Thursday, 12 November 2015

बिहार के बाद क्या?

 



पहले तो लोग इस बात पर माथापच्ची करते रहे कि बिहार में विधानसभा चुनावों के नतीजे क्या होंगे। जिस दिन मतदान का आखिरी चरण सम्पन्न हुआ उस दिन तमाम विशेषज्ञ एक्जिट पोलों की चीर-फाड़ में लग गए। 8 नवंबर को जब बहुप्रतीक्षित परिणाम सामने आए तब से उन नतीजों का विश्लेषण करने का काम चल रहा है। यह स्वाभाविक है तथा अभी कुछ दिन और चलेगा। सोशल मीडिया की जहां तक बात है उसमें लतीफों की बहार आई हुई है। बल्कि दीवाली के समय यह कहना अधिक सही होगा कि फुलझडिय़ां और पटाखे छूट रहे हैं। नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी के दौरान कई महीनों तक पारंपरिक मीडिया और सोशल मीडिया दोनों का जमकर उपयोग किया था। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी इसमें कोई कमी नहीं आई किन्तु इसके साथ यह भी हुआ कि नए-नवेले प्रधानमंत्री पर दोनों तरह के मीडिया में टीका-टिप्पणियां होना शुरु हो गईं, फिर बात चाहे उनकी परिधानप्रियता की हो, चाहे उनके मंत्रियों की योग्यता की। राजनीति में हर व्यक्ति को सार्वजनिक टीकाओं का सामना करना ही होता है। जो जितना बड़ा है उस पर उतनी ही ज्यादा बातें होती हैं। इस मामले में हमारे प्रधानमंत्री ने कमाल कर दिया। विगत डेढ़ वर्ष के दौरान उनको लेकर जितने कटाक्ष किए गए हैं वैसी स्थिति शायद कभी किसी सत्ता प्रमुख के सामने नहीं आई।

बहरहाल बिहार के परिणाम आ जाने के बाद अब राजनैतिक विश्लेषकों के समक्ष देश के राजनीतिक भविष्य के बारे में सोचने का समय शायद आ गया है। 2019 में लोकसभा के अगले चुनाव होंगे। इसमें अभी साढ़े तीन साल का वक्त है। इस बीच असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, पुड्डुचेरी, केरल, फिर उत्तरप्रदेश और अन्य प्रदेशों के चुनाव बारी-बारी होना है। पांच प्रदेशों के चुनाव होने में अब बहुत अधिक समय नहीं बचा है। पूर्वोत्तर और एक छोटा प्रदेश होने के कारण असम पर बाकी देश का ध्यान अक्सर नहीं जाता। यद्यपि भौगोलिक और सामाजिक कारणों से वहां की राजनीति कई बार ऐसे मोड़ पर पहुंच जाती है, जिसका असर पूरे देश पर पड़ता है। अभी असम में तरुण गोगई के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार काबिज है। श्री गोगई पिछले पन्द्रह वर्ष से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन हैं। उनका तीसरा कार्यकाल पूरा होने जा रहा है। कुछ समय पहले असंतुष्ट नेता हिमांता बिस्वा सरमा ने कांग्रेस छोड़कर भाजपा की सदस्यता ली। वे अपने साथ लगभग एक दर्जन विधायकों को भी ले गए। याने भाजपा ने जिस तरह बिहार में दलबदल को प्रश्रय दिया वही काम अब असम में हो रहा है। दूसरी ओर, मुस्लिम हितों की बात करने वाले एक नेता बदरुद्दीन अकमल का भी वहां काफी प्रभाव है। इन दो पाटों के बीच कांग्रेस की रणनीति आसन्न विधानसभा चुनाव में क्या होगी? वहां पार्टी को किसका साथ मिलेगा? मतदाता एक दलबदलू नेता पर कितना विश्वास करेगी और क्या  अल्पसंख्यक समाज बिहार की तर्ज पर कांग्रेस का साथ देगा? ऐसे अनेक प्रश्न उठते हैं।

इसके साथ-साथ बात आती है पश्चिम बंगाल की। तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी ने नीतीश कुमार को बधाई देने में जरा भी वक्त नहीं गंवाया। सवाल उठता है कि पश्चिम बंगाल में क्या समीकरण बनेंगे। एक ओर ममता बनर्जी दूसरी ओर माकपा की अगुवाई में वाममोर्चा। चूंकि बिहार में वाममोर्चे ने अपना पृथक रास्ता चुना इसलिए अनुमान होता है कि पश्चिम बंगाल में वाममोर्चे के साथ उसका कोई तालमेल नहीं बैठेगा। लेकिन क्या तृणमूल कांग्रेस के साथ कांग्रेस का कोई गठबंधन संभव है? अगर इस दिशा में प्रयत्न हुए तो ममता दी उसकी क्या कीमत वसूलेंगी? और क्या कांग्रेस इस प्रदेश में अकेले लडऩे में सक्षम है? महागठबंधन के अन्य दो दलों की बंगाल में क्या भूमिका होगी? यदि लालू जी अथवा नीतीश जी की बिहार के बाहर अगर कोई महत्वाकांक्षा है तो क्या उसके बीजारोपण की शुरुआत ममता बनर्जी केेे साथ हाथ मिलाकर होगी? अगर तृणमूल कांग्रेस, वाममोर्चा और कांग्रेस तीनों अलग-अलग चुनाव लड़े तो क्या इसका कोई लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिल पाएगा? दिल्ली और बिहार में तो भाजपा के पास अनेक कद्दावर नेता थे। पश्चिम बंगाल में कौन हैं? इस कमी का क्या असर भाजपा पर पड़ेगा? गरज यह कि यहां भी सवाल बहुतेरे हैं।

तमिलनाडु में एक अलग ही दृश्य उपस्थित होता है। पिछले लगभग चालीस साल से हम वहां दो क्षेत्रीय दलों के बीच सत्ता की उलट-पुलट देखते आए हैं।  इनका नेतृत्व जो दो बड़े नेता कर रहे हैं वे कब तक अपना दायित्व संभाल पाएंगे कहना कठिन है। डीएमके के करुणानिधि वृद्ध, अशक्त और अस्वस्थ हैं। उनके तीन पत्नियों वाले परिवार में राजनीतिक विरासत को लेकर जो कलह चल रही है वह सर्वविदित है। करुणानिधि राष्ट्रीय स्तर पर अपने प्रतिनिधि के रूप में बेटी कनिमोझी को स्थापित करना चाहते हैं, जबकि प्रदेश में उनकी प्रकट इच्छा छोटे बेटे स्टालिन को राजनीतिक विरासत सौंपने की रही है।  अनुमान कर सकते हैं कि आसन्न विधानसभा चुनाव स्टालिन के सक्रिय मार्गदर्शन में लड़े जाएंगे जिसमें कनिमोझी उनके साथ होंगी। बड़े भाई अजगीरी की क्या भूमिका होगी यह स्पष्ट नहीं है। दूसरी ओर जयललिता की सक्रियता भी स्वास्थ्य संबंधी कारणों से बाधित हुई है ऐसा सुनने में आता है। अगर जयललिता पूरी तैयारी के साथ चुनाव मैदान में उतर सके तब भी क्या तमिलनाडु के मतदाता उन्हें लगातार दूसरा मौका देंगे? जयललिता और नरेन्द्र मोदी के बीच मधुर संबंध हैं, लेकिन क्या दोनों के बीच कोई औपचारिक गठबंधन होना संभव है? इसी तरह डीएमके और कांग्रेस के बीच जो गठबंधन लंबे समय तक चला क्या वह दुबारा बन सकेगा? इस दक्षिण प्रदेश में भाकपा और माकपा दोनों के अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र हैं। यद्यपि राज्यसभा में जाने के लिए उन्हें कभी करुणानिधि तो कभी जयललिता की चिरौरी करना पड़ती है। क्या तमिलनाडु में कांग्रेस समाजवादी और साम्यवादी दोनों मोर्चों को साथ लेकर कोई महा-महागठबंधन बना पाएगी?

एक अन्य दक्षिण प्रदेश केरल में भी कुछ ही दिनों में विधानसभा चुनाव होना है। केरल को राजनीतिक दृष्टि से एक अत्यन्त जागरुक प्रदेश माना जाता है। यहां सामान्यत: हर पांच साल में सरकार  बदल जाती है। फिलहाल सरकार कांग्रेस की है इसलिए यह सोच लेना आसान है कि अगली सरकार माकपा के नेतृत्व में वाममोर्चे की बनेगी। लेकिन मामला इतना सरल नहीं है। माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि उसके पास वी.एस. अच्युतानंदन के बाद कोई सर्वमान्य नेता नहीं है। पिछले चुनावों में वी.एस. को किनारे कर दिया गया था, किन्तु यह उनकी ही छवि थी जिसके कारण माकपा लगातार दूसरी बार सत्ता में आने के करीब पहुंच सकी। कांग्रेस में ओमन चांडी मुख्यमंत्री हैं, लेकिन उन्हें लगातार पार्टी की अंतर्कलह से और पार्टी नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों से जूझना पड़ रहा है। यह उल्लेखनीय है कि केरल विधानसभा में भाजपा को आज तक एक भी सीट नहीं मिली है, फिर भी वह धीरे-धीरे अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाते गई है। विगत नगरीय निकाय चुनावों में भाजपा ने तिरुअनंतपुरम नगर निगम में अठाइस सीटें हासिल कीं। अभी हाल में सम्पन्न चुनाव में उसकी सीटें बढ़कर पैंतीस-छत्तीस हो गई हैं और कांग्रेस वहां तीसरे नंबर पर पहुंच गई है। याने कांग्रेस और माकपा के लिए खतरे की घंटी बज चुकी है। अगले साल जब कांग्रेस और माकपा के बीच मुकाबला होगा तब पहली बार भाजपा शायद विधानसभा में अपना खाता खोलने की उम्मीद कर सकती है।

हमारी उम्मीद है कि राजनैतिक अध्येता इन सारी स्थितियों का विश्लेषण कर हमारा ज्ञानवर्धन करेंगे कि आने वाले दिनों में देश की राजनीति की दिशा क्या होगी।
देशबन्धु में 11 नवंबर 2015 को प्रकाशित

Sunday, 8 November 2015

जनतांत्रिक शक्तियों की विजय

 


बिहार के चुनाव परिणाम देश की जनता के लिए एक बड़ी राहत लेकर आए हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक चुनावी सभा में विश्वास व्यक्त किया था कि बिहार की जनता इस साल दो दिवाली मनाएगी। एक 8 तारीख को और दूसरी 11 तारीख को। उनका कथन सत्य से बढ़कर सिद्ध हुआ है। इस मायने में कि आज देश की तीन चौथाई जनता बिहारवासियों के साथ दिवाली के पहले दिवाली मना रही है। बिहार विधानसभा के लिए महागठबंधन की भारी जीत और भाजपा व उसके सहयोगियों के निराशाजनक प्रदर्शन में बहुत सारे संदेश छुपे हुए हैं। यूं तो लगभग साल भर पहले दिल्ली विधानसभा के चुनावों में करारी शिकस्त मिलने में भी भाजपा के लिए कुछ स्पष्ट दिशा संकेत थे लेकिन तब जिनकी उसने अनदेखी कर दी थी। अपने स्थापना काल से ही भाजपा भावनाओं से खिलवाड़ करने की राजनीति करती आई है। 2014 के आम चुनावों में स्पष्ट विजय मिल जाने के बाद उसे लगने लगा था कि वह जो कर रही है वही ठीक है, लेकिन अब शायद समय आ गया है कि उसे नए सिरे से अपनी राजनीति और रणनीति दोनों पर पुनर्विचार करना चाहिए।

हमारी चुनाव प्रणाली में जिसे सबसे ज्यादा वोट मिले वह जीत जाता है। इसमें वोट प्रतिशत की बात गौण हो जाती है। जब जीतने वाली पार्टी का वोट प्रतिशत आधे से कम हो तथा उससे सबक लेकर सारे विपक्षी एकजुट हो जाएं तो यही तत्व अपने आप महत्वपूर्ण हो जाता है। अतीत में हमने देखा है कि जब-जब गैरकांग्रेसी दल एकजुट हुए हैं कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा। इस बार बिहार में भाजपा-विरोधी तीन दल एकजुट हो गए तो समीकरण बदल गए और भाजपा के हिस्से ऐसी शोचनीय पराजय आई। भाजपा ने महागठबंधन  को तोडऩेेे और कमजोर करने में अपनी ओर से कोई कसर बाकी नहीं रखी। उसने जदयू के दागी नेताओं को टिकट दिए, दलबदल को बढ़ावा दिया, ओवैसी को प्रच्छन्न समर्थन दिया, मुलायम सिंह के साथ भी गुपचुप दोस्ती की लेकिन उसकी कोई भी युक्ति कारगर नहीं हो सकी।

महागठबंधन ने जो शानदार जीत हासिल की है उसका सबसे बड़ा श्रेय तीनों पार्टियों के नेताओं को जाता है, जिन्होंने अपनी एकता में कोई दरार नहीं आने दी और चुनाव की लंबी प्रक्रिया के दौरान किसी भी तरह की बदमज़गी उत्पन्न नहीं होने दी। लालू प्रसाद और नीतीश कुमार दोनों पुराने साथी और मित्र रहे हैं इसलिए उनके दुबारा एक साथ आने में कोई बहुत आश्चर्य की बात नहीं थी। इसमें तीसरे दल के रूप में कांग्रेस की जो सकारात्मक भूमिका रही उसका श्रेय राहुल गांधी को देना ही होगा, जिन्होंने चुनाव के बहुत पहले नीतीश कुमार से बात कर साथ-साथ चलने का मंतव्य प्रकट कर दिया था। उसका जो लाभ कांग्रेस को मिला है वह सामने है। यह उल्लेखनीय है कि न सिर्फ भाजपा बल्कि अनेक टीकाकारों द्वारा बार-बार कहा जाता रहा कि लालू प्रसाद का साथ लेने से नीतीश कुमार को नुकसान होगा, ऐसी सारी भविष्यवाणी निरर्थक सिद्ध हुई।

आज सुबह से टीवी पर जो बहसें आ रही हैं उसमें भी लालू बनाम नीतीश का बखेड़ा उत्पन्न करने की कोशिशें हो रही हैं। ऐसे लोग खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे की कहावत को चरितार्थ कर रहे  हैं। यह स्पष्ट है कि नीतीश कुमार तीसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। जदयू को राजद के मुकाबले तीन-चार सीटें भले ही कम मिली हों, लेकिन उससे कोई फर्क पडऩे वाला नहीं है। हम अतीत के अनुभव से जानते हैं कि लालू जी ने कांग्रेस का साथ दिया तो उसे पूरी तरह निभाया। वे नीतीश के साथ भी दोस्ती निभाएंगे इसमें कोई शक नहीं है। कुल मिलाकर महागठबंधन ने जनतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी शक्तियों को एकजुट होकर चलने का रास्ता प्रशस्त किया है और देश के संविधान की रक्षा के लिए इस समीकरण का बने रहना परम आवश्यक है।

भारतीय जनता पार्टी ने बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान और उसके व्यापक परिदृश्य में जिस तरह की राजनीति की, जैसी प्रवृत्तियों को बढ़ाया दिया और जैसी भाषा का प्रयोग किया उससे आम जनता के भीतर गहरी असुरक्षा का भाव पनप रहा था तथा नरेन्द्र मोदी की क्षमता पर भी सवाल उठने लगे थे। सोचकर देखिए कि चुनावों के दौरान श्री मोदी ने बिहार में बत्तीस आम सभाएं कीं। आज तक किसी भी प्रधानमंत्री ने किसी प्रदेश के चुनाव में इतनी दिलचस्पी नहीं दिखाई। फिर पार्टी अध्यक्ष अमित शाह बिहार में पैंतालीस दिन तक डेरा डाले रहे। केन्द्र में इस प्रदेश से आधे दर्जन मंत्री तो पहले से हैं। फिर भी दर्जन भर और मंत्रियों की ड्यूटी चुनाव में लगा दी गई। ऐसा माहौल खड़ा किया गया मानो नरेन्द्र मोदी मुख्यमंत्री का चुनाव लड़ रहे हों। मतदाताओं ने इस रवैय्ये को पसंद नहीं किया।

यही नहीं, श्री मोदी ने चुनाव अभियान के प्रारंभ में ही बिहार के डीएनए की बात उठा दी। प्रधानमंत्री से ऐसी असंयत भाषा की उम्मीद नहीं की जाती थी। फिर उन्होंने पैकेज देने की बात कुछ इस अंदाज में की मानो जनता पर अहसान कर रहे हों। प्रदेश के खुद्दार मतदाताओं ने इसे भी अपना अपमान ही माना। फिर दिल्ली के पास दादरी से लेकर मुंबई तक जो दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं घटित हुईं उनका भी कोई संज्ञान लेना मोदी सरकार ने उचित नहीं समझा तथा आम जनता के मन में यही बात आई कि यह बिहार चुनाव के समय साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण व बहुमतवाद तैयार करने की कोशिश ही है। लेखकों, कलाकारों द्वारा पुरस्कार व सम्मान लौटाने पर भी उनकी बात को समझने की कोशिश करने की बजाय उल्टे उन पर अनर्गल आरोप जडऩे व टिप्पणियां करने का जो काम भाजपा के मंत्रियों व नेताओं ने किया उसे भी बिहार की राजनीतिक चेतना से लैस प्रबुद्ध मतदाताओं ने स्वीकार नहीं किया।

इस वृहत्तर पृष्ठभूमि में यह भी याद रखने की आवश्यकता है कि आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार अब तक कोई कमाल नहीं कर पाई है। दाल और प्याज की कीमतें जिस तरह बढ़ी हैं उससे हर नागरिक परेशान और चिंतित है। जो स्वदेशी उद्योगपति नरेन्द्र मोदी के अंधसमर्थक थे उनका भी मोह भंग होने लगा है जो अभी नारायण मूर्ति व किरण मजूमदार शॉ के वक्तव्यों से प्रकट हुआ। जिन विदेशी उद्यमियों व निवेशकों ने नरेन्द्र मोदी पर दांव लगाया था वे भी स्वयं को ठगा गया महसूस कर रहे हैं। रेटिंग एजेंसी मूडी की रिपोर्ट चावल का दाना है। विदेश नीति में इस सरकार की असफलता अब दिखाई देने लगी है। नेपाल के साथ संबंध बिगड़ते हैं तो उसका सबसे पहले प्रभाव बिहार पर ही पड़ता है। इस बात को सरकार ने सही ढंग से नहीं समझा। अब जानकार लोग कहने लगे हैं कि अगर विश्व बाजार में तेल की कीमतें न गिरी होतीं तो भारत की अर्थव्यवस्था का न जाने क्या हाल होता।

ऐसी और बहुत सी बातें हैं जो जनता के मन में उमड़-घुमड़ रही हैं। अगर नरेन्द्र मोदी अपने आपको एक सफल प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं तो सबसे पहले उन्हें गुजरात का मुख्यमंत्री होने की मानसिकता से निकलना होगा। उन्हें संघ का स्वयंसेवक होने का गर्व भी छोडऩा होगा। आखिरी बात अमित शाह को नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए तत्काल अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए।

देशबन्धु में 09 नवंबर 2015 को प्रकाशित विशेष सम्पादकीय

Thursday, 5 November 2015

कुंभलगढ़ और हल्दीघाटी


 मन मयूर नाच उठा जैसे मुहावरों का प्रयोग अब शायद ही कोई करता हो। मयूर पंख, नाचे मयूरी जैसे नामवाली फिल्में भी अब किसे याद हैं। मयूर भारत का राष्ट्रीय पक्षी है, लेकिन उसकी चर्चा भी कहां सुनने मिलती है। जब वन्य जीवन की बात होती है तो बाघ को बचाने की फिक्र ही सामने आती है। मोर बेचारा किसी गिनती में नहीं आता। कुल मिलाकर जंगल में मोर नाचा किसने देखा वाली कहावत ही चरितार्थ हो रही है। इसलिए उस दिन जब अरावली की पर्वतमाला में बसे उस छोटे से गांव में मोरों का एक पूरा कुनबा देखा तो मन सहज  प्रफुल्लित हो उठा। दिल्ली भी अरावली की गोद में बसी है। वहां भी कभी-कभार मोर देखने मिल जाते हैं। ऐसा लगता है कि राष्ट्रीय पक्षी को आश्रय देने की पूरी जिम्मेदारी इसी पर्वतमाला ने उठा रखी है जो दिल्ली से लेकर दक्षिण राजस्थान में गुजरात की सीमा तक फैली हुई है।

हमें मयूर दल के दर्शन अनायास ही हो गए। मुख्य मकसद तो कुंभलगढ़ को देखना था। पंद्रहवीं शताब्दी में राणा कुंभा द्वारा बनवाया गया यह किला इधर कुछ वर्षों से चर्चा में आ गया है और एक पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित हो रहा है। एक समय जब लोग उदयपुर घूमने आते थे तो वहां की झीलों को और महल को देखकर खुश हो लेते थे। श्रद्धालुजन निकट स्थित नाथद्वारा और एकलिंगजी के दर्शन करने भी चले जाते थे। देशप्रेम पर्यटकों को हल्दीघाटी तक भी ले जाता था। लेकिन कुंभलगढ़ अपने भव्य सूनेपन में अकेले रहा आता था। यह कुछ आश्चर्य की ही बात है कि इस प्राचीन किले की तरफ अभी तक सैलानियों और पर्यटन प्रबंधकों का ध्यान क्यों नहीं गया। अब स्थिति कुछ बदल रही है। इस स्थान के साथ हमारे इतिहास के दो महत्वपूर्ण अध्याय जुड़े हुए हैं। एक तो चित्तौडग़ढ़ में जब राजवंश को समूल नष्ट करने का षडय़ंत्र रचा गया तब पन्ना धाय पांच साल के बालक उदयसिंह को लेकर यहीं आई थीं। दूसरे, महाराणा प्रताप का जन्म इसी किले में हुआ था।

कुंभलगढ़ के किले से इतिहास की एक और ऐसी कथा जुड़ी है जिसका उल्लेख पाठ्य पुस्तकों में नहीं मिलता। जिन राणा कुंभा ने इस अभेद्य गढ़ का निर्माण करवाया था उनकी हत्या उनके सगे बेटे ऊधा ने साम्राज्य के लालच में कर दी थी। आजकल किले में शाम को ध्वनि और प्रकाश का जो कार्यक्रम चलता है उसमें इस तथ्य का उल्लेख किया जाता है। यह घटना बताती है कि सत्ता के लिए बाप को कैद कर लेना, या मार डालना या भाई की हत्या कर देना- इन सबका किसी धर्म विशेष से लेना-देना नहीं है। जब हम सत और असत के प्रतिमान धर्म, जाति, भाषा आदि के आधार पर गढ़ लेते हैं तब ऐसे तथ्यों की सच्चाई तक पहुंचने में हमारी सहायता करती है और इसलिए इनकी अनदेखी नहीं की जाना चाहिए।

कुंभलगढ़ उदयपुर से लगभग अस्सी किलोमीटर की दूरी पर है। केलवाड़ा नामक गांव से चढ़ाई प्रारंभ होती है और लगभग आठ-नौ किलोमीटर तक आप ऊपर चलते जाते हैं। जिस पहाड़ी पर किला अवस्थित है उसकी ऊंचाई समुद्र सतह से कोई इकतीस-बत्तीस सौ फीट होगी। इसके बाद एक के बाद एक कई दरवाजों और सीढिय़ों को पार करते हुए लगभग पांच सौ फीट और ऊपर चढऩा होता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण किले की देखभाल करता है, लेकिन अब वहां सूनी दीवालों के अलावा और कुछ नहीं है। ऊपर पहुंच जाने के बाद यह अनुमान अवश्य होता है कि इस किले पर चढ़ाई करना और इसे जीत लेना असंभव सी बात रही होगी। बताया जाता है कि सिर्फ एक बार दुश्मन की सेना यहां तक पहुंच पाई थी। एक तरह से यह गढ़ राणा कुंभा की समर-सिद्धता की गवाही देता है।

कुंभलगढ़ की दूसरी बड़ी विशेषता उसका परकोटा है। मूल रूप में इस परकोटे की लंबाई छत्तीस किलोमीटर थी और इसकी चौड़ाई कोई पच्चीस-तीस फीट के आसपास होगी। परकोटा लगभग नष्ट हो चुका है। सिर्फ एक दिशा में लगभग एक किलोमीटर लंबा हिस्सा बाकी है जिसे देखकर चीन की दीवार की याद आ जाना स्वाभाविक है। परकोटे का शेष भाग कब, कैसे नष्ट हो गया और उसे कैसे बचाया नहीं जा सका, यह हमें कोई नहीं बता पाया। किले के अलावा तलहटी में कई वर्ग कि.मी. में फैले विशाल प्रक्षेत्र में तीन सौ से अधिक मंदिर अवस्थित हैं। इनमें से अनेक किले का निर्माण होने के पहले के हैं। इनमें जैन मंदिरों की संख्या काफी है। समझा जाता है कि यहां पहले कभी जैन मंदिर ही रहे होंगे। कालांतर में किसी कारणवश वहां पूजा-पाठ बंद हो गया होगा।

जैसा कि हम जानते हैं मेवाड़ राज्य की पहली राजधानी चित्तौडग़ढ़ में थी। इसके बाद कुंभलगढ़ बसा, फिर राणा उदयसिंह ने उदयपुर की स्थापना की। उदयपुर से कुंभलगढ़ को जाने वाले रास्ते पर भी कोई पंद्रह किलोमीटर बाद एक सड़क हल्दीघाटी की ओर फूटती है जो आगे नाथद्वारा की ओर चली जाती है। हल्दीघाटी के  साथ महाराणा प्रताप की वीरता और उनके स्वामिभक्त चपल वेग घोड़े चेतक की कहानी जुड़ी हुई है। इस जगह का नाम हल्दीघाटी एकदम सटीक और उपयुक्त है। यहां एक संकरा दर्रा है जिसमें महाराणा प्रताप ने अकबर के सेनापति राजा मानसिंह की फौज को घेरने की व्यूह रचना की थी। इस दर्रे की मिट्टी का रंग हल्दी की ही तरह पीला है। इसके पास में ही चेतक की समाधि है। पहले लोग यहां आते थे तो इस समाधि पर और दर्रे पर जाकर माथा नवाते थे, लेकिन अब यहां इक्के-दुक्के पर्यटक ही आते हैं और इसका कारण है।

हल्दीघाटी में दर्रे के दो किलोमीटर पहले जो गांव है वहां एक स्थानीय उद्यमी ने महाराणा प्रताप म्यूजियम की स्थापना कर दी है। यह स्थान सैलानियों के आकर्षण का बड़ा केन्द्र बन गया है। भीतर एक प्रेक्षागृह है जिसमें महाराणा प्रताप के जीवन पर लगभग दस मिनट की एक फिल्म दिखाई जाती है। इसमें एक जगह सूत्रधार एक महत्वपूर्ण बात कहता है- शहंशाह अकबर एवं महाराणा प्रताप के बीच हुई लड़ाई साम्प्रदायिक नहीं थी। अकबर की सेना का नेतृत्व जयपुर के राजा मानसिंह कर रहे थे, जबकि प्रताप के सेनापति हकीम खान सूर थे। फिल्म खत्म होती है। अंत में स्वाधीनता सेनानियों के चित्र दिखाए जाते हैं उनमें लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय और भगतसिंह के साथ-साथ डॉ. हेडगेवार किस तर्क से उपस्थित हैं, यह पाठक स्वयं समझ सकते हैं।

फिल्म खत्म होती है तो एक गुफानुमा लंबी सी दीर्घा में दर्शकों को ले जाया जाता है जहां उपकरणों की सहायता से संचालित महाराणा प्रताप के जीवन की त्रिआयामी झलकियां दिखाई जाती हैं। यहां एक बार फिर आप उन सूचनाओं से रूबरू होते हैं जो पहले आप फिल्म में देख आए हैं। इसके आगे का दृश्य रोचक है। दीर्घा से बाहर निकलते साथ सामने गुलकंद, गुलाबजल और ऐसी कुछ अन्य सामग्रियां बेचने की दुकानें सजी हुई हैं। आपका गाइड आपसे इन दुकानों पर खरीदारी करने का जोरदार आग्रह करता है। दुकानदार भी हांक लगाकर पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयत्न करते हैं। देखते ही देखते आप जिस देशभक्ति की भावना को हृदय में धारण कर बाहर निकले थे वह व्यापार के कौतुक में तिरोहित हो जाती है। इसके बाद आप अपने स्मार्टफोन में संजोई सैल्फियों के साथ खुशी-खुशी अगले ठिकाने के लिए चल पड़ते हैं।

देशबन्धु में 05 नवंबर 2015 को प्रकाशित
 

Friday, 30 October 2015

ओसियां और जोधपुर


 दूर-दूर तक फैला रेगिस्तान। जैसे रेत का समुद्र। आज से कई लाख साल पहले यहां समुद्र ही तो था। इस जनहीन विस्तार के बीच में कहीं-कहीं बालुई चट्टानों से बनी पहाडिय़ां। मरुस्थल की जड़ता को तोड़ती हुई। मैं कल्पना कर रहा हूं आज से बारह-तेरह सौ साल पहले के समय की। इस निर्जन में किसे और क्यों सूझा होगा कि यहां मंदिर बनाया जाए तो क्या शायद यहां कोई छोटी-मोटी बस्ती रही होगी? वहीं कहीं आसपास मीठे पानी का कोई स्रोत रहा होगा। अगर पानी न होता तो मनुष्य की बसाहट भी कैसे होती? मैं कल्पना के घोड़े दौड़ाता हूं तो एक बात समझ आती है। यह जगह पश्चिमी भारत से उत्तर भारत को जोडऩे वाले किसी यात्रापथ पर रही होगी। शायद प्राचीन सिल्क रूट की कोई शाखा! आते-जाते काफिले मीठे पानी के सरोवर के पास डेरा डालते होंगे। धीरे-धीरे यहां स्थायी बस्ती बसी होगी। तब पहले कोई मुखिया, फिर कोई राजा यहां का शासक बन गया होगा और यह स्थान उस प्राचीन समय के मानचित्र पर अंकित हो गया होगा।

मैं बात कर रहा हूं ओसियां की। जोधपुर के पास बसा एक प्राचीन नगर जहां आठवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी के बीच निर्मित मंदिरों का एक पूरा समूह है। मंदिरों की कुल संख्या दो दर्जन के आसपास होगी। जंग खाए, धुंधलाए सूचना पटल से जानकारी मिलती है कि प्रतिहार राजाओं ने इन मंदिरों का निर्माण कराया था। इनमें बड़ी संख्या जैन मंदिरों की है। शैव, वैष्णव और शाक्त मत के देवालय भी यहां पर हैं। श्वेताम्बर जैन सम्प्रदाय के अनुयायी ओसवाल समाज में मान्यता है कि ओसियां से ही उनके समाज का प्रादुर्भाव हुआ। यह इतिहासकारों का विषय है, लेकिन ओसवाल समाज की राजस्थान में जो प्रबल उपस्थिति है उसे देखते हुए यह मान्यता सत्य हो सकती है। जैसा कि ऐतिहासिक संदर्भों में अक्सर होता है तथ्य के साथ मिथक जुड़ जाते हैं, तो इस प्राचीन मंदिरों के नगर में मिथक भी सुनने मिल जाते हैं।

ओसियां में सबसे प्रमुख मंदिर है सच्चाय माता का। यह मंदिर एक टेकरी पर अवस्थित है। पहले ऊपर जाने के लिए पगडंडी रही होगी, लेकिन अब यात्रियों की सुविधा के लिए सीढिय़ां बन गई हैं। सीढिय़ों के दोनों ओर कार्यालय, रसोईघर व अन्य व्यवस्थाओं के लिए बहुत सारा निर्माण हो चुका है। सीढिय़ां संगमरमर की हैं। जगह-जगह पर दानदाताओं  के नामों का उल्लेख है। सीढिय़ों के ऊपर खंभों के सहारे छत भी डाल दी गई है। इनमें प्राचीनता का पुट देने की कोशिश की गई है, लेकिन नया निर्माण देखने से ही समझ आ जाता है। सीढिय़ां चढ़ते वक्त लगता है मानो आप किसी सुरंग में ऊपर चढ़ रहे हैं। श्रद्धालुओं को इस व्यवस्था से अवश्य ही सुविधा हुई होगी, लेकिन निर्माण करवाने वालों ने ध्यान नहीं दिया कि मंदिर में प्राचीनता का जो वैभव है वह इसके चलते धूमिल हो रहा है। बहरहाल सच्चाय माता का यह देवालय राजस्थान के करोड़ों लोगों की श्रद्धा और विश्वास का केन्द्र है। यहां जैन, वैष्णव, शैव, शाक्त सब आते हैं।

इस मंदिर परिसर में दो प्रमुख विशेषताएं मुझे समझ में आईं। एक तो टेकरी पर यह एक अकेला मंदिर नहीं है। उसके साथ सात-आठ मंदिरों का एक समुच्चय जैसा है। एक तरफ लक्ष्मी-नारायण का मंदिर है, तो दूसरी तरफ गणेश का। यहां एक मंदिर में भगवान शंकर विराज रहे हैं तो दुर्गा के नौ स्वरूपों की भी प्रतिमाएं यहां प्रतिष्ठित हैं। मुख्य मंदिर से कुछ फीट नीचे के स्तर पर दशावतार की मूर्तियां भी विद्यमान हैं। ये सारे मंदिर आकार में बहुत बड़े नहीं हैं। फिर भी टेकरी के एक छोटे से क्षेत्रफल में इतने सारे स्वतंत्र मंदिरों का संकुल कम से कम मेरे देखनेे में और कहीं नहीं आया। दूसरी विशेषता इन मंदिरों का स्थापत्य है। हरेक मंदिर में बालुई पत्थरों पर जो नक्काशी की गई है वह अद्भुत है। आप चाहे खंभों को देखें या बाहरी दीवारों को, मूर्तियों को देखें या फिर छत को, सब तरफ पाषाण शिल्पियों की बेजोड़ कलात्मक प्रतिभा का परिचय मिलता है।

सच्चाय माता का मंदिर जागृत मंदिर है याने यहां पूजा-पाठ चलते रहता है। इस कारण मंदिर का रख-रखाव हो जाता है। गो कि प्राचीन विन्यास में जो परिवर्तन किए गए हैं वे बहुत सुखद नहीं हैं। हैरत की बड़ी बात यह है कि ओसियां में जो अन्य मंदिर हैं उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है। पहाड़ी के नीचे जहां पार्किंग की व्यवस्था है, जहां सुरक्षा कर्मी, पार्किंग ठेकेदार आदि पांच-सात लोग बैठे रहते हैं, जहां चाय-पानी की कई सारी दुकानें हैं, वहीं, बिल्कुल वहीं पांच-छह मंदिर अपनी दुरावस्था पर आंसू बहाते खड़े हैं। उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। राजस्थान के पुरातत्व विभाग ने न जाने कब एक सूचना पटल लगाया था जिसकी लिखावट लगभग मिट चुकी है। उससे जो जानकारी मिल सकती है, ले लीजिए, बाकी तो मंदिर के जगत पर बैठी बकरियां और नीचे घूम रही गायों को देखकर आप जितना समझ लें उतना बहुत। जो राजस्थान पर्यटन के लिए इतना प्रसिद्ध है वहां इस प्रमुख विरासत स्थल की ऐसी उपेक्षा को आपराधिक माना जाए तो गलत नहीं होगा।

मैं जितना जानता हूं उसके अनुसार चित्तौडग़ढ़ भारत का सबसे पुराना किला है, उसके बाद जैसलमेर का नंबर आता है जो साढ़े आठ सौ साल पहले बना था। दूसरे शब्दों में, ओसियां राजस्थान के प्राचीनतम नगरों में से एक है। यहीं से उठकर कुछ लोग जैसलमेर गए होंगे। जो प्रस्तर शिल्प ओसियां के मंदिरों में दिखाई देता है उसी की बानगी जैसलमेर के किले में अवस्थित चार-पांच सौ साल बाद बने जैन मंदिरों में देखी जा सकती है। संभव है कि यहां जलस्रोत सूखने से या अन्य किन्हीं कारणों से ओसियां की बजाय जैसलमेर होकर नया यात्रापथ बन गया हो! जो भी हो, इस स्थान के संरक्षण पर तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है।

मेरा ओसियां जाने का कार्यक्रम अचानक ही बन गया। मैं गया तो जोधपुर तक था। वहां के जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय में आयोजित पुर्नश्चर्या पाठ्य में व्याख्यान देने के लिए। बीच में थोड़ा समय था। पूछा कि आसपास कहां-क्या देख सकते हैं? मालूम पड़ा कि ओसियां मात्र यहां से साठ किलोमीटर दूर है। वहां क्या है? उत्तर था- सच्चाय माता का मंदिर है। यह सुनकर मेरी बुद्धि एकदम जागृत हुई। अरे, यही तो हमारी कुलदेवी हैं, जिनकी पूजा दादी किया करती थीं। बस आनन-फानन में कार्यक्रम बन गया। जोधपुर से ओसियां तक का रास्ता बहुत बढिय़ा है और जैसा कि आजकल चलन है इस सड़क पर टोल टैक्स पटाना पड़ता है। जोधपुर से बाहर निकलते-निकलते एक शैक्षणिक परिसर के बीच से हम गुजरते हैं। अशोक गहलोत जब मुख्यमंत्री थे तब वे यहां पर अनेक उच्च शिक्षण संस्थान लेकर आए थे, जिनमें सरदार पटेल (कृपया नोट करें) के नाम पर स्थापित राष्ट्रीय पुलिस वि.वि. भी है।

जोधपुर पुराना शहर तो है, लेकिन बहुत पुराना नहीं। उसकी स्थापना लगभग चार सौ वर्ष पूर्व हुई थी। जोधपुर रियासत की पुरानी राजधानी मंडोर में थी। वह रास्ते पर ही थी। लौटते वक्त यहां के भग्नावशेष देखना चाहते थे, किन्तु समयाभाव के कारण यह इच्छा पूरी नहीं हो पाई। आज का जोधपुर, जयपुर के बाद राजस्थान का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। इसकी आबादी फिलहाल कोई तीस-पैंतीस लाख होगी। प्रदेश में शिक्षा का बड़ा केन्द्र तो है ही, थलसेना तथा वायुसेना की भी बड़ी छावनियां हैं। शहर में चार या पांच रेलवे स्टेशन हैं। इनमें भगत की कोठी भी है जहां से छत्तीसगढ़ के लिए सीधी ट्रेन चलती है। राजा ने कभी किसी साधु को महलनुमा कोठी दक्षिणा में दे दी थी इसलिए यह नाम पड़ गया। एक स्टेशन का नाम राई का बाग है। यहां कभी सरसों की खेती हुआ करती थी।

जोधपुर में मुझे सबसे अधिक आनंद वि.वि. परिसर को देखकर हुआ। पुराने शहर में पुराना परिसर है वह अपनी जगह है। यह नया परिसर नौ सौ एकड़ में फैला है। साठ के दशक में विख्यात शिक्षाशास्त्री वी.वी.जॉन जब यहां कुलपति थे, तब उन्होंने यह भूमि हासिल कर ली थी। आज वि.वि. का हर व्यक्ति प्रोफेसर जॉन की दूरदर्शिता की चर्चा करता है। उनके कार्यकाल में ही अज्ञेय और नामवर सिंह जैसे विद्वान यहां अध्यापक बनकर आए। किन्तु मुझे ध्यान आता है कि प्रोफेसर जॉन को बहुत दुखी मन से प्रतिकूल स्थितियों में जोधपुर छोडऩा पड़ा था। उस समय जो जोधपुर ने देखा, वह आज शायद पूरा देश देख रहा है।

देशबन्धु में 29 अक्टूबर 2015 को प्रकाशित 

Wednesday, 21 October 2015

लेखक का विद्रोह बनाम सत्ता का अहंकार

 



अगर
कुछ लेखकों ने पद, सम्मान या पुरस्कार लौटा दिए हैं तो इसमें केंद्र सरकार को इतना आग-बबूला क्यों होना चाहिए था? प्रधानमंत्री के विश्वस्त और देश के वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कहा कि ये सब लोग कांग्रेसी, वामपंथी या नेहरूवादी हैं और उनका यह विरोध कागजी है। मान लेते हैं कि आप ही सही कह रहे हैं, लेकिन उससे क्या सिद्ध होता है? जो लोग आपकी विचारधारा, आपके कामकाज और आपके तौर-तरीकों में इत्तिफाक नहीं रखते क्या उन्हें अपनी असहमति दर्ज कराने का अधिकार नहीं है? अगर आप ऐसा मानते हैं तब तो यह जनतंत्र वाली बात नहीं हुई। और यदि उनका विरोध कागजी है तब तो आपको रंचमात्र भी चिंता नहीं करना चाहिए, क्योंकि उससे आपको कोई नुकसान होने से रहा। लेकिन श्री जेटली, अन्य मंत्रियों एवं समर्थक पत्रकारों-लेखकों ने जो टीका-टिप्पणियां की हैं, उससे अनुमान होता है कि लेखकों के  विरोध से सरकार की छवि को जो धक्का पहुंचा है, उससे सरकार व उसके सहयोगी समूह किसी हद तक चिंतित हो उठे हैं। भाजपा को शायद पहिली बार पता चला है कि लेखक इस किस्म के भी होते हैं।

भारतीय जनता पार्टी के साथ सदा से दिक्कत रही है कि वह भावनाओं की राजनीति से आगे नहीं बढ़ पाई। उसके लिए देशभक्ति व राष्ट्रप्रेम वही है कि जो मनोज कुमार की फिल्मों में दिखाया जाता है। यह अकारण नहीं है कि भाजपा में बड़े-छोटे परदों के अभिनेताओं का बड़ा सम्मान होता है। यही देशभक्ति उन्हें सेना व पुलिस के अफसरों की ओर भी आकर्षित करती है और जब साहित्य की बात उठती है तो वे उन मंचीय कवियों पर बिछे जाते हैं जो वीररस या हास्यरस की कथित कविताएं सुनाकर मनोरंजन करते हैं। ये समझते हैं कि चीनी तुमको पानी में घोलकर पी जाएंगे या पाक तू नापाक है जैसी कविताओं से मोर्चा फतह किया जा सकता है। ऐसा कहना बहुत गलत नहीं होगा कि इन्हें एक असुरक्षा की भावना हरदम घेरे रहती है। यूं तो संघ परिवार प्राचीन भारतीय संस्कृति का निरंतर जयघोष करता है, लेकिन वास्तविकता यही है कि अधिकतर नेता नाम-जाप और कर्मकांड से आगे संस्कृति से वास्ता नहीं रखते।

भाजपा के शीर्ष नेतृत्व में अटल बिहारी वाजपेयी अपवाद के रूप में उपस्थित हैं। उनका अपने समकालीन लेखकों में से अनेक से संपर्क रहा है और विचारधारा के परे जाकर भी उनके साथ संवाद स्थापित करने में लेखकों ने संकोच नहीं किया। शिवमंगल सिंह सुमन उनके अध्यापक थे तथा वाजपेयीजी उनका बराबर सम्मान करते रहे। हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. शांताकुमार व छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की भी समकालीन साहित्य में थोड़ी-बहुत रुचि रही है। ऐसे कतिपय अपवाद नियम को ही सिद्ध करते हैं। अब जब उदयप्रकाश से प्रारंभ कर मृत्युंजय प्रभाकर तक अनेक जाने-माने लेखकों ने विरोध प्रकट किया, तब शायद भाजपा को पहिली बार पता चला कि देश में बुद्धिजीवियों की कोई ऐसी भी जमात है जो चरण स्पर्श, साष्टांग दंडवत और पेट के बल रेंगने के बजाय आंखों से आंखें मिलाकर बात करना जानती है तथा जो हर बात में, हर मौके पर जय-जयकार करने के बजाय अपनी बात कहने से नहीं हिचकती। काश! सरकार ने इस सच्चाई को जानने का प्रयत्न किया होता!

हम याद दिलाएं कि उदयप्रकाश ने 4 सितंबर को अपना पुरस्कार लौटाने की घोषणा तब की, जब अकादमी पुरस्कार विजेता व अकादमी की सामान्य सभा के सदस्य प्रो. एम.एम. कलबुर्गी की हत्या के बाद साहित्य अकादमी ने न तो शोकसभा की और न ही शोक प्रस्ताव पारित किया। अगर देश के लेखकों की सर्वोच्च संस्था अपने एक वर्तमान सदस्य की हत्या से भी बेखबर है तो इससे बढ़कर विडंबना क्या हो सकती है? उदयप्रकाश ने एक सटीक सैद्धांतिक बिंदु उठाया था, जिसका संज्ञान लिया जाना चाहिए था। इसके बाद नयनतारा सहगल, अशोक वाजपेयी और अन्यों के विरोध प्रदर्शन की खबरें एक के बाद एक आईं। उन्होंने वर्तमान राजनैतिक-सामाजिक वातावरण के बारे में प्रश्न उठाए। देश में बढ़ती असहिष्णुता पर चिंता व्यक्त की। अगर केंद्र सरकार में कोई सही सलाह देने वाला होता तो सार्वजनिक रूप से इन लेखकों की भावनाओं से अवगत होने का संज्ञान लिया गया होता तथा देश में सद्भाव बनाए रखने के लिए हर संभव उपाय अपनाने का आश्वासन दिया जाता। ऐसा नहीं किया गया तो उसके पीछे यही मानसिकता काम कर रही थी कि 25-50 लेखक हमारा क्या बिगाड़ लेंगे।

सच तो यह है कि जब मैं यह कॉलम लिख रहा हूं, उस दिन तक सत्तापक्ष की ओर से जो ढेरों प्रतिक्रियाएं आई हैं उनका केंद्रीय स्वर यही है कि लेखकों के विरोध से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। हम जानते हैं कि लोकसभा में भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत है और अगले साढ़े तीन साल तक प्रत्यक्षत: सरकार के सामने कोई चुनौती दिखाई नहीं पड़ती, लेकिन सत्ताधीशों का यह अहंकार किसी भी दिन उन पर भारी पड़ सकता है। राम और रावण की तुलना करते समय जो कहा जाता है, वह तो भाजपा के शीर्ष नेताओं को अवश्य ही स्मरण होगा। और न हो तो कम से कम आज दशहरे के दिन याद कर लें कि रावण की पराजय अपने किस दुर्गुण के चलते हुई थी। जो हम कह रहे हैं उसके छोटे-मोटे लक्षण दिखना भी प्रारंभ हो गए हैं। जिन ओवैसी को भाजपा ने परोक्ष रूप से बिहार के चुनावी मैदान में उतारा था, वे सिमट कर एक कोने में बैठ गए हैं; उसी प्रदेश में शरद पवार की राकांपा ने मुलायम सिंह की सपा से गठजोड़ तोड़ लिया है, क्योंकि सपा नेता भाजपा के मुरीद हो चले हैं और महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ नाभि-नाल संबंध होने के बावजूद सब कुछ ठीक नहीं है।

आगे बढऩे के पहिले यह तथ्य रेखांकित करना उचित होगा कि जिन लेखकों ने पुरस्कार-सम्मान लौटाए हैं, वे लगभग पूरे भारत का और लगभग सभी भाषाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसमें कश्मीर से केरल व पूर्वोत्तर से लेकर महाराष्ट्र तक के लेखक हैं। इनमें वृद्ध, प्रौढ़, युवा, स्त्री, पुरुष सभी हैं। अनेक ने पुरस्कार वापिस नहीं किए हैं, लेकिन केन्द्र सरकार की वर्तमान रीति-नीति की उन्होंने खुलकर आलोचना की है तथा विरोध जारी रखने का संकल्प व्यक्त किया है। फिर जेटली जी इन्हें चाहे जो घोषित करें, ये स्वतंत्रचेता बुद्धिजीवी हैं तथा इनमें से कई को हमने सत्ता चाहे जिसकी रही हो, बुनियादी मानवीय मूल्यों की रक्षा के प्रश्न पर सत्ता के विरोध में खड़ा होते देखा है। ये लेखक किसी सैन्य प्लाटून का हिस्सा नहीं है कि जैसा हुकुम मिला, वैसी तामील कर दी; इनमें से हरेक में अपने विवेक- बुद्धि से निर्णय लेने की क्षमता है।

लेखकों ने सम्मान-पुरस्कार क्यों लौटाए, इस पर तरह-तरह के सवाल पूछे जा रहे हैं, जिनमें से अधिकांश प्रसंगच्युत, संदर्भहीन व असंगत हैं। मसलन अर्णब गोस्वामी ने अपने चैनल पर वक्तव्य दिया कि आपातकाल में हिटलर की जर्मनी से छह गुना अधिक नसबंदियां की गईं, तब संजय गांधी का विरोध क्यों नहीं किया। पहिले तो श्री गोस्वामी को यह सवाल करना ही था तो केन्द्रीय मंत्री मेनका गांधी से करते। दूसरे, टीवी के इस सुपरस्टार को याद नहीं आया कि नयनतारा सहगल ने आपातकाल का विरोध करने के साथ पीयूसीएल को स्थापित करने में भी अग्रणी भूमिका निभाई थी। इसी तरह के और न जाने कितने सवाल दागे गए हैं। इसका उत्तर यही है कि लेखक को जब सही लगा, उसने विरोध दर्ज किया। पहिले नहीं किया का अर्थ यह नहीं कि आज भी न करें। फिर यह महत्वपूर्ण बिन्दु नोट किया जाना चाहिए कि कांग्रेस पार्टी नीतिगत रूप से दो राष्ट्र अवधारणा का विरोध करते आई है जबकि संघ की प्रेरणा से भाजपा भारत में हिन्दू राष्ट्र बनाने की पक्षधर है तथा वर्तमान में जो वातावरण बना है, उसके पीछे यही भावना काम कर रही है। कांग्रेस ने संगठन व सरकार दोनों स्तर पर ऐसा नहीं होने दिया, बावजूद इसके कि पार्टी में एक तबका प्रारंभ से ही रूढि़वादी सांप्रदायिक सोच का हामी रहा।

अब तक हम देख चुके हैं कि इस पूरे प्रसंग में लेखक चार वर्गो में बंट गए हंै। एक- जिन्होंने पुरस्कार आदि लौटाए। दो- जो विरोध तो करते हैं, लेकिन पुरस्कार नहीं लौटाना चाहते। तीन- जो अपने घर में चुपचाप बैठे हैं। कोऊ हो नृप, हमें का हानि। चार- जो पुरस्कार न लौटाने का औचित्य सिद्ध कर रहे हैं। विनोद कुमार शुक्ल ने दो बातें
पते की कहीं। एक तो उन्होंने कहा कि पुरस्कार कोई उधार नहीं था, जिसे लौटाया जाता। मैं कहना चाहता हूं कि पुरस्कार वाकई आप पर समाज का उधार है। उसके साथ कुछ अपेक्षाएं जुड़ी होती हैं उन्हें पूरा करने पर ही आप उऋण होते हैं। एक लेखक को गाढ़े वक्त में समाज को राह दिखाना चाहिए। यह उससे सबसे बड़ी अपेक्षा है। शायद शुक्लजी की दृष्टि में वह गाढ़ा वक्त नहीं आया। उन्होंने दूसरी बात कही कि जीवन भर पुरस्कार को सलीब की तरह ढोते रहेंगे। आमीन। लेकिन क्या यह तुलना तर्कसंगत है। कोई भी अपनी मर्जी से नहीं, बल्कि दंडाधिकारी के आदेश से सलीब ढोता है। तुलसीदास के मुताबिक यह देह धरने का दंड भी हो सकता है। जो बात विनोद भाई कह रहे हैं उसका यह मतलब निकाला जा सकता है कि पुरस्कार वापिस न करने पर उनसे प्रश्न किया जाएगा कि आप क्यों पीछे रह गए। हां, सवाल शायद पूछा जा सकता है, लेकिन उसकी परवाह करने की आवश्यकता नहीं है। हर व्यक्ति को अधिकार है कि वह अपने मनोनुकूल निर्णय ले। मैं पुरस्कार वापिस न करने वाले सभी मित्रों से कहना चाहूंगा कि यह सलीब नहीं है। अगर आपके मन पर इसका बोझ नहीं है तो मत उतारिए।
देशबन्धु में 22 अक्टूबर 2015 को प्रकाशित

Wednesday, 14 October 2015

विकलांग चेतना का दौर


 



विगत सप्ताह इसी स्थान पर मैंने नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की मृत्यु से जुड़े कुछ पहलुओं की चर्चा की थी, लेकिन बात यहीं समाप्त नहीं होती। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ और संतप्त नेता लालकृष्ण अडवानी ने तो मानो नरेन्द्र मोदी को चुनौती देने के लिए मांग उठा दी है कि नेताजी की मृत्यु से संबंधित सारे दस्तावेज सार्वजनिक कर दिए जाएं तभी इस विवाद पर अंतिम रूप से विराम लगेगा। इस बीच नेताजी के कुछ कुटुम्बीजनों ने ममता बनर्जी सरकार पर जो शक प्रकट किया है उस पर कोई अधिकृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। शायद प. बंगाल सरकार ने ठीक ही किया है। यदि राज्य सरकार के पास सचमुच कोई बचे कागजात हैं वे भी सार्वजनिक कर दिए जाएं तो क्या बोस परिवार के संशयग्रस्त सदस्य उससे संतुष्ट हो पाएंगे या फिर कोई नया शिगूफा छोडऩे की तैयारी में जुट जाएंगे?

जो भी हो, इस दरम्यान भाजपा के शुभचिंतक पत्रकार स्वप्न दासगुप्ता का एक लेख कोलकाता के द टेलीग्राफ अखबार में प्रकाशित हुआ है। इसमें उन्होंने स्पष्ट मत व्यक्त किया है कि दस्तावेजों का खुलासा होने से कुछ आना-जाना नहीं है। वे पंडित नेहरू को भी संदेहमुक्त करते हैं, जो कि श्री दासगुप्ता की दक्षिणपंथी रुझान के चलते आश्चर्यजनक ही माना जाएगा। उनका कहना है कि नेहरूजी जानते थे कि विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु की सच्चाई को शोकग्रस्त बोस परिवार स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है और इसलिए उन्होंने आधिकारिक तौर पर इसके खंडन-मंडन में कोई रुचि नहीं ली। बहरहाल, इसका यह परिणाम जरूर हुआ कि नेताजी के अंधभक्तों को उन्हें लेकर रहस्य का आवरण बुनने का मौका मिल गया। मुझे याद है कि जबलपुर में हमारे दफ्तर में 1961-62 में मोहन लहरी नाम के एक सज्जन ने कुछ समय काम किया था। वे नेताजी के जीवित होने का दावा हर किसी से करते थे।  लगभग चालीस साल बाद ये सज्जन बस्तर में कहीं आकर बस गए थे। नेताजी का साथी होने के आधार पर उनको जो सम्मान मिला उसके चलते उनका अंतिम समय ठीक-ठाक कट गया।

बहरहाल नेताजी तक चर्चा सीमित रहती तब भी गनीमत थी। लेकिन हो यह रहा है कि इस प्रकरण को जो हवा मिली उससे कुछ और लोगों की भी हौसला अफजाई हो गई है। लाल बहादुर शास्त्री के पुत्र व कांग्रेस नेता अनिल शास्त्री ने मांग  की है कि शास्त्रीजी की मृत्यु से संबंधित सारे दस्तावेज जनता के सामने रखे जाएं। वे अपनी स्वर्गीया मां के हवाले से कहते हैं कि उन्हें शास्त्रीजी की हृदयाघात से मौत होने पर विश्वास नहीं था। मुझे ध्यान आता है कि रायपुर में 1965 में शरद पूर्णिमा के कवि सम्मेलन में पधारे एक मंचीय कवि ने जो कविता सुनाई थी उसमें वर्णन था कि उनके सपने में ललितादेवी शास्त्री यह कहने के लिए आईं कि तुम्हारे बाबूजी (शास्त्रीजी) को जहर देकर मारा गया है। इस तथाकथित कविता में इंदिरा गांधी पर सीधे-सीधे आरोप मढ़ा गया था। उनके इस विषवमन के बाद श्रोताओं ने उन्हें बुरी तरह हूट कर दिया था। हाल के समय में वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर ने भी अपनी आत्मकथा में शास्त्रीजी की हत्या किए जाने का आरोप लगाया है। अब प्रश्न उठता है कि अनिल शास्त्री को आज यह मुद्दा उठाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? वैसे वे इस बात से दुखी होंगे कि जांच कराने की बात तो दूर रही, प्रधानमंत्री मोदी 2 अक्टूबर को विजयघाट तक नहीं गए!

नेताजी और शास्त्रीजी के बाद शहीदे-आज़म भगतसिंह की तीसरी-चौथी पीढ़ी के सदस्य भी सामने आ गए हैं। वे आरोप लगा रहे हैं कि स्वतंत्र भारत में भी उनके घर की जासूसी होते रही है। अब जिसे मानना है वह इसे सच मान ले, किन्तु लाल बहादुर शास्त्री और भगतसिंह इन दोनों के प्रसंग में भी सहजबुद्धि कुछ और ही कहती है। जैसा कि सब जानते हैं शास्त्रीजी की मृत्यु ताशकंद में हुई थी। यह भी कोई छुपी बात नहीं है कि शास्त्रीजी को दिल की बीमारी थी। ताशकंद की जनवरी की हाड़ जमा देने वाली ठंड का उनकी सेहत पर क्या असर हुआ होगा यह सिर्फ अनुमान का विषय है, लेकिन जिस सोवियत संघ ने ताशकंद में सुलह वार्ता के लिए लाल बहादुर शास्त्री और अयूब खान दोनों को आमंत्रित किया था, उसकी कोई दिलचस्पी शास्त्रीजी की मृत्यु में होगी, यह कैसे और क्यों माना जाए? अपनी धरती पर किसी मेहमान की मृत्यु सोवियत सरकार के लिए अप्रत्याशित और दु:खद घटना ही रही होगी। दूसरी तरफ शास्त्रीजी की मृत्यु से भारत में किसको लाभ होता, यह भी एक नाहक प्रश्न है। याद रखना चाहिए कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार में मोरारजी देसाई वरिष्ठतम नेता थे तथा नेहरूजी व शास्त्रीजी दोनों की मृत्यु के बाद वे प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे। इस तथ्य को ध्यान में रखेंगे तो अनर्गल आरोप का उत्तर अपने आप मिल जाएगा।

शहीदे-आज़म भगत सिंह के परिवार की खुफिया निगरानी होती थी यह आरोप भी हमें दूर की कौड़ी प्रतीत होता है। भगतसिंह को फांसी देने के बाद अंग्रेज सरकार ने भले ही उनके रिश्तेदारों पर नज़र रखी हो, लेकिन देश को स्वाधीनता मिलने के बाद इसकी कोई वजह दिखाई नहीं देती। इन तीनों प्रकरणों को लेकर मैं एक अन्य दृष्टि से विचार करता हूं। हमें ज्ञात है कि स्वाधीनता सेनानियों के वंशजों को सरकार द्वारा काफी सुविधाएं दी जाती हैं जैसे कि उनकी तीसरी पीढ़ी के लिए मेडिकल कॉलेज आदि में सीटें आरक्षित होती हैं। हम बहुत सारे फर्जी स्वाधीनता सेनानियों को जानते हैं। जब ऐसे लोग सरकारी सुविधाएं हासिल कर सकते हैं तो भगतसिंह, नेताजी व शास्त्रीजी के वंशज भी लाभ उठाने की क्यों न सोचें? मृत्यु की जांच के लिए नए सिरे से कमीशन बन जाए, उस बहाने कुछ पूछ-परख हो जाए, जांच के बहाने विदेश यात्रा का मौका मिल जाए, दिवंगत के नाम पर शोध संस्थान स्थापित करने के लिए अनुदान प्राप्त हो जाए और यह सब न भी हो तो कम से कम अखबारों में तस्वीर के साथ इंटरव्यू छपे, रोटरी क्लब वाले भाषण देने बुला लें और इस तरह पुरखों के नाम पर अपने को सम्मान मिलता रहे। यह भावना कहीं न कहीं काम करते दीखती है।

कुल मिलाकर मुझे लगता है कि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में सारा देश ''थियेटर ऑफ द एब्सर्ड" में तब्दील हो गया है। मैं इसके लिए हिन्दी में पर्याय सोच रहा था। नौटंकी से बेहतर और कोई संज्ञा समझ नहीं आई, लेकिन जो दृश्य बना हुआ है उसे व्यक्त करने के लिए नौटंकी कहना पर्याप्त नहीं है। हरिशंकर परसाई ने काफी पहले विकलांग श्रद्धा का दौर शीर्षक से निबंध लिखा था। इसे थोड़ा बदलकर कह सकते हैं कि अब हम विकलांग चेतना के दौर से गुजर रहे हैं। हमें समझ नहीं आ रहा है कि आगे का रास्ता क्या है तथा किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में सब बैठे हुए हैं। जो सत्ता में हैं उनकी जीभ पर लगाम नहीं है। जिसकी जब जो मर्जी आती है कह देता है और जिन्हें प्रतिकार करना चाहिए वे घिसे-पिटे बयानों से आगे नहीं बढ़ते। अपने आप को उदारवादी, जनतंत्रवादी मानने वाले अनेकानेक बुद्धिजीवी तो तात्कालिक लाभ की प्रत्याशा में प्रतिगामी शक्तियों के सामने दंडवत तक करने लगे हैं। हमारे आसपास नित्यप्रति दिल दहलाने वाले अपराध घटित हो रहे हैं, लेकिन उनको रोकने में आज हम अपने आपको जितना असहाय पा रहे हैं ऐसा शायद पहले कभी नहीं हुआ। (नोट: इस कॉलम के लिखने व छपने के दरम्यान दस दिन का अंतराल रहा है। इस बीच अनेक जाने-माने लेखक प्रतिरोध करने सामने आए हैं। मुझे खुशी है कि उन्होंने मुझे एक सीमा तक गलत सिद्ध किया है)

एक गहरी हताशा सामाजिक जीवन में घर  करते जा रही है। महान लेखक आल्बेयर कामू ने एब्सर्ड को परिभाषित करते हुए ग्रीक मिथक से सिसीफस का उदाहरण दिया था- वह ऐसा इंसान है जो रोज एक चट्टान को ऊपर पहाड़ की चोटी तक ले जाने की कोशिश में लगा हुआ है। वह जितनी बार कोशिश करता है उतनी बार चट्टान खिसक कर नीचे आ जाती है याने एक निरर्थक उद्यम में वह अपना जीवन बिता रहा है। क्या यही स्थिति आज आम भारतीय की नहीं हो गई है? जब कोई अनहोनी हो जाए तो थोड़ी देर हाय-हाय कर लो, फिर चुप बैठ जाओ, फिर टीवी के समाचार चैनलों पर जो बहसें होती हैं, उसी में तत्व दर्शन की खोज कर अपने मन को समझा लो।
देशबन्धु में 15 अक्टूबर 2015 को प्रकाशित

Friday, 9 October 2015

नेताजी की मृत्यु (!) : अपने-अपने हित





नेताजी
सुभाषचन्द्र बोस की मृत्यु को लेकर पिछले सत्तर साल से तरह-तरह की चर्चाएं देश में होती रही हैं। इस चर्चा को समाप्त न होने देने के पीछे कुछ व्यक्तियों और समूहों के अपने-अपने हित जुड़े रहे हैं। अभी एक बार फिर चर्चा गरम है और इसे हवा देने में तीन हित समूहों की भूमिका स्पष्ट दिखाई देती है। सबसे पहले भाजपा सरकार व संघ परिवार, फिर नेताजी के कुटुंब की तीसरी-चौथी पीढ़ी के कुछ सदस्य और सबसे अंत में इस मुुुद्दे पर हाल-हाल में सक्रिय हो गई पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। नेताजी अगर आज जीवित होते तो उनकी आयु एक सौ अठारह वर्ष होती। इसलिए तर्क दृष्टि यह कहती है कि नेताजी का निधन हो चुका है। उनकी मृत्यु कब, कैसे, किन परिस्थितियों में हुई यह हम शायद कभी नहीं जान पाएंगे। किंतु इस बहस को जीवित रखने से किसका क्या हित साधन हो रहा है, यही सोचने की बात है।

इसके पूर्व नेताजी व उनके द्वारा गठित आज़ाद हिन्द फौज से जुड़े कुछ तथ्यों को सामने रखने से वस्तुस्थिति समझने में हमें शायद मदद मिल सकेगी। सर्वप्रथम इस तथ्य को याद रखें कि 18 अगस्त 1945 (नेताजी की घोषित पुण्यतिथि) को भारत में ब्रिटेन का राज था। द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हो चुका था किन्तु भारत के स्वाधीन होने की उस समय कोई चर्चा नहीं थी। पंडित जवाहर लाल नेहरू के उस समय प्रधानमंत्री बनने या किसी अन्य रूप में शक्ति सम्पन्न होने का भी सवाल नहीं था। सुभाषचन्द्र बोस की मृत्यु विमान दुर्घटना में हुई या नहीं हुई इसके बारे में जानकारी ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों को ही हो सकती थी जिन्होंने दक्षिण-पूर्व एशिया में हिटलर की सहयोगी जापानी सेना को पराजित किया था। यहां सवाल उठता है कि भारतीय स्वाधीनता संग्राम के एक महानायक की मृत्यु के बारे में झूठी खबर फैलाकर ब्रिटेन का क्या भला हो सकता था।

यह तो सबको पता है कि नेताजी हिटलर के पास भारत की आज़ादी के लिए सैन्य सहायता मांगने गए थे और हिटलर ने ही उन्हें जापान भिजवा दिया था। धुरी राष्ट्रों की सहायता से ही नेताजी ने आज़ाद हिन्द फौज का गठन किया था, जिसमें पूर्वी देशों में तैनात ब्रिटिश भारतीय सेना के अनेक सिपाही विद्रोह करके शामिल हो गए थे। आज़ाद हिन्द फौज का सांगठनिक आधार बहुत मजबूत नहीं था। उद्दाम देशप्रेम की भावना ही उनकी मुख्य शक्ति थी। इसीलिए मित्र राष्ट्रों की सेना के सामने आज़ाद हिन्द फौज टिक नहीं पाई। बड़ी संख्या में सैनिक गिरफ्तार हुए और सेना के स्थापित नियमों के अनुसार उनका कोर्ट मार्शल हुआ। यहां ध्यान रहे कि द्वितीय विश्व युद्ध मई 45 में लगभग खत्म हो चुका था, जबकि जापान ने 15 अगस्त 1945 को अंतिम रूप से समर्पण कर दिया था।

यह हमारे इतिहास का एक रोचक और स्मरणीय प्रसंग है कि आज़ाद हिन्द फौज याने आईएनए के तीन प्रमुख सेनानियों के विरुद्ध जब लालकिले में ब्रिटिश सरकार ने कोर्ट मार्शल की कार्रवाई शुरु की तो इनकी वकालत करने के लिए बैरिस्टर जवाहर लाल नेहरू ने बरसों बाद एक बार फिर अपना काला गाउन पहना तथा सुविख्यात वकील भूलाभाई देसाई के साथ मिलकर उनकी पैरवी की। इन तीनों के नाम उस समय बच्चे-बच्चे की जुबान पर थे- सहगल, ढिल्लो, शाहनवाज़। इसके आगे की जानकारी और भी गौरतलब है। कर्नल शाहनवाज़ खान कांग्रेस की टिकट पर अमरोहा (उत्तरप्रदेश) से लोकसभा के उम्मीदवार बनाए गए। जीतने के बाद वे नेहरू सरकार में मंत्री भी बने। कर्नल गुरुदयाल सिंह ढिल्लो मध्यप्रदेश में ग्वालियर के पास शिवपुरी में आकर बसे। यहां उनको सरकार द्वारा खेती के लिए जमीन दी गई। वे भी कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े, लेकिन हिन्दू महासभा के उम्मीदवार के आगे जीत नहीं सके क्योंकि हिन्दू महासभा प्रत्याशी को ग्वालियर राजदरबार का समर्थन प्राप्त था।

कर्नल प्रेम सहगल कानपुर जाकर बस गए और एक कम्युनिस्ट नेता के रूप में राजनीति में सक्रिय हुए। उनकी पत्नी कैप्टन डॉ. लक्ष्मी सहगल आईएनए की झांसी रानी बिग्रेड की कमांडर थीं। दोनों पति-पत्नी वामपंथी राजनीति में ताउम्र सक्रिय रहे। कैप्टन लक्ष्मी ने अपनी मेडिकल प्रैक्टिस जारी रखी और एक ममतामयी डॉक्टर के रूप में उन्होंने ख्याति प्राप्त की। यह याद कर लेना मुनासिब होगा कि 2002 में  वामदलों ने कैप्टन लक्ष्मी को एपीजे अब्दुल कलाम के खिलाफ राष्ट्रपति चुनाव में खड़ा किया था। डॉ. कलाम सपा द्वारा प्रस्तावित भाजपा के उम्मीदवार थे और कांग्रेस ने भी उन्हें समर्थन देना बेहतर समझा था।  इस तरह आज़ाद हिन्द फौज की एक वीर नायिका को अपनी वृद्धावस्था में पराजय का सामना करना पड़ा।

नेताजी द्वारा स्थापित आईएनए के सैनिकों याने नेताजी के अनुयायियों के प्रति कांग्रेस के लंबे शासनकाल में एक सम्मान का एक भाव लगातार विद्यमान था। कैप्टन लक्ष्मी सहगल को तो पद्मविभूषण से भी सम्मानित किया गया। इसके अलावा आईएनए के तमाम सैनिकों को यद्यपि सेना में तो दुबारा नहीं लिया गया, लेकिन उनके पुनर्वास की वैकल्पिक व्यवस्था अवश्य की गई। रायपुर में ही कैप्टन नत्थासिंह मिन्हास थे। उनके पुत्र अक्षर सिंह मेरे मित्र थे। नेताजी और उनके साथियों के प्रति सरकार व समाज में जो आदर था वह अन्य रूपों में भी व्यक्त हुआ। मसलन, स्कूलों में विद्यार्थियों के जो दल या हाउस बनते थे उनमें नेहरू हाउस होता था तो सुभाष हाउस भी अवश्य होता था। ऐसे और भी बहुत से उदाहरण देखने मिल जाएंगे।

इस पृष्ठभूमि में हम इस प्रश्न की ओर वापिस लौटते हैं कि विवाद को जीवित रखने में किसका हित साधन हो रहा है। अभी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नेताजी से संबंधित अड़सठ फाइलें जो राज्य सरकार के पास थीं, वे सार्वजनिक कर दी हैं। उन्हें पुलिस म्यूजियम में जनता के अवलोकनार्थ रख दिया गया है। पिछले लगभग एक माह में कितने ही लोगों ने इन फाइलों को देखा होगा लेकिन उससे कुछ हासिल हुआ प्रतीत नहीं होता। ममता बनर्जी शायद सोचती हैं कि विधानसभा के निकट भविष्य में होने वाले चुनावों में उन्हें अपनी इस चतुराई से लाभ होगा, लेकिन अगर दस्तावेजों से नए तथ्य उभर कर सामने नहीं आ रहे हैं तो उनको फायदा मिलना संदिग्ध ही है।

नेताजी के कुछ कुटुंबीजन भी फाइलों को उजागर करने के लिए बड़ी दौड़धूप कर रहे हैं। उनकी उम्मीदें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर टिकी हुई हैं। यह मजे की बात है कि नेताजी की कानूनी वारिस व उनकी अपनी बेटी अनीता बोस खुद यह मानती हैं कि नेताजी की मृत्यु विमान दुर्घटना में हो चुकी है। सहज बुद्धि कहती है कि दूरदराज के रिश्तेदारों के बजाय सगी बेटी की बात पर विश्वास किया जाए। मज़ेदार बात यह है कि अब यही कुटुंबीजन ममता दी पर शक व्यक्त कर रहे हैं कि उन्होंने सारे दस्तावेज उजागर नहीं किए। याने विवाद चलते रहना चाहिए। इसके पीछे हमें निजी स्वार्थ साधन की भावना ही नज़र आती है। जहां तक भाजपा और संघ की बात है तो उनका मुख्य मकसद एक ही है कि येन-केन-प्रकारेण पंडित जवाहर लाल नेहरू की छवि को धूमिल किया जाए। उनकी इन कोशिशों को हम पिछले साठ साल से देख रहे हैं। इसके बावजूद केंद्र की मोदी सरकार चुनावी घोषणा के विपरीत अब नेताजी से संबंधित दस्तावेजों को सार्वजनिक करने से इंकार कर रही है। उसने अपना रुख बदला है तो इसके पीछे कोई जबरदस्त कारण ही होगा। जनता को भावनाओं में बहने के बजाय सोचना चाहिए कि यह कारण क्या हो सकता है।
देशबन्धु में 8 अक्टूबर 2015 को प्रकाशित