Wednesday, 12 August 2015

सरकार बनाम संस्थाएं


 

प्रधानमंत्री
नरेन्द्र मोदी 15 अगस्त 2014 के लालकिले की प्राचीर से पहिले उद्बोधन में अन्य घोषणाओं के बीच दूरगामी परिणामों वाली एक बड़ी घोषणा योजना आयोग को समाप्त करने की थी। इस 15 अगस्त को भी क्या वे ऐसी कोई चौंकाने वाली घोषणा करेंगे? या शायद उसकी आवश्यकता नहीं है? मोदी सरकार ने विगत एक वर्ष के दौरान नेहरू युग अथवा नेहरू परंपरा की अनेक संस्थाओं को जिस तरीके से विसर्जित, खंडित या परिवर्तित किया है, वह देश के सामने है। बीते स्वाधीनता दिवस पर संभवत: प्र्रधानमंत्री के मन में यह विचार रहा हो कि अपने पहिले संबोधन में उन्हें ऐसी कोई बात कहना चाहिए जिसकी व्यापक स्तर पर चर्चा हो सके। इस दरमियान उनकी मुखरता का स्थान मौन ने ले लिया है। दिल्ली के अनुभव से वे शायद यह जान गए हैं कि हर काम घोषणा करके करना जरूरी नहीं है। जो काम चुपचाप किया जा सकता है, उसमें व्यर्थ प्रचार क्यों किया जाए? इसीलिए योजना आयोग को विघटित करने के अलावा ऐसे कई अन्य निर्णय इस बीच लागू कर दिए गए, जिन पर आम जनता को गौर करने का अवसर ही नहीं मिला।

मैं यह स्वीकार करता हूं कि लोकतंत्र में एक चुनी हुई सरकार को अपनी नीतियों व सिद्धांतों के अनुरूप निर्णय लेने का अधिकार होता है। इसमें यह भी शामिल है कि सरकार अपने अधीनस्थ संस्थाओं का संचालन भी अपनी इच्छा से करे व शीर्ष पदों पर ऐसे व्यक्तियों की नियुक्ति करे जो उसके अनुकूल हों। लेकिन लोकतंत्र का अर्थ बहुमतवाद नहीं होता, इस सत्य को ध्यान में रखकर सरकार का यह उत्तरदायित्व भी बनता है कि इन संस्थाओं के जो मूल लक्ष्य हैं, उनकी अनदेखी न की जाए तथा संचालन उन व्यक्तियों के हाथों में हो, जो अपनी वैचारिक/सांगठनिक प्रतिबद्धता के बावजूद उस विषय विशेष में निपुण हों। यह सोचकर मुझे हैरानी होती है कि क्या भाजपा/संघ में प्रतिभाशाली व्यक्तियों का टोटा पड़ गया है! मोदी सरकार के गठन के बाद से ही विभिन्न संस्थाओं के कामकाज में जिस तरीके से  हस्तक्षेप किया गया है, वह हमें निराश करता है। इसके अलावा यह संदेह होता है कि लोकसभा में स्पष्ट बहुमत का अहंकार सरकार को जनतांत्रिक परंपराओं का सम्मान करने से रोक रहा है।

राष्ट्रीय फिल्म एवं टेलीविज़न प्रशिक्षण संस्थान, पुणे याने एफटीटीआई के शासी निकाय के अध्यक्ष पद पर गजेंद्र चौहान की नियुक्ति सत्ता के अहंकार का एक उदाहरण है। यह हमें पता है कि एफटीटीआई जैसे संस्थान में दैनंदिन कामकाज पूर्णकालिक वेतनभोगी निदेशक के जिम्मे होता है जबकि अध्यक्ष का काम मुख्यत: शासी निकाय की बैठक की अध्यक्षता करना एवं समय-समय पर नीतिगत मार्गदर्शन करना होता है। आज तक इस संस्थान में जो अध्यक्ष हुए, वे सिने जगत के कद्दावर व्यक्ति थे। उन्हें अपने ज्ञान एवं अनुभव के बल पर प्रतिष्ठा हासिल की थी। देश-विदेश में जहां भी मौका हो, उनके नाम से संस्थान की भी प्रतिष्ठा वृद्धि होती थी। आज गजेंद्र चौहान के अध्यक्ष बनने एवं साथ-साथ संघ से जुड़े कुछ गैर-फिल्मी लोगों के सदस्य बनने से आशंका उपजती है कि एक सरकारी सेवक याने निदेशक जो मर्जी आएगी, वैसा काम करेगा व शासी निकाय सम्यक समझ व अनुभव के अभाव में उसके प्रस्तावों की पुष्टि मात्र करने तक सीमित रह जाएगा। जो छात्र इस नियुक्ति का विरोध कर रहे हैं, उन्हें यह कहकर डराया जा रहा है कि सरकार संस्थान को ही विघटित कर देगी। यह भूलकर कि संस्था तोडऩा आसान है, संस्था खड़ी करना उतना ही दुष्कर।

एक अन्य प्रसंग जिसमें पुस्तकों में अपनी रुचि के चलते मुझे पीड़ा हुई है, वह है राष्ट्रीय पुस्तक न्यास-याने एनबीटी के अध्यक्ष पद पर हुई नियुक्ति। एनबीटी ने विगत पांच दशकों में पुस्तकों के प्रति आम जनता की रुचि बढ़ाने के लिए यथेष्ट काम किया है। तमाम भारतीय भाषाओं में न्यास पुस्तकें छापता है एवं सस्ते दामों पर बिक्री हेतु उपलब्ध कराता है। उसकी मोबाइल वैन पूरे देश का सफर करती हैं तथा स्थान-स्थान पर बिक्री के लिए स्टॉल लगाती है। अगर आप किसी को पुस्तकें भेंट देना चाहते हैं तो बेहिचक एनबीटी के सुंदर प्रकाशनों का सैट भेंट कर सकते हैं। इसके अध्यक्ष पद पर भी किसी ऐसी शख्सियत की नियुक्ति होना चाहिए थी, जो लेखन-प्रकाशन के बारे में भरपूर जानकारी रखता हो। मोदी सरकार चाहती तो नरेन्द्र कोहली, महीप सिंह, प्रभाकर श्रोत्रिय जैसे किसी ख्यातिनाम लेखक को यह दायित्व दे सकती थी। ऐसा कोई व्यक्ति अध्यक्ष होता तो पुस्तक-प्रेमी समाज में सही संदेश जाता, एक आश्वस्ति होती कि एनबीटी अपनी गुणवत्ता कायम रखेगा। अब देखना होगा कि नए अध्यक्ष बलदेवभाई शर्मा कसौटी पर कितना खरा उतरते हैं, क्योंकि पुस्तक जगत से उनका पहिले कोई खास नाता नहीं रहा।

ललित कला अकादमी में जिस तरह से अध्यक्ष को हटाया गया, वह तो और भी हैरानी एवं चिंता उपजाता है। देश की इस शीर्ष संस्था के अध्यक्ष की नियुक्ति स्वयं राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। अध्यक्ष ऐसे व्यक्ति को ही बनाया जाता है जिसने कला एवं संस्कृति के क्षेत्र में उल्लेखनीय व महत्वपूर्ण योगदान किया हो। यह संयोग की बात है कि कुछ वर्ष पूर्व म.प्र. के अशोक वाजपेयी अकादमी के अध्यक्ष थे। उनका ललित कलाओं व अन्य रचनात्मक विधाओं के उन्नयन में जो दीर्घकालीन योगदान रहा है, उससे सभी परिचित हैं। दो वर्ष पूर्व राष्ट्रपति ने म.प्र./छ.ग. के कल्याण कुमार चक्रवर्ती को इस पद पर मनोनीत किया। श्री चक्रवर्ती का पुरातत्व, कला-इतिहास व संबंधित विषयों पर जो काम है, वह भी सुविदित है। वे दिल्ली में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के भी सदस्य सचिव रह चुके हैं। ऐसे व्यक्ति को अचानक अध्यक्ष पद से हटा दिया गया, जबकि वे दलगत राजनीति से तटस्थ रहकर अपना दायित्व निर्वाह कर रहे थे। राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत एक उच्च पदस्थ व्यक्ति को क्या एकाएक इस तरह पदमुक्त किया जा सकता है, एक सवाल तो यही है। दूसरे, उन्हें हटाकर संस्कृति मंत्रालय ने क्या हासिल कर लिया? अध्यक्ष पद पर अभी तक कोई दूसरी नियुक्ति भी नहीं की गई है। 

कहा जा सकता है कि कांग्रेस राज में भी इसी तरह कामकाज चलता था। बात किसी हद तक सही है, लेकिन एक बड़ा फर्क है। ऐसा नहीं कि कांग्रेस ने सिर्फ और सदैव कांग्रेसियों को ही उपकृत किया हो। उनके शासन के दौरान साम्यवादी, समाजवादी यहां तक कि अघोषित भाजपाईयों को भी लगातार अवसर मिलते रहे हैं। जिस जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय याने जेएनयू पर कम्युनिस्टों का गढ़ होने का आरोप लगता रहा है, क्या वहां सारे शिक्षक साम्यवादी ही थे? आप सूची उठाकर देख सकते हैं कि ऐसा नहीं था। कांग्रेस चूंकि कैडर-आधारित पार्टी नहीं है, इसलिए उसके राज में व्यवहारिक कारणों से ऐसा होना संभव भी नहीं था। केंद्र के अलावा राज्यों में भी अनेकानेक उदाहरण हैं कि जिसे कांग्रेसी अपना समझते थे, वह सत्ता पलटते साथ भाजपाई निकला। दूसरे शब्दों में,यदि कांग्रेस शासन के दौरान पद पाने के लिए चाटुकारिता प्रमुख गुण था तो भाजपा राज में संघ निष्ठा अनिवार्य शर्त है। लेकिन फिर भाजपा को अपने निष्ठावान एवं सुयोग्य जनों की एक सूची बना लेना चाहिए जिन्हें किसी पद पर निर्विवाद बैठाया जा सके।

मेरी इस बिनमांगी सलाह का एक अन्य पक्ष भी है। भाजपा आज सत्ता में है और यह सबको पता है कि सत्ता के साथ अपने आप कुछ बुराईयां जुड़ जाती हैं। सत्ताधारी को कबीर के वचन कड़वे लगने लगते हैं, लेकिन उसकी अपनी भलाई इसी में है कि वह चाटुकारिता से बचकर रहे। जनतंत्र में तो उसे विपरीत विचारों का भी समादर करना आना चाहिए। यदि सत्ता का मकसद सिर्फ सत्ता का आनंद उठाना है तब तो कोई बात नहीं, लेकिन यदि सत्ताधारी अपने पांच, दस या पंद्रह साल के कार्यकाल को लोक-स्मरणीय बनाना चाहता है तो उसे अपनी व्यवस्था में ऐसे अधिकारी नियुक्त करना चाहिए जो विचारों के अनुकूल होने के अलावा अपने पद व कार्य की पवित्रता की रक्षा करने में सक्षम हों। भाजपा को अटलबिहारी वाजपेयी से काफी कुछ सीखने की आवश्यकता है। स्वाधीनता दिवस पर हम यही कामना कर सकते हैं कि ऐसा हो।
देशबन्धु में 13 अगस्त 2015 को प्रकाशित

Sunday, 9 August 2015

स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कविता : दशा और दिशा

 स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कविता : दशा और दिशा। जैसा कि शीर्षक से जाहिर है, यह विशद विवेचन का विषय है, जिसे एक व्याख्यान या आलेख में साधना लगभग असंभव है। यदि विषय के साथ न्याय करना है तो इस हेतु एक सुचिंतित, सुदीर्घ ग्रंथ लिखने की आवश्यकता होगी। फिलहाल इसके कुछेक पहलुओं पर सरसरी तौर पर चर्चा हो सकती है। अपने आपमें विषय महत्वपूर्ण है, प्रासंगिक भी तथा आज की चर्चा को एक प्रस्थान बिंदु मानकर आगे बढ़ा जा सकता है। जब हम हिंदी साहित्य के इतिहास, कालखंड निर्धारण, परंपराओं एवं प्रवृत्तियों की चर्चा करते हैं तो तीन चार नाम प्रमुख रूप से सामने आते हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 1920 के दशक में हिंदी शब्द सागर की भूमिका लिखी, वही कुछ वर्ष बाद ''हिंदी साहित्य का इतिहास" के रूप में सामने आई, आचार्य नंददुलारे वाजपेयी का चर्चित ग्रंथ ''हिन्दी साहित्य : बीसवीं शताब्दी" 1941 में प्रकाशित हुआ तथा आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी रचित ''हिन्दी साहित्य-उद्भव व विकास" 1950 के आसपास आया। इसके अलावा समय-समय पर अन्य पुस्तकें आई होंगी, जिनके बारे में मुझे विशेष जानकारी नहीं है। उपरोक्त तीनों पुस्तकों को लिखे लगभग सत्तर वर्ष से नब्बे वर्ष तक का समय बीत चुका है। आचार्य शुक्ल ने जिसे आधुनिक काल माना है, वह एक तरह से वर्तमान साहित्य का शैशवकाल था तथा वाजपेयी जी व द्विवेदी जी ने भी उस दौर की विवेचना तक ही अपने को सीमित रखा। 

स्मरणीय है कि अज्ञेय द्वारा संपादित ''तार सप्तक" का प्रकाशन 1943 में हुआ था। उसकी चर्चा द्विवेदी जी के ग्रंथ में अभीष्ट थी, किन्तु वह नहीं हुई। इसी तरह वाजपेयी जी ने अपनी पुस्तक, जो कि मूलत: स्वतंत्र प्रकाशित लेखों का संकलन था, का शीर्षक तो महत्वाकांक्षी रखा, लेकिन वह इसलिए असमय था, क्योंकि उसका प्रकाशन तब हुआ जब बीसवीं सदी का प्रथमार्द्ध पूरा होने में भी दस साल बाकी थे। इन तथ्यों के आलोक में कहा जा सकता है कि हिन्दी साहित्य का नया इतिहास लिखने का समय आ चुका है। इसीलिए मैंने आज की चर्चा को प्रस्थान बिंदु मानने का प्रस्ताव ऊपर किया है। किसी उद्यमी शोधार्थी को अब यह बीड़ा उठा लेना चाहिए। यूं तो जब भी समग्र इतिहास लिखा जाएगा उसमें सभी विधाओं का समावेश स्वाभाविक रूप से होगा; किन्तु आज की संगोष्ठी कविता पर केन्द्रित है, इस नाते मैं समझता हूं कि वर्तमान कविता की विवेचना तार सप्तक के प्रकाशन को आधार मानकर की जानी चाहिए। 1943 और 1947 में मात्र चार वर्ष का अंतर है, तदपि कविता की मीमांसा एक ऐतिहासिक किन्तु मूलत: राजनैतिक घटना की पृष्ठभूमि में करने के बजाय कविता के अपने विकास क्रम में आए एक ऐतिहासिक अवसर से करना अधिक श्रेयस्कर होगा। 

मेरी समझ में देश को आजादी मिलने और हिंदी कविता में एक नए युग का सूत्रपात होने के पीछे जो परिस्थितियां व कारण रहे हैं, उनमें भी कई स्थानों पर समानता देखी जा सकती है। सारे विश्व में और देश में विचारों की जो नई बयार बह रही थी, उससे तार सप्तक के कवि भली-भांति परिचित थे और तेजी से बदलते हुए घटनाचक्र पर सतर्क दृष्टि रखे हुए थे। कहा जा सकता है कि कवि समय के साथ चल रहा था। दूसरे, यह तो स्वीकार्य है कि रचनाकार अपने दौर की राजनैतिक हलचलों से स्वयं को काटकर नहीं रख सकता, उसका प्रभाव तो किसी न किसी रूप में पड़ता ही है, किन्तु यह आवश्यक नहीं है कि एक घटना विशेष का फौरी प्रभाव उसकी रचनाशीलता पर पड़े। आशुकवि ही इसका अपवाद हो सकते हैं। अतएव किसी राजनैतिक कालखंड अथवा कैलेंडर को आधार मानकर यदि साहित्य लेखन का विभाजन किया जाए तो उस पर एक प्रश्नचिन्ह लगा रहेगा। मसलन क्या बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों को सिर्फ इस कारण से पृथक किया जा सकता है कि एक नई सहस्राब्दि का उदय हो गया है? 

बहरहाल, तार सप्तक के प्रकाशन एवं स्वाधीनता प्राप्ति के उपरांत रची गई हिंदी कविता की दशा-दिशा पर विचार करते हुए पहले तो यह नोट करना होगा कि सात-आठ दशक की इस लंबी यात्रा में कविता अनेक मोड़ों से गुजरी है, अनेक पड़ावों पर ठहरी है और इस बीच उसने नए-नए रूप ग्रहण किए हैं। विचार, कथ्य, भाषा, शिल्प, सभी दृष्टियों से कविता किसी एक बिंदु पर टिकी नहीं रही, बल्कि उसने निरंतर अपना विकास किया। इस अवधि में वैश्विक एवं राष्ट्रीय क्षितिज पर जो परिवर्तन हुए, कविता उनसे भी अछूती नहीं रही। आचार्य शुक्ल ने जिस आधार पर कविता को कालखंडों में बांटा, उसे प्रमाण मानकर कहा जा सकता है कि सामाजिक-राजनैतिक परिदृश्य में आए युगांतकारी परिवर्तनों से कविता प्रभावित होती है। हमारे विवेच्य कालखंड में ऐसा सबसे पहला परिवर्तन था कि भारत दो सौ साल की गुलामी से मुक्ति पाकर स्वाधीन देश के रूप में उदित हुआ। यह अध्ययन का विषय है कि इस एक बड़ी घटना ने कविता को किस सीमा तक प्रभावित किया। हम पाते हैं कि परवर्ती समय में ऐसी घटनाओं, प्रसंगों व परिस्थितियों की लंबी श्रृंखला है जिसने विश्वजन के साथ-साथ कवि मन को भी आंदोलित किया होगा। इनकी एक सूची बनाने से बात स्पष्ट हो सकेगी:- 

(1) 1939-1945 द्वितीय विश्व युद्ध
(2) 1942 : 'भारत छोड़ो'आंदोलन
(3) 1945 : अणुबम का आविष्कार व हिरोशिमा व नागासाकी पर एटमी हमला
(4) 1947 : भारत में एशियाई संबंध सम्मेलन
(5) 1948 : चीन में साम्यवादी शासन की स्थापना व इजराइल में धर्म आधारित देश की स्थापना
(6) 1950-60 : कोरिया का युद्ध व विभाजन, स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण व उस पर पश्चिमी हमला, बांडुंग सम्मेलन, क्यूबा का स्वतंत्र होना
(7) 1960 : एक दशक में अफ्रीका, एशिया व लैटिन अमेरिका के अनेक गुलाम देशों की स्वतंत्रता
(8) 1964 : पं. नेहरू व मुक्तिबोध जी का निधन
(9) 1965-75 : अमेरिका का वियतनाम युद्ध
(10) 1967 : भारत में नक्सलवाद का उदय
(11) 1952 से अब तक : भारत में आम चुनाव, जनतांत्रिक आकांक्षाओं का बीजारोपण, राजनैतिक चेतना का विस्तार
(12) 1950 के दशक से देश के योजनाबद्ध विकास की कल्पना, बांधों व कारखानों का निर्माण, औद्योगीकरण की शुरूआत
(13) 1962 : भारत-चीन युद्ध
(14) 1965- भारत-पाक के बीच दूसरा युद्ध
(15) 1965-67 : देश में बड़े पैमाने पर अकाल, हरित क्रांति की शुरूआत
(16) 1971 : बांग्लादेश का उदय
(17) 1975-77 : आपातकाल
(18) 1992 : बाबरी मस्जिद विध्वंस
(19) 1998 : भारत का एटमी परीक्षण
(20) 1999 : कारगिल युद्ध

यह फेहरिस्त अभी पूरी नहीं हुई है। भारत में क्षेत्रीय तथा जातिगत अस्मिता का उभार, औद्योगीकरण के साथ शहरीकरण, विस्थापन व पलायन, जल-जंगल-जमीन के मुद्दों पर संघर्ष, समाज में स्त्री, दलित व आदिवासी विमर्शों का प्रारंभ; दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सूचना प्रौद्योगिकी तथा संचार साधनों का विकास, कम्प्यूटर से स्मार्टफोन तक का सफर, बहुराष्ट्रीय निगमों का बढ़ता वर्चस्व, पूंजीबाजार के जटिल खेल, रत्नगर्भा अफ्रीका की धरती का बेरहम शोषण, इजराइल की संकीर्ण साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा से उदित इस्लामी आतंकवाद, अफगानिस्तान और इराक पर अमेरिकी हमले, सोवियत संघ का विघटन जैसी तमाम अन्य घटनाएं हैं जिन सबका प्रभाव साहित्य रचना पर पडऩा ही था। यहां हम ध्यान दें कि स्वतंत्रता प्राप्ति के तत्काल बाद के वर्षों में भारतीय लेखक जिस तरह वैश्विक घटनाचक्र में दिलचस्पी लेता था, वह 1975 के बाद लगभग समाप्त हो गई। दरअसल, स्वातंत्र्योत्तर कविता की बात करें तो इस समय को प्रमुख रूप से तीन खंडों में बांटा जा सकता है- (1) 1943/1947-1964, (2) 1964-1984 एवं (3)1984 से अब तक। मैंने यह विभाजन खंड विशेष की प्रमुख राजनैतिक, आर्थिक, हलचलों को ध्यान में रखकर किया है; इसमें विज्ञान व तकनीकी के क्षेत्र में समयानुसार हुई प्रगति को भी आधार माना है; और कविता के अपने स्वरूप में जो परिवर्तन परिलक्षित हुए हैं उनका संज्ञान लिया है। इसके पश्चात यह कहना भी आवश्यक होगा कि यह निर्धारण पत्थर की लकीर नहीं है। विचारों व भावनाओं के तरल प्रवाह में ऐसा होना संभव नहीं है। 

इस मोटे वर्गीकरण में पहिले खंड याने तार सप्तक के प्रकाशन से लेकर गजानन माधव मुक्तिबोध के निधन तक की अवधि की विवेचना करने से एक बात समझ आती है कि छायावाद के उत्तराधिकारी रूप में जो नई कविता सामने आई थी, वह प्रयोगवाद तथा प्रगतिवाद इन दो धाराओं में विभक्त हो गई थी; किन्तु छायावाद के कतिपय मूल्यों का प्रभाव इस दौर की कविता पर स्पष्ट था। इसमें देशप्रेम व प्रकृति प्रेम था, आजादी की छटपटाहट थी, विश्व नागरिकता की गूंज थी, व्यक्तिगत स्वाधीनता का मूल्य था, युद्ध, हिंसा एवं वैभव का तिरस्कार था। कविता एक अनिवार्य कर्म की तरह थी एवं उसमें सामाजिक उत्तरदायित्व का बोध था। देश एवं दुनिया के नव-निर्माण की, एक यूटोपिया फलित होने की आशा थी। इस अवधि में दो बड़े कवि सामने आए- अज्ञेय एवं मुक्तिबोध। कहने की आवश्यकता नहीं कि दोनों एक मंच पर साथ-साथ प्रकट हुए। यह बाद की बात है कि दोनों की दिशाएं बदल गईं। अज्ञेय ने आगे चलकर दूसरे, तीसरे व चौथे सप्तक का भी संकलन-संपादन किया। दूसरे व तीसरे में कुछ महत्वपूर्ण कवि सामने आए किन्तु चौथा सप्तक तो एक तरह से निष्फल प्रयोजन ही सिद्ध हुआ। प्रयोगवाद की धारा एक मुकाम पर पहुंचकर न सिर्फ रुक गई, बल्कि विलुप्त हो गई, जबकि प्रगतिवादी धारा अपना रास्ता तलाश करते हुए आगे बढ़ती चली गई। मुक्तिबोध की असमय, मात्र 47 वर्ष की आयु में मृत्यु एक हृदय विदारक ट्रैजेडी थी, किन्तु उनके विचार भावी-पीढिय़ों के लिए प्रकाश स्तंभ बन गए। सन् 1964 तक के प्रथम कालखंड की एक और विशेषता गौरतलब है यह समय था जब कवियों की तीन, बल्कि चार पीढिय़ां एक साथ रचनाकर्म में संलग्न थीं। इस दौर में मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, दिनकर, निराला, महादेवी और बच्चन सक्रिय थे तो अज्ञेय, शमशेर, नागार्जुन, भवानीप्रसाद मिश्र, मुक्तिबोध, फिर अपेक्षाकृत युवा धर्मवीर भारती, जगदीश गुप्त, श्रीकांत वर्मा, केदारनाथ सिंह इत्यादि तथा चौथी पीढ़ी के प्रतिनिधि बनकर विनोदकुमार शुक्ल, शलभ श्रीराम सिंह इत्यादि दस्तक दे रहे थे।

एक अन्य रोचक तथ्य यह भी है कि छंदमुक्त कविता का युग भले ही प्रारंभ हो गया हो, अभी गीत के लिए कविता के संसार में सम्मान हासिल था। गोपालसिंह नेपाली, नीरज, वीरेंद्र मिश्र, मुकुटबिहारी सरोज, शंभुनाथ सिंह, उमाकांत मालवीय, रामानंद दोषी आदि की कविताएं सुनी और सराही जाती थीं। धर्मयुग व साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसी पत्रिकाओं में उन्हें उचित स्थान मिलता था। क्या इसकी वजह यह थी कि वह अपेक्षाकृत सरल समय था और अपनी बात गीत में कह पाना संभव था? या फिर क्या ऐसा हुआ कि बाद के कवि लय-ताल को पकड़ पाने में असफल हुए और उन्होंने चिढ़कर गेय कविता को खारिज कर दिया? एक तीसरा कारण यह भी तो हो सकता है कि गीतकार आत्ममुग्धता के शिकार हो गए तथा वर्तमान समय की जटिलताओं को समझ गीतों में उन्हें बांध नहीं पाए।

 वर्तमान समय की कविता के दूसरे चरण में याने 1964 के बाद से लेकर लगभग 1984 तक हम पाते हैं कि देश अनेक प्रकार के झंझावातों से जूझ रहा था। इस अवधि में एक गहरी निराशा का वातावरण भी बन रहा था। यद्यपि शुरूआत सन् 1960 के आसपास हो चुकी थी। इस दौर में जहां अमेरिका की सीआईए द्वारा प्रायोजित फोरम फॉर कल्चरल फ्रीडम जैसी संस्थाएं अपने एजेंडे के अनुसार सक्रिय थीं तो इन्हीं दिनों कविता में भांति-भांति के आंदोलन प्रारंभ हुए। मसलन अकविता, दिगंबर कविता, नवगीत, भुभुक्षु कविता, सनातन सूर्योदयी कविता इत्यादि। कुछ बीटल कवि भी थोड़े समय पूर्व ही भारत आए थे, एलेन गिंसबर्ग का नाम मुझे ध्यान आ रहा है, और वे कविता नहीं, बल्कि अपने क्रियाकलापों के चलते भारत में चर्चित हुए थे। यही समय था जब भोगा हुआ यथार्थ व अनुभूति की प्रामाणिकता जैसे नारे प्रचलन में आए। इस कालावधि में अनास्था, अविश्वास व संशय का जो स्वर मुखर हुआ उसके प्रमुख कवियों में शायद रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा, राजकमल चौधरी व धूमिल आदि नाम लिए जा सकते हैं। धर्मवीर भारती की अंधा युग भी इसी दौरान प्रकाशित-चर्चित हुई। दूसरी ओर त्रिलोचन, शमशेर, केदारनाथ अग्रवाल, केदारनाथ सिंह आदि की प्रगतिशील कवियों के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा मुकम्मल तौर पर हुई। इसी समय में प्रतिभाशाली कवियों की उस पीढ़ी ने अपनी पहिचान बनाना प्रारंभ किया, जो वर्तमान दौर में शीर्ष पर माने जाते हैं। इनमें विनोदकुमार शुक्ल, मलय, चंद्रकांत देवताले, अरुण कमल, सोमदत्त, भगवत रावत, राजेश जोशी, विजेंद्र, प्रयाग शुक्ल, अशोक वाजपेयी आदि के नाम प्रमुखता से लिये जा सकते हैं। 


इस दूसरे चरण में नई कविता या छंदमुक्त कविता का तीव्रगति से विकास तो हुआ लेकिन पाठकों या कहें कि समाज के बीच कविता पहुंचने के अवसर सिमटने लगे। जो दो लोकप्रिय साप्ताहिक और दो-तीन पत्रिकाएं हर पढ़े-लिखे हिंदीभाषी परिवार में खरीदी जाती थीं, वे या तो बंद कर दी गईं या उन्हें बंद होने के लिए छोड़ दिया गया। इस दौर के कवियों को चूंकि कवि सम्मेलन शब्द से ही अरुचि थी और चूंकि वे कविता को एक श्रेष्ठ कर्म मानते थे, इसलिए कविता धीरे-धीरे कर कमरों में होने वाली आत्मीय गोष्ठियों तक सीमित हो गई। कवि का वृहत्तर समाज के साथ संपर्क कट गया। उसने यहां तक कहना शुरू कर दिया कि पाठक को कवि के पास आना चाहिए। इसका परिणाम यह निकला कि मंच पूरी तरह उन गीतकारों के हवाले हो गया जो आधुनिक भावबोध को साध पाने में अक्षम थे। पर इस दरम्यान एक नई बात हुई। कमलेश्वर ने  'सारिका' में अपने मित्र दुष्यंत कुमार की गजलों को प्रमुखता से छापना शुरू किया तो हिंदी गजल नामक एक नई विधा का ही जन्म हो गया। चंद्रसेन विराट व ओम प्रभाकर जैसे गुणी गीतकार गजलगो हो गए। आज हिंदी कविता के नाम पर गज़ल का ही बोलबाला है। अब तो गुजराती, मराठी, बुंदेली व छत्तीसगढ़ी में भी गजलें कही जा रही हैं। नवगीत को यह सौभाग्य प्राप्त नहीं हो सका।

तीसरा चरण यूं तो 1984 से माना जा सकता है, लेकिन इसका ठीक-ठाक स्वरूप बनना 1991 के आसपास प्रारंभ हुआ, जब नवसाम्राज्यवाद की पगचापें भारत की धरती पर सुनाई देने लगीं। आज बाजारवाद की बात खूब होती है, लेकिन यह ध्यान रखना आवश्यक है कि आज का बाजार वैश्विक पूंजीवाद का एक अस्त्र मात्र है। जब सिर्फ बाजारवाद की आलोचना होती है तो उसकी नियामक शक्ति की तरफ दुर्लक्ष्य हो जाता है। इस दौर में जो स्थापित कवि हैं उनसे सुधी पाठक भलीभांति परिचित हैं। कवियों की एक और नई पीढ़ी स्वाभाविक क्रम में सामने आ रही है। उसकी रचनाओं में वर्तमान की आर्थिक-राजनैतिक-वैज्ञानिक जटिलताओं को पकड़ पाने की, उनका विश्लेषण करने की इच्छा प्रतिबिंबित होती है। अच्छी बात यह है कि मुक्तिबोध की कृतियां इस तीसरी पीढ़ी का पथ आलोकित कर रही हैं। इस लंबी अवधि में, हमारा ध्यान जाता है कि, महिलाओं ने जहां कहानी व उपन्यास लेखन में अपनी प्रतिभा का भरपूर परिचय दिया, वहीं कविता लेखन में कुछ गिने-चुने नाम ही सामने आ पाए। यह भी दृष्टव्य है कि मुक्तिबोध के बाद उन जैसी महाकाव्यात्मक विस्तार की कविता और कोई नहीं लिख पाया, लंबी कविताएं भले ही कितनी भी लिखी गई हों। यह भी नोट करना उचित होगा कि पहिले की भांति आज भी कविता में नए-नए प्रयोग हो रहे हैं। निराला ने गक़ालें, त्रिलोचन ने सॉनेट, कईयों ने नवगीत लिखे तो आज ''हिंदी गज़ल" के साथ हाईकू आदि भी लिखे जा रहे हैं। ये प्रयोग कितने सार्थक हैं, उस पर फिलहाल क्या कहें?

टिप्पणी : राष्ट्रभाषा सेवी समाज, अकोला (महा.) द्वारा 28 जून 2015 को आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में दिए उद्घाटन व्याख्यान का संशोधित स्वरूप। 

अक्षर पर्व अगस्त 2015 अंक की प्रस्तावना

Friday, 7 August 2015

अकोला में हिंदी


 आज के इस लेख में कुछ अतीत राग है, कुछ यात्रा विवरण एवं कुछ साहित्य चर्चा। मैं आपको एक ऐसे स्थान ले चलना चाहता हूं जिसके साथ मेरे बचपन की एक रोचक स्मृति जुड़ी हुई है। यह वाकया है मई 1956 का। छठवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद गर्मी की छुट्टियों में बाबूजी-बाई (माँ) के साथ मैं अकोला आया था। ननिहाल पक्ष में एक विवाह का अवसर था। बाबूजी बारात के साथ नागपुर चले गए थे। विवाह वाले घर में मेरी बराबरी का कोई बच्चा नहीं था। जो भैया दूल्हा बनकर गए थे, उनके कमरे में एक पुस्तक मुझे मिल गई। जासूस जे.बी. और उसके सहायक जैकब के कारनामों की। जबलपुर में घर के पुस्तकालय (बाबूजी ने उसे बड़े प्यार से ग्रंथ चयन नाम दिया था) से मैं प्रेमचंद, सुदर्शन तथा शरतचंद्र को समझे-बिना समझे पढ़ चुका था। किंतु जासूसी उपन्यास पढऩे का यह पहिला मौका मुझे लगा था। तीसरे दिन बारात लौटकर आने तक मैंने उपन्यास को शुरु से आखिरी तक पूरा पढ़ लिया था। जासूस अपने सहायक के साथ किस तरह अपराधियों को कानून के शिकंजे में जकड़ता था, यह पढऩे में वाकई बहुत मज़ा आ रहा था। इसके बाद मैंने खोज-खोज कर जासूसी उपन्यास पढ़े। विनोद-हमीद, राजेश-जयंत, सुरेश-कमल, वर्मा-रमेश आदि जासूसी जोडिय़ों की ढेर सारी किताबें पढ़ डालीं। नोट करने लायक है कि इनमें से हरेक जासूस अपने सहायक के साथ ही चलता है। इन्हें पढ़ते हुए फिर यह पता चला कि अंग्रेजी के चर्चित सैक्सटन ब्लैक-टिंकर की जोड़ी के किस्सों की ही जे.बी.-जैकब में नकल की गई थी। आज भी रहस्य-रोमांच के ऐसे लोकप्रिय लेखक हमारे बीच हैं जिनके उपन्यासों में कहीं अर्ल स्टनले गार्डनर की पैरी मैसन सीरीज़ की खूबसूरत ढंग से चोरी की गई है तो कहीं जेम्स हेडले चेज़ के रोमांच भरे उपन्यासों से, जिसमें अपराधी के हाथ अन्तत: शून्य ही आता है।

इस तरह अकोला ने भले ही मेरी साहित्यिक रुचि को ''बिगाडऩे" का काम किया हो, लेकिन सच पूछिए तो अकोला एक लंबे समय से हिंदी रचनाशीलता का एक प्रमुख केंद्र रहा है, जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे। रायगढ़ के मूल निवासी प्रो. सुभाष पटनायक अकोला के किसी महाविद्यालय में प्राध्यापक बनकर आए थे और यहीं के होकर रह गए थे। उनकी बहुत इच्छा थी कि मैं एक बार हिंदी साहित्य पर केंद्रित किसी कार्यक्रम में अकोला अवश्य आऊं। उनके स्नेहिल निमंत्रण को स्वीकार करना किसी न किसी कारण से टलता रहा और दुर्भाग्य से लगभग एक वर्ष पूर्व वे दिवंगत हो गए। किंतु अकोला के कुछेक अन्य लेखक मित्रों से इस बीच संपर्क बना रहा, बल्कि प्रगाढ़ भी हुआ। इसलिए जब सुकवि-प्राध्यापक रामप्रकाश वर्मा ने हिंदी कविता पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन करने का आग्रह किया तो उसे स्वीकारने में फिर मैंने विलंब नहीं किया। मेरे मन में अकोला प्रवास का लोभ तो था ही, उसके साथ यह भावना भी थी कि पास के उस गांव के भी एक बार दर्शन कर लूं जहां अपनी ननिहाल में मेरा जन्म हुआ था। संयोगवश यह दूसरी इच्छा अधूरी रह गई, किंतु अकोला में बिताया लगभग तीस घंटे का समय नए, शिक्षाप्रद एवं आनंददायी अनुभवों से भरा सिद्ध हुआ।

अकोला एक लंबे समय तक सी.पी. एंड बरार (मध्यप्रांत एवं बरार) प्रदेश का हिस्सा था। प्रदेश की राजधानी नागपुर में थी और नागपुर, जबलपुर, रायपुर व अकोला इसके चार प्रमुख नगर थे। 1 नवंबर 1956 को नए मध्यप्रदेश का गठन होने के साथ विदर्भ के मराठीभाषी आठ जिले नए महाराष्ट्र में समाहित कर दिए गए। उन दिनों अकोला की एक यह ख्याति सुनने मिलती थी कि वह भारत का सबसे गर्म स्थान है। स्वतंत्रता पूर्व यह ओहदा जकोबाबाद को हासिल था जो पाकिस्तान में चला गया। पता नहीं यह बात कितनी सही थी। क्योंकि तब ऐसी भी चर्चाएं होती थीं कि नागपुर भारत का केंद्रीय स्थल है। (प्रो. एस.डी. मिश्र ने अपने संस्मरणों में नागपुर के ग्राउंड ज़ीरो का वर्णन किया है)। इन चर्चाओं से परे यह ठोस जानकारी भी थी कि अकोला प्रदेश की कृषि उपज की एक महत्वपूर्ण मंडी थी। मध्यप्रदेश के पहिले मुख्यमंत्री पं. रविशंकर शुक्ल ने अपने विशाल प्रदेश के संतुलित विकास के लिए जो कार्ययोजना बनाई उसके तहत नागपुर में मेडिकल कॉलेज, जबलपुर में इंजीनियरिंग कॉलेज, रायपुर में साइंस कॉलेज व अकोला में एग्रीकल्चर कॉलेज याने कृषि म.वि. की स्थापना की गई। कालांतर में इसका दर्जा बढ़ा और पंजाबराव देशमुख कृषि विद्यापीठ के रूप में इसे विकसित किया गया। यही कारण है कि महाराष्ट्र राज्य बीज विकास निगम का मुख्यालय इसी नगर में ही रखा गया है।

इसी अकोला में विदर्भ के एक प्रमुख हिंदी समाचारपत्र की नींव रखी गई। स्वाधीनता सेनानी बृजलाल बियाणी ने सन् तीस के दशक में यहां से 'नव राजस्थान' नामक एक साप्ताहिक का प्रकाशन प्रारंभ किया। बियाणीजी स्वयं शब्द-शिल्पी थे, किंतु पत्र का नियमित संपादन करने के लिए उन्होंने तब की हिंदी राजधानी इलाहाबाद से प्रतिष्ठित लेखक रामनाथ सुमन को आमंत्रित किया। सुमनजी इस पत्र से काफी समय तक जुड़े रहे। उनके सुपुत्र ज्ञानरंजन से भला कौन साहित्यप्रेमी परिचित नहीं है? उनकी गणना हिंदी के प्रमुख कथाकारों में होती है तथा उससे बढ़कर वे 'पहल' पत्रिका के यशस्वी संपादक के रूप में चर्चित-प्रतिष्ठित हैं। बृजलाल बियाणी ने स्वाधीनता संग्राम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, कई बार जेल यात्राएं कीं। उन्हें जनता ने 'विदर्भ केसरी' की उपाधि दी। बियाणीजी की आत्मकथा ''जेल में" शीर्षक से प्रकाशित हुई। स्वतंत्र देश में वे सीपी एंड बरार सरकार में मंत्री भी बने, किंतु उनका साहित्य से अनुराग बना रहा। मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन के गोंदिया अधिवेशन (1955) के समय वे संभवत: अध्यक्ष थे। उस समय काफी विवाद भी हुआ था। मुक्तिबोधजी ने बियाणीजी को लक्ष्य करके ही 'नया खून' में 'साहित्य के काठमांडो का राजा' शीर्षक से एक चुभता हुआ व्यंग्य लिखा था।

इस पृष्ठभूमि में समझा जा सकता है कि अकोला में जो कि मूलत: एक मराठीभाषी क्षेत्र है, हिंदी साहित्य की अजस्रधारा पिछले सौ वर्ष से चली आ रही है। जिस साप्ताहिक की चर्चा ऊपर हुई, उसी ने आगे चलकर आज के प्रमुख हिंदी पत्र नवभारत का स्वरूप ले लिया। मुक्तिबोध मंडली के एक प्रमुख सदस्य रामकृष्ण श्रीवास्तव 1950 के आसपास अकोला के सीताबाई आर्ट्स कॉलेज में प्राध्यापक बन कर चले गए। थे। वे अपने दौर के एक सम्मानित कवि एवं गीतकार थे। 'चट्टान की आँखें' शीर्षक से उनका संकलन प्रकाशित हुआ। रामकृष्णजी की छवि एक विद्रोही तेवर वाले कवि की थी तथा उनकी कविता ''जिस पत्थर से देव बने तुम, मैं उस पत्थर का टुकड़ा हूं" खासी चर्चित हुई थी। उनका निधन भी असमय ही हो गया किंतु उनकी परंपरा को अकोला के रचनाकारों ने जीवित रखा है। रामप्रकाश वर्मा व मणि खेड़ेकर से मेरा पूर्व परिचय था; प्रवास के दौरान पता चला कि अंबिकापुर में जन्मे दामोदर खड़से ने भी एक लंबा समय यहां बिताया व यहां की साहित्यिक गतिविधियों को जीवंतता प्रदान की। यहीं मेरा परिचय घनश्याम अग्रवाल से हुआ, जो सटीक तरीके से मंच संचालन तो करते ही हैं, अपनी लघुकथाओं में भी उन्होंने सामाजिक विसंगतियों का बखूबी चित्रण किया है। यहीं प्रो. सुरेश केशवानी भी मिले, जिनकी स्कूली शिक्षा रायपुर में हुई थी। मुझे उनसे जानकर अच्छा लगा कि देशबन्धु के 'पूछिए परसाई से' और 'दरअसल' जैसे स्तंभों से उन्हें प्रेरणा मिली।

अकोला में राष्ट्रभाषा सेवी समाज नामक संस्था विगत तीस वर्षों से काम कर रही है। इसने नगर व क्षेत्र में पहिले से व्याप्त हिंदी प्रेम को पुष्ट करने के लिए अनेक काम किए हैं। मैं जिस राष्ट्रीय संगोष्ठी में आमंत्रित था, उसका आयोजन संस्था ने ही किया था। दिनभर चले कार्यक्रम में लगभग दो सौ लेखक, अध्यापक व हिंदीप्रेमी उपस्थित थे। मुझे दो बातों ने विशेषकर प्रभावित किया। एक तो संस्था के संचालन में यहां सभी वर्गों के नागरिक अत्यन्त रुचि लेकर सहयोग करते हैं। दूसरे-विदर्भ के महाविद्यालयों तथा माध्यमिक शालाओं के शिक्षकों का हिंदी के प्रति अनुराग दुर्लभ व अनुकरणीय है। गोष्ठी के सत्रों के संचालन मेें, आलेख पठन में, आभार प्रदर्शन में याने हर मौके पर इसका प्रमाण मुझे मिला। संगोष्ठी में जो परचे पढ़े गए, उनका स्तर बहुत अच्छा था। लगता था कि आलेख लेखकों ने पर्याप्त परिश्रम किया है। एक तरफ मैं हिंदी में उनकी दक्षता व रुचि पर चकित था तो दूसरी ओर यह सोचकर पीड़ा हो रही थी कि हमारे छत्तीसगढ़ में ऐसा क्यों नहीं है।

लिखने के लिए बहुत कुछ है। किंतु मेरी बात अधूरी रहेगी जब तक मैं महाबीज के प्रबंध संचालक अरुण उन्हाले के प्रति आभार व्यक्त न करूं। वे स्वागत समिति के अध्यक्ष थे। अपने निवास पर ही उन्होंने आत्मीयतापूर्वक मुझे ठहराया और संगोष्ठी की पूर्व संध्या पर 27 जून से आयोजित कवि सम्मेलन में अपनी नहीं, हरिवंश राय बच्चन की कविता भी सुनाई।
देशबन्धु में 6 अगस्त 2015 को प्रकाशित

Wednesday, 29 July 2015

'स्मार्ट सिटी' का सपना




इन दिनों केंद्र सरकार द्वारा प्रवर्तित ''स्मार्ट सिटी" योजना काफी चर्चा में है। कोई ऐसा राज्य नहीं जो इस योजना का लाभ न उठाना चाहता हो और कोई ऐसा बड़ा शहर नहीं जो इस दौड़ में शामिल न हो। इसके लिए राज्य सरकारों के शहरी विकास विभाग व नगर निगम अपना दावा पुख्ता करने के लिए आकाश-पाताल एक किए दे रहे हैं। लेकिन यह योजना आखिरकार है क्या? सरकार की ओर से जो सूचनाएं प्रसारित हुई हैं उनके अनुसार देश में एक सौ स्मार्ट सिटी स्थापित की जाएंगी तथा इसके अलावा हर बड़े शहर के आसपास सैटेलाइट टाउनशिप या उपनगर का निर्माण किया जाएगा। देश के उनतीस राज्यों में से हरेक को न्यूनतम दो स्मार्ट सिटी मिलेंगी व इनके अतिरिक्त मुंबई-दिल्ली औद्योगिक कॉरीडोर इत्यादि में इनका निर्माण किया जाएगा। सरकार का मानना है कि देश के तेजी से हो रहे शहरीकरण को व्यवस्थित करने में यह योजना कारगर होगी तथा इससे बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर भी सृजित होंगे। भारत सरकार ने इस योजना को स्वीकार करने में विश्व के कुछेक देशों में इसी नाम से लागू योजनाओं का अनुकरण किया है, जिनमें इंग्लैंड, इजराइल व जर्मनी आदि शामिल हैं। इन सभी में योजना के लाभ तो अनेक गिनाए गए हैं, लेकिन मुझे जो बिंदु सर्वोपरि प्रतीत होता है वह यह कि इन नए नगरों के संचालन में सूचना प्रौद्योगिकी का अधिकतम इस्तेमाल किया जाएगा।

यह मानी हुई बात है कि सभ्यता के विकास के साथ नए नगरों की स्थापना होती है और उनमें विद्यमान प्रौद्योगिकी का उपयोग किया ही जाता है। हम चाहे सिंधु घाटी सभ्यता के हड़प्पा व मोहनजोदड़ो जैसे नगरों की बात करें, चाहे उज्जैन या उज्जयिनी से उत्खनन में प्राप्त प्राचीन बसाहट की, या फिर आधुनिक समय में तीन सौ वर्ष पूर्व बसाए गए जयपुर अथवा स्वतंत्रता के बाद स्थापित चंडीगढ़, भुवनेश्वर, गांधीनगर की, इन सबमें जो भी आधुनिकतम तकनीकी प्रचलित थी, नगर निर्माण में उनका उपयोग किया गया। इसलिए इक्कीसवीं सदी के पूर्वाद्र्ध में स्थापित, विकसित की जाने वाली स्मार्ट सिटी में अद्यतन कला-कौशल का उपयोग होना स्वाभाविक माना जाएगा। यहां प्रश्न यह उठता है कि देशव्यापी योजना को अंगीकृत करने के पूर्व इस हेतु किस स्तर पर विचार-विमर्श किया जाना चाहिए था? क्या यह कार्य पूरी तरह से नीति आयोग तथा शहरी विकास मंत्रालय आदि में बैठे विशेषज्ञों व अधिकारियों पर छोड़ देना चाहिए या इस पर पूरी पारदर्शिता के साथ नागरिक समुदायों के साथ चर्चा की जाना चाहिए थी? अपनी ओर से सरकार ने कुछ अंग्रेजी अखबारों में तथा वेबसाइट पर जनता के सुझाव आमंत्रित अवश्य किए हैं, लेकिन क्या यह बेमन से उठाया गया आधा-अधूरा कदम नहीं है? जब तक जनता के पास अपनी भाषा में इस विषय की पर्याप्त जानकारी एवं उस पर बहस करने के लिए पर्याप्त समय नहीं होगा, तब तक एक आम आदमी कोई राय दे भी तो क्या दे?

मैं देख रहा हूं कि इधर कुछ दिनों से छत्तीसगढ़ व मध्यप्रदेश के कुछ बड़े शहरों में अपने नगर को स्मार्ट सिटी का दर्जा दिलाने के लिए प्रशासनिक तंत्र के भीतर चर्चाएं चल रही हैं। तब क्या एक सामान्य नागरिक को यह सवाल पूछने का हक नहीं है कि अपने नगर के विकास के लिए आप एक नई अवधारणा लेकर आ रहे हैं तो इसमें उसकी सुनवाई कहां है? इस सिलसिले में यह बात भी अटपटी लगती है कि स्मार्ट सिटी के नाम पर बिल्कुल नए नगर बसाएं जाएंगे तो मौजूदा शहरों के मालिक (!) उस पर इतनी माथापच्ची क्यों कर रहे हैं! अगर इस योजना के अन्तर्गत उपनगर बसेंगे तो वे भी तो वर्तमान नगर प्रशासन के बाहर ही रहेंगे। इससे तो यही प्रतीत होता है कि हमारे निर्वाचित प्रतिनिधियों को समय बिताने के लिए एक नया खिलौना मिल गया है। इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि अगर इनकी मेहनत वाकई रंग लाती है और मौजूदा शहर को स्मार्ट सिटी का दर्जा मिल जाता है तो क्या फिर वे वाकई स्मार्ट सिटी कहलाने के अधिकारी होंगे?

इस लेख में अब तक मैंने शायद आधा दर्जन बार 'स्मार्ट सिटी' संज्ञा का प्रयोग किया है। मैं जानना चाहता हूं कि हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में इसकी समानार्थी संज्ञा क्या होगी? ट्विटर पर एक सज्जन ने मेरे प्रश्न के उत्तर में चतुरनगरी संज्ञा प्रस्तावित की। फिर मुझे कुछ और शब्द सूझे यथा-कुशलपुरी, कुशाग्रपुरी, चपलनगरी, दक्षनगरी आदि। फिर भी स्मार्ट का ठीक-ठीक भाव शायद इनमें से किसी में नहीं आ पाता। क्या इसकी वजह यह है कि स्मार्ट संज्ञा हमारे लिए पराई या विदेशी है? पारंपरिक रूप से धोती-कुर्ता या कुर्ता-पाजामा पहनने वालों के सामने सूट-बूट वाले लोग ही स्मार्ट कहलाते हैं। याद कीजिए सगीना महतो में दिलीपकुमार पर फिल्माया गया गीत- साला मैं तो साहब बन गया, ये सूट मेरा देखो, ये बूट मेरा देखो, जैसे गोरा कोई लंदन का; और मान लीजिए कि स्मार्ट सिटी का समानार्थी ढूंढने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन फिर एक दूसरा दुष्ट विचार मन में उठता है कि क्या स्मार्ट सिटी में रहने वाले लोग अंग्रेजी ही बोलेंगे, लिखेंगे, उसी में सोएंगे और उसी में जागेंगे? तब फिर सरकार की उस घोषणा का क्या होगा कि बढ़ते हुए शहरीकरण को सुचारु रूप देने के लिए इनका निर्माण किया जाएगा?

एक आधुनिक नगर, कुछ-कुछ अपने समय के इंद्रप्रस्थ जैसा, जिसमें सड़कें चकाचक होंगी और इमारतें भव्य, जहां स्मार्टफोन या अन्य उपकरणों की क्लिक के साथ आदेश दिए जा सकेंगे, जहां सब कुछ करीने से होगा, उस बस्ती में क्या गांव से शहर का रुख करने वाले मुसीबतज़दा भूमिपुत्र के लिए कोई जगह होगी? किसान का बेटा शहर आकर मजदूर बनता है, लेकिन यदि इस मायानगरी में मजदूर का काम यंत्रमानव (रोबो) करेगा तो ये जमीन से उखड़े लोग फिर कहां जाएंगे? लेकिन इतना निराश क्यों हुआ जाए? शायद हो कि यहां भी इनकी सेवाओं की आवश्यकता आन पड़े! लेकिन ये कहां रहेंगे? इनके बच्चे कहां पढ़ेंगे? इनका इलाज़ कहां होगा? क्या ये किसी पुराने शहर के सीमांत पर बसे स्मार्ट जे.जे. क्लस्टर (झुग्गी-झोपड़ी बस्ती) में रहेंगे, जहां से कोई स्मार्ट बस इन्हें अपनी ड्यूटी पर लाएगी और स्कूल-अस्पताल आदि के लिए इन्हें पुराने शहर का रुख करना होगा? या फिर स्मार्ट सिटी में इस तरह का भेदभाव नहीं होगा? जैसे लंदन, न्यूयॉर्क, बर्लिन में अमीर-गरीब, साहब-चपरासी उसी मैट्रो में सफर करते हैं, अक्सर उसी कैंटीन में एक लाइन में खड़े होकर अपनी प्लेट उठाते हैं, क्या भारत की स्मार्ट सिटी में इस समदर्शी व्यवहार का परिचय मिलेगा?

स्मार्ट सिटी की चर्चा करते हुए एक भय भी मन में उपजता है। अनेक वर्ष पूर्व इरविंग वालेस का उपन्यास आया था- द आर डाक्यूमेंट। इसमें बताया गया था कि एक औद्योगिक नगरी में किस तरह हर रहवासी पर कड़ी नज़र  रखी जाती थी। इसके बाद बांग्ला के लोकप्रिय लेखक शंकर का उपन्यास- 'सीमाबद्ध' पढऩे मिला। इसमें जिक्र था कि कंपनी के बड़े साहब ने एक अधिकारी को बुलाकर आदेश दिया कि तुम्हारे बूढ़े माँ-बाप को आए तीन दिन हो गए, तुम्हारा ध्यान उनकी तरफ लगा रहेगा तो यहां काम कौन करेगा, उन्हें वापिस भेज दो और इलाज़ के लिए पैसा भेज दिया करो। क्या हमारी 'स्मार्ट सिटी' में भी कुछ ऐसा ही वातावरण बनेगा? यह डर इसलिए बढ़ जाता है कि स्मार्ट सिटी के साथ-साथ अब देश में प्राइवेट सिटी याने निजी नगरों की अवधारणा भी प्रचलित होने जा रही है। महाराष्ट्र के लवासा को भारत की पहिली प्राइवेट सिटी निरूपित करते हुए उम्मीद की जा रही है कि शीघ्र ही ऐसे कोई तीस निजी नगर खड़े हो जाएंगे। इनके अलावा औद्योगिक नगरों का भी बखान हो रहा है। मुझे एक औद्योगिक नगर के बारे में पता है कि वहां कोई चालीस साल तक महात्मा गांधी की प्रतिमा स्थापित नहीं होने दी गई थी। अगर स्मार्ट सिटी, प्राइवेट सिटी, इंडस्ट्रियल सिटी- सब का रवैय्या यही रहा तो भारत के मजदूर वर्ग को व्यक्तिगत स्वतंत्रता, जनतांत्रिक अधिकार, मानवीय गरिमा आदि के बारे में भूल जाना पड़ेगा। हम उम्मीद करते हैं कि इस पर खुली बहस होगी।

मैं अपनी बात का समापन बीती रात देखे सपने के उल्लेख से करना चाहता हूं। मैंने देखा कि मेरा नगर याने रायपुर स्मार्ट सिटी बन गया है। जनता मुदित है। सारी सड़कें फोरलेन हो गई हैं। बरसात का पानी सड़कों पर जमा नहीं हो रहा है। सारे तालाब पाट दिए गए हैं क्योंकि हर घर में रेनवाटर हार्वेस्टिंग हो रही है। हर घर में फ्री वाई-फाई पहुंच गया है। सारे स्कूल-कॉलेज बंद कर दिए गए हैं- बच्चे घर से ही ई-क्लास रूम में उपस्थिति दे रहे हैं। सारे बागीचों में प्लास्टिक केपेड़ रोप दिए गए हैं, ताकि नागरिक पेड़-पौधों से होने वाली एलर्जी से बच सकें। राजधानी के तमाम नेता सांस्कृतिक -सामाजिक कार्यक्रमों में बिल्कुल घड़ी का कांटा देखकर पहुंच रहे हैं लेकिन आयोजक क्षमायाचना कर रहे हैं कि एक भी दर्शक-श्रोता नहीं आया, सब अपने घर में बिग स्क्रीन पर कार्यक्रम देखने के लिए बैठे हुए हैं। कोई बाहर नहीं निकलना चाहता, सिवाय फास्ट फुड की डिलीवरी करने वाले बाइक-सवारों के अलावा। कहिए, क्या ख्याल है?


देशबन्धु में 30 जुलाई 2015 को प्रकाशित

Wednesday, 22 July 2015

व्यापम : कड़वे सच की परतें


 मध्यप्रदेश के व्यवसायिक परीक्षा मंडल या कि व्यापम महाघोटाले की जांच सीबीआई के सुपुर्द  कर दिए जाने के बाद बहुत लोगों ने चैन की सांस ली होगी। जिन राज्यपाल रामनरेश यादव के अब-तब में इस्तीफा देने या पदमुक्त किए जाने की चर्चाएं चल रही थीं उनके बारे में कहा जा रहा है वे शायद जांच पूरी होने या अपना कार्यकाल समाप्त होने तक अपनी जगह पर बने रहेंगे। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने तो स्पष्ट कहा है कि उनके सिर से भारी बोझ उतर गया है। प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस को शायद इस बात की खुशी हो कि उनके दबाव बनाने के कारण ही मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और जांच का काम राज्य सरकार की एजेंसी से लेकर केंद्रीय एजेंसी को दे दिया गया। इस अभूतपूर्व षड़ंयत्र का पर्दाफाश जाने-अनजाने में जिन्होंने किया, वे भी अपनी सुरक्षा के प्रति अब आश्वस्त होंगे! आम जनता को भी संभवत: लग रहा हो कि अब न्याय होकर रहेगा। दूसरी ओर ऐसा सोचने वालों की भी कमी नहीं कि सीबीआई तो पिंजरे में कैद तोता है और जैसा केंद्र सरकार चाहेगी, उसकी जांच उसी दिशा में जाएगी। इस सिलसिले में भाई लोग याद भी दिलाते हैं कि एक समय शिवराज सिंह चौहान प्रधानमंत्री पद के दावेदार थे, इसलिए उन्हें नरेंद्र मोदी सरकार से किसी सहानुभूति की अपेक्षा नहीं रखना चाहिए। कुछेक जन इसके आगे बढ़कर टीका करते हैं कि सुषमा, वसुंधरा, शिवराज सबके सब मोदी-विरोधी हैं। फिलहाल, हमें इतनी दूर जाने की आवश्यकता नहीं है।

व्यापम में पिछले एक दशक में या शायद उसके भी पहिले जो कुछ हुआ है, उसकी अनेक परतें हमारे सामने खुलती हैं। शिवराज सरकार से पहिले की चर्चा करें तो ध्यान आता है कि व्यापम में धांधली की शिकायतें आज से बीस साल पूर्व भी सुनने मिलती थीं। अलबत्ता उनका स्वरूप इतना विकराल नहीं था। धनी-धोरी लोग अपने पाल्यों को डॉक्टर, इंजीनियर बनाने के लिए परीक्षकों को अथवा अन्य अधिकारियों को घूस देकर अंकसूची में हेरफेर करवाते हैं, ऐसी चर्चाएं तब होती थीं। लेकिन इनमें राजनेताओं के नाम कभी नहीं लिए गए। कुल मिलाकर जैसे बारहवीं बोर्ड या बी.ए./एम.ए. में नंबर बढ़वाने की जो प्रथा प्रचलित थी, वही व्यापम में भी लागू हो गई थी। सुनते हैं कि अपनी संतान को मेडिकल कॉलेज में दाखिले की व्यवस्था करने के लिए पालक उस समय तीन-चार लाख रुपए तक की रिश्वत दे देते थे। ऐसे कुछ प्रकरण पकड़े भी गए थे। उन पर क्या कार्रवाई हुई, यह पता नहीं चला। किंतु यदि तत्कालीन सरकारों ने इस ओर पर्याप्त ध्यान दिया होता तो उसी समय बेहतर विकल्पों पर विचार किया जा सकता था।

बहरहाल, शिवराज सरकार के दौरान जो भयावह स्थिति बनी है, उसमें तीन पक्ष साफ देखे जा सकते हैं। पहिला पक्ष तो राजनेताओं व अफसरों का है जिन्होंने इस महाघोटाले का लाभ दो तरह से उठाया। एक तो अपने चहेतों को उपकृत करके और दूसरे करोड़ों-अरबों के लेन-देन में अपना हिस्सा लेकर। ध्यातव्य है कि जो व्यापम पूर्व में सिर्फ व्यवसायिक पाठ्यक्रमों की परीक्षाएं संचालित करता था, कालांतर में वह राज्य सरकार के कतिपय निम्न श्रेणी पदों पर भरती करने का अभिकरण भी बन गया था। याने सरकारी नौकरी लगाने के लिए जो घूस ली जाती है, वह व्यापम के माध्यम से होने लगी। क्या शासक दल का कोई भी जिम्मेदार व्यक्ति इस प्रक्रिया में बेदाग बच गया होगा? पाठक अपनी बुद्धि से  निर्णय ले सकते हैं। दूसरा पक्ष उन व्यक्तियों का है जिन्होंने या तो नौकरी पाने के लिए या मेडिकल आदि में दाखिले के लिए रिश्वत दी। छोटी नौकरियों के लिए चढ़ावे की रकम भी छोटी ही रही होगी। फिर भी न जाने कितने परिवारों ने अपनी जेवर-ज़मीन-घर बेचकर अथवा रेहन रखकर इसकी व्यवस्था की होगी,  इसकी कल्पना ही की जा सकती है। जब मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में तबादला करने-रुकवाने के लिए पचास-पचास हजार रुपए की बोली होती हो तो नौकरी लगने के लिए दो लाख रुपया तो सामान्य बात होगी!

इसमें सबसे अधिक लेन-देन मेडिकल कॉलेज में दाखिले के लिए हुआ होगा। अगर इस हेतु प्रति छात्र पंद्रह लाख रुपया भी लिया गया हो तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। सब जानते हैं कि कर्नाटक में जब निजी मेडिकल कॉलेजों में कैपिटेशन फीस देकर प्रवेश की परंपरा प्रारंभ हुई तो उसके लिए तीस लाख रुपए तक देना होते थे। बाद में महाराष्ट्र आदि प्रदेशों ने भी इस परंपरा को प्रसन्न भाव से ग्रहण कर लिया। अब सुनते हैं कि स्नातकोत्तर याने पी.जी. पाठ्यक्रमों के लिए तो एक करोड़ से भी अधिक की मांग की जाती है। इस दूसरे पक्ष में दो तरह के पात्र सामने आए-पहिले- पालक/अभिभावक और दूसरे-उनके पाल्य। माँ-बाप को लगता है कि बेटा-बेटी डॉक्टर बन जाएंगे तो उसका जीवन बन जाएगा। आज जैसा सामाजिक परिवेश है उसमें बच्चों को भी लगता है कि सफल जीवन का मंत्र बेतहाशा धनार्जन करना ही है। जिन व्यवसायों में आर्थिक सुरक्षा व प्रगति की संभावनाएं हैं, उनमें इस दौर में डॉक्टरी पेशा मानो सोने के अंडे देने वाली मुर्गी है। अभियांत्रिकी, वकालत आदि में भी ऐसी अपार गुंजाइश नहीं है, गो कि बहुत से विद्यार्थी उस दिशा में जाते ही हैं।

तीसरा पक्ष उन गिरोहों व व्यक्तियों का है जो सामने न आकर परदे के पीछे से सारी कूटरचना करते हैं। व्यापम जैसी परीक्षाओं में ये परचे आउट करवाते हैं, नंबर बढ़वाते हैं, कोरी उत्तर-पुस्तिकाएं भरवाते हैं, छद्म विद्यार्थियों से परीक्षा दिलवाते हैं और इसके लिए मेहनताना वसूल करते हैं? पालक/विद्यार्थी, व्यापम, राजनेता के बीच की कड़ी ये ही होते हैं। इनके लिए माफिया संज्ञा बिल्कुल फिट बैठती है। जब इन्हें अपने ऊपर आँच आने का अंदेशा हो तब ये माफिया शैली में डराने-धमकाने से लेकर हत्या करने तक से नहीं हिचकते। व्यापम में जो संदिग्ध मौतें सड़क दुर्घटनाओंं आदि में हुई हैं, उनके पीछे इनका ही हाथ होगा। यह एक तरह से लोगों को अपनी जुबान बंद रखने की चेतावनी थी। इसीलिए बाद में कुछ लोग दहशत में ही मर गए होंगे तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। कहना न होगा कि ये माफिया गिरोह राजनैतिक संरक्षण में ही फलते-फूलते हैं। मेरा अनुमान है कि ये गिरोह मध्यप्रदेश में ही नहीं, अनेक अन्य प्रदेशों में भी सक्रिय हैं तथा इन्हें सदैव व्यापम जैसी संभावनाओं की तलाश रहती है। छत्तीसगढ़ में भी पीएमटी परचे फूटने के जो केस सामने आए हैं, उसमें भी यही लोग लिप्त रहे होंगे। सीबीआई की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, नए-नए खुलासे होंगे, तभी हम वस्तुस्थिति जान सकेंगे।

मध्यप्रदेश का व्यापम हो या डीमैट महाघोटाला या फिर छत्तीसगढ़ का पीएमटी पर्चा फूट कांड, इनके एक अत्यन्त गंभीर एवं शोचनीय पक्ष पर अभी तक पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। व्यापम के बारे में जैसा कि हमें पता है, लगभग दो हजार व्यक्तियों पर फौजदारी प्रकरण दर्ज किए गए हैं। लगभग इतने लोगों की गिरफ्तारी हुई, उनमें से अनेक जेल में हैं,  अनेक जमानत पर। इनमें बड़ी संख्या उन युवजनों की है, जिनकी आयु व्यापम परीक्षा में बैठते वक्त अठारह या उन्नीस साल रही होगी। छत्तीसगढ़ में भी इसी तरह सैकड़ों नौजवानों को गिरफ्तार किया गया। इन्होंने अपराध तो निश्चित रूप से किया है, इसलिए इन्हें दंड भी मिलना चाहिए, किंतु क्या बात यहीं खत्म कर देना ठीक होगा? क्या हमें उन सामाजिक स्थितियों का विश्लेषण नहीं करना चाहिए, जिनके चलते ये युवजन एक स्वर्णमृग के पीछे भागने लगते हैं? इन्हें गिरफ्तार कर, जेल भेजकर, साल-दो साल की कारावास देकर हम इनके भविष्य के बारे में क्या सोचते हैं? इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी क्या पीईटी और पीएमटी जैसी परीक्षाएं जारी रहना चाहिए? क्या केंद्रीकृत परीक्षा होने से यह बुराई समाप्त हो जाएगी? मेडिकल की बात खास तौर पर करें तो सरकार बड़े पैमाने पर आवश्यकतानुसार मेडिकल कॉलेज शुरु क्यों नहीं करती? डॉक्टरी पेशा एक लालची पेशे में इस तरह तब्दील क्यों हो गया? ऐसे और भी बहुत से सवाल जेहन में उठते हैं, किंतु मुझे यह सोचकर बेहद तकलीफ होती है कि 18-20 साल के नौजवान इस व्यवस्था में किस तरह पथभ्रष्ट हो रहे हैं, उन्हें अपराध के रास्ते पर ढकेला जा रहा है, इसमें उनके अपने सगे प्रेरणा दे रहे हैं और इस बुनियादी मुद्दे पर कहीं कोई बात नहीं होती।
देशबन्धु में 23 जुलाई 2015 को प्रकाशित

Wednesday, 15 July 2015

सिद्धांत बनाम पद



भारत की राजनीति पर कुछ इसी अंदाज में कोहरा छाया हुआ है जैसे शीतकाल में देश की राजधानी पर कई-कई दिनों तक छाया रहता है। जब हाथ को हाथ नहीं सूझता, रेलें पटरियों पर थम जाती हैं, हवाई जहाज उड़ान नहीं भर पाते और सड़कों पर चलना दुश्वार होने के अलावा वह जानलेवा भी हो सकता है। यह कुछ अनहोनी सा घटित हो रहा है। एक साल ही तो बीता है, जब देश के मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग एक नई सुबह के विश्वास में प्रमत्त हुआ जा रहा था। उसने तो सोचा था कि उनका बालारुण शीघ्र ही मध्यान्ह के मार्तंड में कायांतरण कर अपनी प्रचंड किरणों से भ्रष्टाचार, निकम्मापन, बेईमानी आदि बुराईयों को भस्मीभूत कर देगा। तब उसे क्या रंचमात्र भी आशंका थी कि वह नई सुबह का सूरज उनकी अपेक्षाओं को झुठलाते हुए इतने जल्दी मौन के बादलों के पीछे जाकर शरण ले लेगा और बस, कुछ फुलझडिय़ां बीच-बीच में टीवी के परदे पर आकर महानायक के पुनरावतरण के अविश्वसनीय आश्वासन देती रहेंगी। कितनी अच्छी-अच्छी बातें सुनने मिलती थीं- संवेदनशीलता, पारदर्शिता, सुशासन आदि के बारे में। उन वायदों पर ऐतबार करना तो दूर, अब उनके बारे में सोचना भी निरर्थक प्रतीत होता है।

यह एक विडंबना ही मानी जाएगी कि इन दिनों जब चालीस साल पहिले लगे आपातकाल का स्मरण अपने-अपने ढंग से किया जा रहा है, तब देश में इस समय अघोषित आपातकाल लागू होने की बात भी चर्चाओं में उभरने लगी है। मैं मानता हूं कि 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद यदि श्रीमती इंदिरा गांधी ने इस्तीफा दे दिया होता तो मात्र दो सप्ताह बाद उन्हें आपातकाल लगाने जैसा अतिरेकी कदम उठाने की आवश्यकता न पड़ती। अदालत का फैसला सही था या गलत, देश की आंतरिक स्थिति उस समय कैसी थी, इत्यादि प्रश्न हैं जिन पर अलग से चर्चा की जा सकती है, किंतु यह तय है कि इंदिराजी ने तत्काल इस्तीफा न देकर नैतिक दुर्बलता का परिचय दिया था, जिससे उनकी प्रतिष्ठा का ह्रास हुआ। वे अपने किसी विश्वस्त सहयोगी को प्रधानमंत्री की कुर्सी सौंप देतीं तो कुछ समय बाद सर्वोच्च न्यायालय से निर्दोष सिद्ध होने पर वापिस पदासीन हो सकती थीं। यही गलती राजीव गांधी ने दोहराई, जब बोफोर्स की आंच उन तक पहुंचने के बाद वे त्यागपत्र देने का नैतिक साहस नहीं जुटा पाए। इसके तुरंत बाद हरियाणा विधानसभा आदि में पराजय के बावजूद वे अपने पद पर बने रहे, जिसकी दु:खद परिणति 1989 की पराजय में हुई। अगर वे 1987 में मध्यावधि चुनाव में चले जाते तो अपनी खोई प्रतिष्ठा को वापिस पा सकते थे।

हमें ध्यान रखना चाहिए कि देश ही नहीं, दुनिया के तमाम जनतांत्रिक देशों में जनता अपने चुने हुए नेताओं से कतिपय नैतिक मूल्यों एवं आदर्शों के पालन की उम्मीद रखती है। इंग्लैंड-अमेरिका जैसे देशों में, जिनके बारे में हमारी सामान्य धारणा है कि वहां स्त्री-पुरुष संबंधों में बहुत खुलापन है, वहां भी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के एकपत्नीव्रती होने की अपेक्षा की जाती है। इंग्लैंड में जॉन प्रोफ्यूमो-क्रिस्टीन कीलर कांड से लेकर अमेरिका में बिल क्लिंटन-मोनिका लेविंस्की प्रकरण तक ऐसे अनेक उदाहरण पश्चिमी देशों में हैं। इसी तरह नेताओं की वित्तीय गड़बडिय़ों, रिश्वतखोरी, माफिया-मैत्री आदि का जब भी खुलासा होता है, जापान से लेकर अमेरिका तक नेताओं से उम्मीद की जाती है कि वे तत्काल अपने पद से इस्तीफा दें और वैसा ही होता है। यह एक स्वस्थ परिपाटी है और इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि पार्टी दागदार होने से बच जाती है। राजनेता पर से भी जनता का ध्यान हट जाता है। वरना आज के समय में चौबीस घंटे चलने वाले चैनलों पर अपनी थुक्का-फजीहत करवाने में कौन सी बड़ाई है?

जहां तक अपने देश का सवाल है, हमने अपने जनतंत्र के शैशवकाल से ही एक चमकदार मानक राजनेताओं के लिए बना रखा है। जो उस कसौटी पर खरा उतरे, वही सोना, बाकी पत्थर तो सब तरफ बिखरे मिलते हैं। आप जान रहे हैं कि मैं सन् 1954 में आपको ले जा रहा हूं, जब तत्कालीन रेलमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने एक रेल दुर्घटना होने पर नैतिक दायित्व लेते हुए अपना पद छोड़ दिया था। ऐसा उन्होंने स्वयं किया, प्रधानमंत्री को विश्वास में लेकर किया या प्रधानमंत्री की सलाह से किया, यह महत्वपूर्ण नहीं है, लेकिन यह स्वयंसिद्ध है कि भारतीय लोकतंत्र में अपनी तरह के इस पहिले दृष्टांत के चलते लालबहादुर शास्त्री की जो निर्मल-उज्जवल छवि निर्मित हुई, वह आज तक कायम है। यदि पं. नेहरू के जीवनकाल में ही उनके उत्तराधिकारी के रूप में शास्त्रीजी का नाम अव्वल लिया जाता था तो उसके पीछे उनकी यही अप्रतिम छवि थी। प्रधानमंत्री बनने के बाद एवं 1965 युद्ध के समय जब उन्होंने देशवासियों से सप्ताह में एक समय उपवास रख अन्न बचाने की अपील की तो करोड़ों लोगों ने उसे एक तरह से आदेश मानकर तत्काल स्वीकार कर लिया। मैं ऐसे मित्रों को जानता हूं जो आज भी सोमवार की शाम शास्त्रीजी को श्रृद्धांजलि के रूप में उपवास रखते हैं। क्या आज ऐसे दृष्टांत की कोई प्रासंगिकता या उपयोगिता है?

पं. नेहरू के प्रधानमंत्री काल में शास्त्रीजी का उदाहरण बेमिसाल है किंतु उस अवधि में पंडितजी के कतिपय अन्य सहयोगियों ने भी अपनी छवि पर आंच आने पर इस्तीफे दे दिए थे। टी.टी. कृष्णमाचारी ने हरिदास मूंधड़ा कांड में व केशवदेव मालवीय ने सिराजुद्दीन कांड में नाम आने पर मंत्रीपद छोड़ दिया था। इन प्रकरणों में उनकी कोई सीधी संलिप्तता सिद्ध नहीं हुई, याने इनके त्यागपत्र भी नैतिक आधार पर ही लिए गए थे। काफी आगे चलकर शास्त्रीजी का अनुकरण करते हुए माधवराव सिंधिया ने दुर्घटना का दायित्व लेते हुए मंत्रीपद से तत्काल इस्तीफा दे दिया था। कांग्रेस पार्टी में एक और उदाहरण ध्यान आता है, जब लाभ का पद मामले में सोनिया गांधी ने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एएनसी) व लोकसभा से इस्तीफा दिया तथा उपचुनाव में विजयी होकर दुबारा सदन में लौटीं। दुर्भाग्य से इस परिपाटी का पालन यूपीए सरकार द्वारा नियुक्त राज्यपालों ने नहीं किया। दो-तीन अपवाद छोड़कर बाकी सब रास्ता देखते रहे कि जब मोदी सरकार निकालेगी, तभी घर जाएंगे। लेकिन इस दल में भी ऐेसे दो राज्यपाल निकल आए जो जितने यूपीए को प्यारे थे, उतने ही बीजेपी को भी। इनके नाम सब जानते हैं- नजीब जंग तथा रामनरेश यादव। यादवजी तो कमाल के आदमी हैं। वे शायद राजनेताओं की वर्तमान पीढ़ी के लिए अनुकरणीय आदर्श हो सकते हैं।

चूंकि आपातकाल का जिक्र आ गया है तो यह उल्लेख अवश्य किया जाना चाहिए कि 1976 में जब इंदिराजी ने लोकसभा का कार्यकाल एक साल बढ़ाया तब उसे अनैतिक एवं असंवैधानिक करार देते हुए दो संसद सदस्यों ने बिना समय गंवाए लोकसभा की सदस्यता त्याग दी थी। एक थे- मधु लिमए और दूसरे शरद यादव। मधुजी दुर्भाग्य से हमारे बीच नहीं हैं, किंतु शरद यादव वर्तमान में वरिष्ठतम सांसदों में से एक हैं। वे देश में संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार के नाते 1975 में जबलपुर से चुने गए थे। उन्होंने पचास साल सांसद रहे सेठ गोविंददास की मृत्यु के बाद संपन्न उपचुनाव में उनके पौत्र रविमोहन को पराजित किया था। एक युवानेता के रूप में शरद के मन में लालच हो सकता था कि एक साल का बढ़ा हुआ कार्यकाल सेंत-मेंत में मिल रहा है, इसे क्यों छोड़ा जाए, किंतु उन्होंने संसदीय व्यवहार व परंपरा को निजी लाभ से ऊपर रखकर एक आदर्श प्रस्तुत किया। आगे शरद यादव वाजपेयी सरकार में नागरिक उड्डयन मंत्री भी बने। लेकिन उन्होंने विदेशयात्रा का मोह कभी नहीं पाला। अभी हाल में शायद वे मात्र एक बार चीन की संक्षिप्त यात्रा पर गए। इसी तरह जैन हवाला केस में नाम आया तो शरद यादव ने निर्भीकतापूर्वक स्वीकार लिया कि हां, उन्होंने चंदा लिया था।

यह सोचकर क्लेश होता है कि जब आज भी हमारे समक्ष ऐसे दृष्टांत मौजूद हैं तो राजनेता इनसे कोई सबक क्यों नहीं लेते। विगत तीन-चार सप्ताह के दौरान जो प्रसंग घटित हुए हैं, वे देश की राजनीतिक दिशा के प्रति शंका, अविश्वास एवं चिंता उत्पन्न करते हैं। सुषमा स्वराज जिन्हें कभी प्रधानमंत्री पद का दावेदार माना जाता है, ललित मोदी के मामले में अपनी जवाबदेही से बच रही हैं, वसुंधरा राजे का भी रुख वैसा ही है, केंद्रीय मंत्रिमंडल में ऐसे व्यक्ति शामिल हैं जिन पर आपराधिक प्रकरण चल रहे हैं और मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह ने जिस हठधर्मी का परिचय दिया है, वह राजनीति में उनकी भावी प्रगति पर प्रश्नचिन्ह लगाती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुप रहना चाहते हैं तो वैसा ही करें, लेकिन वे खामोश रहकर भी तो जनभावना के अनुरूप आवश्यक निर्णय ले सकते हैं। श्री मोदी की निर्णयहीनता तात्कालिक रणनीति की दृष्टि से उचित हो सकती है, किंतु हकीकत ये है कि इस तरह कतराकर निकलने से वे अपने ही मतदाताओं का स्वप्न भंग कर रहे हैं।

देशबन्धु में 16 जुलाई 2015 को प्रकाशित 

Friday, 10 July 2015

जनता के आँगन में कवि



सारे
अतिथि आ चुके हैं। जलपान के साथ स्वागत हो गया है। अब सभास्थल की ओर चलना है। लाउडस्पीकर से लगातार घोषणा हो रही है कि कार्यक्रम प्रारंभ होने ही वाला है। स्वागत गृह से सभास्थल दूर नहीं है, बस यही कोई दो-ढाई सौ मीटर या एक फर्लांग। आगे-आगे नवयुवाओं की टोली ढोल-नगाड़ा बजाते चल रही है। दस मिनट में दूरी तय हो जाती है। सामने चौपाल में दरियां बिछी हैं। अच्छी खासी संख्या में श्रोता आ भी चुके हैं। आने का क्रम जारी है। सरस्वती वंदना, अतिथियों की आरती, फूलमाला, टीके से स्वागत होते-होते तक पांचेक सौ जन तो आ ही गए हैं, लेकिन लोगों का आना अभी भी जारी है। इनमें एक तिहाई संख्या महिलाओं की होगी। वे घर का कामकाज निबटाकर आ रही हैं। अनेक की गोद में या फिर अंगुली पकड़े बच्चे भी हैं। पुरुष श्रोता भी फुर्सत के भाव में आए हैं। दरी पर जगह नहीं है तो कोई घर की दहलीज पर बैठा है, कोई चबूतरे पर, कोई खुली बैलगाड़ी पर और सामने छत पर भी तो 15-20 नौजवान डटे हुए हैं। समय रात आठ बजे का हो चुका है। दृश्य गांव का है। गांव में बिजली है, डीटीएच और बुद्धू बक्सा भी, किन्तु आज की रात टीवी सेट खामोश हैं। ये सब जन सामने गांव के सार्वजनिक सांस्कृतिक मंच पर विराजमान अतिथियों को सुनने के लिए आए हैं। मेला तो नहीं है, लेकिन चहल-पहल अच्छी-खासी है।
इस गांव का नाम है- ईटार। छत्तीसगढ़ के कस्बे खैरागढ़ से उत्तर-पश्चिम में कोई 13 किमी दूर। गांव के थोड़ा आगे ही जंगल का इलाका प्रारंभ हो जाता है। खैरागढ़ का नाम सुनकर शायद बहुत से पाठकों को याद आए कि एशिया का पहिला कला-संगीत विश्वविद्यालय इस नगर में स्थापित है। उसकी चर्चा बाद में कभी। फिलहाल हमारे सामने जो दृश्य है, उसकी बात। हम जो अतिथि यहां आए हैं सब छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन से जुड़े हुए हैं। संस्था की एक योजना ‘पाठक मंच’ के नाम से गत 13-14 वर्ष से संचालित हो रही है। एक पाठक मंच खैरागढ़ में भी है जिसके संयोजक डॉ. प्रशांत झा हैं। ईटार प्रशांतजी का गांव हैं और उनके निमंत्रण पर ही हम उपस्थित हैं। पेशे से भले ही डॉक्टर हों, किन्तु वे एक साहित्यिक अभिरुचि संपन्न व्यक्ति हैं। यह बात उनके मन में उठी कि शहरों में और बड़ी जगहों पर तो साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम आए दिन होते ही रहते हैं, संस्कृतिकर्मियों को, साहित्यकारों को उससे आगे बढक़र गांवों का रुख भी करना चाहिए। अन्य कोई संस्था ऐसा करे या न करे, जिस संस्था से वे जुड़े हुए हैं, वह तो ऐसा कर ही सकती है। फिर अगर प्रयोग ही करना है तो अपने निज गांव से बेहतर स्थान और कौन-सा हो सकता है?
बस यह बात उनके मन घर कर गई और उन्होंने ठान लिया कि पाठक मंच की खैरागढ़ इकाई का एक कार्यक्रम वे अपने गांव में करके ही रहेंगे। इसके लिए उन्होंने पाठक मंच की सामान्य गतिविधि से हटकर कार्यक्रम की रूपरेखा बनाई, ताकि ग्रामजनों की रुचि व सहभागिता उसमें हो सके। उन्होंने ‘‘चलो गांव की ओर’’ यह नाम भी अपने इस कार्यक्रम के लिए तय कर लिया। पाठक मंच में सामान्यत: पुस्तक चर्चा होती है, उन्होंने इसमें कवि सम्मेलन का भी समावेश कर लिया। इस तरह ईटार में 3 जून की रात साढ़े 7 बजे से 4 जून की सुबह 1 बजे तक यह अद्भुत कार्यक्रम सम्पन्न हुआ जिसकी संक्षिप्त झलक मैंने प्रारंभ में आपको दी। कवि सम्मेलन सुनकर जो तस्वीर आपके मन में उभरती है, यह कवि सम्मेलन वैसा बिलकुल भी नहीं था। आसंदी पर जो कविगण विराजमान थे, उनमें से 2 या 3 ऐसे अवश्य थे जो कवि सम्मेलनों के मंच पर जाते रहे हैं, किन्तु वे सब अपनी अर्थगंभीर रचनाशीलता के लिए जाने-जाते हैं। उनमें से एक भी तुक्कड़ नहीं था, जोकर नहीं था, हास्य रस या वीर रस की वर्षा करने वाला नहीं था। दो घंटे तक कवि सम्मेलन चला, नौ या दस साथियों ने कविताएं सुनाईं और श्रोतागण मुग्ध होकर पूरे समय उनको सुनते रहे।
ईटार के इतिहास में संभवत: यह पहिला ही कवि सम्मेलन होगा। इसके पूर्व हो सकता है कि कुछेक खैरागढ़ या अन्य कहीं कथित कवि सम्मेलनों में श्रोता के रूप में हाज़िर रहे हों; अनेक ने शायद टीवी पर वाह! वाह! जैसे कार्यक्रम देखे होंगे। कुल मिलाकर कवि सम्मेलन जैसे कार्यक्रम के बारे में ग्रामजनों की क्या अवधारणा अब तक रही है, यह हम नहीं कह सकते। किन्तु उस रात का जो वातावरण था, वह हम सबके लिए एक अविस्मरणीय अनुभव बन गया है। हम जान रहे थे कि श्रोता समादर के भाव के साथ अतिथि कवियों के गीत एवं कविताओं का आस्वाद ले रहे थे। रचनाओं में उन्हें शायद अपने जीवनानुभवों का प्रतिबिंब छलकता प्रतीत हो रहा होगा। शायद उन्हें अहसास हो रहा था कि ये कविताएं उनके लिए लिखी गई हैं; कि अगर वे भी कवि होते तो शायद अपने भावों को कुछ इसी तरह शब्दों में बांधते। साथी जीवन यदु छत्तीसगढ़ के चहेते जनकवि हैं। वे अपने गीतों में एक बेहतर दुनिया रचने का स्वप्न देखते हैं। जीवन जब सधे हुए कंठ से गीत गा रहे थे तो स्त्री-पुरुष सब उनकी स्वर-लहरियों पर झूमे जा रहे थे।
कवि सम्मेलन का समापन हुआ, रात्रि भोजन का समय हो चला था, सभा कुछ देर के लिए स्थगित की गई, रात 11 बजे के आसपास श्रीमती संतोष झांझी के कहानी संग्रह ‘पराए घर का दरवाजा’ पर पाठक मंच की गोष्ठी प्रारंभ हुई। अगर गांव में प्रथम कवि सम्मेलन आयोजित कर एक रिकॉर्ड बना था तो अब दूसरा कीर्तिमान स्थापित करने का वक्त आ गया था। इसके पहिले क्या आपने कभी सुना कि आधी रात को किसी पुस्तक पर चर्चा की गई हो, वह भी किसी गांव में, वह भी जहां न कोई कॉलेज हो और न हिन्दी साहित्य का कोई विद्वान प्रोफेसर आलोचक! तिस पर मज़ा यह कि लाउडस्पीकर अभी भी चल रहा था; जो लोग भोजन के बाद सभास्थल पर नहीं लौटे, वे अपने-अपने घर में बैठकर ही श्रवण लाभ लें, जानें कि कहानी की एक पुस्तक के बारे में क्या चर्चा हो रही है। यह चर्चा गोष्ठी भी दो घंटे तक चली, एक बजे रात तक, जिसमें कुल मिलाकर 19 या 20 लोगों ने अपने विचार प्रस्तुत किए। इनमें अतिथियों के अलावा गांव के वे प्रबुद्धजन भी थे, जिन्हें पाठक मंच के संयोजक ने कुछ कहानियों की फोटो प्रतियां दे दी थीं कि आप भी पढऩा और इन पर बात करना।
इस रिपोर्टिंग के बाद शायद यह प्रासंगिक व उपयुक्त होगा कि छ.ग. प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन की पाठक मंच योजना के बारे में संक्षिप्त जानकारी मैं पाठकों के साथ साझा करूं। यह योजना हमने कोई 13-14 साल पहिले प्रारंभ की थी। इसका मूल विचार मध्यप्रदेश साहित्य परिषद द्वारा तीन दशक पूर्व स्थापित पाठक मंच की योजना से ही हमने लिया था। किन्तु दोनों में एक बड़ा फर्क यह है कि म.प्र. साहित्य परिषद का पाठक मंच एक शासकीय अनुष्ठान है जबकि सम्मेलन की योजना पूरी तरह गैर-सरकारी। एक में मंच संयोजक को कुछ मानदेय दिए जाने की व्यवस्था है, इसमें बिलकुल भी नहीं। इसके अलावा सम्मेलन का पाठक मंच नाम के अनुरूप है अर्थात् इसके सदस्यों में बहुतायत पाठकों की है, न कि लेखकों की। आपको यह जानकर सुखद आश्चर्य हो सकता है कि क्रमश: रायपुर व भिलाई में दो पाठक मंच ऐसे भी हैं जिनकी सदस्याएं गृहणियां हैं और कामकाज के बीच पढऩे का समय निकालती हैं। अभी कोई 35-36 पाठक मंच स्थापित हैं, कुछ सक्रिय, कुछ निष्क्रिय। हरेक में औसतन 12 सदस्य हैं। किसी चुनी गई पुस्तक की दो प्रतियां मंच को भेजी जाती हैं, एक संयोजक के लिए, दूसरी आलेख लेखक के लिए। सारे सदस्य बारी-बारी से पुस्तक पढ़ते हैं, फिर एक दिन प्रारंभिक आलेख पाठ के बाद उस पर चर्चा हो जाती है। कार्रवाई की रिपोर्ट मिलने पर वह लेखक को भी भेज देते हैं। इस तरह अमूमन एक पुस्तक को प्रदेश के 200-250 पाठक पढ़ लेते हैं।
पाठक मंच में पुस्तकों के चयन में कथा संग्रह को प्राथमिकता दी जाती है। उपन्यास पढऩे में सबकी रुचि नहीं होती, समय भी नहीं मिल पाता। कविता की किताब में वैसे भी एक सामान्य पाठक की दिलचस्पी नहीं होती। कहानी के अलावा संस्मरण व यात्रा-वृत्तांत की पुस्तकें भी यथासमय मंच को भेजी जाती हैं। इस योजना में अब तक चालीस से अधिक पुस्तकें पाठक मंच के सदस्यों ने पढ़ ली हैं। लेखकों को जब पाठकों द्वारा ही लिखी गई समीक्षा एवं उनकी प्रतिक्रिया जानने मिलती है, तब उन्हें यह संतोष अवश्य होता होगा कि वे जो लिख रहे हैं वह दूर-दूर तक पहुंच रहा है और सराहा जा रहा है। इन समीक्षाओं में अकादमिक बहसें तो होती नहीं हैं और न ही किसी तरह का राग-द्वेष प्रकट करने का अवसर होता है। अभी एक प्रावधान यह है कि पाठक मंच अगर चाहे तो वह पुस्तक लेखक को अपने यहां आमंत्रित कर सकता है जिसका मार्गव्यय सम्मेलन वहन करेगा। इस तरह पाठकों को लेखक से रू-ब-रू होने का भी अवसर मिलेगा। खैरागढ़ के पाठक मंच ने नई सुविधा का लाभ उठाया तथा भिलाई निवासी लेखिका को ईटार आमंत्रित किया। आप देख सकते हैं कि सम्मेलन की इस योजना से एक ओर अच्छी कृतियों से पाठकों का परिचय हो रहा है, तो दूसरी ओर लेखकों को पाठकों के साथ जीवंत संवाद स्थापित करने का अवसर भी जुट रहा है।
 
मैं उम्मीद करता हूं कि अक्षर पर्व के सुधी पाठक आज मुझे सम्मेलन के बारे में कुछ और सूचना देने पर आपत्ति न करेंगे। मैं चूंकि संस्था का अध्यक्ष हूं, इसलिए मेरा यह निवेदन भी है कि मैं जो कह रहा हूं, उसे आत्मश्लाघा न माना जाए। संभव है कि पूर्व में कभी सम्मेलन के कार्यक्रमों के बारे में मैंने कोई चर्चा इस स्तंभ में की हो, लेकिन अगर ऐसा हुआ है तो बहुत पहिले तथा नए पाठकों के लिए यह चर्चा नई ही होगी। सम्मेलन ने अपना मुख्य उद्देश्य यही माना है कि उत्तम साहित्य जनता तक कैसे पहुंचे, इसके लिए निरंतर प्रयत्न किए जाएं। जब हिन्दी समाज में साहित्य के प्रति अरुचि का भाव निरंतर बढ़ता प्रतीत हो रहा है; बोलचाल में और अखबारों में अंग्रेजी के शब्द एवं मुहावरे हिन्दी को लगातार बेदखल करने में लगे हैं; संस्थाओं, योजनाओं, कार्यक्रमों के भारी-भरकम नामों का अंग्रेजी में शब्दलाघव किया जा रहा है; मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों तक में हिन्दी माध्यम की पाठशालाएं बंद की जा रही हैं; अंग्रेजी को पहिली कक्षा से अनिवार्य की जाने की वकालत हो रही है, तब यह काम पहिले की अपेक्षा कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो उठता है। भाषा बचेगी तो जातीय स्मृतियां बचेंगी, वरना एक दिन हम अपनी विरासत और परंपराओं को ही खो बैठेंगे।
इस उद्देश्य को सामने रखकर 2001 में ही सम्मेलन ने एक और पहल की- गीत यामिनी कार्यक्रम के रूप में। यूं तो गीतकारों के लिए अनेक मंच उपलब्ध हैं और तथाकथित कवि सम्मेलन आज मनोरंजन का एक जनप्रिय माध्यम बन चुका है लेकिन गीत यामिनी की अवधारणा इससे हटकर है। यह कार्यक्रम प्रतिवर्ष 12 फरवरी को आयोजित किया जाता है, भारत कोकिला सरोजिनी नायडू के जन्मदिन की पूर्व संध्या पर। दरअसल, जब इस योजना पर विचार-विमर्श चल रहा था, तभी ध्यान आया कि सरोजिनी नायडू का जन्मदिन कुछ सप्ताह बाद ही है तो कार्यक्रम उनके नाम पर समर्पित करने का फैसला ले लिया गया। पहिले साल का आयोजन तो रायपुर में हुआ, किन्तु उसके बाद से हम एक के बाद एक प्रदेश के अन्य नगरों एवं कस्बों में जा रहे हैं। गीत यामिनी में प्रदेश के प्रतिष्ठित गीतकार उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं। उन्हें कोई पारिश्रमिक नहीं दिया जाता, सिर्फ मार्गव्यय की व्यवस्था होती है। वे उत्साह के साथ आयोजन में शरीक होते हैं कि हजार-पांच सौ श्रोताओं के बीच कविता की शर्तें पूरी करने वाले गीत सुनाने का एक दुर्लभ अवसर प्राप्त होगा। लटकों-झटकों से दूर इस आयोजन में वे अपनी बेहतर रचनाएं प्रस्तुत करते हैं जिनसे श्रोताओं के मनोरंजन के साथ लोकशिक्षण का काम भी किसी सीमा तक होता है। कहना होगा कि कविजनों को यह जानकर आत्मसंतोष मिलता है कि जनता में अच्छी कविता सुनने की समझ व ललक दोनों कायम हैं।
छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने विशेषत: युवजनों के मध्य साहित्यिक रुचि जागृत करने के लिए कुछ अन्य अभिनव आयोजन भी किए हैं। एक कार्यक्रम है- पीढिय़ों के अंतर को पाटता साहित्य। 2012 में पहिली बार यह आयोजन सिर्फ कविता पर केन्द्रित था, लेकिन 2014 में कविता व कहानी- इन दो विधाओं को लिया गया। इसमें सम्मेलन ने कॉलेज के विद्यार्थियों को प्रतिभागी के तौर पर आमंत्रित किया। प्राध्यापक मित्रों से आग्रह किया कि वे अपने कॉलेज में 1-2 विद्यार्थियों का चयन करें, भले ही वे हिन्दी के विद्यार्थी न हों, उन्हें अपनी पसंद के कवि या कथाकार की रचनाएं चुनकर दें, उनके साथ बैठकर रचना की बारीकी समझाएं व रचनापाठ के लिए तैयार करें। इसके बाद रायपुर में निर्धारित तिथियों पर विद्यार्थियों ने चुनी गई रचनाओं का पाठ किया। इससे तीन-चार काम सधे-
1. विद्यार्थियों का आधुनिक हिन्दी साहित्य की श्रेष्ठ रचनाओं व रचनाकारों से परिचय हुआ। 2. प्राध्यापकों ने निर्धारित पाठ्यक्रम के बाहर जानकर स्वयं भी रचनाएं पढ़ीं, छांटी व छात्रों को तैयार किया। 3. कॉलेज के पुस्तकालय में हिन्दी पुस्तकों पर जमा धूल साफ हुई। 4. रायपुर के वृहद आयोजन में प्रदेश भर के साहित्य अनुरागियों को एक-दूसरे से परिचय व संपर्क विकसित करने का अवसर मिला। 5. अध्यापक मित्रों को भी लीक से हटकर साहित्य के अध्यापन का मौका मिला। 6. उपस्थित श्रोताओं को भी श्रेष्ठ रचनाएं सुनने मिलीं।
मेरी बात यहां समाप्त होती है। सम्मेलन के कार्यक्रमों की जानकारी देने का मकसद यही था कि हमारे साहित्यिक मित्र जहां हैं, वहां सोचें कि व्यापक जनसमाज, विशेषकर युवा पीढ़ी में अपनी भाषा व साहित्य के प्रति उत्कंठा व लगाव जागृत करने के लिए और भी क्या नए प्रयत्न हो सकते हैं। हमारे मध्य ऐसे मूर्धन्य रचनाकार हैं जो कविता में तो जनता के बीच जाने की इच्छा व्यक्त करते हैं, लेकिन वास्तव में चाहते यह हैं कि जनता उनके पास आए। हम जो उपक्रम कर रहे हैं, उससे शायद किसी दिन हासिल हो कि जनता कवि का घर पहिचानने लगे।
 अक्षर पर्व जुलाई 2015 अंक की प्रस्तावना