Tuesday, 3 May 2016

दलबदल: गलत कब और क्यों?


 मेरा मानना है कि जनतांत्रिक राजनीति में दलबदल अपने आप में कोई बुराई नहीं है। एक  समाज में हर व्यक्ति की अपनी सोच होती है और वह उसे कभी भी बदलने का अधिकार रखता है। अगर विचारों में परिवर्तन को प्रारंभ से ही बुराई मान लिया जाए तो यह उस व्यक्ति के अधिकार का हनन या उसमें हस्तक्षेप करना होगा। स्वतंत्र भारत की राजनीति में दलबदल के दर्जनों उदाहरण हमारे सामने हैं, जो इस अधिकार की पुष्टि करते हैं। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी याने राजाजी भारत के शीर्ष राजनेता थे। वे लंबे समय तक कांग्रेस से जुड़े रहे। कांग्रेस ने ही उन्हें देश का प्रथम भारतीय गवर्नर जनरल बनाया तथा बाद में मद्रास प्रांत का मुख्यमंत्री भी। ऐसे उद्भट विद्वान व विचारशील नेता ने भी एक दिन अपनी मातृसंस्था छोड़कर स्वतंत्र पार्टी की स्थापना कर ली। एक अन्य विद्वान राजनेता तथा पुराने कांग्रेसी मीनू मसानी उनके सबसे विश्वस्त एवं प्रमुख सहयोगी के रूप में इस पार्टी में आए।

इसके पूर्व कांग्रेस के भीतर समाजवादी धड़े के नेताओं के पार्टी छोडऩे व नई पार्टी बनाकर कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लडऩे के उदाहरण भी हमारे सम्मुख हैं। पं. नेहरू के प्रिय पात्र रफी अहमद किदवई ने पार्टी छोड़ी और फिर कुछ समय बाद कांग्रेस में यह कहते हुए लौट आए कि वहां जी नहीं लगता। यह स्पष्ट है कि किसी राजनैतिक कार्यकर्ता या नेता ने कभी वैचारिक मतभेदों के कारण पार्टी छोड़ी तो कभी व्यक्तिगत कारणों से। देखा जाए तो सन् 1967 के आम चुनावों तक दलबदल को राजनीतिक प्रक्रिया का एक सामान्य अंग ही माना जाता था। वह एक रोग या अनिवार्य बुराई है, यह धारणा उस वर्ष विधानसभा चुनावों के बाद जो कुछ हुआ, उसके कारण विकसित हुई, जो आज एक भयावह व चिंताजनक रूप में देश के  सामने दिखाई दे रही है।

हमने चूंकि ब्रिटेन संसदीय जनतांत्रिक प्रणाली को काफी हद तक अपनाया है, इसलिए अपने राजनैतिक क्रियाकलापों में हमारे अध्येता अक्सर ब्रिटिश संसद की नजीरें पेश करते हैं। इनमें से एक है कि कोई निर्वाचित सदस्य सदन में पार्टी के रुख से अपनी स्पष्ट असहमति व्यक्त कर सकता है, वह  पार्टी के खिलाफ जाकर वोट भी दे सकता है; लेकिन दो मौकों पर उसे पार्टी व्हिप का पालन करना अनिवार्य होता है, पहिला अविश्वास प्रस्ताव के समय और दूसरा- वित्तीय विधेयक (मनी बिल) के दौरान। इसमें अगर सदस्य ने पार्टी अनुशासन का पालन नहीं किया तो उसकी सदस्यता खारिज हो जाएगी। कारण यह है कि उपरोक्त दो मौके ही हैं जब शक्ति परीक्षण में हारने पर सरकार गिर जाती है अन्यथा नहीं। आज भी ब्रिटिश संसद में गाहे-बगाहे सदस्य अपनी पार्टी के खिलाफ वोट देते हैं, पार्टी बदल भी लेते हैं, लेकिन उनकी सदस्यता बरकरार रहती है।

भारत में इसी तर्ज पर स्वस्थ परंपराएं विकसित होने की उम्मीद की जाती थी। किंतु 1967 में जो राजनैतिक पाखंड घटित हुआ उसने निर्वाचित सदनों की पवित्रता नष्ट कर उन्हें सदस्यों के नीलामीघर में बदलने में कोई कसर बाकी न रखी। मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री पं. द्वारिका प्रसाद मिश्र ने कांग्रेस आलाकमान से अनुमति मांगी थी कि 37 विधायकों द्वारा थोक में दलबदल करने के कारण वे राज्यपाल से विधानसभा भंग कर नए चुनाव की सिफारिश कर सकें। अगर श्रीमती इंदिरा गांधी ने उन्हें यह अनुमति दे दी होती तो मध्यप्रदेश के बाद बाकी प्रदेशों में भी इसका अनुकरण होता तथा अपनी महत्वाकांक्षा के चलते दलबदल कर सत्तासुख चाहने वालों के मंसूबों पर एक सिरे से पानी फिर जाता। किंतु तब इंदिराजी को यशवंतराव चव्हाण ने यह भरोसा दिला दिया था कि इसी तरह दलबदल करवाकर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बन सकती है और इस धोखे में उन्होंने मिश्रजी की बात नहीं मानी। देश में तब से गयाराम-आयाराम का जो खेल चल रहा है, उसे सब देख रहे हैं।

राजीव गांधी ने अपने प्रधानमंत्री काल में इस विषय पर गंभीरतापूर्वक विचार किया, तब संसदीय जनतंत्र में जड़ें जमा चुके दलबदल के रोग को समाप्त करने के लिए दलबदल विरोधी कानून संसद से पारित हुआ। इस कानून में सबसे बड़ी कमजोरी या विसंगति यह थी कि व्यक्तिगत दलबदल पर तो रोक लगाई गई किंतु थोक में ऐसा करने को कानूनी मान्यता दे दी गई। प्रारंभ में प्रावधान था कि यदि किसी पार्टी के एक तिहाई विधायक दल बदलते हैं तो यह कानून के दायरे में नहीं आएगा। आगे चलकर इसे पचास प्रतिशत और अब दो तिहाई कर दिया गया। लेकिन मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की वाला शेर यहां मौजूं सिद्ध हुआ। उस समय समाजवादी नेता मधु लिमये एकमात्र सांसद थे जिन्होंने राजीव सरकार के विधेयक का विरोध किया था कि इससे दलबदल नहीं रुकेगा। तब कम से कम हिंदी में देशबन्धु ही एकमात्र अखबार था जिसने मधुजी के तर्कों से सहमति रखते हुए बिल के विरोध में टिप्पणी की थी। हमारा आज भी मानना है कि अच्छे इरादे से पेश विधेयक में नाहक कानूनी दांव-पेंच फंसा दिए गए, जिसकी तोड़ भी वैसे ही दांव-पेंचों के द्वारा ढूंढ ली गई।

विगत तीस वर्षों में अनेक प्रदेशों में दल-बदल के अनेक कुत्सित प्रयास जनता ने देखे हैं। जो बड़े प्रदेश हैं, वहां स्थिति बेहतर है, लेकिन अपेक्षाकृत छोटे प्रदेशों में जहां विधानसभा में निर्वाचित सदस्यों की संख्या कम है, हालात चिंताजनक ही कहे जाएंगे। वर्तमान कानून का सबसे ज्यादा मखौल तो शायद गोवा प्रदेश में किया गया है, जहां मात्र चालीस सदस्यों की विधानसभा है। अभी हाल तक वहां कब कौन सदस्य दल बदल कर किस पार्टी में चला जाए कुछ समझ ही नहीं आता था। एक उदाहरण तो मेरे गृह प्रदेश छत्तीसगढ़ का है, जहां कांग्रेसी मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने सदन में स्पष्ट बहुमत होते हुए भी भाजपा के बारह विधायकों को तोड़कर कांग्रेस में शामिल कर लिया। इस राजनैतिक चातुरी का खामियाजा आज भी प्रदेश में कांग्रेस पार्टी भुगत रही है। अविभाजित मध्यप्रदेश में भी हमने दर्शक दीर्घा में बैठकर वह तमाशा देखा था जब गुजरात के बागी भाजपा नेता शंकर सिंह वाघेला अपने साथ कितने अन्य बागियों को लेकर खजुराहो में म.प्र. की दिग्विजय सरकार के मेहमान हुए थे।

इधर केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने भी मानो तय कर लिया है कि कल तक कांग्रेस ने जो किया, वह हम भी करेंगे। इसमें इतना संशोधन कर देना उचित होगा कि जो रास्ता पहले-पहल भाजपा ने दिखाया, मसलन म.प्र. में श्रीमती विजयाराजे सिंधिया के संरक्षण में, वही रास्ता कांग्रेस ने अपनाया और आगे बढ़ते हुए भाजपा पुन: अपने पुराने मार्ग पर आ गई है। अरुणाचल, मणिपुर, उत्तराखंड में हाल के दिनों में जो राजनैतिक हलचलें देखने मिलीं, वे इसका सबूत हैं। भाजपा कांग्रेस को कहती है कि अगर तुम्हारे भीतर कलह है तो हमें दोष क्यों देते हो। लेकिन तटस्थ पर्यवेक्षक तो यही कहेगा कि भाजपा को कांग्रेस के भीतरी विग्रह में दखल क्यों देना चाहिए।  भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री व राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा उनके नियंत्रक सरसंघचालक सब किस कदर जल्दबाजी में नज़र आते हैं कि आसेतु हिमालय भाजपा का परचम व संघ का ध्वज अखंड फहराने लगे, पर इसके लिए नैतिकता व जनमत की परवाह न की जाय, इसे कैसे उचित माना जाए?  

मेरा दलबदल के संबंध में मानना है कि अंतत: ब्रिटिश संसदीय परंपरा का पालन करने से ही हम इस बुराई से छुटकारा पा सकेंगे। फिलहाल दलबदल कानून में एक अंतिम संशोधन की तजवीज मैं करना चाहूंगा कि जो भी विधायक/ सांसद दलबदल करे वह अपनी सीट से तुरंत इस्तीफा देकर नई पार्टी के चिन्ह पर चुनाव लड़ कर अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करे। इसके सिवाय कानून में वर्तमान में जो भी प्रावधान हैं, वे सारे के सारे निरस्त कर दिए जाएं। जिस जनता ने आपको एक बार चुनकर भेजा है, उसी के सामने दुबारा जाइए और अपनी सफाई पेश कीजिए। वह मान जाए तो जीत, न माने तो हार।

देशबन्धु में 28 अप्रैल 2016 को प्रकाशित 

Wednesday, 20 April 2016

भविष्य की पत्रकारिता



 पत्रकारिता के लिए इन दिनों एक नई संज्ञा प्रचलित हो गई है-मीडिया। यह एक अधूरी संज्ञा है जिसे बोलने में आसानी के कारण अपना लिया गया है। अन्यथा पत्रकारिता के लिए जनसंचार माध्यम एक बेहतर संज्ञा है जिसे हम मास मीडिया के नाम से भी जानते हैं। आज पत्रकारिता के स्वरूप पर चर्चा करते हुए हमें सबसे पहले अखबार का ध्यान आता है जिसका प्रारंभ कोई पांच सौ साल पहले हुआ था। इस अर्थ में पत्रकारिता एक आधुनिक संज्ञा है, लेकिन यदि हम जनसंचार माध्यमों की बात करें तो भारत के संदर्भ में इसके लिए लगभग एक हजार साल पहले जाना होगा। जैसा कि पाठक जानते हैं नाटक या रंगमच एक प्राचीन विधा है। प्राचीनकाल में नाटक सामान्यत: देव स्तुति में लिखे जाते थे या फिर राजाओं के मनोरंजन के लिए। इनका दायरा बहुत सीमित था इसलिए इन्हें जनसंचार का माध्यम मानना सही नहीं होगा। मेरी समझ में भारत में जनसंचार माध्यम की नींव शूद्रक के नाटक मृच्छकटिकम् के साथ रखी गई जिसमें जनसामान्य के जीवन का चित्रण हुआ। यह कोई हजार-ग्यारह सौ वर्ष पुरानी बात है। इंग्लैंड में भी रंगमंच की लंबी परंपरा रही है जिसे शेक्सपियर के नाटक आम जनता के बीच ले जाते हैं।

मैं इस पृष्ठभूमि में भविष्य की पत्रकारिता का अक्स देखता हूं। पत्रकारिता की प्रगति में मेरी राय में निम्नलिखित तथ्य आवश्यक है- 1. टेक्नालॉजी का विकास 2. राजनीतिक परिस्थितियां 3. सामाजिक स्थितियां और 4. पूंजी निवेश। पहले बिन्दु के बारे में लगभग सर्वविदित है कि जर्मनी के हाईडैलबर्ग शहर में छापाखाने के आविष्कार के साथ पुस्तक मुद्रण और समाचार पत्र प्रकाशन का काम बड़े पैमाने पर शुरु होता है। अपने समय में यह एक क्रांतिकारी घटना थी।  छपाई मशीन ने वाचिक परंपरा को अवरूद्ध किया ही, ताड़पत्र और पैपिरस आदि पर हो रहे श्रमसाध्य लिप्यांकन को भी समाप्त किया। जनसंचार में टेक्नालॉजी के विकास के भावी उदाहरण रेडियो, सिनेमा, टेलीविजन, इंटरनेट अथवा डिजिटल मीडिया के रूप में सामने आते हैं। रेडियो के बाद जब ट्रांजिस्टर का आविष्कार हुआ तो वह जनसंचार के लिए एक बहुत उपयोगी उपकरण सिद्ध हुआ। टेक्नालॉजी का विकास और उसका उपयोग करना अथवा करने की इच्छा रखना एक बात है, किन्तु उसमें सफल होना दूसरी बात।

यदि किसी देशकाल में राजनैतिक परिस्थितियां अनुकूल न हों तो जनसंचार  माध्यम कठपुतली से बेहतर और कुछ नहीं हो सकता। यहां अनुकूल परिस्थिति से मेरा आशय जनतंत्र से है। जनसंचार अपने आप में एक जनतांत्रिक युक्ति है, जिसका बेहतरीन उपयोग जनतांत्रिक राजनैतिक व्यवस्था में ही हो सकता है। जहां कहीं भी अधिनायकवाद, राजशाही, कुलीनतंत्र अथवा सैन्य शासन होगा वहां पत्रकारिता के स्वस्थ विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। इसे हम अपने कुछेक पड़ोसी देशों के उदाहरण से समझ सकते हैं। औरों की बात क्या, संसदीय जनतंत्र की जननी इंग्लैण्ड में भी बीबीसी को नियंत्रित करने की कोशिशें काफी समय से चल रही हैं। अमेरिका का प्रथम संविधान संशोधन विधेयक हो, चाहे भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी का मौलिक अधिकार, इनकी रक्षा तभी हो सकती है जब राजसत्ता में अपार सहनशीलता हो और जनतांत्रिक मूल्यों के प्रति अविचल प्रतिबद्धता।

अंग्रेजी में पुरानी कहावत है कि आपको वही सरकार मिलती है, जिसके योग्य आप हैं। यही बात पत्रकारिता के बारे में कही जा सकती है। पत्रकारिता के विकास की दृष्टि से यह जानना महत्वपूर्ण है कि उसकी सामाजिक परिस्थितियां क्या हैं। यह बहुत कुछ समाज की राजनैतिक रुझान पर भी निर्भर करता है। मोटे तौर पर समाज में पत्रकारिता के प्रति एक आदर का भाव विद्यमान होता है, किंतु अब वहां पत्रकारिता पर सवाल उठने लगे हैं, उसे संशय की दृष्टि से देखा जा रहा है और दूसरी तरफ जिस पत्रकारिता को लोकशिक्षण का अनिवार्य माध्यम सदियों से माना गया है, उससे लोकशिक्षण के बजाय लोकमनोरंजन की भूमिका निभाने की अपेक्षा की जा रही है। बात साफ है। यदि नागरिकों की दिलचस्पी लोकहित के गंभीर प्रश्नों में नहीं है तो ऐसे में पत्रकारिता का विकास होने के बजाय उसके बीमार पडऩे की आशंका अधिक है। यह तो समाज को ही तय करना होगा कि उसे चमक-दमक, शोशेबाजी, नकली बहसों, चुटकुलेबाजी, अविश्वसनीय समाचारों आदि की आवश्यकता है या अपने समय के प्रश्नों से रूबरू होने की!

यहां पूंजी निवेश की बात भी उठती है। टेक्नालॉजी का विकास अपने आप में स्वागत योग्य है, किन्तु यदि वह आम जनता को उपलब्ध नहीं है तो ऐसा विकास किस काम का? भारत ही नहीं, विदेशों में जनसंचार माध्यमों में एकाधिकारवाद की प्रवृत्ति बढ़ते जा रही है। टेक्नालॉजी इतनी मंहगी है कि वह कामकाजी पत्रकारों की पहुंच से बाहर है। इस स्थिति का फायदा उठाकर कारपोरेट घराने मास मीडिया पर मिल्कियत जमाते जा रहे हंै। यह बेहद चिंताजनक स्थिति है। जिनके पास सत्ता है उनमें सहिष्णुता की कमी है। ऐसे में अब जो पत्रकारिता हम देख रहे हैं वह बहुत बड़ी हद तक सत्ता और पूंजी के गठजोड़ का परिणाम व प्रमाण है।

इस तरह एक ओर महंगी टेक्नालॉजी,  दूसरी ओर असहिष्णु सत्ता तंत्र, तीसरी ओर आत्ममुग्ध, स्वकेंद्रित समाज - इन सबने मिल कर भविष्य की पत्रकारिता के सामने गंभीर चुनौती पेश कर दी है। इस बीच डिजिटल मीडिया का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। डिजिटल मीडिया को हम बोलचाल में सोशल मीडिया कहते हैं, लेकिन वस्तुस्थिति इसके विपरीत है। यह तथाकथित सोशल मीडिया समाजपरक न होकर बड़ी सीमा तक व्यक्तिपरक है और अभी जैसी स्थिति है उसमें इससे कोई उम्मीद पालना बेमानी होगा। डिजिटल मीडिया में लोकमंगल के लिए संभावनाएं निहित हैं, लेकिन उसमें अनेक  बाधाएं हैं।  हम पारंपरिक मीडिया के दो उदाहरण लेकर बात को समझें। भारत में जब दूरदर्शन आया था तो उम्मीद की गई थी कि वह लोकशिक्षण का बहुत बड़ा माध्यम बनेगा, लेकिन पूंजी की ताकतों ने उसका क्या हाल किया है यह बताने की आवश्यकता नहीं है। इसी तरह की उम्मीद एफएम रेडियो से की गई थी कि समुदाय आधारित एफएम रेडियो स्टेशन अपने प्रसार क्षेत्र में जनहित के कार्यों का प्रचार और लोकशिक्षण का काम करेंगे। इसके  उल्टे एफएम रेडियो निम्नस्तरीय मनोरंजन का माध्यम बनकर रह गया है।

डिजिटल मीडिया की हालत बदतर है। एक तरफ वह आत्ममुग्धता को बढ़ाने का माध्यम  सिद्ध हो रहा है तो दूसरी तरफ उसमें बेहद गैरजिम्मेदाराना और उच्छृंखल अभिव्यक्तियां हो रही हैं। मुझेे प्रतीत होता है कि हम पत्रकारिता याने जनसंचार माध्यमों के युग से वापिस एक हजार साल पूर्व के उस परिवेश की ओर लौट रहे हैं जिसमें मास मीडिया की कोई भूमिका ही नहीं थी! दूसरे शब्दों में व्यक्ति जैसे-जैसे समाज केन्द्रित होने से हटकर आत्मकेन्द्रित होने की ओर बढ़ रहा है उसी का प्रतिबिंब आने वाले समय में पत्रकारिता में भी दिखाई देगा। दुनिया के कुछेक बेहतरीन अखबार बंद हो चुके हैं। उनका स्थान न तो रेडियो ले पाया है और न  टीवी। डिजिटल मीडिया के माध्यम से अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश में समाजोन्मुखी पत्रकार लगे हुए हैं। उनकी यह कोशिश कितनी सफल हो पाएगी इसका आज कोई अनुमान लगाने में मैं असमर्थ हूं। यहां मुझे एक और महत्वपूर्ण बिन्दु ध्यान आता है कि डिजिटल मीडिया के नियंत्रण सूत्र अमेरिका के सैन्य पूंजी गठबंधन में है। वे या उनके अनुगत सत्ताधीश जिस दिन चाहेंगे डिजिटल मीडिया से समाजपरक पत्रकारिता को बाहर निकाल फेकेंगे।

दरअसल विश्व समाज इस समय गहरे संकट से जूझ रहा है और वह है विचारहीनता का संकट। जिन्हें हम जनतांत्रिक समाज कहते हैं वहां पूंजी का शिकंजा कसा हुआ है। इस वातावरण में जनसंचार के जितने भी अवयव हैं उनका उपयोग ऊपरी तौर पर तो ऐसे कामों में होगा जो सामाजिक सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं, मसलन तूफान की चेतावनी अथवा जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र बनाना आदि। मास मीडिया में मनोरंजन को मिलने वाला स्थान लगातार बढ़ते जा रहा है। इसका मतलब है कि खाओ पियो खुश रहो और किसी बात की चिंता मत करो। तो क्या भविष्य की पत्रकारिता मनुष्य की चेतना को थपकी देकर सुलाने की पत्रकारिता होगी?  फिलहाल ऐसा ही लगता है। इस स्थिति को बदलने के लिए पत्रकारों को और उन विचारसम्पन्न युवाओं को आगे आना पड़ेगा जो यथास्थिति को बदलने में यकीन रखते हैं।

(डॉ. हरिसिंह गौर केंद्रीय वि.वि. सागर में 17 अप्रैल 2016 को दिए व्याख्यान का परिवर्द्धित रूप)

देशबन्धु में 21 अप्रैल 2016 को प्रकशित 

Thursday, 14 April 2016

चिकित्सा सेवा की दुर्गति




ब्रिटिश मेडिकल जर्नल  स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में एक अत्यन्त प्रतिष्ठित एवं विश्वसनीय पत्रिका है। जर्नल ने अपने ताजा अंक में भारतीय चिकित्सा परिषद में आमूलचूल परिवर्तन करने का आह्वान किया है ताकि भारत में चिकित्सा क्षेत्र में भ्रष्टाचार व नैतिक मूल्यों की अवहेलना को खत्म किया जा सके। यह पत्रिका भले ही ब्रिटेन की हो उसमें यह संपादकीय लेख तीन भारतीय डॉक्टरों ने संयुक्त रूप से लिखा है; लेख में जो तथ्य दिए गए हैं वे स्वास्थ्य सेवा पर संसद की स्थायी समिति की उस रिपोर्ट से उठाए गए हैं जो कुछ दिन पहले ही राज्य सभा के पटल पर रखी गई है। इसलिए पत्रिका पर किसी तरह के पूर्वाग्रह या दुराग्रह का आरोप नहीं लगाया जा सकता। यह उल्लेखनीय है कि ब्रिटिश मेडिकल जर्नल ने सन् 2014 से ही स्वास्थ्य क्षेत्र में भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ रखी है। यहां संदर्भित लेख में कहा गया है कि भारतीय चिकित्सा परिषद देश के मेडिकल कॉलेजों को मान्यता देने के लिए पारदर्शी एवं सुदृढ़तंत्र विकसित करने में नाकाम रही है जिसके चलते निजी चिकित्सा महाविद्यालयों में घपले सामने आए हैं। इसके पूर्व जर्नल ने भारत के प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में भारी-भरकम कैपिटेशन फीस याने प्रवेश शुल्क तथा कारपोरेट अस्पतालों में आमदनी बढ़ाने के लिए डॉक्टरों के लक्ष्य निर्धारित करना आदि बुराइयों पर भी सामग्री प्रकाशित की है।

एक दूसरी रिपोर्ट राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन द्वारा जारी की गई है। इसमें 2009-10 से लेकर 2014-15 तक के तुलनात्मक आंकड़े पेश कर बताया गया है कि देश के अस्पतालों में शल्य क्रिया याने सर्जरी करने के मामलों में कैसे बेतहाशा वृद्धि हुई है। महाराष्ट्र के अस्पतालों में शल्य चिकित्सा लगभग एक हजार प्रतिशत बढ़ गई। जबकि दूसरे नंबर पर छत्तीसगढ़ में यह बढ़ोतरी 509 प्रतिशत रही है। रिपोर्ट में बताया गया है कि स्वास्थ्य बीमा योजना, जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम इत्यादि जिनमें या तो प्रोत्साहन निधि मिलना है या बीमा कंपनी को लाभ होना है, के कारण बिना आवश्यकता के मरीजों की सर्जरी कर दी गई।  इनमें सिजेरियन, हार्निया, गालब्लेडर, अपेंडिक्स आदि से संबंधित प्रक्रियाएं सम्मिलित हैं। रिपोर्ट बताती है कि केन्द्र शासित प्रदेशों में तो यह दर लगभग अविश्वसनीय है। मसलन सिक्किम में बाईस सौ चौदह प्रतिशत बढ़ोतरी और अंडमान निकोबार में ग्यारह सौ अठहत्तर प्रतिशत। इसे लेकर सरकार की ओर से स्पष्टीकरण आए हैं, लेकिन अधिकतर विशेषज्ञों का मानना है कि बीमा कंपनियों को लाभ पहुंचाने का उद्देश्य इसमें सर्वोपरि रहा है। संस्थागत प्रसव में प्रेरक को प्रोत्साहन राशि मिलती है जो सामान्य प्रसूति में तीन दिन तक के लिए होती है, लेकिन सिजेरियन में सात दिन भर्ती रहने के लिए, याने दुगुना फायदा।

इन दोनों रिपोर्टों से अनुमान लगाया जा सकता है कि हमारे देश में स्वास्थ्य सेवाओं की क्या स्थिति है। एक आम आदमी के जीवन में शिक्षा के बाद स्वास्थ्य ही सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा होता है। किसी भी कल्याणकारी राज्य में स्वास्थ्य सेवा को सरकार की प्राथमिकता सूची में रखा जाता है। लेकिन हमारे यहां उल्टी गंगा बह रही है। अभी अधिक समय नहीं हुआ, पच्चीस-तीस साल पहले तक जनता का सरकारी अस्पताल में बहुत विश्वास रहता था तथा डॉक्टर को देवतुल्य नहीं तो घर के बड़े-बुर्जुगों को मिलने वाले सम्मान का अधिकारी माना जाता था। मुझे ठीक से तो याद नहीं, लेकिन शायद ऋषिकेश मुखर्जी की खूबसूरत आखिरी फिल्म थी जिसमें डॉक्टर को परिवार के शुभचिंतक मित्र और विश्वस्त के रूप में चित्रित किया गया था। यह भूमिका डेविड ने अदा की थी। उन दिनों निजी अस्पताल बहुत कम थे, लेकिन जैसे-जैसे नवपूंजीवाद के कदम आगे बढ़ रहे थे, वैसे-वैसे चिकित्सा क्षेत्र में भी निजी अस्पतालों ने अपने पांव पसारना प्रारंभ कर दिया था। 1970-80 के दशक में बंबई का जसलोक अस्पताल बहुत चर्चित हुआ था जहां पेट्रो डॉलर वाले अरब शेख इलाज करवाने आते थे। अब तो ऐसे नए अस्पताल बन गए हैं जिनके सामने जसलोक दीन-हीन लगता है।

भारत में स्वाधीनता प्राप्ति के समय औसत आयु लगभग सत्ताइस वर्ष थी। आज वह बढ़ कर सत्तर वर्ष के आसपास पहुंच गई है। पहले पचास साल की उम्र में व्यक्ति बूढ़ा लगने लगता था, आज उस उम्र का व्यक्ति युवा कहलाता है। भारत से चेचक का समूल नाश हो चुका है। पोलियो भी समाप्त हो गया है। हृदयरोगी आज सर्जरी के भरोसे लंबी आयु पा लेते हैं। गरज यह कि तमाम भ्रष्टाचार के बावजूद स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में भारत ने सराहनीय सफलताएं अर्जित की हैं। लेकिन हम यह न भूलें कि ये सारे काम सरकारी क्षेत्र में ही हुए। सरकारी अस्पतालों में पहले भी थोड़े-बहुत लालची डॉक्टर रहे होंगे और पैरामेडिकल स्टाफ बख्शीश मांगता होगा, फिर भी रोगी का उपचार तो होता ही था।

आज क्या स्थिति है? क्या मेडिकल कॉलेज से पढ़कर निकलने वाले युवा चिकित्सकों के मन में वैसा सेवाभाव है जो आज से पचास साल पहले था? उत्तर मिलेगा नहीं। शहर की सुविधा में रहने का लोभ हर पढ़े-लिखे व्यक्ति को हो सकता है, लेकिन पहले के डॉक्टर गांव जाने में इस तरह नहीं कतराते थे। इसका एक कारण शायद यह हो कि तब डॉक्टरों को प्राइवेट क्लीनिक या नर्सिंग होम खोलने के लिए बैंकों से इतनी आसानी से ऋण नहीं मिलता था। दूसरी वजह  थी जैसा कि हमने उत्तरप्रदेश में देखा- डॉक्टरों को पहले गांव, फिर कस्बा, फिर जिला मुख्यालय इस तरह क्रमिक रूप से पोस्टिंग मिला करती थी। उसमें राजनैतिक हस्तक्षेप नहीं होता था। आज ऐसी कोई व्यवस्था शायद किसी भी प्रदेश में नहीं है।
इस तथ्य पर भी ध्यान दें कि इस बीते युग में सरकारी अस्पतालों के अलावा निजी अस्पताल यदि खुले भी तो किसी सीमा तक वे सरकारी अस्पताल के प्रतिपूरक रहे न कि प्रतिस्पर्द्धी। सम्पन्न तबके द्वारा स्थापित किए गए निजी अस्पतालों के पीछे सेवाभाव प्रमुख था। ये अस्पताल आम जनता के लिए खुले होते थे और इनके डॉक्टरों की जीवनशैली सरकारी डॉक्टरों से बहुत भिन्न नहीं थी। बल्कि अनेक सरकारी डॉक्टर सेवानिवृत्ति के बाद किसी परमार्थ अस्पताल में जाकर सेवा देना पसंद करते थे किन्तु आज चाहे मुंबई में अंबानी अस्पताल हो, चाहे पुणे में बिड़ला अस्पताल या फिर दिल्ली, बंगलुरु, चेन्नई के नामी-गिरामी अस्पताल इनमें किसी साधनहीन व्यक्ति का इलाज तो दूर, मेनगेट से भीतर प्रवेश करना भी असंभव है। विडंबना यह कि ऐसे अधिकतर अस्पतालों को रियायती दर पर भूखंड मिले हैं कि गरीबों की चिकित्सा करेंगे।

मेरी राय में इस विसंगतिपूर्ण स्थिति का सबसे बड़ा कारण है कि देश में जनसंख्या के हिसाब से जितने डॉक्टर होना चाहिए उतने नहीं हैं। अनेक मेधावी डॉक्टर विदेश चले जाते हैं। इस कारण से जो कमी आती है वह अलग है। कोई पच्चीस साल पहले सरकार ने तकनीकी शिक्षा के तंत्र में कुछ बुनियादी फेरबदल किए जिससे तकनीकी महाविद्यालयों की संख्या एकदम से बढ़ गई और देश में इंजीनियरों की कोई कमी नहीं रही। मुझे समझ नहीं आता कि डॉक्टरों व नर्सों की कमी दूर करने के लिए सरकार इसी तरह से कोई कदम क्यों नहीं उठाती! हमें निजी क्षेत्र में नहीं बल्कि सरकारी चिकित्सा महाविद्यालयों की बड़ी संख्या में आवश्यकता है। यदि सरकार ठान ले तो इस हेतु समुचित व्यवस्थाएं करने के लिए अधिक वक्त नहीं लगेगा। लेकिन जब प्रधानमंत्री से लेकर जिलाधीश तक निजी अस्पतालों को बढ़ावा देने में लगे हों तब किससे फरियाद करें और किससे उम्मीद रखें?

देशबन्धु में 14 अप्रैल 2016 को प्रकाशित 
 

Thursday, 7 April 2016

भारतीय समाज : रुग्णता के लक्षण




हम सोचते थे कि मोदी सरकार ने आधार  कार्ड की आवश्यकता स्वीकार कर भारतवासियों को एक तरह से निश्चिंत कर दिया है कि तुम्हारे पास जब यह कार्ड है तो फिर और किसी अन्य तरह के पहचानपत्र की जरूरत नहीं है कि तुम भारतवासी हो या नहीं। लेकिन संघ और भाजपा के नेता जिस तरह के वक्तव्य शृंखलाबद्ध तरीके से और रोजाना किश्तों में दे रहे हैं उससे लगता है कि अपने भारतीय होने का पहचानपत्र देने के लिए हर हिन्दुस्तानी को अब सरसंघचालक द्वारा स्थापित फ्रेंचाइजी पर जाना पड़ेगा। संभव है कि कल तक योग सिखाने वाले उद्योगपति रामदेव ये फ्रेंचाइजी ले लें और पतंजलि बिस्किट, नूडल्स, केश तेल, घी इत्यादि के साथ-साथ देश भर में फैली उनकी दुुकानों पर पहचानपत्र बिक्री का भी काउंटर खुल जाए। अगर कोई कमी होगी तो अपने भक्तों के बीच श्री श्री कहलाने वाले रविशंकर या गुरमत राम-रहीम की दुकानों से उनका वितरण किया जा सकेगा।

नरेन्द्र मोदी मई 2014 में अनेक समुदायों, वर्गों और समूहों के सहयोग से चुनाव जीतकर प्रधानमंत्री बने थे। उस समय दावा किया गया था कि अल्पसंख्यकों ने भी नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में विश्वास प्रकट किया है। जफर सरेसवाला इत्यादि इसके प्रमाण के तौर पर पेश किए गए थे।  इसमें संदेह नहीं कि मोदी के चुनाव अभियान में संघ परिवार ने महत्वपूर्ण भूमिका वोटरों को घर से निकालने व बूथ प्रबंधन आदि में निभाई थी। देशी-विदेशी पूंजीपतियों ने उनके लिए अपनी तिजोरियां खोल दी थीं। किन्तु इस सबसे बढ़ कर नरेन्द्र मोदी सरकार के लिए उस साधारण परिस्थिति के नागरिक ने वोट दिया था, जो भ्रष्टाचार से त्रस्त था और जिसे जीवनयापन के लिए एक छोटे से रोजगार के अवसर की आवश्यकता थी। उसे बढ़ती हुई महंगाई से निजात पाने की भी उम्मीद थी। वह साधारण नागरिक आज अपने आपको छला गया महसूस कर रहा है। प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार खत्म होने का चाहे जितना दावा करें यह सबको पता है कि बुराई पहले से कहीं ज्यादा फैल गई है। अफसरशाही आज पहले की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली और प्रबल है, शिक्षा और स्वास्थ्य में किसी तरह का सुधार नहीं हुआ है, विश्व बाजार में पेट्रोल के दाम घट जाने के बावजूद जनता को उसका कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है, महंगाई दिन-ब-दिन बढ़ रही है, आर्थिक मंदी के जो भी कारण हों कल-कारखाने बंद हो रहे हैं या उनमें उत्पादन कम हो गया है, बेरोजगारी दूर होने के बजाय बढ़ रही है तथा प्रति व्यक्ति पन्द्रह लाख रुपया और अच्छे दिन आने को भाजपा नेतृत्व स्वयं ही जुमला घोषित कर चुका है।

एक तरह से जनता मोहभंग की स्थिति में पहुंच गई है, लेकिन इससे न भाजपा को और न ही रिमोट से सरकार चलाने वाले संघ परिवार को कोई फर्क पड़ रहा है। उन्हें अपने गठबंधन के साथियों की आलोचना की भी चिंता नहीं है। अरुणाचल और उत्तराखंड में संविधान की मर्यादा का उल्लंघन करने में भी उन्होंने संकोच नहीं बरता। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को दरअसल लग रहा है कि भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने का यह जो एक मौका आया है उसे हाथ से फिसलने नहीं देना चाहिए। प्रधानमंत्री की मजबूरी देखिए। संघ के स्वयंसेवक होने के नाते वे अपनी पितृसंस्था का विरोध नहीं कर सकते और विरोध करें भी क्यों? लोकसभा में भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत है। सरकार गिरने का कोई खतरा नहीं है। जैसे दो साल निकल गए वैसे अगले तीन साल भी निकल जाएंगे। यह तो सब जानते हैं कि श्री मोदी सत्ताप्रिय व्यक्ति हैं। देश-दुनिया में हुई तमाम आलोचनाओं के बावजूद उन्होंने गुजरात का मुख्यमंत्री पद नहीं छोड़ा तो प्रधानमंत्री पद कैसे छोड़ देंगे? उनका शायद यह भी मानना हो कि जिस तरह से वे तीन बार गुजरात में चुनाव जीते, उसी तरह केन्द्र में भी दुबारा जीत जाएंगे। शायद यही उम्मीद सरसंघचालक मोहन भागवत को होगी।

हमारी चिंता मोहन भागवत अथवा नरेन्द्र मोदी के बारे में नहीं है। चिंता इस बात की है कि देश का क्या होगा? आधुनिक समय में धर्म आधारित देशों के जो हालात हमने देखे हैं, उनसे हमारी चिंता बढ़ती है। यह समझना बहुत आवश्यक है कि आज जिसे हम राष्ट्र कहते हैं वह कोई स्वाभाविक संज्ञा नहीं बल्कि एक राजनैतिक निर्मिति है। विश्व में शायद ही कोई राष्ट्र हो जहां सिर्फ एक धर्म, एक मत, एक विश्वास, एक जाति, एक रंग या एक नस्ल के लोग रहते हों। ऐतिहासिक कारणों से विभिन्न तरह के समाज पास-पास आते हैं और साथ मिलकर राजनैतिक रूप से राष्ट्र अथवा नेशन स्टेट की स्थापना करते हैं। इस राजनीतिक इकाई का अस्तित्व इस बात पर निर्भर करता है कि उसमें जो भिन्न-भिन्न समाज हैं वे बराबरी के साथ रह पाते हैं या नहीं। यदि किसी देश के सत्ताधीश अपने भीतर के सभी समुदायों के साथ समान न्याय का भाव नहीं रखेंगे तो वह राष्ट्र किसी भी समय टूट सकता है।

पाकिस्तान में बंगलाभाषियों के प्रति सत्ताधीशों ने समानता का बर्ताव नहीं किया तो देश के दो हिस्से हो गए। श्रीलंका में बहुसंख्यक सिंहलियों ने अल्पसंख्यक तमिलों के साथ भेदभाव रखा, तो वहां कई दशकों तक गृहयुद्ध चलता रहा। आज स्वयं भारत सरकार नेपाल में मधेशियों के प्रति समभाव रखने की सीख वहां की सरकार को दे रही है। युगांडा में ईदी अमीन ने भारतीयों को देश से निकालने की कोशिश की तब भारत ने उसका विरोध किया था या नहीं? आज अमेरिका में आतंकवादी होने के धोखे में जब किसी सिख को मार दिया जाता है तो वह बात हमें नागवार गुजरती है और जब कनाडा के प्रधानमंत्री ट्रूडो तीन कनाडाई सिखों को मंत्रिमंडल में शामिल करते हैं तो हमें प्रसन्नता होती है। आज भारत में संघ परिवार से जुड़े वे तमाम लोग जो बात-बात में अल्पसंख्यकों व उनका साथ देने वालों को चिन्हित कर उन्हें राष्ट्रद्रोही घोषित कर पाकिस्तान जाने की सलाह देते हैं, वे कृपया हमें बताएं कि क्या वे इंग्लैंड, अमेरिका, कनाडा, कैरेबियन देश, अफ्रीकी देश, नेपाल, बंगलादेश, श्रीलंका, म्यांमार आदि में बसे भारतवंशियों को जहाजों में भरकर भारत वापिस लाएंगे?

इस समय संघ परिवार भारत में जो हिन्दू राष्ट्र निर्मित करने की कोशिश कर रहा है तब यह याद कर लेना मुनासिब होगा कि यही कोशिश हिटलर और मुसोलनी ने की थी, जिसकी परिणति द्वितीय विश्वयुद्ध के रूप में हुई थी। आज जब ग्लोबल विलेज की बात हो रही है तब किसी भी देश में गृहयुद्ध की स्थिति कितना विकराल रूप ले सकती है उसकी कल्पना मात्र से हर समझदार व्यक्ति को डर लगना चाहिए। अयातुल्ला खुमैनी ने इरान को एक शिया धर्म राज्य में रूपांतरित करने की जो पहल की उसका परिणाम यह हुआ कि इरान विकास की दौड़ में कम से कम एक सदी पिछड़ गया।  इस्लामिक स्टेट द्वारा खिलाफत की पुनस्र्थापना के लिए जो अकल्पनीय हिंसा की जा रही है उसके कारण पश्चिमी एशिया और उत्तर अफ्रीका के तमाम देश बेहाल हो रहे हैं। इस क्षेत्र की राजनीति का गहन अध्ययन अथवा ऐसी परिस्थितियों का विश्लेषण जिन्होंने किया है उनके कुछ उद्धरण यहां प्रस्तुत करने से मेरी बात और स्पष्ट हो सकती है।

यूएनडीपी ने अरब मानव विकास रिपोर्ट 2003 में लिखा था-''शोधकर्ताओं का मानना है कि अरब देशों में जो पढ़ाया जा रहा है वह स्वतंत्र तर्कबुद्धि व विचारशीलता बढ़ाने के बजाय व्यक्ति को अधीनता, आत्मसमर्पण, आज्ञाकारिता और परवशता के लिए प्रेरित करता है।" इसे उद्धृत करते हुए पूर्व राजदूत एवं दार्शनिक राबर्ट तोस्कानो कहते हैं कि-''जो सत्ताधीश पूर्ण नियंत्रण रखना चाहते हैं वे मुक्त, बहुलतावादी, नवाचारयुक्त विचारसरणि को पनपने से रोकते हैं। इसका दुष्प्रभाव अर्थव्यवस्था एवं समाज व्यवस्था दोनों में देखने मिलता है। इससे उदारवादी जनतंत्र के बजाय अनुदार जनतंत्र का उदय होता है जिससे शांतिपूर्ण विकास एवं परिवर्तन की संभावना खत्म हो जाती है।"

अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'कैपिटल' में ऐसे वातावरण की चर्चा करते हुए कहते हैं कि ''पूंजीवाद एकतरफा और गैरटिकाऊ असमानताओं को जन्म देता है जिससे जनतांत्रिक समाज के बुनियादी मूल्य खंडित होते हैं।" यह आश्चर्य की बात नहीं है कि पूंजीपति वर्ग हमेशा से धर्म आधारित व्यवस्था का समर्थन करते आया है। उसे सर्वाधिक लाभ वहीं मिलता है। आक्सफैम की एक ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि विगत बीस वर्ष में विश्व के सबसे धनी एक प्रतिशत लोगों की आमदनी साठ गुना बढ़ गई है।

मैं अंत में सुप्रसिद्ध राजनैतिक विचारक अन्तोनियो ग्राम्शी को उद्धृत करना चाहूंगा। उन्होंने कहा था कि ऐसे संकट की जड़ इस तथ्य में है कि अतीत की व्यवस्था मर रही है और नूतन का जन्म होते नहीं दिख रहा है। इस संधि-बेला में विभिन्न कोटियों की रुग्णता के लक्षण समाज में परिलक्षित होते हैं।

यह दायित्व भारत के नौजवानों पर है कि वे एक रुग्ण मानसिकता के साथ जीना पसंद करेंगे या एक नए भारत का निर्माण करना चाहेंगे!!

देशबन्धु में 07 अप्रैल 2016 को प्रकाशित 

Wednesday, 30 March 2016

उच्च शिक्षा : कुछ सवाल





खबर है कि भारत सरकार विदेशियों के लिए भारत को एक शिक्षा गंतव्य के रूप में विकसित करना चाहती है। दूसरे शब्दों में सरकार की मंशा है कि दूसरे देशों से बड़ी संख्या में छात्र आकर हमारे विश्वविद्यालयों में पढ़ें। अभी हर साल अमूमन तीस हजार विदेशी छात्र भारत में पढऩे के लिए आते हैं। इसमें अधिकतर तीसरी दुनिया के देशों के होते हैं। उन्हें यहां के वातावरण में जो असुविधाएं होती हैं उन्हें कैसे दूर किया जाए तथा इन छात्रों के लिए भारत कैसे एक आकर्षक गंतव्य बन सके इस पर विचार चल रहा है। इसके साथ दूसरी खबर है कि केन्द्र सरकार स्वायत्तशासी शिक्षण संस्थानों पर लगाम कसने की तैयारी कर रही है। मोदी सरकार की सोच है कि उच्च शिक्षा के ये संस्थान अपने लक्ष्य से भटक गए हैं। सरकार का यह भी ख्याल है कि आर्थिक अनुदान में कटौती कर उन्हें रास्ते पर लाया जा सकता है। इस हेतु वरिष्ठ नौकरशाहों की सदस्यता वाली दो समितियां बना दी गई हैं, जिनकी सिफारिश आने के बाद इस संबंध में कोई अंतिम फैसला हो पाएगा।

दोनों खबरों में स्पष्ट अंतर्विरोध दिखाई देता है। यदि किसी विश्वविद्यालय अथवा उच्च शिक्षा के अन्य संस्थान में पर्याप्त स्वायत्तता नहीं है तो वह स्थान युवाओं के लिए आदर्श और आकर्षक कैसे हो सकता है? ऐसे संस्थान में दोहरी व्यवस्था तो होगी नहीं कि भारतीय विद्यार्थियों को निगरानी में रखा जाए, उनकी स्वायत्तता में कटौती हो और दूसरी ओर विदेशी विद्यार्थियों को उनके मनमाफिक आदर्श वातावरण मिल सके! आखिरकार परिसर एक ही होगा, शिक्षक भी वही होंगे तथा प्रशासनिक व्यवस्था भी अलग नहीं होगी। कोई भी विदेशी विद्यार्थी भारत में पढऩे के लिए अगर आएगा, तो उसका पहला कारण होगा- किफायती शिक्षण शुल्क और किफायत से जीवन निर्वाह। किन्तु इसके अलावा उसकी आंखों में उदार वातावरण का सपना होगा कि इंग्लैण्ड, अमेरिका नहीं जा सके तो भारत में चल कर पढ़ाई कर लो। जहां शैक्षणिक परिसर में घुटन की आशंका हो, तो वह शायद वहां नहीं जाना चाहेगा।

दरअसल भारत में उच्च शिक्षा का स्वरूप क्या हो, इसे लेकर हम अभी तक कोई साफ समझ विकसित नहीं कर पाए हैं। पंडित जवाहर लाल नेहरू के समय में जो संस्थान स्थापित किए गए थे वे अपने समय में मॉडल माने जाते थे तथा विदेशों के संस्थानों से उनकी तुलना की जा सकती थी। उनके निधन के पांच साल बाद जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की स्थापना हुई। उसमें हार्वर्ड, कैम्ब्रिज अथवा ऑक्सफोर्ड जैसा वातावरण एवं परंपराएं देने की काफी हद तक सफल कोशिश की गई, लेकिन आज तो उस पर भी खतरा मंडरा रहा है। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि भारत में आधुनिक शिक्षा के उच्च संस्थानों की स्थापना पहले पहल अंग्रेजों के कार्यकाल में हुई थी जब 1857 में एक साथ कलकत्ता, बंबई और मद्रास में वि.वि. खोले गए। इन्हें ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों की तर्ज पर ही स्थापित किया गया था। गो कि कालांतर में इनकी आभा कम होते गई।

हमारे नीति निर्माताओं को यह समझने की आवश्यकता है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तभी संभव है जब स्वायत्तता के अलावा समाज में शिक्षक का यथेष्ट सम्मान हो, फिर बात चाहे प्राथमिक शिक्षा की हो या उच्च शिक्षा की। दुर्भाग्य से न तो हमारे निर्वाचित प्रतिनिधि और न ही नौकरशाह इस बुनियादी तथ्य को समझने के लिए तैयार हैं। आप 5 सितंबर को शिक्षक दिवस चाहे जितने बड़े पैमाने पर मना लें, यह सोचकर देखिए कि डॉ. राधाकृष्णन और डॉ. जाकिर हुसैन के बाद क्या हमने किसी शिक्षक को राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के पद पर बैठाया? यह जवाहर लाल नेहरू ही कर सकते थे कि 1962 में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति इन दोनों पदों पर क्रमश: दो शिक्षक ही आसीन किए गए। हमारे सत्ताधीश जब तक इस बात के महत्व को नहीं समझ लेते और जब तक समाज सत्ताधीशों पर इसके लिए दबाव नहीं डालता तब तक हमें शिक्षा में गुणवत्ता को भूल जाना ही बेहतर होगा।

पिछले दिनों जेएनयू, हैदराबाद, इलाहाबाद, आईआईटी मुंबई, जादवपुर, मद्रास समाजशास्त्र संस्थान इत्यादि में जो हुआ उसके बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है। उसे यहां दोहराने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन हमें एक नज़र विराट शैक्षणिक परिदृश्य पर डाल लेना चाहिए। आज विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की क्या हैसियत है? कितने ही प्रदेशों से सुनने में आता है कि पदेन कुलाधिपति याने राज्यपाल ने कुलपति नियुक्त करने के लिए कहीं तीस लाख तो कहीं चालीस लाख रुपए की रिश्वत ले ली। ये घटनाएं झूठी नहीं हैं। कुछेक राज्यपालों को इन आरोपों के कारण हटाए जाने के प्रसंग भी सामने आए हैं। जब व्यक्ति कुलपति बनने के लिए रिश्वत देगा तो स्वाभाविक है कि पद स्थापना के बाद सबसे पहले तो वह अपने घाटे की भरपाई करने पर ध्यान देगा। ऐसे में विश्वविद्यालय को न तो अच्छे शिक्षक मिलेंगे, न अच्छा भवन, न अच्छा पुस्तकालय और छात्रों की पढ़ाई जितनी होगी वह भगवान भरोसे।

कुलपतियों की नियुक्ति में राजनैतिक हस्तक्षेप भी बहुत होता है। इसमें जातीयता व स्थानीयता के दबाव भी अपनी भूमिका निभाते हैं। केन्द्रीय विश्वविद्यालयों की स्थिति कुछ बेहतर है, किन्तु प्रदेश सरकार के अंतर्गत विश्वविद्यालयों में इन दबावों को स्पष्ट देखा जा सकता है। लब्बो-लुआब यह कि सत्ताधीशों को विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता नागवार गुजरती है और उसका अतिक्रमण करने का कोई भी अवसर वे नहीं चूकते। जो कुलपति और अध्यापक भांति-भांति की हिकमतें कर पद प्राप्त करते हैं, वे अपने संरक्षकों की सेवा करने का भी कोई अवसर हाथ से जाने नहीं देते। ऐसा शायद ही कोई कुलपति हो जो अभिमानपूर्वक कह सके कि यह मेरा विश्वविद्यालय है और मैं इसमें किसी तरह का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करूंगा। जब यह हकीकत हमारे सामने हो तब विश्वस्तरीय शिक्षा देने की बात एक दिवास्वप्न से अधिक कुछ नहीं हो सकती।

वह एक उल्लेखनीय तथ्य है कि आज हमारे विश्वविद्यालयों एवं कॉलेजों के पूर्णकालिक शिक्षकों को जो वेतन-भत्ते मिल रहे हैं उसकी कल्पना आज से सात-आठ साल पहले नहीं की जा सकती थी। जब छठवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू हुर्ईं तब विवि अनुदान आयोग याने यूजीसी ने विश्वविद्यालयों के लिए एक बेहतरीन वेतन ढांचा तैयार किया। आज विश्वविद्यालय के कुलपति को प्रदेश के चीफ सेक्रेटरी या भारत सरकार के सचिव के बराबर वेतन मिलता है तथा कॉलेज में नवनियुक्त सहायक प्राध्यापक का वेतन कलेक्टर से अधिक होता है। उम्मीद की गई थी कि आर्थिक रूप से निश्चिंत होकर प्राध्यापक स्वयं अपने ज्ञान को विकसित करने तथा विद्यार्थियों को उसका लाभ देने के लिए दिलोजान से काम करेंगे। अफसोस कि यह उम्मीद फलीभूत नहीं हो सकी। अधिकतर शिक्षकों की मानसिकता में कोई खास परिवर्तन देखने में नहीं आता। वे जो है उससे संतुष्ट न होकर अन्य उपायों से धनोपार्जन करने तथा सुख-सुविधाएं जुटाने में ही अपना समय व्यतीत कर रहे हैं।

हमें लगता है कि उच्च शिक्षा के वर्तमान ढांचे पर समाज के भीतर व्यापक बहस होना चाहिए। उच्च शिक्षा संस्थानों को सही अर्थों में स्वायत्तता मिले, यह हमारा सोचना है; लेकिन इस विषय में रुचि रखने वाले लोग यह भी सोचें कि अगर विद्यार्थियों को तरुणोचित विकास का वातावरण न मिले, तो क्या उनकी प्रतिभा कुंठित नहीं होगी? दूसरे यह भी विचारणीय है कि शिक्षा हमारी एक अनिवार्य जिम्मेदारी है या नहीं? क्या हम उसे किसी बिक्री योग्य माल में बदल दें कि अभी बेचा और अभी पैसा कमा लिया या फिर मजबूती से यह कहें कि शिक्षा हासिल करना युवा पीढ़ी का अधिकार है तथा इसके लिए जो भी खर्च हो वह उचित है, इस पर सवाल खड़े करना ठीक नहीं है। फिर हमें अपने नौैकरशाहों से भी पूछना चाहिए कि आप किस बिना पर वाइस चांसलर, प्रिंसिपल या प्रोफेसर को अपने से छोटा समझते हैं।

समाज व्यवस्था में सबके काम बंटे हुए हैं। इसमें वेतन अथवा पदनाम के आधार पर कोई भेदभाव क्यों? जिलाधीश या सचिव का काम अपनी जगह है तो कुलपति और अध्यापक का अपना स्थान है। दोनों के बीच परस्पर सम्मान का रिश्ता होगा तभी बात बनेगी। यही बात समाज को राजनेताओं से भी पूछना चाहिए कि आप क्यों उम्मीद करते हैं कि कुलपति आपके पैर छुए या आपकी सार्वजनिक झिड़कियां सुने या रात बारह बजे आपके बंगले पर मत्था टेकने आए। अंत में इसी तरह हमें अपने शिक्षकों से भी यह पूछना होगा कि आप अपने आपको इतना दीन-दरिद्र क्यों मानते हैं? आप क्यों नहीं अपने आत्मसम्मान और अपने पेशे की रक्षा करना सीखते? जिस दिन ये प्रश्न उठेंगे उस दिन से उच्च शिक्षा में वांछित सुधार देखने मिलने लगेगें।

देशबन्धु में 31 मार्च 2016 को प्रकाशित 

Thursday, 24 March 2016

अगला राष्ट्रपति कौन होगा?



भारत में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के लिए चुनाव अगले साल होंगे। भारतीय जनता पार्टी या यूं कहें कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा मनोनीत व्यक्ति ही इन दोनों पदों पर चुने जाएंगे। इसमें संदेह की कोई गुंजाइश फिलहाल नजर नहीं आती। सवाल यह है कि भाजपा राष्ट्रपति पद के लिए अपने प्रत्याशी का चयन किस आधार पर करेगी। क्या वह कोई वरिष्ठ राजनीतिज्ञ होगा अथवा कोई अकादमिक, क्या वह सैन्यतंत्र अथवा प्रतिरक्षा मामलों का जानकार होगा या कोई सेवानिवृत्त  न्यायमूर्ति या नौकरशाह? भाजपा जिस किसी को भी चाहेगी क्या उसके लिए सरसंघचालक मोहन भागवत के आशीर्वाद की आवश्यकता होगी? यूं तो इस चुनाव के लिए एक साल से अधिक का समय बाकी है, लेकिन राज्यसभा में अपनी सीटें बढ़ाने के उद्देश्य से भाजपा जिस तरह ताबड़तोड़ दल-बदल को प्रश्रय दे रही है, उससे यह आशंका भी बनती है कि देश के दो सर्वोच्च संवैधानिक पदों पर अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए यह रणनीति उस समय भी अपनाई जाएगी।

एनडीए-1 याने वाजपेयी जी के कार्यकाल में डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को सत्तापक्ष ने अपना प्रत्याशी बनाकर विजय प्राप्त की थी। उसमें कांग्रेस ने भी साथ दिया था। डॉ. कलाम देश के सैन्यतंत्र से गहराई से जुड़े हुए थे। उनकी पहचान मिसाइलमैन के रूप में बन चुकी थी। भारत के पहले खुले आणविक परीक्षण का नायक उन्हें ही माना गया था। इसके अलावा वे भारतरत्न से भी विभूषित हो चुके थे। आज सैन्यतंत्र अथवा प्रतिरक्षा प्रतिष्ठान में उनकी बराबरी का कोई दूसरा व्यक्ति नहीं दिखाई देता। इसलिए यह संभावना कम ही है कि किसी सेनाधिकारी या प्रतिरक्षा विशेषज्ञ को एनडीए-2 मनोनीत करे। प्रसंगवश यह जान लेना दिलचस्प होगा कि डॉ. कलाम के विरुद्ध चुनाव लड़ रही वामदलों की प्रत्याशी कैप्टन लक्ष्मी सहगल की पृष्ठभूमि भी सेना की थी। वे आज़ाद हिन्द फौज की प्रख्यात कैप्टन लक्ष्मी थीं और रानी झांसी बिग्रेड का उन्होंने नेतृत्व किया था। डॉ. कलाम की भांति वे भी मूलत: तमिलभाषी थीं। उन्हें पद्मविभूषण से भी अलंकृत किया जा चुका था। मालूम नहीं कांग्रेस ने क्या सोचकर उनका समर्थन नहीं किया। यद्यपि इससे परिणामों पर कोई फर्क नहीं पड़ता।

जहां तक अकादमिक क्षेत्र से प्रत्याशी लेने की बात है तो भाजपा के पास ऐसा कोई व्यक्ति दिखाई नहीं देता जिसकी अकादमिक क्षेत्र में अखिल भारतीय स्तर पर प्रतिष्ठा हो। अर्थशास्त्री जगदीश भगवती का नाम ध्यान आता है, लेकिन क्या राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों गुजरात से हो सकेंगे? हमें यह भी नहीं पता कि प्रोफेसर भगवती भारत के नागरिक हैं या अमेरिका के? वैसे किसी अकादमिक को राष्ट्रपति बनाने की परंपरा डॉ. जाकिर हुसैन के बाद से समाप्त हो चुकी है। बाद के राष्ट्रपतियों में कुछ की विद्वता पर संदेह नहीं, लेकिन अकादमिक वातावरण से उन्होंने बहुत पहले अवकाश ले लिया था। जहां तक किसी न्यायाधीश को नियुक्त करने की बात है तो जस्टिस गोपाल स्वरूप पाठक और जस्टिस एन. हिदायतुल्ला कांग्रेस के दौर में उपराष्ट्रपति तो बने, राष्ट्रपति बनने का अवसर उन्हें भी नहीं दिया गया। जनसंघ ने अवश्य जस्टिस कोका सुब्बाराव को 1967 में राष्ट्रपति पद के लिए खड़ा किया था लेकिन वे चुनाव हार गए थे।

शासनतंत्र अथवा नौकरशाही से राष्ट्रपति बनने का एकमात्र उदाहरण के.आर. नारायणन का है, जो भारतीय विदेश सेवा से निवृत्त होने के बाद पूर्णकालिक राजनीति में आ चुके थे। कुल मिलाकर यह एक मिला-जुला मामला था। वैसे फिलहाल हमारे उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी भी सेवानिवृत्त नौकरशाह ही हैं। सेवानिवृत्त अधिकारियों की पदलालसा किसी से छुपी हुई नहीं है। वे कई बार नियमों में अपने मनमाफिक संशोधन भी करवा लेते हैं। मैंने कुछ साल पहले इसी संदर्भ में सुझाव दिया था कि कैबिनेट सेक्रेटरी और चीफ सेक्रेटरी को क्रमश: प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री के प्रसादपर्यंत अपने पद पर बने रहना चाहिए।  इस दृष्टि से देखें तो भाजपा में दोनों पदों के लिए बहुत सारे उम्मीदवार हो सकते हैं। यह अब किसी से छिपा नहीं है कि यूपीए शासनकाल में भी अनेक अधिकारी भाजपा अथवा संघ के प्रति निष्ठा रखते थे। समय आने पर इन्हें अपनी सेना का पुरस्कार मिला। अब सवाल यही है कि क्या कोई ऐसा वरिष्ठ नौकरशाह है, जिसे भाजपा राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी घोषित करें और जनमानस में उसका गलत संदेश न जाए। क्या पूर्व सीएजी विनोद राय ऐसे व्यक्ति हैं? यद्यपि मुझे शक है कि मोदी जी किसी रिटायर्ड अफसर को राष्ट्रपति बनाना पसंद करेंगे।

कुल मिलाकर बात आ टिकती है राजनीति के ऊपर। यहां भी प्रत्याशियों की कोई कमी नहीं है। पचहत्तर से ऊपर वालों को छोड़ दीजिए, उनके अलावा भी काफी लोग हैं। कुछ नाम ध्यान में आते हैं जैसे राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज व सुमित्रा महाजन। वयोवृद्ध नेताओं में अपवाद स्वरूप एक नाम नजमा हेपतुल्ला का भी हो सकता है। इनमें से राजनाथ सिंह वरिष्ठता के नाते दावेदार तो हो सकते हैं, लेकिन उनकी संभावना कम ही दिखती है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि वैदेशिक मामलों में उनका दखल बहुत सीमित है। राष्ट्रपति का पद संवैधानिक तो है, लेकिन उससे अधिक वह एक अलंकारिक पद है तथा विदेश नीति के मोर्चे पर इस महिमामंडित पद का उपयोग अकसर किया जाता है। राजनाथजी संभवत: इस भूमिका में फिट नहीं बैठ पाएंगे।

सुमित्रा महाजन के पक्ष में चार बिन्दु हैं- एक तो वे छह बार की अनुभवी लोकसभा सदस्य हैं, दूसरे- वर्तमान में लोकसभा अध्यक्ष के पद पर हैं, तीसरे- अध्यक्ष के नाते निर्णय लेते हुए सरकार के प्रति उनकी पक्षधरता जब-तब प्रकट हो जाती है, चौथे वे संघ की समर्पित कार्यकर्ता हैं। उन्हें यदि उम्मीदवार बनाया गया तो एनडीए में शायद ही कहीं उनका विरोध होगा। लेकिन राष्ट्रपति को अनेक बार जटिल संवैधानिक प्रश्नों का समाधान करना होता है। वे इस दिशा में कितनी सक्षम हैं यह पता नहीं है। नजमा हेपतुल्ला अगले वर्ष ससत्तर साल की हो जाएंगी।  लेकिन राष्ट्रपति पद के लिए यह उमर अधिक नहीं है। वे राज्यसभा   की उपाध्यक्ष रह चुकी हैं, अल्पसंख्यक हैं, मौलाना आज़ाद के परिवार से संबंध रखती हैं, संसदवेत्ता हैं- ये सारी बातें उनके पक्ष में जाती हैं। उन्हें प्रत्याशी बनाकर श्री मोदी अपने धर्मनिरपेक्ष होने का सबूत भी दे सकेंगे।

सुषमा स्वराज का नाम मेरी लिस्ट में सबसे ऊपर है। वे 1977 में पहली बार चुनाव जीत कर विधानसभा सदस्य बनी थीं याने वे राजनीतिक जीवन के चालीस वर्ष पूर्ण कर चुकी होंगी। वे केन्द्रीय मंत्रिमंडल में पहले और अब भी अपनी कार्यक्षमता सिद्ध कर चुकी हैं। हिन्दी, संस्कृत और अंगे्रजी में वे समान अधिकार से बात कर सकती हैं। विदेश मंत्री के रूप में उनका अब तक का काम संतोषजनक ही माना जाएगा। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि संघ की है और पार्टी के प्रति उनकी निष्ठा अविचल है। अपने संसदीय जीवन में उन्होंने विपक्षी दलों से भी मैत्रीपूर्ण व्यवहार रखा है और उनकी सद्भावना अर्जित की है। उन्होंने सोनिया गांधी के बारे में जो कहा था, वह अब शायद पुरानी बात हो चुकी है।  रेड्डी बन्धुओं अथवा ललित मोदी से निकटता आज की राजनीतिक वातावरण में क्षम्य ही मानी जाएगी!

अब बात आती है उपराष्ट्रपति की। यह चर्चा राजनीतिक हल्कों में चल रही है कि दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग भाजपा की ओर से इस पद के दावेदार हो सकते हैं। अगर सुषमा स्वराज राष्ट्रपति और नजीब जंग उपराष्ट्रपति बने तो एक तरह से 2007 की पुनरावृत्ति होगी जब प्रतिभा देवीसिंह पाटिल और हामिद अंसारी क्रमश: राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति बने थे। यदि राष्ट्रपति पद के लिए नजमा हेपतुल्ला का मनोनयन हुआ तो उपराष्ट्रपति के लिए फिर शायद किसी वरिष्ठ भाजपा नेता को अवसर दे दिया जाए। जो कुछ भी हो अभी तो ये सब कयास है। होली के अवसर पर अगर कोई गंभीर बात लिखी जाए तो उसे पढ़ेगा कौन? इसलिए बैठे ठाले जो मन में आया वह लिख दिया।

देशबन्धु में 24 मार्च 2016 को प्रकाशित 
 

Wednesday, 16 March 2016

शिक्षा का अधिकार : कानून बनाम हकीकत



परीक्षाओं का मौसम है और हमारे सत्ताधीश इन दिनों बच्चों के भविष्य को लेकर खासे चिंतित नजर आ रहे हैं। पहले तो प्रधानमंत्री ने 'मन की बात' में बच्चों को नसीहत दी कि वे पास-फेल की चिंता में घबराएं नहीं इत्यादि।  उनका अनुकरण छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने अपने मासिक रेडियो प्रसारण 'मन के गोठ' में किया। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी इसी तरह से चिंतित हैं। वे टीवी पर मध्यप्रदेश सरकार के विज्ञापन में दिन में न जाने कितनी बार बच्चों के परीक्षाफल और बालमन पर उसके प्रभाव की चिंता प्रकट करते हैं। राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा और हरियाणा में भी अगर ऐसा कुछ हो रहा हो तो उसकी जानकारी मुझ तक नहीं पहुंची है। यह देखकर मन भर आता है कि हमारे सत्ताधीशों को युवा पीढ़ी की कितनी चिंता है! टीवी और रेडियो पर देख-सुन कर तो यही लगता है कि बच्चों का इनसे बढ़कर हितैषी और कोई नहीं है।

एक तरफ राजनेताओं के ये उद्गार हैं और दूसरी ओर शिक्षा प्राप्त कर रहे बाल-बालिकाओं के असली हालात।  हम अभी विश्वविद्यालयों में जो हो रहा है उसकी चर्चा नहीं छेडऩा चाहते किन्तु स्कूली विद्यार्थियों की क्या दशा है, उसके दृश्य आए दिन सामने आ रहे हैं। एक बच्चा स्कूल के पास कुएं से पानी खींचते हुए डूब कर मर जाता है, क्योंकि दलित होने के कारण शाला के हैण्डपंप से पानी पीने की मनाही है। किसी स्कूल में दो मासूम बच्चों से अध्यापक नाराज हो जाते हैं तो उन्हें नंगे होकर कक्षा के बाहर खड़े रहने की सजा दे दी जाती है। कहीं आदिवासी छात्रों को छात्रवृत्ति लेने के लिए हर माह पैंतीस किलोमीटर दूर जाना पड़ता है, तो आज भी कहीं बच्चे स्कूल जाने के लिए मीलों पैदल चलते हैं। मध्याह्न भोजन जैसी बेहतरीन योजना का हाल यह कि हर रोज विद्यार्थियों के बीमार पडऩे और अस्पताल में भर्ती होने के समाचार आते हैं। बकौल कवि सोमदत्त-किस्से अरबों हैं।

यूं तो अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में शिक्षा हासिल करने को मौलिक अधिकार का दर्जा मिल गया और मनमोहन सिंह के कार्यकाल में उसे अमली जामा पहनाने के लिए कानून भी पास हो गया था, लेकिन जैसा इन दिनों सुनने में आ रहा है सत्तारूढ़ भाजपा की यही मंशा प्रतीत होती है कि शिक्षा का अधिकार कानून समाप्त नहीं, तो इस तरह से संशोधित कर दिया जाए कि उसमें से वंचितों के हित के प्रावधान निरस्त हो जाएं। अगर ऐसा हुआ तो यह बहुत बड़ा अनर्थ होगा। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री इत्यादि बच्चों के हित में जो उद्गार व्यक्त कर रहे हैं यह उनका भी तिरस्कार होगा। सवाल यह है कि कानून में खामियां हैं या उसे लागू करने में गड़बडिय़ां हैं अथवा प्रावधानों को अमल में लाने की ईमानदार कोशिश ही नहीं है। इसकी सिलसिलेवार समीक्षा करना आज आवश्यक हो गया है।

हमारे छत्तीसगढ़ में स्कूली शिक्षा की बहुत अधिक दुर्दशा है जिसके कारण इस प्रदेश के उज्ज्वल भविष्य पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा है। मुख्यमंत्री इस सच्चाई को जानते हैं। इसलिए वे स्वयं बीच-बीच में स्कूलों का निरीक्षण करने पहुंच जाते हैं। उनकी देखादेखी तमाम मंत्री और आला अफसर भी स्कूल जाते हैं, एकाध कक्षा लेते हैं, फोटो खिंचवाते हैं, अखबार में तस्वीर छप जाती है और बात वहीं खत्म हो जाती है। शिक्षा व्यवस्था को तथा शिक्षा का अधिकार कानून को प्रभावी ढंग से लागू करने का  यह कोई तरीका नहीं है। इसे अगर शोशेबाजी कहा जाए तो भी गलत नहीं होगा। अगर इस विषय पर सच्चे मन के साथ काम करना हो तो इस हेतु निम्नानुसार कदम उठाना होगा।

अभिजात मानसिकता- समाज के सम्पन्न अथवा अपेक्षाकृत सुखी तबके में यह धारणा है कि बच्चों को सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ाना चाहिए, साथ ही निजी स्कूलों में गरीब बच्चों को प्रवेश नहीं देना चाहिए। यह वर्गभेद की धारणा है। बच्चों को आगे बढऩे के लिए समान अवसर मिलना आवश्यक है और उसमें शिक्षा की जहां तक बात है सरकारी स्कूल से बेहतर कुछ नहीं है। यदि देश के भावी नागरिकों को बचपन से ऊंच-नीच का पाठ पढ़ाया जाएगा तो आगे चलकर समाज में खाई बढ़ेगी और अशांति का वातावरण बनेगा।

शिक्षक- पिछले तीस-चालीस सालों के दौरान विश्व बैंक आदि के दबाव के चलते पूरे देश में पूर्णकालिक शिक्षकों की भर्ती बंद है। ऐसे में  अच्छे शिक्षक कहां से आएंगे? छत्तीसगढ़ में ठेके या अनुबंध पर जो नियुक्त किए गए हैं उन्हें पंचायत शिक्षक का पदनाम मिला है। उनकी सेवा शर्तें भी कई अन्य राज्यों से बेहतर हैं। लेकिन इन्हें एक तो समय पर वेतन नहीं मिलता, दूसरे भ्रम  की स्थिति बनी हुई है कि ये राज्य शासन के कर्मचारी हैं अथवा जिला पंचायत के। इसके अलावा यह कटु तथ्य अपनी जगह पर है कि ये स्थायी शिक्षक नहीं हैं। ऐसी विपरीत स्थितियों में इनसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की उम्मीद कैसे की जा सकती है।
यह आवश्यक है कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के दबाव से मुक्त होकर सरकार शिक्षा  को अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी माने और इसके लिए स्थायी शिक्षकों सहित अन्य आवश्यकताएं पूरी करे।

प्रशिक्षण- स्कूली बच्चों को पढ़ाना कोई बच्चों का खेल नहीं है। शिक्षक का काम एक तकनीकी  काम है, जिसके लिए उसे आवश्यक प्रशिक्षण लेना होता है। डीएड, बीएड और एमएड इत्यादि पाठ्यक्रम उत्तीर्ण करके ही कोई प्रशिक्षित शिक्षक बन सकता है। इसमें विषय के ज्ञान के अलावा बाल मनोविज्ञान तथा विषय को आयुक्रमानुसार पढ़ाना इत्यादि बहुत सी बातें शामिल होती हैं। यह काम मुख्यमंत्री या मुख्यसचिव के वश का नहीं है। लेकिन हो क्या रहा है? एक तो बीएड इत्यादि के लिए बहुत से नए कॉलेज खुल गए हैं। निजी महाविद्यालयों ने इसे कमाई का उत्तम जरिया बना लिया है। इन कॉलेजों में भी शिक्षकों की कमी है। इन पाठ्यक्रमों के संचालन के लिए एक नहीं बल्कि तीन एजेेंसियां जिम्मेदार हैं जिनमें आपस में कोई तालमेल नहीं हो पाता। इससे तथाकथित प्रशिक्षित शिक्षकों की योग्यता का अनुमान लगाया जा सकता है।

परीक्षा- यह एक भ्रम अच्छे तरीके से फैलाया गया है कि आठवीं कक्षा तक परीक्षा नहीं लेना है। यह सही है कि पारंपरिक तरीके से जो परीक्षाएं होती रही हैं वैसा अब नहीं होना है, किन्तु इसमें एक महत्वपूर्ण प्रावधान है कि विद्यार्थियों का सतत् मूल्यांकन किया जाना है। अर्थात शिक्षक उनकी पढ़ाई पर लगातार ध्यान रखेंगे तथा जो बच्चे कमजोर हैं उन पर विशेष ध्यान देंगे। अगर शिक्षक अपने विद्यार्थियों की उन्नति के लिए हर समय प्रयत्नरत है तो स्वाभाविक है कि विद्यार्थी लगातार अपनी प्रतिभा का विकास करते जाएंगे और अपवादों को छोड़कर फेल होने का सवाल ही नहीं उठेगा।

दंड- हमारे यहां लंबे समय से मान्यता चली आ रही है कि बच्चों को पीटे बिना वह सुधर नहीं सकते। यह दरअसल बड़ों के मन की कुंठा का ही प्रतिबिंब है। इससे सुकुमार बच्चों की प्रगति अवरूद्ध ही होती है। उन्हें अपने विकास के लिए खुला तथा अनुकूल वातावरण मिलना चाहिए।

समाज का दायित्व- शिक्षा का अधिकार कानून में शाला प्रबंधन समिति का प्रावधान किया गया है। इस समिति को शाला की आवश्यकताओं को सूचीबद्ध करना, प्राथमिकताओं का निर्धारण करना, संसाधन जुटाना आदि दायित्व वहन करना चाहिए। जिस भी गांव या मुहल्ले में स्कूल हैं, वहां अधिकतर सदस्य पालकों के बीच से ही चुने जाते हैं। अपने इस महती दायित्व को पालकों को गंभीरता से लेना चाहिए। आज भी ऐसे स्कूल आपके आसपास होंगे जो उदारमना नागरिकों के सहयोग से स्थापित हुए होंगे। आज एक बार फिर समाज को ही दुबारा इस हेतु उद्यम करने की आवश्यकता है।

शिक्षा का अधिकार एक कानूनी साधन है, किन्तु किसी भी कानून का क्रियान्वयन बड़ी हद तक नागरिकों के सहयोग एवं सन्मति पर निर्भर करता है। हमें अपने बच्चों का भविष्य बनाना है तो सरकार की तरफ मुंह ताकना बंद कर अपनी सामूहिक इच्छाशक्ति को जगाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।

देशबन्धु में 17 मार्च 2016 को प्रकाशित