Wednesday, 9 December 2015

भगवान ने सवाल पूछा!


 एक रोचक खबर ट्विटर पर पढऩे मिली कि सचिन तेंदुलकर ने राज्यसभा में तीन साल बीतने के बाद पहली बार कोई प्रश्न पूछा। इस पर मैंने टीका की- ''हे भगवान, जब स्वयं भगवान सवाल पूछने लगे तो हम सामान्य मनुष्यों के सवालों का उत्तर कौन देगा।" यह तो हुई मजाक की बात। किन्तु इस बहाने अपने समय की एक चिंताजनक सच्चाई पर विचार करने का मौका हाथ लग गया है। हमने न जाने कब क्यूं अमिताभ बच्चन व सचिन तेंदुलकर इत्यादि को महानायक और शताब्दी पुरुष जैसे विशेषणों से नवाज दिया। जहां कुछेक आध्यात्मिक गुरु यथा ओशो रजनीश, श्रीराम शर्मा, सत्य साईं बाबा आदि स्वयं को भगवान कहलाने लगे थे मानो उन्हीं का बराबरी करते हुए ग्लैमर की दुनिया के इन सितारों को भी हमने भगवान बना डाला। मुझे संदेह होता है कि योग गुरु बाबा रामदेव भी इनके पीछे-पीछे ही चल रहे हैं। उन्होंने स्वयं को नोबेल पुरस्कार का अधिकारी तो घोषित कर ही दिया है। वे भी किसी दिन भारत रत्न से अलंकृत हो जाएं तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा।

यदि सचिन तेंदुलकर द्वारा अपने कार्यकाल का आधा समय बीत जाने के बाद राज्यसभा में एक सवाल उठाना समाचार बन सकता है, तो हमें इस पर गौर करने की आवश्यकता है कि आखिरकार क्या सोचकर क्रिकेट के इस महान खिलाड़ी को राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा में मनोनीत किया गया। उन्हीं राष्ट्रपति द्वारा सचिन को भारत रत्न देने का भी क्या औचित्य था। जैसा कि हम जानते हैं राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से किए गए ये निर्णय वस्तुत: तत्कालीन सरकार के होते हैं, इसलिए पिछली सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी दोनों को आज शायद आत्मचिंतन करना चाहिए कि सचिन तेंदुलकर को इतना महत्व देकर देश, सरकार और पार्टी का क्या भला हुआ। यह सवाल फिल्म अभिनेत्री रेखा के बारे में भी है, जिन्हें राज्यसभा में लाया गया। कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से हम उत्तर की अपेक्षा नहीं रखते, लेकिन शायद भूतपूर्व पत्रकार और वर्तमान राजनेता राजीव शुक्ला हमारी जिज्ञासा शांत कर सकते हैं, क्योंकि संभवत: इन निर्णयों के पीछे उनकी अहम् भूमिका थी।

राष्ट्रपति द्वारा सरकार की सिफारिश पर राज्यसभा में बारह सदस्य मनोनीत किए जाते हैं। इसका प्रमुख आधार उस व्यक्ति का देश के सार्वजनिक जीवन के किसी क्षेत्र में विशिष्ट  योगदान होता है। लेकिन इसके साथ-साथ यह ध्यान भी रखा जाना चाहिए कि वह व्यक्ति उच्च सदन याने राज्यसभा के कामकाज में कितनी गंभीरता व क्षमता के साथ अपनी सेवाएं दे सकता है। वैसे तो यह शर्त किसी भी सदन की सदस्यता के लिए रखी जाना चाहिए। जो व्यक्ति सदन की कार्रवाई के लिए समय देने तैयार न हो, बहस में हिस्सा न ले, सवाल न पूछे, जिसका ध्यान हर समय पैसे कमाने पर या अन्य दिशाओं में लगा रहे उसका मनोनयन करने से किसका भला होना है। इस अवांछनीय स्थिति को लोकसभा में भी देखा गया है, लेकिन वहां व्यक्ति कम से कम जनता द्वारा चुना जाकर आता है, जबकि राज्यसभा में ऐसा होने पर तो मनोनयन करने वाले के विवेक और निर्णयक्षमता पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाता है।

राज्यसभा में 1952 में राष्ट्रपति द्वारा कला, साहित्य, विज्ञान एवं समाजसेवा के लिए जो व्यक्ति मनोनीत किए गए उनके नाम देखें तो मन उल्लास से भर उठता है। इसमें सत्येन्द्रनाथ बोस, पृथ्वीराज कपूर, रुक्मणी देवी अरुन्देल, डॉ. जाकिर हुसैन, मैथिलीशरण गुप्त, काका कालेलकर और राधा कुमुद मुखर्जी जैसे व्यक्ति शामिल थे। बाद के वर्षों में महामहोपाध्याय पी.वी. काणे, मामा वरेरकर, इतिहासविद् डॉ. ताराचंद  और ताराशंकर बंद्योपाध्याय जैसे मनीषियों ने राज्यसभा का गौरव बढ़ाया। यह संभव है कि ये सब एक समान रूप से सदन में सक्रिय न रहे हों, लेकिन इनकी उपस्थिति मात्र से सदन में जो गरिमामय वातारवरण का निर्माण होता होगा उसकी कल्पना करना कठिन नहीं है। ऐसा तो नहीं है कि देश में विद्वानों की और मनीषियों की कमी हो गई हो, लेकिन दु:ख की बात यही है कि उनकी ओर अब सत्ताधीशों का ध्यान नहीं जाता। पुरानी कहावत है-गुण न हिरानो गुण गाहक हिरानो है।

यहां हम मणिशंकर अय्यर का भी उल्लेख करना चाहेंगे। वे मनोनयन के लिए उपयुक्त पात्र थे, किन्तु क्या राष्ट्रपति द्वारा नामांकित व्यक्ति को दलगत राजनीति में भाग लेना चाहिए और ऐसा करने से क्या राष्ट्रपति और सदन दोनों की गरिमा पर आघात नहीं होगा। हमें ध्यान आता है कि जब फिल्म अभिनेत्री नरगिस को नामजद किया गया था तब सांसद के रूप में उसकी निष्क्रियता को लेकर सवाल उठाए गए थे। यह आलोचना सही थी, लेकिन एक सीमा तक। क्योंकि नरगिस ने एक समाज-सजग नागरिक और अभिनेता के रूप में बड़ा काम किया था। सुनील दत्त और नरगिस ने युद्ध के समय मोर्चे पर जाकर सैनिकों का मनोबल बढ़ाया था और वे अन्य उपायों से भी निस्वार्थ समाजसेवा में संलग्न थे। ऐसे सदस्य के ज्ञान और अनुभव का लाभ सदन की कार्रवाई से परे भी उठाया जाना संभव था। यह बात रेखा के बारे में नहीं कही जा सकती। कभी-कभी शक होता है कि क्या उन्हें लाने का मकसद सदन में मौजूद एक अन्य सदस्य को चिढ़ाना था। हमें लता मंगेशकर से बहुत उम्मीद थी कि वे कला जगत की प्रतिनिधि के रूप में राज्यसभा में सक्रियता दिखाएंगी, लेकिन उन्होंने निराश किया।

दरअसल राज्यसभा की महत्ता को हाल के बरसों में जिस तरह से क्षीण किया गया है वह एक और चिंता उपजाती है। यह हमें पता है कि हमारा उच्च सदन ब्रिटेन के हाउस ऑफ लॉर्ड्स की तर्ज पर नहीं बल्कि अमेरिकी सीनेट की तर्ज पर बनाया गया है। यह कल्पना की गई थी कि इसके सदस्य ज्ञान, अनुभव और विवेक के धनी होंगे जो लोकसभा के निर्णयों की सम्यक समीक्षा करने में सक्षम होंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि संसद में जब कोई भी निर्णय हो तो वह विचार, तर्क और व्यवहारिकता की कसौटी पर खरा उतरे और उसमें किसी तरह का असंंतुलन न हो। किन्तु इस बुनियादी सिद्धांत को खंडित करने में किसी भी दल, कोई कसर बाकी नहीं रखी। यहां तक कि सामान्यत: विचार-प्रवण कम्युनिस्ट भी इस बिन्दु पर चूक गए।

इस सिलसिले में पहली गलती तो तब हुई एक राज्य के निवासी को किसी अन्य राज्य से मनोनीत करने की परंपरा डाली गई। इसके लिए खासा प्रपंच रचा गया। अन्य राज्य की मतदाता सूची में उस व्यक्ति का नाम जुड़वाना, उसे फर्जी तरीके से वहां का नागरिक बताना और उस राज्य की पार्टी कार्यकर्ताओं की अवहेलना कर विधायकों पर दबाव डालकर अपने पसंदीदा व्यक्ति को राज्यसभा के लिए चुनवाना, इस तरह एक लंबी प्रक्रिया अपनाई गई। जब इस पर सवाल उठने लगे तब संविधान संशोधन कर इस प्रवंचना को वैधानिक मान्यता दे दी गई।  इसका फायदा राजनेताओं को तो मिला, लेकिन बड़ा दुरुपयोग किया थैलीशाहों ने। पार्टी को करोड़ों का चंदा दो और जहां गुंजाइश दिखे उस राज्य से सदस्य बन जाओ। हमारा राजनेताओं से सवाल है कि अगर आप में चुनाव लडऩे की कूवत नहीं है और अपने ही गृह राज्य में आप चुनाव नहीं जीत सकते तो राजनीति कर क्यों रहे हैं और क्या राज्यसभा में गए बिना आपका जीवन अकारथ हो जाएगा। यह दृश्य सचमुच दु:खद है कि दिल्ली के अरुण जेटली गुजरात से राज्यसभा में जाते हैं और तमिलनाडु में डी. राजा को एक बार डीएमके और दूसरी बार एआईडीएमके की शरण में जाना पड़ता है।

बहरहाल इस विपर्यय की चरम सीमा कुछ दिन पहले देखने मिली जब अरुण जेटली ने रोष व्यक्त किया कि मनोनीत सदस्य निर्वाचित सदन के निर्णयों को लागू करने में बाधा बन रहे हैं और इस तरह देश की जनता का अपमान कर रहे हैं। उनकी देखादेखी और भी बहुत से विद्वान संविधान में संशोधन करने तथा राज्यसभा की शक्तियों को सीमित करने की मांग करने लग गए हैं। इनमें से किसी ने भी इस तथ्य पर गौर करना आवश्यक नहीं समझा कि स्वयं अरुण जेटली लोकसभा नहीं वरन राज्यसभा के मनोनीत सदस्य हैं, वह भी दिल्ली से नहीं बल्कि गुजरात से। ऐसे व्यक्ति की राय को क्या देश की आम जनता की राय माना जा सकता है। इन तमाम स्थितियों पर विचार करते हुए हमारा मत है कि राज्यसभा की गरिमा को पुर्नस्थापित करने के लिए आवाज उठाना चाहिए। राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत सदस्य सचमुच इस योग्य हों, राज्य के निवासी ही राज्यसभा में भेजे जाएं तथा उच्च सदन में वह नैैतिक व बौद्धिक शक्ति हो कि वह निम्न सदन की संभावित निरंकुशता को रोक सके।

देशबन्धु में 10 दिसंबर 2015 को प्रकाशित 

Sunday, 6 December 2015

केजरीवाल सरकार का सही फैसला


 
केजरीवाल सरकार ने दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के मद्देनज़र दो दिन पूर्व जो निर्णय लिया है, उसका हम स्वागत करते हैं। इसके अनुसार सम और विषम नंबर वाले वाहन हर दूसरे दिन ही सड़क पर आ सकेंगे; इस तरह दिल्ली की सड़कों पर प्रतिदिन दौडऩे वाले लाखों वाहनों की संख्या आधी हो जाएगी। यह खबर आई नहीं कि आनन-फानन में इसकी आलोचना प्रारंभ हो गई। कांग्रेस व भाजपा दोनों दिल्ली सरकार के पीछे पड़ गए कि यह तुगलकशाही है इत्यादि।  सोशल मीडिया पर भी अरविन्द केजरीवाल को उपहास का पात्र बना दिया गया। इसे हम उचित नहीं मानते। इस प्रस्ताव में यदि खामियां हैं तो उन्हें दूर करने के उपाय भी अवश्य होंगे। बेहतर होता कि आलोचना करने वाले इसे राजनीति के चश्मे के बजाय दिल्ली में विद्यमान एक भयंकर समस्या से निबटने की भावना से देखते। पिछले कुछ दिनों से देश की राजधानी में भीषण वायु प्रदूषण होने की चर्चा खूब हो रही है। इसके साथ यह भी याद कर लें कि हर साल जाड़ों के मौसम में कोहरे और धुएं के कारण कितनी ट्रेनें रद्द होती हैं और कितने जहाज उड़ नहीं पाते। आशय यह है कि इस विषय पर सम्यक रूप से तत्काल विचार किया जाना आवश्यक है।
एक ओर सरकार जनता को निजी वाहन खरीदने के लिए प्रोत्साहित करती है, दूसरी ओर प्रदूषण की समस्या बढऩे पर कागजी और जबानी कार्रवाईयों में जुट जाती है। जब दिल्ली में यातायात बाधित होता है तो उससे पूरे देश को कितना नुकसान उठाना पड़ता है, क्या इसका कोई हिसाब लगाया गया है? इस दिशा में सबसे पहिले पर्यावरणविद स्व. अनिल अग्रवाल ने मुहिम चलाई थी, जिसे उनकी अनन्य सहयोगी सुनीता नारायण ने आगे बढ़ाया व दिल्ली में डीज़ल के बजाय सीएनजी से वाहन चलना प्रारंभ हुआ। बाद में सार्वजनिक बसों के लिए बीआरटी की योजना पर अमल शुरु किया गया। यह जनहितैषी योजना दिल्ली के अभिजात वर्ग व उसके मीडिया को नागवार गुजरी तथा उसे सही रूप में आगे बढऩे से रोक दिया गया। अब केजरीवाल सरकार ने एक ठोस कदम उठाया है तो उसका विरोध भी इसीलिए हो रहा है कि इससे अभिजात समाज को तकलीफ होगी। जब कार स्टेटस सिंबल बन जाए, तब मैट्रो या बस में सवारी करना भला किसे पसंद आएगा। हम मान लेते हैं कि इस निर्णय में व्यवहारिक अड़चनें हैं। ऐसा है तो उन्हें दूर कैसे किया जाए या विकल्प क्या हो, यह भी तो कोई बताए।
सम-विषम का यह फार्मूला विश्व में अनेक स्थानों पर लागू है। इसके अलावा अनेक उपाय समय-समय पर आजमाए गए हैं। लास ऐंजिल्स में एकल सवारी के बजाय पूरी भरी कार को सड़क पर प्राथमिकता दी जाती है। कार साझा करने वाले एक्सपे्रस-वे का उपयोग कर सकते हैं। सिंगापुर की मुख्य सड़क आर्चर्ड रोड पर सुबह नौ बजे जो पहिली कार प्रवेश करती है, उसे भारी जुर्माना देना पड़ता है, याने नागरिक अपनी कार को भीड़भरे इलाके से यथासंभव दूर रखें। इंग्लैंड में प्रधानमंत्री तक लोकल ट्रेन और बस में सहज यात्रा कर लेते हैं। जापान के प्रधानमंत्री को पद संभालते साथ एक नई साईकिल भी भेंट मिलती है। स्वीडन आदि यूरोपीय देशों में लाखों जन नियमित साईकिल की सवारी करते हैं। आपको केजरीवाल की योजना पसंद नहीं है तो इसी तरह नए उपाय आप भी क्यों नहीं सोच लेते? 
हमारी राय में वायु प्रदूषण को रोकने के लिए कारों व निजी वाहनों की संख्या को सीमित करना परम आवश्यक है। इसमें बाइक व स्कूटर भी शामिल हैं। दूसरे शब्दों में निजी के बजाय सार्वजनिक यातायात प्रणाली को मजबूत करने से ही समस्या का स्थायी समाधान होगा। निजी वाहनों की निरंतर बढ़ती संख्या से प्रदूषण तो बढ़ ही रहा है, अन्य समस्याएं भी खड़ी हो रही हैं, जैसे सड़कों को चौड़ा करने व फ्लाईओवर बनाने की नित नई मांगें, रोड रेज याने सड़कों पर हो रही हिंसक घटनाएं जिसमें जान तक चली जाती है, लगातार बढ़ रही सड़क दुर्घटनाएं, पार्किंग की दिक्कत आदि. अगर सरकार कारों के उत्पादन पर दस साल के लिए रोक लगा दे और उसके बजाय सार्वजनिक वाहन याने बसों के संचालन पर ध्यान दे तो हर दृष्टि से लाभ होगा।

देशबन्धु में 07 दिसंबर 2015 को प्रकाशित सम्पादकीय

Wednesday, 2 December 2015

फारूख अब्दुल्ला का बयान



डॉ.फारूख अब्दुल्ला के ताजा बयान पर जल्दबाजी में टिप्पणी करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। वे देश के वरिष्ठ राजनेता हैं, जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री हैं, कश्मीर उनका अपना घर है और वहां के हालात को उन्होंने नजदीक से देखा-समझा है। उनकी बात से सहमत या असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन देश की राजनीति का फिलहाल जो चलन है उसका अनुसरण कर डॉ. अब्दुल्ला पर कोई ठप्पा लगा देना अथवा उनके इरादों पर शंका करना उनके प्रति अन्याय तो है ही, टीकाकारों की नाबालिग सोच का भी परिचय इससे मिलता है। जम्मू-कश्मीर का मुद्दा भारतवासियों के लिए एक बड़ा भावनात्मक विषय है, किन्तु इसका समाधान तो व्यवहारिक राजनीति के धरातल पर ही संभव होगा, उसमें भले दस बरस लगें या पचास बरस। आज नहीं तो कल, इस मुद्दे की जटिलताओं को समझकर आगे का मार्ग निर्धारित होगा, इसलिए धीरज के साथ बात को समझने का प्रयत्न होना चाहिए।

अगर थोड़ा सा इतिहास में लौटें तो 1947 में आज़ादी के समय कश्मीर को लेकर तीन विकल्प थे। पहला- जम्मू-कश्मीर राज्य का भारत में विलय, दूसरा- पाकिस्तान में विलय, तीसरा-स्वतंत्र देश के रूप में उदय। इतिहास के विद्यार्थी जानते हैं कि बहुत से अन्य राजाओं की तरह राजा हरीसिंह भी कश्मीर को एक स्वतंत्र देश के रूप में देखना चाहते थे। इन राजाओं की भारत में विलय की इच्छा तो बिल्कुल भी नहीं थी। इन्हें लगता था कि गांधी-नेहरू के भारत में उनका राजपाट और उससे जुड़े विशेषाधिकार छिन जाएंगे। इनके लिए अंग्रेज सरकार ने प्रिंसिस्तान के नाम से एक तीसरे विभाजन की योजना भी बना रखी थी। इन देशी रियासतों में प्रगतिशील, जनतांत्रिक सोच वाले प्रजामंडल के उग्र आंदोलन और बाद में सरदार पटेल की कूटनीतिक सूझ-बूझ के चलते यह योजना कारगर नहीं हो पाई तथा लगभग सभी रियासतों का भारत में विलय हो गया। इनमें से कुछेक राजा ऐेसे थे जो पाकिस्तान के साथ जाने को तैयार थे। इन्हें लगता था कि पाकिस्तान में इनके विशेषाधिकार सुरक्षित रहे आएंगे। उनका सोचना काफी हद तक सही था क्योंकि पाकिस्तान के निर्माण में बड़े जमींदारों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था।

पाक में विलय की संभावना टटोलने वाले इन राजाओं में हिन्दू और मुसलमान का फर्क नहीं था। स्वयं महाराजा हरीसिंह इस बारे में मोहम्मद अली जिन्ना के साथ निरंतर संवाद कर रहे थे। अगर इनकी रियासतों का पाकिस्तान के बजाय भारत में विलय हो सका तो उसके पीछे रियासत की जनता की इच्छा और उसके लिए संघर्ष ही मुख्य कारण था। जम्मू-कश्मीर में शेख अब्दुल्ला भारत के साथ विलय के पक्ष में थे और महाराजा ने तो विलय पत्र पर उस समय हस्ताक्षर किए जब पाकिस्तानी फौज के उकसावे पर कबाइली दस्ते कश्मीर घाटी को रौंदते हुए श्रीनगर के दरवाजे तक लगभग पहुंच चुके थे। अगर भारतीय फौज समय पर न पहुंचती तो कश्मीर पाकिस्तान में चला गया होता।

अगर महाराजा हरीसिंह भी पाकिस्तान में विलय और स्वतंत्र देश की स्थापना की ऊहापोह में न फंसे होते तब भी शायद यह सुंदर प्रदेश शायद पाकिस्तान में ही होता। यह सवाल कई बार उठता है कि भारत की फौजें घाटी के आगे याने वर्तमान तथाकथित आज़ाद कश्मीर में क्यों नहीं बढ़ीं। दूसरा सवाल यह भी उठता है कि भारत इस मामले को संयुक्त राष्ट्र में क्यों ले गया। पहले प्रश्न का उत्तर आश्चर्यजनक रूप से सरल है। कश्मीर के महाराजा ने वर्तमान में पाक अधिकृत कश्मीर के भूभाग को सन् 30 के दशक में याने लगभग दस साल पहले ही वहां के जागीरदारों से खरीदा था। वहां के लोगों का कश्मीर घाटी से कोई भावनात्मक लगाव नहीं था तथा सांस्कृतिक रूप से वे अपने को पाकिस्तान के पंजाब के निकट पाते थे। आज भी लंदन, न्यूयार्क आदि में जो कश्मीरी भारत के खिलाफ आवाज उठाते हैं, वे अधिकतर उसी इलाके के हैं। दूसरे सवाल का उत्तर यह है कि अगर महाराजा द्वारा विलय पत्र पर हस्ताक्षर नैतिक और विधि-सम्मत था तो फिर हैदराबादके निजाम और जूनागढ़ के नवाब को आप पाकिस्तान में मिलने से कैसे रोक सकते थे।

मतलब यह कि भारत एक जनतांत्रिक देश के रूप में राजा की इच्छा के बजाय जनता की इच्छा को महत्व एवं प्राथमिकता दे रहा था। यह हमें पता था कि हैदराबाद की जनता निजाम के साथ नहीं जाएगी। हमें यह भी भरोसा था कि शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में जम्मू-कश्मीर की जनता भी जनमत संग्रह होने पर भारत के पक्ष में वोट देगी। चूंकि पाकिस्तान ने जनमत संग्रह के पूर्व अपने अधिकार वाले हिस्से से फौजें नहीं हटाईं (जो कि एक अनिवार्य शर्त थी) इसलिए भारत ने भी जनमत संग्रह की बात पर कदम आगे नहीं बढ़ाए। इस बीच स्थितियां बहुत बदल चुकी हैं। कश्मीर का हिस्सा जो भारत के साथ है वह पिछले अड़सठ साल से एक लोकतांत्रिक माहौल में जी रहा है गो कि उसमें कमियां निकाली जा सकती हैं। दूसरी तरफ पाक अधिकृत कश्मीर के लोग भी वहां के सामाजिक-राजनीतिक अनिश्चित माहौल के अभ्यस्त हो चुके हैं तथा अगर सीमा के इस पार उनका थोड़ा-बहुत लगाव था तो वह लगभग समाप्त हो चुका है।

यह तो हुई इतिहास की बात। वर्तमान में क्या स्थिति है? कश्मीर को एक समस्या मानकर उसका हल खोजने के लिए अथकमेहनत हो रही है। यह तय है कि अपने-अपने हिस्से के कश्मीर को न तो भारत छोड़ेगा और न पाकिस्तान। दोनों के लिए यह राष्ट्रीय स्वाभिमान का विषय बन गया है। पाकिस्तान में फौज का दबदबा है इसलिए पाक अधिकृत कश्मीर की जनता क्या सोचती है इसकी कोई सही तस्वीर दुनिया के सामने नहीं आ पाती। इतना हम जानते हैं कि आज़ाद कश्मीर के नाम पर जो सरकार चलती है वह इस्लामाबाद की कठपुतली होती है। वहीं गिलगिट, बाल्टिस्तान आदि उत्तरी क्षेत्र भी हैं जो शिया धर्मानुयायी हैं तथा जिनकी पटरी पाकिस्तान के कठमुल्लों के साथ नहीं बैठती, लेकिन वे मुखर विरोध नहीं कर पाते।

इसके बरक्स भारत के जम्मू-कश्मीर प्रांत में एक ओर निर्धारित अवधि में चुनाव होते हैं, लोकतांत्रिक सरकार चुनी जाती है, दूसरी ओर स्वतंत्र कश्मीर अथवा पाकिस्तान समर्थक शक्तियों को काफी खुले रूप में अपनी बात कहने का मौका मिल जाता है और तीसरी ओर केन्द्र सरकार के स्तर पर समस्या के समाधान के लिए कभी प्रदेश को तीन राज्यों में, तो कभी पांच राज्यों में विभाजित करने जैसे प्रस्ताव भी सामने आ जाते हैं। फिलहाल एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि प्रदेश में पीडीपी और भाजपा की मिली-जुली सरकार चल रही है। इसमें नरेन्द्र मोदी मुफ्ती साहब को देशभक्त होने का खिताब देते हैं, तो दूसरी ओर मुफ्ती मुहम्मद सईद मोदीजी की धर्मनिरपेक्षता पर शंका न करने का परामर्श देते हैं। जिन फारूख अब्दुल्ला के बेटे उमर वाजपेयी सरकार में मंत्री रहे आज उनको कटघरे में खड़ा किया जा रहा है, वह भी इस दृश्य का एक विद्रूप ही है।

बेशक कश्मीर एक मसला है और इसका हल ढूंढा जाना चाहिए। हम नहीं सोचते कि कश्मीर घाटी की जनता कभी भी पाकिस्तान के साथ जाना पसंद करेगी। घाटी के लोग लोकतंत्र का महत्व जानते हैं। वहां फौज तैनात है, उसकी ज्यादतियों के किस्से आए दिन पढऩे मिलते हैं। इस अवांछनीय स्थिति को समाप्त करना होगा, यह एक जुड़ा हुआ प्रश्न है। यह शंकास्पद है कि प्रदेश का सांप्रदायिक आधार पर विभाजन करने से कोई हल निकलेगा, क्योंकि जम्मू और लद्दाख दोनों में मिली-जुली आबादी है। जम्मू-कश्मीर को स्वतंत्र देश बनाने की मांग करने वाले लोग भी हैं लेकिन वे खामख्याली में हैं। डॉ. फारूख अब्दुल्ला ने जो बयान दिया है वह जमीनी सच्चाई को प्रतिबिंबित करता है। इसका परीक्षण करना वांछित है।

देशबन्धु में 03 दिसंबर 2015 को प्रकाशित

Friday, 27 November 2015

तेजस्वी बिहार


 बिहार के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का कामकाज उनके मंत्रिमंडल के शपथ ग्रहण के साथ प्रारंभ हो गया है। वे अपने पांच साल के दौरान कैसा शासन दे पाएंगे इस पर चर्चाएं होने लगी हैं। इसमें भी पहले के दो साल न सिर्फ बिहार बल्कि पूरे देश की राजनीति के लिए बहुत मायने रखते हैं। अगर नीतीश के नेतृत्व में महागठबंधन की सरकार उनकी अर्जित ख्याति के अनुरूप सुचारु चलती है तो इसका सबसे बड़ा लाभ असम के आसन्न चुनावों में मिलेगा जहां से भाजपा ने बहुत उम्मीद बांध रखी है। अगले वर्ष जिन पांच राज्यों में चुनाव होना है उनमें से शेष चार में भाजपा का कोई खास दखल नहीं है, लेकिन असम के लिए उसने अपनी तैयारियां काफी पहले से प्रारंभ कर दी थीं। दूसरी ओर महागठबंधन के दलों में कांग्रेस ही एकमात्र पार्टी है जिसकी प्रतिष्ठा असम में दांव पर लगी है। अगर बिहार सरकार अच्छे से चलती है, तो इससे असम में कांग्रेस को फायदा होगा। और इस ''अगर" को चुटकी मारकर नहीं उड़ाया जा सकता।

 19 नवंबर को नीतीश मंत्रिमंडल को शपथ ग्रहण में अनेक दलों व विभिन्न प्रदेशों के प्रतिनिधि गुलदस्ते लेकर पहुंचे। इस अवसर पर डॉ. फारूख अब्दुल्ला ने जो टिप्पणी की उसे अलग से रेखांकित करना होगा। एक समय था जब स्वयं डॉ. अब्दुल्ला तीसरे मोर्चे के बड़े नेता के रूप में उभर रहे थे। उन्हें शायद विश्वास हो गया था कि वे एक दिन प्रधानमंत्री अवश्य बनेंगे। यह सपना टूटा तो वे राष्ट्रपति बनने की दौड़ में शामिल हो गए। इसका जिक्र देश के आला खुफिया अधिकारी ए.एस. दुल्लत ने अपनी हाल में प्रकाशित आत्मकथा ''कश्मीर: द वाजपेयी ईयर्स" में किया है। इन्हीं डॉ. अब्दुल्ला ने पटना में नीतीश कुमार की हौसला अफजाई की कि वे आने वाले समय में प्रधानमंत्री बन सकते हैं। उन्होंने कोई नई बात नहीं की लेकिन जिस मौके पर की उसमें एक बार फिर नीतीशजी की महत्वाकांक्षा को नए पंख मिल सकते हैं। नीतीश कुमार राजनीति के उतार-चढ़ावों को भली-भांति जानते हैं और फिलहाल उम्मीद यही रखना चाहिए कि वे भावावेश में कोई निर्णय नहीं लेंगे।

आज यह बात इसलिए करना पड़ रही है क्योंकि पांचवी बार बने मुख्यमंत्री ने अपने मंत्रिमंडल का जैसा गठन किया है उसे लेकर आलोचना भी की जा सकती है और शंका भी उभरती है। इस नए मंत्रिमंडल में नीतीश कुमार ने अपने बहुत से पुराने साथियों को फिलहाल अलग रखा है। अधिकतर मंत्री युवा और नए हैं। बताया गया है कि उन्होंने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों का चयन करने में सामाजिक समीकरणों का विशेष ध्यान रखा है। इसके विपरीत यह भी कहा गया कि उन्होंने भौगोलिक समीकरणों को भुला दिया है। लेकिन इन सबसे बढ़कर आलोचना इसलिए हो रही है कि दुर्धर्ष नेता लालू प्रसाद यादव के दोनों बेटों को न सिर्फ मंत्रिमंडल में स्थान मिला है बल्कि एक को उपमुख्यमंत्री याने नंबर दो और एक को तीसरे क्रम की वरीयता दी गई है। दोनों भाई पहली बार विधायक बने हैं तथा उन्हें इतना महत्व देना बहुतों को असामान्य प्रतीत हो रहा है।

हमें याद आता है कि पांच तारीख को जैसे ही यह चुनाव परिणाम आए वैसे ही चर्चाएं आरंभ हो गई थीं कि लालूजी अपनी बेटी मीसा भारती को या फिर छोटे बेटे तेजस्वी को उपमुख्यमंत्री बनाएंगे। दो-एक दिन बाद यह चर्चा भी उठी कि लोकसभा चुनाव हार चुकी सुश्री मीसा को वे राज्यसभा में ले जाएंगे तथा तेजस्वी ही उपमुख्यमंत्री होंगे। एक और चर्चा इस बीच हुई कि मीसा भारती नहीं, बल्कि राबड़ी देवी राज्यसभा में जाएंगी। जहां पूर्व मुख्यमंत्री होने के नाते उन्हें यथेष्ट सुविधाएं प्राप्त होंगी तथा राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका निभाने के लिए लालू प्रसादजी को एक उपयुक्त ठिकाना मिल जाएगा। जो भी हो, इन चर्चाओं से यह तो सिद्ध हुआ कि बिहार की राजनीति में सबसे बड़े दल का नेता होने के नाते लालूजी की बात का कदम-कदम पर वजन होगा। अपने दोनों बेटों को आलोचना होने की स्पष्ट संभावना के बावजूद मंत्रिमंडल में स्थान दिलवाकर उन्होंने अपना महत्व तो सिद्ध किया ही है; इसके अलावा उन्होंने ऐसा शायद कुछ व्यवहारिक कारणों से भी किया होगा।

इस तथ्य पर गौर करें कि लालू प्रसाद ने अपने बड़े बेटे तेजप्रताप को उपमुख्यमंत्री नहीं बनाया बल्कि इस पद के लिए अपने छोटे बेटे का चयन किया। इसके पीछे शायद कारण यह था कि तेजस्वी के तेवर अपने अग्रज की तुलना में कहीं ज्यादा तीखे, लड़ाकू और प्रखर हैं। यह भी हो सकता है कि उसने पिछले डेढ़-दो साल के दौरान अपनी राजनीतिक सूझ-बूझ का बेहतर परिचय दिया हो। कारण जो भी रहा हो, इससे लालू प्रसाद को एक लाभ अवश्य हुआ है कि उनकी व्यक्ति आधारित पार्टी में लालू के बाद कौन का झगड़ा अब शायद नहीं उठेगा। उनकी विरासत को तेजस्वी संभाल लेंगे। एक तरह से तमिलनाडु में करुणानिधि को जो पारिवारिक कलह देखना पड़ी वह स्थिति बिहार में नहीं होगी। हमें यहां ख्याल आता है कि ओडिशा में बीजू पटनायक की विरासत बड़े बेटे प्रेम की बजाय छोटे बेटे नवीन ही संभाल रहे हैं।

लालू प्रसाद के दोनों बेटों के मंत्री बनने को लेकर जो आलोचना हो रही है, उसके दो पक्ष हैं- एक- वंशवाद और दो- तेजस्वी और तेजप्रताप की शैक्षणिक योग्यता। भारत में वंशवाद की बात तो करना ही नहीं चाहिए। यह अकेले भारत की नहीं, बल्कि पूरे एशिया की फितरत है। कम्युनिस्ट चीन भी इससे बचा नहीं है। और अब तो अमेरिका में भी हम वंशवाद का नए सिरे से उभार देख रहे हैं। एडम्स, रूज़वेल्ट और कैनेडी को भूल जाइए। अब बुश और क्लिंटन का जमाना है। पहले सीनियर बुश राष्ट्रपति बने, फिर छोटे बेटे जार्ज बुश। बड़े बेटे जेब बुश फ्लोरिडा के गर्वनर थे। वे भी राष्ट्रपति पद के लिए अवसर तलाश रहे हैं। बिल क्लिंटन के बाद हिलेरी क्लिंटन तो सामने दिख ही रही हैं। कनाडा में पियरे ट्रूडो के पुत्र जस्टिन ट्रूडो हाल-हाल में नए प्रधानमंत्री चुने गए हैं। भारत की महिमा इस मामले में अपरंपार है।

जम्मू-कश्मीर से लेकर केरल तक और पूर्वोत्तर से लेकर लक्षद्वीप तक कोई भी ऐसी जगह नहीं है जहां राजनीति में वंश परंपरा के दर्शन न होते हों। जब पंजाब में पिता-पुत्र एक साथ मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री हो सकते हैं तो बिहार में जो हुआ है उसे अपवाद क्यों समझा जाए। इस बारे में सैकड़ों दृष्टांत दिए जा सकते हैं। उनकी बात करने से समय ही नष्ट होगा। दूसरी बात, यादव बंधुओं की शैक्षणिक योग्यता को लेकर है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार दोनों भाईयों ने हायर सेकेण्डरी की पढ़ाई भी पूरी नहीं की। आज के समय में एक सामान्य परिवार के लिए यह घनघोर चिंता का विषय है। जिन लालू प्रसाद ने स्वयं विषम परिस्थितियों का मुकाबला कर अपनी पढ़ाई जारी रखी, वे अपने बेटों को पढ़ाने में क्यों चूक गए, यह कोई अच्छा दृष्टांत  नहीं है। महज अनुमान लगाया जा सकता है कि लालू प्रसाद-राबड़ी देवी दोनों ने अपनी राजनीति के फेर में संतानों की जैसी फिक्र करनी चाहिए थी वैसी नहीं की। खैर! यह उनके अपने घर की बात है।

इधर उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद तेजस्वी की शैक्षणिक योग्यता को लेकर जो आलोचना हुई उसके जवाब में तेजस्वी ने ट्विटर पर यह टिप्पणी की कि-''किसी को भी पुस्तक का सिर्फ आवरण देखकर उसके बारे में राय नहीं बनाना चाहिए। मीठी शहद और कड़वी दवाई की तरह किसी क्षमता का फायदा थोड़ा वक्त बीत जाने के बाद ही मिलता है।" तेजस्वी सोच सकते हैं कि उन्होंने अपने विरोधियों को करारा जवाब दे दिया है, लेकिन इतने से बात नहीं बनेगी। उन्हें आने वाले दिनों में अपनी योग्यता सिद्ध करने के लिए जी-तोड़ परिश्रम करना होगा। हमारी राय में औपचारिक पढ़ाई वांछित तो है, लेकिन राजनीति में सहजबुद्धि की आवश्यकता अधिक पड़ती है। क्या इस कसौटी पर तेजस्वी खरा उतर पाएंगे। हमने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के कामराज को देखा है जो न हिन्दी जानते थे, न अंग्रेजी, लेकिन एक बेहतरीन प्रशासक सिद्ध हुए। बंशीलाल भी ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन एक समय उन्होंने हरियाणा का कायाकल्प किया। गत वर्ष जब स्मृति ईरानी की इसी बिना पर आलोचना हुई थी तो इसी कॉलम में हमने उनका बचाव किया था। यह दुर्भाग्य की बात है कि वे अपने आपको सक्षम मंत्री सिद्ध नहीं कर सकीं। तेजस्वी और तेजप्रताप दोनों के सामने दोनों तरह के उदाहरण हैं। वे किस रास्ते जाते हैं, इसके लिए कोई लंबी प्रतीक्षा नहीं करना होगी। तब तक धैर्य रखा जा सकता है।
 
देशबन्धु में 26 नवंबर 2015 को प्रकाशित

Wednesday, 18 November 2015

बिहार चुनाव : कुछ अन्य बातें


 बिहार की राजनीति को बारीकी से समझने वाले पत्रकारों में संकर्षण ठाकुर का नाम प्रमुखता के साथ लिया जा सकता है। वे स्वयं बिहार के हैं और उन्होंने बिहार के दो प्रमुख राजनेताओं लालू प्रसाद यादव तथा नीतीश कुमार पर विश्लेषणपरक पुस्तकें भी लिखी हैं। जैसा कि इनसे पता चलता है वे लालू प्रसाद की राजनीति के विरोधी और नीतीश के प्रशंसक हैं। उनके निष्कर्ष जमीनी अध्ययन पर आधारित हैं इसलिए अभी विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद श्री ठाकुर ने नीतीश के चुनाव प्रबंधक प्रशांत किशोर पर किसी अंग्रेजी अखबार में  आधा पेज का लेख प्रकाशित किया तो मैं कुछ सोच में डूब गया। इस लेख का सार यह है कि महागठबंधन की जीत में प्रशांत किशोर की रणनीति का बहुत बड़ा योगदान रहा। मैंने पहली बार देखा कि किसी चुनावी प्रबंधक की ऐसी छवि प्रस्तुत की गई जो अतिशयोक्ति की हद को छूती हो। चूंकि लिखने वाले एक जानकार पत्रकार हैं इसलिए उनकी बात को यूं ही नहीं उड़ाया जा सकता।

बिहार में महागठबंधन की अभूतपूर्व जीत के बारे में टीकाकारों के अपने-अपने विश्लेषण हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने अपने हाल में प्रकाशित लेख में बहुत चतुराई के साथ मोदी-शाह की टीम को ही भाजपा की हार के लिए दोषी ठहरा दिया है। इसके अलावा कहीं गणित फेल होने की बात हो रही है, तो कहीं केमिस्ट्री सफल होने की। इसमें प्रशांत किशोर याने एक चुनाव प्रबंधक की भूमिका कितनी प्रभावी रही होगी, यह अलग प्रश्न उभर आया है। उल्खेनीय है कि श्री किशोर ने 2014 में नरेन्द्र मोदी के चुनाव प्रबंधक  के तौर पर काम किया था। यह अभी रहस्य ही है कि वे श्री मोदी को छोड़कर नीतीश कुमार के खेमे में कैसे आ गए। एकाध जगह कहीं लिखा गया कि चुनाव जीतने के बाद भाजपा के शीर्ष नेतृत्व में उन्हें अपमानित किया। इससे आहत होकर उन्होंने पाला बदल लिया। बिहार के नतीजे आने के बाद वे दिल्ली गए और पढऩे में आया कि वे एक तरफ राहुल गांधी से मिले और दूसरी तरफ अरुण जेटली से भी।

इस समूचे संदर्भ में एक कयास तो ऐसा लगाया जा रहा है कि लालू प्रसाद को महागठबंधन की जीत का श्रेय न मिले, इसलिए प्रशांत किशोर का नाम आगे किया गया है। इस बात पर विश्वास करने का मन नहीं होता। संभव है कि भविष्य में लालूजी और नीतीशजी के बीच वर्चस्व का प्रश्न उठे, किन्तु हमें नहीं लगता कि चुनाव जीतने के पांच-सात दिन बाद ही ऐसा होने लगेगा। इससे एक दूसरी शंका उभरती है कि लालू-नीतीश की निकटता से चिंतित नीतीश खेमे के ही लोग तो कहीं अपनी होशियारी दिखाने के लिए ऐसा नहीं कर रहे? एक तीसरी संभावना और है कि प्रशांत किशोर स्वयं अपने छवि निर्माण में लगे हों ताकि आने वाले समय में उनकी मूल्यवान सेवाएं कांग्रेस या कोई अन्य पार्टी हासिल करने के लिए उत्सुक हो उठे। मेरा अपना मानना है कि चुनाव प्रबंधन अपने आप में एक कला है और जिन्होंने इसे साध लिया है वे सराहना के पात्र होते हैं, लेकिन जब पक्ष या विपक्ष में लहर उठी हो तो फिर सारा मामला आम नागरिक की आशा-आकांक्षा पर आकर टिक जाता है। वहां फिर कोई गणित, कोई रणनीति, कोई प्रबंधन काम नहीं आता और अगर आता भी है तो सीमित रूप में।

बहरहाल नीतीश कुमार औपचारिक रूप से महागठबंधन के नेता चुन लिए गए हैं तथा कल याने 20 तारीख को वे एक बार फिर मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण करेंगे। अपने शपथ ग्रहण में उन्होंने अनेक राज्यों के मुख्यमंत्रियों को शामिल होने का न्यौता दिया है। जिनमें से सिर्फ नवीन पटनायक ने ही अपनी असमर्थता जताई है। यह भव्य शपथ ग्रहण समारोह एक तरफ महागठबंधन के लिए अपनी अपूर्व सफलता का जश्न मनाने का अवसर होगा वहीं नीतीश कुमार इसे राष्ट्रीय रंगमंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के एक नायाब मौके के रूप में भी देखेंगे। कुछ ऐसी ही सुप्त महत्वाकांक्षा नवीन पटनायक की भी है और अनुमान लगाया जा सकता है कि वे शायद इसी कारण पटना नहीं आ रहे हों।

सुना है कि नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री ने शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे को भी आमंत्रित किया है। उद्धव चूंकि लगातार मोदी का विरोध कर रहे हैं, इस संदर्भ में इस निमंत्रण को देखा जा सकता है। इसका एक व्यवहारिक पक्ष भी हो सकता है कि महाराष्ट्र खासकर मुंबई में जो मराठी बनाम बाहरी के नाम पर झड़पें होती हैं उस पर विराम लगाने का कोई संकेत यहां से जाए। याद करें कि जब बिहार में किसी रेलवे स्टेशन पर पूर्वोत्तर के नागरिकों के साथ दुर्व्यवहार हुआ था तो तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद स्वयं असम गए थे और गुवाहाटी की सड़कों पर पैदल घूमकर उन्होंने क्षमायाचना की थी। ऐसी पहल करने से वातावरण सुधरता है, स्थितियां सामान्य होती हैं और नागरिकों के बीच सद्भावना पनपती है तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए। नीतीश कुमार मितभाषी हैं, लेकिन लालू प्रसाद अपने मंतव्य प्रकट करने में शब्दों में कंजूसी नहीं करते। उन्होंने तो रिजल्ट आते साथ ही ऐलान कर दिया है कि वे अब राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय होंगे। यहां नोट करना चाहिए कि बिहार के बाद कांग्रेस में भी स्फूर्ति आई है, लेकिन उसे अपने भावी लक्ष्य के बारे में अभी कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। वह राष्ट्रीय पार्टी है और 2016 में होने वाले विधानसभा चुनावों में ही उसकी संभावनाएं छुपी हुई हैं।

बिहार में महागठबंधन की विजय से जुड़े एक अन्य पहलू पर अभी बहुत ध्यान नहीं गया है। यह सबको पता है कि चाहे राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद हों, चाहे अध्यक्ष नीतीश कुमार, चाहे जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव- ये सब डॉ. राममनोहर लोहिया की आक्रामक और व्यक्तिवादी राजनीति के प्रशंसक थे और उसी से प्रेरित होकर राजनीति में आए थे। ये एक तरफ जॉर्ज फर्नांडीज़ के तीखे तेवरों के मुरीद थे, तो दूसरी तरफ मधु लिमये व किशन पटनायक की सौम्य विचारशीलता इन्हें प्रभावित करती थी। तब के इन समाजवादी युवाओं में शरद यादव पहले व्यक्ति थे जो 1975  में संयुक्त विपक्ष के प्रत्याशी बन लोकसभा उपचुनाव जीत संसद में पहुंचे थे। वे छात्र राजनीति से निकलकर  एकाएक राष्ट्रीय क्षितिज पर आ गए थे। जबकि लालू प्रसाद इत्यादि के राजनैतिक कॅरियर की शुरुआत आपातकाल में छात्र आंदोलन और जेल यात्रा से हुई। ऐतिहासिक दृष्टि से विवेचना करें तो 1946-47 से लेकर 2014 तक समाजवादी खेमा और उसके विभिन्न धड़ों की राजनीति कांग्रेस-विरोध पर ही केन्द्रित थी।

जब स्वतंत्र देश की पहली सरकार बन रही थी तब पंडित नेहरू के समाजवादी मित्रों ने उनका साथ छोड़ दिया था।  डॉ. लोहिया ने तो गैर-कांग्रेसवाद का नारा ईजाद किया था जिसकी पहली सफलता 1967 में देखने मिली जब कांग्रेस से दलबदल कर विभिन्न प्रदेशों में संविद सरकारें (संयुक्त विधायक दल) बनीं। ये सरकारें आपसी विग्रह के कारण लंबे समय तक तो नहीं चल पाईं, लेकिन इसका असली लाभ लोहिया के अनुयायियों के बजाय जनसंघ ने उठाया। इसके बावजूद विभिन्न पार्टियों में बंटे समाजवादियों के कांग्रेस विरोध में कोई कमी नहीं आई। 1977 में सारे कांग्रेस-विरोधी जनता पार्टी के नाम पर एकजुट हुए जिसका कालांतर में लाभ भाजपा को मिला। 1998 में भी जब कांग्रेस सरकार बनने की संभावना जग रही थी तब एक-दूसरे समाजवादी मुलायम सिंह ने उसमें सेंध लगा दी थी। इस इतिहास को देखने से स्पष्ट होता है कि ऐसा पहली बार 2015 में जाकर हुआ है जब कांग्रेस और समाजवादी दोनों एक साथ मिलकर चुनाव लड़े और लड़े ही नहीं, चुनाव जीते भी।

यह स्पष्ट है कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टियां- इनके बीच कोई बहुत ज्यादा वैचारिक मतभेद नहीं हैं। किसी हद तक सीपीआई याने भाकपा की भी इनसे कोई बड़ी वैचारिक असहमति नहीं है। अगर ये सब मिलकर एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम तैयार कर लें और उस पर ईमानदारी के साथ अमल करें तो यह महागठबंधन देश की राजनीति में एक बड़ा परिवर्तन करने में कामयाब हो सकता है। इसमें तीनों समाजवादियों नेताओं को अपनी-अपनी भूमिका भी अभी से तय करना होगी- नीतीश सुशासन का मॉडल पेश करें, लालूप्रसाद वोट बटोरने का और वरिष्ठता के नाते शरद यादव समन्वय का जिम्मा उठाएं।
देशबन्धु में 19 नवंबर 2015 को प्रकाशित

Sunday, 15 November 2015

पेरिस पर हमला


 इस्लामिक स्टेट या आईएस ने पेरिस पर आतंकी हमला कर एक बार फिर अपनेे नृशंस, विचारहीन और अमानवीय चरित्र का परिचय दिया है। आईएस के इस दुष्कृत्य की जितनी भी भर्त्सना की जाए कम है। पेरिस के पूर्व आईएस ने इजिप्ट के आकाश पर सोवियत विमान मार गिराने की जिम्मेदारी ली थी। पश्चिम एशिया में वह इस तरह के अनेक क्रूर आक्रमणों को पहले भी अंजाम दे चुका है। इस्लाम के नाम पर दुनिया के बड़े हिस्से में हिंसा और दहशत का माहौल बनाने वाला इस्लामिक स्टेट पहला संगठन नहीं है। पिछले तीन दशक में मुजाहिदीन, तालिबान, लश्कर-ए-तोयबा, अलकायदा, बोको हराम इत्यादि संगठनों की करतूतें विश्व समाज ने देखी और भोगी हैं। इसमें कोई शक नहीं कि ऐसे अमानुषिक कृत्यों का पुरजोर विरोध होना चाहिए तथा इन्हें जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए हर संभव उपाय किए जाना चाहिए। यह काम कैसे हो? इक्कीसवीं सदी के विश्व को जो किसी अतीत की गुफा में ले जाना चाहते हों उनकी मानसिकता क्या है? वे प्रेरणा कहां से पाते हैं? अपने हिंसक इरादों को अमल में लाने के लिए उन्हें हथियार और रसद कहां से मिलते हैं? उनके शरणस्थल कहां हैं? उनका प्रशिक्षण कहां होता है? वे कौन सी ताकतें हैं जो उन्हें उकसा रही हैं? इन सब बातों को जाने बिना आईएस और उस जैसे अन्य संगठनों से कैसे लड़ा जाए?

कनाडा में बसे तारीक फतह जैसे इस्लामी अध्येता कहते हैं कि इस्लाम के प्रादुर्भाव के साथ ही कट्टरपंथ और जिहादी मानसिकता की शुरुआत हो गई थी। निर्वासित लेखिका अयान हिरसी अली जैसी अध्येता कहती हैं कि यह मक्का इस्लाम और मदीना इस्लाम के बीच के द्वंद्व से उपजा माहौल है। प्रसिद्ध पत्रकार बर्नाड लेविन इस्लाम को एक जिहादी धर्म के रूप में ही देखते हैं। तस्लीमा नसरीन जिन्हें लज्जा उपन्यास लिखने के कारण निर्वासन भोगना पड़ा, वे भी समय-समय पर ऐसे ही विचार प्रकट करती हैं। इन सबने इस्लाम धर्म का गहन अध्ययन किया है और निजी अनुभवों के साक्ष्य भी इनके पास हैं। अत: मानना होगा कि ये जो कह रहे हैं उसमें सत्य का अंश है तथा इनके विचारों को हल्के में खारिज नहीं किया जा सकता। फिर भी इनसे तस्वीर का एक पहलू ही हमारे सामने आता है। क्या इसका कोई दूसरा पक्ष भी है? अगर किसी विषय पर कुछ ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध हैं भी तो क्या उन्हें वर्तमान समय पर ज्यों का त्यों आरोपित किया जा सकता है? क्या वर्तमान में ऐसे कोई कारक तत्व नहीं हो सकते जिन्होंने आज के दृश्य को प्रभावित किया है? ऐसे तत्व क्या हैं और क्या उनका ईमानदारी से विश्लेषण करने की कोई कोशिश की गई है?

एक तो इस तथ्य पर गौर करना चाहिए कि दुनिया में धर्म के नाम पर राष्ट्रों का निर्माण कब कैसे हुआ। इतिहास में बहुत पीछे न जाकर बीसवीं सदी की ही बात करें तो ऐसा क्यों हुआ कि लगभग एक ही समय में धर्म पर आधारित दो देशों का उदय हुआ। मैं इस बात को कुछ सप्ताह पूर्व लिख चुका हूं कि इस्लाम पर आधारित पाकिस्तान और यहूदी धर्म पर आधारित इजरायल दोनों की स्थापना द्वितीय विश्व युद्ध के तुरंत बाद हुई। इनके निर्माण की पृष्ठभूमि क्या थी? पाकिस्तान के बारे में भारतवासी बहुत कुछ जानते हैं। वे ये भी जान लें कि इजरायल की स्थापना में भी उन्हीं साम्राज्यवादी पश्चिमी ताकतों का हाथ था। हिन्दी में इस विषय पर बहुत कम लिखा गया है, लेकिन जिज्ञासु पाठक महेन्द्र कुमार मिश्र की पुस्तक ''फिलस्तीन और अरब इसराइल संघर्ष" पढ़ सकते हैं। अंग्रेजी समझने वाले पाठक गीता हरिहरन द्वारा संपादित पुस्तक ''फ्रॉम इंडिया टू पैलेस्टाइन : एसेज़ इन सॉलीडरीटी"  पढ़ सकते हैं। इस्लाम की एक गंभीर अध्येता करेन आर्मस्ट्रांग ने इस विषय पर अनेक पुस्तकें लिखी हैं। उनका मानना है कि धर्म के नाम पर जितना खून- खराबा हुआ है उससे कई गुना अधिक हिंसा दूसरे कारणों से हुई है जिनमें एक कारण जनतंत्र की रक्षा करना भी है।

आज इस्लाम के नाम पर हो रही हिंसा के एक के बाद एक प्रकरण सामने आ रहे हैं, लेकिन क्या वाकई इस्लाम में कट्टरता के तत्व स्थापना काल से मौजूद रहे हैं? हम इतिहास में जिन दुर्दम्य आक्रांताओं के बारे में पढ़ते हैं मसलन चंगेज खां, वह और उस जैसे अनेक इस्लाम के अनुयायी नहीं थे। विश्व विजय का सपना लेकर निकला सिकंदर न यहूदी था न मुसलमान न ईसाई। हिटलर, मुसोलिनी, फ्रांको, सालाजार इत्यादि भी इस्लाम को मानने वाले नहीं थे। तुर्की के राष्ट्रपिता कमाल अतातुर्क ने तो बीसवीं सदी के प्रारंभिक समय में खिलाफत को चुनौती देकर एक आधुनिक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की स्थापना की थी।  इजिप्त के नासिर और इंडोनेशिया के सुकार्णों ने भी धर्मनिरपेक्षता की नींव पर अपने नवस्वतंत्र देशों को खड़ा करने का उपक्रम किया था।

यह पूछना चाहिए कि सुकार्णों को अपदस्थ कर सुहार्तों को लाने में किसका हाथ था और नासिर बेहतर थे या उनके बाद बने राष्ट्रपति अनवर सादात। पश्चिम एशिया के अनेक देशों में से ऐसे अनेक सत्ताधीश हुए जो अपने को बाथिस्ट कहते थे और जो धार्मिक कट्टरता से बिल्कुल दूर थे। इराक में बाथिस्ट पार्टी को हटाकर सद्दाम हुसैन भले ही सत्ता में आए हों, लेकिन उनके विदेश मंत्री ईसाई थे और उनके इराक में धार्मिक असहिष्णुता नहीं थी; यही बात सीरिया के बारे में कही जा सकती है। लेबनान में तो ईसाई और इस्लामी दोनों बारी-बारी से राज करते रहे। हम अपने पड़ोस में बंगलादेश को ले सकते हैं। अमेरिकन राष्ट्रपति निक्सन ने बंगलादेश में जनतांत्रिक शक्तियों के उभार पर कोई ध्यान नहीं दिया व तानाशाह याह्या खान का समर्थन करते रहे।  बंगलादेश बन जाने के बाद मुजीबुर्ररहमान ने धर्मनिरपेक्षता का रास्ता अपनाया और आज उनकी बेटी शेख हसीना भी उसी रास्ते पर चल रही है।

आज इस्लामिक स्टेट के नाम पर जो दहशत का भयानक मंजर छाया हुआ है उसका प्रणेता कौन है? ऐसी खबरें लंबे समय से आ रही हैं कि आईएस को नवपूंजीवादी, नवसाम्राज्यवादी ताकतों ने ही खड़ा किया ताकि सीरिया और ईरान आदि में सत्ता पलट किया जा सके। इसके पहले अफगानिस्तान और इराक में तो अमेरिका और उसके पिठ्ठू कब्जा कर ही चुके हैं। इजिप्त और ट्युनिशिया में अरब-बसंत के नाम पर जो आंदोलन खड़े हुए थे उनका भी मकसद यही था। एक समय महाप्रतापी इंग्लैंड ने अमेरिका से लेकर आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड तक अपने उपनिवेश कायम किए। आज अमेरिका उसी मिशन को आगे बढ़ा रहा है। इसीलिए जब रूस, सीरिया व ईरान का साथ देता है तो यह अमेरिका व उसके साथियों को नागवार गुजरता है। इस प्रकट विडंबना की ओर भी ध्यान जाना चाहिए कि अमेरिका ने आज तक सऊदी अरब के खिलाफ कभी कोई कदम नहीं उठाया। जबकि सऊदी नागरिक ओसामा बिन लादेन को अपने कुटिल खेल में मोहरा बनाकर शामिल किया। इस्लामी जगत में सर्वाधिक कट्टरता अगर कहीं है तो वह सऊदी अरब में है। औरतों की स्वाधीनता पर सर्वाधिक प्रतिबंध भी तो वहीं है। जिहाद के लिए मुख्यत: पैसा वहीं से भेजा जाता है और वहां के शासकों की अय्याशी के किस्से मशहूर हैं। आशय यह कि इन तमाम बातों को सही परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है। तात्कालिक प्रतिक्रियाओं से हल नहीं निकलेगा। जब तक आईएस की पीठ पर हाथ रखने वालों का विरोध नहीं होगा तब तक इस गंभीर चुनौती का सामना नहीं हो पाएगा। बंगलादेश में मार डाले गए ब्लॉगर पत्रकारों सहित अनेक ऐसे इस्लामी बुद्धिजीवी हैं जो कट्टरपंथ व जड़वाद का विरोध तमाम खतरे उठाकर भी कर रहे हैं। शेष विश्व को इनके समर्थन में खड़ा होने से मुकाबला करना आसान होगा।
देशबन्धु में 16 नवंबर 2015 को प्रकाशित विशेष सम्पादकीय

Friday, 13 November 2015

कहानी के सौ साल

 इस साल 'उसने कहा था' का प्रकाशन हुए पूरे सौ साल बीत चुके हैं। यह वर्ष भीष्म साहनी की जन्मशती का भी है। इसके अलावा कहानी पत्रिका के उस विशेषांक को भी साठ साल हो गए हैं, जिसमें 'चीफ की दावत' सहित अनेक वे कहानियां छपी थीं, जिनसे कहानी विधा में एक नए युग का सूत्रपात माना गया था। जैसा कि साहित्य का हर विद्यार्थी जानता है, पं. चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने मात्र तीन कहानियां लिखी थीं- उसने कहा था, सुखमय जीवन व बुद्धू का कांटा। मात्र इनके बल पर वे सिद्धहस्त कथाकार कहलाए। 'उसने कहा था' को तो अमर कथा का दर्जा प्राप्त हो चुका है। आज एक शताब्दी बाद भी उसे पढ़ा जाता है और पढ़ते हुए यही लगता है मानो वह आज की ही कहानी है। उसने कहा था को हिन्दी की पहिली मुकम्मल एवं आधुनिक कहानी मान जाए तो गलत नहीं होगा। कथानक, कथोपकथन, चरित्र चित्रण, भाषा, शैली, आरंभ, चरमोत्कर्ष, उपसंहार- विवेचना के हर कोण पर कहानी खरी उतरती है।
गुलेरी जी ने जब कहानी लिखी, तब तक प्रेमचंद भी कथाकार के रूप में अपनी पहिचान बना चुके थे। 'पंच परमेश्वर' कहानी भी 1915 में ही लिखी गई थी। यहां से एक लंबा दौर प्रारंभ होता है, जिसे प्रेमचंद युग की संज्ञा दी जा सकती है। इस दौर में रचे कथा साहित्य को आदर्शवाद, यथार्थोन्मुख आदर्शवाद, यथार्थवाद, प्रगतिवाद जैसी अनेक सरणियों में समीक्षकों ने निबद्ध किया। श्रीपतराय द्वारा संचालित-संपादित 'कहानी' के उक्त विशेषांक तक यह दौर चलता रहा। इस युग में पं. सुदर्शन, शिवपूजन सहाय, जैनेन्द्र, यशपाल, विशंभरनाथ शर्मा कौशिक, सुभद्राकुमारी चौहान, अमृतलाल नागर, भगवतीचरण वर्मा इत्यादि अनेक कथाकारों ने ख्याति प्राप्त की, लेकिन न तो उन्होंने किसी नए आंदोलन को प्रारंभ किया और न किसी नवयुग का सूत्रपात। 1955 में कहानी का विशेषांक आने के साथ दृश्य परिवर्तन हुआ। कहानी का स्थान अब नई कहानी ने ले लिया। नई कहानियां नाम से एक नई पत्रिका भी प्रारंभ हो गई। कहानी के विशेषांक के समय से मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, भैरव प्रसाद गुप्त, मार्कण्डेय, अमरकांत, निर्मल वर्मा, शेखर जोशी, धर्मवीर भारती, आनंद प्रकाश जैन, कमल जोशी, रामकुमार, मन्नू भंडारी, कृष्णा सोबती, उषा प्रियंवदा आदि कथा क्षितिज पर एक नई आभा बिखेरते हुए उदित हुए तथा नई कहानियां पत्रिका इनमें से अनेक को आगे ले जाने का वाहन बनी। नई कहानी के इस दौर में ही ज्ञानरंजन, दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह इत्यादि कथाकार भी प्रकाश में आए।
कहानी पत्रिका ने एक युगांतकारी भूमिका निभाई। उसके बाद वह नए सिरे से नए लेखकों की पहिचान देने में सक्रिय हो गई। सन् साठ के दशक में कितने ही नए कहानीकार इस माध्यम से सामने आए। कुछ के नाम याद आते हैं- प्रबोध कुमार, ओमप्रकाश मेहरा, ममता कालिया, रवींद्र कालिया, रामनारायण शुक्ल, रमेश बक्षी, सतीश जमाली, देवेन्दु, नीलकांत, प्रकाश बाथम, निरुपमा सेवती इत्यादि। मैं कुछ अन्य पत्रिकाओं का भी उल्लेख यहां करना चाहूंगा। साठ के दशक में तब के कलकत्ता से कथाकार छेदीलाल गुप्त एवं उनके साथियों ने सुप्रभात नामक कथा पत्रिका निकाली। आगरा से भी नीहारिका शीर्षक से एक पत्रिका प्रारंभ हुई। मेरठ से छपने वाली अरुण ने अपना अलग स्थान बनाया जिसमें उर्दू और मराठी कहानियों के अनुवाद मुख्यत: छपते थे। फ्रिक तौसवीं, शौकत थानवी, ना.सी. फड़के, पु.ल. देशपांडे आदि की रचनाएं सर्वप्रथम इस पत्रिका में ही पढ़ीं। साठ का दशक जब विदा लेने को था, लगभग उसी समय महीप सिंह, मनहर चौहान व कुछ अन्य मित्रों ने मिलकर न सिर्फ सचेतन कहानी आंदोलन चलाया, बल्कि सचेतन कहानी नामक पत्रिका भी प्रारंभ की। यह शायद हिन्दी कहानी में चलाया गया पहिला आंदोलन था। यद्यपि यह लंबे समय तक नहीं चल पाया।
कथा जगत में इसके पश्चात दो अन्य आंदोलनों का ध्यान मुझे आता है। दोनों के प्रणेता कमलेश्वर थे। एक तो उन्होंने समानांतर कहानी आंदोलन (जो अल्पजीवी सिद्ध हुआ) प्रारंभ किया; दूसरे सारिका का संपादन करते हुए उन्होंने जहां एक ओर हिन्दी गज़ल को प्रतिष्ठित किया, वहीं उन्होंने लघु कथा को एक स्वतंत्र विधा के रूप में स्थापित करने की चेष्टा की। कहना न होगा कि दोनों विधाएं खूब फल-फूल रही हैं। इस बीच धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, ज्ञानोदय इत्यादि पत्रिकाओं ने पाठकों को अनेक कथाकारों की कृतियों से परिचित होने का अवसर दिया। शिवानी व मालती जोशी को जो लोकप्रियता हासिल हुई, उसमें दोनों बहुप्रसारित साप्ताहिकों की भूमिका को स्मरण करना चाहिए। ज्ञानोदय ने भी एक प्रयोग किया- सहयोगी उपन्यास प्रकाशित करने का। पहिले ग्यारह सपनों का देश छपा और फिर एक इंच मुस्कान।
बहरहाल, कहानी को एक नया मोड़ मिला, राजेन्द्र यादव के संपादन में पुनर्प्रकाशित 'हंस' से। आज जितने भी प्रमुख कथाशिल्पी हैं, उनमें से शायद ही कोई ऐसा हो जो हंस में न छपा हो। राजेन्द्र जी ने हंस में स्त्री-विमर्श एवं दलित-विमर्श की खूब सोच-समझकर शुरूआत की तथा उससे न सिर्फ कथा साहित्य में, बल्कि समूचे हिन्दी जगत में एक नई चेतना का प्रसार हुआ। उन्होंने अपने ढंग से साहित्य के सामाजिक दायित्व एवं सोद्देश्यता को परिभाषित किया। राजेन्द्र यादव ने इस तरह हिन्दी साहित्य के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा।
इस वृहत्तर पृष्ठभूमि में 'अक्षर पर्व' का उत्सव अंक कहानी विशेषांक के रूप में आपके सम्मुख है। इसकी भूमिका छह साल पहिले बनी थी, जब 2009 में हमने कविता विशेषांक प्रकाशित किया था। किसी न किसी कारण से योजना टलती चली गई। अब जाकर इस विचार को मूर्त रूप मिल सका है। वैसे भी कविता विशेषांक के बाद कहानी विशेषांक की योजना बनना लाजिमी था, लेकिन अक्षर पर्व का यह अंक 2009 की ही भांति सामान्य तौर से प्रकाशित होने वाले विशेषांकों से एक मायने में बिल्कुल भिन्न है। इसमें सिर्फ वे ही रचनाएं ली गई हैं जो अक्षर पर्व में पूर्व में प्रकाशित हो चुकी हैं। एक तरह से यह हमारा अपना विहंगावलोकन है। दूसरे, ये सारी रचनाएं नई सदी के मोड़ पर लिखी गई हैं, याने 2000 के 4-5 साल पहिले या 10-15 साल बाद तक। अर्थात् गत दो दशक की अवधि में हिन्दी कथा साहित्य की जो दशा-दिशा रही है, उसकी एक आंशिक झलक यहां संकलित रचनाओं से मिल सकती है।
इस अंक के लिए रचनाओं का चयन करना मेरे लिए एक दुष्कर दायित्व था। 1997 से लेकर हाल-हाल तक प्रकाशित छह सौ से अधिक कहानियों में से किसे लें और किसे छोड़ें, यह प्रश्न सामने था। माथापच्ची के बाद पहिला निर्णय यही लिया कि अंक में अनूदित रचनाएं शामिल न की जाएं। इसके बाद उपन्यासिकाओं एवं उपन्यास अंशों को भी छोडऩे की बात तय की। ये दोनों निर्णय अनिच्छा से ही लिए। फिर यह बात उठी कि भीष्मजी सहित अनेक ज्येष्ठ कथाकारों की जो रचनाएं समय-समय पर प्रकाशित हुई हैं, उनमें से चयन कैसे हो। पुराने अंकों के पन्ने पलटते हुए मुझे इनकी जो कहानी एकबारगी जम गई, वह रख ली। स्थानाभाव के कारण अक्षर पर्व में प्रकाशित उनकी सारी कहानियां लेना तो संभव नहीं था न। अन्य सहयोगी लेखकों की कहानियों को दुबारा पढ़ते हुए कथावस्तु की विविधता को ध्यान में रखकर चयन करने का प्रयत्न किया ताकि एक कोलाज़ की शक्ल में वर्तमान समय की सच्चाइयां भरसक सामने आ सकें। इस तरह कहानी विशेषांक में एक ओर ज्येष्ठ लेखकों की रचनाएं हैं तो दूसरी ओर उन लेखकों की भी जिनसे पाठक शायद बहुत अच्छी तरह परिचित नहीं हैं। चयन में जहां कथावस्तु को प्राथमिकता दी है, वहीं यह प्रयास भी किया है कि भाषा व शैली में जो विविधता एवं नवाचार है, वह भी यथासंभव प्रकट हो सके।
अक्षर पर्व मुख्यत: कहानी की पत्रिका नहीं है। यह दायित्व कुछ अन्य पत्रिकाएं लम्बे समय से बखूबी निभा रही हैं। उनमें कहानी कला को लेकर निरंतर विमर्श और आलोचनाएं चलती रहती हैं, फिर भी अक्षर पर्व में जो कथा साहित्य प्रकाशित हुआ है वह अपने समय का दस्तावेज है। विगत तीस वर्षों में भारत के सामाजिक परिदृश्य में बहुत से परिवर्तन आए हैं। इसके पीछे जो आर्थिक, राजनीतिक कारण हैं उनसे हम अनभिज्ञ नहीं हैं। आज का कहानी लेखक इन परिवर्तनों को खुली आंखों से देख रहा है। आम नागरिक के जीवन में निजी और सामाजिक दोनों स्तरों पर जो प्रभाव पड़ा है वह कथाकार से छुपा हुआ नहीं है। इस संक्रमण काल की बेचैनी और छटपटाहट विभिन्न स्तरों पर कहानियों में बखूबी चित्रित हुई है।  मेरा विश्वास है यहां प्रकाशित कहानियों से एक बार गुजरने के बाद पाठक इस बात से सहमत होंगे।
पत्रिका के एक अंक में, भले ही वह विशेषांक क्यों न हो, सीमित स्थान के चलते रचनाओं की संख्या भी सीमित ही होगी। इसीलिए हमने तय किया है कि प्रस्तुत अंक कहानी विशेषांक का खंड-एक होगा तथा दिसंबर अंक खंड-दो के रूप में प्रकाशित किया जाएगा। आशा है कि हमेशा की तरह इस अंक का भी पाठक जगत में स्वागत होगा। अंत में सुधी पाठकों से क्षमा याचना कि याददाश्त के बल पर लिखी इस प्रस्तावना में कोई महत्वपूर्ण नाम छूटने की और अन्य गलतियां हो सकती हैं।
अक्षर पर्व नवंबर 2015 अंक की प्रस्तावना