो वर्ष पूर्व स्पैनिश भाषा के महान कवि पाब्लो नेरुदा के नाम से एक लंबी कविता सोशल मीडिया पर प्रसारित हो गई। किसी सजग पाठक का उस पर ध्यान गया। उसने खोज कर बताया कि यह किसी अन्य की रचना है जिसे नेरूदा के नाम से चलाया जा रहा है। दुनिया में और जगहों पर भी इस तरह के प्रसंग घटित होते होंगे। इतिहास में एक दौर वह भी था जब वाचिक परंपरा में किसी कवि की रचना के साथ प्रक्षिप्त अंश जुड़ जाते थे या किसी प्रसिद्ध कवि के नाम से कोई नया कवि अपनी रचना चला देता था। कबीर और मीरा के पदों में कितना उनका स्वयं का लिखा है और कितना दूसरों ने उनके नाम पर जड़ दिया है उस पर आज भी चर्चाएं जारी हैं।
हम जानते हैं कि प्रिंटिंग मशीन के आविष्कार के साथ बड़ी संख्या में किताबों का मुद्रण प्रारंभ हुआ। अब ताड़ पत्र या भोजपत्र पर लिखने की आवश्यकता नहीं थी। साहित्यिक कृति का गेय होना भी अनिवार्य नहीं था। किसी कृति का असली लेखक कौन हैं इस बारे में भ्रम फैलने की गुंजाइश भी कम हो गई। फिर भी कुछ कसर बाकी रहना ही थी। वह इसलिए कि जिस भाषा का प्रसार क्षेत्र विस्तृत हो उसमें कब, कहां, किसने क्या लिखा इसकी समूची जानकारी सामान्य पाठक के पास नहीं हो सकती थी। यदि स्पेन में एक लेखक ने कुछ लिखा और उसे स्पेन प्रवास से लौटे किसी लातिन अमेरिकी चतुर सुजान ने अपने नाम से चला दिया हो, तो ऐसा हो जाना असंभव न था। आज भी तो हम पाते हैं कि कभी किसी फिल्म की कहानी चोरी  होने का आरोप लगता है, तो कभी किसी पत्रिका में चोरी की गई कविता या कहानी छपने का विवाद उठता है। साहित्येतर विषयों में शोध कार्य में चोरी के आरोप लगते हैं और नेताओं के भाषणों में ढूंढा जाता है कि उन्होंने कहां से मसाला टीपा है।
अमेरिका में कोई शोध प्रबंध प्रकाशित होता है और उसकी नकल मारकर भारत में पीएचडी मिल जाती है। इतनी दूर भी क्यों जाएं? भारत में ही एक विश्वविद्यालय के भीतर एक जैसी विषयवस्तु पर पीएचडी दे देते हैं। अगर कहीं पकड़े गए तो फिर जो होगा सो होगा। आज उसकी चिंता क्यों की जाए। मैंने कई हिन्दी लेखकों को दावे करते हुए सुना है कि फलानी फिल्म का प्लॉट उनकी कहानी से चोरी किया गया है। हमारे हिन्दी जगत में यह शिकायत इसलिए उठती है क्योंकि हिन्दी भाषी क्षेत्र अत्यंत वृहद है। लेखकों की संख्या भी कम नहीं है। लगभग हर कस्बे से एकाध लघु पत्रिका प्रकाशित हो रही है। रचनाएं छपती हैं। अधिकतर एक छोटे से दायरे में सीमित रह जाती हैं, लेकिन पत्रिकाओं के संपादकों और साहित्यिक संस्थाओं के बीच विनिमय में रचना एक जगह से दूसरी जगह पहुंचने की संभावना बनी रहती है। इसी में यह आशंका भी निहित है कि दूरदराज की पत्रिका में छपी कोई रचना पसंद आ जाए तो उसे अपने नाम से स्थानीय पत्र या पत्रिका में छपा लो, किसको पता चलना है। वैसे भी अधिकतर लेखक अपनी रचनाओं को ही पढ़ते हैं। सरसरी निगाह से पत्रिका में अन्य लेखों को देखो तो ध्यान भी नहीं जाता कि इसमें कोई चोरी की रचना भी हो सकती है। ऐसी घटनाएं कम ही होती हैं, लेकिन होती तो हैं। सवाल उठता है कि क्या इस पर रोक लगाना संभव है, और क्या सूचना प्रौद्योगिकी का जो विकास हुआ है वह इस संबंध में हमारा मददगार हो सकता है? सवाल अटपटा लग रहा होगा, लेकिन इस पर सोचकर देखिए।
आज हम डिजिटल युग में हैं। सरकारी दफ्तरों में सौ-सौ साल पुरानी फाइलों को डिजिटल स्वरूप में संरक्षित किया जा रहा है। आक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी अब ट्विटर पर नए शब्द शामिल करने की सूचना देती है। किसी भी शब्द का अर्थ देखना हो गूगल सर्च पर चले जाइए। इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका जो कभी छत्तीस खंडों में प्रकाशित होता था वह अब डिजिटल रूप में उपलब्ध है। न्यूयार्क टाइम्स जैसे अखबारों ने अपने सौ-सवा सौ साल पुराने अंकों का डिजिटलीकरण कर दिया है। हिन्दी साहित्य में ही देखिए कि विकिपीडिया पर अनेक लेखकों के परिचय उपलब्ध हैं। हिन्दी कविता कोश इत्यादि नामों से ब्लॉग और फेसबुक पेज इत्यादि चल रहे हैं। अगर एक सुचारू योजना बने और उसे अंजाम देने के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध हो तो हिन्दी में लिखा गया विपुल साहित्य पीसी में माऊस के एक क्लिक पर या स्मार्ट फोन के एक टच पर प्राप्त हो सकता है।
मेरी समझ में देश में हिन्दी की सबसे पुरानी संस्थाओं यथा नागरी प्रचारणी सभा, हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा, दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा हैदराबाद इत्यादि को यह योजना हाथ में लेना चाहिए। देश के तमाम विश्वविद्यालयों के हिन्दी विभागों को भी इस दिशा में विचार करने की आवश्यकता है। केन्द्र सरकार हिन्दी के प्रचार-प्रसार पर हर साल करोड़ों रुपए खर्च करती है। विश्व हिन्दी सम्मेलन नाम का एक स्वांग भी तीसरे-चौथे साल रचा जाता है। यदि एक समन्वित नीति बने, संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग हो तो हिन्दी की तमाम पुस्तकें तथा स्फुट रचनाएं डिजिटल प्लेटफार्म पर आसानी से लाई जा सकती हैं। अभी बहुत से लेखक अपनी रचनाएं खुद का ब्लॉग बनाकर पोस्ट करते हैं। दिक्कत होती है कि इसमें अधिकतम संख्या में लोगों को कैसे जोड़ा जाए। मेरे परिचित अनेक लेखकों के ब्लॉग होंगे, लेकिन उनको अलग-अलग खोलकर देखना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं होता। अंग्रेजी की लाखों पुस्तकें किंडल पर उपलब्ध हैं, लेकिन हिन्दी की न के बराबर। संभावनाएं बहुत हैं। उन्हें अमली जामा पहनाने के लिए क्या किया जाए यह विचारणीय है। आज की चर्चा इस दिशा में आगे बढऩे में थोड़ी सी भी सहायक हो तो यह नागार्जुन व जीवनलाल वर्मा विद्रोही दोनों को हमारी आदरांजलि होगी।
अक्षर पर्व मार्च 2018 अंक की प्रस्तावना 

Wednesday, 21 March 2018

खुशी के पैमाने पर भारत

                                       
 
1991 में पी.वी. नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने और वित्त मंत्री का पद संभाला डॉ. मनमोहन सिंह ने। यही समय था जब भारत में तथाकथित आर्थिक उदारवाद की अवधारणा पनपना शुरू हुई। इसके पहले अमेरिका और इंग्लैंड की आर्थिक नीतियों में युगांतरकारी परिवर्तन आ चुके थे। मार्गरेट थैचर और रोनाल्ड रीगन ने जो नया रास्ता चुना उसे क्रमश: थैचरोनामिक्स और रीगनोनामिक्स की संज्ञा प्रदान की गई। एक नया पद प्रयोग में आया जिसे संक्षेप में एलपीजी कहा गया। अंग्रेजी के तीन शब्दों का हिन्दी अनुवाद हुआ उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण। यही वह समय था जब सोवियत संघ टूटने के कगार पर पहुंच चुका था। अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यतंत्र में विश्व व्यापार संगठन अर्थात डब्ल्यूटीओ की स्थापना हो गई थी और कैसे किन शर्तों पर अविछिन्न वैश्विक बाजार कायम किया जा सके इस पर माथापच्ची शुरू हो गई थी। अमेरिका तो शुरू से ही मुक्त व्यापार का पक्षधर था, फिर भी वहां कुछ ऐसे निर्माण क्षेत्र थे जिनमें मजदूर संगठन मजबूत थे और अपनी शर्तें मनवा सकते थे। वहां बेरोजगारी और विपन्नता पर मरहम लगाने के लिए सामाजिक सुरक्षातंत्र मौजूद था।
इंग्लैंड में समाजवादी और पूंजीवादी दोनों धाराएं एक-दूसरे से मुकाबला करते हुए चल रही थीं। आम आदमी को बड़ी हद तक बुनियादी सुविधाएं मयस्सर थीं गो कि वे पर्याप्त नहीं थीं। थैचर ने समाजवादी नीतियों को पूरी तरह दरकिनार करते हुए पूंजीवादी की नीतियों को बढ़ावा दिया। ब्रिटिश रेल का निजीकरण इस दिशा में एक बड़ा कदम था। इंग्लैंड अमेरिका सहित अन्य पूंजीवादी देशों ने जो माहौल बनाया भारत उससे अछूता नहीं रह सकता था। पहले इंदिरा गांधी और फिर राजीव गांधी की हत्या के बाद देश में कोई ऐसा कद्दावर नेता नहीं था जो वैश्विक पूंजी के खिलाफ आवाज बुलंद कर सकता। अपने दूसरे कार्यकाल में श्रीमती गांधी को घरेलू मोर्चे पर जिस तरह कांटों पर चलना पड़ रहा था उसमें वे आर्थिक मोर्चे पर पहले की तरह ध्यान नहीं दे पा रही थीं। राजीव गांधी अगर दुबारा सत्ता में लौटते तो वे अपने पहले कार्यकाल की गलतियों को सुधारते ऐसा सामान्य विश्वास था। माना जाता है कि इसी कारण उनकी हत्या की गई।
बहरहाल 1991 से लेकर आज तक भारत एलपीजी के फार्मूले पर चल रहा है। इस बीच सरकार भले ही किसी की भी रही हो। फर्क इतना है कि अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार जनमत का थोड़ा बहुत आदर करती थी इसलिए उसे अपने आर्थिक निर्णयों में संशोधन करने में संकोच नहीं होता था। यशवंत सिन्हा को इसीलिए रोल बैक मिनिस्टर कहकर पुकारा जाने लगा था याने वह मंत्री जो अपने निर्णय हर समय वापस ले ले।यूपीए के दस साल के दौरान अगर मनमोहन सरकार पूंजीमुखी निर्णय लेती थी तो सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद उन पर या तो अंकुश लगाती थी या ऐसी नीतियां प्रवर्तित करती थी जो लोकोन्मुखी हों। किसानों की सत्तर हजार करोड़ की ऋण माफी एक ऐसा बड़ा उदाहरण था। वर्तमान मोदी सरकार की सोच बिल्कुल भिन्न है। इस सरकार को वायदे करना बहुत आता है, लेकिन निभाना नहीं। इसे न जनमत की परवाह है और न संसदीय परंपराओं की। बिना बहस के बजट पारित करना इस सरकार की अहम्मन्यता का बड़ा उदाहरण है। वित्त मंत्री से आम जनता की कौन कहे, व्यापारी और उद्योगपति भी त्रस्त हैं। श्री जेटली जैसा अलोकप्रिय वित्तमंत्री शायद ही कोई और हुआ हो!
एक लंबे समय से हम कुछ संज्ञाएं सुन रहे हैं जैसे- जीडीपी, सेंसेक्स, निफ्टी, जीएसटी इत्यादि। समाज का एक बड़ा वर्ग इनसे प्रभावित है। कितने ही लोग डेस्कटॉप पर बैठकर शेयर मार्केट का उतार-चढ़ाव देखकर खरीद-बिक्री में लगे रहते हैं। बहुत से लोग यह काम अपनी सरकारी ड्यूटी के समय भी करते हैं। हमें बार-बार बताया जाता है कि भारत की विकास दर कल कितनी थी और आज बढ़कर कितनी हो गई है। मोदी सरकार के अर्थशास्त्री इसी को आधार बनाकर यूपीए पर हमला करते हैं। उधर से चिदंबरम पलटवार करते हैं और उनका साथ देने यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी जैसे भाजपाई आ जाते हैं। मीडिया में बयानबाजी होती है, अखबारों में लेख छपते हैं और आम आदमी की हालत सेमल की डाल पर बैठे तोते जैसी हो जाती है। इतना सुंदर चमकीला लुभावना फूल है, यह जब पककर फल बनेगा तो कितना मीठा होगा, तोता यही आस लगाए रहता है। फूल पकता है, फल बनता है और रुई के रेशे बनकर उड़ जाता है।
यह पुरानी कहानी सिर्फ एक दृष्टांत नहीं बल्कि वर्तमान का कठोर सत्य है। अभी-अभी संयुक्त राष्ट्र संघ का एक प्रतिवेदन आया है जिसका नाम है हैप्पीनेस रिपोर्ट। इसके मुताबिक दुनिया के कोई डेढ़ सौ देशों में भारत एक सौ पैंतीसवें क्रम पर है। दक्षिण एशिया या उपमहाद्वीप में भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश और श्रीलंका से भी नीचे है। इस  रिपोर्ट से दो अर्थ निकलते हैं। एक तो यह कि एक भारतीय के जीवन में आम तौर पर खुशी या आनंद नहीं है। उसका क्रम लगातार नीचे गिर रहा है। एक सौ अठाइस से एक सौ तीस, फिर एक सौ पैंतीस, शायद कुछ ऐसा ही है। दूसरे यह कि खुशी और खुशहाली न तो परिपूरक हैं और न पर्यायवाची। जीडीपी के आंकड़ों से आप सिद्ध कर सकते हैं कि देश में खुशहाली बढ़ी है, लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि आम नागरिक का जीवन पहले से अधिक आनंददायक हो गया है। 
इस कठोर सत्य को जानने के लिए किसी बहस की, जिरह की, दस्तावेज की आवश्यकता नहीं है। यह सत्य हमारे दैनंदिन जीवन में चारों ओर बिखरा हुआ है। कोई दिन नहीं जाता जब हम अपने गांव, मुहल्ले या बस्ती में दिल दहलाने वाली, रोंगटे खड़े कर देने वाली एकाध घटना घटित न सुनते हों। आज से बीस बरस पहले तक ऐसी घटनाओं की हम कल्पना भी नहीं करते थे। इक्की-दुक्की वारदातें होती थीं और उन्हें लोग जल्दी भूल जाते थे। लेकिन अब तो ऐसी लोमहर्षक वारदातों का एक लंबा सिलसिला ही चल पड़ा है। इन्हें पेशेवर अपराधी अंजाम नहीं देते बल्कि बिल्कुल सहज, सामान्य जीवन जीने वाले, सीधे-साधे दिखने वाले आम लोग न जाने कब कैसे अपना आपा खोकर अकल्पनीय अपराध कर बैठते हैं।
मैं इस तरह की घटनाओं के बारे में पढ़ता-सुनता हूं तो एक ही निष्कर्ष पर पहुंचता हूं। हमारे देश का कायांतरण एक अशांत और विक्षुब्ध समाज के रूप में हो गया है। हम बात-बात में क्रोधित होने लगे हैं। आप चाहें तो इसका दोष सिनेमा, टीवी, अपसंस्कृति वगैरह-वगैरह को दे सकते हैं, लेकिन यह सच्चाई का एक छोटा हिस्सा है। इस देश के धर्मोपदेशक और ईश्वर के दूत क्या कर रहे हैं? हमारे अपने घर का वातावरण क्या है? हम जिस मुहल्ले या कालोनी में रह रहे हैं क्या वहां सामाजिक समरसता है? अपने बच्चों को जिन स्कूलों में पढ़ने भेज रहे हैं क्या वहां समता व सौहार्द्र का वातावरण है? अगर वृहतर परिदृश्य में देखें तो पाएंगे कि हमने पूंजीवाद के उपकरण तो अपना लिए हैं, लेकिन सामंती संस्कार और कबीलाई मानसिकता से छुटकारा नहीं पा सके हैं।
उन्मुक्त पूंजीवाद के इस दौर में हमने असीमित इच्छाएं पाल ली हैं जिन्हें पूरा करने के साधन आम आदमी के पास नहीं हैं। शहरीकरण व उत्पादन के नए संबंधों ने पुराने सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया है। हमारे पास अब कोई सुरक्षा कवच नहीं है। अपनी लाचारी और बेबसी पर पर्दा डालने के लिए भारतवासी या तो किसी मिथकीय स्वर्णयुग में लौट जाना चाहते हैं या फिर मध्ययुगीन वर्जनाओं का आश्रय लेने लगते हैं। राजनेता इस ओर से गाफिल हैं, अर्थशास्त्री आत्ममुग्ध और समाजशास्त्री सेमिनारों में व्यस्त। अपने जीवन की खुशियां अब कहां-कैसे तलाशें? 
देशबंधु में 22 मार्च 2018 को प्रकाशित 

Thursday, 15 March 2018

बैंकों के निजीकरण के खिलाफ


सिझौरा में सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की दो हजारवीं शाखा खुली। यह कोई चालीस साल पुरानी बात है। उस दिन गांव में उत्सव का माहौल था। बैंक के चेयरमेेन बंबई से आए। भोपाल से सरकार के कौन-कौन नुमाइंदे आए यह अभी याद नहीं; लेकिन मैंने इसे एक ऐतिहासिक अवसर माना और अपने वरिष्ठ साथी सत्येन्द्र गुमाश्ता को कार्यक्रम की रिपोर्टिंग करने वहां भेजा। आप नक्शे पर देखना चाहेंगे, तो शायद कहीं एक छोटे से बिंदु के रूप में यह जगह आपको दिख जाएगी। रायपुर-जबलपुर मार्ग पर मंडला जिले में सिझौरा एक छोटा सा गांव है, जिसकी आबादी लगभग सौ फीसदी आदिवासी है। इस छोटे से गांव में जहां तक पहुंचने के लिए एक अच्छी सड़क भी न हो, और जहां के लोग बैंक का अर्थ भी न जानते हों भला वहां सेन्ट्रल बैंक को अपनी शाखा खोलने की क्या सूझी? आज चालीस साल बाद शायद यह सवाल पूछा जा सकता है। इसका जवाब बैंकों के राष्ट्रीयकरण में है। 


सिझौरा ही नहीं, भुआ-बिछिया, करंजिया, बीजाडांडी, नारायणगंज-पडरिया जैसे गांवों में भी बैंक ने शाखाएं खोलीं। इसी तरह अन्य बैंकों ने भी दूरदराज के गांवों में जाकर अपना कारोबार शुरू किया। तब के सरगुजा जिले में उदयपुर एक छोटा सा गांव था। वहां एक झोपड़ीनुमा मकान में सेंट्रल बैंक की शाखा खुली। बैंक के मेरे पूर्व परिचित राजेन्द्र खजांची उस एकल स्टाफ वाली बैंक शाखा के पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर सब कुछ थे। गांव में प्राथमिक शाला शायद रही हो, पुलिस थाना भी नहीं था। मंडला ज़िले की भुआ-बिछिया शाखा में में मेरे साथ कभी काम कर चुके चुन्नीलाल केला पदस्थ थे। इन गांवों में सामान्य बुनियादी सुविधाएं भी नहीं थीं, लेकिन इन जैसे लोग बैंक राष्ट्रीयकरण के उद्देश्य को पूरा करने में लगे थे, यद्यपि इसके लिए उन्हें शहरी सुख-सुविधाओं से वंचित होना पड़ा था। एक जुनून था कि देश के गांव-गांव तक बैंकिंग सेवा पहुंचे और उसके माध्यम से आम आदमी के आर्थिक स्तर में सुधार आए। उसकी मेहनत की गाढ़ी कमाई सूदखोरों के पास न चली जाए।
1969 में जब इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया तो उसके कुछ और प्रभाव देखने में आए। देश में पहली बार प्रायरटी सेक्टर की अवधारणा आई।  इसका सरल अर्थ था कि कमजोर वर्ग की माली हालत सुधारने में बैंक योगदान करेगा। इसके दो रोचक उदाहरणों का मैं गवाह हूं। मालती प्रसाद जैन रायपुर में पंजाब नेशनल बैंक याने पीएनबी के मैनेजर थे। उनका भोपाल तबादला हो गया। वहां उन्होंने पुलिस के तमाम सिपाहियों को सायकिल खरीदने हेतु आसान शर्तों पर कर्ज उपलब्ध कराया। विभाग ने वेतन से पांच रुपया या दस रुपया महीने की किश्त काटकर बैंक में जमा करने की अनुमति दे दी। सैकड़ों पुलिस वालों के पास खुद की साइकिल हो गई। रायपुर में सेंट्रल बैंक की विवेकानंद आश्रम शाखा के प्रबंधक थे गिरधरदास डागा। उन्होंने बढ़ईपारा में बैलगाड़ी के चक्के बनाने वालों को कर्ज दिया। उसकी मासिक किश्त की वसूली करने वे खुद उनके मुहल्ले में जाते थे। चक्के बनाने वालों के कारोबार में तरक्की हुई और बैंक का कर्ज भी पट गया। एनपीए की नौबत नहीं आई।
आज इन प्रसंगों का उल्लेख करना प्रासंगिक है और आवश्यक भी। मुझे उस समय की धुंधली स्मृति है जब 1952-53 में कभी लक्ष्मी बैंक दिवालिया हो गया था। यह एक निजी बैंक था। इसकी शाखाएं पूरे मध्यप्रांत और बरार में फैली थीं। बड़े विश्वास के साथ लोगों ने बैंक में पैसा जमा कराया था। उनकी जीवन भर की जमा पूंजी स्वाहा हो गई। बैंक के मालिकों पर क्या कार्रवाई हुई, यह नहीं पता, लेकिन एक खराब उदाहरण के रूप में लक्ष्मी बैंक का नाम बार-बार लिया जाता था। अपने आपको दिवालिया घोषित करने वाला वह अकेला बैंक नहीं था। देश में कई जगहों पर इसी तरह चालाक पूंजीपतियों ने जनता के साथ धोखाधड़ी की। बाद में चिटफंड कंपनियों के भी इस तरह के करतब लोगों ने देखे। अभी मैंने एक लेख में पढ़ा कि निजी बैंक द्वारा आम जनता के साथ धोखाधड़ी करने का भारत में पहला केस सन् 1840 में हुआ था। लेख आउटलुक पत्रिका के 12 मार्च के अंक में छपा है। 
इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद निजी बैंकों और बीमा कंपनियों के द्वारा की जा रही लूट पर अंकुश लगाने के लिए काफी सोच-विचार किया था। राष्ट्रीयकरण तो बाद में हुआ। पहले बैंकों पर सामाजिक नियंत्रण की योजना लागू की गई। इसके अंतर्गत प्रावधान हुआ कि कोई भी उद्यमी अपने द्वारा स्थापित या नियंत्रित बैंक से ऋण नहीं ले सकेगा। इसकी काट निकालने में व्यापार-चतुर बैंक मालिकों ने देरी नहीं लगाई। बैंक ए का मालिक बैंक बी से ऋण लेने लगा, बी वाला सी से और सी वाला डी से। इस तरह एक दुष्चक्र रच दिया गया। कुल मिलाकर बैंकों पर पूंजीपतियों का नियंत्रण कायम रहा आया। आम जनता को इससे कोई फायदा नहीं पहुंचा। सच तो यह है कि आम जनता ने बैंकों में जो रकम जमा की थी उसका उपभोग ये इजारेदार अपना व्यवसाय बढ़ाने के लिए करते रहे। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं था कि बैंकिंग एक ऐसी सेवा है जो देश की गरीबी को दूर करने में मददगार हो सकती थी।
यह माना जाता है कि इंदिराजी ने कांग्रेस के भीतर अपने विरोधियों याने सिंडीकेट के नेताओं  के दबाव से मुक्त होने के लिए बैंक राष्ट्रीयकरण की योजना बनाई थी। इसमें किसी हद तक सच्चाई है, लेकिन श्रीमती गांधी के इस साहसिक और अभूतपूर्व निर्णय के जो सकारात्मक दूरगामी परिणाम हुए उनकी तुलना में यह राजनैतिक लाभ तो क्षणिक था। जैसा कि मैंने शुरू में बताया देश के दूरदराज के कोनों तक बैंकों की शाखाएं खुलीं, बैंक कर्मचारियों का मनोबल बढ़ा, उन्हें लगा कि वे देश की तरक्की में अपना योगदान कर रहे हैं। उन्होंने इसके लिए एक लंबी लड़ाई लड़ी थी और यह ट्रेड यूनियन का कोई छोटा-मोटा मामला नहीं था। एक समय था जब बैंकों में सेवा शर्तें बहुत खराब थीं। काम का वातावरण बोझिल और कई बार प्राणलेवा भी था। बैंक कर्मचारियों के नेता एच.एस. परवाना और उनके साथियों ने इसके खिलाफ लगातार संघर्ष किया, पर वे सिर्फ खुद की सुविधाओं के लिए नहीं लड़ रहे थे, बल्कि बैंकिंग को एक समाजउपयोगी सेवातंत्र में बदलना उनका अभीष्ट था।
आज पीएनबी घोटाले के बाद बैंकों को वापिस निजी क्षेत्र के हवाले करने की आवाजें उठ रही हैं। देश के उद्यमियों की अग्रणी संस्था सीआईआई ने इस हेतु आवाज उठाने में एक दिन का भी समय नहीं लिया। हमें याद रखना चाहिए कि ये सीआईआई जैसे व्यापारिक संगठन ही हैं, जो उद्योगों के लिए सारी रियायतें चाहते हैं, जिन्हें लगता है कि भारत में टैक्स दरें बहुत ज्यादा हैं, जो निजी क्षेत्र की नौकरियों में आरक्षण का विरोध करते हैं, जो एसईजेड में कारखाने खोल देश के तमाम नियम कायदों को धता बताते हैं और जिनका वश चले तो सारे स्कूल कॉलेज भी निजी क्षेत्र के हवाले कर दें। यही लोग जीएसटी के भी समर्थक हैं और चाहते हैं कि टैक्स का सारा भार अप्रत्यक्ष कर के रूप में गरीब से गरीब आदमी को भी भुगतना पड़े।
नीरव मोदी, मेहुल चौकसी, जतिन मेहता, ललित मोदी, विजय माल्या, दिवंगत हर्षद मेहता इत्यादि तमाम लोग इस अभिजात समाज के हिस्से हैं। बैंकों से अरबों-खरबों का ऋण ये लेंगे। फिर उसे नहीं पटाएंगे। कानून से बचते फिरेंगे, और फिर कहेंगे कि बैंक इनके हाथों में सौंप दिए जाएं। कहावत है -चित भी मेरी पट भी मेरी। वह इन्हीं लोगों पर पूरी-पूरी लागू होती है। ठीक है कि पीएनबी और अन्य राष्ट्रीयकृत बैंकों में घपले हुए हैं, लेकिन उसका लाभ किसने उठाया? आपने या मैंने तो नहीं। कुछ बैंक कर्मचारी यदि भ्रष्ट निकले तो उससे पूरी व्यवस्था तो गलत नहीं हो जाती। और क्या निजी बैंकों में घपले नहीं होते? अगर विदेशों में निजी बैंक डूब सकते हैं तो भारत में क्यों नहीं? किसी दिन उनका कच्चा चिट्ठा भी सामने आएगा। मेरा यह सब कहने का मतलब इतना ही है कि जनता को सार्वजनिक क्षेत्र की संपदाएं, चाहे बैंक हो या और कुछ, उनके निजीकरण अथवा विनिवेश के खिलाफ आवाज उठाना चाहिए।
देशबंधु में 15 मार्च 2018 को प्रकाशित 



 

Thursday, 8 March 2018

त्रिपुरा के बाद?



 
भारतीय जनता पार्टी त्रिपुरा के विधानसभा चुनावों में मिली शानदार जीत के लिए निश्चित ही बधाई की हकदार है। बात यहां समाप्त नहीं हो जाती।  जिस दिन चुनाव परिणाम आए उस दिन से यह प्रचार लगातार किया जाता रहा कि उत्तर-पूर्वी राज्यों में लाल किला ढह गया है और केसरिया ध्वज चारों ओर लहरा रहा है। मैं सवाल करना चाहता हूं कि भारतीय जनता पार्टी कब तक इस छद्म के सहारे चलेगी। मेरा जनता से भी सवाल है कि वह कब तक आंखें मूंदकर, कान बंद कर इस छलना को समझने से इंकार करती रहेगी। भारतीय जनता पार्टी का प्रचारतंत्र जिस तरह दिन में अड़तालीस घंटे काम कर रहा है उसे देखकर मुझे दो बातें प्रतीत होती हैं-एक तो यह कि भाजपा जनता को मूर्ख समझती है और उसने एक पुरानी कहावत को पलटकर इस तरह रख दिया है कि आप हर समय हर व्यक्ति को बेवकूफ बना सकते हैं। दूसरी, अगर ऐसा नहीं है तो क्या हम यह मान लें कि भारत के मतदाता ने एक बिल्कुल नई राह पकड़ ली है, जिसमें आदर्श और सिद्धांतों की कोई गुंजाइश नहीं है बल्कि संकीर्ण मानसिकता से उपजे एक मध्ययुगीन भग्न स्वप्न को फिर यथार्थ में बदलने का लक्ष्य है?
उत्तर-पूर्व के राजनीतिक और चुनावी नक्शे पर एक उड़ती दृष्टि डाल लेना उचित होगा।  त्रिपुरा में पिछले बीस साल से सीपीएम के माणिक सरकार मुख्यमंत्री थे। उनके पहले भी नृपेन चक्रवर्ती और दशरथ देब के नेतृत्व में वामपंथी सरकार थी। इस लंबे दौर में त्रिपुरा में आंतरिक अशांति के कारणों का समाधान हुआ। वहां जो उग्रवाद पनपा था वह नियंत्रित हुआ। अपने आप में यह एक बड़ी उपलब्धि थी। फिर भी लंबे समय तक किसी एक पार्टी का शासन हो तो मतदाता ऊबने लगते हैं, उनमें असंतोष पनपने लगता है और वे बदलाव की अपेक्षा करने लगते हैं। सत्तारूढ़ दल इतने समय तक बिना कोई गलती किए राज करेगा, ऐसा कोई नहीं सोचेगा याने उसे अपने गल्तियों का खामियाजा भी भुगतना पड़ता है। इसके अलावा त्रिपुरा में भारतीय जनता पार्टी और उसकी पितृसंस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने घोर परिश्रम किया और उन्हें अपनी रणनीति में कामयाबी मिली। यह तथ्य ध्यान रखने योग्य है कि त्रिपुरा में भाजपा और माकपा को प्राप्त कुल मतों में बहुत अधिक अंतर नहीं था, शायद एक प्रतिशत का भी नहीं।
भारतीय जनता पार्टी ने एक ओर जहां दो अलगाववादी पार्टियों के साथ चुनावी समझौता किया, वहीं उसने कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के विधायकों और नेताओं को चाणक्य नीति पर चल कर अपने साथ जोड़ने में सफलता हासिल की। त्रिपुरा में कांग्रेस पहले भी सत्ता में नहीं थी। इस चुनाव में भी उसके पास खोने के लिए बहुत कुछ नहीं था। कांग्रेस की शायद यह भी सोच थी कि माकपा की जीत से उसे आगे चलकर लोकसभा चुनावों के समय गठबंधन में सहायता मिलेगी।  दूसरी ओर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की विडंबना कि उसके शीर्ष नेतृत्व में टकराव चल रहा है। पार्टी एक तरह से पश्चिम बंगाल और केरल ऐसे दो खेमों में बंट गई है। जनाधारविहीन प्रकाश करात की नीतियों ने पार्टी का जो नुकसान किया है उसे अभी पूरी तरह समझा नहीं गया है। कुल मिलाकर ऐसे कारण बने जिनसे भाजपा की जीत सुनिश्चित हो गई। माणिक सरकार की सादगी और ईमानदारी को बहुत उछाला गया। हमने ऐसे बहुत से चरित्रवान, सादगी पसंद और ईमानदार लोगों को पहले भी चुनाव हारते देखा है।
अब नगालैण्ड की बात करें। यहां जिस क्षेत्रीय दल के साथ भाजपा ने पिछले पांच साल या शायद उससे भी पहले से गठबंधन कर रखा था उसे चुनाव के ऐन पहले तोड़ दिया और एक दूसरे क्षेत्रीय दल के साथ नया मोर्चा बना लिया। चुनाव में दोनों पार्टियों को बराबर-बराबर सीटें मिलीं और कुछ समय के लिए एक संवैधानिक संकट की स्थिति बन गई। जब निवृत्तमान मुख्यमंत्री ने पद छोड़ने से इंकार कर दिया। उनकी मांग थी कि उन्हें ही दुबारा शपथ ग्रहण कराई जाए।  इस स्थिति में भाजपा क्या करती? राज्यपाल उसका है इसलिए वह नए गठबंधन के नेता को मुख्यमंत्री पद का आमंत्रण भिजवा सकती थी, लेकिन नगालैण्ड में भाजपा की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग गया है। जिसका साथ उसने छोड़ा वह पार्टी बराबरी की ताकत बन कर उभरी है, वह भी बिना भाजपा के सहारे, इसलिए उसका मनोबल ऊंचा है। क्या ऐसे में भाजपा नए दोस्त को छोड़कर पुराने साथी की ओर हाथ बढ़ाएगी या फिर नए गठबंधन में पिछलग्गू बनकर सत्ता हासिल करेगी? 

नगालैण्ड की बात करते समय यह नहीं भूला जा सकता कि केन्द्र की मोदी सरकार ने विद्रोही नगा गुटों के साथ कोई गुप्त समझौता किया है। इसका खुलासा अभी तक नहीं हुआ है। यह चर्चा अवश्य सुनने मिलती है कि वृहत्तर नगालिम बनेगा जिसमें मणिपुर आदि के नगा इलाके भी शामिल होंगे तथा इस नए प्रदेश का अपना अलग ध्वज आदि होंगे। इसको लेकर मणिपुर में संशय पनप रहा है जहां अनैतिक रूप से भाजपा ने सत्ता हासिल की है। भाजपा यदि प्रदेश की सत्ता में आती है तो क्या वह इस कथित समझौते को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ेगी? यदि हां तो पड़ोसी मणिपुर में इसका क्या असर पड़ेगा और यदि नहीं तो नगालैण्ड की जनता उस पर आगे कितना विश्वास रख पाएगी? एक तरफ त्रिपुरा के अलगाववादी दल, दूसरी ओर नगालैण्ड की यह उलझन। कहना होगा कि भाजपा यहां अपने ही जाल में खुद किसी हद तक फंस गई है। इससे बाहर निकलने के लिए भारी युक्ति और कौशल की आवश्यकता होगी।
 मेघालय में भारतीय जनता पार्टी ने जो खेल खेला है उसकी खुले शब्दों में निंदा की जानी चाहिए। मेघालय में आज तक कभी किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, लेकिन संसदीय परंपरा है कि सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का न्यौता दिया जाता है। मेघालय के राज्यपाल ने जो किया उससे इस परिपाटी का उल्लंघन हुआ है। भाजपा को इस सवाल का जवाब देना पड़ेगा कि मेघालय में सबसे बड़ी पार्टी को सरकार न बनाने देने से उसने कौन सा आदर्श स्थापित किया है। उल्लेखनीय है कि मेघालय में भाजपा को मात्र दो सीटें मिलीं। यहां उसके सहयोग से कोनराड संगमा मुख्यमंत्री बन गए हैं। वे पी.ए. संगमा के बेटे हैं। उनकी बहन भी चुनाव जीती हैं। कांग्रेस पर वंशवाद का आरोप मोदीजी और उनके भक्तों ने खूब लगाया लेकिन अब पूर्णों संगमा के बेटे को मुख्यमंत्री बनाने में इन्हें वंशवाद नज़र नहीं आया, बल्कि इस तथ्य को भाजपा ने सुविधापूर्वक भुला दिया। संभव है कि आने वाले दिनों में वह मेघालय कांग्रेस में तोड़-फोड़ की वैसी ही कोशिश करे जैसे उसने अरुणाचल और मणिपुर में की थी। 
एक विहंगम दृष्टि डालें तो हमें समझ आता है कि उत्तर-पूर्व के किसी भी प्रांत में भारतीय जनता पार्टी की मूलरूप से कोई प्रभावी स्थिति नहीं है। वह जिन राज्यों में सत्तारूढ़ है वहां उसने अधिकतर जोड़-तोड़ से सत्ता हासिल की है। सबसे पहले असम में हिमंत विश्व शर्मा जैसे अवसरवादी कांग्रेसी नेता को उसने तोड़ लिया। शर्मा जोड़-तोड़ में अवश्य माहिर होंगे, लेकिन उसकी भी कोई सीमा होती है। अरुणाचल में भाजपा ने जो खेल किया उसकी परिणति एक पूर्व मुख्यमंत्री की आत्महत्या में हुई। अरुणाचल और मणिपुर दोनों में सत्तालोलुप राजनेता ही भाजपा के साथ जुड़े। यही स्थिति नगालैण्ड, त्रिपुरा और मेघालय में दिखाई दे रही है। इसके परिणाम दीर्घकाल में अच्छे नहीं होंगे।
नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के शब्दकोष में राजनैतिक शुचिता जैसी कोई संज्ञा नहीं है। आप पिछली सरकारों को चाहे जितना कोसते रहें, लेकिन स्वयं आपने क्या किया है, इसके बारे में जनता आज नहीं तो कल सवाल अवश्य पूछेगी। एक समय भाजपा चाल चरित्र और चेहरा की बात करती थी, अब वह सिर्फ दो लोगों के चेहरे और उनकी चाल नहीं, बल्कि चालबाजी के सिद्धांत पर अमल कर रही है। अब देखना यही है कि प्रचारतंत्र के भरोसे जो तिलिस्म खड़ा किया है, वह भरम कब टूटता है।
देशबंधु में 08 मार्च 2018 को प्रकाशित