Wednesday, 26 June 2019

देशबन्धु के साठ साल-2


छत्तीसगढ़ में आप किसी विषय पर शोध करना चाहते हैं, कोई पुरानी खबर या विज्ञापन आपको देखना है तो बहुत संभव है कि इसके लिए आप देशबन्धु लाइब्रेरी आएं। इस सार्वजनिक ग्र्रंथालय में देशबन्धु के पिछले साठ सालों के दौरान प्रकाशित अंकों की जिल्दों में कहीं आपको अपनी वांछित सामग्री मिल जाएगी। देश-दुनिया के अनेक समाचारपत्रों में विगत अंकों को इस तरह से संरक्षित रखा जाता है। इसलिए यह कोई अनोखी बात नहीं है। लेकिन आपको जानकर अचरज होगा कि जिस व्यक्ति ने देशबन्धु की पुरानी फाइलों को सिलसिलेवार संजोने की प्रणाली विकसित की, वह लगभग निरक्षर था। उसकी पढ़ाई चौथी हिन्दी से आगे नहीं हुई थी; लिखावट बहुत खराब, जिसे शायद मैं अकेला ही पढ़ पाता था; जिसने कभी आजीविका के लिए कुछ समय के लिए पान दूकान खोल ली थी; और जो सदर बाजार के सद्दानी चौक पर खड़े होकर लोगों से शर्त लगाने का शौकीन था कि छप्पर से बारिश की पहली बूंद कितनी देर में नीचे गिरेगी। इस शख्स का नाम था- बालकृष्ण जोशी। उन्हें और उनकी पत्नी झुमरीबाई को हम फूफाजी-बुआजी का आदरसूचक संबोधन देते थे।
बालकृष्ण जोशी बूढ़ापारा में प्रेस के बाजू से गुजरने वाली गोकुलचंद्रमा गली में उस छोर पर दूसरे मकान में रहते थे। 17 अप्रैल 1959 को अखबार चालू हुआ तो दूसरे-तीसरे दिन वे मुहल्लावासियों का डेलीगेशन लेकर बाबूजी से लड़ने आ गए थे। आपकी मशीन की खटखट से हमारी रातों की नींद में बाधा पड़ रही है। बाबूजी ने मुस्कुरा कर उन्हें समझाया- कुछ दिनों बाद यही खटखट आपको लोरी लगने लगेगी। और फिर अखबार का काम चौबीस घंटे चलता है तो आपके घर चोर भी नहीं आएंगे। मुहल्लेवासी संतुष्ट होकर लौट गए। यही जोशीजी लगभग चार साल बाद 1963 में प्रेस से कैसे जुड़े, यह मुझे ध्यान नहीं, लेकिन जब आ गए तो ताउम्र हमारे साथ ही रहे आए। गोकुलचंद्रमा मंदिर में जोशी दंपति का मेरे दादा-दादी से परिचय हुआ होगा। उसी कारण शायद यह मुंहबोला रिश्ता बना होगा। नि:संतान जोशीजी की एक भतीजी कृष्णा उनके पास रहती थीं, वह मेरी छोटी बहिन ममता की हमउम्र सहेली बन गई। जोशीजी पढ़े-लिखे तो नहीं थे, लेकिन व्यवहारबुद्धि उनमें अपार थी। वे अपने ढंग से कुछ चालाक भी थे। अनेक प्रेस कर्मचारी उनसे सूद पर रकम उठाते थे। मुझे मालूम पड़ा तो उन्हें रोका। कर्मचारियों के लिए उनका अपना कल्याण कोष स्थापित किया, जिससे वे कई जगहों से कर्जमुक्त हो सके। जोशीजी ने शिकायत की-आपने मेरी कमाई बंद करवा दी।
खैर, यह जोशीजी की ही सोच थी कि अखबार की दैनंदिन प्रतियों को संभालकर रखा जाए। उन्होंने पिछले तीन-तीन माह के अंकों की फाइलें बनवाना शुरू किया। उन्हें रखने के लिए भारी लकड़ी के बड़े-बड़े रैक बनवाए। पत्र की जो अतिरिक्त प्रतियां रखी जाती थीं, उसकी भी प्रणाली बनाई- आज के अंक की बीस कॉपियां, एक माह बाद सिर्फ दस, एक साल बाद घटाकर पांच। अनावश्यक जगह क्यों घेरी जाए! अगर किसी को पुराने अखबार की प्रति चाहिए तो जितना पुराना अंक, उतना अधिक दाम। अधिकतर जमीन-जायदाद के मुकदमों से संबंधित खबर/विज्ञापन के लिए ही लोग पुराना पेपर लेने आते थे। उनसे मुरव्वत क्यों? आखिर रख-रखाव में हमें भी तो खर्च करना पड़ता है, यह जोशीजी का तर्क था। उन्होंने जो व्यवस्था लागू की, वह आज छप्पन साल बाद भी लगभग वैसी ही चली आ रही है।
जोशीजी पर प्रेस की रद्दी, स्याही के ड्रम आदि के निबटान का जिम्मा भी था। हमारे हितैषी बैंक मैनेजर डागाजी ने जोशीजी को निर्देश दिया- तुम रद्दी बिक्री की रकम से हर माह एक सौ रुपए लाकर मुझे दोगे। उसका एक अलग खाता खोला गया। पांच साल बाद जब घर बनाने के लिए सहकारी समिति में प्लॉट खरीदने का अवसर मिला तो बचत की रकम काम आई। बाबूजी को भी उस दिन तक इसका पता नहीं था। जोशीजी के अनोखे व्यक्तित्व के बारे में लिखने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन एक प्रसंग का जिक्र करना उचित होगा। जोशी दंपति का अपना कोई खास घर खर्च नहीं था। अनेक संपन्न परिवारों में उनकी जजमानी चलती थी। अपने देहांत से कुछ साल पहले उन्होंने एक कन्या शाला में पेयजल व्यवस्था के लिए अपनी मेहनत से जोड़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा लगा दिया। वे एक सहृदय, सदाशयी व्यक्ति थे और उनकी स्मृति जब-तब आ ही जाती है।
एक अन्य सहयोगी रामसखीले दुबे भी अपने ढंग के अनोखे थे। मैं उन्हें महाराज कहता था। गो कि अधिकतर उन्हें लंगड़े पंडित ही कहा जाता था। आज रामसागरपारा के जिस प्रेस भवन से देशबन्धु का कारोबार संचालित होता है, उसके निर्माण में महाराज ने अनथक और अनकथ परिश्रम किया है। हमारे आवासगृह को तामीर करने में भी महाराज ने वैसी ही दौड़-धूप की थी। महाराज रीवां के पास किसी गांव के मूल निवासी थे और अब भी शायद वहीं रहते हैं। मुझे जहां तक याद पड़ता है वे 1961-62 में जबलपुर पे्रस में फोल्डिंग विभाग में काम करने आए थे। सन् 62 के अंत में जबलपुर नई दुनिया से बाबूजी अलग हुए तो महाराज भी हमारे साथ-साथ आ गए। नया अखबार शुरू होने में कुछ माह का समय था तो पाककला में प्रवीण महाराज ने घर की रसोई संभाल ली। अखबार चालू हुआ तो घर-दफ्तर दोनों जगह ड्यूटी करते रहे। पोलियोग्रस्त होने के कारण महाराज का एक पैर छोटा था। लंगड़ाकर चलते थे, लेकिन उनकी फुर्ती देखते बनती थी। वे हमारे ऐसे साथी थे, जिन्होंने कभी किसी काम के लिए मना नहीं किया। भवन निर्माण के समय दिन-दिन भर साइट पर खड़े रहना, निर्माण सामग्री के लिए दूकानों के चक्कर लगाना, श्रमिकों के साथ सद्व्यवहार के साथ उनके काम की निगरानी रखना- यह सब काम महाराज ने पूरी लगन और निष्ठा के साथ किया। बढ़ती उम्र में विवाह करने के बाद पारिवारिक जिम्मेदारियों को सम्हालने आदि कारणों से वे गांव वापस चले गए। यह हमारी विवशता थी कि चाहकर भी उन्हें रोककर नहीं रख सके।
मुझे रघुनाथराव कड़वे की भी याद आती है। प्रेस में अधिकतर लोग उन्हें रघुनाथ दादा कहते थे। दुर्बल कद-काठी के रघुनाथ रातपाली के चौकीदार थे। दिन में वे म.प्र. विद्युत मंडल में चतुर्थ श्रेणी के किसी पद पर काम करते थे। रघुनाथ देखने में सुकोमल लेकिन स्वभाव में कड़क थे। मजाल है कि उनके ड्यूटी पर रहते एक कागज इधर का उधर हो जाए। हमारे एक कैशियर को भूलने की बीमारी थी, शायद जानबूझकर। वे शाम को कई बार कैशबॉक्स खुला छोड़कर घर चले जाते थे। रघुनाथ कैशबॉक्स को ताला लगाते, गोदरेज की आलमारी में बंद करते और चाबियां देने घर तक आते। उनके बारे में दिलचस्प तथ्य यह था कि उनकी उम्र का किसी को पता नहीं था। देखकर लगता था कि रिटायरमेंट का समय हो चुका है, लेकिन विद्युत मंडल में किसी जादू से हर साल उनकी सेवानिवृत्ति टल जाती थी। शायद हो कि वहां के अधिकारी भी उनकी कर्तव्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर उन्हें विदा न करना चाहते हों! रघुनाथ के बेटे सतीश ने भी कुछ समय तक प्रेस में काम किया, लेकिन टिक नहीं पाए। रघुनाथराव ने शायद तीस साल से भी अधिक समय तक अखबार को अपनी सेवाएं दीं। कर्तव्यपरायणता और ईमानदारी उन दिनों भी शायद इतनी ही दुर्लभ या सुलभ थी, जितनी आज है। यह हमारा सौभाग्य था कि हमें इनके जैसी साथी-सहयोगी मिले।
इस लेखमाला की 11 अप्रैल को प्रकाशित पहली किश्त में मैंने कुछ ऐसे जनों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की थी, जिनका देशबन्धु की साठसाला यात्रा में किसी न किसी वक्त पर अनमोल सहयोग मिला। आज उसी कड़ी में अपने उपरोक्त तीन सहयोगियों की चर्चा हुई है। मैंने अमेरिका के उपन्यासकार कैमरून हॉले का बहुचर्चित उपन्यास -''द एक्जीक्यूटिव सुईट'' या ''अध्यक्ष कौन हो'' 1962-63 में पढ़ा था और उससे गहरे तक प्रभावित हुआ था। इस उपन्यास का आधारबिंदु यही था कि कोई भी प्रतिष्ठान सिर्फ मशीनों और जड़ नियमों से नहीं बल्कि मानवीय सरोकारों से संचालित होता है। मैं अक्सर सोचता हूं कि बाबूजी को ऐसे साथी न मिले होते तो अखबार आगे कैसे बढ़ता! अगली किश्त शीघ्र ही, कुछ और साथियों-सहयोगियों के परिचय के साथ।
देशबंधु में 27 जून 2019 को प्रकाशित

Thursday, 20 June 2019

तपती धूप में सड़क का सफर


बड़चिचोली। नागपुर से भोपाल राष्ट्रीय राजमार्ग क्र. 47 पर विदर्भ की सीमा पार करते साथ म.प्र. के छिंदवाड़ा जिले का एक छोटा सा गांव। कुछ दिन पहले इस रास्ते से गुजरना हुआ तो जाते वक्त तो बाईपास से ही आगे बढ़ गए, लेकिन लौटते समय तय कर लिया कि गांव में जाना ही है। इसलिए कि वह वटवृक्ष एक बार फिर देखना था, जिसे देखे करीब पच्चीस साल बीत चुके थे। इसमें शायद कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि समूचे मध्यवर्ती भारत में इससे वृहदाकार बरगद का पेड़ कोई दूसरा नहीं है। जब पिछली बार देखा था, तब वृक्ष का विस्तार एक वर्ग किमी से अधिक क्षेत्र में था, जो इन बीस-पच्चीस सालों मे और आगे बढ़कर संभवत् डेढ़ वर्ग किमी तक फैल गया है। इस विशाल वृक्ष में अब लगभग सात सौ तने हैं- तने याने ऊपर से नीचे आकर धरती में समाने वाली जड़ें। मेरी जानकारी में कोलकाता के शिवपुर वानस्पतिक उद्यान, चैन्नई के अड्यार और शायद आंध्रप्रदेश में किसी स्थान पर अवस्थित वटवृक्ष हमारे देश के प्रमुख और महाकाय वटवृक्ष हैं। बड़चिचोली की गिनती किस क्रम पर होगी, यह तो वनस्पति-विज्ञान के पंडित ही जानते होंगे, लेकिन यदि इस स्तंभ के पाठकों के पास इस संदर्भ में कोई जानकारी हो तो साझा करने की कृपा करें।
जाहिर है कि विदर्भ-महाकौशल के सीमांत पर बसे इस गांव का नाम ही अपने वटवृक्ष के कारण बड़चिचोली पड़ा है, लेकिन अपनी इस प्राकृतिक विरासत को सहेजने में म.प्र. सरकार ने कोई विशेष ध्यान दिया हो, ऐसा नहीं लगता। ध्यान आता है कि बाराबंकी (उ.प्र.) के लोकसभा सदस्य बेनीप्रसाद वर्मा केंद्रीय संचार मंत्री बने तो उन्होंने अपने क्षेत्र में स्थित अनूठे ''कल्पवृक्ष'' पर डाक टिकिट जारी करवा दिया था। देखें कि मुख्यमंत्री कमलनाथ का ध्यान अपने गृहक्षेत्र की इस अनूठी धरोहर पर कब जाता है! इसी परिसर में एक बावली भी है जो शायद दो सौ साल पुरानी होगी। बड़चिचोली के बरगद की एक और खासियत है जो आज के दौर में खासे मायने रखती है। यहां एक सूफी संत की मजार है, जिस पर हर साल उर्स भरता है। उस मजार के बाजू में ही हनुमानजी का मंदिर भी है। इस मजार व उर्स के संरक्षक व सहयोगी आसपास के गांवों के सभी धर्मों व वर्गों के नागरिक हैं। उसमें कोई भेदभाव नहीं है। पहले मजार छोटे रूप में थी, उत्साही भक्तों के सहयोग से अब उसका विस्तार हो रहा है। इससे वटवृक्ष के प्राकृतिक सौंदर्य पर असर पड़ रहा है, लेकिन यह भक्तिभाव कहां नहीं है? रायपुर के निकट चंपारन में महाप्रभु वल्लभाचार्य की जन्मस्थली में कभी जो नैसर्गिक वन होता था, उसकी शोभा कांक्रीट के बढ़ते जंगल के कारण नितदिन नष्ट हो रही है। अस्तु,
बड़चिचोली हमारी उस यात्रा का एक संक्षिप्त पड़ाव मात्र था, जिस पर हम जून और जेठ माह की तपती दोपहरों में निकल पड़े थे। हमारा गंतव्य था- नर्मदांचल का नगर हरदा जहां कवि मित्र प्रेमशंकर रघुवंशी की स्मृति में आयोजित एक समारोह में भाग लेना था। पहले कभी नरसिंहपुर, होशंगाबाद और हरदा को मिलाकर एक ही जिला हुआ करता था- होशंगाबाद। कालांतर में विभाजन होकर नरसिंहपुर व हरदा भी पृथक जिले बन गए। मध्यप्रदेश के सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनैतिक परिदृश्य में इस अंचल का सदैव से महत्वपूर्ण स्थान रहा है। माखनलाल चतुर्वेदी, भवानी प्रसाद मिश्र, मायाराम सुरजन, हरिशंकर परसाई जैसे कलम के धनी और कलम के सिपाही मूलत: यहीं के थे। इसी कड़ी में प्रेमशंकर रघुवंशी का नाम भी जुड़ता है। भाई रघुवंशी के साथ दशकों पुरानी मित्रता थी। हमने मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन में बरसों साथ-साथ काम किया। उन्हें मैंने सन् 1961-62 में सबसे पहले एक समर्थ गीतकार के रूप में जाना था। रचनाकार के इस रूप से मैं हमेशा प्रभावित रहा। 1995 में हमने इसीलिए देशबन्धु के अवकाश अंक में लगातार एक साल तक 'गीत वर्ष' शीर्षक से साप्ताहिक स्तंभ के अंतर्गत उनके गीत छापे। उनकी लंबी कविता ''देखो सांप: तक्षक नाग'' अपने कथ्य और बुनावट में एक अद्भुत कविता है, जिसमें समसामयिक जीवन की बहुविध विसंगतियों को पुरजोर ढंग से उजागर किया गया है।
श्रीमती विनीता रघुवंशी ने जब फोन पर आदेश दिया कि मुझे 8 जून को प्रेमशंकर रघुवंशी फाउंडेशन के उद्घाटन अवसर पर उपस्थित होना ही है तो मैं मना नहीं कर सका। इससे मेरा ही लाभ हुआ। हरदा में कुछ पुराने, लेकिन अधिकतर नए रचनाशील साथियों से परिचय हुआ। इस भीषण गर्मी में आयोजन करना अपने आप में हिम्मत का काम था, लेकिन विनीताजी और उनकी टीम ने जिस सुंदर-सुचारू ढंग से कार्यक्रम किया, उसकी प्रशंसा ही की जा सकती है। भाई रघुवंशी पर एक लघु वृत्तचित्र का प्रदर्शन, लेखक बंधु कैलाश मंडलेकर का प्रभावशाली व्याख्यान, इप्टा इकाई द्वारा ''देखो सांप: तक्षक नाग'' की नाट्य प्रस्तुति और नवोदित प्रतिभाओं की कलात्मक अभिव्यक्तियां- इन सबने सभा में उपस्थित सभी जनों को पूरे समय तक बांधे रखा। उल्लेखनीय था कि कार्यक्रम 44-45 डिग्री तापमान में गैर ए.सी. हॉल में हो रहा था, लेकिन श्रोता-दर्शक उससे निर्लिप्त थे। आयोजन में महिलाओं की बढ़-चढ़कर भागीदारी भी सुखद और कल्पनातीत थी।
यह हमारी मजबूरी थी कि हमें यात्रा दिन में ही करना थी। आजकल सूरज डूबने के बाद सड़क मार्ग से यात्रा करने में बेचैनी होने लगती है। इसलिए रायपुर से हरदा और फिर बालाघाट-गोंदिया होते हुए वापसी में हमने पूरे पांच दिन तपती धूप में सफर करते हुए ही गुजारे। दिन-दिन की यात्रा का एक लाभ यह हुआ कि सतपुड़ा और नर्मदा अंचल की निरंतर बदलती हुई दृश्यावली को थोड़ा-बहुत देखने का अवसर मिल गया।
एक परिवर्तन जो विशेष कर नोट करने लायक है कि कहीं फोरलेन, कहीं सिक्सलेन, कहीं बाईपास के निर्माण के चलते रास्ते के गांव-कस्बे-शहर एक किनारे छूट जाते हैं। रायपुर से नागपुर जाते हुए भिलाई शहर के बीच से गुजरना पड़ता है, लेकिन दुर्ग किनारे रह जाता है, राजनांदगांव में फ्लाईओवर से देखते न देखते शहर पीछे छूट जाता है। नागपुर से हरदा के बीच सावनेर, पांढुर्णा, मुलताई, बैतूल- सब पर बाईपास, सड़क किनारे वृक्षों की अंधाधुंध कटाई के रूप में सामने आया है। पूरे रास्ते कहीं छाँह नहीं मिलती। दूसरे- यदि कहीं अल्प विश्राम के लिए रुकना चाहें तो कहां रुकें? इन नगरों के स्थानीय विशिष्ट व्यंजन भी अब चखने नहीं मिलते। तीसरे- टोल नाकों पर अच्छी-खासी रकम चुकाना पड़ती है। नियमों के अनुसार टोल नाकों पर यात्री सुविधाएं होना चाहिए, लेकिन ठेकेदारों की कोई रुचि उनके रख-रखाव में नहीं है।
बहरहाल, हरदा जाते समय हमने सोचा कि फोरलेन छोड़कर बैतूल के पहले बैतूलबाजार में निर्मित बालाजीपुरम में रुककर चाय पी लेंगे। एनआरआई उद्योगपति सैम वर्मा ने लगभग चालीस साल पहले बालाजी का एक छोटा सा मंदिर बनवाया था। अभी उसका भव्य रूप देखकर आश्चर्य हुआ। वहां तो सड़क के दोनों किनारे बाकायदा एक बाजार सज गया है। अतिथिशाला और बैंक की शाखाएं भी हैं। एक जगह सूचनापटल था- देश का पांचवा धाम। धर्मप्राण जनता को इसी सब में मानसिक शांति और संतोष मिलता है। लौटते समय हम इसी तरह राजमार्ग छोड़ ताप्ती नदी का उद्गम देखने मुलताई नगर में घुसे। मैंने लगभग पच्चीस वर्ष बाद ही ताप्ती कुंड के दर्शन किए। ध्यान आया कि पहले सड़क किनारे दूकानें थीं, जिनकी ओट में कुंड छुप जाता था, लेकिन वे शायद हटा दी गई हैं? छुटपुट ठेले, गुमटियां अवश्य थीं। ताप्ती कुंड में इस गर्मी में भी भरपूर पानी था, जिसे देखकर नेत्र और मन दोनों तृप्त हुए। स्मरणीय है कि मध्यप्रदेश की दो प्रमुख नदियों नर्मदा और ताप्ती पूर्व से पश्चिम की ओर बहते हुए गुजरात में अरब सागर में विलीन होती हैं। जबकि देश की अन्य प्रमुख नदियां पूर्व की ओर बहते हुए बंगाल की खाड़ी में विलीन होती हैं। ताप्ती कुंड का जल स्वच्छ था, उसमें बदकें तैर रही थीं, नौका विहार भी चल रहा था, कुल मिलाकर एक आह्लादकारी दृश्य था।
एक समय ''चांदनी रात में नौका विहार'' पर कविताएं लिखी जाती थीं, हमने तपती धूप में सड़क का सफर किया। स्वाभाविक ही कुछ कष्ट उठाए, लेकिन समग्रता में आनंददायक अनुभव पाया।
देशबंधु में 20 जून 2019 को प्रकाशित

Wednesday, 12 June 2019

राहुल गांधी नई राह पर?


राहुल गांधी ने कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद से अभी तक इस्तीफ़ा वापिस नहीं लिया है। इस बात को तीन सप्ताह हो चुके हैं। अनुमान होता है कि राहुल अपने निर्णय पर अडिग हैं। इस बीच कांग्रेस पार्टी के भीतर से कुछ और तस्वीरें सामने आई हैं। पंजाब में मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह और मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू की आपसी लड़ाई खुलकर जनता के बीच आ गई है। कैप्टन ने सिद्धू के उनके पुराने विभाग छीन लिए हैं, लेकिन सिद्धू ने नए विभागों का प्रभार अब तक ग्रहण नहीं किया है। वे राहुल गांधी के दरबार में गुहार लगाने पहुंचे हैं। महाराष्ट्र विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे राधाकृष्ण विखे-पाटिल ने पुत्र के नक्शे-कदम पर चलते हुए भाजपा का दामन थाम लिया है। विखे-पाटिल पहले कोई और पार्टी छोड़कर कांग्रेस में आए थे। कर्नाटक में कांग्रेसी विधायकों पर डोरे डालना भाजपा ने बंद नहीं किया है। तेलंगाना में कांग्रेस के बारह विधायक एकमुश्त टीआरएस में शामिल हो गए हैं। गोवा में भी कांग्रेस में तोड़फोड़ की कोशिशें जारी हैं। राजस्थान में गहलोत बनाम पायलट द्वंद्व लगातार जारी है। इधर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ अपने पुत्र नवनिर्वाचित लोकसभा सदस्य नकुलनाथ के साथ जाकर प्रधानमंत्री से शिष्टाचार भेंट कर आए हैं। उधर आंध्र के युवा मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी ने प्रधानमंत्री मोदी के प्रदेश आगमन पर न सिर्फ उनकी अगवानी की, बल्कि उनके साथ-साथ तिरुपति दर्शन का लाभ भी लिया।
इस तमाम घमासान के बीच राहुल गांधी अपने नए लोकसभा क्षेत्र वायनाड के दौरे पर पहुंचे। वे तीन दिन वहां रहे, मतदाताओं का आभार माना और कोई नई बात न कह बारंबार यही कहा कि वे घृणा नहीं, प्रेम की राजनीति करते हैं और करते रहेंगे। राहुल इतना तो समझ ही रहे होंगे कि भारत की राजनीति में खेल के नियम पूरी तरह बदल चुके हैं, मुहावरे भी बदल गए हैं। यह जानने और चुनावी मैदान में बुरी तरह घायल हो जाने के बावजूद यदि वे किन्हीं पुराने मूल्यों की पुनर्स्थापना करना चाहते हैं, तो स्वाभाविक ही सवाल उठता है कि इसके लिए उनकी कार्ययोजना क्या है? उसे अमल में आने के लिए क्या वे कोई समयबद्ध कार्यक्रम बना रहे हैं और इसमें उनका साथ कौन देगा? क्या सत्तालोलुप कांग्रेसियों में इतना धीरज और साहस है कि वे उनके साथ-साथ चल सकें? जब राजनीति करने का मूल मकसद ही स्वार्थपूर्ति हो तब सिद्धांतों पर टिके रहने वाले कार्यकर्ता कहां से जुटेंगे?
जाहिर है कि राहुल गांधी ने अपने लिए एक नया रास्ता चुन लिया है, जिस पर चलने में कदम-कदम पर बाधाएं आएंगी और हौसला कायम रखने के लिए एकमेव अवलंब दृढ़ इच्छाशक्ति का ही होगा। मुझे यहां वह नीतिकथा अनायास याद आ रही है जिसमें बाप-बेटे अपने गधे के साथ कहीं जा रहे हैं और तमाशबीनों की फब्तियां सुन-सुन अपना ही तमाशा बना बैठते हैं। कभी बाप गधे पर सवार तो कभी बेटा, कभी दोनों सवार, तो कभी दोनों पैदल। मतलब यह कि हर ऐरे-गैरे की सलाह मानने की बजाय अपनी बुद्धि से चलना ही श्रेयस्कर है। उम्मीद करना चाहिए कि राहुल गांधी भली-भांति विचार करने के बाद ही एक नए पथ पर चलेंगे और उससे डिगेंगे नहीं। लेकिन यहां एक और सवाल उठता है कि वर्तमान दौर में कांग्रेस के अलावा उन तमाम दलों व नेताओं की क्या भूमिका होना चाहिए, जो जनतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखते हैं? राहुल गांधी और इन नेताओं के बीच समन्वय और हमराह होने की क्या संभावना है? और यह कितना वांछित है?
ऐसे तमाम सवालों के बीच हमें लगता है कि राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष पद से एक निश्चित अवधि के लिए अवकाश भले ही ले लें, किंतु त्यागपत्र न दें। वे औपचारिक रूप से पद पर बने रहें, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर ऐसे वरिष्ठ साथियों को दायित्व सौंप दें जो संगठन में और सदन में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने के काबिल हों। यदि मल्लिकार्जुन खड़गे इस बार हारे न होते तो उन्हें एक बार फिर सदन में प्रमुख विपक्षी दल का नेता निर्वाचित किया जा सकता था। विगत लोकसभा में उन्होंने अपनी भूमिका सशक्त रूप से निभाई थी। आज शायद उचित होगा कि उन्हें कांग्रेस पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष या कार्यकारी उपाध्यक्ष बना दिया जाए। एक समय कमलापति त्रिपाठी, फिर अर्जुन सिंह को यह जिम्मेदारी सौंपी गई थी। लोकसभा में पार्टी के नेता व उपनेता पद का दायित्व क्रमश: अधीर रंजन चौधरी व शशि थरूर अथवा प्रणीत कौर को सौंपा जा सकता है। बहरहाल, यह बैठे-ठाले की सलाह है। अंतिम निर्णय तो पार्टी के भीतर ही होना है।
अपने पिछले लेख में हमने राहुल गांधी से व्यापक पैमाने पर जनता से संवाद स्थापित करने की अपेक्षा की थी। यही अपेक्षा अन्य गैर-एनडीए दलों से भी हम करते हैं। आज सबसे महती आवश्यकता इसी बात की है। इस संपर्क-संवाद अभियान का प्रारंभ करने के लिए एक बेहतरीन अवसर भी सामने है। इस साल राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की सार्द्धशती है। याने 2 अक्टूबर 2019 को उनकी एक सौ पचासवीं जयंती है। कांग्रेस ने बीते बरसों में कुछ अच्छे अवसर यूं ही गंवा दिए जैसे दांडी यात्रा के पचहत्तर साल, सत्याग्रह शताब्दी और पं. नेहरू की एक सौ पच्चीसवीं जयंती। परंतु आज जो अवसर मिला है, उसे बिलकुल नहीं चूकना चाहिए। खासकर तब जबकि जनमानस से गांधी को अपदस्थ करने का एक महीन षड़यंत्र चुपचाप चलाया जा रहा है। आज जनता के बीच जाकर समझाना है कि गांधी सिर्फ एक चश्मे की कमानी या एक छड़ी मात्र नहीं थे, कि स्वच्छता उनके विराट जीवन दर्शन का एक छोटा सा हिस्सा मात्र था, कि सत्य और अहिंसा को अस्त्र बनाकर ही उन्होंने साम्राज्यवाद व उपनिवेशवाद के खिलाफ लड़ाई जीतने में निर्णायक भूमिका निभाई थी।
हमारी राय में इस संपर्क अभियान के लिए राहुल गांधी को बिना समय गंवाए देश की पदयात्रा पर निकल पड़ना चाहिए। याद करें कि जब 1915 में गांधीजी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे थे तो अपने गुरु गोपालकृष्ण गोखले के निर्देश पर उन्होंने पूरा एक साल देशभ्रमण कर देश की आत्मा को समझने में बिताया था। उस यात्रा में ही उन्हें अंग्रेजी राज के खिलाफ अपनी रणनीति तैयार करने के सूत्र मिले थे। राहुल को इस देशव्यापी पदयात्रा में साथ देने के लिए उन तमाम लोगों का, खासकर युवाओं का आह्वान करना चाहिए जो सत्ता की नहीं, सिद्धांत की राजनीति में विश्वास रखते हैं। राहुल और प्रियंका के साथ अगर कन्हैया जैसे युवा जुड़ पाते हैं तो यह एक उत्साहवर्द्धक बात होगी। इस अभियान में भाकपा, माकपा, राजद, द्रमुक, राकांपा आदि भी साथ दें तो अच्छा होगा। दरअसल, समय की मांग है कि चुनावी राजनीति से ऊपर उठकर दीर्घकालीन लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित किया जाए।
जनता के बीच जाएंगे तो समझ आएगा कि मतदाता आप से विमुख क्यों होते गया है। राहुल को चाहिए कि इन्हें उदार मन से आमंत्रित करें। उन्हें जनतांत्रिक मूल्यों के पैरोकार बुद्धिजीवियों से भी अपना संपर्क बढ़ाना चाहिए। इस तरह से दो काम सिद्ध होंगे। एक ओर गांधी-नेहरू दर्शन को लोगों के बीच ले जाना, दूसरी ओर स्वयं अपने लिए सबक सीखना। और अंत में यह भी जोड़ना चाहूंगा कि तथाकथित ''लेफ्ट-लिबरल'' बुद्धिजीवी जो अधिकतर दिल्ली में पाए जाते हैं, और जो अब तक कांग्रेस व राहुल को पानी पी-पीकर कोस रहे थे, वे भी आत्मालोचना का साहस जुटाएं।
#देशबंधु में 13 जून 2019 को प्रकाशित

Thursday, 6 June 2019

आने वाले दिनों की एक तस्वीर


लोकसभा चुनावों के परिणाम आने के बाद की कुछ घटनाओं को नोट करना चाहिए। एक-राहुल गांधी का कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा। दो- पश्चिम बंगाल से चार विधायकों का दलबदल। तीन- समाजवादी पार्टी और कांग्रेस द्वारा टी.वी. चैनलों पर अपने प्रवक्ता न भेजने का निर्णय। चार- मध्यप्रदेश व कर्नाटक में सरकार को गिरा देने के मंसूबे। पांच- महाराष्ट्र कांग्रेस में तोड़-फोड़ के संकेत। छह- राहुल गांधी का शरद पवार से जाकर भेंट करना। सात- राहुल गांधी की कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं से नाराज़गी के संकेत। आठ- नई शिक्षा नीति के मसौदे की बिना पर दक्षिण भारत में हिंदी का विरोध। नौ- देश में बेरोजगारी के आंकड़ों का अधिकृत तौर पर प्रकाशन। दस- अमेरिका द्वारा भारत को दी गई व्यापार वरीयता समाप्त। ग्यारह- आंध्रप्रदेश में जगनमोहन रेड्डी का मुख्यमंत्री बनना। बारह- कर्नाटक के नगरीय निकाय चुनावों में कांग्रेस व जद (स) की शानदार जीत। तेरह- 'टाइम' पत्रिका में नरेंद्र मोदी की प्रशंसा में लेख। मैंने केंद्रीय मंत्रिमंडल के स्वरूप को फिलहाल छोड़ दिया है। ऐसे और भी अनेक बिंदु हैं जिन्हें आप चाहें तो जोड़ लें। इन्हें एक साथ देखने से आने वाले दिनों की राजनीतिक तस्वीर का एक अनुमान लगाया जा सकता है।

सबसे पहले राज्यों में चल रही उथल-पुथल पर बात करना बेहतर होगा। प्रश्न उठता है कि भारतीय जनता पार्टी को अन्य दलों द्वारा संचालित राज्य सरकारें गिराने की इतनी हड़बड़ी क्यों है? एक तरफ प्रधानमंत्री सबके साथ के अलावा सबका विश्वास हासिल करने का मंतव्य व्यक्त करते हैं और दूसरी तरफ चुनी हुई सरकारों को गिराने की कोशिशें होती हैं- यह दोहरापन सत्तारूढ़ दल को शोभा नहीं देता। हारे हुए दलों के नेता सत्तासुख पाने के लिए दलबदल करना चाहें तो कोई नई बात नहीं है। लेकिन जिस पार्टी ने प्रचंड बहुमत से दुबारा जीत हासिल की हो, क्या उसे आज भी इन स्वार्थी नेताओं को प्रोत्साहन देना चाहिए? कायदे से तो इन नेताओं की लानत-मलामत होना चाहिए। यह भी विचारणीय है कि दल-बदलुओं का स्वागत-सत्कार करने से क्या अपने ही निष्ठावान कार्यकर्ताओं का मनोबल नहीं टूटता? क्या इस प्रक्रिया में उनके आगे बढ़ने के अवसर नहीं छीन लिए जाते? ध्यान दीजिए कि ये सवाल नैतिकता से नहीं, व्यवहारिकता से संबंधित है। मीडिया में जो खबरें आ रही हैं उनसे पता चलता है कि भाजपा संगठन के अनेक कद्दावर नेता भीतर ही भीतर नाराज़ हैं कि उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में स्थान नहीं मिला जबकि इन सबने अपने-अपने प्रभार के प्रदेशों में पार्टी को जिताने के लिए हाड़तोड़ मेहनत की थी। इन रुष्टजनों में कैलाश विजयवर्गीय, अनिल जैन, अरुण सिंह, राम माधव आदि के नाम गिनाए जा रहे हैं।
हमने जो बिंदु गिनाए हैं, उनमें कांग्रेस व सपा द्वारा टीवी चैनलों पर प्रवक्ता न भेजने की बात भी है। सपा ने तुरंत ही यह कदम उठा लिया, लेकिन कांग्रेस ने इसके लिए दो-तीन दिन का वक्त लिया और उसका निर्णय भी एक समय सीमा तक ही है। ऐसा प्रतीत होता है कि राहुल गांधी के इस्तीफे को लेकर चैनलों पर कोई अवांछित बहस न हो, यह सोचकर कांग्रेस ने निर्णय लिया है। लेकिन हम तो पिछले आठ साल से लगातार कहते आए हैं कि विपक्षी दलों को टीवी पर होने वाली फर्जी बहसों में भाग लेना ही नहीं चाहिए। यह सलाह हम यूपीए-दो के समय से दे रहे हैं। कारण स्पष्ट है कि टीवी चैनलों व काफी हद तक अखबारों पर कारपोरेट घरानों का नियंत्रण है, और वे मुख्यत: कांग्रेस की घोषित जनहितकारी नीतियों के विरोधी हैं। अब तो लगभग सारे चैनल सत्तारूढ़ दल के साथ हैं। उन्होंने सरकार को परेशान करने वाले सवाल पूछना पूरी तरह बंद कर रखा है, जबकि हर गलती का दोष कांग्रेस पर मढ़ने में वे देर नहीं करते। ऐसे में श्रेयस्कर यही है कि इन बहसों में भाग न लिया जाए। जिसे कांग्रेस का पक्ष जानना हो, वह आकर बात करे।
यहीं प्रसंगवश 'टाइम' पत्रिका की भी बात कर लेना उपयुक्त होगा। चुनावों के दौरान पत्रिका ने नरेंद्र मोदी और उनकी नीतियों के विरुद्ध 'कवर स्टोरी' की याने मुख्य लेख छापा। इसकी मोदी विरोधियों ने खूब चर्चा की और माना गया कि मोदीजी को इससे चुनावों में नुकसान होगा। लेकिन इसी अंक में भीतर और भी लेख थे, जिनमें मोदी सरकार की सराहना की गई थी। उनकी उपेक्षा कर दी गई। अभी नतीज आने के बाद पत्रिका ने एक और लेख छापा है, जिसमें मोदीजी की प्रशंंसा की गई है। इसे लेकर कहा जा रहा है कि 'टाइम' जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका ने पाला बदल लिया या पलटी मार ली। वास्तव में ऐसा कुछ नहीं है। पत्रिका में पक्ष-विपक्ष दोनों को ही स्थान मिलता रहा है। देश में ही कुछ मीडिया घराने हैं जिनका एक से अधिक माध्यम पर नियंत्रण है तो वे एक जगह सरकार के गुण गाते हैं तो दूसरी जगह आलोचना करने की जगह भी बना लेते हैं।
आज एक बड़ा मुद्दा राहुल गांधी के इस्तीफे और कांग्रेस की भावी दिशा का है। कांग्रेस अध्यक्ष ने हार की जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए अपने पद से त्यागपत्र दे दिया, उनकी इस भावना का सम्मान किया जाना चाहिए। यह संसदीय जनतंत्र की आधारभूमि इंग्लैंड में विकसित परिपाटियों के अनुकूल है। लेकिन सोचना होगा कि इंग्लैंड ने कई सदियों के अनुभव व अभ्यास से जो परंपराएं स्थापित तथा स्वीकार की हैं, क्या भारतीय संदर्भों में उन्हें यथावत लागू किया जा सकता है? दरअसल, राहुल को अपने आप से यहां कुछ सवाल करना चाहिए। मसलन, क्या आपके इस्तीफा देने से यह हार जीत में बदल जाएगी? क्या इसके बाद कांग्रेस का कायाकल्प हो जाएगा? और क्या पार्टी में ऐसा कोई सदस्य है जो आपके विकल्प के रूप में स्वीकार्य, समर्थ और इच्छुक है?
राहुल के बाद कौन-यह एक अटपटा प्रश्न हो सकता है कि एक सौ पैंतीस साल पुरानी पार्टी में नेतृत्व देने में सक्षम एक भी व्यक्ति नहीं है! लेकिन इस सवाल का उत्तर आसान नहीं है, वह इसलिए कि कांग्रेस अपने बुनियादी चरित्र में एक राजनैतिक दल नहीं, बल्कि एक आंदोलन है। इतिहास उठाकर देखें कि पार्टी में समय-समय पर भांति-भांति के विचारों के लोग आते-जाते रहे हैं। इसकी शुरूआत नरम दल और गरम दल के समय ही हो गई थी। गो कि इसे आंदोलन का रूप महात्मा गांधी ने दिया। इस दृष्टि से विचार करें तो समझ आता है कि कांग्रेस को हर समय ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो उसके आंदोलनकारी रूप को कायम रख सके। इसके लिए सत्ता को साध्य नहीं, बल्कि साधन मानने की भावना; और जब सत्ता से बाहर हों तो आंदोलन को जारी रखने के लिए धैर्य, साहस और बलिदान के गुण चाहिए। कहना न होगा कि 1947 से लगातार लंबे समय तक सत्ता में बने रहने के कारण पार्टी के बड़े वर्ग ने उसे ही साध्य मान लिया, जिसके दुष्परिणाम भी पार्टी को जब-तब भुगतने पड़े हैं।
यह मेरा मानना है कि महात्मा गांधी ने कांग्रेस को जिस सांचे में ढाला था, उसे सबसे बढ़कर नेहरूजी ने ही सही अर्थों में समझा था। आज राहुल उसी भावना का पुनराविष्कार करने का प्रयत्न कर रहे हैं। आज की बदली हुई परिस्थितियों में वे कितने सफल हो पाते हैं, यह एकदम अलग बात है। 1964 के बाद से अलग-अलग दौर में के. कामराज, सिंडीकेट, पीवी नरसिंहराव, सीताराम केसरी आदि का पार्टी में वर्चस्व रहा, लेकिन यह सबके सामने है कि उन्होंने पार्टी को मजबूत किया या कमजार!
इस बीच राहुल गांधी का दिल्ली में शरद पवार से उनके आवास पर जाकर मिलना एक महत्वपूर्ण घटना थी। इसके बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि एनसीपी का कांग्रेस में विलय हो सकता है, कि उसका अनुसरण तृणमूल कांग्रेस व वाईएसआर कांग्रेस भी कर सकते हैं। चूंकि प. बंगाल में ममता बनर्जी अभी भी काफी मजबूत स्थिति में हैं और जगन मोहन ने तो भारी विजय के साथ पहली पारी शुरू की है, इसलिए उनके बारे में कोई अनुमान लगाना गलत हो सकता है; किंतु कांग्रेस और एनसीपी के एक साथ आने की संभावना साकार हो सकती है। शरद पवार अपनी इनिंग्स खेल चुके हैं और महाराष्ट्र में दोनों दलों का गठबंधन लंबे समय से चल ही रहा है, इसलिए विलय दोनों के लिए श्रेयस्कर होगा। लेकिन कांग्रेस के सामने इस समय सबसे बड़ा लक्ष्य जनता से व्यापक स्तर पर संवाद स्थापित करना होना चाहिए। क्या राहुल इस बात को समझने के लिए तैयार हैं?
#देशबंधु में 06 जून 2019 को प्रकाशित

Wednesday, 29 May 2019

''मोदीवाद की जीत''


मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवराज सिंह चौहान ने एक वाक्य में पूरी कहानी कह दी है कि ''यह मोदीवाद की जीत है।'' इसके साथ ही उन्होंने नरेंद्र मोदी को एक उच्चतर धरातल पर स्थापित कर दिया है। पूंजीवाद, साम्राज्यवाद, साम्यवाद, गांधीवाद, समाजवाद, माओवाद आदि की तर्ज पर गोया एक नया राजनीतिक दर्शन अस्तित्व में आ गया है। यह अब अध्येताओं का जिम्मा है कि वे मोदीवाद की व्याख्या करें, उसके गुण सूत्र तलाशें, उसके बिंदुवार अनुच्छेद तैयार करें। अपनी सीमित समझ में हम जैसे अज्ञानी भी अगर ऐसा करने चाहें तो कर सकते हैं। मेरी कोशिश कुछ यही है।
श्री चौहान के सारगर्भित कथन का खुलासा करते हुए सबसे पहले यही समझ में आता है कि सत्रहवीं लोकसभा के लिए संपन्न चुनावों में नरेंद्र मोदी और सिर्फ नरेंद्र मोदी ने विजय हासिल की है। चुनाव के समय एकमात्र नारा था- फिर एक बार मोदी सरकार या अबकी बार मोदी सरकार। इस परिदृश्य में न तो कहीं भारतीय जनता पार्टी थी और न कहीं राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन या कि एनडीए। परिणाम आने के बाद अवश्य कहा जा सकता है कि चालीस पार्टियों का गठबंधन जीता है, लेकिन यह बच्चे के हाथ में झुनझुना थमा देने जैसी बात है। सच तो यह है कि चुनाव में भाजपा या एनडीए के प्रत्याशी तक मतदाता की स्मृति और सोच से नदारद थे। हर मुखर मतदाता यही कह रहा था कि मोदी को जिताना है। स्वतंत्र भारत में संसदीय जनतंत्र के इतिहास में यह पहली बार हुआ है। नेहरू, इंदिरा, राजीव, नरसिंह राव, वीपी सिंह, मोरारजी, वाजपेयी किसी ने भी खुद अपने नाम पर चुनाव नहीं लड़ा था। उनके व्यक्तित्व का जो लाभ मिला, वह समयोचित संयोग था।
याद करें कि 2014 के चुनाव में नरेंद्र मोदी की छवि को सामने रखा गया था, लेकिन तब चुनाव भारतीय जनता पार्टी के बैनर तले लड़ा गया था और भ्रष्टाचार से मुक्ति तथा देश के विकास के नाम पर वोट मांगे गए थे। पिछले पांच साल में भाजपा या घटक दल का हर नेता समय-असमय एक ही नारा लगाते मिलता था- विकास, विकास, विकास। इस बार के चुनाव अभियान में विकास को तलाक, तलाक, तलाक कह दिया गया। न नरेंद्र मोदी, न अमित शाह, न किसी प्रत्याशी, और न किसी बड़े नेता ने ही विकास का नाम लिया। 23 मई की शाम को भाजपा मुख्यालय में भाषण देते हुए मोदीजी ने आम जनता की तुलना भगवान कृष्ण से की, लेकिन सच तो यह है कि मोदीजी स्वयं कृष्ण की भूमिका निभाते हुए कह रहे थे- सर्वधर्मान परित्यज्य मामेकं शरणं वृज। हे बृजवासियो, हे देशवासियो! सब कुछ छोड़कर तुम मेरी शरण में आओ। तथास्तु। अहम् ब्रम्हास्मि मोदीवाद का पहला सूत्र है।
गठबंधन का नाम नहीं, पार्टी का नाम नहीं, मुद्दों की बात एक सिरे से गायब तो फिर वह ऐसा कौन सा आशादीप था जो पतिंगे की मानिंद मतदाताओं को मोदी की तरफ खींच रहा था? इसका जवाब 23 तारीख की दोपहर में छत्तीसगढ़ की प्रमुख भाजपा नेत्री सरोज पांडे ने दिया। एक रिपोर्टर से उन्होंने कहा- राष्ट्रवाद और देश की सुरक्षा। मैंने उनका कथन सुना, लेकिन देश में अन्यत्र भी अन्य नेतागण शायद यही बात कर रहे होंगे! इस राष्ट्रवाद को कैसे परिभाषित किया जाए, मैं नहीं जानता। इतना अवश्य पता है कि बीसवीं सदी के पूर्वाद्र्ध में चीनी राष्ट्रवाद, जापानी राष्ट्रवाद, कोरियाई राष्ट्रवाद जैसी भावनाएं प्रचलित थीं, जिनकी आलोचना विश्वकवि रवींद्रनाथ ठाकुर ने की थी। मैं यह भी नहीं समझ पाता कि हम एक देश में रहते हैं, देशवासी कहलाते हैं, लेकिन राष्ट्रवाद की तर्ज पर देशवाद जैसी कोई संज्ञा आजतक क्यों नहीं बनी! भाजपा के राष्ट्रवाद की व्याख्या शायद यही है कि 1947 में पाकिस्तान के नाम पर एक मुस्लिम राष्ट्र बन गया था, सो भारत को हिंदू राष्ट्र बनना ही चाहिए जिसमें मुसलमान दोयम दर्जे के नागरिक बनकर रहें। उनकी यह अवधारणा इजराइल के यहूदी राष्ट्रवाद से प्रेरित हो तो इसमें आश्चर्य की बात नहीं होगी। यह मोदीवाद का सूत्र क्रमांक दो है।
सुश्री सरोज पांडे ने सुरक्षा का मुद्दा भी सामने रखा। एक अरब तीन करोड़ की आबादी वाले भारत देश को किससे सुरक्षा चाहिए? क्या हम एक भयभीत देश हैं? हमने तो 1947 के अक्टूबर में ही जब देश नया-नया आजाद हुआ था, तब भी काश्मीर पर हमले को नाकाम कर दिया था; जिसमें बारामूला के मकबूल शेरवानी और ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान सबसे पहले शहादत पाने वालों में थे। हमने 1965 में पाकिस्तानी हमले को नाकाम किया, 1971 में बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम में निर्णायक सहायता की; 1998 में कारगिल से पाक को खदेड़ दिया; 1974 और 1999 में आण्विक क्षमता हासिल कर उसका परिचय दिया; फिर भी हमारे मन मेंं सुरक्षा को लेकर चिंता है? हम 1962 में अवश्य चीन से पराजित हुए थे लेकिन चीन हर दृष्टि से हमसे समर्थ था और हम युद्ध को लगातार टालने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन आज जब चीन के साथ हमारे घनिष्ठ वाणिज्यिक संबंध बन चुके हैं और चीन के राष्ट्रपति भारत के प्रधानमंत्री के साथ झूला झूलते हैं, तब चीन से भी कैसा डर? जो भी हो, सुरक्षा (पाकिस्तान का भय!) मोदीवाद का तीसरा सूत्र है।
शिवराज सिंह चौहान ने अपने उपरोक्त कथन में जातिवाद और वंशवाद समाप्त होने का भी उल्लेख किया। नतीज़े आने के बाद अनेक विश्लेषक व पत्रकार कह रहे हैं कि इन चुनावों में मतदाता ने जात-पांत से ऊपर उठकर वोट दिया और साथ ही उसने वंशवाद को नकार दिया। क्या सचमुच? अगर ऐसा है तो एनडीए में शामिल शेष उन्चालीस पार्टियों का राजनीतिक आधार क्या है? एक सांस में जातिवाद खत्म होने का दावा, और उसी सांस में यह प्रशंसा भी कि मोदी ने ओबीसी के उपेक्षित समुदायों को कैसे साथ लेकर गठबंधन तैयार किया। यह दोहरी बात क्यों? ओपी राजभर आपके साथ क्यों थे? अनुप्रिया पटेल आपके साथ क्यों हैं? गिरिराज सिंह की सीट बदलकर बेगूसराय से क्यों उतारा गया? छत्तीसगढ़ की बिलासपुर और महासमुंद सीट से साहू के बदले साहू को ही टिकिट क्यों दिया गया? फिर भी आप कहते हैं तो मान लेते हैं कि आपने जातिवाद समाप्त कर दिया है। वंशवाद का जहां तक सवाल है, वह तो सोनिया-राहुल तक सीमित है। मेनका-वरुण तो अपनी काबलियत से आगे बढ़े हैं। बाकी किसी गिनती में नहीं आते। मोदीवाद का चौथा सूत्र-तुम्हारे पैर पैर, हमारे पैर चरण।
देश के (या राष्ट्र के!) मतदाता बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने मोदीवाद के इन तमाम सूत्रों को आत्मसात किया और ट्रंप, पुतिन, एरदोगान, नेतन्याहू, अबे, दुतार्ते की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए एक ''स्ट्रांग लीडर'' को अपना नेतृत्व करने के लिए चुना। आज की दुनिया की शायद यह सामान्य रीति बन गई है कि हमें सलाह-मशविरा करने वाले, आम सहमति कायम करने वाले नहीं, आनन-फानन में सही या गलत, दृढ़ निर्णय लेने वाले नेताओं की आवश्यकता आन पड़ी है।
लेख समाप्त करने के पहिले एक बात उनसे जो इन चुनावी नतीजा को लेकर संशयग्रस्त हैं। एक्जिट पोल आने के आसपास आरटीआई कार्यकर्ता वेंकटेश नायक ने टीवी पर बताया कि ईवीएम का खोखा तो भारत में निर्मित है, लेकिन उसकी माइक्रो प्रोसेसिंग चिप विदेश से आयातित हैं, जिसमें फिट फ्लैश मेमोरी मनचाहा कमाल कर सकती है। क्या कांग्रेस पार्टी श्री नायक की इस दौड़धूप से अनभिज्ञ थी? उसने समय रहते इसका खुलासा क्यों नहीं किया? फ्लैश मेमोरी वाली चिप किन कंपनियों से खरीदी गई, उनकी अपनी साख क्या थी, ये सारे बिंदु सुप्रीम कोर्ट और जनता की अदालत दोनों में समय रहते रखे जाते तो कुछ बात बनती। अब लकीर पीटने से क्या होना है!
#देशबंधु में 30 मई 2019 को प्रकाशित
  
 

Thursday, 23 May 2019

गहलौत, नाथ, बघेल और आने वाले दिन


इस वक्त आप शायद टीवी स्क्रीन पर नजरें गड़ाए बैठे होंगे! आज सत्रहवीं लोकसभा के बहुप्रतीक्षित चुनाव परिणाम आने का दिन जो है। टीवी स्टूडियो में सुबह छह बजे से ज्ञानी, पंडित, विश्लेषक आकर बैठ गए होंगे और अभी शायद डाक मतपत्रों की गणना शुरू हो गई होगी! ऐसे में आज आपको मेरा कॉलम पढ़ने का भी समय और धीरज कहां होगा? मैं आज कॉलम न भी लिखता तो काम चल जाता, मेरी ही मेहनत बचती, लेकिन पिछले सत्रह सालों में जब एक भी हफ्ते व्यवधान नहीं हुआ तो आज का गुरुवार ही अपवाद क्यों बने, यही सोचकर लिखने बैठ गया। दिक्कत विषय चुनने की भी है। एक्जाट पोल पहिले ही आ चुके हैं। पिछले रविवार की शाम से उन पर चकल्लस चल रही है। मैं खुद भी सोशल मीडिया पर अपनी अकल के नमूने पेश कर चुका हूं। इस क्षण उस बारे में बात करने का कोई मतलब नहीं है। चुनाव परिणाम शाम-रात तक आ ही जाएंगे, तब उन पर बहस होगी। फिलहाल, क्या यह बेहतर नहीं होगा कि मैं कुछ ऐसी चर्चा करूं जिस पर अमूमन अभी ज्ञानीजनों का ध्यान नहीं गया है?
मैं उन तीन राज्यों के बारे में कुछ बातें करना चाहता हूं, जिनमें विगत नवंबर 2018 में विधानसभा चुनाव हुए थे। मेरा आशय राजस्थान, मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ से है। जैसा कि आपको ध्यान होगा, इन तीनों राज्यों के चुनाव परिणाम 11 दिसंबर को घोषित हुए और उसके एक सप्ताह बाद 17 दिसंबर को तीनों नवनिर्वाचित मुख्यमंत्रियों ने अपना-अपना पदभार ग्रहण किया। उन्हें अपना मंत्रिमंडल गठित करने में इसके बाद कुछ दिन और लग गए। इस बीच 10 मार्च 2019 को केंद्रीय चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनावों की अधिसूचना जारी कर दी, जिसके बाद सारे सरकारी कामकाज एक तरह से रुक ही गए। सीधा गणित है कि इन तीनों प्रदेशों की नई सरकारों को मात्र पैंसठ या सत्तर दिन ही मिल पाए, जिसमें वे अपने चुनावी वायदों और पार्टी की नीतियों के अनुरूप कुछ ठोस काम कर पाते। बाकी तो दैनंदिन प्रशासन अपनी गति से चलना ही था। देश के अन्य राज्यों की तुलना में इन राज्यों में, कह सकते हैं, कि एक विशिष्ट परिस्थिति निर्मित हो गई थी।
तीन नई सरकारें। तीन नए मुख्यमंत्री। इनमें शायद सबसे कम परेशानी राजस्थान के अशोक गहलोत के सामने थी। वह इसलिए कि वे पहले भी दो बार पूरे पांच साल के लिए मुख्यमंत्री पद सम्हाल चुके थे और राज्य के प्रशासन तंत्र पर उनकी पकड़़ पहिले से थी। मेरा अनुमान है कि राजस्थान में चूंकि सरकारें पांच साल में बदलती रही हैं, इसलिए नौकरशाही भी दूसरे राज्यों के मुकाबले व्यक्ति निष्ठा अथवा दलीय निष्ठा से किसी हद तक मुक्त रही होगी। मध्यप्रदेश का मामला इस लिहाज से अधिक गंभीर था। कमलनाथ वैसे तो सन् 1980 से लगातार लोकसभा सदस्य रहे हैं और चुनावों के एक साल पहिले वे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बन गए थे, फिर भी उनके सामने कई तरह की अड़चनें थीं। यह याद रखना होगा कि राजस्थान व मध्यप्रदेश दोनों में कांग्रेस को स्पष्ट जनादेश मिलने में कुछ कसर रह गई थी। राजस्थान में सत्ताच्युत भाजपा कांग्रेस को चुनौती देने लायक सीटें नहीं जीत पाई, किंतु मध्यप्रदेश में दोनों के बीच मात्र चार सीटों का अंतर था और भाजपा किसी कदर उद्धत होकर अपनी पराजय मानने तैयार न थी और न है।
एक अन्य परिस्थिति का भी उल्लेख करना चाहिए। राजस्थान में युवा प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे, लेकिन गहलोत की वरिष्ठता का आदर व उपमुख्यमंत्री मिल जाने के कारण वहां कोई आंतरिक संकट उपस्थित नहीं हुआ। मध्यप्रदेश में कमलनाथ प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते स्वाभाविक रूप से मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे, लेकिन युवा ज्योतिरादित्य सिंधिया व हमउम्र दिग्विजय सिंह के साथ जाने-अनजाने उनकी तुलना होने लगी। यहां तक बातें उठीं कि सरकार तो दिग्विजय चला रहे हैं। अजय सिंह, राहुल, सुरेश पचौरी, अरुण यादव भी नेपथ्य में विद्यमान थे। लेकिन इन सबसे बढ़कर दो अन्य कारण भी थे। एक तो कमलनाथ को प्रदेश सरकार चलाने का कोई अनुभव नहीं था। वे कैलाशनाथ काटजू व प्रकाशचंद सेठी की परंपरा के मुख्यमंत्री हैं। केंद्र में अनेकानेक कार्य सुनिश्चित नीति और प्रक्रिया से चलते हैं जबकि मध्यप्रदेश जैसे राज्य में लगभग सारे समय प्रशासन में अस्त-व्यस्तता का माहौल बना रहता है। दूसरे, प्रदेश की नौकरशाही पिछले पंद्रह सालों के दौरान भाजपा व शिवराज सिंह के साथ काम करने के अभ्यस्त हो चुकी है।
हम देख रहे हैं कि एक्जिट पोल आने के बाद शायद इन सभी कारणों से मध्यप्रदेश में भाजपा के हौसले एक बार फिर बुलंद हो गए हैं। प्रतिपक्ष के नेता गोपाल भार्गव ने तो राज्यपाल को पत्र लिखकर विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की मांग कर दी है, जबकि उसके लिए फिलहाल कोई तर्कसंगत आधार नहीं है। आशंका होती है कि चुनाव परिणाम आने के बाद भाजपा कमलनाथ सरकार को अपदस्थ करने के लिए हरसंभव प्रयत्न करेगी। भाजपा का यह अतिउत्साह और आत्मविश्वास का अतिरेक जनतांत्रिक परंपराओं के विपरीत दिखाई देता है। सामान्य तौर पर विधानसभा का मानसून सत्र जुलाई में आहूत होगा। क्या शिवराज सिंह और गोपाल भार्गव डेढ़-दो माह भी धैर्य नहीं रख सकते? तिस पर तुर्रा यह कि ''हमने कांग्रेस को सरकार बनाने दी।" बहुत मेहरबानी आपकी। लेकिन फिर गोवा और मेघालय और मणिपुर में इतनी ही दयानतदारी दिखा देते। अच्छी बात है कि कमलनाथ ने बेहद संयत स्वर में इनकी चुनौती को कबूल कर लिया है।
छत्तीसगढ़ की स्थिति राजस्थान और मध्यप्रदेश दोनों से भिन्न है। मोदी-शाह तंत्र की सोच थी कि यहां तो भाजपा लगातार चौथी बार जीतेगी, जिसका असर म.प्र. व राजस्थान में भी होगा। यही सोचकर सबसे पहिले विधानसभा चुनाव छत्तीसगढ़ में करवाए गए। लेकिन भाजपा का दांव उल्टा पड़ गया। छत्तीसगढ़ से जो लहर उठी, उससे म.प्र. व राजस्थान में कांग्रेस को कुछ न कुछ लाभ ही पहुंचा। यहां कांग्रेस ने तीन चौथाई बहुमत हासिल किया तो पूरे देश में पार्टी के भीतर नए उत्साह का संचार हुआ। भूपेश बघेल, टीएस सिंहदेव, ताम्रध्वज साहू, रवींद्र चौबे आदि सभी वरिष्ठ नेताओं को दूसरे प्रदेशों में भी लोकसभा चुनाव में मदद करने भेजा गया। टीएस बाबा ओडिशा के प्रभारी बनाए गए, जबकि मुख्यमंत्री भूपेश मध्यप्रदेश व उत्तरप्रदेश के अनेक क्षेत्रों में स्टार प्रचारक के रूप में भूमिका निभाते नज़र आए। यह कहना शायद गलत नहीं होगा कि पार्टी के भीतर भूपेश एक कद्दावर ओबीसी नेता बनकर उभरे हैं। यह तस्वीर का एक पहलू है। इसका दूसरा पक्ष भी देख लेना चाहिए।
इसमें संदेह नहीं कि भूपेश सरकार को इस बीच काम करने के लिए जो सत्तर दिन मिले, उनमें कर्ज माफी जैसे अनेक कदम त्वरित रूप से उठाए गए। वायदे निभाए गए। लेकिन अब सामने चुनौतियों का अंबार लगा है। राज्य के प्रशासन तंत्र को लेकर जो स्थिति म.प्र. में है, वही छत्तीसगढ़ में है। मुख्यमंत्री को सर्वोच्च वरीयता देकर ऐसा तंत्र स्थापित करने की जरूरत है जो राग-द्वेष, ईर्ष्या प्रतिद्वंद्विता, भ्रष्टाचार से मुक्त होकर सरकार की रीति-नीति के अनुसार काम करे और परिणाम दे सके। शीर्ष नेताओं के बीच आपसी खींचतान की जो $खबरें आ रही हैं, वे भी चिंता उपजाती हैं। मतभेद होना सामान्य है, लेकिन उनके समाधान संभव है और इन्हें अखबारों की गपशप बनने से बचाने की फौरी आवश्यकता है। आज शाम को चुनाव परिणाम घोषित होने के साथ ही सरकारी कामकाज पर लगी रोक हट जाएगी। मेरी अपनी राय में युवा मुख्यमंत्री को अब अधिकतर समय अपने कार्यालय में बैठकर प्रशासन को सही दिशा व गति देने पर केंद्रित करना वांछित होगा
#देशबंधु में 23 मई 2019 को प्रकाशित
  
 

Thursday, 16 May 2019

एक गैर-चुनावी चर्चा


देश में इन दिनों चारों तरफ आम चुनावों का माहौल है, लेकिन इसी बीच रायपुर में एक गैर-चुनावी घटना से प्याली में तूफान उठने की स्थिति बन गई। हुआ यह है कि प्रदेश के चर्चित आरटीआई कार्यकर्ता कुणाल शुक्ल एक दिन सुबह-सुबह वरिष्ठ विधायक और पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के सरकारी बंगले को खाली करने की मांग लेकर बंगले के सामने ही धरने पर बैठ गए। धरना अधिक देर तक नहीं चल पाया। पुलिस आई और उन्हें उठाकर ले गई। लेकिन इस घटना ने झील में कंकड़ फेंकने का काम तो कर ही दिया और मुझ जैसे लोगों को सोचने के लिए मसाला दे दिया।
भाजपाई बृजमोहन अग्रवाल सन् 1990 में पहली बार विधायक बने। हाल में संपन्न विधानसभा चुनावों में उन्होंने लगातार सातवीं बार जीत का रिकॉर्ड बनाया है। तीस साल की उम्र में विधायक बने बृजमोहन अब साठ सीढ़ियां पार कर चुके हैं। वे एक संपन्न व्यापारी परिवार से आते हैं, लेकिन नगर की जनता मुख्यत: उनकी मिलनसारिता से प्रभावित होती है। जब राजधानी भोपाल में थी, तब भी छत्तीसगढ़ से कोई भोपाल जाए तो बृजमोहन के सरकारी घर पर यथोचित ध्यान रखा जाता था। रायपुर में वे शहर की सड़कों पर अपने स्कूटर पर ही घूमने, पान खाने, मिलने-मिलाने निकल जाते थे। रायपुर के ही एक कांग्रेसी विधायक कुलदीप जुनेजा उनका अनुसरण करते नजर आते हैं। कुलदीप को भी स्कूटी की सीट पर अपना दफ्तर जमाए देखा जा सकता है। लेकिन माफ कीजिए, मैं बहक गया। बात तो बंगले की हो रही थी।
2003 में छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार बनी बृजमोहन को मंत्री पद हासिल हुआ और उन्होंने बिना समय गंवाए रायपुर की सिविल लाइंस के सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले बंगले पर कब्जा कर लिया। यह परंपरा से रायपुर संभाग के कमिश्नर का बंगला था, जो राज्य बनने के बाद प्रदेश के मुख्य सचिव के नाम हो गया था। चीफ सेक्रेटरी अरुण कुमार इसमें रहे और रिटायर होने के बाद प्रशासनिक सुधार आयोग के अध्यक्ष की हैसियत से भी वहीं काबिज रहे आए। लेकिन मंत्रीजी नौकरशाह पर भारी पड़ गए। अरुण कुमार को बंगला छोड़ना पड़ा। तब से बृजमोहन अग्रवाल का निवास यहां बना हुआ है याने पंद्रह साल कुछ माह से। यह समझ आता है कि प्रदेश के वरिष्ठतम विधायकों में से एक श्री अग्रवाल को एक सुविधायुक्त आवास की सुविधा होना चाहिए, लेकिन उन्हें इसी जगह से इतना मोह है तो उसका कोई कारण अवश्य होगा!
मुश्किल यह हुई है कि पंद्रह साल बाद सत्ता में लौटी कांग्रेस के नए-नवेले मंत्री रुद्रकुमार गुरु ने अपने आवास के लिए इसी बंगले को चुन लिया। रायपुर कमिश्नर के इस सौ साल पुराने बंगले में ऐसी क्या कोई खासियत होगी जो किसी मंत्री को अपनी ओर आकर्षित करती है? श्री गुरु का कथन है कि वे शिफ्ट होंगे तो इसी बंगले में वरना अपने पैतृक आवास से ही काम चलाते रहेंगे। उन्हें दूसरे सरकारी आवास में जाना कुबूल नहीं है। लेकिन हमारी समझ में बात नहीं आई कि कुणाल शुक्ल एकाएक रुद्रकुमार गुरु के हनुमान क्यों बन गए! वे एक ऊर्जावान युवा हैं जो पिछले कई सालों से सूचना के अधिकार कानून व जनहित याचिका आदि का सहारा लेकर प्रशासन तंत्र की जवाबदेही सुनिश्चित करने के उपक्रम में लगे रहते हैं। इस बंगला प्रसंग में भी उन्होंने शायद जनहित मानकर ही हस्तक्षेप किया होगा; लेकिन प्रतीत होता है कि इस पूरे मामले के जितने स्टेकहोल्डर याने हितग्राही हो सकते हैं, वे इस ओर से पूरी तरह निर्विकार हैं।
मुझे इस संदर्भ में कुछ सप्ताह पहले लिखे अपने ही एक लेख की याद हो आई। सन् 2000 में राज्य गठन के बाद स्वाभाविक था कि मंत्रियों को शासकीय आवासगृहों या कि बंगलों की आवश्यकता पड़ती। मंत्री द्वय सत्यनारायण शर्मा व अमितेश शुक्ल पूर्व से ही रायपुर के स्थायी निवासी थे। शर्माजी ने जनसंकुल बांसटाल की गली में अपने निजी आवास में ही रहना पसंद किया। वह मकान उनके लिए सदा से मंगलकारी था। वहीं से उनकी राजनीति परवान चढ़ी। अमितेश का खम्हारडीह का सुसज्जित बंगला तो वैसे भी पूर्व मुख्यमंत्री का निजी आवास था, सो उसमें शुभ-लाभ सोचने की कोई बात नहीं थी। अगर अन्य किसी मंत्री ने भी इन उदाहरणों का अनुकरण किया हो तो मुझे ध्यान नहीं है।
फिलहाल, मेरा ध्यान इस तथ्य पर जाता है कि बृजमोहन अग्रवाल ने 1990 के अपने पहले चुनाव के बाद 1993, 1998 और 2003 के चुनाव भी रामसागरपारा में अपने पैतृक निवास से ही जीते थे। अगले तीन चुनाव अर्थात 2008, 2013 व 2018 की विजय उन्हें मंत्री बंगले में रहते हुए प्राप्त हुई। किंतु इससे जुड़ा तथ्य यह भी है कि यह पुराना बंगला अपने तमाम रंग-रोगन के बावजूद उनकी महत्वाकांक्षा पूरी करने में सहायक नहीं बन सका। छत्तीसगढ़ भाजपा में उनकी ख्याति चुनावी रणनीतिकार के रूप में रही है। विगत पंद्रह सालों में भाजपा जितने भी चुनाव-उपचुनाव जीती है, उसमें बृजमोहन ने महती भूमिका निभाई है। यह राजनीति की विडंबना है कि इसके बाद भी वे जहां पहुंचना चाहते थे, नहीं पहुंच सके हैं। मेरी समझ में रुद्रकुमार गुरु के लिए भी यहां एक अव्यक्त संदेश है। जिस घर में रहकर दो बार विधायक और फिर मंत्री बने, वहीं बने रहने में क्या परेशानी है। अफसरों के बंगले तो वैसे भी तबादले पर आने-जाने वालों के लिए बनते हैं। उनसे क्यों मोह पाला जाए?
जो बात मंत्रियों पर लागू होती है, वह विधायकों पर भी लागू होना ही है। जशपुर के राजकुमार युद्धवीर सिंह विधायक बने तो उन्होंने रायपुर में एनआईटी डायरेक्टर के लिए नामांकित आवास पर कब्जा कर लिया। एक संपन्न राजपरिवार के वारिस होने के नाते शहर में कहीं भी वे अपनी मर्जी का आवास ले सकते थे। मालूम नहीं, शिक्षकों की कालोनी, विद्यार्थियों के छात्रावास के निकट रहने में उन्हें क्या सुख मिला। उनके नक्शेकदम पर रायपुर पश्चिम के तेजतर्रार युवा विधायक विकास उपाध्याय चल पड़े हैं। उन्होंने जिस बंगले पर आधिपत्य जमाया है वह छत्तीसगढ़ के सबसे प्रतिष्ठित शासकीय विज्ञान महाविद्यालय के प्राचार्य का नामांकित आवास है। उन्हें यहां आकर रहने की क्या सूझी? विकास का आधा समय तो धरना, प्रदर्शन, जन आंदोलन में जाता है। अब कुछ समय विधानसभा में बीतेगा। दिन भर की मशक्कत के बाद एक अच्छी नींद लेने के लिए वह पुराना घर क्या बुरा था? जनसंपर्क करना है, लोगों से मिलना-जुलना है तो कुलदीप जुनेजा को अपना आदर्श बनाने में कोई हर्ज नहीं है। अनुपम गार्डन में पेड़ की छाँह तले बैठकर भी जनता के साथ संवाद किया जा सकता है।
मेरी बात व्यक्ति को लेकर नहीं, वरन हाल-हाल में पनप रही एक नई प्रवृत्ति को लेकर है। हमारे निर्वाचित प्रतिनिधियों का ध्यान सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की ओर जाना चाहिए। उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि में पूर्व मुख्यमंत्रियों को आबंटित बंगले निरस्त कर दिए गए हैं। मोतीलाल वोरा, मुलायम सिंह, मायावती तक को बंगले खाली करने पड़े हैं। इसी तरह सुप्रीम कोर्ट ने लालबत्ती का प्रयोग भी निषिद्ध कर दिया। जननेता की पहचान लाव-लश्कर से नहीं, जनसामान्य के प्रति उसके व्यवहार व सरोकार से बनती है। कथित चायवाले को जनता ने चुना, लेकिन सोने के धागे से बुने नाम वाले सूट को उसने पसंद नहीं किया। बंगलों की चर्चा चलने पर मुझे अनायास 1956 का भोपाल याद आने लगता है। विधायक विश्रामगृह क्रमांक 1, 2 और 3 में विधायकगण सत्र के दौरान आकर ठहरते थे। सत्रावसान के बाद क्षेत्र में लौट जाते थे। यही हमने दिल्ली में देखा। नॉर्थ एवेन्यू व साउथ एवेन्यू में संसद सदस्यों के लिए फ्लैट बने हैं। एलआईजी मानदंड के फ्लैट, जिनमें संसद सत्र के दौरान सदस्य रुकते हैं। मध्यप्रदेश में तीन बार मुख्यमंत्री रहे श्यामाचरण शुक्ल भी जब लोकसभा में पहुंचे तो नॉर्थ ब्लॉक का फ्लैट ही उन्हें मिला। कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ सांसद इंद्रजीत गुप्त तो अंत तक वेस्टन कोर्ट के एक कमरे में ही रहते रहे। अगर ये उदाहरण प्रेरणा दे सकें तो ठीक, अन्यथा जो चल रहा है, वह चलता रहेगा।
#देशबंधु में 16 मई 2019 को प्रकाशित