Tuesday, 9 December 2014

कांशीराम: दलितों के नेता


 भारतीय राजनीति में दलित-चेतना को प्रतिष्ठित करने में बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम, जिन्हें उनके अनुयायी मान्यवर अथवा साहब के उपनाम से संबोधित करते हैं, ने जो युगांतकारी भूमिका निभाई है उससे सब परिचित हैं। इस श्रृंखला में महात्मा ज्योतिबा फुले पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने उन्नीसवीं सदी में दलित और वंचित समुदायों को अन्याय, अपमान, शोषण व तिरस्कार के खिलाफ उठ खड़े होने के लिए प्रेरित किया था। वे ही पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने दलितों (उस समय के अछूत) के लिए पुणे जैसे घोर रुढि़वादग्रस्त नगर में पाठशाला स्थापित की थी। यहीं उन्होंने बाद में सत्य शोधक समाज की भी स्थापना की थी। महात्मा फुले व उनकी सहधर्मिणी सावित्री बाई ने उस दौर में जो क्रांतिकारी काम किया उससे भारतीय समाज में समता, बंधुत्व एवं मानवीय गरिमा की एक नई धारा का सूत्रपात हुआ। महात्मा फुले के काम को आगे बढ़ाया छत्रपति शाहूजी महाराज ने। महात्मा फुले और उनके युग के बारे में बहुत सारा साहित्य प्रकाशित हो चुका है।

महात्मा फुले ने जिस नवयुग का आह्वान किया उसका परचम आगे चलकर बाबा साहेब अम्बेडकर ने अपने मजबूत हाथों से उठाया। बाबा साहब के जीवन और कार्य के बारे में पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है। उन्होंने स्वयं प्रचुर मात्रा में लेखन किया एवं देश के राजनीतिक इतिहास में उनकी भूमिका के बारे में न जाने कितना कुछ लिखा जा चुका है। मैं विस्तार में जाकर कुछ कहने की कोशिश करूं तो वह पूर्व में लिखे गए को दोहराना ही होगा। इतना कहना पर्याप्त होगा कि औपनिवेशिक काल में महात्मा फुले ने सामाजिक स्तर पर जो कार्य किया था, बाबा साहब ने उसके लिए पहले सामाजिक और राजनैतिक लड़ाइयां लड़ीं और फिर स्वतंत्र देश के संविधान में उन आदर्श जीवन मूल्यों को स्थापित करने का कार्य संपादित किया। आज यदि भारत एक सभ्य समाज होने का दावा कर सकता है तो यह उस संविधान की ही देन है, जिसके निर्माण में डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने महती भूमिका निभाई।

यह हम जानते हैं कि हमारा समाज अभी भी अपनी युगों से चली आ रही रुढिय़ों और सड़ी-गली मान्यताओं से पूरी तरह मुक्ति नहीं पा सका है। संविधान के अनुच्छेद तथा कानून की धाराएं चाहे जो कहती हों, भारत में दलितों के साथ आज भी समानता का बर्ताव नहीं होता। उत्तर से लेकर दक्षिण तक ऐसे उदाहरण नित्यप्रति मिलते हैं जहां दलितों को आज भी अछूत माना जाता है; उनके साथ गजभर की दूरी रखी जाती है; बस्तियों के आरपार दीवारें उठा ली जाती हैं और यदि वे सिर झुकाने के बजाय सिर उठाने की उठाने की कोशिश करें तो उन्हें दंड का भागी भी बनना पड़ता है। जाहिर है कि सामाजिक, राजनैतिक व संवैधानिक विमर्श के द्वारा विषमता और भेदभाव मिटाने के चाहे जितने प्रयत्न किए गए हों वे तब तक कारगर नहीं हो सकते जब तक राजनीतिक सत्ता के सूत्र बहुजन समाज के पास न हों। कांशीराम ने अपनी राजनीति का ताना-बाना इसी विचार के इर्द-गिर्द बुना।  यह आश्चर्यजनक ही है कि जिस व्यक्ति ने बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की उसके बारे में अब तक कोई पुस्तक न लिखी गई हो। यह आश्चर्य थोड़ा और बढ़ जाता है जब हम जानते हैं कि कांशीराम की घोषित उत्तराधिकारी सुश्री मायावती पर जाने-माने पत्रकार अजय घोष द्वारा लिखित ''बहनजी" शीर्षक जीवनी चार-पांच वर्ष पहले ही बाजार में आ चुकी है। बहरहाल अब यह कमी दूर हो गई है। हिन्दी के जाने-माने कवि एवं समाजशास्त्री बद्रीनारायण ने इसी वर्ष ''कांशीराम : लीडर ऑफ द दलित्स" शीर्षक से पुस्तक प्रकाशित की है।

बद्रीनारायण झूसी इलाहाबाद स्थित गोविन्दवल्लभ पंत समाज विज्ञान संस्थान के प्रोफेसर हैं। वे अपनी इस दूसरी भूमिका को काफी गंभीरता के साथ जी रहे हैं। मुख्यत: दलित विमर्श पर उनके आलेख समय-समय पर इकॉनामिक एंड पोलिटिकल वीकली जैसी अकादमिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होते हैं। यह पुस्तक प्रकाशित कर बद्रीनारायण ने एक महत्वपूर्ण कार्य को अंजाम दिया है।


इस पुस्तक की भूमिका में लेखक उन कठिनाइयों का वर्णन करता है जो लिखने के दौरान उसे पेश आईं। लेखक के सामने सबसे बड़ी मुश्किल यह थी कि कांशीराम ने न तो स्वयं अपनी आत्मकथा लिखी, न मायावती या अन्य किसी के साथ पत्राचार किया और न उनके अनुयायियों व साथियों ने उनके जीवन के बारे में कुछ लिखा। कांशीराम कोई दैनंदिनी भी नहीं लिखते थे और न बसपा के पास उनके कोई दस्तावेज हैं। बद्रीनारायण के सामने सिर्फ दो पुस्तकें थी एक- स्वयं कांशीराम द्वारा अंग्रेजी में लिखित ''द चमचा एज" जिसमें उनके विचार तो हैं पर वे स्वयं नहीं हैं। दो- उनके सचिव अंबेठ रंजन द्वारा लिखित ''संत चरित वर्णन" जिसमें कांशीराम का एक संत के रूप में श्रद्धाभाव से वर्णन है। इस तरह लेखक को सामग्री जुटाने के लिए दूर-दूर तक भटकना पड़ा; कांशीराम जी के पूर्व सहयोगियों से भेंट के अवसर जुटाना पड़े; उनके परिवारजनों से मुलाकातें की तथा अखबारों में यत्र-तत्र प्रकाशित सामग्री में से अपने काम की चीजें छांटनी पड़ी। इन तमाम प्रयत्नों के बाद जो पुस्तक हमारे सामने आई है वह न सिर्फ कांशीराम से पाठकों का पहला परिचय करवाती है बल्कि उनके व्यक्तिगत जीवन और विचारों पर पर्याप्त रोशनी डालती है। बद्रीनारायण इस नाते दोहरी बधाई के पात्र हैं।

किताब आठ अध्यायों में विभक्त हैं। पहले अध्याय में उनके प्रारंभिक जीवन की झलकियां देखने मिलती हैं, तो आखरी अध्याय में कांशीराम की महत्वाकांक्षी राजनीति का एक संतुलित विश्लेषण प्राप्त होता है। कांशीराम का जन्म 15 मार्च 1934 को पंजाब के रोपड़ जिले के एक दलित बहुल गांव में हुआ था। पंजाब में सिख धर्म की प्रमुखता तो थी ही, कालांतर में आर्य समाज की गतिविधियों का भी विस्तार प्रदेश में हुआ। इन दोनों पंथों में उस तरह की जड़ता और रुढि़वादिता नहीं थी जो सनातन पंथ में थी। कांशीराम के पिता हरिसिंह आर्य समाज की सुधारवादी विचारधारा से काफी प्रभावित थे। इसके अलावा उन्होंने पंजाब के दलितों में आम रामदासिया पंथ छोड़कर खालसा पंथ अपना लिया था। एक तरफ समाज सुधार का वातावरण, दूसरी ओर सिख धर्म स्वीकार करना और तीसरी ओर परिवार की सामान्य से बेहतर माली स्थिति। इनके चलते कांशीराम को सामाजिक भेदभाव  और छूआछूत का उस हद तक सामना नहीं करना पड़ा जिसका शिकार उनके बचपन के अन्य साथी थे। फिर भी अपने आसपास फैले जातिवाद और उससे उपजी पीड़ा को वे भलीभांति महसूस कर सकते थे। उनके बचपन की स्मृतियां पूना में भी उनके साथ रही जहां वे भारत सरकार के एक संस्थान में नौकरी करने के लिए पहुंचे थे। यहीं उन्होंने दलित के ही नहीं, बहुजनों के हित में पहली बार आवाज तब उठाई जब भारत सरकार के उस दफ्तर में बुद्ध जयंती और अंबेडकर जयंती की छुट्टियां निरस्त कर दी गईं थीं। पूना में ही कांशीराम पहले बाबा साहब अम्बेडकर द्वारा स्थापित रिपब्लिकन पार्टी के सदस्य बने, लेकिन कुछ वर्षों बाद उन्हें अनुभव हुआ कि पार्टी बाबा साहब के आदर्शों पर नहीं चल रही है। इस बीच उन्होंने बामसेफ नाम से बहुजन एवं अल्पसंख्यक कर्मचारियों के नाम से महासंघ खड़ा कर लिया था, जिसकी राजनीतिक शाखा के रूप में कुछ ही समय बाद उन्होंने डीएस-4 अर्थात दलित शोषित समाज संघर्ष समिति की स्थापना की। डीएस-4 ने ही आगे चलकर बसपा का रूप ले लिया।

अपने पूना के दिनों में कांशीराम को अनेक दारुण अनुभवों से सामना करना पड़ा। बहुजन समाज के कर्मचारियों की हित रक्षा में उन्होंने मीलों पैदल व सायकिल यात्राएं की, भूखे पेट रहे, बिना टिकट रेल यात्राएं की। इनके ब्यौरे, इनके मित्रों से हुई बातचीत से मिले। इसी शहर में कांशीराम ने संकल्प लिया कि वे समाज कार्य को पूरा समय देंगे और इस हेतु उन्होंने अपने परिवार से सारे नाते तोड़ लिए। वे न तो अपनी बहनों की शादी पर गए, न एक बहन की मृत्यु पर। अपने पिता के अंतिम संस्कार में भी वे शामिल नहीं हुए। लगभग पच्चीस साल के लम्बे अंतराल के बाद जब वे अपने भाई से मिले तो एकबारगी उसे पहचान भी नहीं सके। एक बार जब उनकी मां उन्हें घर ले जाने के लिए पूना आ गई तो मां का प्रेम भी उन्हें अपने रास्ते से विचलित नहीं कर सका।

लेखक बद्रीनारायण के अनुसार कांशीराम ने यह समझ लिया था कि सारे संतों और गुरुओं तथा फुले, अम्बेडकर जैसे नेताओं के प्रयत्नों के बावजूद जातिप्रथा समाप्त नहीं होगी और इसलिए उन्होंने वंचित समुदायों की जातिगत चेतना को राजनीतिकृत करने की अवधारणा को प्रचलित किया। एक तो उन्होंने सवर्ण एवं वर्चस्ववादी तबकों के हाथों दलितों ने जो कष्ट सहे उनकी स्मृतियां जगाकर उन्हें लामबंद करने की कोशिश की, दूसरे दलित समुदाय के हर तबके के सांस्कृतिक इतिहास की पुर्नव्याख्या कर उनमें जातीय अभिमान पैदा करने का प्रयत्न किया ताकि इस तरह वे अपना खोया हुआ आत्मविश्वास हासिल कर सकें।

1982 में उन्होंने ''द चमचा एज : एन एरा ऑफ द स्टूजेस" (चमचा युग : चाटुकारों का पर्व) नाम से पुस्तक लिखी। लेखक के अनुसार इस पुस्तक से ही बसपा की दार्शनिक आधारशिला रखी गई। कांशीराम अपनी इस पुस्तक में चमचों को छह श्रेणियों में बांटते हैं। यथा अ- जाति एवं समुदाय आधारित चमचे, ब- राजनीतिक चमचे, स- अज्ञानी चमचे, द- शिक्षित अथवा अंबेडकरवादी चमचे, प- चमचों के चमचे, फ- विदेशों में चमचे। इनमें से प्रथम को वे फिर चार भागों में बांटते हैं- 1. अनुसूचित जाति- अनिच्छुक चमचे, 2. अनुसूचित जनजातियां- दीक्षित चमचे, 3. अन्य पिछड़े समाज- उत्सुक चमचे, 4. अल्पसंख्यक- असहाय चमचे। इन सबको विस्तार से परिभाषित करते हुए कांशीराम एक ओर जगजीवनराम और रामविलास पासवान जैसे राजनीतिज्ञों की घोर आलोचना करते हैं, दूसरी ओर वे डॉ. अम्बेडकर के अनुयायियों को भी कटघरे में खड़ा करते हैं। उनका आरोप है कि अंबेडकरवादी मूल लक्ष्य से भटक गए हैं।
पुस्तक के तीसरे अध्याय का शीर्षक ही है- ''द चमचा एज : एन एजेण्डा बियॉंड अम्बेडकर" याने अम्बेडकर से परे। इस अध्याय में बद्रीनारायण डॉ. अम्बेडकर और कांशीराम के विचारों का एक तुलनात्मक अध्ययन सामने रखते हैं। इसमें कुछ बिन्दु प्रमुखता के साथ उल्लेखनीय हैं।

1. अम्बेडकर मानते थे कि दलितों का गांव छोड़कर शहर में बसना उन्हें उत्पीडऩ से मुक्ति दिलाएगा। इसके विपरीत कांशीराम का कहना है कि दलित गांव में रहें या शहर में, जाति उनके साथ हर हाल में जुड़ी रहेगी। इसलिए दलितों को जाति को एक अस्त्र की तरह इस्तेमाल करना चाहिए जब तक कि ब्राह्मणवाद समाप्त न हो जाए।
2. अम्बेडकर सोचते थे कि अंतरजातीय विवाह भेदभाव को मिटाने के लिए एक उपयुक्त रणनीति है जबकि कांशीराम के अनुसार दलितों को अपनी जाति के आधार पर समाज में प्रतिष्ठा हासिल करनी चाहिए।
3. अम्बेडकर दलितों के लिए पृथक चुनाव मंडल की मांग करते थे, लेकिन कांशीराम इसके खिलाफ थे। उनका मानना था कि समतामूलक समाज का निर्माण करने के लिए दलितों को राजनीतिक सत्ता हथियाना चाहिए।
4. अम्बेडकर अमेरिका के कोलंबिया विवि में पढ़े थे। उन्होंने पश्चिम की ज्ञान परंपरा का गहन अध्ययन किया था। वे दलित प्रश्न का विश्लेषण ऐतिहासिक आधार पर करते थे। दूसरी ओर कांशीराम ठेठ देहात में पले-बढ़े थे व उन्हें इतिहास एवं मिथक का घालमेल करने में कोई समस्या नहीं थी।
5. अम्बेडकर ने वंचित समाज की मुक्ति की राजनीति को दलित आंदोलन का नाम दिया,जबकि कांशीराम दलित संज्ञा के प्रयोग से बचकर बहुजन आंदोलन की बात करते हैं। उनका मानना है कि दलितों को दलितपन से बाहर निकलना चाहिए।
6. दलित मुक्ति के लिए अंबेडकर अपने आंदोलन को एक नैतिक पृष्ठभूमि में देखते हैं जबकि कांशीराम के लिए व्यावहारिकता ज्यादा महत्वपूर्ण है।

इस तरह कहा जा सकता है कि कांशीराम ने अम्बेडकर की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया, लेकिन अपनी शर्तों पर। अपने विचारों को मूर्तरूप देने के लिए उन्हें मायावती के रूप में एक युवा, प्रखर अनुयायी मिलीं। कांशीराम ने स्वयं किसी राजनीतिक पद की अभिलाषा नहीं रखी, लेकिन मायावती को आगे कर उन्होंने सत्ता हासिल करने की राजनीति सफलतापूर्वक की और जब भी उचित अवसर हाथ में आया तो उसका उपयोग दलित अस्मिता को पुष्ट करने में लगाया। कांशीराम और उनके मार्गदर्शन में मायावती ने एक तरफ इतिहास और मिथकों से खोज-खोजकर बहुजन समाज के आदर्श पात्रों को निकाला और दूसरी तरफ फुले, अम्बेडकर और हाथी की प्रतिमाएं स्थापित की। इनके माध्यम से उन्होंने बहुजन समाज में आत्मविश्वास व स्वाभिमान का संचार करने का प्रयत्न किए।  फिलहाल यह पुस्तक हिन्दी में उपलब्ध नहीं है। हमारा अनुरोध है कि स्वयं बद्रीनारायण ही इसे हिन्दी में लाएं ताकि इस पर व्यापक पैमाने पर विमर्श हो सके। पुस्तक के अंत में बद्रीनारायण कुछ निराश नजर आते हैं। वे कहते हैं कि ''अपने स्वार्थों के लिए खुद को बेच देने वालों पर कांशीराम ने तीखे प्रहार किए हैं। आज बसपा में भी हालात कुछ वैसे ही हैं। मायावती के नेतृत्व में बसपा को अल्पकालिक राजनीति छोड़कर वृहत्तर उद्देश्य पर ध्यान केन्द्रित करना होगा, वही कांशीराम को सही श्रद्धांजलि होगी।
अक्षर पर्व दिसंबर 2014 अंक की प्रस्तावना