Wednesday, 25 February 2015

नीलामी का सीज़न


 आने वाले कुछेक हफ्ते देशवासियों के लिए खासी दिलचस्पी के होंगे। एक ओर संसद का बजट सत्र प्रारंभ हो चुका है जिसमें स्वाभाविक ही जनता की रुचि है। दूसरी तरफ अनगिनत क्रिकेट प्रेमी दम साधकर आस्ट्रेलिया में चल रहे वर्ल्ड कप के मैच देख रहे हैं। किन्तु बीते कुछ दिनों में भी कुछ ऐसे प्रसंग उपस्थित हुए जिन्होंने जनजीवन में अच्छी खासी उत्तेजना बनाए रखी। एक लंबी शीत ऋतु बीत जाने के बाद बसंत की शरारत भरी बयार ने जैसे स्फुरित कर दिया हो। मुझे लगता है कि पिछले एक पखवाड़े को नीलामी का सीजन कहकर पुकारा जाए तो बात और स्पष्ट हो सकेगी। सबसे पहले तो आईपीएल के लिए क्रिकेट खिलाडिय़ों की नीलामी का काम हुआ। उसके बाद कुछ चुने हुए कोल ब्लॉकों को नीलाम करने का कदम सरकार ने उठाया। उधर बिहार में जीतनराम मांझी द्वारा अप्रत्याशित विद्रोह करने  के बाद विधायकों की खरीद-फरोख्त की चर्चा हवा में तैरने लगी तो इधर छत्तीसगढ़ में जिला पंचायतों और जनपद पंचायतों के चुनाव में चुने गए सदस्यों के दाम लगाए जाने के आरोप भी खुले रूप से लगे।

इन सारी वास्तविक अथवा आरोपित नीलामियों में लीक से हटकर कोई बात नहीं हुई। आईपीएल के लिए जब पहली बार बोली लगाई जाना थी तब अवश्य आम जनता खासकर क्रिकेट प्रेमियों के मन में वितृष्णा पैदा हुई थी कि अब खिलाड़ी भी मवेशियों की तरह नीलाम होंगे। किंतु थोड़े दिन बाद इसे सबने सहज स्वीकार कर लिया। खेल के नियम ही बदल गए हैं। जब खिलाड़ी स्वयं अपने को बेचने तैयार हैं तो किसी और का उन पर क्या वश! विधायकों और निर्वाचित प्रतिनिधियों के बिकने में भी अब किसी को आश्चर्य नहीं होता। यह दस्तूर तो 1967 में ही प्रारंभ हो चुका था। फिलहाल नीतीश कुमार तसल्ली कर सकते हैं कि भाजपा के खुले सहयोग के बावजूद जीतनराम मांझी जदयू को तोड़ नहीं पाए। छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल को भी संतोष हुआ होगा कि सत्तारूढ़ पार्टी के प्रलोभन में बहुत ज्यादा लोग नहीं आए और कांग्रेस का सम्मान सुरक्षित रहा आया। कोयला खदानों का आबंटन नीलामी से हो तो यह कार्य एक निर्धारित प्रक्रिया से ही चल रहा है। यद्यपि अभी जो नीलामियां हुई हैं उनसे प्राप्त लाभ को लेकर परस्पर विरोधी दावे किए जा रहे हैं।

बहरहाल, इस सीज़न  में जिस नीलामी ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा तथा जिसकी चर्चा देश के बाहर भी हुई वह थी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बहुचर्चित सूट की नीलामी। पाठकों को याद दिलाने की आवश्यकता नहीं है कि इस सूट में सुनहरे धागे से प्रधानमंत्री के नाम की धारियां बुनी गई हैं। जिस दिन प्रधानमंत्री ने हैदराबाद हाउस की चाय पार्टी में यह सूट धारण किया था उसके बाद से ही इसे लेकर  तरह-तरह की बातें हो रही थीं। इसकी कीमत लाखों रुपयों में आंकी जा रही थी यद्यपि भाजपा के अनथक प्रवक्ता संबित पात्रा की मानें तो इसका मूल्य मात्र पांच-छह हजार रुपए ही था। ये बात अलग है कि उनके इस बयान पर लोगों ने भरोसा नहीं किया। यह सूट मोदीजी को किसने दिया? कब दिया और क्यों दिया? इसका कपड़ा कहां से आया? डिजाइन किसने तैयार की? सिलाई कहां हुई? इसे लेकर खोजी पत्रकारों ने पता लगाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। किसी ने अहमदाबाद के टेलर मास्टर को पकड़ा, तो कोई मुंबई में फैशन डिजाइनर के स्टूडियो तक पहुंच गया। यह तथ्य भी सामने आया कि इजिप्त के तानाशाह हुस्नी मुबारक के पास भी ऐसा ही सूट था। अमेरिका तक के अखबारों में इस पर चर्चाएं हुईं। यह चर्चा शायद कुछ देर में ठंडी पड़ जाती, लेकिन एक दिन अचानक ज्ञात हुआ कि मोदीजी इस सूट को नीलाम कर रहे हैं तो मुझ जैसे बैठे-ठाले व्यक्ति को फिर कुछ लिखने के लिए मसाला मिल गया।

बताया गया कि सूरत में मोदीजी के इस सूट के अलावा प्रधानमंत्री को पिछले आठ माह में मिले अन्य उपहारों की भी नीलामी की जाएगी। यह नीलामी तीन दिन तक चली। पहले दिन सूट पर सवा करोड़ तक की बोली लगाई गई जो तीसरे दिन अंतत: चार करोड़ इकतीस लाख में जाकर रुकी। सूट के अलावा जो अन्य वस्तुएं नीलाम की गईं उनसे भी कुल मिलाकर लगभग चार करोड़ की राशि प्राप्त हुई। याने नाम वाला सूट एक तरफ, बाकी सारी सौगातें दूसरी तरफ। यह सारी राशि प्रधानमंत्रीजी के प्रिय लक्ष्य गंगा सफाई अभियान के खाते में चली जाएगी। जब नीलामी करने की बात उठी तब रमेश विरानी नामक एक हीरा व्यापारी सामने आए। उन्होंने बताया कि यह सूट उन्होंने अपने बेटे की विवाह पत्रिका के साथ मोदीजी को भेंट किया था। सूट खरीदने वाले लक्ष्मीकांत पटेल भी हीरा व्यापारी हैं। अगर सचमुच गंगा किसी दिन साफ हो सकी तो उस दिन कहना होगा कि इसमें सूरत के हीरा व्यापारियों का अमूल्य योगदान था।

मैं इस विचार में कोई बुराई नहीं देखता कि प्रधानमंत्री को प्राप्त तोहफों की सार्वजनिक रूप से नीलामी हो और उससे प्राप्त नीलामी को किसी महत्तर सार्वजनिक उद्देश्य के लिए व्यय किया जाए। हमें बताया तो यह भी गया कि जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब भी वे प्रतिवर्ष अपने को मिली सौगातों की नीलामी करते थे। याने एक तरह से उन्होंने यह कोई नया काम नहीं किया बल्कि अपनी सोच को राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया है। यहां एक बात समझ नहीं आई जब मुख्यमंत्री मोदी अपने तोहफों की नीलामी करते थे तब उसका कोई प्रचार क्यों नहीं किया गया? श्री मोदी प्रारंभ से ही प्रचारप्रिय रहे हैं इसलिए यह चूक आश्चर्यजनक प्रतीत होती है। यह समयोचित होगा कि गुजरात की वर्तमान मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल इस संबंध में जो भी दस्तावेज सरकार के पास हैं उन्हें सार्वजनिक कर दें ताकि जनता को पूर्व में की गई नीलामियों की मुकम्मल जानकारी मिल सके।

मैं यह भी सोचता हूं कि इस तरह की नीलामी के अलावा ऐसे और कौन से अवसर हो सकते हैं जब प्रधानमंत्री लोकहित के कार्यों के लिए ऐसे नवीन उपायों से धन संग्रह कर सकें। एक उपाय मुझे बहुत मौजूं लगता है कि श्री मोदी अपने किसी भी प्रशंसक के साथ मुफ्त में सेल्फी न खिंचवाएं। अगर कोई देश के प्रधानमंत्री के साथ फोटो खिंचवाना चाहता है तो इसके लिए वह गंगा सफाई अभियान या अन्य किसी प्रकल्प के लिए बकायदा एक निश्चित राशि जमा करे। इसमें यह भी हो सकता है कि प्रधानमंत्री प्रतिदिन या प्रति सप्ताह एक या दो घंटे का समय सेल्फी सेशन के लिए तय करें और इच्छुक जनों के बीच पहले से नीलामी हो जाए। मान लो एक हजार लोग आए हैं तो उन सौ लोगों के साथ ही सेल्फी हो जो अधिकतम राशि दे रहे हों। प्रधानमंत्री इसी तरह सार्वजनिक अथवा व्यक्तिगत कार्यक्रम का निमंत्रण भी फीस लेकर ही स्वीकार करें। अभी जैसे वे मुलायम सिंहजी के पौत्र के तिलक में सैफई गए थे। अच्छा मौका था। वे मुलायम सिंह से एकाध करोड़ तो आसानी वसूल कर ही सकते थे।

प्रधानमंत्री को स्वाभाविक रूप से आए दिन न्यौते मिलते ही हैं। कुछ समय पहले उन्होंने मुंबई में अंबानी अस्पताल का उद्घाटन किया। यह एक सुनहरा अवसर था जब वे अंबानी परिवार से गंगा अभियान के लिए पांच-दस करोड़ तो ले भी सकते थे। वे मुकेश अंबानी को शायद यह भी कह सकते थे कि पीठ पर हाथ रखकर फोटो खिंचवाने के पांच करोड़ एक्सट्रा लगेंगे। हम जानते हैं कि गांधीजी कई बार आटोग्राफ देने के लिए लोगों से पैसा ले लेते थे। इसका अनुसरण भी प्रधानमंत्री करें तो कोई हर्ज नहीं है। इस तरह देखते ही देखते सरकारी खजाने मेंं तीव्र गति से धनराशि आ सकती है। लेकिन बात यहीं तक सीमित क्यों रहे? हम उस सुभाषित को याद करें कि जिस मार्ग पर महापुरुष चलते हैं उसका अनुसरण करना चाहिए।

प्रधानमंत्री ने असावधानी के किसी क्षण में सूट की यह सौगात स्वीकार की होगी। उसका परिमार्जन नीलामी करके हो गया, लेकिन ऐसा करके नरेंद्र मोदी ने एक दृष्टांत उपस्थित कर दिया है। भाजपा द्वारा नियुक्त राज्यपाल, भाजपा के मुख्यमंत्री, मंत्री भी अगर प्रधानमंत्री की बताई राह पर चलें तो एक अच्छी मिसाल कायम हो सकती है। हम छत्तीसगढ़ में ही देखते हैं कि मुख्यमंत्री प्रतिदिन कम से कम आधा दर्जन कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं। जिसमें उन्हें अनिवार्य रूप से स्मृति चिन्ह भेंट किए जाते हैं। ऐसा ही अन्य प्रदेशों में भी होता है। स्मृति चिन्हों के अलावा भांति-भांति के उपहार भी मिलते हैं। मुख्यमंत्री इनका क्या करते हैं? अगर इनकी नीलामी कर दी जाए तो मुख्यमंत्री सहायता कोष के लिए साल में पांच-दस करोड़ रुपया इकट्ठा हो जाना कौन सा मुश्किल काम है? आशा है नेतागण इस पर विचार करेंगे।
देशबन्धु में 26 फरवरी 2015  को प्रकाशित

Wednesday, 18 February 2015

पूंजीवादी जनतंत्र और 'आप'


 7फरवरी को जब टीवी चैनलों पर एक्जिट पोल आ रहे थे और आम आदमी पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिलने की संभावना व्यक्त की जा रही थी तब मैंने ट्विटर और फेसबुक पर एक संभावना व्यक्त की थी कि क्या आम आदमी पार्टी पुराने समय की स्वतंत्र पार्टी के नए अवतार के रूप में उभरेगी; ऐसी पार्टी जो धर्मनिरपेक्ष होगी किन्तु अन्य मामलों में जिसकी रुझान दक्षिणपंथी होगी! मुझे इस टिप्पणी पर कोई खास प्रतिक्रियाएं नहीं मिलीं, लेकिन मैं जब आम आदमी पार्टी की अभूतपूर्व दिल्ली विजय की समीक्षा करने का प्रयत्न करता हूं तब यही सोचने पर मजबूर होता हूं कि देश में आप के रूप में एक ऐसी पार्टी का उदय हुआ है जो अमेरिकी शैली में पूंजीवादी जनतंत्र की ध्वजवाहक होगी। मैं याद करना चाहता हूं कि फ्रांसिस फुकुयामा ने लगभग ढाई दशक पहले अपनी बहुचर्चित पुस्तक 'द एंड ऑफ हिस्ट्री' यह अवधारणा प्रस्तुत की थी कि राजनैतिक इतिहास में पूंजीवादी जनतंत्र ही अंतिम विकल्प है। आगे चलकर फुकुयामा ने तो अपनी स्थापना को काफी हद तक संशोधित किया लेकिन क्या आश्चर्य कि भारत में मीमांसकों को उसका पुराना रूप ही स्वीकार हो!

जैसा कि हम जानते हैं योगेन्द्र यादव आम आदमी पार्टी के सबसे प्रबल, सबसे प्रमुख और सबसे मुखर भाष्यकार हैं। वे सीएसडीएस नामक उस संस्था या थिंक टैंक से भी जुड़े रहे हैं जिसकी राजनैतिक सोच मुख्यत: कांग्रेस विरोधी रही है। श्री यादव ने नतीजे आने के तुरंत बाद ही टीवी पर यह स्पष्ट रूप से घोषित किया कि आम आदमी पार्टी की विचारधारा वर्ग संघर्ष की विचारधारा नहीं है। सीएसडीएस से ही जुड़े आप समर्थक प्रखर पत्रकार अभय कुमार दुबे का भी कहना है कि आम आदमी पार्टी पूंजी-विरोधी या व्यापार-विरोधी नहीं है। आप के प्रणेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी शपथ ग्रहण के बाद व्यापार जगत को निर्भय होकर अपना व्यापार करने और उस पर कानूनन टैक्स जमा करने का संदेश दिया है। ये तीनों उक्तियां आप के राजनैतिक दर्शन को समझने में हमारी मदद करती हैं।

यह तथ्य किसी से छिपा हुआ नहीं है कि वैश्विक पूंजी हितों को भारत में समाजवाद की अवधारणा कभी रास नहीं आई। जब जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री थे तब भी कांग्रेस पार्टी और सरकार में वही लोग बहुमत में थे जो समाजवाद के खुले तौर पर न सही दबे-छुपे विरोधी थे। पंडितजी ने योजना आयोग की स्थापना व मिश्रित अर्थव्यवस्था की जो बात की वह भी न्यस्त हितों को नागवार गुजरती थी। पंडित नेहरू एक तरह से पार्टी के भीतर काफी हद तक अकेले थे इसीलिए भूमि सुधार कार्यक्रम देश में कभी भी पूरी तरह से लागू नहीं हो पाया। कांग्रेस की जमींदारी उन्मूलन के प्रति वचनबद्धता भी बहुत कुछ कागजों पर रही आई। बड़े भूस्वामियों ने हर तरह के प्रपंच रच भूमि सुधार लागू नहीं होने दिया। विनोबा भावे का भूदान आंदोलन भी इसीलिए अंतत: एक आडंबर ही सिद्ध हुआ। ऐसे बड़े जमींदार अपवादस्वरूप ही थे जिन्होंने ईमानदारी से अपनी भूमि भूदान यज्ञ को समर्पित की।

इसी कड़ी में हम स्वतंत्र पार्टी का गठन होते देखते हैं। इसके सबसे बड़े नेता देश के महान नेताओं में से एक चक्रवर्ती राजगोपालाचारी थे और कर्ता-धर्ताओं में प्रमुख नाम किसी समय के समाजवादी मीनू मसानी का था। यूं तो दोनों पुराने कांग्रेसी और पंडितजी के निकट सहयोगी थे, लेकिन पंडित नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस जिस समाजवाद की बात कर रही थी उससे ये सहमत नहीं थे। यह सच्चाई अपनी जगह पर है कि तत्कालीन परिस्थितियों में स्वयं पंडित नेहरू अपनी नीतियों को पूरी तरह से लागू करने की स्थिति में नहीं थे और समाजवाद आधे-अधूरे रूप में ही लागू हो रहा था। जैसे ही स्वतंत्र पार्टी का गठन हुआ देश के तमाम राजे-महाराजे और इजारेदार उसमें शामिल हो गए। पार्टी ने 1962 के आमचुनाव में ठीक-ठाक सफलता भी अर्जित की। यद्यपि यह प्रयोग बहुत लंबे समय तक नहीं चल पाया। इसके अनेक कारण थे।

आर्थिक नीतियों के अनेक विशेषज्ञों का मानना है कि 1980 में इंदिरा गांधी के दुबारा प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत में आर्थिक उदारवाद के नए दौर की शुरुआत हो चुकी थी, यद्यपि वह बहुत प्रकट नहीं थी। राजीव गांधी, फिर वी.पी. सिंह के संक्षिप्त कार्यकाल में देश में वैश्विक पूंजी हितों की पकड़ कुछ और मजबूत हुई। तदन्तर पी.वी. नरसिम्हाराव के प्रधानमंत्री बनने और उनके साथ डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा वित्तमंत्री की कुर्सी संभालने के साथ एल.पी.जी. याने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण का जो दौर प्रारंभ हुआ वह लगातार मजबूत होते गया है। मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री के नाते अपने दूसरे कार्यकाल में इस प्रक्रिया को अपेक्षानुरूप गति नहीं दे पाए- यह आलोचना तो पूंजीवाद समर्थक हर आर्थिक-सामाजिक विश्लेषण कर ही रहा है। ऐसी स्थिति में पूंजी हितों की रक्षा करने के लिए एक नए नेतृृत्व की तलाश शुरु हुई और नरेन्द्र मोदी देखते ही देखते राष्ट्रीय तो क्या बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर छा गए।

यहां तक तो सब कुछ ठीक था। सब जानते हैं कि भारत दुनिया का दूसरे नंबर का बड़ा बाजार है।  जो सबसे बड़ा बाजार है याने चीन वहां से वैश्विक पूंजी को जो कुछ हासिल करना था वह काफी हद तक पाया जा चुका है। उसके विस्तार में जाने की यहां आवश्यकता नहीं है। अब भारत पर सबकी निगाहें टिकी हैं। देश की भौगोलिक स्थिति, राजनीतिक परंपरा व सामाजिक वातावरण सब मिलकर एक ऐसी रचना करते हैं जो आस्ट्रेलिया व जापान से लेकर अमेरिका व कनाडा तक सबको आकर्षित करती है। विश्व के सबसे बड़े धनपति बिल गेट्स भारत के प्रति अपना प्रेम समय-समय पर व्यक्त करते रहते हैं और भारत के पूंजीपतियों को अमेरिका से कितना प्रेम है इसका प्रमाण राष्ट्रपति भवन में बराक ओबामा से हाथ मिलाने के लिए खड़े उद्योगपतियों की सुदीर्घ पंक्ति के दृश्य से मिल जाता है। फिलहाल यह भूल जाइए कि डॉ. मनमोहन सिंह ने कभी राष्ट्रपति बुश को उच्छवास भर कर कहा था कि भारत की जनता आपसे बहुत प्यार करती है। यह भी भूल जाइए कि बिल क्लिंटन जब हमारी संसद में आए थे तो संसद सदस्य उनसे हाथ मिलाने के लिए कैसे पागलों की तरह टूटे पड़ रहे थे।

इतनी बात करने का मतलब सिर्फ इतना है कि भारतीय संविधान में समाजवाद शब्द भले ही हो, हमारी व्यवहारिक राजनीति से उसे निकालकर फेंक दिया गया है। अब भारत एक मुकम्मल पूंजीवादी जनतंत्र बनने के रास्ते पर काफी आगे बढ़ गया है। यह अपेक्षा नरेन्द्र मोदी से थी कि वे मंजिल पर पहुंचकर ही दम लेंगे, लेकिन उन्हें कदम-कदम पर बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। यह बाधा कोई और नहीं बल्कि उनके अपने परिवार के लोग पैदा कर रहे हैं। स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि कल तक मोदीजी के अंधप्रशंसक रहे तीसरे दर्जे के रूमानी उपन्यासों के चर्चित लेखक चेतन भगत उन्हें जमीन पर आने की सलाह देने लगे। संघ परिवार के एक अन्य शुभचिंतक बाबा रामदेव के अनन्य सहयोगी व मोदी-विजय से उल्लसित पत्रकार वेदप्रताप वैदिक भी अब प्रधानमंत्री को प्रादेशिक नेता कहने लगे हैं।

दरअसल, हुआ यह है कि वैश्विक पूंजीहितों को समाजवाद से भले ही घृणा हो, वे धर्मनिरपेक्षता के  विरोधी नहीं हैं। बात सरल है। किसी भी देश में सामाजिक सद्भाव और शांति कायम रहेगी तभी व्यापार-व्यवसाय अपेक्षानुरूप प्रगति कर सकेगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दो पाटों के बीच फंस गए हैं। वे एक तरफ कारपोरेट हितों की रक्षा करना चाहते हैं और दूसरी तरफ हिन्दुत्व को भी नहीं छोडऩा चाहते। पिछले नौ माहों में संघ प्रमुख मोहन भागवत से लेकर छोटे-मोटे कार्यकर्ताओं तक ने हिन्दुत्व को लेकर जो उग्र रूप वाणी और व्यवहार में प्रदर्शित किया है वह पूंजीवादी लोकतंत्र के अनुकूल नहीं है। अगर नरेन्द्र मोदी हिन्दुत्व से अपना पीछा नहीं छुड़ा सकते तो उन्हें विश्व बाजार से समर्थन की आशा भी नहीं रखना चाहिए।

हम स्वतंत्र पार्टी की ओर वापस लौटते हैं। देश में उस समय हिन्दुत्ववादी शक्तियों के तीन राजनीतिक दल थे-हिन्दू महासभा, रामराज्य परिषद और भारतीय जनसंघ। उस समय भी वैश्विक पूंजीवाद ने इनमें से किसी पर दांव लगाने के बजाय स्वतंत्र पार्टी के रूप में एक नए राजनीतिक विन्यास को अपना समर्थन दिया था। हमें लगता है कि आज के इजारेदार भी भाजपा और आप के बीच किसको चुनें, इस पर सोच रहे हैं। इस परिदृश्य में आप से यह उम्मीद करना निष्फल ही होगा कि वह किसी तीसरे मोर्चे का हिस्सा बनेगी या कि समाजवादी, साम्यवादी पार्टियों के साथ उसका कोई स्थायी तालमेल हो सकेगा। देश में धर्मनिरपेक्षता का नारा बुलंद करने वाली निष्क्रिय और हताश शक्तियों के लिए फिलहाल इतनी ही राहत काफी है कि भारतीय जनता पार्टी को आम आदमी पार्टी के हाथों पराजय झेलना पड़ी है।
 देशबन्धु में 19 फरवरी 2015 को प्रकाशित

Wednesday, 11 February 2015

जनता की उम्मीदों की विजय




दिल्ली के विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी को मिली सफलता अभूतपूर्व है और इसने सबको चकित कर दिया है। देश के पूर्वोत्तर प्रांतों व तमिलनाडु में जब-तब क्षेत्रीय दलों को इस तरह की एकतरफा विजय मिलने के उदाहरण हैं, लेकिन देश की राजधानी वाले प्रदेश में ऐसे नतीजे आना कल्पनातीत थे। आप प्रमुख अरविन्द केजरीवाल व उनकी पूरी टीम को न सिर्फ बधाईयां मिल रही हैं, जिसके कि वे हर तरह से हकदार हैं; देश की जनता उन्हें इसलिए भी धन्यवाद दे रही है कि आप की विजय के बाद वह भ्रष्टाचार ही नहीं, सार्वजनिक जीवन में तेजी से फैल रहे उन्माद से भी शायद मुक्ति पा सकेगी! इसे संभवत: इस तरह भी कहा जा सकता है कि जनता के मन में आप की विजय ने यह विश्वास जागृत किया है कि वह तानाशाही, फिरकापरस्ती और पूंजी के गठजोड़ से लड़ सकती है। सत्तर में से सड़सठ सीटों में जीतना कोई हंसी खेल नहीं है। यह जनता की उम्मीदों और विश्वास की विजय है। और यदि दिल्ली लघु भारत है तो यह पूरे देश की जनता की जीत है।

इन चुनाव परिणामों का विश्लेषण करते हुए सबसे पहले सवाल उठता है कि भारतीय जनता पार्टी की शोचनीय पराजय के लिए कौन जिम्मेदार हैं और वे इस हार को किस भावना के साथ लेते हैं। भाजपा की मुख्यमंत्री पद की थोपी उम्मीदवार किरण बेदी ने तो नतीजे आते साथ ही यह कहकर अपने आपको बरी कर लिया कि यह उनकी हार नहीं है; उन्होंने लगे हाथ भाजपा को आत्मचिंतन करने की सलाह भी दे डाली है। उसका जो गूढ़ार्थ है उसे हम शायद जानते हैं, लेकिन सिर्फ इतना कहने से सुश्री बेदी अपनी जिम्मेवारी से नहीं बच सकतीं। यह उनकी दबी हुई महत्वाकांक्षा तो थी जिसने उन्हें अरविन्द केजरीवाल का साथ छोड़ भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के लिए उकसाया। वे धूमकेतु की तरह प्रकट हुईं और टूटे हुए तारे की तरह विलीन हो गईं। तथापि उन्होंने पार्टी में बने रहने की घोषणा की है इसलिए संभावना बनती है कि आगे- पीछे उनकी सेवाओं का कुछ और उपयोग कर लिया जाए!

जब किरण बेदी हार की जिम्मेदारी पार्टी पर डालती हैं तो मानना चाहिए कि यह आरोप उन पर है जिन्होंने उनके लिए पार्टी में आने का मार्ग प्रशस्त किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह- इन दोनों में से किसकी यह सोच थी, यह हमें पता नहीं है, लेकिन दिल्ली के विधानसभा चुनाव भाजपा ने जिस बड़े लाव-लश्कर के साथ लड़े और स्वयं नरेन्द्र मोदी आगे बढ़कर नेतृत्व करते रहे, उसमें तो उनकी ही जिम्मेदारी सबसे पहले बनती है, ऐसी सोच मन में उठना स्वाभाविक है। अगर भाजपा के प्रधानमंत्री को बरी कर दिया जाए तब भी क्या पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को इस शर्मनाक हार की नैतिक जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते हुए अध्यक्ष पद से इस्तीफा नहीं दे देना चाहिए? उन्हें लोकसभा में उत्तरप्रदेश में जीत का श्रेय देते हुए अध्यक्ष पद सौंपा गया था जबकि पार्टी के बड़े-बड़े नेता दरकिनार कर दिए गए थे। तो जिस व्यक्ति को जीतने पर पुरस्कार मिला हो, हारने के बाद उससे और क्या उम्मीद की जाए?

ऐसा समझ आता है कि भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली के चुनावों में शुरु से ही अपने पत्ते गलत खेले। पार्टी को हरियाणा विधानसभा में अवश्य पूर्ण बहुमत मिला, किन्तु महाराष्ट्र व जम्मू-काश्मीर में नतीजे उसकी अपेक्षानुरूप नहीं आए। इसके बाद भाजपा को अहंकार छोड़ आत्ममंथन करना चाहिए था, जो उसने नहीं किया।  इसके बजाय वह उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल तथा अन्य गैर-भाजपाई प्रदेशों में लगातार प्रत्यक्ष और परोक्ष वहां की सरकारों को अस्थिर करने के काम में जुटी रही। संघ परिवार के विभिन्न अभिकरणों ने इसमें योगदान करने में कोई कमी नहीं की। आत्ममुग्धता की स्थिति में पहुंचकर भाजपा दिल्ली की जमीनी हकीकत का सही आकलन नहीं कर सकी। 2013 में डॉ. हर्षवर्धन के नेतृत्व में भाजपा 32 सीटें लेकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी। डॉ. हर्षवर्धन बेदाग छवि के नेता हैं यह भी सबको पता है, लेकिन उनके साथ क्या व्यवहार किया गया? वे लोकसभा चुनाव जीते तो पहले उन्हें स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया, फिर एक तरह से अपमानित कर उनका विभाग बदल दिया गया। यह शायद पार्टी की पहली गलती थी।

यदि भारतीय जनता पार्टी लोकसभा चुनावों के चार-पांच माह के भीतर दिल्ली के चुनाव करा लेती और ये चुनाव दुबारा डॉ. हर्षवर्धन के नेतृत्व में लड़े जाते तब शायद ऐसी स्थिति नहीं होती। चुनावों में इतना विलंब क्यों किया गया, यह भी समझ से परे है। उपराज्यपाल नजीब जंग ने उचित समय में विधानसभा भंग करने की सिफारिश क्यों नहीं की, यह एक और पहेली है। फिर अगर मोदी-शाह युति को हर्षवर्धन रास नहीं आ रहे थे तो विजय गोयल या जगदीश मुखी ने ऐसा क्या अपराध किया था कि उनको किनारे कर दिया गया? विजय गोयल को तो मोदीजी एक समय मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत भी कर चुके थे। फिर किरण बेदी में ऐसी क्या खूबी नज़र आई कि उन्हें सबके सिर पर बैठा दिया गया? उन्हें कृष्णा नगर से ही चुनाव क्यों लड़ाया गया जहां वर्धन अपने बेटे के लिए टिकट मांग रहे थे? पूरे घटनाचक्र का विश्लेषण करें तो अनुमान होता है कि दिल्ली के भाजपाईयों ने स्वयं पूरे मन से काम नहीं किया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवकसंघ में तो एकचालकानुवर्ती का सिद्धांत चलता ही है। केन्द्र सरकार में भी यही नीति लागू कर दी गई। मोदीजी ने अपने आगे बाकी सबको बौना सिद्ध करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पार्टी के अनेक दिग्गज मन ही मन दुखी हैं। केन्द्र सरकार के अधिकारियों-कर्मचारियों के बीच भी शासन की रीति-नीति को लेकर लगातार असंतोष बढ़ रहा है। जहां तक आम जनता की बात है तो वह मोहन भागवत से लेकर साक्षी महाराज और साध्वी प्रज्ञा आदि के कुवचनों से तथा देश में जगह-जगह  सांप्रदायिकता के उभार जैसे दिल्ली में एक के बाद एक गिरिजाघरों में तोडफ़ोड़, लव जेहाद, जैसे कृत्यों से खुद को आहत व ठगा हुआ महसूस कर रही है। उसने मोदीजी को सुशासन के लिए वोट दिया था, इन कामों के लिए नहीं।

ऐन चुनाव के दौरान ही अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा करवा के शायद मोदीजी ने सोचा होगा कि अब तो किला फतह हो गया, लेकिन उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया। श्री ओबामा ने दिल्ली से रवाना होने के तुरंत पहले तथा वाशिंगटन लौटते साथ ही भारत में सांप्रदायिकता फैलने पर जो चिंता व्यक्त की है उससे यह समझ आ जाना चाहिए कि भारत यदि वैश्विक पूंजीवादी अर्थतंत्र का हिस्सा बनना चाहता है, तो यह तभी हो सकता है जब देश धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर चले और वहां मानवाधिकारों की रक्षा की जाए। आप अठारहवीं सदी की सोच लेकर इक्कीसवीं सदी में विश्व विजय नहीं कर सकते। हमारा ख्याल है कि मोदीजी बराक-बराक कहकर और दस लाख का सूट पहनकर भले ही खुद को धन्य मान रहे हों, इसे भी देश की जनता ने स्वीकार नहीं किया। हमें तो यह तक प्रतीत होता है कि वैश्विक पूंजी का मोदीजी से मोहभंग होने लगा है, इसलिए अब उन्होंने केजरीवालजी पर दाँव लगाया है।

कुछ बात कांग्रेस की भी। उसकी गल्तियों का भी कोई अंत नहीं है। अरविन्द सिंह लवली मौजूदा हालात में अपना काम ठीक ही कर रहे थे, उन्हें चुनाव क्यों नहीं लडऩे दिया गया? वे पिछले सदन में पार्टी के नेता थे, इस बार भी होते। उन्हें हटाकर अजय माकन को क्यों लाया गया? जब श्री माकन केन्द्र की राजनीति में जा चुके हैं, तो फिर प्रदेश में लौटने की ऐसी क्या आवश्यकता थी? क्या ऐसा इसलिए हुआ कि लवली शीला दीक्षित समर्थक माने जाते हैं और माकन उनके घोर विरोधी रहे हैं? शीलाजी तो अपने पुत्र संदीप दीक्षित सहित पहले से ही धराशायी थीं। उनकी तरफ इतना ध्यान देने की जरूरत ही कहां थी? श्री माकन को लाना ही था तो आठ महीने पहले कमान दे दी जाती। बहरहाल कांग्रेस के लिए खुशी की बात है कि भाजपा को इस बुरी कदर पराजय मिली। पुरानी कहावत है- ''नकटे की नाक कटी मेरी सवा हाथ बढ़ी।" यह तय है कि कांगे्रस के बहुत से वोटरों ने आप पार्टी को इसलिए चुना ताकि भाजपा को रोका जा सके।

अब सवाल उठता है कि देश की राजनीति पर इन चुनाव परिणामों का क्या असर होगा? यदि भारतीय जनता पार्टी अब भी अपनी रीति-नीति में सुधार करने के लिए तैयार हो तो वह अपने पूर्ण बहुमत के आधार पर संविधान की मर्यादा के अनुसार देश को सुशासन दे सकती है, किन्तु क्या वह ऐसा करने में समर्थ है? अभी बजट सत्र में ही इसकी परीक्षा हो जाएगी। क्या वह एक जनोन्मुखी बजट लाएगी या फिर कारपोरेट घरानों के इशारों पर नाचती रहेगी? दूसरे,क्या सरकार भूमि अधिग्रहण कानून जैसे अध्यादेशों को वापिस लेगी या फिर हठधर्मिता का परिचय देगी? राजनैतिक मोर्चे पर सबसे पहले बिहार में उसे राजनैतिक विवेक का परिचय देना होगा।  यह देखना होगा कि भाजपाई राज्यपाल नीतीश कुमार को सरकार बनाने आमंत्रित करते हैं या फिर भाजपा जीतनराम मांझी की नाव को ही धक्का लगाने की कोशिश करती रहेगी।

दिल्ली में 'आप' की विजय प्रथम दृष्टि में जनतंत्र की विजय है। अगर केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा इस सत्य को स्वीकार कर लेती है तो ठीक अन्यथा उसकी राह आगे भी सुगम नहीं है।
देशबन्धु में 12 फरवरी 2015 को प्रकाशित

Wednesday, 4 February 2015

ओबामा यात्रा के पांच अध्याय

 


 अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत आए और चले गए। उनकी इस यात्रा को मुख्य तौर से पांच अध्यायों में बांटकर देखा जा सकता है। प्रथम अध्याय है- गणतंत्र दिवस समारोह में विशिष्ट अतिथि के रूप में उनकी उपस्थिति। यह अभूतपूर्व है कि कोई अमेरिकी राष्ट्रपति अपने कार्यकाल में दूसरी बार भारत आया हो। यह यात्रा इस नाते और महत्वपूर्ण हो जाती है कि राष्ट्रपति ने अपने पारंपरिक देश के नाम संदेश प्रसारण की तारीख बदली ताकि वे 26 जनवरी को दिल्ली में मौजूद रह सकें। जब से गणतंत्र दिवस परेड का आयोजन हो रहा है तब से प्रतिवर्ष किसी राष्ट्रप्रमुख या शासन प्रमुख को आमंत्रित करने की परिपाटी चली आ रही है, किन्तु आज तक अमेरिका के राष्ट्रप्रमुख को न्यौता नहीं दिया गया। कहते हैं कि पी.वी. नरसिम्हा राव बिल क्लिंटन को बुलाना चाहते थे किन्तु वे अपने देश के नाम संदेश की तारीख बदलने के लिए राजी नहीं थे। इस एक अपवाद को छोड़कर हमने कभी न्यौता क्यों नहीं भेजा तो इसके पीछे कोई कारण अवश्य रहा होगा। अमेरिका के साथ भारत के राजनैतिक संबंध कभी बहुत मधुर नहीं रहे। हम कैसे भूल जाएं कि अमेरिका ने काश्मीर के मसले पर संयुक्त राष्ट्र संघ में लगातार पाकिस्तान का साथ दिया। हमारी गुटनिरपेक्षता की नीति भी अमेरिकी सोच के विपरीत थी। अब इस स्थिति में काफी बदलाव आ चुका है।  दूसरे, अमेरिका के राष्ट्रपति की खातिरदारी करना अपने आप में एक बड़ा सरदर्द है। मोदी सरकार को उनकी सुरक्षा के लिए रखी गई हर शर्त मंजूर करना पड़ी। मैं तुलना करना चाहता हूं कि जब सोवियत संघ से ख्रुश्चेव और बुल्गानिन भारत आए तो पंडित नेहरू ने उन्हें अपने साथ खुली गाड़ी में घुमाया। और जब पंडितजी वहां गए तो उन नेताओं ने भी अपनी सुरक्षा व्यवस्था को तोड़कर नेहरूजी को उसी तरह खुली कार में घुमाया।

दूसरे अध्याय में भारत-अमेरिका आण्विक करार की चर्चा होगी। यह मसला दो-तीन साल से अटका हुआ था। डॉ. मनमोहन सिंह जिन शर्तों पर करार करना चाहते थे उन शर्तों पर प्रमुख विपक्षी दल के नाते भारतीय जनता पार्टी ने कड़ा विरोध किया था, लेकिन अब जिस समझौते पर हस्ताक्षर हुए हैं उसमें लगभग वही बातें हैं जो पुराने मसौदे में थीं। जिस तरह मोदी सरकार मनमोहन सरकार की अनेक पुरानी योजनाओं को नाम बदल-बदल कर चला रही है और प्रचार के बल पर वाहवाही लूटने की कोशिश कर रही है वही हकीकत इस करार को लेकर भी है। विशेषज्ञों की राय न तो उस समय अनुकूल थी और न इस समय। भारत ने रूस के साथ भी आण्विक दुर्घटना की स्थिति में मुआवजे का जो करार रूस के साथ किया है, उसमें सारी जिम्मेदारी आपूर्तिकर्ता की है जबकि श्री ओबामा की यात्रा के समय हुए करार में आपूर्तिकर्ता की जिम्मेदारी मात्र पचास प्रतिशत है, शेष पचास प्रतिशत भारत सरकार के मत्थे। इसके लिए सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनियां साढ़े सात सौ करोड़ का प्रावधान करेंगी। याने जनता की जेब से पैसा जाएगा। यह तर्क समझ नहीं आता। जो अमेरिकी कंपनी संयंत्र लगा रही हैं और चलाएंगी, किसी भी आकस्मिक स्थिति में जिम्मेदारी शत प्रतिशत उन पर ही होना चाहिए। उपभोक्ता पर बोझ क्यों डाला जाए। इससे जुड़ा एक अवांतर मुद्दा भी है कि अमेरिका हमें अपने कबाड़ हो गए परमाणु संयंत्र बेच रहा है जबकि वह अपने देश में ऊर्जा के स्वच्छ, सस्ते और बेहतर उपायों के उपक्रम में निरंतर लगा हुआ है।

अब हम आते हैं तीसरे अध्याय पर। भारत ने अमेरिका के साथ सुरक्षा के मुद्दों पर राष्ट्रपति ओबामा की यात्रा के दौरान जो बहुसूत्रीय समझौता किया है उसकी कुछ धाराएं विशेषकर धारा-36 आशंका उपजाती है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इसके लागू हो जाने के बाद भारत के जितने भी सैनिक प्रतिष्ठान हैं वे सब अमेरिका की निगरानी में अपने आप आ जाएंगे। अगर ऐसा है तो यह एक गंभीर घटना होगी। यह तो हम जानते हैं कि भारत पिछले बीस साल से बल्कि उसके पहले से भी अमेरिका और उसके पिठ्ठू इ•ाराइल के साथ सैन्य मामलों में लगातार सहयोग बढ़ाते आया है। यही वजह है कि आज भारत इ•ारायली शस्त्रास्त्र का ग्राहक नंबर-1 बन चुका है। इस बढ़ती हुर्ई दोस्ती की जो कीमत हमें देश में फैल रही आंतरिक अशांति के रूप में चुकाना पड़ रही है उससे हमारा सत्तातंत्र जानबूझ कर अनभिज्ञ बना हुआ है। हम काश्मीर के मसले पर अमेरिकी रुख देख ही चुके हैं। यह भी कैसे भूला जाए कि बंगलादेश युद्ध के समय अमेरिका ने अपने सातवें बेड़े का इंटरप्राइज नामक युद्धपोत हिन्द महासागर में भेजकर भारत को घुड़काने की कैसी कोशिश की थी। हम मानते हैं कि परिस्थितियां बदलती हैं, लेकिन नये माहौल में, नये मित्रों पर आंख मूंद कर विश्वास किस हद तक किया जा सकता है? अभी जो रिपोर्टें आ रही हैं उनके अनुसार रूस और चीन दोनों इस कारण से भारत से नाखुश हैं। हम चीन को कुछ देर के लिए छोड़ दें, लेकिन रूस के साथ भारत के परस्पर गहरे संबंध रहे हैं और उस ओर ध्यान न देना दुर्भाग्यपूर्ण होगा।

यह सवाल चौथे अध्याय में उठता है कि क्या राष्ट्रपति ओबामा प्रधानमंत्री मोदी के निमंत्रण मात्र पर भारत चले आए? सच बात यह है कि बराक ओबामा के दूसरे कार्यकाल के अब मात्र दो साल बचे हैं। अमेरिकी संसद की दोनों सदनों में विपक्षी रिपब्लिकन पार्टी का बहुमत है। संभावना बनी है कि अगला राष्ट्रपति भी कहीं उनका न बन जाए। डेमोक्रेटिक पार्टी से संभवत: हिलेरी क्लिंटन अगली उम्मीदवार होंगी। ओबामा के लिए जरूरी है कि वे अपनी पार्टी के पक्ष में माहौल तैयार करें। इसके लिए अमेरिका के व्यवसायिक हितों पर ध्यान देना उनके लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। इसलिए हमारे प्रधानमंत्री चाहे जितनी मेक इन इंडिया की बात करें अमेरिकी राष्ट्रपति ने तो स्पष्ट कर दिया है कि वे भारत में भांति-भांति के उपक्रमों में पूंजी निवेश कर अपने उद्योग जगत के लिए मुनाफा कमाने की संभावनाएं टटोल रहे हैं। दूसरी तरफ वे भारतीय पूंजीपतियों को अमेरिका में निवेश के लिए बुला रहे हैं ताकि उनके यहां रोजगार के नए अवसर सृजित हो सकें। याने श्री ओबामा अपने दोनों हाथों में लड्डू रखना चाहते हैं और मुंह में भी। इसमें भारत को क्या लाभ होगा यह अभी मेरी समझ में नहीं आ रहा है। हम एफडीआई का किसी हद तक समर्थन करते रहे हैं, लेकिन उससे अगर हमारे देश में रोजगार न बढ़े, उल्टे मुनाफे का बड़ा हिस्सा निवेशक देश में चला जाए तो फिर ऐसा उद्यम किस काम का?

अमेरिका के राष्ट्रपति ने स्वदेश रवाना होने के पहले सिरीफोर्ट सभागार में जो व्याख्यान दिया उसकी बहुत चर्चा हो रही है। यह पांचवां अध्याय है। श्री ओबामा ने महात्मा गांधी को याद किया और मार्टिन लूथर किंग को। उन्होंने स्वामी विवेकानंद को याद करते हुए भारत के भाइयों और बहनों कहकर संबोधित किया।  इसके बाद उन्होंने भारत में सामाजिक सद्भाव, साम्प्रदायिक एकता, सामाजिक न्याय, समान अवसर आदि पर काफी बातें कीं तथा शाहरुख खान, मिल्खा सिंह, मैरीकॉम व कैलाश सत्यार्थी- इन चार विभिन्न धर्म के लोगों की आदर्श के रूप में श्रोताओं के सामने प्रस्तुत किया। निश्चित रूप से अमेरिकी राष्ट्रपति अपना होमवर्क ठीक से करके आए थे। उनका भाषण जिसने भी लिखा वह कोई समझदार भारत विशेषज्ञ ही रहा होगा। इस भाषण में उन्होंने एक ओर तो यह संदेश दिया कि भारत-अमेरिका दोस्ती तभी मजबूत हो सकेगी जब भारत अपने संविधान में निहित मूल्यों पर कायम रहेगा। दूसरी ओर इस बहाने उन्होंने पाकिस्तान से लेकर लीबिया-अल्जीरिया तक को आश्वस्त किया है।

इस पुस्तक में एक अध्याय परिशिष्ट के रूप में जोड़ा जा सकता है। प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति ओबामा को बार-बार उनके प्रथम नाम बराक से संबोधित किया, यह बात गले नहीं उतरी और इसकी खूब आलोचना हो रही है जो उचित है। राजनयिक शिष्टाचार की अपनी शर्तें होती हैं जिनका पालन करने की अपेक्षा प्रधानमंत्री से की जाती थी। श्री ओबामा ने एक बार भी श्री मोदी को नरेन्द्र कहकर संबोधित नहीं किया। वे उन्हें मिस्टर प्राइम मिनिस्टर ही कहते रहे। ठीक भी है। दोनों के बीच आपसी संबंधों में गर्माहट है भी तो वह राजनैतिक धरातल पर है। उसमें व्यक्तिगत मित्रता जैसी कोई बात नहीं है। मार्गे्रट थैचर और रोनाल्ड रीगन ने भी सार्वजनिक मंच पर एक-दूसरे को प्रथम नाम से संबोधित नहीं किया था। इसी तरह श्री मोदी ने एक तो जो दस लाख का सुनहरे धागों में बुना अपने नाम का सूट पहना और दूसरे दिन में जो चार-चार बार कपड़े बदले यह बात भी आम जनता को पसंद नहीं आई। श्री मोदी न तो अमिताभ बच्चन हैं और न वे कौन बन गया करोड़पति के सेट पर थे जहां उन्हें अपना बार-बार परिधान बदलने की आवश्यकता होती। ऐसा उन्होंने क्यों किया? क्या इसकी सलाह उनके छवि निर्माताओं ने दी थी? या फिर वे भारत के नवधनाढ्य वर्ग तथा 'डोन्ट वरी बी हैप्पी' युवाओं को कोई सूक्ष्म संदेश देना चाहते थे?
देशबन्धु में 5 फरवरी 2015 को प्रकाशित

Friday, 30 January 2015

प्रकृति से प्यार की एक पुस्तक


 मेरे सामने एक नई पुस्तक है, आकर्षक मुखपृष्ठ, चिकने पन्ने, उम्दा छपाई, रंगीन तस्वीरें, लालित्यपूर्ण भाषा और विषय भी एकदम नया। ऐसा विषय जिस पर अमूमन हिन्दी में किताबें नहीं लिखी जातीं। लेखक हिंदी जगत के लिए लगभग अपरिचित व्यक्ति हैं- शिक्षा से चिकित्सक, पेशा डॉक्टरी छोड़कर अखबार प्रबंधन, रुचि से प्रकृति प्रेमी और कवि तो नहीं, किन्तु अवश्य ही कवि-हृदय।

पुस्तक के शीर्षक से विषय परिचय हो जाएगा- ''विकराल वनांचलों की विभीषिकाओं में एक वनप्रेमी"। विकराल और विभीषिका जैसे शब्द सुनकर डर लग सकता है; यह अंदाज हो सकता है कि यह जंगल महकमे के किसी अधिकारी या किसी शिकारी के लोमहर्षक अनुभवों की कथा है। वास्तव में ऐसा है नहीं, यह तो लेखक ने आलंकारिकता के मोह में पड़कर पाठक को कुछ पलों के लिए भ्रमित कर दिया है। पुस्तक में वनप्रेमी के अनुभव तो हैं, लेकिन वे आपको प्रकृति और वनराशि के निकट ले चलते हैं, उनसे साक्षात्कार करवाते हैं, वन्य पशुओं, पक्षी जगत और जलचरों से परिचय पाने के लिए आमंत्रित करते हैं। उनके साथ साहचर्य स्थापित करने, उनका सम्मान करने, उनकी सुरक्षा करने के लिए प्रेरित करते हैं।

आइए, लेखक से भी आपको मिलवाएं। डॉ. सुरेन्द्र तिवारी भोपाल के निवासी हैं। वन्यजीवन में लंबे समय से आपकी रुचि रही है। जब समय मिला, जंगल की सैर पर निकल पड़े। इसी शौक के चलते आज मध्यप्रदेश और अन्यत्र एक वन्यजीवन विशेषज्ञ के रूप में जाने जाते हैं। यूं तो देश में इस अनुशासन के अध्येताओं/विशेषज्ञों की कमी नहीं है, लेकिन उनमें से कितने हैं जो अपने ज्ञान और अनुभवों को लिपिबद्ध करने में रुचि रखते हैं? जो लिखते हैं तो उनमें भी अधिकतर अंग्रेजी में। हो सकता है कि कुछेक ने अन्य भारतीय भाषाओं मे लिखा हो, उन्हें हम नहीं जानते। ऐसे लेखकों को उंगलियों पर गिना जा सकता है, जिन्होंने हिन्दी में प्राणीजगत और वन्य जीवन पर संस्मरण लिखे हों। एक नाम अवश्य याद आता है- रमेश बेदी का। उन्होंने वन्य पशुओं पर काफी लिखा है, सरल भाषा में, एक समय उनकी किताबें काफी लोकप्रिय हुई थीं, उस दौर में जब पुस्तकें पढ़ी जाती थीं। सुरेन्द्र तिवारी ने उनके काम को न सिर्फ आगे बढ़ाया है, बल्कि उसके क्षेत्र को विस्तृत किया है और प्रस्तुति भी बेहतरीन तरीके से की है। बेदीजी का साथ उनके पुत्रों ने दिया तो यहां श्रीमती तिवारी हाजिर हैं, जिन्हें लेखक कभी साथिन, कभी संगिनी लिखकर मधुरता से संबोधित करते हैं। श्री बेदी व श्री तिवारी के बीच मुझे याद आता है कि जानी-मानी लेखिका लीना मेहंदेले ने भी पशुजगत को लेकर आत्मीय भाव से परिपूर्ण संस्मरण लिखे हैं।

डॉ. सुरेन्द्र तिवारी इसके पूर्व एक और पुस्तक लिख चुके हैं जिसका शीर्षक ज्यादा सटीक है- ''एक प्रकृति प्रेमी के प्रेरक प्रसंग"। उनकी दूसरी पुस्तक भी ऐसे ही प्रसंगों से भरपूर है जो पाठक के मन में एक अलग तरह की प्रेरणा जगाते हैं। इस पुस्तक में चौबीस अध्याय हैं जिनमें से तेरह भारत पर और ग्यारह विदेशों में की गई यात्राओं पर आधारित हैं।  लेखक उस तरह का प्रकृति प्रेमी नहीं है जिनकी भरमार आज देखी जा रही है। वाइल्ड लाइफ टूरिज्म और इको टूरिज्म आदि के नाम पर पांच सितारा होटलों व पर्यटन उद्योग ने जो प्रपंच खड़ा किया है उसके चलते ही यह भीड़ इकट्ठा हुई है। जंगल, पहाड़, समुद्र, रेगिस्तान सब देखना है, लेकिन अपनी शर्तों पर और हड़बड़ी में। ऐसे पर्यटकों का एकमात्र लक्ष्य होता है कि यात्रा से लौटकर आएं और सबको बताएं कि वे शेर देखकर आए हैं। इन्हें पर्यटन स्थल पर हर तरह की सुविधा की दरकार होती है, उनके बिना वे रह नहीं सकते, जो कुछ देखकर लौटते हैं उसकी तस्वीरें परिचितों को पोस्ट करते हैं और शायद किसी हद तक ग्लानि से मुक्त हो बताने की कोशिश करते हैं कि देखो, हम भी प्रकृति प्रेमी हैं।

डॉ. सुरेन्द्र तिवारी के संस्मरणों में एक अपवाद स्वरूप व्यक्तित्व उभरकर आता है। वे उड़ीसा की विश्व प्रसिद्ध चिलिका झील पर पहुंचते हैं तो स्वाधीनता सेनानी कवि गोपबंधु दास की कविता उद्धृत करते हैं- ''एक पल को रुको, क्या तुम रुकोगे, ओ अग्नि रथ? मुझे इस सौंदर्य को जी भर करके देख लेने दो, चिलिका के इस विहंगम दृश्य को। मुझे तो ऐसा लग रहा है मानो ये तो कोई स्वप्न-चित्र है, सत्य नहीं। क्या इस धरती पर कोई इतनी सुन्दर चीज हो सकती है? आह! ये वेदना शून्य वाहन, जो मुझे यहां से इतनी लापरवाही से भगाए लिए जा रहा है। जहां चट्टानों, शिलाओं और वृक्षों से मेरी दृष्टि अवरुद्ध हो रही है- मेरे और चिलिका के बीच और इतने सुन्दर न•ाारों को बार-बार ओझल कर देती है। ये कभी दिखाई देते हैं और कभी मेरी नजर से दूर हो जाते हैं। वैसे ही जैसे अपने अति प्रिय के सपनों में दर्शन होते हैं और ओझल हो जाते हैं। मेरी आत्मा तो हमेशा-हमेशा से इस सुंदरता की प्यासी ही रही है। अपने अति व्यस्त समय में से भी मैंने यह योजना बनाई थी कि मैं तुम्हारे किनारों पर नितान्त अकेला ही टहलूंगा और इस सुंदरता का पान करूंगा ओ मेरी प्यारी चिलिका"। वे पुस्तक के इस पहले ही लेख में चिलिका की शोभा का वर्णन करते हैं लेकिन वहीं उन्हें यह चिंता भी सताती है कि मछली और झींगे के व्यापार के चलते वृक्षों की कटाई और गाद भरने से झील को कितना नुकसान हो रहा है। यहां वे राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त को उद्धृत करते हैं कि ''शौकीन मानव ने इतने पशु-पक्षी मारकर खा डाले हैं कि तैरने वालों में सिर्फ नाव, उडऩे वालों में सिर्फ पतंग और चौपायों में सिर्फ खाट ही शेष बची है।"

उड़ीसा के ही भीतरकनिका अभ्यारण्य के पूरे परिवेश का वे सजीव चित्रण करते हैं। प्रकृति की एक अद्भुत लीला के बारे में बताते हैं कि कैसे हजारों किलोमीटर दूर से आलिव रिडले नामक समुद्री कछुए यहां के समुद्रतट पर हर साल आते हैं। लाखों कछुए पानी से बमुश्किल पैंतालिस मिनट के लिए बाहर निकलते हैं, घोंसले बनाते हैं, अंडे देते हैं, वे भी रात के समय और फिर तुरंत लौट जाते हैं। इसी लेख में वे बतलाना जरूरी समझते हैं कि उड़ीसा के समुद्रतट वासियों से लेकर चीन तक इन अंडों का बाजार कैसे फैला हु्आ है जिसके कारण कछुओं की संख्या में लगातार कमी आ रही है। वे कछुए के साथ प्रकृति के आदिम संबंध की भी चर्चा करते हैं और विश्व में इन्हें बचाने की पहल का भी। वे एक अन्य उद्धरण देते हैं कि  ''आज हम उस दोराहे पर खड़े हैं जहां से एक राह तो इन पुरातन जीवों को बचाने के लिए जाती है और दूसरी उन्हें हमेशा-हमेशा के लिए खो देने के लिए।"

उड़ीसा के समुद्र तट से लेखक हमें हिमाचल प्रदेश ले जाते हैं। हिमालय की कुल्लू घाटी में, उत्तराखंड के कतरनिया घाट में, ऊपर नेपाल तक। वे अपने घर मध्यप्रदेश के मढ़ई अभ्यारण्य में भी ले चलते हैं, राजस्थान के केवलादेव पक्षी अभ्यारण्य में, महाराष्ट्र के भीमाशंकर में, कर्नाटक के दांड़ेली में, कच्छ के पिरोटन द्वीप में जिसकी जानकारी सामान्य तौर पर लोगों को कम है और भारत के अंतिम छोर अंडमान निकोबार में भी। जब ऐसी-ऐसी यात्राएं कर रहे हैं तो कुछ न कुछ मुश्किलें भी पेश आना ही है। परिणामस्वरूप जब वे पिरोटन में जाते हैं जो कि एक समुद्री अभ्यारण्य है तो वहां बीच समुद्र में शून्य तापमान पर रात बिताने की नौबत आती है,  तो किसी दूसरी यात्रा में सामने बाघ आकर खड़ा हो जाता है और शायद लेखक को अपना दोस्त समझकर छोड़ देता है!

इस पुस्तक में दिए संस्मरणों में ऐसी अनूठी विविधता है जो पाठक को लगातार आनंदित करती है। लेखक चूंकि सिद्धहस्त फोटोग्राफर हैं तो उनकी ही खींची हुई सैकड़ों रंगीन तस्वीरें इस आनंद को दोगुना करती हैं। एक सामान्य शहरी व्यक्ति अपने आसपास के चिडिय़ाघर में जो पशु-पक्षी हैं उनको ही देख पाता है, उसके आगे देखने का न तो शायद समय मिलता, न ही कोई ललक होती। बहुत हुआ तो डिस्कवरी चैनल पर कोई कार्यक्रम देख लिया। लेकिन यहां तो सुरेन्द्र जी हमारे सामने एक पूरा एलबम खोलकर रख देते हैं। उसमें कहीं समुद्र तट पर कछुओं के नष्ट हुए असंख्य अंडों का चित्रण है तो कहीं लम्बी पूंछ वाली गिलहरी शेकरू, कहीं छलांग भरती कोयटी लोमड़ी है, तो कहीं पेड़ पर चढ़ी चींटीखोर पेंगोलिन। इन चित्रों को देखिए, इनके साथ दिए गए विवरण को पढि़ए और मन को प्रसन्न कीजिए।

वे केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान के वृत्तांत में साइबेरिया से आए प्रवासी पक्षियों से हमें परिचित कराते हैं। हमें पता चलता है कि सारस पक्षी अपने जीवन साथी का वियोग नहीं सह पाता। दोनों में से कोई एक मर जाए या खो जाए तो दूसरा विरह में तड़प-तड़प कर जान दे देता है। वे हमें यह भी बताते हैं कि ये पक्षी अपना यात्रा पथ कैसे तय करते हैं और फिर उनकी स्वतंत्र दिनचर्या का इन शब्दों में वर्णन करते हैं जिन्हें पढ़कर हमें शायद पक्षियों से ही ईष्र्या होने लगे- ''इन प्रवासी पक्षियों को एक देश से दूसरे देश जाने के लिए न तो कोई पासपोर्ट चाहिए न ही कोई वीसा या कोई वाहन। ये पक्षी कोई राजनीतिक बंधन में भी नहीं बंधते और जहां इनकी मर्जी, जहां सुरक्षा व उत्तम भोजन मिले, उसे ही अपना ठौर-ठिकाना बना लेते है। घने में उगी घास की जड़ें इनका प्रिय भोजन है। छिछले पानी में खड़े ये अपना भोजन तलाशते रहते हैं। इनका नृत्य देखना भी एक अत्यंत दुर्लभ और अतुलनीय आनंददायक अनुभव है। नृत्य के दौरान इनकी आवाज से ऐसा भ्रम होता है जैसे कहीं कोई मीठी बांसुरी बजा रहा है।"

हमारे प्राणीविद् लेखक नेपाल के बरदिया राष्ट्रीय उद्यान की सैर करते हैं ताकि वहां के वासी राजा गज नामक हाथी को देख सकें, जिसके दांत दुनिया के सारे हाथियों से ज्यादा लंबे हैं। इस परिवेश का वृत्त लिखते हुए लेखक इन शब्दों में अपने कवि हृदय का परिचय देता है:- अब महारात्रि अपनी चादर फैला रही थी, अपने आगोश में लेने के लिए, झींगुर, झिल्ली की झंकार ने अपना रात्रि संगीत आरंभ कर दिया था निशा प्रहरी का कर्तव्य निभाने के लिए। पंछी आवास वृक्षों पर रात्रि विश्राम के लिए बसेरा करने आने लगे थे। संध्या घाटी में उतर आई थी। समूचा महावन प्रगाढ़ निद्रा में अचेत होने को आतुर था और भय की छायाएं प्रतिक्षण मंडराने लगी थीं।"

प्रकृति के साथ लेखक ने जो तादात्म्य स्थापित कर लिया है वह उसे हमेशा परेशान करता है। वह चाहता है कि वन देवता और उसकी प्रजा दोनों की रक्षा होना चाहिए। वह बहुत व्यावहारिक होकर कहता है कि मनुष्य और वन पशु के बीच की लड़ाई तभी समाप्त हो सकती है जब राज्य याने सरकार इसमें प्रभावी ढंग से हस्तक्षेप करे। हाथियों पर मुख्यत: केन्द्रित इस लेख में वह हाथियों पर फिल्म बनाने वाले विश्वप्रसिद्ध माइक पांडे को उद्धृत करता है- ''वन्य जीवन से लगाव ऐसा होता है मानो जंगल से शादी रच ली हो और यह तो एक ऐसा रोग होता है जिसे तुम अपने खून से कभी बाहर नहीं निकाल सकते हो।"

सुरेन्द्र तिवारी भारत में अंडमान निकोबार तक जाते हैं तो सात समुंदर पार सुदूर उत्तर में अलास्का भी हो आते हैं। वे देश के भीतर कतरनिया घाट की यात्रा करते हैं तो अमेरिका का यलोस्टोन नेशनल पार्क भी उन्हें अपनी ओर खींच लेता है। ऐसा सैलानी अफ्रीका न जाए, ऐसा हो ही नहीं सकता तो वे केन्या-तंजानिया में सेंरगेटी और मसाईमारा अभ्यारण्य के भी अनुभव हासिल करते हैं। इन सारे विवरणों में जो विशेष बात है वह यह कि इनकी भाषा कवि सुलभ है। लेखक स्वयं अपने विचार आलंकारिक शब्दावली में व्यक्त करता है और उसे जहां भी उचित लगता है वहां अन्यों से उद्धरण लेने में संकोच नहीं करता। मिसाल के तौर पर एक जगह वह देश के जाने-माने बाघ विशेषज्ञ बिली अर्जुनसिंह का कथन दोहराता है- वन्य प्राणियों के लिए कोई स्वर्ग या नरक नहीं होता सिवाय उसके जिसे मनुष्य ने बनाया है। वह पक्षी वन में जाता है तो इन शब्दों में अपने भाव व्यक्त करता है- ''परिंदे अब भी पर तौले हुए हैं, हवा में सनसनी घोले हुए हैं।"

इसी तरह एक स्थान पर वह लिखता है- ''हिमालय की तराई के गहन वन में धंसे दबे हुए एक पुरातन जंगल ग्रंथ का फडफ़ड़ाता पृष्ठ है कतरनिया घाट जिसके हर सफे पर वन्य जीवन के जीवंत हस्ताक्षर हैं।" दूसरी ओर दांडेली में वह कहता है- ''वन देवता को अप्रसन्न करने का एक भी कार्य वहां न होना चाहिए। वन भूमियां सौंदर्य के अक्षय भंडार हैं, अहिंसा, प्रेम और शांति के प्रतीक हैं, वैराग्य के उद्दीपक हैं, आनंद के स्रोत हैं, पवित्रताओं के निकेतन हैं। उनके लिए हमारे हृदय में ऐसी ही सम्मान भावना रहनी चाहिए। तभी तो रस आएगा।" इस लेख का अंत वह इन पंक्तियों के साथ करता है-
''वो भयानक जंगलों को पार कर आया मगर,
आदमी था अपनी ही बस्ती में आकर डर गया।"

सुरेन्द्र तिवारी की एक और विशेषता है। वे वन्य जीवन को एकांगी दृष्टि से नहीं देखते बल्कि जो कुछ देख रहे हैं उसका व्यापक संदर्भों के साथ वर्णन करते हैं। वे पुराकथाओं का आश्रय लेते हैं, उन किंवदंतियों का भी उल्लेख करते हैं जो प्रसंग विषय से जुड़ी हुई है। ऐतिहासिक संदर्भों का भी हवाला देते हैं तथा भौगोलिक एवं प्राणीशास्त्रीय तथ्यों को भी रोचकता के साथ प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने जगह-जगह वन्य जीवन विशेषज्ञों के कथनों को दोहराया है तो हिन्दी तथा अन्य भाषाओं के कवियों की पंक्तियों को भी अपने विचारों के समर्थन में उठाकर उन्हें पुष्ट किया है। याने पुस्तक भले ही वन्यजीवन के संस्मरणों की हो, लेकिन भाषा शैली के चलते मानो यह एक कविता की किताब में बदल गई हो। एक जगह कहीं नदी किनारे बैठे उसे किसी कवि की ये पंक्तियां याद आती हैं-
बन जाओ तुम पत्थर मैं तुम पर,
फूल-फूल गिरता जाऊंगा,
तुम्हें कद ऊंचा इतना ऊंचा दूंगा कि,
तुम्हारी नीची आंखें पा जाऊंगा।
तो अंडमान के आदिवासी अंचल से लौटते हुए उन्हें महाकवि जयशंकर प्रसाद का स्मरण हो आता है-
''बांधकर तूफान अपनी मुट्ठियों में हम चले,
दोपहर के सूर्य जैसे इस धरा पर हम जले,
हम नदी की धार बनकर बह रहे,
उठ गए ऊपर गए, ऊंचाइयों से नभ तले।"

मैं इस पुस्तक पर चर्चा लेखक द्वारा उद्धृत दो कथनों से समाप्त करना चाहूंगा। एक जगह वह जॉन म्यूर नामक प्रकृतिविद् को उद्धृत करता है- ''जंगल की प्रत्येक यात्रा एक धार्मिक अनुष्ठान है और झरने का हर स्थान उसे बचाने का अध्यादेश।" दूसरा कथन विलियम हॉजलिट का है- ''मैं तो अपना सम्पूर्ण जीवन ही ऐसी यात्राओं में बिताना चाहता हूं, यदि मुझे एक और जीवन कहीं से उधार में मिल जाए अपने घर में बिताने के लिए।"
 अक्षर पर्व फ़रवरी 2015 अंक की प्रस्तावना 

Thursday, 29 January 2015

पॉलीथिन पर रोक: अधूरी पहल


 छत्तीसगढ़ की रमन सरकार ने प्रदेश में पॉलीथिन के निर्माण, विक्रय और उपयोग पर आंशिक प्रतिबंध लगा दिया है। पर्यावरण सुधार की दिशा में यह एक सही किन्तु अधूरा कदम है। यह हम जानते हैं कि पॉलीथिन झिल्लियों के उपयोग से बहुत सी परेशानियां खड़ी होती हैं। जहां-तहां पॉलीथिन के ढेर खड़े हो जाते हैं, नालियों की सफाई में बाधा उत्पन्न होती है, किसी के गले में फंस जाए तो मौत हो जाए, मवेशी के पेट में चले जाए तो उसकी भी मौत हो जाने का अंदेशा, किन्तु पॉलीथिन खासकर सस्ते हल्के झिल्लीनुमा बैग पर रोक लगा देने मात्र से समस्या का हल नहीं निकलने वाला। मैं कहूंगा कि यह एक आलस भरी सोच है। जो सामने दिख रहा है उसे बंद कर दो, लेकिन जो एकदम से दिखाई न दे उसकी तरफ झांकने की कोशिश भी न करो। यदि सरकार प्लास्टिक एवं अन्य वस्तुओं से हो रही पर्यावरण हानि को रोकना चाहती है तो उसे कुछ ठोस और कठोर कदम उठाना चाहिए अन्यथा यह पहल मोदीजी के स्वच्छ भारत मिशन जैसी दिखावटी मुहिम बनकर रह जाएगी।

चलिए, पहले प्लास्टिक की ही बात करते हैं। क्या सरकार के पास इस बारे में कोई आंकड़े या ठीक-ठाक अनुमान है कि पेयजल की बोतलों में प्लास्टिक की कितनी खपत होती है और प्रतिदिन कितनी बोतलें उपयोग के बाद सड़क पर या कूड़े के ढेर पर फेंक दी जाती हैं? इन बोतलों का निर्माण कहां होता है? क्या ये बाहर से आती हैं या छत्तीसगढ़ में बनती हैं? इनके निर्माण, विक्रय और उपयोग पर कैसे रोक लग सकती है? अगर पानी प्लास्टिक की बोतल में  न बिके तो किस पदार्थ से बने? सस्ता पेयजल तो प्लास्टिक के पाउच में भी बिक रहा है। क्या उस पर भी रोक लगायी गई है? होटलों में होने वाली सरकारी, गैर-सरकारी बैठकों में सौ, दो सौ और पांच सौ मिलीलीटर की बोतलें उपयोग में लाई जाती हैं। इसमें पानी की भी बर्बादी है और प्लास्टिक का उपयोग तो है ही। कुछ साल पहले मैंने नागपुर रेलवे स्टेशन पर देखा था- आर.ओ. या अन्य किसी मशीन से पानी शुद्ध कर यात्रियों को दिया जा रहा था। क्या ऐसी व्यवस्था प्रदेश के बड़े रेलवे स्टेशनों पर सरकारी दफ्तरों में एवं होटलों में नहीं हो सकती? इसमें प्लास्टिक की खपत में भी काफी कमी आएगी और बोतलबंद पानी खरीदने में पैसा भी बचेगा।

यही बात कोक, पेप्सी आदि शीतल पेय के बारे में व फलों के रस पर लागू होती है। इनमें भी कांच की बोतल छोड़ प्लास्टिक की बोतलों का चलन तेजी से बढ़ा है। पी लेने के बाद इन बोतलों का क्या उपयोग होता है? पेप्सी, कोक आदि के बाटलिंग संयंत्र छत्तीसगढ़ में अनेक स्थानों पर लगे हैं? क्या इन पर रोक लगाने का सरकार का कोई विचार है? अगर है भी तो विकल्प क्या है? क्या निर्माताओं को मजबूर किया जा सकता है कि वे कांच की बोतल या कागज के पैकेट का ही इस्तेमाल करें? आशंका होती है कि सरकार ने हिम्मत कर ऐसा निर्णय ले भी लिया तो कंपनियां हाईकोर्ट से जाकर स्टे आर्डर न ले आएं।

हमारी राय में सरकार को यह भी देखना चाहिए कि उसके दफ्तरों में प्लास्टिक का कितना उपयोग होता है। पुराने समय में कागज और पुट्ठे की फाइलें इस्तेमाल होती थीं, लेकिन आजकल प्लास्टिक की फाइल-फोल्डरों का उपयोग करना आम हो गया है। इस दिशा में पहल की जा सकती है कि प्लास्टिक की फाइलों की खरीद बिल्कुल न की जाए। इनके बजाय गत्ते या मोटे कागज से बनी फाइलों को बढ़ावा दिया जाए। जहां आवश्यक हो वहां जूट या कपड़े के कवर वाली फाइलें भी उपयोग में लायी जा सकती हैं। सभा-सेमीनार आदि में ऐसी आकर्षक फाइलों का उपयोग कभी-कभार देखने आता है। गैर-सरकारी क्षेत्र को भी इस दिशा में सोचना चाहिए।

26 जनवरी और 15 अगस्त को प्लास्टिक के तिरंगे बड़ी संख्या में बिकते हैं इन पर शायद रोक लगा दी गई है, किन्तु इसकी जांच करना बेहतर होगा कि प्लास्टिक के तिरंगे ध्वज न बनें, न बिकें। इनके साथ-साथ सजावट के लिए भी प्लास्टिक की झंडियां, तोरण और फूल आदि बनाए जाते हैं। यहीं नहीं, आजकल तो लोहे और टिन के होर्डिंग्स का स्थान भी प्लास्टिक के फ्लैक्स ने ले लिया है। नि:संदेह फ्लैक्स में कलाकारी ज्यादा अच्छे से होती है व इन्हें काफी जल्दी बनाया जा सकता है। लेकिन इनसे बने बैनर व होर्डिंग्स का बाद में क्या उपयोग होता है। अंत में जाकर ये भी कचरे के ढेर की ही शोभा बढ़ाते हैं। तो क्या यह संभव है कि वापिस पुराने नमूने के होर्डिंग्स पर लौटा जाए और पेंटरों को उनका व्यवसाय वापिस मिल जाए!

इसी सिलसिले में यह भी ध्यान आता है कि पॉलीथिन-झिल्ली का एक बड़ा दुरुपयोग शादी-ब्याह व अन्य समारोह में होता है। इसकी शुरुआत निमंत्रण पत्रिका से हो जाती है। इधर दसेक साल से निमंत्रण पत्र पर प्लास्टिक का आवरण चढ़ाने का शौक चल पड़ा है। यह मूर्खता भरा प्रयोग मालूम नहीं किसने शुरू किया। हाथ में कार्ड आए तो पहले झिल्ली हटाओ, फिर लिफाफा खोलो। यह झिल्ली भी कचरे की पेटी में ही पहुंचती है। फिर समारोह के दौरान प्लास्टिक के कप में चाय-काफी, प्लास्टिक के गिलास में पेयजल व शीतल पेय; औसत दर्जे के समारोह में प्लास्टिक के प्लेट में खाना याने इसका कोई अंत नहीं है। क्या सरकार प्रिटिंग प्रेसों को और कैटररों को रोक सकती है कि वे प्लास्टिक का उपयोग बिल्कुल भी न करें?

इसी तरह की एक और कवायद करने की जरूरत है। रेडीमेड कपड़ों की दुकानों से जो कचरा निकलता है उसकी तरफ सामान्यत: ध्यान नहीं जाता। सबसे ऊपर गत्ते का डिब्बा उसके भीतर प्लास्टिक में लिपटा रेडीमेड वस्त्र एवं उसमें टँकी ढेर सारी ऑलपिनें और लेबल, शर्ट के कॉलर के लिए कड़ा प्लास्टिक और न जाने क्या-क्या। मालूम नहीं इतना प्रपंच क्यों किया जाता है! ऐसे उदाहरण अन्य दूकानों पर भी मिल जाएंगे। इसमें अगर अपराधी की तलाश की जाए तो हमारी खोज पैकेजिंग इंडस्ट्री पर जाकर टिकती है।

जैसा कि आजकल सुबह-शाम कहा जाता है यह बाजार का समय है। बाजार अब ग्राहक की आवश्यकता पूर्ति के लिए नहीं है। उसकी निगाह तो ग्राहक की जेब काटना तो क्या, उसकी सारी जमा पूंजी हड़प लेने की है। इसीलिए बाजार दिनोंदिन ज्यादा लुभावना, ज्यादा आकर्षक होते जा रहा है। यह पैकेजिंग इंडस्ट्री की देन है। यहां सादगी से काम नहीं होता। जितना ज्यादा दिखावा उतना बड़ा डाका। बहरहाल यह तो जनता की समझने की बात है। वह जब समझेगी तब समझेगी। सवाल यह है कि सरकार अभी क्या करे। यहां सिर्फ छत्तीसगढ़ राज्य की बात नहीं है। यदि सरकारें स्वच्छ सुरक्षित पर्यावरण वापिस लाना चाहती हैं तो प्लास्टिक की झिल्लियों का निर्माण रोकने के अलावा और भी बहुत से काम करना पड़ेंगे। इसके समानांतर यह भी सोचना पड़ेगा कि प्लास्टिक के व्यवसाय में जो लोग जुड़े हुए हैं उनके रोजगार व रोजी दोनों का क्या होगा। समस्या कठिन है। प्लास्टिक का पुराना विकल्प कागज है, लेकिन कागज के लिए पेड़ कटते हैं। दूसरा विकल्प कांच है, किन्तु उसमें टूट-फूट ज्यादा है। ईंधन का इस्तेमाल और परिवहन की लागत ये दोनों समस्याएं कागज व कांच दोनों के साथ जुड़ी हैं। तब फिर क्या हो?

हमारी राय में यह सरकार का भी दायित्व है और बुद्धिजीवियों का भी कि वे अनावश्यक उपभोग के विरुद्ध जनता को सचेत करने के लिए निरंतर मुहिम चलाएं।  'यूज एंड थ्रो' याने उपयोग करो और फेंको की मनोवृत्ति उचित नहीं है। उसका हर स्तर पर विरोध होना चाहिए। जो भी समाज टिकाऊ विकास चाहता है, उसे टिकाऊ वस्तुओं का उपयोग करना सीखना होगा। आज ही कहीं खबर पढ़ी थी विश्व के एक प्रतिशत लोगों के पास दुनिया का पचास प्रतिशत धन हो गया है। इसका सीधा अर्थ है कि निन्यानबे प्रतिशत जनता को एक प्रतिशत लुटेरों के साथ लडऩे के लिए स्वयं को तैयार करना होगा। जब तक ऐसा नहीं होता तब तक प्लास्टिक की झिल्ली का न उपयोग करने का संकल्प लें और इस खुशफहमी में रहें कि आपने पर्यावरण की रक्षा कर ली है।
देशबन्धु में 29 जनवरी 2015 को प्रकाशित

Friday, 23 January 2015

स्वायत्त संस्थाएं कितनी स्वायत्त


 लोकतंत्र की यह एकमात्र शर्त नहीं है कि निर्धारित अवधि में आम चुनाव सम्पन्न हो जाएं और बहुमत के आधार पर एक सरकार बन जाए। लोकतंत्र का अर्थ है कि व्यवस्था में अधिकतम लोगों की भागीदारी हो तथा ऐसा सुनिश्चित करने के लिए स्वायत्त संस्थाओं का गठन हो। एक चुनी हुई सरकार अपने दायित्व से विमुख होती है जब वह इस स्वायत्तता की रक्षा करने में असफल होती है अथवा स्वयं अपनी पहल पर स्वायत्तता को बाधित करती है। आज इस अवधारणा पर गौर करना बहुत आवश्यक हो गया है। वह इसलिए कि लोकतांत्रिक समाज में अनिवार्य रूप से विचारों की बहुलता का सम्मान होता है, नागरिक समूहों को आत्मनिर्णय के अवसर मिलते हैं एवं इस तरह अलग-अलग दिशाओं में समाज-रचना का काम होकर एक वृहत्तर पहचान के साथ समाज आगे बढ़ता है।

सिर्फ चार दिन बाद भारत अपने गणतंत्र के पैंसठ वर्ष पूर्ण करेगा। इधर एक जुमला खासा प्रचलित हो गया है कि साठ-पैंसठ साल में कुछ नहीं हुआ। कुछ लोग आगे बढ़-चढ़कर यह भी कह देते हैं कि जो हुआ सब गलत हुआ। यह अपने-अपने राजनीतिक विश्वास से उपजी प्रतिक्रिया है। आश्चर्य की बात यह है कि इस आलोचना में कभी यह सुनने में नहीं मिला कि लोकतंत्र के लिए आवश्यक स्वायत्त संस्थाओं की शक्ति कैसे बाधित की गई। ऐसा क्या इसलिए है कि जब जिसके हाथ में सत्ता आई उसने अपने तरीके से इन संस्थाओं का दोहन करने व इनके माध्यम से अपने संकीर्ण स्वार्थ साधने की ही कोशिश की? हमने केन्द्र व प्रदेशों में कांग्रेस व भारतीय जनता पार्टी के अलावा वामपंथियों, समाजवादियों व क्षेत्रीय दलों के शासन को देखा है। इनमें से किसी ने भी लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति वह आदर नहीं दर्शाया जिसकी उनसे अपेक्षा थी।

सबसे ताजा उदाहरण केन्द्रीय फिल्म प्रमाणीकरण मंडल याने सेंसर बोर्ड का है। यूपीए द्वारा नियुक्त सुप्रसिद्ध नृत्यांगना लीला सेमसन एवं अन्य सदस्य इस्तीफा देकर जा चुके हैं व नए बोर्ड का गठन हो गया है। इस नए बोर्ड में अधिकतर सदस्य वे हैं जो भाजपा की राजनीति में सक्रिय हैं। सत्तारूढ़ दल अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाए इसमें कोई बुराई नहीं, लेकिन क्या यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि जिन्हें नियुक्त किया गया है वे इस पद के योग्य हैं? अटल बिहारी वाजपेयी के समय अभिनेता अनुपम खेर को अध्यक्ष बनाया गया था, उस समय वह सवाल नहीं उठा था क्योंकि श्री खेर की इस पद के लिए योग्यता असंदिग्ध थी। अभी पहलाज निहलानी अध्यक्ष बने हैं। वे दोयम दर्जे के फिल्मकार हैं तथा नरेन्द्र मोदी के लिए चुनावी फिल्म बना चुके हैं। अन्य की योग्यताएं भी कुछ इसी तरह की हैं। उनकी तुलना में लीला सेमसन कला जगत का एक प्रतिष्ठित नाम था एवं अधिकतर सदस्यों की योग्यता पर भी कोई सवाल नहीं था।

यह नियुक्ति तो एक बात हुई। लीला सेमसन ने टीवी पत्रकार करन थापर से साक्षात्कार में जो कहा वह अधिक विचारणीय है। जिस यूपीए ने उन्हें नियुक्त किया था उसी के सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी पर उन्होंने सेंसर बोर्ड के कामकाज में अनुचित हस्तक्षेप करने तथा बोर्ड की स्वायत्तता का सम्मान न करने का आरोप लगाया। उन्होंने यहां कहा कि मंत्रालय से बोर्ड के छोटे-मोटे अधिकारियों के पास सीधे फोन पर निर्देश आते थे याने बोर्ड को अंधेरे में रखकर काम किया जाता था। आज जो कांग्रेसजन भारतीय जनता पार्टी पर लीला सेमसन को दबावपूर्वक हटाने का आरोप लगा रहे हैं उन्हें यह भी देखना चाहिए कि कांग्रेस का अपना रिकार्ड इस मामले में क्या रहा है। यह ठीक है कि अनुपम खेर को एनडीए-1 ने मनोनीत किया था, लेकिन वे अगर अपना कार्यकाल पूरा कर लेते तो इसमें कौन सा पहाड़ टूटने वाला था। क्या कांग्रेस ने उस समय अपना छोटा दिल होने का परिचय नहीं दिया?

मुझे सुश्री सेमसन की बात से कोई आश्चर्य नहीं हुआ। यह कहना गलत नहीं होगा कि कांग्रेस और भाजपा में इस बारे में कोई ज्यादा फर्क नहीं है। इतना अवश्य है कि भाजपाई अपने और पराए का भेद जानते हैं। भाजपा सरकार में वही लोग नियुक्त होते हैं, जिनकी संघ या पार्टी के प्रति प्रतिश्रुति में संदेह की रंचमात्र की गुंजाइश नहीं होती। कांग्रेस में एक अलग तरह की उदारता है। वहां पार्टी के सिद्धांतों के प्रति निष्ठा रखने वालों की बजाय उन लोगों को पसंद किया जाता है जो मंत्रियों के करीबी होते हैं या वे जिन्हें चाटुकार कहा जा सकता है। नेहरु युग में तो ऐसा नहीं था किन्तु धीरे-धीरे योग्यता पर चाटुकारिता हावी होते चली गई है। इसके सैकड़ों-हजारों नहीं, बल्कि असंख्य उदाहरण पेश किए जा सकते हैं। कहने का मतलब यह कि स्वायत्तता का हनन उत्तर नेहरु युग में प्रारंभ हो गया था जो अब चरम परिणति पर पहुंच चुका है।

हम अपनी बात कुछेक उदाहरणों से स्पष्ट कर सकते हैं। एक समय देश में सहकारिता आंदोलन काफी मजबूत अवस्था में था। सहकारी संस्था के चुनाव बाकायदा होते थे। वही स्थिति नगरीय निकायों की भी थी। जो राजनीतिक कार्यकर्ता संसद या विधानसभा की सीढ़ी चढऩे से वंचित रह जाते थे वे सहकारी संस्था अथवा नगरपालिका इत्यादि में अपने लिए जगह तलाश कर लिया करते थे। इसमें कई बार ऐसा भी होता था कि जो जीतकर आए वे मुख्यमंत्री, मंत्री या संसद सदस्य के विरोधी खेमे के हों। जैसे रायपुर में नगरपालिका अध्यक्ष बुलाकीलाल पुजारी और विधायक शारदाचरण तिवारी एक-दूसरे के विरोधी थे। जब तिवारीजी मंत्री बने तो नगरपालिका भंग कर प्रशासक बैठा दिया गया और फिर बरसों तक चुनाव नहीं हुए। नगरीय निकायों के चुनाव तो अब खैर तिहत्तरवें संविधान संशोधन विधेयक के चलते होने लगे हैं, लेकिन पाठक याद करें कि हमारे यहां सहकारी चुनाव आखिरी बार कब हुए थे!

इस सोच का एक दुष्परिणाम तो यह हुआ है कि राजनीतिक कार्यकर्ताओं को व्यवस्था के भीतर जो भी छोटा-मोटा अवसर मिल जाता था वे उससे वंचित हो गए हैं। इसका दूसरा दु:खद नतीजा यह भी हुआ है कि दूसरी और तीसरी पंक्ति का नेतृत्व सुचारु रूप से विकसित नहीं हो पा रहा है। रायपुर के रमेश बैस पहले पार्षद, फिर विधायक, फिर संसद सदस्य बने। यह सही रास्ता था, लेकिन ऐसा अपवादस्वरूप ही होता है। अब शायद नेताओं को डर लगने लगा है कि यदि दूसरी पंक्ति का नेतृत्व विकसित हुआ तो इससे कहीं उनका भविष्य खतरे में न पड़ जाए।

जिन संस्थाओं का चरित्र गैर-राजनीतिक है जैसे साहित्य अकादमी, सेंसर बोर्ड, विश्वविद्यालय या आईआईटी, उनकी भी स्थिति बेहतर नहीं है। ये वे संस्थाएं हैं जिन्हें काम करने दिया जाए तो ''लेस गवर्नमेंट" याने कम सरकार का लक्ष्य फलीभूत होता है। किन्तु जब इनके ऊपर प्रतिबंध लगाया जाए और ऊपर से आदेश दिए जाएं तो फिर ये संस्थाएं एक प्राणहीन सरकारी दफ्तर बनकर रह जाती हैं। इनमें न तो नवाचार की गुंजाइश होती और न नवोन्मेष की। मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में विवि की स्वायत्तता कैसे छीनी गई है इसे मैंने निकट से देखा है। अब तो केन्द्रीय विवि जैसे दिल्ली विवि तक पर मंत्रालय के तुगलकी फरमान चलने लगे हैं। यह कितना शर्मनाक है कि राज्यपाल याने कुलाधिपति पर वाइस चासंलर की नियुक्ति में पैसे लेने का आरोप लगे। इसके बाद आप शिक्षण संस्थाओं से देश का भविष्य बनाने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?

मैंने ऊपर नरेन्द्र मोदी के नारे का जिक्र किया है-''लेस गवर्नमेंट" का। यदि प्रधानमंत्री सचमुच इस पर विश्वास करते हैं तो उन्हें इन लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता बहाल करने के बारे में सोचना पड़ेगा और चाटुकारों के बजाय उन सुपात्रों को मौका देना होगा जो सरकारी बाबुओं के इशारे पर नहीं, बल्कि अपने अनुभव और योग्यता के बल पर निर्णय लेने में सक्षम हों।
देशबन्धु में 22 जनवरी 2015 को प्रकाशित