Saturday, 12 September 2015

शिक्षक राष्ट्रपति, शिक्षक प्रधानमंत्री


 



अब
इस बारे में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि भारत विश्व गुरु है। यह वशिष्ठ, विश्वामित्र और सांदीपनि की पुण्यधरा है, जिनके पास स्वयं ईश्वर अवतार धर कर शिक्षा पाने गए। गुरु द्रोणाचार्य का विद्यालय है, जिसमें पांडव कुमार तमाम कलाओं में पारंगत होकर निकले। इसी भूमि पर चाणक्य हुए जिन्होंने चंद्रगुप्त मौर्य को चक्रवर्ती सम्राट बनने की प्रेरणा व उसके लिए दीक्षा दी। अतीतकाल में यहीं तक्षशिला और नालंदा सरीखे विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई।  इस भारत में ही हम देशवासी 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस मनाते हैं, शिक्षकों को प्रणाम कर उनकी चरण धूलि लेते हैं, उन्हें शाल-श्रीफल से सम्मानित करते हैं। अहा! धन्य है यह देश जहां शिक्षक का, गुरु का इतना समादर होता है। उनके इस सौभाग्य से संभवत: स्वर्ग के देवता भी ईष्र्या करते हैं। वे भी शायद मन ही मन इच्छा करते हैं कि एक दिन के लिए सही मनुष्य जन्म लेकर भारत में शिक्षक बन जाएं।

अब देवताओं की बात तो देवता जानें, किंतु यह तो हमारे समक्ष है कि देश में सर्वोच्च पदों को विभूषित कर रहे श्रीमंत भी अपने हृदय में शिक्षक बनने की अभिलाषा संजोए रखते हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण 4 सितम्बर को मिला जब राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी तथा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दोनों ने अलग-अलग स्थानों पर बच्चों की कक्षाएं लीं।  हमारे राष्ट्रपति ने तो अपने कॅरियर की शुरुआत ही शिक्षक के रूप में की थी और लोकसभा-राज्यसभा में भी यदा-कदा उनके शिक्षकीय गुणों के दर्शन हो जाते थे। इधर राष्ट्रपति भवन के विशाल परिसर में लगभग एकाकी रहते हुए उन्हें शायद अकुलाहट होती हो और उससे उबरने के लिए उन्होंने नौनिहालों के साथ समय बिताने की ठानी हो! जहां तक प्रधानमंत्री का प्रश्न है, यह तो सारा देश जानता है कि संसद छोड़कर वे देश में कहीं भी कभी भी किसी की भी क्लास लेने के लिए उत्सुक और तत्पर रहते हैं। वे इसके पूर्व भारत में ही नहीं, जापान से लेकर अमेरिका तक कक्षाएं ले चुके हैं। सो उनके लिए तो यह एक तरह से उनकी दिनचर्या का अंग ही था।

हमारे ऐसे दिग्गज बाकायदा शाला में जाएं और विद्यार्थियों से बातचीत करें तो सामान्यत: इस पहल का स्वागत करना चाहिए। हमें स्मरण आता है कि देश के दूसरे और तीसरे राष्ट्रपति अर्थात् डॉ. राधाकृष्णन और डॉ. जाकिर हुसैन दोनों अपने समय के सर्वोत्तम शिक्षकों में गिने जाते थे। उनके बाद डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के रूप में देश को एक और ऐसा विद्वान राष्ट्रपति के रूप में मिला जो अतीत में शिक्षक रह चुका था। राजनीति और प्रशासन में ऐसे अनेक उदाहरण इसके नीचे की सीढिय़ों पर मिल जाएंगे। देश को चलाने वाले आई.ए.एस. और आई.पी.एस. अफसरों में एक बड़ी संख्या में उन जनों की है जो अखिल भारतीय सेवा में चुने जाने के पहले कहीं अध्यापक के पद पर सेवा दे रहे थे। इनके भीतर का शिक्षक भी बीच-बीच में जाग उठता है। अखबार के पाठकों के सामने प्राय: प्रतिदिन ऐसे शीर्षक आते हैं कि मुख्यमंत्री ने क्लास ली, मंत्री ने क्लास ली, मुख्यसचिव ने क्लास ली या कलेक्टर ने क्लास ली। इस आशय के शीर्षक पढ़कर यह संदेह भी होता है कि क्या स्वयं पत्रकारों के मन में भी शिक्षक बनने और क्लास लेने की चाह बनी रहती है! तभी वे बड़े लोगों द्वारा क्लास लेने पर इस तरह मुग्ध हो जाते हैं।

शिक्षक दिवस के एक दिन पूर्व जब राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री विद्यार्थियों को पढ़ा रहे थे तब उसके आसपास ही यह समाचार भी मिला कि छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री सहित अनेक मंत्री व अधिकारी स्वयं शासकीय विद्यालयों में जाकर उनकी सुध लेंगे। अगर मुझे सही स्मरण है तो प्रदेश के मुख्य सचिव ने रायपुर के पास किसी ग्रामीण शाला में कक्षा लेकर इस अभियान का शुभारंभ भी कर दिया है। इस तरह यदि देश में सर्वोच्च पदों से लेकर जिले और तहसील तक पहुंचकर सत्तासीन लोग शालाओं की तरफ ध्यान देने लगे तथा शिक्षकों व विद्यार्थियों से जीवंत संपर्क स्थापित कर सकें तो विश्वास होता है कि देश में शिक्षा क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन होने में अधिक समय नहीं लगेगा। जब नीति निर्माता और पालनकर्ता स्वयं ध्यान देंगे तो स्थितियां सुधरने के बारे में शंका क्यों हो?

यह भी एक संयोग है कि अभी कुछ दिन पूर्व ही इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने निर्णय दिया कि शासकीय पदों पर कार्यरत सभी व्यक्तियों के पाल्यों को शासकीय विद्यालयों में ही अनिवार्य रूप से पढऩा चाहिए। इस निर्णय का स्वागत तत्काल हुआ। दो-चार दिन तक इसकी प्रशंसा मिली, प्रतिक्रियाएं भी आईं, लेकिन फिर उसे विस्मृत कर दिया गया। एक ओर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की पहल, दूसरी ओर उच्च न्यायालय का एक निर्णय। यूं ऊपरी तौर पर दोनों एक ही दिशा में जाते दिखाई देते हैं, किन्तु गहरे पैठने पर दोनों के बीच का अन्तर्विरोध स्पष्ट होने लगता है। हम स्मरण करें कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकारों में शामिल करने जैसा महत्वपूर्ण कदम उठाया था। इसे क्रियान्वित करने के लिए जिस वैधानिक सक्षमता की आवश्यकता थी वह डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह की पहल से संभव हुई व अनिवार्य एवं नि:शुल्क शिक्षा का कानून अमल में आया। यह अधिनियम अभी तक उसी रूप में लागू है, किन्तु इसको प्रभावी ढंग से लागू क्यों नहीं किया जा रहा, इस प्रश्न का उत्तर सिर्फ मौन से मिलता है।

हमें इस बात की प्रसन्नता है कि देश-प्रदेश के कर्णधार विद्यार्थियों से रूबरू हो रहे हैं। राष्ट्रपति  एक शासकीय विद्यालय में बाकायदा एक विषय चुनकर उसे पढ़ाने के लिए गए किन्तु प्रधानमंत्री ने दिल्ली छावनी में भारतीय सेना के मानेकशा सेंटर के भव्य सभागार में कक्षा लगाना उचित समझा। वहां उन्होंने किसी विषय विशेष पर बच्चों को पढ़ाने के बजाय गुरु-शिष्य परंपरा आदि के बारे में बातें कीं। इनके व्याख्यान का सीधा प्रसारण देश भर में दूरदर्शन एवं आकाशवाणी से होना था, लेकिन अनेक स्थानों पर विद्युत व्यवस्था में अवरोध इत्यादि कारणों से बच्चे उसे सुनने से वंचित रह गए। चूंकि नियमित कक्षा नहीं थी इसलिए विद्यार्थी अपने प्रधानमंत्री से सीधे सवाल-जवाब भी नहीं कर सके। वे अगर राष्ट्रपति का अनुसरण करते तो इसमें लगा समय और श्रम अधिक लाभकारी हो सकता था। वैसे प्रधानमंत्री पूर्व राष्ट्रपति डॉ. कलाम का भी अनुसरण कर सकते थे जो विद्यार्थियों के बीच सीधे जाकर बातचीत किया करते थे। यह बात अलग है कि डॉ. कलाम की भेंटें सम्पन्न स्कूलों के बच्चों से ही होती थी।

हम यह जानने के लिए उत्सुक हैं कि 4 अप्रैल की इन कक्षाओं से अंतत: क्या उपलब्धि हुई। हमें प्रसन्नता होगी यदि इससे शिक्षकों के मन में अपने विषय के प्रति गौरव जागृत हो, उनका आत्मसम्मान बढ़े तथा वे नई ऊर्जा, नए विश्वास से देश की भावी पीढ़ी को विकसित करने के लिए पुन: संकल्पित और समर्पित हो जाएं। किन्तु यक्ष प्रश्न है कि ऐसा होगा कैसे? इलाहाबाद उच्च न्यायालय का जो फैसला आया उस पर शायद तत्काल ही रोक लगा दी गई। शिक्षा का अधिकार कानून की जो दुर्दशा है उसके बारे में जितना लिखा जाए कम है। खबरें तो ये आ रही हैं कि इस कानून में बड़े पैमाने पर संशोधन किए जाने की मुहिम चल रही है। जो निजी शालाएं हैं वे किसी भी कीमत पर साधनहीन बच्चों को अपने स्कूल में नि:शुल्क तो क्या, फीस लेकर पढ़ाने के लिए भी राजी नहीं। शिक्षक एक बार राजी हो भी जाएं तो साधन-सम्पन्न अभिभावकों की दृष्टि में इससे बढ़कर पाप और कुछ नहीं हो सकता कि अमीर और गरीब के बच्चे साथ पढ़ें।

प्रधानमंत्री ने अपने एकपक्षीय व्याख्यान में गुरु-शिष्य परंपरा का बखान किया। यह उस युग की बात है जब गुरु का पद उसी को मिलता था जो प्रभुतासम्पन्न समाज के बच्चों को पढ़ा सके। आखिरकार द्रोणाचार्य ने एकलव्य को अपनी कक्षा में बैठाने से साफ-साफ इंकार कर दिया था। और सांदीपनि की कक्षा में सुदामा सिर्फ इसलिए पढ़ पाए क्योंकि वे द्विज थे। आज की स्थिति तो और बदतर है। आज से लगभग तीस साल पहले वल्र्ड बैंक के इशारे पर जब नियमित शिक्षकों की भर्ती पूरे देश में बंद कर दी गई और उनका स्थान तदर्थ शिक्षकों ने ले लिया तब से शिक्षा व्यवस्था निरंतर रसातल को जा रही है। आज किसी प्रदेश सरकार के पास यह अधिकार भी नहीं है कि वह शासकीय शालाओं में पूर्णकालिक शिक्षकों की नियुक्ति कर सके।

प्रथम जैसी संस्था द्वारा जो एसीईआर (असर) रिपोर्ट प्रकाशित होती है वह सरकारी स्कूलों की दुर्दशा का बयान तो करती ही है, लेकिन दुर्दशा  के कारणों पर मौन रहती है। बात साफ है। हमने अपनी शिक्षा व्यवस्था पूंजीपतियों के हाथों में सौंपने की पूरी तैयारी कर ली है। देश भर में महंगे से महंगे निजी स्कूल जिन्हें न जाने क्यों पब्लिक स्कूल कहा जाता है, खुल रहे हैं। मुंबई स्थित धीरूभाई अंबानी इंटरनेशनल स्कूल इसका ज्वलंत उदाहरण है। कुछ समय बाद होगा यह कि साधनहीन बच्चों को पढऩे के अवसर ही नहीं होंगे, उनकी शालाएं बंद हो जाएंगी; जो मुंहमांगी फीस देकर पढ़ सकेंगे स्कूल उनके लिए ही होंगे और तब देश में फिर से गुरु-शिष्य परंपरा स्थापित होगी। द्रोणाचार्य पढ़ाएंगे और उनके छात्रों में सौ कौरव होंगे और पांडव सिर्फ पांच।
देशबन्धु में 10 सितम्बर 2015 को प्रकाशित

Wednesday, 2 September 2015

मंगलौर और मडि़केरी के आसपास


 मंगलौर का हवाई अड्डा देश के अन्य मंझोले विमानतलों की तरह ही है। वैसे इसे अंतरराष्ट्रीय विमानतल का दर्जा मिला है क्योंकि यहां से प्रतिदिन खाड़ी के देशों को तीन-चार उड़ानें जा रही हैं। लेकिन मुझे यहां एक अटपटी विशेषता देखने मिली। विमानतल के प्रस्थान खंड में छातों की एक दूकान थी जिसमें छह सौ रुपए से लेकर छ: हजार रुपए तक के रंग-बिरंगे छाते मिल रहे थे। जिज्ञासा करने पर सेल्समैन ने बताया कि छह हजार का छाता ऑटोमेटिक है। अपने पल्ले यह नहीं पड़ा कि एक छाते में ऐसा क्या यंत्र हो सकता है। गनीमत थी कि कीमत सुनकर मैं बेहोश नहीं हुआ। और पूछने पर पता चला कि केरल की छाता बनाने वाली कंपनी ने दक्षिण भारत के कुछ और विमानतलों पर ऐसी दुकानें खोल रखी हैं। शायद खाड़ी देशों की ओर जाने वाले हवाई यात्री ये छाते खरीदकर वहां बारिश से न सही, धूप से बचते हों!

हमारी आठ दिन की यात्रा का यह अंतिम रोचक प्रसंग था, लेकिन इस बीच हमने जो कुछ देखा उनमें से कुछ का उल्लेख होना बाकी है। जैसे-दक्षिण भारत की प्रमुख नदी कावेरी कोडग़ू जिले के दक्षिण-पश्चिम से निकलकर दक्षिण-पूर्व की ओर जब बहती है तो वह दुबारे नामक एक रमणीक स्थान से गुजरती है। दुबारे में नदी की शोभा एकबारगी ही आकर्षित करती है, खासकर धारा के बीचोंबीच उभर आए छोटे-छोटे टीलों पर उगे विशाल मैंग्रोव वृक्ष जो एक तरह से कावेरी के ऊपर चंदोबा तान देते हैं। नदी के दूसरे किनारे पर जाने के लिए मोटरबोट का सहारा लेना पड़ता है। उस किनारे पर दुबारे एलीफेंट केंप याने हाथियों का शिविर है। कर्नाटक वन विभाग के अंतर्गत इस शिविर में हाथियों को प्रशिक्षित करने का काम किया जाता है। यह शिविर अंग्रेजों के जमाने में कायम किया गया था। हम जिस दिन पहुंचे उस दिन बारिश के कारण मिट्टी चिकनी हो गई थी और यह पर्यटकों के लिए कौतुक भरा दृश्य था कि कावेरी में स्नान के लिए अपनी मां के साथ उतरता एक हस्तिशावक बार-बार फिसल जा रहा था। उसने तंग आकर अंतत: नहाने का इरादा ही छोड़ दिया। बच्चे तो बच्चे ही ठहरे, आदमी के हों या हाथी के।

दुबारे और मडि़केरी के बीच कावेरी पर दृश्यावलोकन के लिए एक और सुंदर स्थान है जिसे उचित ही कावेरी निसर्गधाम नाम दिया गया है। यहां पर नदी घने वृक्षों की छाया के बीच से गुजरती है। एक लक्ष्मण झूला लगा दिया गया है जिसके पार वनराशि के बीच सैर-सपाटे के इंतजाम कर दिए गए हैं। यूं तो इस जगह में कोई विशेष बात नहीं थी, लेकिन मुझे लगा कि हमारे छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल के कर्ता-धर्ता यहां से पर्यटन विकास के लिए दो-चार बातें सीख सकते हैं। निसर्गधाम में एक छोटा सा चिडिय़ाघर था और एक हिरण उद्यान। इसके अलावा अलग-अलग ऊंचाई के कुछ मचान जहां से प्राकृतिक छटा का आनंद लिया जा सकता था। मुझे इस जगह पहुंच कर रायपुर के निकट स्थित सोमनाथ की याद आई जहां खारून और शिवनाथ का संगम है।

मंगलौर चूंकि सागर तट पर है इसलिए वहां गर्मी होना स्वाभाविक है, लेकिन वहां से जब मडि़केरी की ओर चलते हैं तो शीतलता के अलावा धीरे-धीरे वातावरण बदलने लगता है। हरियाली तो शुरु से अंत तक साथ रहती है, लेकिन उसकी रंगत कुछ और रूप ले लेती है। पूरब की ओर चलते हुए दक्षिण कन्नड़ जिले की सीमा जहां तक है लगभग वहां तक सुपारी और नारियल के वृक्षों के साथ रबर के पेड़ भी लगातार दिखाई देते हैं। इस अंचल में रबर की खेती होती है। पेड़ों में प्लास्टिक की थैलियां टांग दी गई हैं। पेड़ के तने से द्रव निकल कर इनमें इकट्ठा कर लिया जाता है जो बाद में रबर फैक्ट्रियों में चला जाता है। इन ऊंचे पेड़ों के बीच जहां भी समतल भूखंड हैं वहां धान की खेती होती है। लेकिन जैसे-जैसे आप ऊपर चढ़ते हैं रबर का स्थान दूसरे पेड़ ले लेते हैं और धान की जगह कॉफी के पौधे आ जाते हैं। मंगलौर के इलाके में इसके अलावा काजू की खेती भी व्यवसायिक पैमाने पर होती है और इलाके में काजू का प्रसंस्करण करने वाली अनेक इकाईयां कायम हैं।

मैंने पिछली किश्त में चॉकलेट की चर्चा की थी। मडि़केरी के आस-पास एक और कुटीर उद्योग चलता है-मदिरा उत्पादन का। जिन दुकानों पर मसाले और चॉकलेट मिलते हैं वहीं या उनके आस-पास आपको घर की बनी विभिन्न स्वादों वाली मदिरा खरीदने का निमंत्रण भी मिल जाता है। सोचा कि अपने रसप्रिय मित्रों के लिए उपहार स्वरूप यहां से कुछ नमूने ले लिए जाएं, लेकिन फिर मालूम पड़ा कि सरकार ने गृह उद्योग के रूप में मदिरा निर्माण पर रोक लगा रखी है और उसके नाम पर बोतलों में जो बिक रहा है वह एसेंस मात्र है। यह सच्चाई जानकर निराशा तो हुई लेकिन अच्छा हुआ कि बेवकूफ बनने से बच गए। मडि़केरी में ही इसके अलावा बांस के करील बाजार में बिकते हुए देखे। यह भी बातचीत में पता चला कि इस प्रांतर में और भी अनेक तरह की वनस्पतियां पाई जाती हैं। आशय यह कि कोडग़ू जिला जैवविविधता से सम्पन्न है और गनीमत है कि अंधाधुंध आधुनिकीकरण से काफी हद तक बचा हुआ है।

यह तो हम जानते ही हैं कि केरल से बड़ी संख्या में लोग खाड़ी के देशों में रोजगार के लिए आते हैं। वे अपनी मेहनत से वहां जो कमाते हैं उससे भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने में काफी सहायता मिलती है। केरल के लगभग हर शहर में एक नई सम्पन्नता के दर्शन होते हैं, वह भी इन्हीं की बदौलत। कोझीकोड, कोच्चि इत्यादि नगरों का स्वरूप बहुत तेजी के साथ बदला है। यही बात मंगलौर के बारे में भी कही जा सकती है। अगर भारत के नक्शे पर एक निगाह डालें तो पश्चिमी समुद्र तट पर मंगलौर से नीचे तक सीधे पट्टी चली गई है जिसका भौगोलिक-आर्थिक परिवेश लगभग एक जैसा है। हां, इतना अवश्य है कि मंगलौर याने दक्षिण कन्नड़ जिले में प्रमुख रूप से तुलु भाषा बोली जाती है जबकि केरल में मलयाली।

मंगलौर पिछले कुछ सालों से नकारात्मक समाचारों के लिए सुर्खियों में रहा है। श्रीराम सेने आदि के समाचार टीवी पर देखने-सुनने मिल जाते हैं। मैं यह अनुमान लगाता हूं कि एक तरफ इस अंचल का औद्योगीकरण और दूसरी ओर खाड़ी देशों  से हो रही आमदनी- इन दोनों के चलते स्थानीय निवासियों के रहन-सहन में बदलाव तो आया ही है, साथ-साथ सामाजिक संबंधों में अलगाव के लक्षण दिखाई देने लगे हैं। एक तरफ इस अंचल में साक्षरता और शिक्षा का प्रतिशत बहुत ऊंचा है तो दूसरी ओर लोक व्यवहार में जड़वाद और कठमुल्लापन फैलता हुआ प्रतीत होता है। जिस दक्षिण कन्नड़ जिले ने भारत की बैंकिंग व्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान के अलावा उडुपी भोजनालय और मणिपाल जैसी शिक्षण संस्थाएं देश को दी हों, वहां यह जो नया माहौल बन रहा है उससे चिंता उपजती ही है।

और अंत में, दो प्रसंग जिनका संबंध इस अंचल में हुए शिक्षा प्रसार से है। मंगलौर  के कादरी मंदिर में हमारी भेंट शहडोल के एक तिवारीजी से हुई। वे अपनी पत्नी और बेटी के साथ आए थे। मंगलौर के निकट सूरतकल एनआईटी देश के श्रेष्ठ तकनीकी संस्थानों में एक है। तिवारी दंपति अपनी बेटी को छोडऩे के लिए आए थे जिसका प्रवेश इस संस्था में अखिल भारतीय कोटे से हुआ है। इसी तरह मडि़केरी के अब्बी जलप्रपात पर हमें एक सिख दंपति मिल गए। वे बंबई से अपनी बेटी के साथ आए थे जिसे मंगलौर के कस्तूरबा गांधी मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिला था। कहने की आवश्यकता नहीं कि इन शिक्षण संस्थानों के चलते देश की युवा पीढ़ी मंगलौर में एक लघु भारत की रचना कर रही है। अगर धर्म के नाम पर दंगा-फसाद करने वाले इस सच्चाई को समझ सकें  तो बेहतर होगा।
देशबन्धु में 03 सितम्बर 2015 को प्रकाशित

भगवत रावत की कवितायेँ

भगवत रावत कविता नहीं लिखते। वे बातचीत करते हैं। वे सुनने या पढऩे वाले को आतंकित नहीं करते, बल्कि साथ लेकर चलते हैं। भगवत जैसे सहज सरल व्यक्तित्व के धनी थे, वैसे ही वे अपनी कविताओं से सामने आते हैं। उन्हें हमारे बीच से गए लगभग दो साल होने आए, लेकिन उनकी कविताएं एक सच्चे और बहुत प्यारे दोस्त की तरह हमारे साथ चल रही हैं। इस साथ चलने का अर्थ यह भी है कि ये कविताएं पांच, दस या बीस साल पहले लिखी जाने के बावजूद पुरानी नहीं पड़ीं। कहने को तो दुनिया बदल गई है, लेकिन बदलाव के हर मोड़ पर अगर कविता आपके साथ निरंतर बनी हुई है तो इसका मतलब यही है कि वह सच्ची कविता है। मैं उनकी पुस्तकों के पन्ने पलट रहा हूं और मेरे सामने यह कविता खुलती है- जिसका शीर्षक है- ''गाय"। इस कविता को पढि़ए और महसूस कीजिए कि भगवत रावत की गाय उस गाय से कितनी अलग है जिसे लेकर राजनीतिक प्रपंच हो रहा है।
और अब यह भी याद नहीं आता
हमने कब किसी गाय की पीठ थपथपाई थी
कब उनकी आंखों में
कृतज्ञता की बे आवाज भाषा को पढ़ा था
हमें सचमुच याद नहीं आता
हमने कब किसी गाय को
उसके नाम से पुकारा था
और उसने अपनी थूथन हमारे कंधे पर
ऐसे टिका दी थी जैसे
अब उसे कोई चिन्ता नहीं
इसी कविता की आखिरी पंक्तियां भी पढ़ लेना चाहिए-
गाय के सहारे इस समय मां को याद करना
एक तो अतिरिक्त भावुकता होगी
दूसरे मुझे उन लोगों का प्रवक्ता समझ लिया जाएगा
जो गाय के नाम पर ही मरने-मारने पर
उतारू हो जाते हैं
वे पृथ्वी पर कोई लुप्त होती प्रजाति नहीं
फिर भी हमारे जीवन से चली गई हैं।
एक और कविता है- ''शाकाहारी-मांसाहारी"। यह कविता भी बिना किसी प्रयत्न के सीधे-सीधे आज के राजनीतिक परिदृश्य को हमारी आंखों के सामने प्रगट कर देती है। कविता की ये पंक्तियां दृष्टव्य हैं-
क्षमा करें
मैं खाने-पीने की चीजो को लेकर
न तो किसी की निंदा कर रहा हूं
और न कोई सिद्धांत गढ़ रहा हूं
केवल अपने ही शुद्ध-शाकाहारी लोगों के बीच
धीरे-धीरे जड़ पकड़ती
असहिष्णुता और हिंसा की ओर
इशारा भर कर रहा हूं
रही मांसाहारियों की बात
तो सबसे पहले सोचें उनके बारे में
जो मनुष्य और मनुष्यता को
खड़े-खड़े
कच्चा चबा जाते हैं
और दुनिया के मसीहा कहे जाते हैं
हम उन्हें ऐसा करते केवल देखते रहते हैं
और शायद यह सोचकर खुश होते हैं
कि यह कहर हम पर नहीं टूटा
फिर इसके बाद क्या  फ़र्क़ पड़ता है
कि कौन मांसाहारी है
कौन शाकाहारी है।
भगवत रावत ने कविता लिखने के लिए ऐसी सरल भाषा कैसे सिद्ध की होगी यह सोचकर विस्मय होता है मुझे। किन्तु कवि स्वयं ही कई जगह पर अपनी कविताओं में इसका खुलासा करता है। एक जगह पर वह लिखते हैं-
दिन-रात जो साहित्य से खेलते हैं
उसी को ओढ़ते-बिछाते हैं
उसी का नाम ले-लेकर पीते हैं-खाते हैं
मैं ऐसे दिमागों को हिला देने वाली कविताएं
लिख नहीं पाता
इस कविता का अंत इस प्रकार होता है-
जिसके पन्ने दर पन्ने पढ़ते चले जाओ
कभी अपने घर का पता नहीं बनाती
सुना है वही है जो आजकल
मर्मज्ञों, गुणीजनों के दिमागों को उकसाती है
मैं ऐसी कविता कोशिश करने पर भी
कभी लिख नहीं पाता।
बात बहुत साफ है कि भगवत रावत शब्द विलास के लिए कविता नहीं लिखते। अपने कवि होने का उन्हें कोई अहंकार नहीं है और न ही वे कविता से कोई बहुत बड़ी अपेक्षा रखते हैं। कविता लिखना तो है, लेकिन इसलिए कि अपने समय को जैसा देख रहे हैं उसका बयान करना है। यह जानते हुए कि अगर समाज को बदलना है तो उसके लिए कविता की दुनिया से बाहर निकलना होगा। इसलिए वे एक जगह कहते हैं-
कविता से, कहानी से हटकर भी लिखा जाना चाहिए
इसलिए नहीं कि लिखकर अमर होना है
इसलिए कि मर-मरकर लिखना है।
इन पंक्तियों से स्पष्ट है कि कवि जैसे दुनिया को देख रहा है उससे उसे मर्मांतक पीड़ा हो रही है। और वह जानता है कि उसके पास अगर भाषा है तो उसका सार्थक तरीके से इस्तेमाल होना चाहिए। अगर वह अपने मन की पीड़ा को अभिव्यक्ति नहीं दे पाया तो फिर उसकी शब्द साधना किस काम की?
भगवत रावत का कवि सिर्फ इतने में ही संतुष्ट नहीं है कि वह अपनी वेदना व्यक्त कर दे। वह तो अपने साथियों का भी आह्वान करता है-
क्या  कही
कभी घर से बाहर नहीं गए

बैठे-बैठे घर में ही
कविता करते रहे?
कहना न होगा कि कितने ही कवि इस तरह शब्दों के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। और जब बाहर निकलकर वृहत्तर समाज से जोडऩे की बात आती है तो वे कभी बादलों पर, कभी चांद-तारों पर, तो कभी पक्षियों पर कविता लिखकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं। हिन्दी कविता में अभी बहुत अधिक समय नहीं बीता है जब ऐसी कविताएं बेशुमार लिखी गईं। ''चिडिय़ों को पता नहीं" शीर्षक कविता में वे इस प्रवृत्ति पर करारा व्यंग्य करते हुए चिडिय़ों से कहते हैं-
तुम हमेशा की तरह
कविताओं की परवाह किए बिना उड़ो
न सही कविता में
पर हर रोज
पेड़ से उतरकर
घर में
दो-चार बार
जरूर आओ-जाओ।
पता नहीं समकालीन कवियों ने इस व्यंग्य को कितना समझा, लेकिन कविता के पाठक जानते हैं ऐसी कविताएं एक फैशन की तरह आयीं और जल्दी ही चली गईं।
भगवत भाई की जो कविता मुझे बहुत पसंद है वह है- ''तीजन बाई"। इस रचना में वे छत्तीसगढ़ की लोक गायिका तीजन बाई के अद्भुत पंडवानी गायन की सराहना इन शब्दों में करते हैं-
महाभारत गाती है तीजन बाई
दुहराती नहीं
गाती है
गाना दोहराना नहीं होता
हर बार नये सिरे से रचना होता है
हाथ में इकतारा लेकर गाते हुए
जब काल को आवाजो लगाती है तीजन बाई
तो आकाश में देवता
हाथ जोड़कर खड़े हो जाते हैं
लेकिन वे किसी व्यवसायिक कला मर्मज्ञ की तरह इतने पर रुक नहीं जाते। वे देखते हैं कि तीजन बाई की प्रतिभा देश-विदेश में कैसे उसकी पहचान बनाती है, उसके अपने व्यक्तित्व का रूपांतरण कैसे इस प्रक्रिया में होता है और इस बिन्दु पर वे तीजन बाई के सामने एक चुभता हुआ प्रश्न रख देते हैं;
तो कभी पूछना तो अपने मुरारी से
कि प्रभो!
इन शहराती बाबुओं को अचानक क्यों भाई
तीजन बाई?
तीजन बाई के सामने रखा यह सवाल सिर्फ उसके लिए नहीं है। एक बड़ी मंचसिद्ध कलाकार महाभारत की पुनर्रचना कर रही है, लेकिन कवि धीरे से कहता है कि इसके बाद भी कुछ नहीं बदला और अदृश्य चौपड़ पर खेल अभी भी जारी है। यहीं भगवत रावत के व्यक्तित्व का एक और पहलू स्पष्ट होता है। एक तरफ कवि है, एक तरफ गायिका। वे दो कलाकारों के बीच एक आत्मीय संबंध जोड़ते हैं और उस अधिकार से तीजन बाई को इन पंक्तियों में सलाह देते हैं-
तुम दुनिया-जहान में घूम आना
गुंजा आना जगह-जगह अपना छत्तीसगढ़ी गाना
लेकिन उनके बीच जाना मत छोडऩा
जो तुम्हारा एक-एक बोल सच मानते हैं
जो न्याय और अन्याय
तुम्हारी ही बोली में
पहचानते हैं।
आप देखेंगे कि भगवत रावत इस तरह कदम-कदम पर रिश्ते बनाते हुए चलते हैं। वे अपने हृदय के तरल प्रवाह में अपने संपर्क में आने वाले व्यक्तियों और वस्तुओं को बहा ले चलते हैं। जिस तरह वे तीजन बाई के लिए चिंता करते हैं कि कहीं वह अपनी जमीन से कट न जाए, उसी तरह वे कचरा बीनने वाली लड़कियों के प्रति, गांव से मिलने आए मजदूर समधी-समधिन के प्रति और ऐसे ही तमाम सामान्यजनों के प्रति भी गहरी सहानुभूति का परिचय देते हैं।
मैं जब भगवत रावत की कविताओं को पढ़ता हूं तो दो-तीन बातें और समझ में आती हैं। एक तो वे अनेक स्थानों पर रेखांकित करते हैं कि आज के दौर में मनुष्य कितना असहाय हो चला है और यह असहायता सामूहिकता के क्षीण होने तथा अकेलेपन से उपजी है। उन्हें यह चिंता बार-बार सताती है कि आज अपने बलबूते पर ही हरेक को लडऩा पड़ रहा है। इसमें कवि की राजनीतिक दृष्टि बिल्कुल साफ है। विश्व में और देश में जो कुछ घटित हो रहा है उसका वह बखूबी कार्य-कारण विश्लेषण करता है। देश में बढ़ती हुई धर्मांधता, साम्प्रदायिकता, वैश्विक पूंजीवाद का बढ़ता प्रभाव, इन सबके संदर्भ उनकी कविताओं में आते हैं। उन्होंने मेधा पाटकर के संघर्ष पर भी कविता लिखी है और मेधा को अपनी कविता का पात्र बनाने वाले वे शायद पहले कवि हैं।
भगवत भाई ने प्रेम कविताएं भी लिखी हैं। इनमें वे बुंदेलखंड के पिछली पीढ़ी के कवि केदारनाथ अग्रवाल का अनजाने में अनुसरण करते प्रतीत होते हैं। दोनों को प्रेम का आलंबन बाहर नहीं ढूंढना पड़ा। केदार जी की तरह भगवत की कविताएं भी स्वकीया प्रेम की कविता हैं जिसका परिचय ''उसकी थकान", ''बाहर जाने की जल्दी" आदि कविताओं में मिलता है। भगवत रावत ने कविता लिखने की शुरूआत गीत से की थी, लेकिन परवर्ती काल में उन्होंने ''कहते हैं कि दिल्ली की है कुछ आबोहवा" और ''अथ: रूपकुमार कथा" और ''सुनो हीरामन" जैसी लंबी कविताएं भी लिखी। उनकी कविताओं में चलचित्र की तरह दृश्यबंद देखने मिलते हैं, जिनसे उनकी पैनी अवलोकन शक्ति का पता चलता है। मैं समझता हूं कि भगवत रावत की कविताएं अपने समय का दस्तावेज तो है ही, वे एक लंबी दूरी तक हमारे लिए प्रासंगिक बनी रहेगी।
अक्षर पर्व सितम्बर 2015 अंक की प्रस्तावना
 

Wednesday, 26 August 2015

कावेरी, कोडग़ू, कॉफी, कोको

 



"अच्छा
तो आप दक्षिण का काश्मीर घूम आए।" यह टिप्पणी एक प्रिय मित्र ने की जब मैंने उन्हें अपनी मडि़केरी यात्रा के बारे में बताया। उनका कहना सही था। काश्मीर घाटी में यदि चिनार और पॉप्लर हैं तो कोडग़ू घाटी में नारियल और सुपारी के आकाश से होड़ लेते दरख्त हैं। वहां केशर है, तो यहां इलायची, जायफल, जावत्री और लौंग। वहां झेलम है, तो यहां कावेरी। वहां हिमालय की पर्वतमाला है, तो यहां सघन हरियाली में डूबी नीलगिरी की शृंखला। कोडग़ू याने कुर्ग जिले का मुख्यालय मडि़केरी में है जिसे पहले मरकरा के नाम से जाना जाता था। यह वह जिला है जिसने भारत को फील्ड मार्शल करियप्पा तथा जनरल थिमैय्या जैसे सेनानायक दिए। बहुत तारीफ सुन रखी थी कर्नाटक के दक्षिण-पश्चिम में बसे इस पर्वत प्रदेश की। यह भी सुना था कि यहां के स्त्री-पुरुष अतीव सुंदर होते हैं, वहां पहुंचकर अनुमान हुआ कि यह एक अतिशयोक्ति थी।

मडि़केरी एक छोटा सा नगर है। आबादी कोई तीस हजार होगी। अपनी भौगोलिक संरचना में इसकी तुलना पचमढ़ी से की जा सकती है। चारों तरफ पहाडिय़ों पर बसे मुहल्ले और घेरदार-घुमावदार सड़कें। पूरा जिला ही समुद्र सतह से तीन हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर बसा है इसलिए वातावरण में साल भर ठंडक बनी रहती है। हम वर्षा ऋतु में छुट्टियां मना रहे थे तो बारिश के कारण मौसम में ठंडक कुछ अधिक ही थी। कोडग़ू जिले में मुख्यत: कोडग़ू भाषा ही बोली जाती है। उसमें और छत्तीसगढ़ के जशपुर अंचल की कुडख भाषा में काफी समानताएं हैं। ऐेसी धारणा भी है कि सिंधु घाटी से निकलकर कोई मनुष्य दल सुदूर दक्षिण में कोडग़ू में आकर  बसा था और उन्हीं की एक शाखा ने आगे चलकर जशपुर और रांची की तरफ आकर डेरा डाल दिया। इस पर्वत प्रदेश में सामान्य तौर पर खेती के योग्य भूमि नहीं है, लेकिन यहां की आबोहवा में मसालों के साथ-साथ कॉफी और कोको की पैदावार खूब होती है।

यहां के अधिसंख्य कामकाजी लोग नगद फसलों के बगीचों में ही काम करते हैं। एक समय सेना में जाने के प्रति काफी उत्साह था, लेकिन अब वह कम हो गया है। फिर भी एक बड़ी संख्या में स्थानीय युवा देश की सेना में काम कर रहे हैं। इस बीच पर्यटन उद्योग के प्रति यहां खासी दिलचस्पी पैदा हुई है। बेशुमार तो होटल और रिसोर्ट खुल गए हैं। कॉफी के बगीचे वालों ने भी अपने यहां पर्यटकों के लिए विश्राम कुटीरें बना रखी हैं। टैक्सी और भोजनालयों की तो गिनती ही नहीं है। मडि़केरी से तीस किलोमीटर के वृत्त में जहां चले जाइए, होमस्टे के बोर्ड आपको दिखाई दे जाएंगे। मालूम पड़ा कि ऐसे करीब सात सौ घर हैं जहां घर मालिकों ने पर्यटकों को ठहराने के लिए दो-चार कमरे अलग से बना रखे हैं। गृहस्वामी कोई रिटायर्ड व्यक्ति हो सकता है, कोई अवकाश प्राप्त फौजी या कोई टैक्सी ड्रायवर भी। इनके किराए भी अपेक्षाकृत कम हैं और आप चाहें तो कोडग़ू शैली में बने घर के भोजन का आनंद भी उठा सकते हैं।

आप जहां भी ठहरे हों बाहर निकलें तो चारों तरफ हरियाली ही हरियाली नज़र आती है। पहाड़ की ऊंची चोटियाँ लगभग हर समय कोहरे से ढंकी रहती हैं। अभी कॉफी के पौधों में फल नहीं आए हैं। दो-तीन महीने बाद जब पौधे फलेंगे तो हरी पत्तियों और लाल बेरियों की अलग ही छटा नज़र आएगी। सुपारी और अन्य ऊंचे वृक्षों पर कालीमिर्च की बेलें इस तरह लिपटी हैं कि जैसे जनम-जनम का साथ हो। जब कालीमिर्च तोडऩे का समय आता है तो ऊंची-ऊंची सीढिय़ां लगाकर उन्हें इकट्ठा करने में खासी मशक्कत करना पड़ती है। इलायची के पौधे की पत्तियां काफी लंबी और कुछ-कुछ तलवारनुमा होती हैं। इलायची लगती है नीचे जड़ के एकदम पास। उन्हें बीनना भी कोई आसान काम नहीं है। इन बगीचों में काम करने वाले किसान औसतन दस-बारह हजार रुपया प्रतिमाह कमा पाते हैं।

भारत की प्रमुख नदियों में से एक कावेरी नदी का उद्गम मडि़केरी से लगभग पैंतालीस किलोमीटर दूर तालकावेरी नामक स्थान पर है। यह जगह लगभग अड़तीस सौ फीट ऊंचाई पर है और उसके पीछे कोडग़ू की शायद सबसे ऊंची पांच हजार फीट वाली चोटी भी है। यहीं से एक पहाड़ी झरने के रूप में कावेरी प्रकट होती है और तालकावेरी में एक छोटा-सा कुंड है जहां से वह आगे बहती है। यहां कर्नाटक सरकार ने एक सुंदर सा परिसर निर्मित कर दिया है। कावेरी कुंड में ठीक वैसे ही पूजा-अर्चना चलते रहती है जैसी अमरकंटक के नर्मदा कुंड में अथवा मुलताई के ताप्ती कुंड में। लेकिन यहां कुंड का आकार बहुत बड़ा नहीं है। कावेरी कुंड का परिसर तीन-चार तलों का है। नीचे के तल पर दर्शनार्थियों के लिए प्रसाधन की व्यवस्था भी है। इसके ठेकेदार महोदय पटना बिहार के एक सज्जन निकले। वे अपने घर से इतनी दूर यहां अकेले बैठे हुए यात्रियों की सुविधा का ख्याल करते हुए अपनी रोजी-रोटी के प्रबंध में लगे हुए थे। उन्होंने बताया कि साल में डेढ़-दो लाख की आमदनी हो जाती है।

तालकावेरी से आठ किलोमीटर पहले भगमंडल नामक एक छोटा सा गांव है। यहां भगंडेश्वर महादेव का मंदिर है। इसी परिसर में गणेशजी भी विराज रहे हैं और एक तरफ विष्णु भगवान भी विराजित हैं। यह मंदिर तो बहुत पुराना नहीं है, लेकिन इसमें जो मूर्तियां प्रतिष्ठित हैं वे पुरातात्विक महत्व की प्रतीत होती हैं। एक बात मैंने नोट की कि इलाके के अधिकतर मंदिरों में मूर्तियों पर चांदी के कवच चढ़ा दिए गए हैं। इसके पीछे क्या कारण होगा मालूम नहीं। पुजारी लोग टूटी-फूटी हिन्दी तो बोल लेते हैं, लेकिन उनसे पूरी तरह संवाद स्थापित नहीं हो पाता। खैर! इस गांव की एक और विशेषता है कि यहां त्रिवेणी संगम है। अड़तीस सौ फीट की ऊंचाई से लगभग आठ सौ फीट नीचे उतरकर कावेरी यहां अन्य दो छोटी-बड़ी नदियों के साथ मिलन करती हैं।

मडि़केरी में नगर के बीच एक और मंदिर है। ओंकारेश्वर मंदिर की प्राणप्रतिष्ठा सन् 1820 में हुई थी अर्थात् पांच साल बाद इसे दो सौ साल पूरे हो जाएंगे। कोडग़ू के राजा लिंगराज ने इसकी स्थापना की थी। मंदिर परिसर में एक सुंदर सा जलाशय निर्मित है। इस अंचल की काश्मीर से तुलना करते हुए बात ध्यान आती है कि काश्मीर घाटी की तरह यहां जलाशय नहीं हंै। ओंकारेश्वर मंदिर का जलाशय इस कमी को अत्यन्त अल्पांश में पूरा करता है। इस मंदिर की सबसे बड़ी खूबी इसका स्थापत्य है। मंदिर के मुख्य भवन के चार कोनों पर चार मीनारें हैं जिनसे मस्जिद का भ्रम होता है। जानकारों के अनुसार, यह इंडो-सरसानिक याने भारत-ईरानी स्थापत्य का उदाहरण है। ऐसा क्या सोच-समझकर किया गया था क्योंकि लिंगराज संभवत: मैसूर के राजा स्वतंत्रता सेनानी टीपू सुल्तान के करद थे!

कोडग़ू जिले में ही एक अन्य प्रसिद्ध मंदिर है जिसकी ख्याति देश-विदेश तक है। इस मंदिर को सामान्यत: गोल्डन टेंपल के नाम से जाना जाता है किन्तु यह बौद्ध धर्म का मंदिर है। इसका निर्माण ही सन् 1963 में किया गया तथा धर्मशाला (हिमाचल) के बाद भारत में यह सबसे बड़ा बौद्ध मंदिर है। यह स्थान मडि़केरी से लगभग चालीस किलोमीटर की दूरी पर है। एक विशाल प्रांगण में तीन प्रमुख मंदिर, उनके अलावा यह धर्मदीक्षा का केन्द्र भी है। हमें बहुत से तिब्बती बच्चे अपनी पारंपरिक वेशभूषा में दिखाई दिए, लेकिन वे अपरिचितों से बात नहीं करते।  इन मंदिरों में भगवान बुद्ध तथा तिब्बती परंपरा में बौद्धधर्म के अन्य इष्ट देवों की प्रतिमाएं स्थापित हैं। इस परिसर की भव्यता कुल मिलाकर अपनी ओर आकर्षित करती है।

कोडग़ू जिले में चूंकि कोको और कॉफी दोनों प्रचुरता में उपलब्ध हैं इसलिए यहां कुटीर उद्योग के रूप में चाकलेट बनती है और सच मानिए कि यहां घर-घर में बनी चाकलेट स्विस चाकलेट को स्वाद में मात देती है।
देशबन्धु में 27 अगस्त 2015 को प्रकाशित

Friday, 21 August 2015

मंगलौर, कारकल, मुड़बिदरी




31 जुलाई की दोपहर मंगलौर विमानतल पर उतरते साथ जिस अव्यवस्था के दर्शन हुए उससे मन सशंकित हुआ कि क्या आगे की यात्रा में भी यही सब झेलना होगा। हवाई अड्डे पर बेहद भीड़ और गहमागहमी थी। अपना सामान उठाने के लिए यात्री एक-दूसरे पर टूटे पड़ रहे थे। मैंने जो टैक्सी तय कर रखी थी उसका कहीं कोई अता-पता नहीं था। टेलीफोन किया तो आश्वासन मिला कि गाड़ी जल्दी ही पहुंच रही है। बाहर जो प्रीपेड टैक्सी वाले थे उनका कोई प्रतिनिधि फोन पर वार्तालाप सुनकर पास आया-आपको दूसरी टैक्सी करवा देते हैं, ओला कंपनी की टैक्सी हम यहां नहीं आने देते। मैंने उसकी बात अनसुनी कर दी। कुछ देर बाद ओला टैक्सी ड्राइवर का फोन आया कि आप पार्किंग में आ जाइए, गाड़ी तैयार है। हम गाड़ी में बैठने को हुए तो उसे बाकी टैक्सी वालों ने घेर लिया, मैं कुछ नाराज हुआ तो उन्होंने टैक्सी वाले को यह कहकर छोड़ दिया कि बाद में देख लेंगे। इस बीच रिमझिम बारिश में हम थोड़ा भीग भी चुके थे। ओला पर गुस्सा आया कि एयरपोर्ट के टैक्सी वालों से तुम्हारा झगड़ा है तो फिर हमारे लिए ऑनलाइन बुकिंग क्यों स्वीकार की, पहले ही मना कर देते।

बहरहाल, इसके बाद दक्षिण कन्नड़ और कुर्ग की आठ दिन की यात्रा सुखद और निरापद रही। मंगलौर हम लोग चालीस साल बाद आए थे। उस समय शहर की सबसे ऊंची पहाड़ी से नीचे देखो तो सिवाय हरियाली के और कुछ दिखाई नहीं देता था। सुपारी और नारियल के ऊंचे-ऊंचे वृक्षों की छाया में दोमंजिले या ज्यादा हुआ तो तिमंजिले भवन छुप जाते थे। आज उसी मंगलौर में कांक्रीट की ऊंची-ऊंची इमारतें हरियाली को बौना कर दे रही हैं। विमानतल से शहर के रास्ते पर एक इमारत तो शायद बीस मंजिल की बन गई है, जबकि सात-आठ मंजिल के भवन बनना अब सामान्य बात है। गत चार दशक में एक तो मंगलौर के बंदरगाह का विकास हुआ और दूसरे एक बड़ा रासायनिक उद्योग यहां स्थापित हुआ जिसके पीछे-पीछे सहायक उद्योग भी आए। एक अन्य कारण यह भी बताया गया कि खाड़ी के देशों में काम कर रहे स्थानीय निवासियों को रिएल एस्टेट में निवेश करना अधिक सुरक्षित प्रतीत होता है।

यद्यपि मंगलौर ने आधुनिक शैली के एक नगर का रूप ले लिया है, फिर भी यह तथ्य तसल्लीदायक है कि शहर में आज भी हरियाली खूब है तथा प्रदूषण का स्तर बहुत कम व शहर ने अपनी प्राचीनता को बचा रखा है। मोटे तौर पर रेलवे स्टेशन से दक्षिण-पश्चिम की ओर याने समुद्र तट से लगकर पुराना शहर बसा हुआ है, जबकि नई बसाहट उत्तर की तरफ हो रही है। आते-जाते मंगलौर में हम तीन दिन रुके जिसमें दो सुखद अनुभवों का उल्लेख मैं करना चाहूंगा। एक तो ऑटो रिक्शा मीटर से चलते हैं, ड्रायवर सभ्यतापूर्वक पेश आते हैं और अजनबियों को बेवकूफ नहीं बनाते। दूसरा अनुभव रोचक है। हम लोग सड़क पर आटो की तलाश में धीरे-धीरे चल रहे थे, बारिश होने लगी थी, मैं शायद कुछ तेज चल रहा था। एक मिनट बाद मुड़कर देखा तो पाया कि एक अनजान तरुणी ने अपने छाते में श्रीमती जी को साथ ले लिया था। आज के दौर में ऐसा सौजन्य कल्पनातीत ही था।

अरब सागर के तट पर बसा मंगलौर एक प्राचीन नगर है। यहां स्थित कादरी मंदिर सन् नौ सौ अठ्ठावन ईस्वी में बना था। यहां शिव के मंजुनाथ स्वरूप की पूजा होती है। यद्यपि यह एक पुरातात्विक धरोहर है, लेकिन मंदिर के विशाल चौकोर प्रांगण में इतना कुछ नवनिर्माण हो चुका है कि उसका पुरातात्विक महत्व लगभग समाप्त हो गया है। इस मंदिर से पांच-छह किलोमीटर दूरी पर मंगलादेवी मंदिर है, जो मंगलौर की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती है। इसका निर्माण कब हुआ इस बारे में कोई प्रामाणिक जानकारी मैं हासिल नहीं कर पाया। एक विशेष बात दोनों मंदिरों के अलावा अन्य स्थानों पर भी देखने मिली कि मुख्य देवी-देवता के साथ में अन्य देवताओं के मंदिर भी उसी प्रांगण में अवस्थित हैं। एक तरह से शैव, वैष्णव, शाक्त इन तीनों संप्रदायों का साहचर्य यहां देखने मिल सकता है। एक और विशेषता पर ध्यान गया कि हर मंदिर में एक या अधिक यज्ञ संचालित हो रहे हैं।

मंगलौर से लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर की दूरी पर बेलूर का चन्नकेशव मंदिर और उसी के निकट हॉलीबिडु में शिव मंदिर अवस्थित हैं। आज से एक हजार वर्ष पूर्व होयसल राजाओं ने इन्हें स्थापित किया था। मेेेेरी दृष्टि में माउंट आबू के देलवाड़ा जैन मंदिर के बाद ये दोनों मंदिर स्थापत्य कला की दृष्टि से बेजोड़ हैं। अगर समय होता तो इस बार भी हमें फिर इन मंदिरों को देखने की इच्छा थी। भारत अपने मंदिर शिल्प के लिए विख्यात रहा है और ये दोनों मंदिर उसके सर्वोत्तम उदाहरण हैं। फिर भी हमारे पास जो समय था उसमें हमने दो अन्य पुरातात्विक धरोहरों को देखने में व्यतीत किया। मंगलौर से चालीस किलोमीटर पर कारकल नामक छोटा सा कस्बा है। यहां लगभग पांच सौ वर्ष पूर्व (सन् 1432) एक पहाड़ी पर बाहुबली की प्रतिमा स्थापित की गई थी। यह एक जैन मंदिर है। बाहुबली की बयालीस फीट ऊंची प्रतिमा एक पत्थर से बनी है और उसकी भव्यता आकर्षित करती है। कई बरसों तक यह मूर्ति जमीन में दबी हुई थी। पहाड़ी पर सिर्फ मंदिर की प्राचीर दिखाई देती थी। अभी कोई पन्द्रह-बीस साल पहले यह प्रतिमा धरती के गर्भ में मिली और प्रतिष्ठित की गई। इसके ठीक सामने नब्बे डिग्री पर एक और जैन मंदिर है-चतुर्मुख मंदिर (सन् 1586)। यहां गर्भगृह में चारों दिशाओं में तीन-तीन कर बारह तीर्थंकरों की प्रतिमाएं स्थापित हैं। इन्हें स्थापित करने में इतनी बारीकी बरती गई है कि हर दिशा में बीच की प्रतिमा के पैरों की खुली जगह से विपरीत दिशा में बीच में स्थापित प्रतिमा के पैरों की खुली जगह देख सकते हैं। ऐसी अद्भुत कलाकारी दुर्लभ है।

मंगलौर और कारकल के बीच जैन धर्म का एक और प्रमुख तीर्थ है- मुड़बिदरी। यहां अठारह जैन मंदिर हैं। जो सर्वप्रमुख मंदिर है वहां गैर जैनों का प्रवेश निषिद्ध है। छत्तीसगढ़ के पाठकों को स्मरण होगा कि दो साल पहले इसी मंदिर से बेशकीमती मूर्तियां चोरी हुई थीं जिसमें रायपुर के किसी जौहरी का नाम भी आया था। खैर! इस नगर में हम जैसे पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र था थाउजेंड पिलर टेम्पल याने एक सहस्र स्तंभों वाला मंदिर। यह जैन मंदिर भी लगभग चार सौ साल पुराना है लेकिन इसमें जो खंभे बने हैं वे सीधी सरल रेखाओं में हैं। राजस्थान के रनकपुर में भी एक हजार खंभों वाला जैन मंदिर है, किन्तु उसमें ऐसी जटिल कलाकारी है कि खंभे कभी भी पूरे नहीं गिने जा सकते।

दक्षिण कन्नड़ प्रदेश पश्चिमी घाट में अवस्थित है और यहां मैदानी इलाका नहीं के बराबर है। यह अंचल अपनी जैव विविधता के लिए भी प्रसिद्ध है। नारियल और सुपारी तो बहुतायत से होती ही है और न जाने कितनी प्रकार की वनस्पतियों की फसल यहां होती है। इसका कुछ अनुमान हमें मुड़बिदरी के पास सोन्स फार्म पर पहुंच कर हुआ। एल.सी. सोन्स और उनके भाईयों ने इस बागवानी प्रक्षेत्र को विकसित किया है। यहां वे करीब एक हजार किस्म की वनस्पतियां उगाते हैं। यहां की वर्षा वन की जलवायु में बहुत सारे विदेशी पौधे भी अपने लिए अनुकूल वातावरण पा लेते हैं। सोन्स बंधुओं ने अपनी व्यवसायिक बुद्धि का परिचय देते हुए इस फार्म को एक आकर्षक पर्यटक स्थल का भी रूप दे दिया है। जब मौसम अनुकूल हो तो वे बांस के झुरमुटों के बीच देशी-विदेशी अतिथियों के लिए सशुल्क पार्टियों का आयोजन भी करते हैं। हमारे ड्रायवर के अनुरोध पर हमने यहां अनानास का ताजा रस पिया और वह सचमुच बेहद मीठा व स्वादिष्ट था।
देशबन्धु में 20 अगस्त 2015 को प्रकाशित

Wednesday, 12 August 2015

सरकार बनाम संस्थाएं


 

प्रधानमंत्री
नरेन्द्र मोदी 15 अगस्त 2014 के लालकिले की प्राचीर से पहिले उद्बोधन में अन्य घोषणाओं के बीच दूरगामी परिणामों वाली एक बड़ी घोषणा योजना आयोग को समाप्त करने की थी। इस 15 अगस्त को भी क्या वे ऐसी कोई चौंकाने वाली घोषणा करेंगे? या शायद उसकी आवश्यकता नहीं है? मोदी सरकार ने विगत एक वर्ष के दौरान नेहरू युग अथवा नेहरू परंपरा की अनेक संस्थाओं को जिस तरीके से विसर्जित, खंडित या परिवर्तित किया है, वह देश के सामने है। बीते स्वाधीनता दिवस पर संभवत: प्र्रधानमंत्री के मन में यह विचार रहा हो कि अपने पहिले संबोधन में उन्हें ऐसी कोई बात कहना चाहिए जिसकी व्यापक स्तर पर चर्चा हो सके। इस दरमियान उनकी मुखरता का स्थान मौन ने ले लिया है। दिल्ली के अनुभव से वे शायद यह जान गए हैं कि हर काम घोषणा करके करना जरूरी नहीं है। जो काम चुपचाप किया जा सकता है, उसमें व्यर्थ प्रचार क्यों किया जाए? इसीलिए योजना आयोग को विघटित करने के अलावा ऐसे कई अन्य निर्णय इस बीच लागू कर दिए गए, जिन पर आम जनता को गौर करने का अवसर ही नहीं मिला।

मैं यह स्वीकार करता हूं कि लोकतंत्र में एक चुनी हुई सरकार को अपनी नीतियों व सिद्धांतों के अनुरूप निर्णय लेने का अधिकार होता है। इसमें यह भी शामिल है कि सरकार अपने अधीनस्थ संस्थाओं का संचालन भी अपनी इच्छा से करे व शीर्ष पदों पर ऐसे व्यक्तियों की नियुक्ति करे जो उसके अनुकूल हों। लेकिन लोकतंत्र का अर्थ बहुमतवाद नहीं होता, इस सत्य को ध्यान में रखकर सरकार का यह उत्तरदायित्व भी बनता है कि इन संस्थाओं के जो मूल लक्ष्य हैं, उनकी अनदेखी न की जाए तथा संचालन उन व्यक्तियों के हाथों में हो, जो अपनी वैचारिक/सांगठनिक प्रतिबद्धता के बावजूद उस विषय विशेष में निपुण हों। यह सोचकर मुझे हैरानी होती है कि क्या भाजपा/संघ में प्रतिभाशाली व्यक्तियों का टोटा पड़ गया है! मोदी सरकार के गठन के बाद से ही विभिन्न संस्थाओं के कामकाज में जिस तरीके से  हस्तक्षेप किया गया है, वह हमें निराश करता है। इसके अलावा यह संदेह होता है कि लोकसभा में स्पष्ट बहुमत का अहंकार सरकार को जनतांत्रिक परंपराओं का सम्मान करने से रोक रहा है।

राष्ट्रीय फिल्म एवं टेलीविज़न प्रशिक्षण संस्थान, पुणे याने एफटीटीआई के शासी निकाय के अध्यक्ष पद पर गजेंद्र चौहान की नियुक्ति सत्ता के अहंकार का एक उदाहरण है। यह हमें पता है कि एफटीटीआई जैसे संस्थान में दैनंदिन कामकाज पूर्णकालिक वेतनभोगी निदेशक के जिम्मे होता है जबकि अध्यक्ष का काम मुख्यत: शासी निकाय की बैठक की अध्यक्षता करना एवं समय-समय पर नीतिगत मार्गदर्शन करना होता है। आज तक इस संस्थान में जो अध्यक्ष हुए, वे सिने जगत के कद्दावर व्यक्ति थे। उन्हें अपने ज्ञान एवं अनुभव के बल पर प्रतिष्ठा हासिल की थी। देश-विदेश में जहां भी मौका हो, उनके नाम से संस्थान की भी प्रतिष्ठा वृद्धि होती थी। आज गजेंद्र चौहान के अध्यक्ष बनने एवं साथ-साथ संघ से जुड़े कुछ गैर-फिल्मी लोगों के सदस्य बनने से आशंका उपजती है कि एक सरकारी सेवक याने निदेशक जो मर्जी आएगी, वैसा काम करेगा व शासी निकाय सम्यक समझ व अनुभव के अभाव में उसके प्रस्तावों की पुष्टि मात्र करने तक सीमित रह जाएगा। जो छात्र इस नियुक्ति का विरोध कर रहे हैं, उन्हें यह कहकर डराया जा रहा है कि सरकार संस्थान को ही विघटित कर देगी। यह भूलकर कि संस्था तोडऩा आसान है, संस्था खड़ी करना उतना ही दुष्कर।

एक अन्य प्रसंग जिसमें पुस्तकों में अपनी रुचि के चलते मुझे पीड़ा हुई है, वह है राष्ट्रीय पुस्तक न्यास-याने एनबीटी के अध्यक्ष पद पर हुई नियुक्ति। एनबीटी ने विगत पांच दशकों में पुस्तकों के प्रति आम जनता की रुचि बढ़ाने के लिए यथेष्ट काम किया है। तमाम भारतीय भाषाओं में न्यास पुस्तकें छापता है एवं सस्ते दामों पर बिक्री हेतु उपलब्ध कराता है। उसकी मोबाइल वैन पूरे देश का सफर करती हैं तथा स्थान-स्थान पर बिक्री के लिए स्टॉल लगाती है। अगर आप किसी को पुस्तकें भेंट देना चाहते हैं तो बेहिचक एनबीटी के सुंदर प्रकाशनों का सैट भेंट कर सकते हैं। इसके अध्यक्ष पद पर भी किसी ऐसी शख्सियत की नियुक्ति होना चाहिए थी, जो लेखन-प्रकाशन के बारे में भरपूर जानकारी रखता हो। मोदी सरकार चाहती तो नरेन्द्र कोहली, महीप सिंह, प्रभाकर श्रोत्रिय जैसे किसी ख्यातिनाम लेखक को यह दायित्व दे सकती थी। ऐसा कोई व्यक्ति अध्यक्ष होता तो पुस्तक-प्रेमी समाज में सही संदेश जाता, एक आश्वस्ति होती कि एनबीटी अपनी गुणवत्ता कायम रखेगा। अब देखना होगा कि नए अध्यक्ष बलदेवभाई शर्मा कसौटी पर कितना खरा उतरते हैं, क्योंकि पुस्तक जगत से उनका पहिले कोई खास नाता नहीं रहा।

ललित कला अकादमी में जिस तरह से अध्यक्ष को हटाया गया, वह तो और भी हैरानी एवं चिंता उपजाता है। देश की इस शीर्ष संस्था के अध्यक्ष की नियुक्ति स्वयं राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। अध्यक्ष ऐसे व्यक्ति को ही बनाया जाता है जिसने कला एवं संस्कृति के क्षेत्र में उल्लेखनीय व महत्वपूर्ण योगदान किया हो। यह संयोग की बात है कि कुछ वर्ष पूर्व म.प्र. के अशोक वाजपेयी अकादमी के अध्यक्ष थे। उनका ललित कलाओं व अन्य रचनात्मक विधाओं के उन्नयन में जो दीर्घकालीन योगदान रहा है, उससे सभी परिचित हैं। दो वर्ष पूर्व राष्ट्रपति ने म.प्र./छ.ग. के कल्याण कुमार चक्रवर्ती को इस पद पर मनोनीत किया। श्री चक्रवर्ती का पुरातत्व, कला-इतिहास व संबंधित विषयों पर जो काम है, वह भी सुविदित है। वे दिल्ली में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के भी सदस्य सचिव रह चुके हैं। ऐसे व्यक्ति को अचानक अध्यक्ष पद से हटा दिया गया, जबकि वे दलगत राजनीति से तटस्थ रहकर अपना दायित्व निर्वाह कर रहे थे। राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत एक उच्च पदस्थ व्यक्ति को क्या एकाएक इस तरह पदमुक्त किया जा सकता है, एक सवाल तो यही है। दूसरे, उन्हें हटाकर संस्कृति मंत्रालय ने क्या हासिल कर लिया? अध्यक्ष पद पर अभी तक कोई दूसरी नियुक्ति भी नहीं की गई है। 

कहा जा सकता है कि कांग्रेस राज में भी इसी तरह कामकाज चलता था। बात किसी हद तक सही है, लेकिन एक बड़ा फर्क है। ऐसा नहीं कि कांग्रेस ने सिर्फ और सदैव कांग्रेसियों को ही उपकृत किया हो। उनके शासन के दौरान साम्यवादी, समाजवादी यहां तक कि अघोषित भाजपाईयों को भी लगातार अवसर मिलते रहे हैं। जिस जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय याने जेएनयू पर कम्युनिस्टों का गढ़ होने का आरोप लगता रहा है, क्या वहां सारे शिक्षक साम्यवादी ही थे? आप सूची उठाकर देख सकते हैं कि ऐसा नहीं था। कांग्रेस चूंकि कैडर-आधारित पार्टी नहीं है, इसलिए उसके राज में व्यवहारिक कारणों से ऐसा होना संभव भी नहीं था। केंद्र के अलावा राज्यों में भी अनेकानेक उदाहरण हैं कि जिसे कांग्रेसी अपना समझते थे, वह सत्ता पलटते साथ भाजपाई निकला। दूसरे शब्दों में,यदि कांग्रेस शासन के दौरान पद पाने के लिए चाटुकारिता प्रमुख गुण था तो भाजपा राज में संघ निष्ठा अनिवार्य शर्त है। लेकिन फिर भाजपा को अपने निष्ठावान एवं सुयोग्य जनों की एक सूची बना लेना चाहिए जिन्हें किसी पद पर निर्विवाद बैठाया जा सके।

मेरी इस बिनमांगी सलाह का एक अन्य पक्ष भी है। भाजपा आज सत्ता में है और यह सबको पता है कि सत्ता के साथ अपने आप कुछ बुराईयां जुड़ जाती हैं। सत्ताधारी को कबीर के वचन कड़वे लगने लगते हैं, लेकिन उसकी अपनी भलाई इसी में है कि वह चाटुकारिता से बचकर रहे। जनतंत्र में तो उसे विपरीत विचारों का भी समादर करना आना चाहिए। यदि सत्ता का मकसद सिर्फ सत्ता का आनंद उठाना है तब तो कोई बात नहीं, लेकिन यदि सत्ताधारी अपने पांच, दस या पंद्रह साल के कार्यकाल को लोक-स्मरणीय बनाना चाहता है तो उसे अपनी व्यवस्था में ऐसे अधिकारी नियुक्त करना चाहिए जो विचारों के अनुकूल होने के अलावा अपने पद व कार्य की पवित्रता की रक्षा करने में सक्षम हों। भाजपा को अटलबिहारी वाजपेयी से काफी कुछ सीखने की आवश्यकता है। स्वाधीनता दिवस पर हम यही कामना कर सकते हैं कि ऐसा हो।
देशबन्धु में 13 अगस्त 2015 को प्रकाशित

Sunday, 9 August 2015

स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कविता : दशा और दिशा

 स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कविता : दशा और दिशा। जैसा कि शीर्षक से जाहिर है, यह विशद विवेचन का विषय है, जिसे एक व्याख्यान या आलेख में साधना लगभग असंभव है। यदि विषय के साथ न्याय करना है तो इस हेतु एक सुचिंतित, सुदीर्घ ग्रंथ लिखने की आवश्यकता होगी। फिलहाल इसके कुछेक पहलुओं पर सरसरी तौर पर चर्चा हो सकती है। अपने आपमें विषय महत्वपूर्ण है, प्रासंगिक भी तथा आज की चर्चा को एक प्रस्थान बिंदु मानकर आगे बढ़ा जा सकता है। जब हम हिंदी साहित्य के इतिहास, कालखंड निर्धारण, परंपराओं एवं प्रवृत्तियों की चर्चा करते हैं तो तीन चार नाम प्रमुख रूप से सामने आते हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 1920 के दशक में हिंदी शब्द सागर की भूमिका लिखी, वही कुछ वर्ष बाद ''हिंदी साहित्य का इतिहास" के रूप में सामने आई, आचार्य नंददुलारे वाजपेयी का चर्चित ग्रंथ ''हिन्दी साहित्य : बीसवीं शताब्दी" 1941 में प्रकाशित हुआ तथा आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी रचित ''हिन्दी साहित्य-उद्भव व विकास" 1950 के आसपास आया। इसके अलावा समय-समय पर अन्य पुस्तकें आई होंगी, जिनके बारे में मुझे विशेष जानकारी नहीं है। उपरोक्त तीनों पुस्तकों को लिखे लगभग सत्तर वर्ष से नब्बे वर्ष तक का समय बीत चुका है। आचार्य शुक्ल ने जिसे आधुनिक काल माना है, वह एक तरह से वर्तमान साहित्य का शैशवकाल था तथा वाजपेयी जी व द्विवेदी जी ने भी उस दौर की विवेचना तक ही अपने को सीमित रखा। 

स्मरणीय है कि अज्ञेय द्वारा संपादित ''तार सप्तक" का प्रकाशन 1943 में हुआ था। उसकी चर्चा द्विवेदी जी के ग्रंथ में अभीष्ट थी, किन्तु वह नहीं हुई। इसी तरह वाजपेयी जी ने अपनी पुस्तक, जो कि मूलत: स्वतंत्र प्रकाशित लेखों का संकलन था, का शीर्षक तो महत्वाकांक्षी रखा, लेकिन वह इसलिए असमय था, क्योंकि उसका प्रकाशन तब हुआ जब बीसवीं सदी का प्रथमार्द्ध पूरा होने में भी दस साल बाकी थे। इन तथ्यों के आलोक में कहा जा सकता है कि हिन्दी साहित्य का नया इतिहास लिखने का समय आ चुका है। इसीलिए मैंने आज की चर्चा को प्रस्थान बिंदु मानने का प्रस्ताव ऊपर किया है। किसी उद्यमी शोधार्थी को अब यह बीड़ा उठा लेना चाहिए। यूं तो जब भी समग्र इतिहास लिखा जाएगा उसमें सभी विधाओं का समावेश स्वाभाविक रूप से होगा; किन्तु आज की संगोष्ठी कविता पर केन्द्रित है, इस नाते मैं समझता हूं कि वर्तमान कविता की विवेचना तार सप्तक के प्रकाशन को आधार मानकर की जानी चाहिए। 1943 और 1947 में मात्र चार वर्ष का अंतर है, तदपि कविता की मीमांसा एक ऐतिहासिक किन्तु मूलत: राजनैतिक घटना की पृष्ठभूमि में करने के बजाय कविता के अपने विकास क्रम में आए एक ऐतिहासिक अवसर से करना अधिक श्रेयस्कर होगा। 

मेरी समझ में देश को आजादी मिलने और हिंदी कविता में एक नए युग का सूत्रपात होने के पीछे जो परिस्थितियां व कारण रहे हैं, उनमें भी कई स्थानों पर समानता देखी जा सकती है। सारे विश्व में और देश में विचारों की जो नई बयार बह रही थी, उससे तार सप्तक के कवि भली-भांति परिचित थे और तेजी से बदलते हुए घटनाचक्र पर सतर्क दृष्टि रखे हुए थे। कहा जा सकता है कि कवि समय के साथ चल रहा था। दूसरे, यह तो स्वीकार्य है कि रचनाकार अपने दौर की राजनैतिक हलचलों से स्वयं को काटकर नहीं रख सकता, उसका प्रभाव तो किसी न किसी रूप में पड़ता ही है, किन्तु यह आवश्यक नहीं है कि एक घटना विशेष का फौरी प्रभाव उसकी रचनाशीलता पर पड़े। आशुकवि ही इसका अपवाद हो सकते हैं। अतएव किसी राजनैतिक कालखंड अथवा कैलेंडर को आधार मानकर यदि साहित्य लेखन का विभाजन किया जाए तो उस पर एक प्रश्नचिन्ह लगा रहेगा। मसलन क्या बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों को सिर्फ इस कारण से पृथक किया जा सकता है कि एक नई सहस्राब्दि का उदय हो गया है? 

बहरहाल, तार सप्तक के प्रकाशन एवं स्वाधीनता प्राप्ति के उपरांत रची गई हिंदी कविता की दशा-दिशा पर विचार करते हुए पहले तो यह नोट करना होगा कि सात-आठ दशक की इस लंबी यात्रा में कविता अनेक मोड़ों से गुजरी है, अनेक पड़ावों पर ठहरी है और इस बीच उसने नए-नए रूप ग्रहण किए हैं। विचार, कथ्य, भाषा, शिल्प, सभी दृष्टियों से कविता किसी एक बिंदु पर टिकी नहीं रही, बल्कि उसने निरंतर अपना विकास किया। इस अवधि में वैश्विक एवं राष्ट्रीय क्षितिज पर जो परिवर्तन हुए, कविता उनसे भी अछूती नहीं रही। आचार्य शुक्ल ने जिस आधार पर कविता को कालखंडों में बांटा, उसे प्रमाण मानकर कहा जा सकता है कि सामाजिक-राजनैतिक परिदृश्य में आए युगांतकारी परिवर्तनों से कविता प्रभावित होती है। हमारे विवेच्य कालखंड में ऐसा सबसे पहला परिवर्तन था कि भारत दो सौ साल की गुलामी से मुक्ति पाकर स्वाधीन देश के रूप में उदित हुआ। यह अध्ययन का विषय है कि इस एक बड़ी घटना ने कविता को किस सीमा तक प्रभावित किया। हम पाते हैं कि परवर्ती समय में ऐसी घटनाओं, प्रसंगों व परिस्थितियों की लंबी श्रृंखला है जिसने विश्वजन के साथ-साथ कवि मन को भी आंदोलित किया होगा। इनकी एक सूची बनाने से बात स्पष्ट हो सकेगी:- 

(1) 1939-1945 द्वितीय विश्व युद्ध
(2) 1942 : 'भारत छोड़ो'आंदोलन
(3) 1945 : अणुबम का आविष्कार व हिरोशिमा व नागासाकी पर एटमी हमला
(4) 1947 : भारत में एशियाई संबंध सम्मेलन
(5) 1948 : चीन में साम्यवादी शासन की स्थापना व इजराइल में धर्म आधारित देश की स्थापना
(6) 1950-60 : कोरिया का युद्ध व विभाजन, स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण व उस पर पश्चिमी हमला, बांडुंग सम्मेलन, क्यूबा का स्वतंत्र होना
(7) 1960 : एक दशक में अफ्रीका, एशिया व लैटिन अमेरिका के अनेक गुलाम देशों की स्वतंत्रता
(8) 1964 : पं. नेहरू व मुक्तिबोध जी का निधन
(9) 1965-75 : अमेरिका का वियतनाम युद्ध
(10) 1967 : भारत में नक्सलवाद का उदय
(11) 1952 से अब तक : भारत में आम चुनाव, जनतांत्रिक आकांक्षाओं का बीजारोपण, राजनैतिक चेतना का विस्तार
(12) 1950 के दशक से देश के योजनाबद्ध विकास की कल्पना, बांधों व कारखानों का निर्माण, औद्योगीकरण की शुरूआत
(13) 1962 : भारत-चीन युद्ध
(14) 1965- भारत-पाक के बीच दूसरा युद्ध
(15) 1965-67 : देश में बड़े पैमाने पर अकाल, हरित क्रांति की शुरूआत
(16) 1971 : बांग्लादेश का उदय
(17) 1975-77 : आपातकाल
(18) 1992 : बाबरी मस्जिद विध्वंस
(19) 1998 : भारत का एटमी परीक्षण
(20) 1999 : कारगिल युद्ध

यह फेहरिस्त अभी पूरी नहीं हुई है। भारत में क्षेत्रीय तथा जातिगत अस्मिता का उभार, औद्योगीकरण के साथ शहरीकरण, विस्थापन व पलायन, जल-जंगल-जमीन के मुद्दों पर संघर्ष, समाज में स्त्री, दलित व आदिवासी विमर्शों का प्रारंभ; दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सूचना प्रौद्योगिकी तथा संचार साधनों का विकास, कम्प्यूटर से स्मार्टफोन तक का सफर, बहुराष्ट्रीय निगमों का बढ़ता वर्चस्व, पूंजीबाजार के जटिल खेल, रत्नगर्भा अफ्रीका की धरती का बेरहम शोषण, इजराइल की संकीर्ण साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा से उदित इस्लामी आतंकवाद, अफगानिस्तान और इराक पर अमेरिकी हमले, सोवियत संघ का विघटन जैसी तमाम अन्य घटनाएं हैं जिन सबका प्रभाव साहित्य रचना पर पडऩा ही था। यहां हम ध्यान दें कि स्वतंत्रता प्राप्ति के तत्काल बाद के वर्षों में भारतीय लेखक जिस तरह वैश्विक घटनाचक्र में दिलचस्पी लेता था, वह 1975 के बाद लगभग समाप्त हो गई। दरअसल, स्वातंत्र्योत्तर कविता की बात करें तो इस समय को प्रमुख रूप से तीन खंडों में बांटा जा सकता है- (1) 1943/1947-1964, (2) 1964-1984 एवं (3)1984 से अब तक। मैंने यह विभाजन खंड विशेष की प्रमुख राजनैतिक, आर्थिक, हलचलों को ध्यान में रखकर किया है; इसमें विज्ञान व तकनीकी के क्षेत्र में समयानुसार हुई प्रगति को भी आधार माना है; और कविता के अपने स्वरूप में जो परिवर्तन परिलक्षित हुए हैं उनका संज्ञान लिया है। इसके पश्चात यह कहना भी आवश्यक होगा कि यह निर्धारण पत्थर की लकीर नहीं है। विचारों व भावनाओं के तरल प्रवाह में ऐसा होना संभव नहीं है। 

इस मोटे वर्गीकरण में पहिले खंड याने तार सप्तक के प्रकाशन से लेकर गजानन माधव मुक्तिबोध के निधन तक की अवधि की विवेचना करने से एक बात समझ आती है कि छायावाद के उत्तराधिकारी रूप में जो नई कविता सामने आई थी, वह प्रयोगवाद तथा प्रगतिवाद इन दो धाराओं में विभक्त हो गई थी; किन्तु छायावाद के कतिपय मूल्यों का प्रभाव इस दौर की कविता पर स्पष्ट था। इसमें देशप्रेम व प्रकृति प्रेम था, आजादी की छटपटाहट थी, विश्व नागरिकता की गूंज थी, व्यक्तिगत स्वाधीनता का मूल्य था, युद्ध, हिंसा एवं वैभव का तिरस्कार था। कविता एक अनिवार्य कर्म की तरह थी एवं उसमें सामाजिक उत्तरदायित्व का बोध था। देश एवं दुनिया के नव-निर्माण की, एक यूटोपिया फलित होने की आशा थी। इस अवधि में दो बड़े कवि सामने आए- अज्ञेय एवं मुक्तिबोध। कहने की आवश्यकता नहीं कि दोनों एक मंच पर साथ-साथ प्रकट हुए। यह बाद की बात है कि दोनों की दिशाएं बदल गईं। अज्ञेय ने आगे चलकर दूसरे, तीसरे व चौथे सप्तक का भी संकलन-संपादन किया। दूसरे व तीसरे में कुछ महत्वपूर्ण कवि सामने आए किन्तु चौथा सप्तक तो एक तरह से निष्फल प्रयोजन ही सिद्ध हुआ। प्रयोगवाद की धारा एक मुकाम पर पहुंचकर न सिर्फ रुक गई, बल्कि विलुप्त हो गई, जबकि प्रगतिवादी धारा अपना रास्ता तलाश करते हुए आगे बढ़ती चली गई। मुक्तिबोध की असमय, मात्र 47 वर्ष की आयु में मृत्यु एक हृदय विदारक ट्रैजेडी थी, किन्तु उनके विचार भावी-पीढिय़ों के लिए प्रकाश स्तंभ बन गए। सन् 1964 तक के प्रथम कालखंड की एक और विशेषता गौरतलब है यह समय था जब कवियों की तीन, बल्कि चार पीढिय़ां एक साथ रचनाकर्म में संलग्न थीं। इस दौर में मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, दिनकर, निराला, महादेवी और बच्चन सक्रिय थे तो अज्ञेय, शमशेर, नागार्जुन, भवानीप्रसाद मिश्र, मुक्तिबोध, फिर अपेक्षाकृत युवा धर्मवीर भारती, जगदीश गुप्त, श्रीकांत वर्मा, केदारनाथ सिंह इत्यादि तथा चौथी पीढ़ी के प्रतिनिधि बनकर विनोदकुमार शुक्ल, शलभ श्रीराम सिंह इत्यादि दस्तक दे रहे थे।

एक अन्य रोचक तथ्य यह भी है कि छंदमुक्त कविता का युग भले ही प्रारंभ हो गया हो, अभी गीत के लिए कविता के संसार में सम्मान हासिल था। गोपालसिंह नेपाली, नीरज, वीरेंद्र मिश्र, मुकुटबिहारी सरोज, शंभुनाथ सिंह, उमाकांत मालवीय, रामानंद दोषी आदि की कविताएं सुनी और सराही जाती थीं। धर्मयुग व साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसी पत्रिकाओं में उन्हें उचित स्थान मिलता था। क्या इसकी वजह यह थी कि वह अपेक्षाकृत सरल समय था और अपनी बात गीत में कह पाना संभव था? या फिर क्या ऐसा हुआ कि बाद के कवि लय-ताल को पकड़ पाने में असफल हुए और उन्होंने चिढ़कर गेय कविता को खारिज कर दिया? एक तीसरा कारण यह भी तो हो सकता है कि गीतकार आत्ममुग्धता के शिकार हो गए तथा वर्तमान समय की जटिलताओं को समझ गीतों में उन्हें बांध नहीं पाए।

 वर्तमान समय की कविता के दूसरे चरण में याने 1964 के बाद से लेकर लगभग 1984 तक हम पाते हैं कि देश अनेक प्रकार के झंझावातों से जूझ रहा था। इस अवधि में एक गहरी निराशा का वातावरण भी बन रहा था। यद्यपि शुरूआत सन् 1960 के आसपास हो चुकी थी। इस दौर में जहां अमेरिका की सीआईए द्वारा प्रायोजित फोरम फॉर कल्चरल फ्रीडम जैसी संस्थाएं अपने एजेंडे के अनुसार सक्रिय थीं तो इन्हीं दिनों कविता में भांति-भांति के आंदोलन प्रारंभ हुए। मसलन अकविता, दिगंबर कविता, नवगीत, भुभुक्षु कविता, सनातन सूर्योदयी कविता इत्यादि। कुछ बीटल कवि भी थोड़े समय पूर्व ही भारत आए थे, एलेन गिंसबर्ग का नाम मुझे ध्यान आ रहा है, और वे कविता नहीं, बल्कि अपने क्रियाकलापों के चलते भारत में चर्चित हुए थे। यही समय था जब भोगा हुआ यथार्थ व अनुभूति की प्रामाणिकता जैसे नारे प्रचलन में आए। इस कालावधि में अनास्था, अविश्वास व संशय का जो स्वर मुखर हुआ उसके प्रमुख कवियों में शायद रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा, राजकमल चौधरी व धूमिल आदि नाम लिए जा सकते हैं। धर्मवीर भारती की अंधा युग भी इसी दौरान प्रकाशित-चर्चित हुई। दूसरी ओर त्रिलोचन, शमशेर, केदारनाथ अग्रवाल, केदारनाथ सिंह आदि की प्रगतिशील कवियों के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा मुकम्मल तौर पर हुई। इसी समय में प्रतिभाशाली कवियों की उस पीढ़ी ने अपनी पहिचान बनाना प्रारंभ किया, जो वर्तमान दौर में शीर्ष पर माने जाते हैं। इनमें विनोदकुमार शुक्ल, मलय, चंद्रकांत देवताले, अरुण कमल, सोमदत्त, भगवत रावत, राजेश जोशी, विजेंद्र, प्रयाग शुक्ल, अशोक वाजपेयी आदि के नाम प्रमुखता से लिये जा सकते हैं। 


इस दूसरे चरण में नई कविता या छंदमुक्त कविता का तीव्रगति से विकास तो हुआ लेकिन पाठकों या कहें कि समाज के बीच कविता पहुंचने के अवसर सिमटने लगे। जो दो लोकप्रिय साप्ताहिक और दो-तीन पत्रिकाएं हर पढ़े-लिखे हिंदीभाषी परिवार में खरीदी जाती थीं, वे या तो बंद कर दी गईं या उन्हें बंद होने के लिए छोड़ दिया गया। इस दौर के कवियों को चूंकि कवि सम्मेलन शब्द से ही अरुचि थी और चूंकि वे कविता को एक श्रेष्ठ कर्म मानते थे, इसलिए कविता धीरे-धीरे कर कमरों में होने वाली आत्मीय गोष्ठियों तक सीमित हो गई। कवि का वृहत्तर समाज के साथ संपर्क कट गया। उसने यहां तक कहना शुरू कर दिया कि पाठक को कवि के पास आना चाहिए। इसका परिणाम यह निकला कि मंच पूरी तरह उन गीतकारों के हवाले हो गया जो आधुनिक भावबोध को साध पाने में अक्षम थे। पर इस दरम्यान एक नई बात हुई। कमलेश्वर ने  'सारिका' में अपने मित्र दुष्यंत कुमार की गजलों को प्रमुखता से छापना शुरू किया तो हिंदी गजल नामक एक नई विधा का ही जन्म हो गया। चंद्रसेन विराट व ओम प्रभाकर जैसे गुणी गीतकार गजलगो हो गए। आज हिंदी कविता के नाम पर गज़ल का ही बोलबाला है। अब तो गुजराती, मराठी, बुंदेली व छत्तीसगढ़ी में भी गजलें कही जा रही हैं। नवगीत को यह सौभाग्य प्राप्त नहीं हो सका।

तीसरा चरण यूं तो 1984 से माना जा सकता है, लेकिन इसका ठीक-ठाक स्वरूप बनना 1991 के आसपास प्रारंभ हुआ, जब नवसाम्राज्यवाद की पगचापें भारत की धरती पर सुनाई देने लगीं। आज बाजारवाद की बात खूब होती है, लेकिन यह ध्यान रखना आवश्यक है कि आज का बाजार वैश्विक पूंजीवाद का एक अस्त्र मात्र है। जब सिर्फ बाजारवाद की आलोचना होती है तो उसकी नियामक शक्ति की तरफ दुर्लक्ष्य हो जाता है। इस दौर में जो स्थापित कवि हैं उनसे सुधी पाठक भलीभांति परिचित हैं। कवियों की एक और नई पीढ़ी स्वाभाविक क्रम में सामने आ रही है। उसकी रचनाओं में वर्तमान की आर्थिक-राजनैतिक-वैज्ञानिक जटिलताओं को पकड़ पाने की, उनका विश्लेषण करने की इच्छा प्रतिबिंबित होती है। अच्छी बात यह है कि मुक्तिबोध की कृतियां इस तीसरी पीढ़ी का पथ आलोकित कर रही हैं। इस लंबी अवधि में, हमारा ध्यान जाता है कि, महिलाओं ने जहां कहानी व उपन्यास लेखन में अपनी प्रतिभा का भरपूर परिचय दिया, वहीं कविता लेखन में कुछ गिने-चुने नाम ही सामने आ पाए। यह भी दृष्टव्य है कि मुक्तिबोध के बाद उन जैसी महाकाव्यात्मक विस्तार की कविता और कोई नहीं लिख पाया, लंबी कविताएं भले ही कितनी भी लिखी गई हों। यह भी नोट करना उचित होगा कि पहिले की भांति आज भी कविता में नए-नए प्रयोग हो रहे हैं। निराला ने गक़ालें, त्रिलोचन ने सॉनेट, कईयों ने नवगीत लिखे तो आज ''हिंदी गज़ल" के साथ हाईकू आदि भी लिखे जा रहे हैं। ये प्रयोग कितने सार्थक हैं, उस पर फिलहाल क्या कहें?

टिप्पणी : राष्ट्रभाषा सेवी समाज, अकोला (महा.) द्वारा 28 जून 2015 को आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में दिए उद्घाटन व्याख्यान का संशोधित स्वरूप। 

अक्षर पर्व अगस्त 2015 अंक की प्रस्तावना