Wednesday, 31 December 2014

नया साल और नौजवान




पर्व, उत्सव, त्यौहार, छुट्टी- इन सबका असली आनन्द तो मुख्यतौर पर बच्चे और नौजवान ही उठाते हैं। ऐसा नहीं कि जो युवावस्था पार कर चुके हैं वे इस आनन्द से वंचित रहते हैं, किन्तु जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है कुछ मन की थकान और कुछ देह की थकान के कारण उत्साह धीमा पडऩे लगता है। कुछ लोग समय से पहले बूढ़े हो जाते हैं उन पर भी यही बात लागू होती है।  आनन्द के किसी भी अवसर पर आपको अपने आस-पास ऐेसे व्यक्ति मिल जाएंगे जो स्मृतियों के सहारे जीते हैं। उनसे आप सुन सकते हैं कि हमारे जमाने में तो ऐसा होता था। फिर भी कहना होगा कि वरिष्ठ नागरिकों के समूह में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो जिन्दगी को जीना चाहते हैं और जीवन के शेष दिनों का एक-एक पल  आनन्द उठाने की कोशिश करते हैं। ये लोग बच्चों के साथ बच्चे बन जाते हैं और तरुणों के साथ तरुण। यह अच्छी बात है कि पिछले दशकों में देश में औसत आयु बढऩे के साथ-साथ बुजुर्ग नौजवानों की संख्या भी बढ़ रही है।

बहरहाल, आज हम अपनी बात जो युवा पीढ़ी है, उस तक सीमित रखना चाहते हैं। आज प्रारंभ होने वाला नववर्ष उनके लिए क्या खुशियां लेकर आया है और कौन सी संभावनाएं, इस पर विचार करना शायद अवसर के अनुकूल होगा। एक किशोर, तरुण या नवयुवा- मोटे तौर पर मान लीजिए सोलह से पच्चीस का आयु वर्ग। उसकी आशा, आकांक्षाएं क्या हैं ?  सामान्य सोच कहती है कि आज लड़की हो या लड़के, वे एक ऐसे जीवन की कल्पना करते हैं जो निरापद और सुखद हो, जिसमें अच्छी शिक्षा प्राप्त करने का अवसर हो, ठीक-ठाक तरीके से जीवनयापन के साधन जुट जाएं, सच्चा प्यार करने वाला जीवन साथी हो और फुर्सत के लम्हों में मनचाहा मनोरंजन हो सके। अपने देश की परिस्थितियों पर एक उड़ती निगाह डालें तो शायद यह सब कुछ उपलब्ध है।

आज गांव-गांव में अंगे्रजी मीडियम स्कूल खुल गए हैं। विदेशों में जाकर पढऩे के लिए सरकारी बैकों से ऋण मिल जाता है। जीवनयापन के लिए अब नौकरी नहीं, बल्कि कॅरियर संज्ञा का इस्तेमाल होता है। कदम-कदम पर बेहतर कॅरियर का सपना दिखाने वाले प्रतिष्ठान हैं। मनोरंजन के लिए आज क्या नहीं है- मॉल, मल्टीप्लेक्स, स्मार्ट फोन, बाइक, मैरीन ड्राइव और तरह-तरह के सरंजाम। सच्चे जीवन साथी की तलाश भी शायद पहले से आसान हो गई है और सुखमय जीवन की कल्पना शायद इस रूप में साकार हो रही है कि पहले रिटायरमेंट के बाद घर बनाने की बात सोची जाती थी, आज कॅरियर के पहले-दूसरे साल में ही फ्लैट बुक हो जाता है। आप आपत्ति कर सकते हैं कि ये सारी सुख-सुविधाएं हर नौजवान को मयस्सर नहीं हैं । जो आर्थिक रूप से सक्षम हैं वही इन्हें हासिल कर सकते हैं और लड़कियों की जहां तक बात है उनकी सुरक्षा तो एक सपना ही है। बात सही है। इसका अर्थ यह भी हुआ कि नया साल हो कि अन्य कोई अवसर, हर नौजवान एक तरह से आनन्द नहीं उठा पाता। इसका कारण ढूंढना चाहिए।

यह सोचना शायद गलत नहीं है कि हमारे वर्ग-विभाजित समाज में खाई लगातार बढ़ रही है और उसका सीधा असर युवजनों पर पड़ रहा है। हमने युवाओं के लिए ऐसे तमाम साधन जुटा लिए हैं जिनमें मशगूल रहते हुए वे अपने समय की सच्चाईयों से कट जाएं। दूसरी तरफ वे व्यवस्थाएं भ्रष्ट या नष्ट कर दी गई हैं जहां युवा पीढ़ी एक मंच पर आकर एक-दूसरे से रूबरू हो सके और परस्पर समझ विकसित कर सके। इस बात को यूं समझा जा सकता है कि पिछले तीस-चालीस साल में देश में कोई बड़ा छात्र आन्दोलन नहीं हुआ। जिन छात्रसंघों के माध्यम से नवयुवा आगे आते थे उनको निष्प्रभावी बनाने के लिए हर संभव कोशिश की गई है। राजनीतिक दलों के भी जो छात्र अथवा युवा संगठन हैं उनमें भी वैचारिक आधार पर चर्चाएं नहीं होतीं, बल्कि अराजक वातावरण निर्मित करने के लिए नौजवानों को उकसाया जाता है।

यह स्थिति भविष्य के प्रति चिंता उपजाती है। हम जानते हैं कि वर्चस्ववादी ताकतें युवाओं को भरमाने के लिए नित नए उपाय करती रहेंगी। यह तो खुद नयी पीढ़ी के सोचने की बात है कि वह मृगमरीचिका के पीछे न दौड़े। जिन्हें वोट देने का अधिकार मिल चुका है उनसे इस समझदारी की अपेक्षा तो करना ही चाहिए। हम भरोसा करना चाहते हैं कि आज नहीं तो कल देश के नौजवान वस्तुस्थिति को समझेंगे और मिल-जुल कर एक नया समाज बनाने के लिए अग्रसर होंगे। इन्हीं विचारों के साथ नौजवानों को 2015 की शुभकामनाएं।
देशबन्धु सम्पादकीय 1 जनवरी 2015