Wednesday, 7 May 2014

वैमनस्य की राजनीति





अभिनेत्री
रानी मुखर्जी व निर्देशक आदित्य चोपड़ा ने कुछ दिन पूर्व इटली में जाकर विवाह रचाया। इस पर एक मोदीभक्त ने ट्वीट किया कि अगर ये लोग 16 मई तक रुक जाते तो उनके विवाह में सोनिया, राहुल, प्रियंका और राबर्ट भी शामिल हो जाते। मुझे यह टिप्पणी सुरुचिपूर्ण नहीं लगी। इस पर मैंने अपनी प्रतिक्रिया इन शब्दों में की-''क्यों भाई, क्या भारत इनका घर नहीं है और क्या आपके यहां बहू-बच्चों को घर से निकाल दिया जाता है? इसके बाद ट्विटर में मुझ पर अपशब्दों की जो बौछार हुई उसके बारे में कुछ न लिखना ही बेहतर होगा। इस प्रसंग से पता चलता है कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को किस तरह व्यक्तिगत वैमनस्य के स्तर पर लाया गया, उसमें भी असहिष्णुता का परिचय देते हुए सामान्य शिष्टाचार को भी ताक पर रख दिया गया। मुझे इससे हैरत नहीं हुई क्योंकि जनसंघ और भाजपा के अधिकतर नेता-कार्यकर्ता लंबे समय से इसी भांति निजी कुंठा का परिचय देते आए हैं।

मुझे 1965 के भारत-पाक युद्ध के समय का एक प्रसंग ध्यान आता है। उन दिनोंं महान शिक्षाविद् व स्वाधीनता सेनानी डॉ. जाकिर हुसैन भारत के उपराष्ट्रपति थे। उनके बारे में जोर-शोर से अफवाहें फैलाई गईं कि वे पाकिस्तान के लिए जासूसी कर रहे थे इसलिए उन्हें नजरबंद कर लिया गया है। ऐसी बेसिर-पैर की बात कहां से उड़ाई गई होंगी, पाठक स्वयं अनुमान लगा सकते हैं। इसी तरह 11 जनवरी 1966 को ताशकंद समझौते के तुरंत बाद प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के हृदयाघात से निधन पर भी अफवाहें फैलाई गईं कि उन्हें जहर देकर मारा गया। इसे लेकर कानाफूसी तो की ही गई, अखबारों में भी छपा और वीररस के एक कथित कवि तो कवि सम्मेलनों के मंच से उनके सपनों में श्रीमती ललिता शास्त्री के आकर कहने का बखान करने लगे कि शास्त्रीजी को जहर दिया गया है। ऐसा प्रचार करने वालों ने एक क्षण भी यह सोचने की जहमत नहीं उठाई कि उस वक्त भारत में ऐसा कोई भी शक्तिशाली नेता नहीं था जो इतने बड़े षडय़ंत्र को अंजाम दे पाता। जाहिर है कि इसका उद्देश्य इंदिरा गांधी को बदनाम करना मात्र था। इस आरोप को हाल-हाल में वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर ने भी अपनी आत्मकथा में दोहराया है जबकि इस बीच शास्त्रीजी के तीन बेटे कांग्रेस के संसद सदस्य और एक बेटे मंत्री भी रह चुके हैं।

भारत में एक ऐसा वर्ग है जो देश में कुछ भी गलत हो उसका दोष पंडित नेहरू या उनके वंशजों पर सुविधापूर्वक मढ़ देता है। यह सिलसिला 1947 से अब तक चला आ रहा है। 2004 में सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बन जाने की संभावना मात्र से ही सामान्यत: हँसमुख सुषमा स्वराज किस कदर बिफर गई थीं! उन्होंने अपना सिर मुंडवाने तक की धमकी दे डाली थी। उन्होंने यह न सोचा था कि सोनिया गांधी स्वयं प्रधानमंत्री पद ठुकरा देंगी। इधर 2014 के चुनावों में ऐसी उग्र प्रतिक्रियाएं बार-बार देखने-सुनने मिल रही हैं। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने एक नहीं, दो बार कहा कि मोदी सरकार बनेगी तो राबर्ट वाड्रा को जेल भेज देंगे। उन्हें इस बात की परवाह नहीं है कि देश का कानून क्या कहता है और अभी तो यह भी तय नहीं है कि उनकी सरकार बनेगी कि नहीं। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी तो पहले दिन से ही राहुल गांधी को शहजादा कहकर मखौल उड़ानेे की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनावों के समय कवर्धा में दिया अपना भाषण याद नहीं रहा कि यदि डॉ. रमन सिंह कांग्रेस में होते तो अपने बेटे अभिषेक को चुनाव लड़ाते, न कि सामान्य कार्यकर्ता अशोक साहू को। अब वही अभिषेक सिंह मोदी के नेतृत्व में लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसे में जब नरेन्द्र मोदी मतदाताओं से कहते हैं कि वे उन पर विश्वास करें तो उनके वचनों का खोखलापन प्रकट होने लगता है।

नरेन्द्र मोदी की निगाह में राहुल गांधी शहजादे हैं, लेकिन वे गुजरात में अपने ही मंत्री सौरभ पटेल के बारे में बात नहीं करते जो कि नवकुबेर अंबानी के दामाद हैं। श्री मोदी अपनी पार्टी के इतिहास की भी जानबूझ कर अनदेखी कर देते हैं। विजयाराजे सिंधिया क्या थीं? उनकी बेटियां वसुंधरा राजे और यशोधरा राजे क्या हैं? वसुंधराजी के बेटे दुष्यंत सिंह को किस श्रेणी में रखा जाएगा, और वसुंधराजी के मामा ध्यानेंद्र सिंह और मामी माया सिंह को? मोदीजी के तर्क के अनुसार तो मेनका गांधी और उनके सुपुत्र वरुण गांधी को भी भाजपा में नहीं होना चाहिए और न ही प्रेमकुमार धूमल के बेटे अनुराग सिंह को। मोदीजी ने यशवंत सिन्हा के बेटे जयंत सिन्हा को इस बार लोकसभा का टिकट क्यों दिया? मुझे और भी बहुत से उदाहरण याद आ रहे हैं, लेकिन कहां तक नाम गिनाएं! प्रश्न है कि श्री मोदी व उनके प्रशंसक समर्थक शीशे के घर में रहकर दूसरे के घर पत्थर क्यों फेंक रहे हैं।

इधर जब से प्रियंका गांधी ने राहुल गांधी के चुनाव क्षेत्र अमेठी की कमान संभाली है तब से उनके ऊपर भी भाजपा के नेता कार्यकर्ता बेदम हमले किए जा रहे हैं। राबर्ट वाड्रा के बारे में मेरे जो विचार हैं उन्हें इसी कॉलम में 11 अक्टूबर 2012 को लिख चुका हूं। मेरा कहना है कि श्री वाड्रा ने यदि कहीं विधि-विधान का उल्लंघन किया है तो भाजपा उनके ऊपर मुकदमे चलाए, लेकिन अपराध सिद्ध होने के पहले किसी को अपराधी क्यों माना जाए। राजस्थान में तो भाजपा की सरकार है। वहां यदि श्री वाड्रा ने कुछ गड़बड़ की है तो सरकार को वैधानिक कार्रवाई करने से किसने रोका है? लेकिन ऐसा न कर सिर्फ दुष्प्रचार करना क्या दर्शाता है? मुझे हैरत है कि भाजपा के बड़े नेता रविशंकर प्रसाद इत्यादि भी प्रियंका को अब श्रीमती वाड्रा कहकर संबोधित करते हैं। ऐसा करके वे एक औरत का अपमान कर रहे हैं। प्रियंका यदि अपने पिता का कुलनाम जोड़ कर खुद को प्रियंका गांधी कहलाना पसंद करती हैं तो उन्हें इसी तरह से संबोधित किया जाना चाहिए। शिष्टाचार इसी में है। बंगाल में तो ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जहां पतिगृह और पितृगृह दोनों से मिलाकर नए  कुलनाम प्रचलन में आ गये हैं।

इसी रौ में मुझे दो प्रकरण और ध्यान आते हैं। एक तो 1977 में जब इंदिरा गांधी चुनाव हार गईं तो यह प्रचारित किया गया कि राजीव गांधी अपनी ससुराल जाकर बस जाएंगे। हम जानते हैं कि ऐसा नहीं हुआ, बल्कि राजीव गांधी इंडियन एयर लाइंस में पायलट की नौकरी बदस्तूर करते रहे। फिर इंदिराजी की हत्या के बाद यह निंदनीय दुष्प्रचार किया गया कि उन्होंने अपनी किसी डुप्लीकेट को मरवा डाला है और वे खुद स्विट्जरलैंड भाग गईं हैं। मैं नहीं जानता कि ऐसी ओछी बातें करने में लोगों को क्या आनंद आता है। मुझे ध्यान नहीं आता कि कांग्रेस अथवा कम्युनिस्ट पार्टियों के बड़े नेताओं ने कभी विपक्ष के बारे में इस स्तर तक उतरकर अशोभनीय टिप्पणियां की हों। भाजपा में भी अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता ने भी ऐसी टिप्पणियां नहीं कीं। क्या यह इसकी वजह थी कि वाजपेयीजी राजनीतिक शिष्टाचार का मूल्य समझते थे? भैरोंसिंह शेखावत, लालकृष्ण आडवानी या मुरली मनोहर जोशी को भी ऐसे निजी आक्षेप करते हुए शायद ही कभी देखा गया हो। अफसोस इस पर कि काश वे अपनी अगली पीढ़ी को राजनीति में सद्भाव, सौमनस्य निभाने के संस्कार दे सकने में सफल हो पाते।

देशबन्धु में 08 मई 2014 को प्रकाशित
 

Friday, 2 May 2014

रेंगने का वक्त



''आज बंद हैं/  दुनिया के तमाम स्कूल/  रविवार जो है/ बच्चों के बिना/  जैसे भुतहा महलों में/  तब्दील हो गए हैं स्कूल/  हाथों में छड़ी लिए/  घूम रही हैं/ गुस्सैल प्रेतात्माएं/  जब तक पूरा नहीं होगा/  बच्चों का होमवर्क/  बेचैन प्रेतात्माएं/  यूं ही भटकती रहेंगी।'' (होमवर्क)


महज तेरह पंक्तियों की छोटी-सी कविता। क्या कह रही है ये कविता? क्या इसे पढ़कर आप व्याकुलता अनुभव कर रहे हैं? क्या आपको लगा कि यह कविता आपको उठाकर कहीं साथ चलने का इसरार कर रही है? कहां- किसी स्कूल में, आपके बच्चों की दुनिया में, उनकी कापी किताबों में!

मैंने जब यह कविता पढ़ी तो मेरे सामने जैसे किसी भव्य इमारत में चल रहे बड़े स्कूल का मुख्य द्वार खुल गया हो। सुन्दर-सी इमारत है, प्रशस्त मैदान है, ढेर सारी बसें खड़ी हैं जो बच्चों को स्कूल लाने-ले जाने का काम कर रही हैं। स्कूल में चहकते हुए बच्चे हैं। यह कोई ऐसा स्कूल है जहां मां-बाप अपने बच्चों को लाखों मिन्नतों, मशक्कतों के बाद भर्ती करा पाते हैं, फिर सालाना लाख-दो लाख रुपया फीस देते हैं। गाहे-बगाहे चंदे के रूप में भी रकम देनी पड़ती है। बच्चे की पीठ पर बस्ते का बोझ है। स्कूल में जो पढ़ाई होती है, सो होती है, इसके अलावा उन्हें टयूशन भी लेनी पड़ती है और रविवार का दिन हो या सर्दी-गर्मी की छुट्टियां, होमवर्क तो रहता ही रहता है।

इस दरवाजे से हटता हूं तो एक दूसरा स्कूल सामने आ जाता है। शहर की किसी नई कॉलोनी के किसी रिहायशी घर में चलता हुआ। उस पर अंग्रेजी मीडियम स्कूल का बोर्ड लगा है। अपने बच्चों का कैरियर बनाने के लिए व्यग्र और चिंतित वे मां-बाप ऐसे ही किसी स्कूल में बच्चे का दाखिला करवाते हैं जिनके पास महलनुमा स्कूल की फीस पटाने योग्य साधन नहीं है। बच्चे अंग्रेजी पढ़ते हैं- सही या गलत। उसी में बोलने-बतियाने लगते हैं। माता-पिता के देखे सपने अब उनकी आंखों में हैं। वे अपने लिए एक नए किस्म का वातावरण, एक नए तरह का समाज बनाना चाहते हैं। उनकी इच्छाओं को मूर्त रूप देने के लिए बहुत से सरंजाम मौजूद हैं- फिल्मी सितारे, टीवी सितारे, क्रिकेट खिलाड़ी, अंबानी, चेतन भगत, बरखा दत्त इत्यादि।

इनसे परे वे शालाएं हैं जिन्हें सरकार या नगरपालिकाएं चलाती हैं। इन स्कूलों में बड़ी संख्या में वे बच्चे आते हैं जिन्हें कहीं और ठिकाना नहीं मिलता है। उनके घर की हैसियत ही ऐसी नहीं है। यहां जो अध्यापक पढ़ाते हैं वे सरकार के नियमित कर्मचारी भी नहीं है। स्कूल की इमारत एक बार बन गई सो बन गई, उसमें फिर बरसों मरम्मत नहीं होती। बच्चे जितना पढ़ लें सो ठीक। कितने तो सिर्फ इसलिए आते हैं कि मध्यान्ह भोजन योजना में कम से कम एक वक्त का भोजन तो मिल ही जाता है। भारत में नब्बे प्रतिशत स्कूल ऐसे ही हैं। हम जनतंत्र की बात करते हैं, लेकिन दस प्रतिशत स्कूल जिस कुलीन वर्ग के लिए चलते हैं देश पर शासन उन्हीं का है। नब्बे प्रतिशत बहुमत वालों को तो जीवन-यापन के लिए जो सहारा मिल जाए वही बहुत है। खासकर इनके लिए ही शिक्षा का अधिकार कानून लागू हुआ। कुलीन जानते हैं कि उनके बच्चों को ऐसे स्कूलों में पढ़ाकर उन्हें बिगाड़ना नहीं है। देखिए यह कविता मुझे कहां से कहां ले गई! बच्चों को अवकाश के दिन भी होमवर्क करना है। गुस्सैल प्रेतात्माएं सिर्फ स्कूल में ही नहीं, शायद घर में भी हैं। तो शायद इस तरह बनेगा देश का भविष्य!

कविता यही तो करती है कि वह आपके सामने जाने कितनी खिड़कियां, कितने दरवाजे, कितनी सड़कें खोलकर रख देती है। बशर्ते वह सचमुच कविता हो। जुमलेबाजी नहीं, नारेबाजी नहीं, चुटकुलेबाजी नहीं। कविता आपको अपने मन के अंधेरे कोनों में झांकने के लिए विवश करती है। वह आपको वहां ले जाती है जहां से आप शायद पिंड छुड़ाकर भाग आए हैं! आपने अगर अपनी आंखों को हथेली से ढांप रखा है, तो कविता हथेलियों को हटा देती है। मजबूर करती है कि जिन दृश्यों को देखने से बचना चाहते हैं उन्हें देखें। अपनी बात के समर्थन में मैं सिर्फ दस पंक्तियों की एक और छोटी कविता यहां उध्दृत कर रहा हूं-
''कितनी बड़ी और खूबसूरत कार है/  विज्ञापन में/  अभी बैठ जाओ इसमें/  तो लगेगा/  जैसे दौड़ने लगेगी सड़कों पर/  पर कार अभी विज्ञापन में है/  फिर भी/  दौड़ रही है/  दिल और दिमाग के बीच/  सरपट।'' (विज्ञापन)

देखिए, ये पंक्तियां आपसे क्या कहती हैं? इक्कीसवीं सदी में नवउदारवाद के नाम पर पूंजीवाद ने अपना कारोबार किस तरह बढ़ाया है उसने बाजार की परिभाषा बदल दी है और बाजार का स्थान भी। क्या आपने कभी सोचा कि इन दिनों बिला वजह, बेजरूरत बाज़ार का रुख क्यों कर लेते हैं? अब हम बाज़ार  इसलिए नहीं जाते कि हमें सचमुच में कोई सौदा-सुलुफ करना है। अपने समय के जाने-माने हास्य कवि रमई काका ने लखनऊ के अमीनाबाद बाज़ार का चित्रण किया था कि वहां की चकाचौंध में तो लोग किस तरह धोखे में पड़ जाते हैं। अब तो कई गुना चकाचौंध है और कदम-कदम पर धोखा। अमृतसर से लेकर मदुरै तक शुरु-शुरु में सिर्फ कौतूहलवश मॉल में जाते थे, अब आपको अनजाने ही वहां बार-बार जाने का आकर्षण होने लगा है। नियोन लाइटों और विज्ञापनों ने मिलकर जैसे सोचने की क्षमता ही छीन ली है। जो कार इस वक्त दिल और दिमाग के बीच दौड़ रही है, वह आपकी प्राथमिक जरूरतों को खारिज करते हुए आपके बैंक बैलेंस को नीचे लाते हुए किस दिन आपके दरवाजे पर आकर खड़ी हो जाएगी, यह आप भी नहीं जान पाएंगे। देखता हूं कि कितने ही निम्न आय वर्ग के लोग ज़ीरो प्रतिशत ऋण के लोभ में बाइक या मोपेड खरीद लेते हैं, उसकी किश्त चुकाने के लिए व्यवस्था नहीं हो पाती, पेट्रोल भरवाने के लिए भी दो बार सोचना पड़ता है। ऐसे में किसी दिन जिस शोरूम से दुपहिया गाड़ी खरीदी गई है, वापिस वहीं सेकेण्ड हैंड बिकने के लिए आ जाती है। तो पूंजीवाद अपने नए अवतार में इस तरह का सलूक आपके साथ करता है जैसे सूनी राह पर अकेले राहगीर को चार नकाबपोश डाकू मिलकर लूट लेते हैं! ये सचमुच डाकू हैं। इनके मुंह पर नकाब है इसलिए उनकी शिनाख्त नहीं हो पाती है। लेकिन इस कविता को फिर से पढ़िए। कवि उस नकाब को हटाकर अपराधी को आपके सामने खड़ा कर रहा है।

ये दोनों कविताएं मैंने युवा कवि मणि मोहन के हाल में प्रकाशित कविता संग्रह ''शायद'' से ली हैं। मेरा कवि से प्रत्यक्ष परिचय नहीं है यद्यपि उनकी कविताएं अक्षर पर्व में पहले छपी हैं। मध्यप्रदेश के छोटे से कस्बे गंजबसौदा के निवासी मणि मोहन का पहला संग्रह 2003 में छपा था। एक दशक के अंतराल से प्रकाशित इस नए संकलन में सत्तर कविताएं हैं। अधिकतर कविताएं पन्द्रह-बीस पंक्तियों की हैं, याने कवि का मिजाज छोटी कविताओं का ही है। जैसा कि मेरा हमेशा से मानना रहा है, सामाजिक सरोकारों के बिना सच्ची कविता नहीं लिखी जा सकती। बाकी सब वाग्विलास है। मणि मोहन की कविताएं सिध्द करती हैं कि वर्तमान में हमारे आसपास जो कुछ घटित हो रहा है उस पर कवि की पैनी नजर है। यद्यपि इन कविताओं में और भी रंग हैं। इनमें प्रेम भी है और मृत्यु भी, बच्चे भी हैं और प्रकृति भी। सबसे अच्छी बात यह कि मणि मोहन ने जो भी विषय उठाए उनका बयान करने में बड़बोलापन नहीं दिखाया है। वे इस तरह अपनी बात रखते हैं कि धीरे से पाठक के मन में उतर जाए। मेरा ख्याल है कि उनकी चिंतन प्रक्रिया को समझने के लिए 'घर' शीर्षक कविता को देखना चाहिए-

''प्रणाम करता हूं/  भेड़ियों को/  आते जाते/  सजदा भी करता हूं/  कभी-कभी  लकड़बग्घों के दरबार में/  क्या करूं.../ एक घने बीहड़ से होकर/ गुज़रता है/  मेरे घर का रास्ता।'' (घर)

अगर मैं कहूं कि हर युग में सामान्य नागरिक को ऐसी ही परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, तो गलत नहीं होगा। इसके बावजूद वह कवि ही होता है जो समाज की आंतरिक पीड़ा को अभिव्यक्ति देने के लिए अपनी कविता से रास्ता बना लेता है। चाहता तो हूं कि इस संकलन से और भी कविताएं उध्दृत करूं, लेकिन यह कवि और पाठक दोनों के साथ अन्याय होगा। मुझे संकलन की अधिकांश कविताएं अच्छी लगी हैं। यद्यपि प्रेम कविताओं में कोई नयापन नहीं लगा। ''एक सुपरस्टार की अंतिम यात्रा'' व ''इस तरह'' जैसी कविताओं में कवि ने पाखंड को उजागर किया है। उसने मुझे प्रभावित किया। कविता और भाषा पर मणि मोहन का जो विश्वास है वैसा विश्वास हर रचनाधर्मी को होना चाहिए। ''हत्यारों की रुचि'' में कवि इस ओर आगाह करता है कि समर्थतंत्र किस तरह रचनाशीलता को खरीदने का षडयंत्र करता है। अंत में मैं ''वक्त'' कविता को पूरा उध्दृत करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूं।

''ज़रा-सा तनकर चले/  कि तकलींफ होने लगी चौखटों को/ ज़रा-सा झांका भीतर/  कि डपट दिया रोशनदान ने/ बंद दरवाजे के बाहर/  मैं खड़ा रहा सुबह से शाम तक/  एक बार फिर पूछा मैंने-/  'क्या मैं अंदर आ सकता हूं श्रीमान्?'/  अपनी ही आवाज़ की अनुगूंज/  सुनी मैंने बार-बार/  मैंने गौर से देखा/ इस बार दरवाज़े को/  दरवाज़ा पूरी तरह बंद था/  और लोग रेंगते हुए/  दरारों से भीतर जा रहे थे-/  बड़ी देर बाद समझ में आया मुझे/  कि वक्त/  दरारों से भीतर रेंगने का है।'' (वक्त)

यह रचना बहुत कुछ कह जाती है।
 
अक्षर पर्व अप्रैल 2014 अंक में प्रकाशित  
 

गांधी गुजराती थे?





मैं
बड़ी उलझन में हूं। अभी दो दिन पहले अंतरराष्ट्रीय स्तर की एक समाजसेवी संस्था का बड़ा सा कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। इसमें भारत के आधा दर्जन प्रांतों के प्रतिनिधियों ने शिरकत की। कार्यक्रम का उद्घाटन करने जिन्हें बुलाया गया था वे उस संस्था के बड़े पदाधिकारी थे। अपने उद्घाटन वक्तव्य में उन्होंने यह स्थापित करने का प्रयत्न किया कि महात्मा गांधी गुजराती थे। चूंकि मुख्य अतिथि स्वयं गुजराती भाषी थे इसलिए महात्मा पर उनका दावा कुछ-कुछ समझ में आता है। चूंकि मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म गुजरात के पोरबंदर में गुजराती मूल के एक परिवार में हुआ था इस नाते भी उनकी बात में दम था। महात्मा गांधी के बाद उन्होंने बात आगे बढ़ाई कि सरदार पटेल भी गुजराती थे। उनकी यह बात भी सच थी और इस बारे में भी कोई बहस नहीं की जा सकती, फिर मैं उलझन में क्यों हूं? हुआ यह कि वक्तव्य आगे बढ़ा और उसमें कहा गया कि नरेन्द्र मोदी भी गुजराती हैं। इसमें भी क्या शक है। सवाल उठता है कि क्या गांधी और पटेल की परंपरा में मोदी का नाम जोड़ा जा सकता है?

यह प्रश्न ऐसा है जिसके उत्तर में दर्जनों किताबें लिखी जा सकती हैं, लेकिन मैं अपनी बात इस कॉलम की सीमित जगह में रखने की कोशिश कर रहा हूं। हम जानते हैं महात्मा गांधी का ताल्लुक एक सम्पन्न परिवार से था और वे उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड गए थे। एक सुखी जीवन बिताने के लिए उनके पास विकल्पों की कोई कमी नहीं थी। इसके बावजूद उन्होंने जिस फकीरी ठाठ से जीवन जिया उसे देश का बच्चा-बच्चा जानता है और दुनिया के तमाम देशों में उनकी यही छवि लोगों को लुभाती है। महात्मा गांधी कांग्रेस पार्टी के चवन्नी सदस्य भी नहीं थे, लेकिन पार्टी ने उन्हें अपना डिक्टेटर मान लिया था। बापू यदि चाहते तो भारत के पहले राष्ट्रपति बन सकते थे, लेकिन उन्हें न तो कोई पद चाहिए था और न अपनी कुटिया ही छोडऩी थी। वे बंधुत्व, न्याय, समता व समरसता के आधार पर जिस रामराज्य का स्वप्न देखते थे उसके लिए उन्होंने अपने प्राणों की बलि दे दी। महात्मा गांधी के जीवन और दर्शन पर जो हजारों किताबें लिखी गईं उसमें इन सारी बातों को विस्तारपूर्वक पढ़ा जा सकता है।

सरदार वल्लभ भाई पटेल भी गुजराती थे। वे एक समृद्ध किसान परिवार से थे। एक वकील के रूप में उन्होंने सूबे में ख्याति हासिल कर ली थी। जिस दिन वे गांधी से मिले उस दिन से उनका जीवन बदल गया। बापू का अनुसरण करते हुए उन्होंने भी स्वेच्छा से एक सन्यासी जैसा जीवन भी जिया। उनकी चारित्रिक दृढ़ता के प्रमाण उनके विद्यार्थी जीवन से ही देखने मिलते हैं। उन्होंने स्वाधीनता के बाद सत्ता की राजनीति में अहम् किरदार निभाया, लेकिन इस सत्य से कोई भी इंकार नहीं करेगा कि उनके लिए सत्ता देश को बेहतरी की ओर ले जाने की एक हिकमत थी तथा उसमें निजी लाभ-लोभ की भावना नहीं थी। यहां पर गौर कीजिए कि महात्मा गांधी चाहते तो एक गुजराती होने के नाते दूसरे गुजराती को भारत का प्रधानमंत्री बना सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और सरदार पटेल ने भी अपना रहनुमा के आदेश का सम्मान करते हुए पंडित नेहरू के प्रधानमंत्री बनने के रास्ते में कोई बाधा उत्पन्न नहीं की। आशय यह कि वे सब एक विशाल लक्ष्य को लेकर चल रहे थे तथा उनमें सांसारिक भोग करने का कोई लालच नहीं था।

हमारे समारोह के उद्घाटनकर्ता ने एक और गुजराती का नामोल्लेख शायद जानबूझ कर नहीं किया। पाठक जानते हैं कि मोहम्मद अली जिन्ना महात्मा गांधी के सबसे प्रचंड-प्रखर विरोधी थे। 1920 के आसपास वह समय था जब जिन्ना साहब कांग्रेस के सबसे बड़े नेता के रूप में उभर रहे थे, महात्मा गांधी कुछ दिन पहले ही दक्षिण अफ्रीका से स्वदेश लौटे थे और जनता के दिलोदिमाग पर कुछ इस कदर छा गए थे कि कांग्रेस के भीतर जिन्नाजी लगभग अपदस्थ कर दिए गए थे। इसके चलते उन्होंने राजनीति का एक नया अध्याय शुरू किया। यूं तो उन्हें नए नजरिए से देखने की कोशिश लालकृष्ण अडवानी व जसवंत सिंह ने की है। इनके अलावा वीरेन्द्र कुमार बरनवाल तथा प्रियंवद जैसे उदारवादी लेखकों ने भी उन पर अपने ढंग से नई रोशनी डाली है तथापि यह सच्चाई अपनी जगह बरकरार है कि मोहम्मद अली जिन्ना देश का बंटवारा कर एक नए देश  के राष्ट्रपिता या कि कायदेआजम बने। वे क्या किसी बड़े लक्ष्य के लिए सैद्धांतिक लड़ाई लड़ रहे थे या व्यक्तिगत अहम् की तुष्टि करना चाहते थे, इस पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।

हमने भारत के राजनैतिक इतिहास के इन तीन महानायकों की संक्षिप्त चर्चा की, किन्तु गुजरात में सिर्फ राजनेता ही तो नहीं हुए हैं। भारत के इस पश्चिमी प्रदेश की आत्मा को यदि जानना है तो इसके लिए पुराकथाओं व इतिहास के अन्य पहलुओं पर भी ध्यान देने की आवश्यकता होगी। यह गुजरात ही तो था जहां मथुरा से चलकर श्रीकृष्ण ने अपने कबीले के साथ आश्रय पाया था। महाभारत में जो विनाशलीला हुई कृष्ण उसके साक्षी थे, लेकिन वे एक और त्रासदी के गवाह बनने अभिशप्त थे कि  उनके वंशधर उनके सामने ही आपस में लड़कर समाप्त हो जाएं। पुराकथाएं यह भी बताती हैं कि स्वयं कृष्ण की मृत्यु बहेलिया का बाण लगने से हुई थी। यह जो कृष्णलीला गुजराती में घटित हुई उसके मर्म को महात्मा गांधी और सरदार पटेल दोनों ने शायद गुजराती होने के नाते अच्छे समझा होगा और इसीलिए उनकी राजनीति सद्भाव और समरसता के सिद्धांत से विकसित हुई। इसी कृष्णलीला में सुदामा का जिक्र भी तो है, जो गुजराती जनमान्यता के अनुसार पोरबंदर के निवासी थे। कृष्ण ने सुदामा की मदद कर क्या यही संदेश नहीं दिया था कि राजधर्म किस तरह निभाया जाता है?

जैसा कि हम जानते हैं महात्मा गांधी का परिवार कृष्णभक्त था और वे बचपन से ही भक्त कवि नरसिंह मेहता की वाणी से प्रभावित थे। उनका सबसे प्रिय पद ''वैष्णव जन तो तैने कहिए पीर पराई जाने रे" आज भी बापू की स्मृति में होने वाले हर कार्यक्रम में उसी तरह भाव-विभोर होकर गाया और सुना जाता है। गुजराती साहित्य में इसी भावधारा पर चलने वाले और भी बहुत से रचनाकार हुए जैसे-झवेरचंद मेघाणी, गुलाबदास ब्रोकर, कुंदनिका कापडिय़ा, पन्नालाल पटेल आदि। इनकी रचनाओं में भी परपीड़ा को समझने की छटपटाहट और वंचित समाज के प्रति गहरी सहानुभूति का भाव स्पष्ट है। नरसिंह मेहता और पन्नालाल पटेल के बीच शताब्दियों के फासले को बांटनेवाला एक और नाम ध्यान आता है- वली दक्कनी या वली गुजराती का। आज जिस हिन्दी का इस्तेमाल हम करते हैं, उसके प्रारंभिक रचयिताओं में वली दक्कनी का नाम आता है जो हैदराबाद छोड़कर अहमदाबाद आ बसे थे और जहां वे वली गुजराती कहे जाते थे। अहमदाबाद में उनकी समाधि के बारे में जो पाठक नहीं जानते वे थोड़ी मेहनत कर जानकारी हासिल कर सकते हैं।

हमें याद आता है कि गुजरात में महात्मा गांधी ने अपने दो और अलबेले साथी तैयार किए थे। एक थे- रविशंकर व्यास याने कि रविशंकर महाराज जिनके बारे में प्रसिद्ध है कि उन्होंने दुर्दांत दस्युओं का हृदय परिवर्तन कर उन्हें हिंसा छोड़ अहिंसा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया था। अपने बचपन में मैंने नवनीत में उनके बारे में इस तरह की कथाएं पढ़ी थीं। गांधीजी के दूसरे साथी थे- ठक्कर बापा। दिल्ली वालों को शायद आज यह याद न हो कि नई दिल्ली के बापानगर का नामकरण उनकी स्मृति में ही किया गया था। गांधीजी के आदेश पर ठक्कर बापा ने तत्कालीन सीपी एंड बरार प्रांत में आदिवासियों के बीच रहकर लंबे समय तक काम किया था। आज भी मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में जगह-जगह पर ठक्कर बापा के नाम पर स्कूल व आश्रम इत्यादि हैं। जहां तक मुझे याद है ठक्कर बापा ने मंडला-डिंडौरी के बैगा क्षेत्र में लंबा समय बिताया था। 

राजनीति, साहित्य समाजसेवा के अलावा एक और क्षेत्र है जहां गांधी के आदर्शों की धुंधली छाप आज भी विद्यमान है। गुजरात अपनी उद्यमशीलता के लिए प्रारंभ से जाना जाता रहा है। बीसवीं सदी के उद्योगपतियों में ऐसे कितने ही थे जो किसी हद तक महात्मा गांधी से प्रभावित थे। इनमें एक नाम लेना हो तो साराभाई का लिया जा सकता है। एक तरफ इस परिवार ने जहां कपड़ा उद्योग में अपनी उद्यमशीलता का परिचय दिया, वहीं विक्रम साराभाई ने देश की वैज्ञानिक प्रगति में जो अग्रणी भूमिका निभाई उसके बारे में ज्यादा कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। उनकी बेटी मल्लिका और बेटे कार्तिक साराभाई ने भी गांधीवादी मूल्यों के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया है। मैं एक नाम और लेना चाहूंगा देश के सुविख्यात वास्तुशिल्पी बालकृष्ण दोशी का, जिन्होंने मकबूल फिदा हुसैन के साथ मिलकर अहमदाबाद में गुफा नाम से चित्रदीर्घा की स्थापना की है।

मैं अपने सम्मानीय मुख्य अतिथि से पूछना चाहता हूं कि गांधी और पटेल की परंपरा में उन्हें ये सारे नाम याद क्यों नहीं आए? क्या इसलिए कि उनके मसीहा नरेन्द्र मोदी भी इन नामों से जानबूझकर बचना चाहते हैं। भाई, हम तो गांधी को गुजराती तभी मानेंगे जब आप मोदी के बदले इन नामों का स्मरण करेंगे।

देशबन्धु में 1 मई 2014 को प्रकाशित
 

 
 

Wednesday, 23 April 2014

चुनावों में बदजुबानी


 
दुश्मनी लाख सही, खत्म न कीजे रिश्ते
दिल मिले या न मिले, हाथ मिलाते रहिए।
                                -निदा फ़ाज़ली


एक पुरानी कहावत है- बोया पेड़ बबूल का आम कहां से पाएं। यह कहावत हमारे चुने हुए प्रतिनिधियों पर सटीक बैठती है। पिछले कुछ बरसों में हमने देखा है कि निर्वाचित सदनों का कीमती वक्त किस तरह से शोर-शराबे की भेंट चढ़ जाता है तथा लोकमहत्व के मुद्दों पर या तो चर्चा हो ही नहीं पाती और अगर होती है तो उसे आनन-फानन में निपटा लिया जाता है। इसकी वजह क्या यह नहीं है कि हमने ऐसे लोगों को चुनकर लोकसभा और विधानसभा में भेजा जिसके वे सुपात्र नहीं थे? आम चुनावों की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ रही है तब यह आशंका भी बलवती हो रही है कि क्या सोलहवीं लोकसभा में मर्यादाहीनता के पुराने सारे रिकार्ड टूट जाएंगे? इन दिनों चुनाव अभियान के दौरान जिस तरह से उम्मीदवार एक दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे हैं उसे देखकर तो यही लगता है। प्रश्न है कि राजनैतिक व्यवहार में ऐसी गिरावट क्यों आई है? इसके अनेक कारण हैं।

आज अगर विभिन्न दलों के उम्मीदवार शिष्टता की सारी सीमाएं तोड़ रहे हैं तो उसके लिए सबसे बड़े दोषी भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी हैं। इस बारे में बहुत कयास लगाए गए हैं कि स्थापित परंपराओं को त्यागकर एक व्यक्ति को चुनाव पूर्व ही प्रधानमंत्री पद का दावेदार क्यों घोषित किया गया। जो भी हो, ऐसा होने से यह स्थिति बनी कि चुनाव व्यक्ति केंद्रित बना दिया गया। जब कांग्रेस ने प्रत्युतर में अपनी ओर से किसी की उम्मीदवारी घोषित नहीं की तो भाजपा के उकसावे पर मीडिया ने खुद होकर राहुल गांधी को नरेंद्र मोदी का प्रतिस्पर्धी घोषित कर दिया। उधर अरविंद केजरीवाल भी उसी रास्ते का अनुसरण करते हुए मंच पर अवतरित हो गए। इस परिदृश्य में भाजपा और नरेंद्र मोदी दोनों के लिए यह आवश्यक हो गया कि जैसे भी हथकंडे अपनाना पड़ें, श्री मोदी को एक अजेय योद्धा के रूप में प्रस्तुत किया जाए और वही हो रहा है।

नरेंद्र मोदी अपनी सभाओं में बार-बार जिस शब्दावली का प्रयोग कर रहे हैं वह असंसदीय भले न हो, लेकिन यह तो स्पष्ट है कि उससे अनावश्यक कटुता उत्पन्न हो रही है। आज जब भाजपा ने अटल बिहारी वाजपेयी को भुला दिया है तब उसे यह याद दिलाना उचित होगा कि दूसरी लोकसभा में नवनिर्वाचित सदस्य वाजपेयीजी ने जब अपना प्रथम वक्तव्य दिया तो प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने उन्हें स्वयं होकर बधाई व उज्जवल भविष्य की शुभकामनाएं दी थीं। एक क्षण के लिए कल्पना करें कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए हैं तो क्या वे इसी तरह राहुल गांधी को उनके भाषण पर बधाई देने में विशाल हृदयता का परिचय दे सकेंगे? जिस तरह से श्री मोदी बार-बार राहुल गांधी और उनके परिवार पर कटाक्ष कर रहे हैं उसे देखकर ऐसी कोई उम्मीद रखना व्यर्थ है।

यदि भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार अपने विरोधियों पर विष बुझे तीर छोड़ रहे हैं तो कांग्रेस, सपा, बसपा, आप आदि के नुमाइंदे भी अपनी वाणी पर संयम नहीं रख पा रहे हैं। ऐसा लगता है मानो चुनकर संसद में जाने के पहले ही सारा हिसाब-किताब बराबर कर लेंगे। ऐसा नहीं कि प्रत्याशीगण ऐसा आचरण भावावेश में कर रहे हों बल्कि अनुमान होता है कि वे अच्छी तरह से जानबूझकर ही अशिष्ट और अनर्गल भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। इसमें उन्हें दो तरह से फायदा दिखाई देता है। एक तो उन्हें लगता है कि इससे मतदाताओं पर अनुकूल प्रभाव पड़ेगा और वे उनकी बहादुरी के कायल हो जाएंगे और दूसरे कि इससे मीडिया में उनका नाम बिना खास मेहनत किए सुर्खियों में आ जाएगा। तीसरे यह भी संभव है कि इसके लिए उन्हें दल के बड़े नेताओं से सराहना मिलती हो।

यह जो परिस्थिति उत्पन्न हुई है इसकी कुछ जिम्मेदारी चुनाव आयोग को भी स्वीकार करना चाहिए। वह इसलिए कि आम चुनाव की प्रक्रिया बहुत लंबी खिंच गई है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है किंतु व्यक्ति केन्द्रित हो जाने से उसका दुष्प्रभाव कुछ अधिक गहरा गया है। हम जानते हैं कि चुनाव आयोग के सामने तकनीकी सीमाएं हैं। जब मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ रही हो, मतदान का प्रतिशत भी बढ़ रहा हो, चुनाव में घपलेबाजी रोकना हो, नयी तकनीकी का प्रयोग करना हो, मतदाताओं को निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव के प्रति आश्वस्त करना हो तो इतनी व्यवस्थाएं करने में समय तो लगना ही है, किंतु अब चुनाव आयोग को विचार करना होगा कि  कीचड़ उछालने के इस खेल को कैसे रोका जाए।  कई-कई चरणों में मतदान होने से पार्टियों का अपने विरोधियों पर आक्रमण करने का एक नया अवसर हर दो दिन में मिल जा रहा है, इस पर विराम कैसे लगाया जाए।

आज एक नेता एक जगह भाषण देता है, अगले हफ्ते दूसरी जगह जाकर वह उसी बात को दोहरा देता है इस तरह से मर्यादाहीनता लगातार आगे बढ़ती जाती है। चुनाव आयोग ने शिकायत मिलने पर अपनी तरफ से कार्रवाईयां जरूर कीं, लेकिन वे पर्याप्त सिद्ध नहीं हुईं। अमित शाह का उदाहरण लें। चुनाव आयोग ने उन पर लगी बंदिश क्या सोचकर हटा दी।  हमें लगता है कि ऐसे प्रकरणों में आयोग को और ज्यादा सख्ती दिखाना चाहिए। बयान पर विरोधी पक्ष से शिकायत आए उससे पहले आयोग को स्वयं होकर संज्ञान लेना चाहिए। आखिरकार उसके पर्यवेक्षकों का क्या काम है? और जब एक बार आयोग कोई कार्रवाई करे तो वह चुनावी नतीजे आने तक लागू रहे। अमित शाह, आजम खां, गिरिराज सिंह, इमरान मसूद या कोई और, ये सब आयोग की कठोर कार्रवाई से ही वश में आ सकते हैं।

देश के इलेक्ट्रानिक मीडिया को भी अपना उत्तरदायित्व समझने की बेहद आवश्यकता है। प्रिंट मीडिया याने अखबार में छपी बात तो एक सीमित दायरे में ही फैलती है, लेकिन टीवी पर वही बात दैत्याकार रूप ग्रहण कर लेती है। एक तो चैनलों की संख्या बहुत ज्यादा है। उन सब पर एक ही समय में खबर फूटती है, फिर बार-बार का प्रसारण होने से वह बात चर्चा में लगातार बनी रहती है। कोई अच्छी बात टीवी के माध्यम से दूर-दूर तक पहुंचे तब तो उसका स्वागत है, लेकिन जनता को अभद्र, अश्लील, अनर्गल, अशिष्ट चर्चाएं सुनने के लिए अभिशप्त क्यों किया जाए? इसमें यह बिन्दु भी है कि एक चुनाव क्षेत्र में कही गई बात बचे पांचसौ चालीस क्षेत्रों तक अनावश्यक रूप से पहुंच जाती है, जिनका उससे कोई लेना-देना नहीं होता। मुझे गुरुनानक की बोधकथा का ध्यान आता है कि एक लड़ाई-झगड़े वाले गांव के  सारे लोग उसी गांव में रहे आएं ताकि उनका बुरा आचरण वहीं तक सीमित रहे, जबकि समझदारों के गांव के सारे लोग बिखर जाएं ताकि वे दूर-दूर जाकर  समझदारी फैला सकें।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की चर्चा करते हुए उसके एक अन्य रूप याने सोशल मीडिया की अनदेखी नहीं की जा सकती। टीवी में तो फिर भी गुंजाइश है कि उंगली दिखाकर कहा जा सके कि दोषी कौन है, किन्तु फेसबुक व ट्विटर पर सही-गलत खबरें फैलाने वालों की शिनाख्त करना कठिन क्या, असंभव ही है। इन माध्यमों से उम्मीदवारों के बयानों के अलावा दबे-छुपे तरीके से जो दुष्प्रचार किया जा सकता है, किया जा रहा है, उसकी रोकथाम आसान नहीं है। जनता को पिछले दो सालों में बताया गया है कि सोशल मीडिया पर नरेंद्र मोदी सर्वाधिक लोकप्रिय राजनेता हैं और वे ही इसका सबसे बेहतर इस्तेमाल करते हैं। अगर यह बात सही है तो फिर यह अनुमान भी तार्किक रूप से लगाया जा सकता है कि उनके समर्थक-प्रशंसक-कारिंदे ही दुष्प्रचार में भी सबसे आगे होंगे! हम समझते हैं कि चुनाव आयोग को इस पहलू पर भी गौर करना चाहिए कि चुनाव के समय सोशल मीडिया पर ऐसी कोई सामग्री न परोसी जा सके जिससे माहौल प्रदूषित होने का खतरा पैदा होता हो।

जब कभी नेता या प्रत्याशी आपत्तिजनक बातें कहते हैं, तब पार्टी प्रवक्ता यह कहकर बात को उड़ाने की कोशिश करते हैं कि चुनावों के समय ऐसा स्वाभाविक हो जाता है। जनता को यह तर्क स्वीकार नहीं करना चाहिए। जो लोग चुनाव लड़ते हैं, उन्हें देश के संविधान की रक्षा करने के योग्य माना जाता है। अगर वे ही लक्ष्मण रेखा लांघेंगे तो संविधान की महिमा कैसे कायम रख पाएंगे?

देशबन्धु में 24 अप्रैल 2014 को प्रकाशित
 

Wednesday, 16 April 2014

नक्सल समस्या : हल क्या है?


 
क्या सब कुछ इसी तरह चलता रहेगा? बस्तर के विकास की बातें होंगी, आदिवासियों को मुख्यधारा में लाने का दावा होगा, उनके प्रगति करने के संदिग्ध प्रतीक नागर समाज के सामने पेश किए जाते रहेंगे, नक्सलवाद को जड़ मूल से उखाड़ फेंकने की बड़ी-बड़ी बातें होंगी, नक्सलियों द्वारा हिंसा का तांडव रुक-रुक कर चलता रहेगा, निर्दोष लोग मारे जाते रहेंगे-ऐसे लोग जिनके पास जीवनयापन के लिए और कोई अवसर नहीं है, कायराना हमलों की निंदा खोखली गूंज वाले बड़े शहरों में होती रहेगी, मरने वालों के परिवारों को मुआवजा मिल जाएगा, रायपुर की शहीद वाटिका में उनके नाम पर कुछ नए पौधे रोप दिए जाएंगे, अखबारों में चीखती हुई सुर्खियां छपती रहेंगी, संपादकगण अपने लेखों में बराए दस्तूर शीघ्र समाधान की वकालत करते रहेंगे, कुछ लोग मृतकों की याद में मोमबत्तियां जला देंगे, कुछ अधपढ़े लोग लेख लिखकर चिंता व्यक्त करेंगे, कुछ संस्थाएं सभा-सेमिनार कर लेंगी, कुछ दिन शांति का भ्रम बना रहेगा और फिर एक दिन धमाकों के साथ कुछ और निरीह लोग नक्सलियों की अविचारित हिंसा का शिकार हो जाएंगे।

पिछले शनिवार को बस्तर में नक्सलियों ने जो दो अलग-अलग सामूहिक हत्याकांड किए वे एकबारगी तो हमें सोचने के लिए मजबूर करते हैं, लेकिन इस तरह की नृशंस वारदातों को भुलाने में हम ज्यादा देर नहीं लगाते। क्या हमारी संवेदनाएं मर चुकी हैं? क्या हमने सरकार को ईश्वर मानकर सब कुछ उसके ही ऊपर छोड़ दिया है? क्या हमारी अपनी जीवन स्थितियां इतनी विकट हो गई हैं कि अब हमें सोचने का वक्त ही नहीं मिलता? क्या हम नियतिवादी हो गए हैं कि अब इस देश में कुछ हो ही नहीं सकता? क्या हमें किसी मसीहा की तलाश है या किसी जादूगर की जो अपनी छड़ी घुमाकर नरक को स्वर्ग में बदल देगा या फिर हमने एक समाज के रूप में विचार करने की, आत्ममंथन करने की, विमर्श की अपनी लंबी परंपरा को पूरी तरह से तिलांजलि दे दी है? लगता तो है कि ऐसा ही है तब फिर इससे बढ़कर दुर्भाग्यपूर्ण बात इस प्रदेश के लिए और कुछ नहीं हो सकती। जिस समाज ने विचारों से नाता तोड़ लिया है उससे ज्यादा गरीब और कौन होगा?

बस्तर में इस बार नक्सलियों ने एक नहीं, बल्कि दो भयानक घटनाओं को एक दिन एक साथ अंजाम दिया। इससे एक तो उन्होंने यह संदेश दिया है कि उनका आतंक कायम है और रहेगा। दूसरे उन्होंने उन सरकारी दावों को एक बार फिर झुठला दिया है कि हमारा सुरक्षातंत्र मजबूत और चौकस है। सवाल उठता है कि ऐसे वीभत्स कांडों से उन्हें क्या हासिल हुआ? यह सच्चाई तो नक्सली भी जानते हैं कि वे बस्तर में अनंतकाल तक अपनी लड़ाई जारी नहीं रख सकते। वे यह भी जानते होंगे कि जिस कथित माओवादी-लेनिनवादी राज्य व्यवस्था के प्रति उनकी प्रतिश्रुति है वह भारत में स्थापित कभी नहीं हो सकती। उनके सामने नेपाल का उदाहरण है जहां एक राजशाही के खिलाफ जीतने में वे सफल हुए, लेकिन अंतत: उन्हें जनतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल होना पड़ा।  तो क्या फिर नक्सलवादी कुछ आदर्शवादी लोगों का ऐसा समूह है, जिसकी आंखों में बेहतर दुनिया के सपने पल रहे हैं या फिर वह एक ऐसा गिरोह है जो राजनीतिक शब्दावली की ओट में किन्हीं क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति में निमग्न हैं?
विश्व इतिहास बताता है कि बेहतर व्यवस्था कायम करने के लिए समय-समय पर जनक्रांतियां हुई हैं, लेकिन इनमें निरीह और निर्दोष जनता को जानबूझ कर कब निशाना बनाया गया? अमेरिका की युद्धप्रिय सत्ता ''कोलेटेरल डेमेज" का तर्क आगे बढ़ाए तो यह उसकी रणनीति और चरित्र का हिस्सा है, लेकिन क्या सर्वहारा के लिए लडऩे वाले भी इसी खोखले तर्क का सहारा लेंगे?बात साफ है। नक्सलबाड़ी से 1967 में जो आंदोलन शुरू हुआ था वह तो कब का समाप्त हो चुका उसके नेताओं को भी आगे चलकर समझ आया था कि उन्होंने हिंसा का जो रास्ता चुना था वह ठीक नहीं था। याने आज जो स्वयं को माओवादी कह रहे हैं, वे जनता की लड़ाई नहीं लड़ रहे बल्कि उनके मंसूबे कुछ और ही हैं!

बहरहाल, मेरा मानना है कि यदि बस्तर में नक्सली हिंसा समाप्त कर शांति स्थापना करना है तो उसके लिए नए सिरे से विचार करने की जरूरत होगी। अब घिसी-पिटी बातों और उपायों से काम नहीं बनेगा। इसमें नि:संदेह शासन की भूमिका महत्वपूर्ण होगी, लेकिन इसके साथ-साथ राजनैतिक दलों और अकादमिक संस्थाओं याने विश्वविद्यालयों आदि को भी आगे आना होगा। मुझे ध्यान आता है कि कुछ वर्ष पूर्व छत्तीसगढ़ विधानसभा में बंद दरवाजों के भीतर नक्सलवाद पर विचार किया गया था। इसमें पत्रकारों तक को आने की मनाही थी इसलिए कोई नहीं जानता कि ऐसे महत्वपूर्ण सत्र में क्या निर्णय लिए गए थे। शासकीय स्तर पर यदा-कदा सेमिनार भी हुए हैं, लेकिन वे भी एक तरह से बंद कमरे के भीतर ही। मुख्यमंत्री ने कई बार यह कहकर अपने सदाशय का परिचय दिया है कि वे नक्सलियों के साथ बातचीत के लिए तैयार हैं, लेकिन यह बात कभी आगे नहीं बढ़ पाई।

मेरा मानना है कि प्रदेश के मुखिया होने के नाते मुख्यमंत्री को भी अपनी तरफ से अलग तरीके से एक उदार पहल करना चाहिए। अगर वे प्रदेश के सभी बड़े-छोटे राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ बैठकर मुक्तभाव से चर्चा करें तो इससे ऐसे सूत्र शायद मिलें जिनको पकड़कर आगे बढ़ा जा सके। दरअसल, मुख्यमंत्री की ओर से इस मुद्दे पर विचार-विमर्श की एक पूरी शृंखला आयोजित होनी चाहिए। वे हमारे इस सुझाव पर गौर करें कि प्रदेश के दो विश्वविद्यालयों- रायपुर और बस्तर में राष्ट्रीय स्तर पर दो-तीन दिन की संगोष्ठियां आयोजित हों जिनमें इस विषय से संबंध रखने वाले सभी अनुशासनों के जानकार लोग शामिल हों। इनमें प्रोफेसर, पत्रकार, पुलिस अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी, आदिवासी, बुद्धिजीवी सभी हो सकते हैं।

इसी तरह उद्घाटन और समापन की व्यर्थ औपचारिकताओं को दरकिनार कर दिल्ली या रायपुर में भी ऐसा कोई सेमिनार हो सकता है जहां मुख्यमंत्री उन लोगों के साथ बैठें, जिनके पास बस्तर में शांति स्थापना के लिए प्रस्ताव और सुझाव हों। इस तरह की चर्चाओं के लाभ स्पष्ट हैं। सरकार के काम करने का अपना एक तौर-तरीका होता है। उसमें पूर्वाग्रह विकसित होने का डर हमेशा बना रहता है। तब एक ऐसा मोड़ आता है जब सत्तातंत्र के लिए अपनी ही बनाई दीवारों को तोड़कर आगे बढऩा लगभग रुक जाता है। जब खुली चर्चाएं होंगी तो नई बातें उठेंगी, और नए सिरे से समाधान ढूंढने की पहल होगी। प्रबंधशास्त्र में एक मुहावरा आजकल काफी प्रचलित है-''थिकिंग आउट ऑफ बॉक्सÓÓ याने बंधे-बंधाए दायरे से बाहर निकल कर सोचना। चूंकि यह मुद्दा सरकार से ताल्लुक रखता है इसलिए दायरे को तोडऩे की पहल सरकार के मुखिया को ही करना पड़ेगी। उनके मातहत इस काम के लिए उपयुक्त नहीं हैं।

अगर ऐसा हो तो अच्छा ही होगा। इस बीच सरकार को कुछ बातों पर फौरी महत्व देना चाहिए। कलेक्टर अलेक्स पॉल मेनन की रिहाई के बाद नक्सली होने के नाम पर जेल में बंद लोगों की प्रकरणों की समीक्षा के लिए सरकार ने एक उच्च स्तरीय समिति बनाई थी। इस समिति के काम की क्या प्रगति है? छत्तीसगढ़ के जेलों में नक्सली होने के आरोप में कितने लोग कैद थे, उनमें से कितनों की रिहाई हुई है? हमें याद नहीं आता कि सरकार ने इस बारे में अब तक कोई रिपोर्ट जारी की हो। जबकि दूसरी ओर आए दिन नक्सली होने के नाम पर निर्दोष आदिवासियों को पकड़े जाने की खबरें आती रहती हैं। इस सिलसिले में सोनी सोढ़ी प्रकरण का जिक्र किया जा सकता है।

कुछ साल पहले एस्सार कंपनी द्वारा नक्सलियों को गुप्त तरीके से करोड़ों रुपया भेजने की खबर सामने आई थी। इसमें जिन लोगों के नाम सामने आए उनमें से कुछ गिरफ्तार हुए, कुछ को जमानत मिली और कुछ पर हाथ डाला ही नहीं गया। इसी मामले में सोनी सोढ़ी और उसके भतीजे लिंगाराम कोड़ापी को गिरफ्तार किया गया। सोनी सोढ़ी पर पुलिस ने क्या अत्याचार किए उसकी एक अलग कहानी है, लेकिन इस आदिवासी महिला को पति की मृत्यु हो जाने पर भी पैरोल पर नहीं छोड़ा गया, उसे उच्च न्यायालय तक से जमानत नहीं मिल पाई और अंतत: सुप्रीम कोर्ट ने उसे राहत दी। क्या उसकी यह कथा हमारी व्यवस्था के बारे में कोई सवाल खड़े नहीं करती?

सरकार को यह आकलन करने की भी आवश्यकता है कि बस्तर में पांचवी अनुसूची और पेसा कानून का क्रियान्वयन किस रूप में व किस सीमा तक हो रहा है। प्रदेश में यूं तो पंचायती राज व्यवस्था लागू है, लेकिन उसमें प्रशासन व सांसद-विधायकों का जो हस्तक्षेप है, वह किसी से छुपा नहीं है। बस्तर के विकास के लिए एक विशेष प्राधिकरण अलग से बना हुआ है, लेकिन जब पांचवी अनुसूची लागू है तो प्रदेश सरकार के सीधे नियंत्रण में ऐसे अभिकरण की जरूरत क्या सचमुच है? ऐसे और भी प्रश्न हैं। नक्सल समस्या के बारे में सरकार की भी कोई नीतिगत सोच अवश्य होगी, लेकिन उसके बारे में आदिवासी समाज कितना क्या जानता है? कुल मिलाकर हमारा आशय यही है कि नक्सल समस्या का हल तभी होगा जब समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर एक सुस्पष्ट नीति बनेगी और उस पर पारदर्शी तरीके से अमल होगा।

देशबन्धु में 17 अप्रैल 2014 को प्रकाशित


 

Wednesday, 9 April 2014

आम चुनाव और एन.जी.ओ.


यह
हर कोई जानता है कि जनतंत्र के तीन स्तंभ होते हैं-विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। इन तीनों की अपनी-अपनी स्वायत्त भूमिकाएं हैं और इनके बीच इस तरह से शक्ति संतुलन होने की अपेक्षा की जाती है कि जनतंत्र की इमारत में दरार न पड़ने पाए। इस व्यवस्था में एक नया आयाम पत्रकारिता के विकास के साथ आ जुड़ा और मीडिया को जनता के बीच चौथे स्तंभ के रूप में मान्यता मिल गई। ऐसी सामान्य धारणा बन गई कि व्यवस्था के औपचारिक ढांचे में अगर कहीं कोई कमजोरी आएगी तो मीडिया एक सजग प्रहरी के तौर पर उसकी ओर ध्यान आकर्षित करेगा ताकि यथासमय उस कमजोरी को दूर किया जा सके। मैं समझता हूं कि पूरी दुनिया में एक दौर में अखबारों ने इस रोल को पूरी गंभीरता के साथ स्वीकार किया, आज की वास्तविकता भले ही कुछ और हो। यह याद रखना चाहिए कि औपचारिक रूप से स्थापित स्तंभों और जनमान्यता वाले चौथे स्तंभ के बीच कभी बहुत मधुर संबंध या नैकटय नहीं रहा और जब ऐसा होने लगा तो उसकी साख में कमी आने लगी।

इधर हमने देखा है कि इस संरचना में सिविल सोसायटी के नाम से एक पांचवां स्तंभ खड़ा हो गया है। इस नए स्तंभ के निर्माण के पीछे दो मुख्य कारण दिखाई देते हैं। एक तो जनतांत्रिक व्यवस्था की आधारभूत तासीर ही ऐसी है कि उसमें असहमति व मतवैभिन्न्य की गुंजाइश सदा बनी रहती है। दूसरे जनतंत्र का लक्ष्य लोककल्याण होता है और उसके लक्ष्यों को पाने के लिए प्रशासन की औपचारिक सरणियां कभी पर्याप्त नहीं होतीं याने कार्यक्रम लागू करने के लिए एक बंधे-बंधाएं ढांचे से बाहर निकलकर समाज के विभिन्न वर्गों का सहयोग लेना होता है। इस तरह सिविल सोसायटी में एक तरफ वे संस्थाएं हैं जो नीतियों और मुद्दों पर प्रश्न उठाती हैं, जनतांत्रिक सरकार को कटघरे में खडा करती हैं व उससे जवाबदेही की मांग करती हैं। दूसरी तरफ वे संस्थाएं हैं, जो कल्याणकारी कार्यक्रमों को लागू करने में व्यवस्था के साथ सहयोग करती हैं। इन दोनों श्रेणियों के बीच कोई अनिवार्य विरोधाभास नहीं है बल्कि ऐसी अनेक संस्थाएं हैं जो दोनों मोर्चों पर समान रूप से काम करती हैं।

यूं तो सिविल सोसायटी संज्ञा का दायरा बहुत बड़ा है। उसमें छात्रसंघ, ट्रेड यूनियन, चेम्बर ऑफ कामर्स, महिला मंडल- सब आ जाते हैं, लेकिन अभी हम सिविल सोसायटी के उस बड़े और प्रमुख अंग की बात करने जा रहे हैं जिसे एन.जी.ओ. (गैर सरकारी संगठन) कहा जाता है। इसका रूप इतना वृहद हो चुका है कि अब उसे सेक्टर कहा जाने लगा है। संयुक्त राष्ट्र संघ से लेकर विभिन्न देशों की सरकारें इस क्षेत्र को मान्यता देती हैं व उनके साथ संवाद करती हैं। ऐसा माना जाता है कि ये गैर सरकारी संगठन जमीनी स्तर पर काम करते हैं, और उनके साथ सलाह-मशविरा करते रहने से लोकहितैषी नीतियों व कार्यक्रमों को बेहतर तरीके से लागू करने में मदद मिल सकती है। कुल मिला कर एन.जी.ओ. सेक्टर को जनतंत्र के पांचवां स्तंभ के रूप में मान्यता मिल गई है।

भारत जैसे देश में जहां अभी समग्र व समावेशी विकास के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है स्वाभाविक रूप से एन.जी.ओ. सेक्टर व्यापक स्तर पर अपनी भूमिका निभा रहा है। यह दिलचस्प तथ्य है कि देश के अनेकानेक राजनेताओं ने, भले ही वे किसी भी पार्टी से संबंध रखते हाें, अपनी पहल पर ऐसे कई संगठन स्थापित कर लिए हैं।  इस मामले में सरकारी अधिकारी भी पीछे नहीं हैं। इसका एक कारण तो यह हो सकता है कि अपने एन.जी.ओ. के माध्यम से ये लोग ''इस हाथ दे उस हाथ ले'' की उक्ति को चरितार्थ कर रहे हों। हम ऐसे कई फर्जी एन.जी.ओ. के बारे में जानते हैं जो सत्ताधीशों द्वारा स्थापित किए गए हैं और  सरकार से किसी न किसी कार्यक्रम के नाम पर भरपूर मदद ले लेते हैं। यह एक अलग किस्सा है। अभी तो हमारी दिलचस्पी यह जानने में है कि व्यवस्था के औपचारिक ढांचे से बाहर पांचवें खंभे के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले एन.जी.ओ. कार्यकर्ता एकाएक पहला खंभा बनने के लिए बेताब क्यों हो उठे हैं याने वे चुनावी मैदान में क्यों कूद पड़े हैं?

एन.जी.ओ. के साथी भी इस देश के ही नागरिक हैं और उन्हें वही सारे अधिकार उपलब्ध हैं जो आपको-हमको हैं, इसलिए उनके निर्णय पर प्रश्नचिन्ह तो नहीं लगा सकते लेकिन यह जिज्ञासा मन में अवश्य उठती है कि इनकी सोच में ऐसा क्रांतिकारी परिवर्तन क्यों आ गया है! एन.जी.ओ. सेक्टर के एक प्रमुख अभिनेता अरविंद केजरीवाल तो अब पूरी तरह से राजनेता बन ही चुके हैं, लेकिन उनके समानांतर चलने वाले या उनका अनुसरण करने वाले एन.जी.ओ. नेताओं की अब कोई कमी नहीं दिखाई देती। उदाहरण के लिए एक नाम है- जयप्रकाश नारायण का। आंध्रनिवासी श्री नारायण पूर्व आई.ए.एस. अधिकारी हैं। स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर वे पिछले कई वर्षों से एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में काम कर रहे थे। उन्होंने लोकसत्ता नाम से एक संस्था बनाई जिसके मंच से वे चुनाव सुधाराें की वकालत करते रहे हैं।

श्री नारायण ने अब लोकसत्ता को एक राजनैतिक पार्टी में तब्दील कर दिया है। वे पहिले तो  भाजपा के साथ गठजोड़ करने की जुगत भिड़ाते रहे। बात नहीं बनी तो अब अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ रहे हैं। मेधा पाटकर का जिक्र मैंने पिछले हफ्ते किया ही था। उनके साथ 'नर्मदा बचाओ आंदोलन' में बहुत से जुझारू कार्यकर्ता भी विभिन्न स्थानों से चुनाव लड़ रहे हैं। इस तरह एन.जी.ओ. क्षेत्र में काम करने वाले ऐसे अनेक जन हैं जो राजनीति के औपचारिक मंच पर अपनी भूमिका तलाश रहे हैं।  इनमें से किसे कितनी सफलता मिलती है यह तो आगे चलकर पता लगेगा, लेकिन यह बात कम से कम मेरी समझ में नहीं आती कि इनका राजनीति में आने का मकसद क्या है।

एक सरल उत्तर शायद यह हो सकता है कि वे जिन मूल्यों और आदर्शों के लिए अब तक संघर्षरत रहे उन्हें प्रभावी ढंग से अमल में लाने के लिए लोकसभा में बैठना जरूरी है। अगर ऐसा है तो मैं कहूंगा कि उन्होंने अपने जीवन का एक लम्बा समय यूं ही जाया किया।  मेधा पाटकर, अरविंद केजरीवाल, जयप्रकाश नारायण- ये सब नेतृत्व क्षमता के धनी लोग हैं बल्कि इनमें नेतृत्व करने की नैसर्गिक प्रतिभा है। ये अगर बीस या पच्चीस साल पहले चुनाव लड़कर लोकसभा में आए होते तो बड़े बांधों का विरोध, सूचना का अधिकार, चुनाव सुधार जैसे मुद्दाें पर अपने तर्क प्रभावी ढंग से सदन में रख सकते थे और उससे शायद कुछ निश्चित नतीजे भी मिलते। लेकिन हो सकता है कि यह मेरी खामख्याली हो!

मेरे मन में एक और प्रश्न उठता है कि आज देश का जो राजनैतिक वातावरण है उसमें ये कहां हैं? आम चुनावों के बाद जिस भी पार्टी की सरकार बनेगी या जो पार्टी किसी संभावित गठजोड़ में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरेगी वह अपनी घोषित नीतियों और कार्यक्रमों के अनुसार सरकार चलाना चाहेगी। स्पष्ट है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों के आर्थिक कार्यक्रम लगभग एक जैसे हैं। यह उम्मीद फिलहाल दोनों से नहीं करना चाहिए कि वे वैश्विक पूंजीवाद के एजेंडे से हटकर काम कर पाएंगे। इन दोनों पार्टियों में अगर कोई फर्क है तो यह कि कांग्रेस बहुलतावाद में अनिवार्य रूप से विश्वास रखती है जबकि भाजपा बहुसंख्यकतावाद में। लेकिन क्या एन.जी.ओ. से जीतकर आने वालों की संख्या इतनी होगी कि वे अपने बलबूते सरकार बना सकें या गठबंधन को प्रभावित कर सकें? अगर ऐसा न हुआ तो क्या वे दो बड़ी पार्टियों के बीच कोई नया रास्ता निकालेंगे या फिर किसी एक तरफ झुक जाएंगे? उसका दीर्घकालीन परिणाम देश की राजनीति में किस रूप में सामने आएगा?
देशबंधु में 10 अप्रैल  2014 को प्रकाशित
 

Wednesday, 2 April 2014

'आप' की पॉलिटिक्स क्या है?




हिन्दी
साहित्य में जिनकी थोड़ी बहुत भी रुचि है वे जानते हैं कि मुक्तिबोधजी अपने से पहली बार मिलने वाले हर व्यक्ति से पूछते थे- ''पार्टनर, आपकी पॉलिटिक्स क्या है?'' आज यही सवाल अरविंद केजरीवाल और उनकी बनाई आम आदमी पार्टी से पूछने का मन हो रहा है। हम जानते हैं कि कांग्रेस, भाजपा, भाकपा, माकपा, बसपा इत्यादि दलों की पॉलिटिक्स क्या है। हमें यह भी पता है कि इस चुनावी मौसम में जो लोग अभूतपूर्व तेजी के साथ दलबदल में लगे हैं उनके लिए राजनीति क्या मायने रखती है। कांग्रेस और भाजपा अपनी किन नीतियों पर दृढ़ हैं और किन पर समझौता अथवा समर्पण कर चुके हैं यह भी अध्येता जान-समझ रहे हैं। क्षेत्रीय दलों की राजनीतिक धरती क्या है व उनकी महत्वाकांक्षाओं का विस्तार कहां तक है यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। हमें चेतन भगत, एम.जे. अकबर और रामचंद्र गुहा जैसे चर्चित बुध्दिजीवियों की राजनीति के बारे में भी कुछ अनुमान तो है ही, लेकिन इस प्रश्न का समुचित उत्तर अभी ढूंढा ही जा रहा है कि अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक दिशा क्या है!

'आप' ने दिल्ली की सात सीटों में से एक (पूर्वी दिल्ली) पर राजमोहन गांधी को अपना उम्मीदवार बनाया है। श्री गांधी को हम देश के अग्रणी बुध्दिजीवी के रूप में जानते हैं। यह सबको पता है वे महात्मा गांधी के पौत्र हैं। उन्होंने अपने दादा पर ''मोहनदास'' शीर्षक से जो जीवनी लिखी वह एक अनुपम कृति है। इसे लिखने में श्री गांधी ने जिस वस्तुपरकता व तटस्थता का परिचय दिया है उसकी कोई मिसाल मुझे तो याद नहीं आती। उनकी अन्य पुस्तकें भी भारत और उपमहाद्वीप के राजनैतिक इतिहास को समझने के लिए जैसे अनिवार्य है। राजमोहनजी की राजनीति में दिलचस्पी प्रारंभ से रही है। वे एक बार जबलपुर और फिर रायबरेली से लोकसभा चुनाव हार भी चुके हैं। इसके बाद वे लगभग पूरा समय पुस्तक लेखन को ही देते रहे। वे 78 वर्ष की परिपक्व आयु में चुनावी राजनीति में लौटेंगे इसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी, लेकिन वे मैदान में हैं  यह एक सच्चाई है।  मैं समझना चाहता हूं कि 'आप'  के एजेंडा में ऐसी कौन सी बात थी जिसने उन्हें इस हद तक आकर्षित किया!

उधर मुंबई उत्तर-पूर्व से मेधा पाटकर 'आप' की ओर से मैदान में हैं। मेधाजी ने अपना पूरा जीवन जनसंघर्षों में बिता दिया। 'नर्मदा बचाओ आंदोलन' में उन्होंने जो भूमिका निभाई उसने इस देश में अनगिन लोगों को अन्याय व शोषण के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बड़े बांधों के खिलाफ लड़ाई लड़ी, विस्थापितों के हक के लिए बरसों बरस तकलीफें उठाईं, कितनी बार धरनों पर बैठीं, कितनी बार जेल गईं- इसका कोई हिसाब ही नहीं। वे नर्मदा पर बनने वाले बड़े बांधों को तो नहीं रोक सकीं, लेकिन यह संदेश तो उन्होंने जन-जन तक पहुंचाया ही कि बिना लड़ाई के हक नहीं मिला करते। कहने का आशय यह कि स्थापित राजनीति से हटकर उन्होंने समानान्तर राजनीति की और उसकी बदौलत जनता का, विशेषकर वंचित समाजों का प्यार और विश्वास हासिल किया। इसके बाद ऐसी क्या वजह थी जिसके चलते वे चुनाव के मैदान में उतरीं? इसके पहले पश्चिम बंगाल में ममता बैनर्जी की राजनीति को समर्थन देने का परिणाम क्या निकला, इस पर गौर करने का मौका शायद उन्हें नहीं मिला!

आप कहेंगे कि अगर ऐसे अच्छे लोग राजनीति में आते हैं तो इसमें गलत क्या है। मेरा कहना है कि गलत कुछ नहीं है, लेकिन यदि राजमोहनजी और मेधाजी किन्हीं आदर्शों को पूरा करने की इच्छा लेकर चुनावी राजनीति में आए हैं तो आगे चलकर उन्हें कहीं निराशा न हो! एक तरफ ऐसे लोग हैं तो दूसरी तरफ मीरा सान्याल व कुमार विश्वास जैसे भी  'आप' के परचम तले चुनावी मैदान में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। मीरा सान्याल ने मुंबई दक्षिण से ही 2009 में चुनाव लड़ा था और वे हार गई थीं। वे जिस रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड की भारत में मुख्य अधिकारी थीं, वह बैंक उन दिनों विवादों के घेरे में था। जो विश्वव्यापी मंदी आई थी उसमें इस बैंक की भी भूमिका बताई गई थी। सुश्री सान्याल चुनाव लड़ें उसमें हमें क्या आपत्ति होने चली, लेकिन यह शंका तो मन में उठती ही है कि मेधा पाटकर और मीरा सान्याल दोनों एक मंच पर क्यों और कैसे हैं, जबकि उनका राजनीतिक दर्शन जुदा-जुदा है।

इसी तरह राजमोहन गांधी के साथ-साथ कुमार विश्वास को देखकर कुछ अचरज होता है। यह मेरा सौभाग्य या दुर्भाग्य था कि रायपुर के एक कार्यक्रम में कुछ माह पूर्व मुझे श्री विश्वास का प्रवचन व तथाकथित कविताएं सुनने मिलीं। मुझे उनके विचारों में गंभीरता नहीं, बल्कि उथलापन नज़र आया। उन्होंने जो चुटकुलेबाजी की उससे पता चला कि यह व्यक्ति नस्लवादी, पुरुषसत्तावादी, किसी हद तक यथास्थितिवादी होने के साथ स्त्री-विरोधी है और अहिंसा में विश्वास नहीं रखता। अब इस विरोधाभास का समाधान क्या है कि एक तरफ राजमोहन गांधी हैं, जो ताउम्र अहिंसा और समन्वय की बात करते रहे तथा दूसरी तरफ कुमार विश्वास हैं जो पड़ोसी देश को हथियारों का डर दिखा रहे हैं। सवाल उठता है कि श्री केजरीवाल व उनकी पार्टी के अन्य कर्णधार इस तरह के समीकरण कुछ सोच-समझकर बैठा रहे हैं, क्या इसके पीछे कोई रणनीति है या फिर सब कुछ अनजाने में होता चल रहा है? क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई ही इनका एकमात्र मकसद है या ये इसके परे कुछ और हासिल करना चाहते हैं?

अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल ने मिलकर तीन साल पहले भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ी थी। उन्होंने दावा किया था कि यदि उनके बताए अनुसार जनलोकपाल नामक संस्था का ढांचा खड़ा दिया जाए तो देश से भ्रष्टाचार जड़मूल से समाप्त हो जाएगा। उस समय मीडिया ने इनके आंदोलन को 24x7 कवरेज दिया था और बड़ी संख्या में जनसमर्थन मिला था। इसमें नौजवान ज्यादा थे। लेकिन फिर क्या हुआ? आज अन्ना हजारे के बारे में स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि वे भाजपा का एजेंडा बढ़ाने का काम कर रहे हैं। उधर केजरीवाल एक ऐसे सिध्दहस्त कलाकार के रूप में आए जो कभी आंदोलनकारी की भूमिका निभाता है, तो कभी राजनेता की। बल्कि ये दोनों भूमिकाएं इस तरह गड्ड-मड्ड हो गई हैं कि समझना कठिन हो जाता है कि श्री केजरीवाल आखिरकार किस रास्ते पर चल रहे हैं। वे जब भ्रष्टाचार के खिलाफ बात करते हैं, अंबानी-अडानी पर सीधे-सीधे आरोप लगाते हैं, तो सुनकर अच्छा लगता है, लेकिन इन पर अंकुश लगाने के लिए उनके पास क्या योजना है इसका कोई जवाब नहीं मिलता।

यदि आम आदमी पार्टी के रूप में भारतीय राजनीति में एक तीसरी शक्ति का उदय होता है अथवा वैकल्पिक राजनीति का नया मंच बनता है, तो यह अच्छा ही होगा। लेकिन इसके लिए अरविंद केजरीवाल को अपनी नीतियों का खुलासा तो करना ही होगा। सिर्फ भ्रष्टाचार-विरोधी जुमले उछालने से दूर तक राजनीति नहीं की जा सकती, ऐसा हमारा मानना है। श्री केजरीवाल यदि विभिन्न मतों के प्रबुध्दजनों को एक मंच पर ला सकते हैं तो हम इसका भी स्वागत करेंगे, किन्तु क्या ये सब मिलकर देश को आगे ले जाने के लिए कोई नक्शा दे सकते हैं? दूसरे शब्दों में कहें तो विभिन्न विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करने वाले इन गुणीजनों के पास क्या  कोई न्यूनतम साझा कार्यक्रम है या ये भी नरेन्द्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी की तर्ज पर सिर्फ भावनाएं उभारने का खेल खेल रहे हैं?

श्री केजरीवाल को दिल्ली में एक मौका मिला था कि वे अपने घोषित संकल्पों के अनुरूप स्वच्छ व पारदर्शी सरकार चला सकें, लेकिन उन्होंने स्वयं ऐसी परिस्थितियां निर्मित कीं कि वे इस जिम्मेदारी से पलायन कर सकें। हम उसके विस्तार में फिलहाल नहीं जाना चाहते, लेकिन श्री केजरीवाल से यह अवश्य पूछना चाहते हैं कि यदि हम 'आप' का समर्थन करें तो किस बिना पर? कोई भी सरकार हो, भ्रष्टाचार रोकना उसके अनेक कामों में से एक काम हो सकता है पर मुद्दे इसके अलावा और भी बहुत से हैं- आपकी आर्थिक नीति क्या होगी, विदेश नीति क्या होगी, रक्षा नीति क्या होगी, लैंगिक नीति क्या होगी, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में आप क्या करेंगे इत्यादि। ढेरों प्रश्नों पर क्या आप अपने बीच एक राय कायम कर सकेंगे? जब मीरा सान्याल बड़े बांधों के लिए ऋण देंगी और मेधा पाटकर उसका विरोध करेंगी तब क्या होगा? जब कुमार विश्वास पाकिस्तान पर आक्रमण करने की वकालत करेंगे और राजमोहन गांधी पड़ोसी मुल्क के साथ मैत्री की बात करेंगे तब क्या होगा? हम समझते हैं कि 'आप' के समर्थकों को अपनी पार्टी से इन सवालों के जवाब मांगना चाहिए।

'आप' की पॉलिटिक्स का जहां तक सवाल है, मेरा अनुमान है कि यह उन लोगों का मंच है जो नेहरूवादी नीतियों के घोर विरोधी हैं, और अपने-अपने कारणों से साथ आ गए हैं, ऊपरी तौर पर भले ही वे कुछ भी दावा करें।

 
देशबंधु में 03 अप्रैल 2014 को प्रकाशित