Wednesday, 17 December 2014

वे जीवनदानी थे




ऐसा
क्यों होता है कि कुछ प्रसंग हमेशा के लिए स्मृतिकोष में सुरक्षित हो जाते हैं! अशोक सेक्सरिया से मेरी पहली मुलाकात का प्रसंग भी कुछ ऐसा ही है। श्रीकांत वर्मा ने दिल्ली में दिनमान के दफ्तर में मुझे उनसे मिलवाया था। यह 1967 की बात है। मैं श्रीकांत जी से मिलने गया था और तभी अशोक जी उनसे मिलने आ गए थे। जहां तक मुझे याद है दोनों एक ही इमारत की एक ही मंजिल पर काम करते थे। श्रीकांत जी दिनमान में उपसंपादक थे और अशोक जी दैनिक हिन्दुस्तान के संपादकीय विभाग में थे। वे एक कथाकार के रूप में तब तक प्रसिद्धि पा चुके थे। मैंने उनकी कुछ कहानियां पढ़ रखी थीं। मुझ तरुण के लिए एक चर्चित लेखक से मिल पाना प्रसन्नता का ही विषय था। उस दिन हम लोग कोई आधा घण्टा साथ में बैठे होंगे। इसके बाद उनके साथ यदा-कदा भेंट तो हुई, लेकिन ऐसी नहीं कि जिसका कोई खास जिक्र किया जा सके।

एक समय पता चला कि वे दिल्ली छोड़कर कोलकाता वापिस जा चुके हैं। हमारे परिचय को तब ताजा करवाया उनके अभिन्न मित्र और दूसरे समर्थ कथाकार प्रबोध कुमार ने। इस बीच अशोक जी का जीवन एक नए माहौल में ढल चुका था। वे यूं तो देश के एक प्रतिष्ठित व्यवसायिक घराने से ताल्लुक रखते थे, लेकिन विरासत में प्राप्त वैभव का उपयोग करने अथवा व्यवसाय को बढ़ाने के प्रति उनकी कोई रुचि नहीं थी। लक्ष्मी उन्हें बांधकर कभी नहीं रख सकी। इतना मैं जानता हूं कि वे शुरु से ही समाजवादी राजनीति से, खासकर डॉ. राममनोहर लोहिया से, बहुत ज्यादा प्रभावित थे तथा अंतिम समय तक समाजवादी मूल्यों के लिए जीते रहे।

कोलकाता में उनके परिवार की विशाल कोठी थी। उन्होंने एक कमरे को ही अपना घरौंदा बना लिया था। उन्होंने विवाह तो किया ही नहीं था। उनकी अपनी जरूरतें भी बहुत सीमित थीं। उनके इस कमरे में चारों तरफ किताबें थीं। बीच में एक पलंग या तख्त पर उनका आसन हुआ करता था। कोलकाता के उमस भरे मौसम में भी वे एक पुराने पंखे से ही अपना काम चलाते थे। पढऩे के अलावा उनको अगर कोई लत थी तो शायद बीड़ी पीने की। अपने इस एकांत में उन्होंने कुछ ऐसे काम किए जिनके लिए हिन्दी जगत उनका ऋणी रहेगा।

हिन्दी पाठक रोशनाई प्रकाशन नामक प्रतिष्ठान से संभवत: परिचित होंगे। यहां से अनेक उत्कृष्ट कृतियां सस्ते दामों पर लगातार प्रकाशित होती रही हैं। बेबी हालदार की विश्व प्रसिद्ध आत्मकथा 'आलो आंधरि' भी सबसे पहले पहल यहीं से छपी। इस प्रकाशनगृह के कर्ताधर्ता संजय भारती बता सकते हैं कि सस्ते दामों पर साहित्य प्रकाशित करने की प्रेरणा उन्हें अशोक सेक्सरिया से ही मिली। बेबी हालदार को लिखने की प्रेरणा प्रबोध कुमार ने दी, जबकि उसकी पुस्तक प्रकाशित करने में अशोक जी ने खासी भूमिका निभाई, लेकिन वे एक तरह से जीवन भर बेबी के संरक्षक या धर्मपिता का दायित्व भी निभाते रहे। उन्होंने एक काम और किया।  सेक्सरिया परिवार के वाहन चालक महेन्द्र (शायद यही नाम था) और उसके माता-पिता को उन्होंने जोर देकर समझाया कि आज के समय में उचित नहीं है कि महेन्द्र की नवपरिणीता निरक्षर रही आए। उन्होंने उसे पहले स्कूल पढऩे भेजा और फिर एक दिन उसके हाथ में भी कलम थमा दी कि वह अपनी जीवन गाथा लिखे। सुशीला राय की 'एक अनपढ़ कहानी' यह पुस्तक भी रोशनाई से ही छपी है।

एक और दिलचस्प प्रसंग। कोलकाता स्थित भारतीय भाषा परिषद ने अपने परिसर में अंग्रेजी माध्यम शाला या किंडरगार्टन खोल दिया तो अशोक जी उसके खिलाफ धरने पर बैठ गए, जबकि परिषद के तमाम कर्ताधर्ता मित्र और उनके परिजन ही थे।  29 नवम्बर को अशोक सेक्सरिया के निधन के साथ हिन्दी ने एक सच्चे साधक को खो दिया, लेकिन मेरे लिए तो यह एक निजी हानि है।

इस दु:ख से उबर पाता इसके पहले एक और हृदय विदारक घटना हो गई। 4 दिसम्बर को डॉ. रमेशचन्द्र महरोत्रा का बिलासपुर में निधन हो गया। महरोत्रा जी ने एक अलग ढंग से असाधारण जीवन जिया। वे रविशंकर वि.वि. रायपुर के प्रारंभिक वर्षों में ही भाषा विज्ञान के प्राध्यापक बनकर आए थे। उनसे कब परिचय हुआ था यह तो मुझे याद नहीं लेकिन जब भी हुआ हो, यह परिचय दिनोंदिन प्रगाढ़ होते गया और आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं तो मैं एक रिक्ति महसूस कर रहा हूं।

रमेशचन्द्र महरोत्रा भाषा विज्ञान के उद्भट अध्येता थे। मैंने किसी दिन बात-बात में उन्हें कॉलम लिखने का प्रस्ताव दिया होगा और वे तुरंत राजी हो गए। उनका साप्ताहिक कॉलम 'दो शब्द' शायद बीस साल से भी अधिक समय तक देशबन्धु में हर रविवार को नियमत: प्रकाशित होते रहा तथा अपार लोकप्रिय हुआ। हिन्दी भाषा के प्रति रुचि जागृत करने एवं भाषा का सम्यक ज्ञान प्राप्त करने के लिए इस कॉलम की उपादेयता स्वयंसिद्ध थी। राजकमल प्रकाशन ने इस कॉलम के लेखों को पांच खंडों वाले वृहद ग्रंथ के रूप में कुछ साल पहले प्रकाशित किया। हिन्दी भाषा को वैज्ञानिक आधार लेकर लोकप्रिय बनाने में इस तरह महरोत्रा जी ने जो योगदान किया वह मेरी दृष्टि में अनुपमेय है।

महरोत्रा जी भाषा-शास्त्री थे इस नाते अपने विषय पर उन्होंने कुछ लिखा तो कहा जा सकता है कि यह कोई बड़ी बात नहीं थी, लेकिन वि.वि. में एक ऊंचे पद पर सुविधापूर्ण जीवन बिताने का अवसर आने के बाद भी जो अन्य काम किए, वे उन्हें अपने समकालीनों से अलग खड़ा कर देते हैं। यह जानकारी बहुतों के लिए आश्चर्यजनक होगी कि रमेशचन्द्र महरोत्रा ताउम्र साइकिल पर चलते रहे। कभी किसी झोंक में उन्होंने कार खरीदी होगी, तो उसे कभी चलाया नहीं और बेटी संज्ञा ससुराल गई तो कार भी पीछे-पीछे भेज दी गई। महरोत्रा दंपत्ति ने भी अपनी निजी जरूरतें बहुत सीमित कर रखी थीं। उन्हें भौतिक सुविधाओं का लेशमात्र भी लोभ नहीं था। विश्वविद्यालय की प्रोफेसरी से जो वेतन भत्ते मिल रहे थे उसका एक थोड़ा सा हिस्सा ही वे अपने ऊपर खर्च करते थे, बाकी समाजसेवा के लिए सुरक्षित।

महरोत्रा दंपत्ति याने रमेशचन्द्र एवं उमा महरोत्रा ने विधवा व परित्यक्ताओं के सूखे जीवन में फिर से बहार आ सके इसका बीड़ा उठाया और रायपुर में विधवा विवाह केन्द्र की स्थापना की। हमारे रूढिग़्रस्त समाज में विधवा विवाह को सामाजिक स्वीकृति मिले, इस बारे में जनचेतना जागृत हो, इसके लिए उन्होंने देशबन्धु प्रतिभा प्रोसाहन कोष के माध्यम से छात्रवृत्तियां स्थापित कीं। यही नहीं, वे प्रदेश के पहले दंपत्ति थे जिन्होंने देहदान का संकल्प किया। यह निर्णय उन्होंने उस समय किया जब देहदान  और नेत्रदान तो दूर, रक्तदान के संदर्भ में भी आम जनता के बीच तरह-तरह की भ्रांतियां थीं। इस तरह उन्होंने एक ओर जहां अपनी भौतिक संपदा को समाज के काम में लगाया वहीं अपने पार्थिव शरीर भी चिकित्सा शिक्षा के माध्यम से समाज के लिए दान कर दिए।

एक वर्ष पूर्व श्रीमती उमा महरोत्रा का बिलासपुर में निधन हो गया। तब मित्रों की सलाह थी कि बिलासपुर मेडिकल कॉलेज में उन्हेंं दान कर दिया जाए, लेकिन वे वचन के ऐसे पक्के कि रायपुर मेडिकल कॉलेज में देहदान का संकल्प किया था इसलिए पार्थिव देह यहीं लाएंगे। उनकी इसी भावना का पुन: सम्मान करते हुए महरोत्रा जी का शव लेकर बेटी संज्ञा और दामाद राजेश रायपुर आए और यहां मेडिकल कॉलेज में देहदान किया गया।

अशोक सेक्सरिया और रमेशचन्द्र महरोत्रा- दोनों की अलग पृष्ठभूमि, काम करने का अलग अंदाज, अलग-अलग समझ, लेकिन दोनों में यही उत्कट भावना थी कि मनुष्य जो कुछ है समाज के कारण है। इसलिए उसकी जो भी सामर्थ्य है वह समाज के वृहत्तर हित में लगना चाहिए। मेरा सौभाग्य कि मैं ऐसे दो जीवनदानियों के संपर्क में आया और दुर्भाग्य कि एक सप्ताह के अंतराल में इन दोनों अग्रज मित्रों को खो दिया।


देशबन्धु में 18 दिसंबर 2014 को प्रकाशित

Wednesday, 10 December 2014

गोवा में चार दिन


 पिछले दस-ग्यारह साल के दरम्यान गोवा काफी कुछ बदल गया है। मैंने 2003 में कुछ दिन यहां सैलानी के रूप में बिताए थे। उसके बाद एक कांफ्रेंस के सिलसिले में एक और संक्षिप्त यात्रा हुई, लेकिन तब सारा वक्त सम्मेलन की मशगूलियों में ही बीत गया था। अभी नवम्बर के अंत में फिर चार दिन गोवा में रहने का मौका मिला। यूं तो इस बार भी मैं एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में शिरकत करने के लिए गया था, लेकिन सभा स्थल से बाहर निकलकर गोवा के जनजीवन की झलकियां देख सकूं, इतना समय अवश्य मिल गया था। मेरी दिलचस्पी उन स्थानों को देखने में नहीं थी जहां सैलानियों की भीड़ इकट्ठी होती है गो कि एक दिन मित्रों के साथ चंद घंटे इस तफरीह में ही बीते। मैं चाहता था कि सैरगाहों से हटकर जो गोवा है उसे भी देखा जाए और मेरी यह इच्छा किसी हद तक पूरी भी हुई।

मैं जब 2003 में पहली बार यहां आया था तब गोवा में बड़े पैमाने पर भवन निर्माण की गतिविधियां शुरू होने-होने को थीं। आज उसका कोई पारावार नहीं है। आप किसी भी तरफ चले जाइए, नई-नई कालोनियां बस रही हैं, सात-सात मंजिल की अट्टालिकाएं खड़ी हो रही हैं, नित नए होटल खुल रहे हैं, कितने ही नए पुल बन गए हैं। दूसरी ओर खेती सिमटती जा रही है, हरियाली अभी भी बहुत है, लेकिन पहले के मुकाबले कम हो गई है। इसका इस द्वीप-प्रदेश के पर्यावरण पर प्रभाव पडऩा शुरु हो गया है। ये जो कुछ नवनिर्माण हो रहा है गोवावासियों के लिए नहीं, बल्कि मुख्य रूप से उन लोगों के लिए जो शहर के कोलाहल से दूर शांतिपूर्ण जीवन बिताने के लिए गोवा आकर बस जाना चाहते हैं। लेकिन अगर यही रफ्तार बनी रही तो शांति का स्थान कोलाहल को लेने में कितना वक्त लगेगा?

गोवा की इस प्रगति को देखते हुए ही मुझे ध्यान आया कि एक समय भारत में तीन स्थान अवकाश-प्राप्त लोगों के लिए और साधन-सम्पन्न तबकों के लिए स्वर्ग माने जाते थे। पश्चिम भारत में पूना या पुणे, दक्षिण भारत में बैंगलोर या बंगलुरू और पूर्वी भारत में रांची; उत्तर भारत में तो हिल स्टेशन थे ही। इन स्थानों पर रिटायर्ड लोग घर बना लेते थे। फिल्म अभिनेता वगैरह भी यहां अपनी गर्मी की छुट्टियां बिताने आया करते थे। आबोहवा अच्छी थी, खूब हरियाली थी, आस-पास जलप्रपात और अन्य सुरम्य स्थल थे, लेकिन प्रथम तो औद्योगिकीकरण ने इन स्थानों की तस्वीर विकृत कर दी। दूसरे, अपने मूल स्वरूप में ये स्थान बड़े शहरों से भागकर आए कितने लोगों को शरण दे सकते थे? परिणाम यह हुआ कि यहां सुविधाएं चाहे जितनी हों, स्वर्ग होने का दर्जा तो इन्होंने खो ही दिया है। गोवा भी उसी दिशा में चल पड़ा है।

एक तरह से देखें तो गोवा अब तीन हिस्सों में बंट गया है। एक हिस्सा वह है जिसमें गोवानी बसते हैं, दूसरा- सैलानियों का गोवा और तीसरा अप्रवासियों का। फिलहाल ऐसा नहीं लगता कि इस बदले हुए माहौल से गोवा को कोई परेशानी या नुकसान हुआ है। सैलानियों की संख्या दिनोंदिन बढ़ रही है। उनके लिए उसी अनुपात में होटल, भोजनालय, टैक्सी आदि सेवाएं भी चाहिए। जो बाहर से आकर बस रहे हैं उन्हें भी सेवाओं की दरकार है। इस वजह से यहां रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं। स्थानीय अखबारों में प्रतिदिन विज्ञापन छपते हैं कि इन सेवाओं में काम करने के लिए योग्य व्यक्ति चाहिए। देश में जब बेराजगारी बढ़ रही है तब एक प्रदेश में रोजगार के ढेरों अवसर मिल रहे हैं यह देखकर विस्मय होता है।

हम जिस दिन गोवा पहुंचे उसी दिन गोवा पर्यटन मंडल के एक रेस्तरां में दिन के भोजन के लिए गए। वहां पहले जो बैरा आर्डर लेने आया वह उड़ीसा का निकला। फिर उसने बताया कि वहां कर्नाटक, महाराष्ट्र, मणिपुर, मिजोरम, छत्तीसगढ़, बिहार आदि विभिन्न प्रदेशों से आए लोग काम कर रहे हैं। मैं स्वाभाविक ही छत्तीसगढ़ सुनकर कुछ चौंका और कहा कि कौन हैं, उन्हेंं बुलाओ। उससे भेंट हुई, परिचय प्राप्त किया। जशपुरनगर के पास किसी गांव से आया प्रमोद लकड़ा नामक वह नवयुवक दो-तीन साल से वहां काम कर रहा है। मैं जिस होटल में ठहरा था, वहां सुबह की चाय पिलाने वाला युवक बिहार का था। मुझे यह जानकर अच्छा लगा कि गोवा में स्थानीय और बाहरी जैसा कोई द्वंद्व अभी तक कोई उपस्थित नहीं हुआ है।
 
जब पहली बार आया था तब पाया था कि कश्मीर घाटी से निकले मुस्लिम समुदाय के बहुत से व्यापारी यहां हस्तशिल्प और हैण्डलूम के शो रूम खोलकर अपना जीवनयापन कर रहे हैं। पर्यटन और शहरीकरण के विकास के चलते अब ये अन्य प्रदेशों से आए सेवाक्षेत्र में काम कर रहे युवक भी इसमें जुड़ गए हैं। अलबत्ता टैक्सी ड्रायवर अब भी शायद सारे के सारे गोवा के ही हैं। अब ऑटो रिक्शा भी बहुत चलने लगे हैं, वे भी स्थानीय निवासी हैं। इनके अलावा इस पर्यटन प्रदेश में मोटर साइकिल पर गोवा की सैर करवाने वाले युवा बाइकर्स की सालों पुरानी परंपरा वैसी ही चली आ रही है। कहने की आवश्यकता नहीं कि वे सब गोवा के ही तरुण हैं।

जहां तक मैं जानता हूं भारत में दो ऐसे प्रदेश थे जहां के निवासी दोपहर में तीन घंटे सारा कामकाज बंद कर विश्राम करते थे। एक था उड़ीसा और दूसरा गोवा। दोपहर एक से चार तक सारी दुकानें बंद रहती थीं। यहां तक कि खाना भी नहीं मिलता था। उड़ीसा में यह परिपाटी कैसे पड़ी, नहीं मालूम, लेकिन गोवा में शायद पुर्तगाल की भूमध्य सागरीय जलवायु के असर से जन्मी परंपरा यहां भी आई होगी! किन्तु अब यह उनींदापन पर्यटन व्यवसाय के चलते समाप्त हो गया है। आप होटल में जाइए तो दोपहर तीन-साढ़े तीन बजे तक खाना आराम से मिल जाता है। दूसरे गोवा की प्रसिद्ध काजू फैनी तो अब भी मिलती है, परन्तु इसके साथ-साथ देश-विदेश की उम्दा और घटिया हर तरह की मदिरा सुविधा से उपलब्ध हो जाती है। ग्राहक का संतोष ही हमारी सफलता है- इस मंत्र को गोवा के व्यापारी निश्चित रूप से जानते हैं।

यह संयोग ही था कि हमारी गोवा यात्रा उन दिनों हुई, जब वहां खासी गहमागहमी का माहौल था। सैलानियों का सीज़न तो था ही; भारत का अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव भी उन दिनों चल रहा था; साथ ही साथ संत फ्रांसिस ज़ेवियर की पार्थिव देह भी हर साल की तरह उन्हीं दिनों दर्शनार्थ बाहर निकाली गई थी। एक तरफ फिल्म महोत्सव में असम से लेकर केरल तक के सिनेप्रेमी जुटे थे, दूसरी तरफ संत के दर्शनों के लिए गोवा और निकटवर्ती क्षेत्रों से भक्तजन चले आ रहे थे। यह विशेष उल्लेखनीय है कि ये भक्त सिर्फ ईसाई नहीं, बल्कि हिंदू और अन्य धर्मों के भी थे और इनमें से अनेक पैदल यात्रा करके आ रहे थे। भारत की उदार-उदात्त लोकचेतना का यह एक प्रबल उदाहरण था। 

पिछले एक दशक में गोवा की राजनीति में भी बदलाव आया है। यहां प्रारंभ से एक नागरिक चेतना रही है और ऐसे बहुत से जाने-माने व्यक्ति हैं जो सक्रिय राजनीति में न होकर भी महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी आवाज उठाने से नहीं चूकते। दूसरी तरफ शेष भारत की तरह यहां भी राजनीति में अवसरवादियों की कमी नहीं है। तीसरी ओर एक छोटा प्रदेश होकर भी यहां श्रमिक संगठन या कि ट्रेड यूनियनें काफी जीवंत हैं और उनका नेतृत्व प्रबुद्धजन कर रहे हैं। इस समय कांग्रेस का प्रभाव क्षीण है और यह दिलचस्प तथ्य है कि बहुत बड़ी संख्या में गोवा के बहुसंख्यक ईसाई भारतीय जनता पार्टी को वोट देते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर पार्रिकर से जनता इसलिए खुश है कि उनके शासनकाल में प्रदेश में बहुत सारे विकास कार्य तेजी के साथ हुए। लोगों का कहना है कि पैसा खा के भी जो काम करे वह सही। कांग्रेस से उन्हें यही शिकायत है कि उसने काम नहीं किया।
देशबन्धु में 11 दिसंबर 2014 को प्रकाशित

Tuesday, 9 December 2014

कांशीराम: दलितों के नेता


 भारतीय राजनीति में दलित-चेतना को प्रतिष्ठित करने में बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम, जिन्हें उनके अनुयायी मान्यवर अथवा साहब के उपनाम से संबोधित करते हैं, ने जो युगांतकारी भूमिका निभाई है उससे सब परिचित हैं। इस श्रृंखला में महात्मा ज्योतिबा फुले पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने उन्नीसवीं सदी में दलित और वंचित समुदायों को अन्याय, अपमान, शोषण व तिरस्कार के खिलाफ उठ खड़े होने के लिए प्रेरित किया था। वे ही पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने दलितों (उस समय के अछूत) के लिए पुणे जैसे घोर रुढि़वादग्रस्त नगर में पाठशाला स्थापित की थी। यहीं उन्होंने बाद में सत्य शोधक समाज की भी स्थापना की थी। महात्मा फुले व उनकी सहधर्मिणी सावित्री बाई ने उस दौर में जो क्रांतिकारी काम किया उससे भारतीय समाज में समता, बंधुत्व एवं मानवीय गरिमा की एक नई धारा का सूत्रपात हुआ। महात्मा फुले के काम को आगे बढ़ाया छत्रपति शाहूजी महाराज ने। महात्मा फुले और उनके युग के बारे में बहुत सारा साहित्य प्रकाशित हो चुका है।

महात्मा फुले ने जिस नवयुग का आह्वान किया उसका परचम आगे चलकर बाबा साहेब अम्बेडकर ने अपने मजबूत हाथों से उठाया। बाबा साहब के जीवन और कार्य के बारे में पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है। उन्होंने स्वयं प्रचुर मात्रा में लेखन किया एवं देश के राजनीतिक इतिहास में उनकी भूमिका के बारे में न जाने कितना कुछ लिखा जा चुका है। मैं विस्तार में जाकर कुछ कहने की कोशिश करूं तो वह पूर्व में लिखे गए को दोहराना ही होगा। इतना कहना पर्याप्त होगा कि औपनिवेशिक काल में महात्मा फुले ने सामाजिक स्तर पर जो कार्य किया था, बाबा साहब ने उसके लिए पहले सामाजिक और राजनैतिक लड़ाइयां लड़ीं और फिर स्वतंत्र देश के संविधान में उन आदर्श जीवन मूल्यों को स्थापित करने का कार्य संपादित किया। आज यदि भारत एक सभ्य समाज होने का दावा कर सकता है तो यह उस संविधान की ही देन है, जिसके निर्माण में डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने महती भूमिका निभाई।

यह हम जानते हैं कि हमारा समाज अभी भी अपनी युगों से चली आ रही रुढिय़ों और सड़ी-गली मान्यताओं से पूरी तरह मुक्ति नहीं पा सका है। संविधान के अनुच्छेद तथा कानून की धाराएं चाहे जो कहती हों, भारत में दलितों के साथ आज भी समानता का बर्ताव नहीं होता। उत्तर से लेकर दक्षिण तक ऐसे उदाहरण नित्यप्रति मिलते हैं जहां दलितों को आज भी अछूत माना जाता है; उनके साथ गजभर की दूरी रखी जाती है; बस्तियों के आरपार दीवारें उठा ली जाती हैं और यदि वे सिर झुकाने के बजाय सिर उठाने की उठाने की कोशिश करें तो उन्हें दंड का भागी भी बनना पड़ता है। जाहिर है कि सामाजिक, राजनैतिक व संवैधानिक विमर्श के द्वारा विषमता और भेदभाव मिटाने के चाहे जितने प्रयत्न किए गए हों वे तब तक कारगर नहीं हो सकते जब तक राजनीतिक सत्ता के सूत्र बहुजन समाज के पास न हों। कांशीराम ने अपनी राजनीति का ताना-बाना इसी विचार के इर्द-गिर्द बुना।  यह आश्चर्यजनक ही है कि जिस व्यक्ति ने बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की उसके बारे में अब तक कोई पुस्तक न लिखी गई हो। यह आश्चर्य थोड़ा और बढ़ जाता है जब हम जानते हैं कि कांशीराम की घोषित उत्तराधिकारी सुश्री मायावती पर जाने-माने पत्रकार अजय घोष द्वारा लिखित ''बहनजी" शीर्षक जीवनी चार-पांच वर्ष पहले ही बाजार में आ चुकी है। बहरहाल अब यह कमी दूर हो गई है। हिन्दी के जाने-माने कवि एवं समाजशास्त्री बद्रीनारायण ने इसी वर्ष ''कांशीराम : लीडर ऑफ द दलित्स" शीर्षक से पुस्तक प्रकाशित की है।

बद्रीनारायण झूसी इलाहाबाद स्थित गोविन्दवल्लभ पंत समाज विज्ञान संस्थान के प्रोफेसर हैं। वे अपनी इस दूसरी भूमिका को काफी गंभीरता के साथ जी रहे हैं। मुख्यत: दलित विमर्श पर उनके आलेख समय-समय पर इकॉनामिक एंड पोलिटिकल वीकली जैसी अकादमिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होते हैं। यह पुस्तक प्रकाशित कर बद्रीनारायण ने एक महत्वपूर्ण कार्य को अंजाम दिया है।


इस पुस्तक की भूमिका में लेखक उन कठिनाइयों का वर्णन करता है जो लिखने के दौरान उसे पेश आईं। लेखक के सामने सबसे बड़ी मुश्किल यह थी कि कांशीराम ने न तो स्वयं अपनी आत्मकथा लिखी, न मायावती या अन्य किसी के साथ पत्राचार किया और न उनके अनुयायियों व साथियों ने उनके जीवन के बारे में कुछ लिखा। कांशीराम कोई दैनंदिनी भी नहीं लिखते थे और न बसपा के पास उनके कोई दस्तावेज हैं। बद्रीनारायण के सामने सिर्फ दो पुस्तकें थी एक- स्वयं कांशीराम द्वारा अंग्रेजी में लिखित ''द चमचा एज" जिसमें उनके विचार तो हैं पर वे स्वयं नहीं हैं। दो- उनके सचिव अंबेठ रंजन द्वारा लिखित ''संत चरित वर्णन" जिसमें कांशीराम का एक संत के रूप में श्रद्धाभाव से वर्णन है। इस तरह लेखक को सामग्री जुटाने के लिए दूर-दूर तक भटकना पड़ा; कांशीराम जी के पूर्व सहयोगियों से भेंट के अवसर जुटाना पड़े; उनके परिवारजनों से मुलाकातें की तथा अखबारों में यत्र-तत्र प्रकाशित सामग्री में से अपने काम की चीजें छांटनी पड़ी। इन तमाम प्रयत्नों के बाद जो पुस्तक हमारे सामने आई है वह न सिर्फ कांशीराम से पाठकों का पहला परिचय करवाती है बल्कि उनके व्यक्तिगत जीवन और विचारों पर पर्याप्त रोशनी डालती है। बद्रीनारायण इस नाते दोहरी बधाई के पात्र हैं।

किताब आठ अध्यायों में विभक्त हैं। पहले अध्याय में उनके प्रारंभिक जीवन की झलकियां देखने मिलती हैं, तो आखरी अध्याय में कांशीराम की महत्वाकांक्षी राजनीति का एक संतुलित विश्लेषण प्राप्त होता है। कांशीराम का जन्म 15 मार्च 1934 को पंजाब के रोपड़ जिले के एक दलित बहुल गांव में हुआ था। पंजाब में सिख धर्म की प्रमुखता तो थी ही, कालांतर में आर्य समाज की गतिविधियों का भी विस्तार प्रदेश में हुआ। इन दोनों पंथों में उस तरह की जड़ता और रुढि़वादिता नहीं थी जो सनातन पंथ में थी। कांशीराम के पिता हरिसिंह आर्य समाज की सुधारवादी विचारधारा से काफी प्रभावित थे। इसके अलावा उन्होंने पंजाब के दलितों में आम रामदासिया पंथ छोड़कर खालसा पंथ अपना लिया था। एक तरफ समाज सुधार का वातावरण, दूसरी ओर सिख धर्म स्वीकार करना और तीसरी ओर परिवार की सामान्य से बेहतर माली स्थिति। इनके चलते कांशीराम को सामाजिक भेदभाव  और छूआछूत का उस हद तक सामना नहीं करना पड़ा जिसका शिकार उनके बचपन के अन्य साथी थे। फिर भी अपने आसपास फैले जातिवाद और उससे उपजी पीड़ा को वे भलीभांति महसूस कर सकते थे। उनके बचपन की स्मृतियां पूना में भी उनके साथ रही जहां वे भारत सरकार के एक संस्थान में नौकरी करने के लिए पहुंचे थे। यहीं उन्होंने दलित के ही नहीं, बहुजनों के हित में पहली बार आवाज तब उठाई जब भारत सरकार के उस दफ्तर में बुद्ध जयंती और अंबेडकर जयंती की छुट्टियां निरस्त कर दी गईं थीं। पूना में ही कांशीराम पहले बाबा साहब अम्बेडकर द्वारा स्थापित रिपब्लिकन पार्टी के सदस्य बने, लेकिन कुछ वर्षों बाद उन्हें अनुभव हुआ कि पार्टी बाबा साहब के आदर्शों पर नहीं चल रही है। इस बीच उन्होंने बामसेफ नाम से बहुजन एवं अल्पसंख्यक कर्मचारियों के नाम से महासंघ खड़ा कर लिया था, जिसकी राजनीतिक शाखा के रूप में कुछ ही समय बाद उन्होंने डीएस-4 अर्थात दलित शोषित समाज संघर्ष समिति की स्थापना की। डीएस-4 ने ही आगे चलकर बसपा का रूप ले लिया।

अपने पूना के दिनों में कांशीराम को अनेक दारुण अनुभवों से सामना करना पड़ा। बहुजन समाज के कर्मचारियों की हित रक्षा में उन्होंने मीलों पैदल व सायकिल यात्राएं की, भूखे पेट रहे, बिना टिकट रेल यात्राएं की। इनके ब्यौरे, इनके मित्रों से हुई बातचीत से मिले। इसी शहर में कांशीराम ने संकल्प लिया कि वे समाज कार्य को पूरा समय देंगे और इस हेतु उन्होंने अपने परिवार से सारे नाते तोड़ लिए। वे न तो अपनी बहनों की शादी पर गए, न एक बहन की मृत्यु पर। अपने पिता के अंतिम संस्कार में भी वे शामिल नहीं हुए। लगभग पच्चीस साल के लम्बे अंतराल के बाद जब वे अपने भाई से मिले तो एकबारगी उसे पहचान भी नहीं सके। एक बार जब उनकी मां उन्हें घर ले जाने के लिए पूना आ गई तो मां का प्रेम भी उन्हें अपने रास्ते से विचलित नहीं कर सका।

लेखक बद्रीनारायण के अनुसार कांशीराम ने यह समझ लिया था कि सारे संतों और गुरुओं तथा फुले, अम्बेडकर जैसे नेताओं के प्रयत्नों के बावजूद जातिप्रथा समाप्त नहीं होगी और इसलिए उन्होंने वंचित समुदायों की जातिगत चेतना को राजनीतिकृत करने की अवधारणा को प्रचलित किया। एक तो उन्होंने सवर्ण एवं वर्चस्ववादी तबकों के हाथों दलितों ने जो कष्ट सहे उनकी स्मृतियां जगाकर उन्हें लामबंद करने की कोशिश की, दूसरे दलित समुदाय के हर तबके के सांस्कृतिक इतिहास की पुर्नव्याख्या कर उनमें जातीय अभिमान पैदा करने का प्रयत्न किया ताकि इस तरह वे अपना खोया हुआ आत्मविश्वास हासिल कर सकें।

1982 में उन्होंने ''द चमचा एज : एन एरा ऑफ द स्टूजेस" (चमचा युग : चाटुकारों का पर्व) नाम से पुस्तक लिखी। लेखक के अनुसार इस पुस्तक से ही बसपा की दार्शनिक आधारशिला रखी गई। कांशीराम अपनी इस पुस्तक में चमचों को छह श्रेणियों में बांटते हैं। यथा अ- जाति एवं समुदाय आधारित चमचे, ब- राजनीतिक चमचे, स- अज्ञानी चमचे, द- शिक्षित अथवा अंबेडकरवादी चमचे, प- चमचों के चमचे, फ- विदेशों में चमचे। इनमें से प्रथम को वे फिर चार भागों में बांटते हैं- 1. अनुसूचित जाति- अनिच्छुक चमचे, 2. अनुसूचित जनजातियां- दीक्षित चमचे, 3. अन्य पिछड़े समाज- उत्सुक चमचे, 4. अल्पसंख्यक- असहाय चमचे। इन सबको विस्तार से परिभाषित करते हुए कांशीराम एक ओर जगजीवनराम और रामविलास पासवान जैसे राजनीतिज्ञों की घोर आलोचना करते हैं, दूसरी ओर वे डॉ. अम्बेडकर के अनुयायियों को भी कटघरे में खड़ा करते हैं। उनका आरोप है कि अंबेडकरवादी मूल लक्ष्य से भटक गए हैं।
पुस्तक के तीसरे अध्याय का शीर्षक ही है- ''द चमचा एज : एन एजेण्डा बियॉंड अम्बेडकर" याने अम्बेडकर से परे। इस अध्याय में बद्रीनारायण डॉ. अम्बेडकर और कांशीराम के विचारों का एक तुलनात्मक अध्ययन सामने रखते हैं। इसमें कुछ बिन्दु प्रमुखता के साथ उल्लेखनीय हैं।

1. अम्बेडकर मानते थे कि दलितों का गांव छोड़कर शहर में बसना उन्हें उत्पीडऩ से मुक्ति दिलाएगा। इसके विपरीत कांशीराम का कहना है कि दलित गांव में रहें या शहर में, जाति उनके साथ हर हाल में जुड़ी रहेगी। इसलिए दलितों को जाति को एक अस्त्र की तरह इस्तेमाल करना चाहिए जब तक कि ब्राह्मणवाद समाप्त न हो जाए।
2. अम्बेडकर सोचते थे कि अंतरजातीय विवाह भेदभाव को मिटाने के लिए एक उपयुक्त रणनीति है जबकि कांशीराम के अनुसार दलितों को अपनी जाति के आधार पर समाज में प्रतिष्ठा हासिल करनी चाहिए।
3. अम्बेडकर दलितों के लिए पृथक चुनाव मंडल की मांग करते थे, लेकिन कांशीराम इसके खिलाफ थे। उनका मानना था कि समतामूलक समाज का निर्माण करने के लिए दलितों को राजनीतिक सत्ता हथियाना चाहिए।
4. अम्बेडकर अमेरिका के कोलंबिया विवि में पढ़े थे। उन्होंने पश्चिम की ज्ञान परंपरा का गहन अध्ययन किया था। वे दलित प्रश्न का विश्लेषण ऐतिहासिक आधार पर करते थे। दूसरी ओर कांशीराम ठेठ देहात में पले-बढ़े थे व उन्हें इतिहास एवं मिथक का घालमेल करने में कोई समस्या नहीं थी।
5. अम्बेडकर ने वंचित समाज की मुक्ति की राजनीति को दलित आंदोलन का नाम दिया,जबकि कांशीराम दलित संज्ञा के प्रयोग से बचकर बहुजन आंदोलन की बात करते हैं। उनका मानना है कि दलितों को दलितपन से बाहर निकलना चाहिए।
6. दलित मुक्ति के लिए अंबेडकर अपने आंदोलन को एक नैतिक पृष्ठभूमि में देखते हैं जबकि कांशीराम के लिए व्यावहारिकता ज्यादा महत्वपूर्ण है।

इस तरह कहा जा सकता है कि कांशीराम ने अम्बेडकर की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया, लेकिन अपनी शर्तों पर। अपने विचारों को मूर्तरूप देने के लिए उन्हें मायावती के रूप में एक युवा, प्रखर अनुयायी मिलीं। कांशीराम ने स्वयं किसी राजनीतिक पद की अभिलाषा नहीं रखी, लेकिन मायावती को आगे कर उन्होंने सत्ता हासिल करने की राजनीति सफलतापूर्वक की और जब भी उचित अवसर हाथ में आया तो उसका उपयोग दलित अस्मिता को पुष्ट करने में लगाया। कांशीराम और उनके मार्गदर्शन में मायावती ने एक तरफ इतिहास और मिथकों से खोज-खोजकर बहुजन समाज के आदर्श पात्रों को निकाला और दूसरी तरफ फुले, अम्बेडकर और हाथी की प्रतिमाएं स्थापित की। इनके माध्यम से उन्होंने बहुजन समाज में आत्मविश्वास व स्वाभिमान का संचार करने का प्रयत्न किए।  फिलहाल यह पुस्तक हिन्दी में उपलब्ध नहीं है। हमारा अनुरोध है कि स्वयं बद्रीनारायण ही इसे हिन्दी में लाएं ताकि इस पर व्यापक पैमाने पर विमर्श हो सके। पुस्तक के अंत में बद्रीनारायण कुछ निराश नजर आते हैं। वे कहते हैं कि ''अपने स्वार्थों के लिए खुद को बेच देने वालों पर कांशीराम ने तीखे प्रहार किए हैं। आज बसपा में भी हालात कुछ वैसे ही हैं। मायावती के नेतृत्व में बसपा को अल्पकालिक राजनीति छोड़कर वृहत्तर उद्देश्य पर ध्यान केन्द्रित करना होगा, वही कांशीराम को सही श्रद्धांजलि होगी।
अक्षर पर्व दिसंबर 2014 अंक की प्रस्तावना

Wednesday, 3 December 2014

26 नवम्बर : एक कोलाज़


 आज 26 नवम्बर को एक सप्ताह की यात्रा पर निकलने के पूर्व मैं यह कॉलम लिखने बैठा हूं। आज का दिन एक कोलाज की तरह मेरे सामने है। नेपाल की राजधानी काठमांडू में सार्क का शिखर सम्मेलन प्रारंभ हो गया है और मैं भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अंग्रेजी में भाषण देते सुन रहा हूं। श्री मोदी के प्रधानमंत्री बनने के पूर्व यह तथ्य आमतौर पर ज्ञात नहीं था कि वे अंग्रेजी में सहजता के साथ भाषण दे सकते हैं। जनता ने उन्हें अब तक हिन्दी में ही बोलते सुना था और इसी वजह से कट्टर हिन्दी समर्थकों में उन्माद की सीमा तक उत्साह था कि मोदीजी के आ जाने के बाद देश में चारों तरफ हिन्दी का वर्चस्व हो जाएगा। वे लोग अब शायद कुछ निराश होंगे! लेकिन हमारे लेखे अच्छी बात है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर जहां आवश्यकता है वहां प्रधानमंत्री अंग्रेजी में बात कर रहे हैं।

सार्क शिखर सम्मेलन में भारत की भूमिका को लेकर मीडिया में विरोधाभासी चर्चाएं हो रही हैं। एक तरफ तो भारतीय मीडिया स्वाभाविक ही श्री मोदी का गुणगान कर रहा है, दूसरी तरफ वह पाकिस्तान को कठघरे में खड़ा करने में भी कोई कसर बाकी नहीं रख रहा है। भले ही इसके लिए तथ्य और तर्क को दरकिनार क्यों न करना पड़े। सम्मेलन की क्या उपलब्धियां होंगी यह इस कॉलम के छपने तक पाठकों के सामने आ चुका होगा। मैं यहां कोई पूर्वानुमान नहीं लगाना चाहता। इतना कहना पर्याप्त होगा कि सार्क जैसे बहुराष्ट्रीय मंच आज की वैश्विक राजनीति में लगभग अनिवार्य बन चुके हैं। जब हम विश्व ग्राम की कल्पना करते हैं और तकनीकी उपलब्धियों के सहारे विश्व समाज को परस्पर निकट लाने का प्रयत्न करते हैं तब क्षेत्र विशेष के पड़ोसी देशों के बीच आर्थिक, व्यापारिक, सांस्कृतिक, तकनीकी संबंधों को विकसित होने की प्रासंगिकता स्वयंसिद्ध है। यह सच्चाई भी अपनी जगह पर है कि ऐसे मंचों पर द्विपक्षीय मसले सुलझाने की गुंजाइश कम ही होती है।

प्रधानमंत्री यद्यपि काठमांडू में हैं, लेकिन दिल्ली में उनकी सरकार ने आज छह माह का कार्यकाल पूरा कर लिया है। इस अवधि में घोषणाएं बहुत हुई हैं, वायदे बहुत हुए हैं, किन्तु उन पर अमल होने के लिए अभी न जाने कितने कदम चलना शेष है। इस बात को रेखांकित किया जाना चाहिए कि जनता ने अपनी आशा की डोर अभी भी श्री मोदी के साथ बांध रखी है तथा मोहभंग जैसी कोई स्थिति फिलहाल नहीं है। इसकी एक वजह यह भी है कि कांग्रेस पार्टी छह माह बाद भी स्पष्ट नहीं कर पाई है कि विपक्ष के रूप में उसकी कार्ययोजना क्या है। किन्तु भाजपा को यह समझना होगा कि कांग्रेस चाहे की जो स्थिति हो, उसकी अपनी विश्वसनीयता लंबे समय में तभी कायम रह पाएगी जब वह अपने वायदों पर गंभीरतापूर्वक अमल करना शुरु कर देगी।

लेकिन ऐसा होने में दो प्रमुख अड़चनें हैं। एक तो अधिकांश वायदे चुनावों के समय किए गए थे और उनके व्यवहारिक पहलू पर विचार करने की कोई आवश्यकता तब नहीं समझी गई थी। आकाश से तारे तोड़ लेने का जोश हर प्रेमी दिखाता है, लेकिन सामने पोखर से कमल का फूल तोड़ लाने में उसके हाथ-पैर फूलने लगते हैं। दूसरे, सरकार पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पुरातनपंथी सोच को लागू करने के लिए भारी दबाव है। मोदीजी की समस्या यह है कि वे संघ प्रमुख आदेशों का पालन करें या कि संविधान के अनुसार चलें।

संसद का सत्र प्रारंभ होने के पूर्व प्रधानमंत्री ने संसद का कामकाज सुचारु रूप से चलने की अपील की। उनको यह अपील करने की आवश्यकता नहीं पडऩी चाहिए थी। देश की सर्वोच्च संस्था संसद है और उसमें पक्ष और विपक्ष दोनों को ही रचनात्मक भूमिका निभाना चाहिए। लेकिन स्वयं भाजपा ने विपक्ष में रहते हुए पिछले दस साल में संसद का कामकाज जिस तरह से बार-बार ठप्प किया उसके बाद क्या इस अपील का महत्व रह जाता है? अगर भाजपा ने कांग्रेस को लोकसभा में विपक्षी दल की मान्यता दे दी होती तब भी शायद बिगड़ी बात बन सकती थी। बहरहाल छह माह के कार्यकाल पर राजनीति के अध्येता अपने-अपने अंदाज में विश्लेषण कर ही रहे हैं। हमारा सिर्फ इतना ही कहना है कि इस सरकार को अति उत्साह में ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिससे देश के सामाजिक ढांचे पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़े और अनावश्यक विवाद पैदा हो।

आज ही मुंबई में आतंकवादी हमले की सातवीं बरसी है। यह हमारी कल्पना से परे था कि ऐसा दिन भी आ सकता है। उस दु:स्वप्न की स्मृतियां आज फिर ताजा हो गई हैं। इस पर सोशल मीडिया में कहीं एक टिप्पणी पढऩे मिली कि 26/11 को लोग याद कर रहे हैं, लेकिन उसके पहले मुंबई में ही जो शृंखलाबद्ध बम विस्फोट उपनगरीय रेलवे पर 11 जुलाई 2006 को हुए थे उसे हमने क्यों विस्मृत कर दिया। मैं समझता हूं कि यह सवाल आंशिक रूप से सही है। 26/11 का जो जीवंत प्रसारण टीवी चैनलों पर हुआ उसकी वजह से उसके दृश्य लोगों की स्मृति में बैठ गए हैं; किन्तु देश में बड़े-छोटे आतंकी हमले जहां भी हुए हों उन सबको याद करते हुए यह सोचना भी आवश्यक है कि ऐसा वातावरण कैसे बन गया है. जो हमें सामने दिखाई देता है वही अंतिम सच नहीं है। यह समझने के बाद ही समस्या के मूल में जाकर समाधान के सूत्र मिल सकते हैं।

आज के जिस प्रसंग ने मुझे सबसे ज्यादा जो विचलित किया है वह है तमिलनाडु में वाइको की एमडीएमके पार्टी द्वारा लिट्टे सुप्रीमो प्रभाकरन के जन्मदिन पर आयोजन करना। टीवी के परदे पर यह देखना बेहद तकलीफदेह था कि वाइको प्रभाकरन के चित्र के सामने मोमबत्ती जला रहे हैं और केक काट रहे हैं। तमिलनाडु के दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों की कोई प्रतिक्रिया मुझे देखने नहीं मिली, लेकिन भारतीय जनता पार्टी से तो इस पर खुलकर प्रतिक्रिया अपेक्षित थी। आखिरकार वाइको की पार्टी एनडीए में भाजपा की सहयोगी है। तमिलनाडु की जनता की सहानुभूति श्रीलंका के तमिलों के साथ हो सकती है, होना भी चाहिए लेकिन ऐसा पाखंड करके वाइको किसे और क्या संदेश देना चाहते हैं !

तमिलनाडु के इस प्रसंग को देखकर पंजाब की याद आ जाना स्वाभाविक है, जहां श्रीमती इंदिरा गांधी के हत्यारों को भी इसी तरह से प्रतिष्ठित करने की कोशिशें बार-बार होती हैं। कभी उनके परिवारजनों को सरोपा देकर, कभी उन्हें शहीद की पदवी देकर, तो कभी उनका स्मारक बना देने की बात कर। कहा जाता है कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है। ये दो प्रसंग दु:खद तरीके से सिद्ध करते हैं कि पंजाब से तमिलनाडु तक भारत एक अवांछित स्तर पर अवश्य एक है। एक तरफ हम आतंकवाद से लडऩे का संकल्प करते हैं, पाकिस्तान पर आतंकवाद को बढ़ावा देने का बहुत हद तक सही आरोप लगाते हैं, दूसरी तरफ अपने प्रधानमंत्री की हत्या करने वालों को इस तरह से सम्मानित करते हैं। क्या यह कुछ लोगों का मनोविकार मात्र है या इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक निहितार्थ है? इस प्रश्न का उत्तर मैं ढूंढ रहा हूं।
देशबन्धु में 4 दिसंबर 2014 को प्रकाशित

Sunday, 30 November 2014

कांग्रेस का नेहरू को याद करना



भारतीय जनता पार्टी की सरकार यदि जवाहरलाल नेहरू की 125वीं जयंती मनाने के लिए बहुत उत्साहित न हो तो इसमें अचरज करने वाली कोई बात नहीं है। भाजपा का तो जन्म ही नेहरू विरोध से हुआ है। पिछले बासठ-तिरसठ साल से पहले जनसंघ और अब भाजपा के रूप में वह नेहरू द्वारा प्रवर्तित नीतियों का लगातार विरोध करते आई है और अब जाकर उसे अवसर मिला है कि वह खुल कर इन नीतियों को खारिज कर देश को एक वैकल्पिक मार्ग पर ले जा सके। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पद की शपथ लेने के अगले दिन ही यह स्पष्ट कर दिया था कि नेहरू के बताए रास्ते पर चलना तो दूर, उस ओर झांकना भी वे पसंद नहीं करते। इसीलिए 27 मई को पंडितजी की 125वीं पुण्यतिथि पर उन्होंने शांतिवन जाना अवश्यक नहीं समझा। लगभग पांच माह बाद उन्होंने देश के प्रथम प्रधानमंत्री को याद तो किया, लेकिन चाचा नेहरू के रूप में और उनके जन्मदिन को स्वच्छता अभियान से जोड़ दिया। पार्टी उनकी, सरकार उनकी, नीति और विचार उनके। 

इसी तर्क से भाजपाइयों और भाजपा समर्थकों को भी शिकायत करने का कोई कारण नहीं बनता कि कांग्रेस पार्टी ने नेहरूजी की 125वीं जयंती पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में देश के प्रधानमंत्री को न्यौता क्यों नहीं दिया। जब दोनों के रास्ते अलग-अलग हैं तो फिर उलाहना किस बात का? बहुत से विचारवान लोगों का मानना है कि नेहरूजी के नाम पर राजनीति नहीं होना चाहिए। इस विचार में एक भोलापन है जो व्यवहारिक राजनीति की जटिलताओं को जाने या अनजाने देख नहीं पा रहा है। खैर! हमारा अपना सोचना है कि पंडित नेहरू को याद करने के लिए और उनका मूल्यांकन  करने के लिए इस तरह के औपचारिक आयोजन की अगर कोई भूमिका है तो वह सीमित है। क्योंकि हमारे उत्सवप्रिय देश में ऐसे आयोजन आडंबर में तब्दील हो जाते हैं जिसमें विषयवस्तु की गंभीरता गुम हो जाती है।


यूं तो कांग्रेस पार्टी ने 17-18 नवम्बर को दिल्ली में नेहरूजी पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया, लेकिन उससे कुल मिलाकर क्या हासिल हुआ? वहां जो पत्रकार उपस्थित थे उनकी दिलचस्पी इस बात में ज्यादा थी कि कांग्रेस के निमंत्रण पर गैर-भाजपाई दलों के कौन-कौन नेता सम्मेलन में शिरकत करते हैं। वहां ममता बनर्जी का आ जाना बड़ी खबर थी और मुलायम सिंह या लालू प्रसाद का न आना उससे कुछ छोटी खबर। सम्मेलन के अध्यक्ष पद से सोनिया गांधी ने जो भाषण दिया वह काफी सधा हुआ था, किन्तु ज्यादा चर्चा इस पर हुई कि भाषण के राजनीतिक निहितार्थ क्या थे। विदेशों से जो बड़े राजनेता आए, वे क्या कह रहे हैं उसे सुनने में शायद किसी की भी दिलचस्पी नहीं थी और विज्ञान भवन के सभागार में जो हजार लोग इकट्ठे थे उनमें से अधिकांश नेहरू के कारण आए थे या अपना चेहरा दिखाने के लिए, यह अनुमान लगाना कठिन नहीं था।

मैं 17 तारीख को सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में उपस्थित था। विदेश से आए विशिष्ट अतिथियों ने पंडित नेहरू को जिस भावुकता के साथ स्मरण किया उससे मैं प्रभावित हुआ। अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई ने याद किया कि उनके स्कूल की किताब में नेहरूजी का निबंध था तथा उस पाठ में नेहरूजी ने भारत माता को जिस तरह से परिभाषित किया था उसने उनके मन में एक गहरी छाप छोड़ी थी। नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री व कम्युनिस्ट नेता माधव नेपाल ने नेहरूजी की विश्वमंच पर प्रभावी भूमिका का जिक्र किया और यह भी बताया कि उनके द्वारा गठित योजना आयोग से किस तरह नेपाल को भी प्रेरणा मिली।
अरब लीग के अध्यक्ष और इजिप्त के पूर्व विदेशमंत्री अमरे मूसा ने गुट निरपेक्ष आंदोलन खड़ा करने में पंडित नेहरू की भूमिका का जिक्र किया तथा अरब मुल्कों (विशेष कर इजिप्त) के साथ नेहरू युग के समय विकसित और प्रगाढ़ हुए संबंधों को रेखांकित किया। घाना के पूर्व राष्ट्रपति जॉन कूफोर ने भी अफ्रीकी देशों के स्वाधीनता संग्राम को नेहरूजी से मिले समर्थन व सहयोग का उल्लेख अपने वक्तव्यों में किया। किन्तु इन सबसे ज्यादा प्रभावी व्याख्यान भूटान की राजमाता का था। उन्होंने बताया कि 1954 की गणतंत्र दिवस परेड में भूटान नरेश मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित थे और इस तरह दोनों पड़ोसी देशों के बीच प्रगाढ़ संबंधों की नींव पड़ी जो आज तक चली आ रही है। एक छोटे पड़ोसी देश को पंडितजी ने बराबरी का दर्जा दिया, यह भाव भी उनकी बात में था।

भूटान की राजमाता ने बताया कि पंडित नेहरू 1958 में उनके देश आए थे। किसी भी विदेशी राजप्रमुख की यह पहली भूटान यात्रा थी। पंडितजी के साथ इंदिराजी भी थीं। दोनों कठिन और दुर्गम रास्ते पर कई दिनों की यात्रा कर थिम्बू पहुंचे थे। इस रास्ते पर उन्हें याक की सवारी भी करनी पड़ी थी। पंडितजी की उम्र उस समय 67 वर्ष हो चुकी थी, फिर भी उन्होंने यह कष्ट भरी यात्रा करने से संकोच नहीं किया। उन्होंने आगे यह भी बताया कि 1961 में भूटान ने पहली पंचवर्षीय योजना लागू की। इसकी प्रेरणा भी भूटान को भारत से ही मिली। उद्घाटन सत्र के ये सारे व्याख्यान निश्चित रूप से प्रसंग के अनुकूल थे, लेकिन मुझे एक बात तो यह समझ नहीं आई कि पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह मंच पर तो थे, लेकिन उन्होंने सभा को संबोधित नहीं किया। दूसरे, आयोजन समिति के मुख्य कर्ता-धर्ता के रूप में आनंद शर्मा ने आरंभ में मंच संचालन किया, लेकिन सरकार में रहकर नेहरू की नीतियों पर चलने वाले पूर्व मंत्री मणिशंकर अय्यर मंच के दूसरे छोर पर पूरे समय चुपचाप बैठे रहे।

उद्घाटन सत्र के बाद समानांतर विचार सत्र होना थे। उनमें भाग लेने के लिए कुछेक जाने-माने विद्वान आमंत्रित किए गए थे, लेकिन उद्घाटन सत्र में एक तरह का ठंडापन व्याप्त था, जो आगे के कार्यक्रम में शरीक होने के लिए बहुत उत्साहदायक नहीं था। कांग्रेेस के कई बड़े नेता तो उद्घाटन का कार्यक्रम सम्पन्न होने के बाद ही वहां से रवाना हो गए थे। श्रोताओं की भी कोई दिलचस्पी गोष्ठियों में भाग लेने की होगी, ऐसा नहीं लगा। कुल मिलाकर मैं यह समझने में असमर्थ रहा कि कांग्रेस पार्टी ने क्या सोचकर यह आयोजन किया! 
भारतीय राजनीति में रुचि रखने वाले जानते हैं कि इंदिराजी के समय में ही नेहरू के रास्ते से विचलन प्रारंभ हो गया था। पी.वी. नरसिम्हाराव के समय में नेहरू की आर्थिक नीतियों को तिलांजलि दे दी गई थी। इसमें अगर कोई कसर बाकी थी तो वह डॉ. मनमोहन सिंह के दस साल के कार्यकाल में पूरी हो गई। संभव है कि इसके पीछे उनके पास कोई ठोस तर्क रहे हों, लेकिन उनके बारे में जनता को कभी विश्वास में नहीं लिया गया। मैं सोनिया गांधी के जुझारूपन का कायल रहा हूं, लेकिन मुझे लगता है कि उनके पास जो राजनीतिक पूंजी है वह इंदिराजी मात्र से मिली है। नेहरू को उन्होंने कितना पढ़ा और समझा है, यह कह पाना कठिन है। शायद यही कारण है कि आनंद शर्मा आयोजन के कर्णधार थे और मणिशंकर अय्यर हाशिए पर! 

सोनियाजी ने उद्घाटन सत्र में अध्यक्षीय वक्तव्य तो अच्छा दिया, लेकिन वह अधूरा था। जब पंडित नेहरू की 125वीं जयंती मन रही है तो इतना काफी नहीं है कि आप उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करें और संस्मरण साझा करें। इस अवसर पर यह बात भी होना चाहिए थी कि नेहरू की वैचारिक विरासत को कायम रखने के लिए उनके बताए रास्ते पर आगे बढऩे के लिए आप क्या करने जा रहे हैं। ऐसे कितने कांग्रेसी हैं जिन्होंने नेहरूजी द्वारा लिखी पुस्तकों में से एक पुस्तक भी पढ़ी है? क्या किसी कांग्रेसी नेता के बैठकखाने में ये पुस्तकेंआपको देखने मिलती हैं? राहुल गांधी, युवक कांग्रेस, और छात्र कांग्रेस की सदस्यता खोलते हैं उनमें चुनाव करवाते हैं, लेकिन क्या कहीं ऐसी व्यवस्था है कि ये नौजवान कांग्रेसी नेहरू के विचार से परिचित हो सकें?

मैं इस आयोजन की सार्थकता तब समझता जब कांग्रेस अध्यक्ष अपने उद्बोधन में पार्टीजनों को नेहरू साहित्य पढऩे के लिए पे्ररित करतीं, नेहरू के विचारों को समझने और आत्मसात करने के लिए कार्यशालाओं, शिविरों और विचार गोष्ठियों का कोई दीर्घकालीन कार्यक्रम प्रस्तावित करतीं और इस भव्य आयोजन में भी उन लोगों को बुलातीं जो नेहरू के योगदान का सम्यक मूल्यांकन करने में सक्षम हैं। मसलन नेहरूजी की भांजी और विजयलक्ष्मी पंडित की बेटी नयनतारा सहगल। उन्होंने ''सिविलाइजिंग अ सेवे
ज वर्ल्ड" शीर्षक पुस्तक में तर्कों और प्रमाणों के साथ नेहरू की नीतियों का विश्लेषण व उनके आलोचकों को उत्तर दिया है। अगर यही एक पुस्तक कांग्रेसी पढ़ लें तो अपना भला कर सकते हैं। सोनिया गांधी को हमारी बिन मांगी सलाह है कि ऐसी पुस्तकों का हिंदी अनुवाद करवाएं व कांग्रेसजनों को पढ़वाएं। इससे बेहतर कोई श्रद्धांजलि पंडित नेहरू को नहीं हो सकती।

देशबन्धु में 27 नवंबर 2014 को प्रकाशित 

Wednesday, 19 November 2014

रायपुर में रंगशाला?




रायपुर
के रंगकर्मी लंबे समय से एक सर्वसुविधायुक्त आधुनिक प्रेक्षागृह की मांग उठा रहे हैं। अपने आप में यह मांग उचित है। जिस देश में आज से कोई दो हजार वर्ष पूर्व भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र लिख दिया हो और जो प्रदेश विश्व की सबसे प्राचीन रंगशाला अपने यहां होने का दावा करता हो वहां राजधानी बन गए एक नगर में, जो हबीब तनवीर की जन्मस्थली भी हो, कलापे्रमियों को एक अच्छा प्रेक्षागृह उपलब्ध न हो तो यह उस नगर के साथ अन्याय ही कहा जाएगा। मैं इसलिए सैद्धांतिक तौर पर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक रंगशाला, प्रेक्षागृह या ऑडिटोरियम स्थापित करने के प्रस्ताव का समर्थन करता हूं, लेकिन साथ ही साथ मेरा मानना है कि इस मुद्दे को रायपुर के नागरिक जीवन के अन्य आयामों से काटकर नहीं देखा जा सकता। अपितु उस विशाल संदर्भ में ही तलाश करना होगा कि इस मांग पर आज तक कोई सकारात्मक विचार प्रदेश सरकार या नगर निगम ने क्यों नहीं किया और यह भी कि इसे राजधानी की जनता का समर्थन क्यों नहीं मिला?

यह कहना गलत नहीं होगा कि सभ्यता के विकासक्रम में शहरीकरण एक महत्वपूर्ण और अनिवार्य चरण है। जिस दिन मनुष्य जाति ने घूमंतु जीवन त्यागकर स्थायी आश्रय निर्मित करने की ठानी और जिसके चलते बस्तियों का निर्माण प्रारंभ हुआ उसके तुरंत बाद ही मनुष्य को शहरों की जरूरत आन पड़ी। शहर याने सभ्यता का केन्द्र। एक ऐसी जगह जहां वे सारी सुविधाएं उपलब्ध हों जो दूरदराज तक फैली छोटी-छोटी रिहायशी बस्तियों में उपलब्ध होना संभव नहीं थीं जैसे बाजार, पाठशालाएं चिकित्सालय, मनोरंजनगृह, सत्तापीठ, कारखाने इत्यादि। शायद पहली जरूरत तो बाजार की ही थी। पुराने समय में गांव-गांव में साप्ताहिक बाजार लगते थे और यह परंपरा आज भी चली आ रही है, लेकिन शायद इनका होना पर्याप्त नहीं था। इसीलिए स्थायी बाजार बनना शुरू हुए। बाजार चलते-फिरते रहे हों या एक जगह पर स्थापित, मनोरंजन शालाएं भी उसका एक स्थायी अंग रही है। पुराने समय के बहुरूपिये, नट, मदारी, जादूगर से लेकर सर्कस, टूरिंग टॉकीज और आज के सिनेमा, थिएटर तक इसे देखा जा सकता है।

एक तरह से गांव यदि कृषि उत्पादन का केन्द्र थे, तो नगर व्यवसाय और विपणन के केन्द्र के रूप में उभरे। गांव में रहकर उत्पादन करने वाले की आवश्यकताएं सीमित थीं, लेकिन नागर श्रेष्ठि वर्ग की स्थिति ठीक इसके विपरीत थी। उसे अधिकतम सुविधाएं चाहिए थीं। वही स्थिति आज भी है। इस तरह से नगर एक चुंबक में तब्दील हो गए जिसकी चकाचौंध दूर-पास के ग्रामवासियों को अपनी तरफ खींचने लगी। भव्य अट्टालिकाएं, राज-प्रासाद, सुन्दर उपवन और इनके साथ-साथ बेहतर स्कूल, बेहतर चिकित्सा सुविधाएं और ऐसी अन्य व्यवस्थाएं जो ग्रामीण समाज के लिए आकाश-कुसुम ही रही आईं।
रायपुर नगर को इस सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि में देखना आवश्यक है। एक समय यहां छत्तीसगढ़ के गांवों से विद्यार्थी पढ़ाई करने के लिए आते थे, वहीं सिनेमा, रथयात्रा और गणेशोत्सव की झांकियां देखने के लिए आए ग्रामवासियों का आना भी एक नियम की ही तरह था। उस दौर में नगर के जो समर्थ लोग थे वे अपने बच्चों को पढऩे के लिए जबलपुर, नागपुर, सागर और इलाहाबाद तक भेजते थे।
 
कालांतर में नगर का विकास हुआ और एक दिन यहां राजधानी भी बन गई। चौड़ी-चौड़ी सड़कें, चौराहों पर विद्युत सिग्नल, भव्य अस्पताल, पांच सितारा होटल, चमकते-दमकते शो रूम, मॉल और मल्टीप्लेक्स, अंग्रेजी मीडियम स्कूलों की वातानुकूलित इमारतें, सड़कों पर दौड़तीं मंत्रियों, अफसरों और नवधनाढ्यों की गाडिय़ां- क्या नहीं है इस शहर में? शायद सिर्फ एक प्रेक्षागृह जहां देश-विदेश की नाटक मंडलियां आकर अपना प्रदर्शन कर सकें और उन्हें देख कर अभिजात समाज स्वयं को सुरुचि-सम्पन्न होने का प्रमाण पत्र दे सके! लेकिन क्या बात सिर्फ इतनी ही है? राजधानी में स्वाभाविक ही प्रदेश का पहला मेडिकल कॉलेज और सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल है, किन्तु जिन्हें नाटक देखने के लिए प्रेक्षागृह चाहिए क्या वे उस अस्पताल में जाकर इलाज करने की हिम्मत जुटा पाते हैं? प्रदेश का सबसे पुराना विश्वविद्यालय भी यहीं है और अब तो पांच-छह विश्वविद्यालय हो गए हंै, किन्तु क्या किसी ने पूछा कि इन्हें कितनी स्वायत्तता प्राप्त है? इनका काम-काज कैसा चल रहा है? इनकी कौन सी आवश्यकताएं हैं जिनकी ओर सरकार ध्यान न देना ही मुनासिब समझती है? यहां जो बाग-बगीचे बनाए गए थे उनके क्या हाल-चाल है? इस बात में क्या बुद्धिमानी थी कि अनुपम उद्यान और सौरभ उद्यान के नाम बदलकर धर्मगुरुओं के नाम पर रख दिए जाएं?

मैं कहना चाहता हूं कि जब प्रेक्षागृह की मांग हो रही है, तो इसका सीधा सरोकार हमारी सांस्कृतिक परंपरा से है। तथापि इस शहर की सांस्कृतिक धरोहर को बचाने के लिए हमने आज तक क्या किया है? और क्या उत्साही रंगकर्मियों ने इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता कभी समझी है? मिसाल के तौर पर रायपुर में शासकीय विज्ञान महाविद्यालय, शासकीय संस्कृत महाविद्यालय, सवा सौ साल पुराने गवर्मेंट हाईस्कूल और उससे कुछ कम पुराने माधवराव सप्रे विद्यालय के अपने-अपने विस्तृत परिसर थे। ये सारे परिसर एक के बाद एक नवनिर्माण के नाम पर तहस-नहस कर दिए गए। इसी शहर में लगभग दो सौ साल पुराने कंपनी गार्डन या मोतीबाग है। आज उसका तीन चौथाई हिस्सा बाजार या अन्य कामों की भेंट चढ़ गया है। इसी उद्यान में रवीन्द्रनाथ की जन्मशताब्दी पर जो रवीन्द्र नाट्य मंच बना वह आज कहां है? रंगमंच की मांग का समर्थन तो शहर के प्रेस क्लब के सदस्य भी करते हैं, लेकिन क्या उन्हें इस बात की ग्लानि है कि वे ही रवीन्द्र नाट्य मंच को हड़पने के दोषी हैं?

इस रायपुर में एक से एक पुराने भवन हैं। जयस्तंभ से लगा हुआ कैसर-ए-हिन्द दरवाजा है, जो मलिका विक्टोरिया ने हम पर अपनी हुकूमत की याद दिलाने के लिए तामीर करवाया था। इस ऐतिहासिक द्वार को रवि भवन ने खा लिया। कोई दो सौ-ढाई सौ साल पुराना गोलबाजार उसी सड़क पर आगे है। हमने तो उसे सहेजने के लिए भी कुछ नहीं किया। भारत के प्राचीनतम संग्रहालयों में एक घासीदास म्यूजियम को बने भी सवा सौ साल हो चुके हैं। आज उसका पुराना भवन एक स्थानीय संस्था के हाथों में है। ऐसी तमाम इमारतें हमें अपने इतिहास से जोड़ती हैं, अतीत से सबक लेने के लिए प्रेरित करती हैं, किन्तु उन्हें ठीक-ठिकाने से रखा जाए, यह समझने में हमारी कोई दिलचस्पी नहीं है।

राजधानी में गांधी मैदान पर रंगमंदिर नाम की एक जगह हुआ करती है या थी। गांधी मैदान अब पार्किंग के काम आ रहा है और केन्द्र सरकार के अनुदान से बना रंगमंदिर कानूनी उलझनों में फंसा है क्योंकि कुछ लालची तत्व वहां मॉल बनाना चाहते हैं। बड़े-छोटे लालची लोगों ने ही इस शहर के तालाब पाट दिए। जगह-जगह पर चाट भंडार खुल गए। बूढ़ातालाब का नाम बदलकर विवेकानन्द सरोवर करने में हमें न जाने क्या सुख मिलता है, यह भूलकर कि यह नया नाम प्राचीन इतिहास से हमारा संबंध तोड़ता है। हमने शहर में स्टेडियम भी बनाए, लेकिन किसी ने उनमें खेलों का आयोजन होते कितनी बार देखा है? यह इल्जाम इस नगर के संस्कृतिकर्मियों पर भी है कि शहीद-ए-आजम भगतसिंह की टोपधारी प्रतिमा का सिर काट दिया जाता है और बंद सभागारों में प्रयाण गीत गाने वाले क्रांतिकारी चुप बैठे रह जाते हैं।

मित्रो! प्रेक्षागृह की मांग जरूर कीजिए परन्तु यह भी तो सोचिए कि उसमें नाटकों का मंचन कितने दिन होगा और कितने दिन फूहड़ फिल्मी अंदाज के कार्यक्रम होंगे? नाटक खेलने के लिए जो बड़ी-बड़ी मंडलियां आएंगी उनको देने के लिए लाखों रुपया कहां से लाएंगे? सरकार के आगे हाथ पसारेंगे या उन व्यापारियों अथवा अफसरों के आगे जिनकी सांस्कृतिक समझ के बारे में कुछ न कहना ही बेहतर है। और जब उन्हें आप कार्यक्रम में मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि का सम्मान दे कर बुलाएंगे तो उनके सामने आपकी हैसियत क्या रह जाएगी?
 
देशबन्धु में 20 नवंबर 2014 को प्रकाशित

Wednesday, 12 November 2014

यह तो पहिला फेरबदल है


 प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बीते रविवार अपने मंत्रिमंडल का विस्तार कर पांच माह से रुका हुआ एक जरूरी काम पूरा कर लिया है। छोटा मंत्रिमंडल, सीमित सरकार, लैस गवर्मेंट, जैसे नारे कर्णप्रिय हो सकते हैं लेकिन सरकार चलाना है तो व्यवहारिक आधार पर निर्णय लेना ही पड़ते हैं। इस नाते कहना होगा कि मंत्रिमंडल का विस्तार उचित ही हुआ है। हमारा ख्याल है कि यह पहला फेरबदल अंतिम नहीं है और निकट भविष्य में ही कुछ और परिवर्तनों की संभावना बनी हुई है। प्रधानमंत्री ने अपने सबसे विश्वस्त सहयोगी अरुण जेटली को यद्यपि रक्षामंत्री के प्रभार से मुक्त कर दिया है, लेकिन इसके स्थान पर उन्हें दो अन्य विभाग दे दिए गए हैं- कारपोरेट मामले तथा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय। वित्त मंत्रालय का अपना काम इतना विस्तृत है कि वित्तमंत्री को दूसरे विभागों के लिए पर्याप्त समय निकालना संभव नहीं होगा। श्री जेटली वैसे चाहे जितने मेहनती हों, उन्हें अपने स्वास्थ्य का ध्यान भी रखना होगा। यूं तो भारत का तीन चौथाई मीडिया इस वक्त कारपोरेट के शिकंजे में है, लेकिन सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का कार्य अखबारों व चैनलों पर नियंत्रण रखने से कहीं आगे का है।

यदि अरुण जेटली को आगे-पीछे वित्त मंत्रालय के अलावा अन्य प्रभार छोडऩे की नौबत आई तो उसके पहले प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है कि डॉ. हर्षवर्द्धन केन्द्रीय मंत्रिमंडल में कब तक बने रहेंगे।  राष्ट्रपति भवन से जारी सूची में कैबिनेट मंत्रियों में उनका नाम सबसे नीचे रखा गया है, जबकि वे पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं। ऐसी चर्चा है कि गुजरात की तम्बाखू लॉबी के दबाव में उनसे स्वास्थ्य मंत्रालय छीना गया है। डॉ. हर्षवर्द्धन एक लोकप्रिय जननेता हैं, उनकी छवि साफ-सुथरी है तथा दिल्ली प्रदेश में उन्होंने स्वास्थ्य मंत्री के रूप में वर्षों पूर्व कुशलतापूर्वक कार्य किया था। गत वर्ष विधानसभा चुनाव के समय श्री मोदी के पसंदीदा उम्मीदवार विजय गोयल का नाम भाजपा की तरफ से मुख्यमंत्री पद के लिए उछाला गया था, लेकिन हर्षवर्द्धन को संघ की पसंद होने की वजह से आगे किया गया था। संभव है कि ये बात श्री मोदी को नागवार गुजरी हो! इसका दूसरा पक्ष यह है कि अगर दिल्ली के आसन्न चुनावों में भाजपा जीतती है तो उन्हें मुख्यमंत्री पद के लिए मुक्त कर दिया जाए।

श्री मोदी ने मनोहर पार्रिकर एवं सुरेश प्रभु का चयन कर सही संदेश दिया है। ये दोनों मंत्री सुयोग्य, कर्मठ एवं अपेक्षाकृत युवा हैं। श्री पार्रिकर ने मुख्यमंंत्री रहते हुए और श्री प्रभु ने वाजपेयी सरकार के मंत्री के रूप में पर्याप्त प्रशंसा अर्जित की थी। वर्तमान सरकार का काफी जोर अधोसंरचना विकास पर है एवं भारतीय रेलवे का उसमें अच्छा खासा योगदान होगा। इसी तरह प्रतिरक्षा के मामले में भी बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप नीतियां बनाने और उन्हें त्वरित गति से लागू करने की आवश्यकता पड़ेगी। इन दोनों विभागों में वर्तमान सरकार का जोर निजीकरण एवं विदेशी निवेश पर भी है। प्रधानमंत्री संभवत: उम्मीद रखते हैं कि उनके ये दोनों ऊर्जावान सहयोगी इस दिशा में उनकी सोच के अनुसार तत्परतापूर्वक कार्य करेंगे।

मंत्रिमंडल पुनर्गठन के पहले यह अफवाह चल रही थी कि कैबिनेट की सबसे उम्रदराज सदस्य नजमा हेपतुल्ला को हटा दिया जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। एक ध्यान देने योग्य फेरबदल रविशंकर प्रसाद का है। उनसे विधि विभाग एवं स्वतंत्र प्रभार वाले राज्यमंत्री प्रकाश जावड़ेकर से सूचना प्रसारण मंत्रालय वापिस ले लिया गया है। श्री प्रसाद एनडीए-एक में विधि मंत्री रह चुके थे। उनको इस प्रभार से क्यों हटाया गया समझ नहीं आया। जे.पी. नड्डा पहले हिमाचल में स्वास्थ्य मंत्री थे शायद इसलिए उन्हें केन्द्र का स्वास्थ्य मंत्री बना दिया गया। केबिनेट में अभी एक मंत्री का भविष्य अनिश्चित है।  वे हैं शिवसेना के अनंत गीते। शिवसेना अध्यक्ष ने उन्हें अभी तक इस्तीफा देने क्यों नहीं कहा, यह भी फिलहाल एक पहेली है।

जनरल वी.के. सिंह ने दूसरे क्रम पर सर्वोच्च मतों से जीत दर्ज की थी। उन्हें अपेक्षानुरूप कैबिनेट स्तर न देकर राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार बनाया गया था। यह पूर्व सेनाध्यक्ष का एक तरह से अवमूल्यन ही था। वे अभी अपनी श्रेणी में प्रथम क्रम पर ही हैं, लेकिन उनसे पूर्वोत्तर विकास का प्रभार वापिस ले लिया गया। यह उनका दूसरी बार अवमूल्यन हुआ है। इसके अलावा स्वतंत्र प्रभार के राज्यमंत्रियों के स्तर पर कोई विशेष फेरबदल नहीं हुआ है। दिलचस्प तथ्य यह है कि मंत्रिमंडल में तीन डॉक्टर हैं, लेकिन स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी एक गैर-डॉक्टर को दी गई है। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि कोई विषय विशेषज्ञ अपने ही विषय का मंत्री बन जाए तो उसके पूर्वाग्रह कामकाज पर हावी होने की आशंका बनी रहती है।

यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि प्रधानमंत्री ने इस पुनर्गठन में बिहार और झारखंड में आसन्न विधान सभा चुनावों को ध्यान में रखा है। बिहार में यद्यपि चुनाव होने में कुछ माह बाकी हैं, लेकिन वह राजनीतिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण प्रदेश है। रविशंकर प्रसाद और राधामोहन सिंह तो पहले से ही मंत्री थे, अब एक तरफ राजीव प्रताप रूडी जैसे अभिजात छवि के युवा और दूसरी तरफ गिरिराज सिंह जैसे दबंग छवि के नेता प्रदेश के चुनावी समीकरणों को भाजपा के पक्ष में किस तरह से कर पाएंगे, यह भविष्य ही बताएगा। श्री मोदी ने झारखंड से जयंत सिन्हा को मंत्री बनाकर एक तरह से यशवंत सिन्हा को संतुष्ट किया है, वहीं उनके कारपोरेट ज्ञान का उपयोग करने की बात भी शायद सोची हो! श्री सिन्हा के मंत्री बनने से शायद सबसे ज्यादा तकलीफ वसुंधरा राजे को हुई होगी, जिनके पुत्र दुष्यंत सिंह राजस्थान से सबसे वरिष्ठ सांसद होने के बावजूद मंत्री पद से वंचित रह गए हैं।

एक तरफ बिहार और झारखंड पर प्रधानमंत्री की निगाह है, तो दूसरी तरफ असंदिग्ध विजय से उपजा आत्मविश्वास उन्हें एनडीए के घटक दलों से किनाराकशी करने के लिए संभवत: प्रेरित कर रहा है। उनसे और शिवसेना के बीच तो संबंध विच्छेद हो ही चुका है, अब अगली बारी शायद अकाली दल की हो सकती है। होशियारपुर के दलित सांसद विजय सांपला को मंत्री बनाने से यही संकेत मिलता है। वे इसके पूर्व हरियाणा के विधानसभा चुनावों में डेरा सच्चा सौदा के गुरु का साथ ले ही चुके हैं, जिनका शिरोमणि अकाली दल से बैर सर्वविदित है। भाजपा संविद के दिनों से ही धीरे-धीरे कर गठबंधन सहयोगियों को खत्म करते आई है। इसलिए कल को यदि वह अकाली दल से भी नाता तोड़ लें तो आश्चर्य नहीं होगा।

श्री मोदी के मंत्रिमंडल में अधिकतर लोग नए और अनुभवहीन हैं। कुछेक मंत्री आवश्यकता से अधिक वाचाल भी हैं। कुछेक बड़े छोटे आरोपों के घेरे में भी हैं। अनुभवहीनता पर परिश्रम और लगन से विजय पाई जा सकती है। कुल मिलाकर इस मंत्रिमंडल में ऐसा कुछ नहीं है जिसे लेकर कोई बड़ा प्रवाद खड़ा किया जा सके। कांग्रेस प्रवक्ता अजय माकन ने जो आरोप लगाए हैं, उसमें परिपक्व सोच का परिचय नहीं मिला। कांग्रेस के लिए यह उचित है कि सरकार के कामकाज पर निगाह रखे और जहां गड़बड़ी दिखे उसकी आलोचना करे, लेकिन बिना सही अवसर के विवादों में उलझना स्वयं कांग्रेस के हित में नहीं है। एक और बात, कुछ ही दिनों में भाजपा संगठन में भी फेरबदल होने की अपेक्षा रखनी चाहिए। जो पार्टी पदाधिकारी मंत्री बन गए उनके रिक्त स्थानों पर भाजपा को नए लोगों को लाना ही होगा।

अंत में, छत्तीसगढ़ निवासी होने के कारण मुझे दु:ख है कि सात बार चुनाव जीतने के बाद भी रमेश बैस को मंत्री पद नहीं मिल सका।
 देशबन्धु में 13 नवंबर 2014 को प्रकाशित