Monday, 14 November 2016

मेरी पहली और आखिरी अमेरिका यात्रा


 1978 के दिसंबर में अमेरिका यात्रा का कार्यक्रम बना। वह एक शासन प्रायोजित यात्रा होना थी। एयर इंडिया ने बोइंग कंपनी से एक नया विमान खरीदा था। तब सामान्य परंपरा थी कि भारत सरकार का विमानन मंत्रालय अपनी छवि निर्माण की दृष्टि से कुछ पत्रकारों को ऐसे अवसर पर अमेरिका की संक्षिप्त सैर का मौका उपलब्ध करवाता था। यहां से एयर इंडिया के नियमित विमान से न्यूयॉर्क होते हुए बोइंग से मुख्यालय सीएटल, वाशिंगटन प्रांत जाइए और नए विमान में बैठकर वापिस आइए। केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार थी और रायपुर के लोकसभा सदस्य पुरुषोत्तम कौशिक केन्द्रीय पर्यटन व नागरिक उड्डयन मंत्री। समाजवादी कौशिकजी ने सोचा कि हमेशा दिल्ली-बंबई के पत्रकारों को ही ऐसे मौकों का लाभ मिलता है, इस बार अपने मंत्री रहते हुए हिंदी पत्रकारों को अमेरिका की सैर क्यों न करवाई जाए। मेरी भ्रमणशीलता और भ्रमणप्रियता से वे वाकिफ थे सो मेरा नाम सूची में जुड़ गया। एक निर्धारित तिथि पर दिल्ली पहुंचने की सूचना मिल गई। इसी बीच यह खबर किसी न किसी तरह से फैली होगी तो हिन्दी के 5-7 अन्य पत्रकार बंधुओं के नाम शामिल कर लिए गए।

उन दिनों रायपुर से दिल्ली के लिए एवरो विमान चलता था। रायपुर से जबलपुर, भोपाल होकर दिल्ली। सुबह रवाना हुए तो शाम को दिल्ली पहुंचे। वहां बाबूजी के अनन्य मित्र शेट्टी चाचा के घर पहुंचा नहीं कि चाची ने खबर दी- बच्चू, तुम्हारी अमेरिका यात्रा तो कैंसल हो गई  है। मैं चौंका। मालूम पड़ा कि उसी सुबह दिल्ली के टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रथम पृष्ठ पर खबर छपी कि मंत्री जी न जाने कैसे-कैसे पत्रकारों को अमेरिका भेज रहे हैं जिन्हें न अमेरिका पता है, न पर्यटन, न विमानन। जाहिर है कि जिन पत्रकारों का पत्ता कटा, उन्होंने क्षुब्ध होकर यह प्रहार किया था। बात सही भी थी। मैं रायपुर से, बाकी भी शायद ऐसे ही प्रादेशिक नगरों के होंगे। दिल्ली वालों के सामने हमारी क्या बिसात? मंत्री जी ने दिल्ली में चलने वाले दांव-पेंचों को अभी समझना शुरू ही किया था। वे इस खबर से घबरा गए और आनन-फानन में यात्रा निरस्त कर दी गई।
 मैंने कौशिकजी से बात करना चाही। वे जिस भी मन:स्थिति में रहे हों, कतराते रहे और मिले नहीं। उनके सचिव रमाकांत चंद्राकर को फोन किया तो उन्होंने भी इधर-उधर कर बात समाप्त कर दी। मैं अगले दिन एयर इंडिया के प्रबंध निदेशक एच.एस. कोहली (एवरेस्ट विजेता) से मिलने गया तो बहुत अच्छे से मिले। चाय भी पिलाई। मैंने कहा कि शासकीय निमंत्रण पर यहां तक आया हूं। हवाई जहाज का टिकिट लगा है तो कम से कम उस राशि का भुगतान तो कर दें। उन्होंने मंत्रीजी से बात कर खबर करने का आश्वासन दिया। मैं लौट के बुद्धू घर आया की तर्ज पर वापिस रायपुर आ गया। दरअसल, मुझे इस लालच में पडऩा ही नहीं था। मेरा अनुभव है कि किसी भी तरह की शासकीय मेहरबानी मुझे रास नहीं आती। जो स्वअर्जित है, उसके अलावा और कुछ मुझे फलता ही नहीं है। 

बहरहाल, अमेरिका प्रवास का अगला अवसर आया 1993 में याने उपरोक्त घटना के लगभग 15 वर्ष बाद। यह यात्रा सपत्नीक थी जिसमें अमेरिका के विभिन्न नगरों में हमने कोई बीस दिन बिताए। मैं यात्रा वृत्तांत लिखने में सामान्यत: विलंब नहीं करता। इसके कुछ अपवाद हैं, जिसमें वह यात्रा भी शामिल है। आज लगभग 24 वर्ष बाद मौका आया है कि अपने प्रथम व एकमात्र अमेरिका प्रवास के कुछ संस्मरण सबके साथ साझा करूं। इनमें सबसे दिलचस्प वाकया जो मुझे बार-बार याद आता है और जिस पर मैं मन ही मन मुस्काए बिना नहीं रह पाता वह वाशिंगटन (डीसी) का है। हम अपने रायपुर के मित्र माजिद के बेटे के फ्लैट पर रुके थे। उसने कहीं चलने के लिए अंडरग्राउंड पार्किंग से कार निकाली, रफ्तार कुछ तेज रही होगी, ऊपर पोर्च में खड़ी दूसरी गाड़ी से वह रुकते-रुकते हल्के से टकरा गई। उस गाड़ी का ड्राइवर (या मालिक) नीचे उतरा, हमारी गाड़ी का नंबर नोट किया और कहा- ओके! सी यू इन द कोर्ट। याने ठीक है, अब तुमसे अदालत में मुलाकात होगी। दोनों गाडिय़ों के सिर्फ फैंडर याने सामने की पट्टियां ही टकराई होंगी, लेकिन उस पर कोर्ट में जाने का फौरी फैसला। अमेरिकी नागरिक अपने निजी अधिकारों को लेकर कितने सचेष्ट हैं, यह उसका उदाहरण मेरे सामने था। 

हमारी यात्रा का पहला पड़ाव न्यूजर्सी का कोई छोटा सा नगर था जिसका नाम फिलहाल याद नहीं आ रहा है। इसके लिए हमें न्यूयॉर्क के जेएफके एयरपोर्ट पर उतरना था। माजिद हमें लेने आने वाले थे। सामान लेकर बाहर निकले तो उनका कोई अता-पता नहीं। आधा घंटा हम परेशान खड़े रहे कि अब क्या किया जाए। उस समय मोबाइल फोन तो था नहीं और घर के फोन पर कोई उत्तर नहीं था। खैर ! इस चिंताकुल प्रतीक्षा के बाद माजिद और परवीन दोनों हमें लिवाने आ गए। अमेरिका की गगनचुंबी इमारतों और हडसन नदी के नीचे बनी सुरंग आदि से गुजरते हुए एक सवा घंटे में उस छोटे से नगर में स्थित उनके घर पहुंचे। कई वर्ष पहले इंग्लैंड और वेल्स में देखे पोस्टकार्ड पिक्चर जैसे करीने से बने घर यहां भी थे। ठंड के दिन थे। पेड़ों पर बर्फ जमा थी, लेकिन प्रकृति के विस्तार का एहसास चारों तरफ हो रहा था। और ऐसा क्यों न होता। अमेरिका भारत से क्षेत्रफल में ढाई गुना बड़ा है और आबादी में एक तिहाई। याने वहां खुलेपन की कोई कमी नहीं। दो-तीन दिन बाद हम लोग कार में कहीं घूमने निकले तो रास्ते में जगह-जगह सूचनापटल लगे थे- संभालकर गाड़ी चलाइए, यहां हिरण आते-जाते हैं। और सचमुच प्रकृति के इस प्रांगण में हिरणों को निश्चिंत होकर विचरते देखा।

न्यूयॉर्क के जनसंकुल मैनहट्टन द्वीप से यह दृश्य बिल्कुल भिन्न था। वहां तो इमारतें ऊंचाई में एक-दूसरे से होड़ लेने के लिए नजर आती हैं। ये अट्टालिकाएं इतनी ऊंची हैं कि सूरज की किरणों को नीचे आने से रोक देती हैं। फोरलेन सडक़ भी इस ऊंचाई के सामने संकरी लगने लगती है। मजे की बात है कि अनेक इमारतों में भीतर एट्रियम याने आकाश की तरफ खुले आंगन बने हुए हैं जिससे ताजी हवा मिल जाती है। इनमें लिफ्ट ऐसी लगी हैं कि एक मिनट में सौ मंजिल ऊपर पहुंचा दें। ऐसी तेज रफ्तार कि सिर घूम जाए। इन्हीं के बीच रॉकफैलर प्लाजा में देखा कि जमाई गई बर्फ पर बच्चे स्केटिंग कर रहे हैं। वे जैसे इमारतों की निर्जीवता को तोड़ रहे थे। न्यूयॉर्क में ही सेंट्रल पार्क हैं, जो सीमेंट-कांक्रीट के इस नगर को हरियाली और प्राणवायु देता है। महानगरवासियों के लिए यह पार्क सैर-सपाटे के साथ-साथ मनोरंजन की बहुत सी गतिविधियों का केन्द्र है। मैनहट्टन में ही यूएन प्लाजा अर्थात् संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्यालय है। यहां हमने पहली बार मोबाइल फोन देखा। एक जापानी व्यक्ति फुटपाथ पर चलते हुए अपने फोन पर बात करते जा रहा था। भारत में इसे आने में अभी एक दशक बाकी था। 

माजिद हमें अटलांटिक सिटी दिखाने ले गए। जिस तरह पश्चिम अमेरिका में लास वेगास है उसी तरह पूर्वी तट पर अटलांटिक सिटी अपने जुआघर याने केसिनो के लिए प्रसिद्ध है। एक कई किलोमीटर लंबी सडक़ पर एक के बाद एक केसिनो बने हुए हैं। नीचे जुआघर के बड़े-बड़े हाल हैं। ऊपर ठहरने के लिए होटल के कमरे। आपने अंदर प्रवेश किया नहीं कि साफ्ट ड्रिंक और हार्ड ड्रिंक आपकी खिदमत में पेश। वे जानते हैं कि आप जब भीतर आए हैं तो अपनी जेब कुछ न कुछ हल्की करके ही जाएंगे। यहां न्यूयॉर्क तथा आसपास के अनेक नगरों से नियमित नि:शुल्क बस सेवा चलती है। केसिनो की बस है, मुफ्त में बैठकर आ जाइए, जुआ खेलिए, दिल बहलाइए, जेब खाली करिए और दुबारा आने के लिए वापिस लौट जाइए। इन बसों में आने-वाले लगभग सभी नागरिक वयोवृद्ध होते हैं और शायद एकाकी भी। अपना मन बहलाने के लिए, समय काटने के लिए क्या करें ! इसी सामाजिक स्थिति से जुड़ा एक अन्य पहलू मैंने 1977 के इंग्लैंड प्रवास में देखा था। अखबारों में विज्ञापन छपते थे कि सत्तर साल के वृद्ध या पचहत्तर साला वृद्धा को अकेलापन दूर करने के लिए साथी की आवश्यकता है। शायद ऐसा अमेरिका में भी होता हो। भारत में भी जिस तरह परिवारों का विघटन हो रहा है उसमें किसी दिन ऐसी नौबत आ जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। 

हम जब वाशिंगटन से वापस न्यूजर्सी घर लौट रहे थे तो दो और ऐसे दृश्य देखे जिनकी छाप मन पर अभी तक बनी हुई है। हमारे रास्ते में बाल्टीमोर नगर पड़ा। दोपहर का समय था। शहर की सडक़ों पर बहुत हलचल नहीं थी, लेकिन कई जगहों पर झुंड के झुंड बैठे युवक नजर आए। ये सभी अश्वेत थे। ये शायद बेरोजगार थे या कोई और कारण, यह मैं नहीं समझ पाया, लेकिन काम के दिन नौजवान खाली बैठे हों तो इसका ताल्लुक कहीं सामाजिक व्यवस्था से अवश्य रहा होगा। दूसरा दृश्य सामने आया जब माजिद ने राजमार्ग छोडक़र देहाती इलाके की एक सडक़ पकड़ ली। इस सडक़ पर एक गांव के बाहर फल और सब्जी की दुकान देखकर मैंने गाड़ी रोकने के लिए कहा। उस दुकान पर हर तरह के फल और सब्जियां मिल रहे थे। गांव में ऐसी दुकान देखकर अच्छा लगा। मैंने तस्वीर लेना चाही तो माजिद ने कहा, पहले दुकान की मालकिन से पूछ लेते हैं। याने यहां भी निजी अधिकार का मामला। उस महिला ने इजाजत तो दे दी, लेकिन उसे आश्चर्य हुआ कि दुकान का फोटो लेने में हमें क्या दिलचस्पी है।

माजिद और परवीन ने हमें अपने बहुत से दोस्तों से मिलवाया। वे सब भारतीय ही थे। रायपुर के कॉलेज के दिनों के एक मित्र राजू मल्होत्रा जो किसी सुदूर अन्य प्रांत में रहते थे, वे भी मिलने के लिए आ गए थे। मित्रों की बातचीत में पता चला कि भारत के लोग अपने देश के लोगों से ही संबंध रखना पसंद करते हैं। उनकी न तो अमेरिकी लोगों के साथ बहुत दोस्ती हो पाती और न दूसरे देश के लोगों के साथ। अमेरिका के अश्वेतों के साथ दफ्तर या कारखाने में काम भले ही करते हों, सामान्यत: घर पर आना-जाना नहीं होता है। वहां दिन-रात अंग्रेजी-बोलना पड़ती है, तो हिन्दी में बात करने के लिए तरसते हैं इसलिए बालीवुड के कलाकारों के अलावा शायरों व हास्य कवियों को न्यौता भेजकर बुलाते हैं, अपने घरों में ठहराते हैं और उसमें गर्व अनुभव करते हैं। इनके अलावा धर्मनिष्ठ भारतीय अमेरिकन घरों में स्वामियों और प्रवचनकारों का स्वागत-सत्कार होते रहता है। अब तो अमेरिका में सनातन धर्म के भव्य मंदिर बनने में लगे हैं, लेकिन जब हम गए थे तब वेस्ट वर्जीनिया के एक लगभग निर्जन इलाके में जहां जाने के लिए पक्की सडक़ भी नहीं थी,  इस्कान का मंदिर भारतीयों के बीच काफी लोकप्रिय था। मंदिर नि:संदेह भव्य था, व्यवस्थाएं उत्तम थीं, जूते उतारने की आवश्यकता नहीं थी, उसके ऊपर नायलोन के मोजे पहनकर घूम लीजिए, बाद में डस्टबिन में डाल दीजिए। इस मंदिर में बहुत स्वादिष्ट शाकाहारी भोजन प्रसाद के रूप में प्राप्त हुआ। एक हमउम्र स्वामीजी से बातचीत होने लगी, तो पता चला कि वे किसी प्रसिद्ध संस्था से एम.टेक. करने के बाद संन्यासी बन गए।

माजिद के घर एक सप्ताह रुकने के बाद बचपन के मित्र जयंत लिमये के घर कंसास सिटी जाना था। उसका फोन आ गया कि वीकएंड में आओ तो ठीक, अन्यथा सोमवार से शुक्रवार तक फुर्सत नहीं। भारत से चलने के पूर्व कार्यक्रम बन गया था तब मित्र को शायद इसका ध्यान नहीं था। हमने वहां जाने का इरादा छोड़ा और बफेलो होते हुए नियाग्रा जलप्रपात देखने जाने का फैसला किया। एयरलाइंस से माजिद ने टेलीफोन पर ही सीट बुक कर दी जिसमें काफी देर हो चुकी थी। हम दोनों को अलग-अलग पंक्तियों में बीच की सीट मिली। सहयात्री से निवेदन किया कि सीट बदल लें। उनका उत्तर था- हमने पैसे देकर सीट बुक की है, बदलेंगे नहीं। खैर ! एक डेढ़ घंटे का सफर था, कोई खास परेशानी नहीं हुई। बफेलो में हम सुभद्राकुमारी चौहान की छोटी बेटी ममता जीजी के साथ रुकने वाले थे, उनके पति अरविंद भार्गव एयरपोर्ट लेने आ गए थे। उनके साथ घर पहुंचे। वहां हमारी भेंट उनके एक अश्वेत मित्र के साथ हुई। दोनों एक ही प्रयोगशाला में साथ-साथ काम करते थे। यह हमारे देखे पहला उदाहरण था जहां एक भारतीय की एक अश्वेत नागरिक के साथ इतनी मित्रता थी कि घर आना-जाना होता था। इसके पहले और बाद में कई बार मैं देख-सुन चुका था कि हम गौरांगों की बराबरी करना चाहते हैं और अश्वेतों को अपने से कमतर समझते हैं। एक दूसरी बात जो राजू मल्होत्रा से पता चली थी कि विदेशों में बसे भारतीय अपने बेटों को तो हर तरह की छूट देते हैं, लेकिन बेटियों के मामले में अतिरिक्त और अवांछित सतर्कता बरतते हैं। राजू ने मुझसे कहा कि जब यहां रोजी-रोटी कमाने आए हैं तो हमें यहीं का होकर रहना चाहिए। मैं उसकी बात से सहमत था। 

बफेलो में अरविंद जी ने हमें नियाग्रा फाल के पास अमेरिका की सीमा पर छोड़ दिया था। एक दिन बाद वहीं वापिस मिलने की बात भी हो गई थी। अपना-अपना बैग उठाए हमने पैदल पुल पार किया। आव्रजन अधिकारियों ने पासपोर्ट, वीजा देखा और आगे जाने दिया। पुल पार करते साथ हम कनाडा की धरती पर थे- एक दूसरे देश में। नियाग्रा जलप्रपात देखने के मोह में ही हम बड़ी मशक्कत से वीजा हासिल कर यहां पहुंचे थे। घनघोर ठंड के दिन थे इसलिए पानी भी जमकर बर्फ हो गया था, लेकिन कनाडा की तरफ जलप्रपात से किसी युक्ति से भारी वेग के साथ पानी गिरता रहता है। यहां दो बातों पर ध्यान गया- एक तो कनाडा की अंग्रेजी और तकनीकी शब्दावली अमेरिका से अलग है। जैसे यहां बस को पब्लिक मूवर कहा जाता है और भी ऐसी ही अन्य संज्ञाएं। दूसरे कोई भी पर्यटन स्थल हो, दुकानदारी का बोलबाला सब जगह है। पर्यटकों को लुभाने के लिए क्या-क्या उपाय नहीं किए जाते। यद्यपि इसमें स्थान विशेष का प्राकृतिक सौंदर्य या अन्य कोई विशेषता वह खो जाती है। यह उपभोक्ता समाज की वास्तविकता है। हमने बीस दिन के प्रवास में जो कुछ देखा वह अमेरिका के समाज और प्रकृति का एक अंश भी नहीं है, लेकिन वहां के तमाम शहर और उनके बाजार लगभग एक जैसे हैं। एक को देख लिया तो सबको देख लिया। 
प्राकृतिक सौंदर्य में पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण बहुत विविधताएं हैं, लेकिन उसका पांच-दस प्रतिशत भी देखने के लिए धन और समय दोनों चाहिए। अमेरिका में आम नागरिक से सडक़ पर अगर आंखें मिल जाए तो मुस्कुराकर औपचारिक अभिवादन हो जाता है। वैसे वे अपने काम में इतने मशगूल होते हैं कि उन्हें बात करने के लिए समय नहीं होता। एक तरह की यांत्रिकता व्यवहार में परिलक्षित होती है। नागरिक अधिकारों के प्रति सचेष्टता का एक और उदाहरण है कि जहां-जहां आबादी के पास फ्लाईओवर या द्रुतगामी मार्ग है, वहां दोनों किनारों पर ध्वनिरोधक पट्टियां लंबी दूरी तक फिट की जाती हैं, ताकि रहवासियों को रफ्तार से गुजर रहे वाहनों से उठती खडख़ड़ आवाज और कंपन से तकलीफ न पहुंचे। अमेरिका में अखबार काफी प्रभाव रखते हैं। वे जनता की आवाज उठाते हैं तो सरकार को सुनना पड़ती है याने सत्ता में हमारी तरह वहां पूरी बेशर्मी नहीं है (या नहीं थी?)। जब हम पहुंचे थे तब बिल क्लिंटन नए-नए राष्ट्रपति बने थे। वे सबेरे जॉगिंग करने निकलते थे तो उनसे प्रेरणा लेकर अमेरिका के हर शहर में सुबह-सुबह जागिंग करने वालों के हुजूम सडक़ों पर उमडऩे लगे थे। पता नहीं, यह शौक अब बरकरार है या नहीं! 
अक्षर पर्व नवम्बर 2016 अंक में प्रकाशित 

Wednesday, 9 November 2016

दिल्ली में धुआँ क्यों है?



 यह पिछले हफ्ते की ही तो बात है। दो नवंबर को सुबह साढ़े ग्यारह बजे के आसपास दिल्ली विमानतल पर हवाई जहाज उतरा तो खिडक़ी से बाहर का दृश्य देखकर मैं हैरान ही नहीं हुआ बल्कि किसी हद तक भयभीत हो गया। दोपहर होने को थी जबकि ऊपर चढ़ते सूरज का प्रकाश चारों तरफ प्रखरता के साथ फैला हुआ होना चाहिए था किन्तु वहां तो नीम अंधेरा छाया हुआ था। ऐसा लग रहा था मानो कोहरे ने दिल्ली को अपनी चादर में लपेट लिया है। लेकिन यह कोहरा नहीं था जिसका सामना दिल्ली में अमूमन हर साल दिसंबर-जनवरी में करना होता है। यह तो धुआं छाया हुआ था। हवाई अड्डे से बाहर निकल कर टैक्सी में अपने गंतव्य की ओर रवाना हुआ तो भी पूरे रास्ते भर धुआं साथ-साथ चल रहा था। टैक्सी की खिड़कियों के कांच चढ़े हुए थे, लेकिन धुआं भीतर आकर फेफड़ों में समा रहा था। उस दिन शाम तक दिल्ली के आकाश से सूरज नदारद रहा, बल्कि यूं कहें कि बेदखल कर दिया गया था।

अगली सुबह मौसम कुछ खुला हुआ था, उजाला कुछ-कुछ फैल रहा था, लेकिन वातावरण में धुएं का भारीपन था, सडक़ों पर आते-जाते लोगों को देखा तो बड़ी संख्या में लोग मुंह पर मास्क याने नकाब लगाए हुए दिखे ताकि धुआं नथुनों से होकर फेफड़ों पर आक्रमण न कर सके। मैंने इसकी चर्चा कुछ  दिल्लीवासियों से की तो वे सब इस प्रदूषण से परेशान थे। मेरी बेटी ने तो मुझको यह सलाह दे दी कि आप इस मौसम में दिल्ली आया ही न करें। मेरी चिंता अपने बारे में न होकर जिनके बारे में थी उनका कहना था कि हमारे पास तो कोई विकल्प है नहीं, यहां रहना है तो इस प्रदूषण का भी सामना करना है। अलबत्ता राजधानी के निवासियों को इस बात का कोई इल्म नहीं था कि आखिरी अक्टूबर या शुरूआती नवंबर में महानगर का वातावरण इतना प्रदूषित हो जाएगा। अब उसके कारणों की पड़ताल चल रही है तो आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला भी बराए-दस्तूर चल पड़ा है।

पाठकों को ध्यान होगा कि पिछले साल दिल्ली की आप सरकार ने प्रदूषण मुक्ति के लिए वाहनों के सम-विषम नंबरों के आधार पर परिचालन का प्रयोग किया था। मेरी राय में यह एक सुविचारित कदम था जिसका अध्ययन दलीय राजनीति से अलग हटकर किया जाना चाहिए था। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो सका। सर्वोच्च न्यायालय ने भी दिल्ली में वाहन प्रदूषण की रोकथाम हेतु कुछेक निर्देश समय-समय पर दिए थे उनका भी कोई खास नतीजा नहीं निकला। कोई पन्द्रह साल पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने प्रदूषणकारी लघु और मध्यम उद्योगों को दिल्ली से बाहर ले जाने का निर्णय सुनाया था। वह भी एक आधा-अधूरा कदम साबित हुआ। अब दिल्ली के उपराज्यपाल ने अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए आप सरकार द्वारा नियुक्त पर्यावरण सचिव को हटा दिया है। इससे क्या होगा? राजधानी की सरकार निर्वाचित मुख्यमंत्री नहीं बल्कि मनोनीत उपराज्यपाल चला रहे हैं तब केजरीवाल सरकार को दोष देने में क्या औचित्य है?

दीपावली की रात से ही दिल्ली में धुआं छाने लगा था। उस समय यह समझ आया कि बड़ी मात्रा में पटाखे फोड़े जाने के कारण बारूदी जहर फैल रहा है। किन्तु एक-दो दिन बाद एक नया तर्क सामने आया कि पंजाब, हरियाणा आदि में फसल के ठूंठ जलाए जाने के कारण उसका धुआं उडक़र दिल्ली की तरफ आ रहा है। केन्द्र सरकार ने सीमावर्ती राज्यों पर दोष डाल दिया कि ये प्रदूषण रोकने के उपायों का समुचित पालन नहीं कर रहे हैं। हो सकता है कि उनकी बात सही हो, लेकिन उन दिनों हवा का बहाव दिल्ली की दिशा में याने उत्तर से दक्षिण की ओर नहीं था। खैर! हम चाहे जितने कयास लगाते रहें, समस्या उत्पन्न होने के कारण और उपचार तो विषय-विशेषज्ञ ही बता सकते हैं। इसमें दो पेंच हैं- एक तो क्या सर्व बुद्धिमान सरकार विशेषज्ञों की राय को कोई अहमियत देती है या नहीं। दूसरे- समाज का वर्चस्ववादी शक्तिसम्पन्न तबका विशेषज्ञों की राय के अलावा सरकार द्वारा बनाए गए कायदे-कानूनों को मानने के लिए तैयार है या नहीं।

हम अपने अनुभव से कह सकते हैं कि निर्वाचित सरकारों और सरकार चलाने वाले अहंकारी अधिकारियों की दृष्टि में विशेषज्ञों की राय कोई अहमियत नहीं रखती। उन्हें जो करना है वही करते हैं। और यह सिलसिला लंबे समय से चला आ रहा है। हाल के बरसों में यह मानसिकता और प्रबल हुई है। बात चाहे ताजमहल के बिल्कुल निकट तेलशोधन संयंत्र लगाने की हो, चाहे मुंबई में नमक की खेती वाले डालों पर कब्जा करने की हो, चाहे गोवा और तमिलनाडु में मैंग्रोव के कुंज काटकर भूमाफिया को जमीन देने की हो और चाहे छत्तीसगढ़ में किसानों की भूमि और बांधों का पानी उद्योगपतियों को देने की हो, या फिर ओडिशा में समुद्र तट के केतकीकुंज काटकर इस्पात का कारखाना लगाने की हो। मतलब यह कि न किसी को पर्यावरण की चिंता है, न प्राकृतिक विरासत के संरक्षण की और न भावी पीढिय़ों की सुरक्षा की। इसलिए छत्तीसगढ़ में नदी का एक हिस्सा कांग्रेस सरकार द्वारा उद्योगपति को बेच दिया जाता है किन्तु भाजपा सरकार उस ठेके को निरस्त करने का कदम नहीं उठाती।

यह तो हुई एक बात। दूसरी बात हमारी जीवन शैली से ताल्लुक रखती है। महान लेखक टाल्सटॉय ने भले ही नीति कथा लिखी हो कि मरने के बाद मनुष्य को दफनाने के लिए दो गज जमीन से अधिक की आवश्यकता नहीं होती और भले ही साधु-संत कहते हों कि इंसान खाली हाथ आता है और खाली हाथ जाता है, किन्तु आज तो ऐसा लगता है जैसे हर मरने वाला अपनी पूरी संपत्ति साथ लेकर ही ऊपर जाएगा। क्या मालूम ऊपर जाकर चित्रगुप्त को रिश्वत देना पड़े या कि धर्मराज को ताकि नरक में भी स्वर्ग का सुख मिल सके। अगर ऐसी सोच नहीं है, तो फिर यह संचय वृत्ति क्यों कर समाज में विकसित हो रही है? भारत की स्थिति तो बिल्कुल विचित्र है। भोगवादी पश्चिम में धनी-धोरी लोग अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा दान कर देते हैं, लेकिन यहां जो सत्ताइस मंजिल का महल खड़ा करते हैं वे परमार्थ के लिए कौड़ी भी खर्च नहीं करते।

भारतीय समाज में लंबे समय से संग्रहवृत्ति तो नहीं, बचत करने की आदत रही है। उसकी यह आदत देश की अर्थव्यवस्था को संतुलित करने में काफी काम आई है। लेकिन बदलते समय के साथ अब यह अच्छी आदत खत्म होते दिखाई दे रही है। नवपूंजीवाद ने इसमें खासी भूमिका निभाई है। आज के मीडिया और आज के बाजार को नवपूंजीवाद ने अपने मनमर्जी ढाला है। उसके फैलाए इंद्रजाल में लोग चाहे-अनचाहे फंसते जा रहे हैं। क्षणिक आनंद के लिए अथवा अपने अहंकार की तुष्टि के लिए अब जिस तरह गैरउत्पादक गतिविधियों में धन का अपव्यय हो रहा है वैसा बीस-पच्चीस साल पहले तो नहीं था या एक सीमा के भीतर था। दिल्ली हो या रायपुर, दीपावली पर पटाखे तो पहले भी चलाए जाते थे। तब तो धुआं आकाश पर इस तरह नहीं छाता था और न सूरज को इस तरह निगलता था। इससे यही समझ आता है कि अब लोग बिना सोचे- समझे दीवाली में आतिशबाजी पर अंधाधुंध खर्च कर रहे हैं। उन्हें इस बात की परवाह नहीं है कि इससे कितना जहर फैलेगा और जिन बच्चों की खुशियों के लिए वे ऐसा कर रहे हैं उनको ही इसका दुष्परिणाम भुगतना पड़ेगा।

हमें एक तीसरे बिन्दु पर भी ध्यान देना चाहिए। 1947 में भारत की आबादी बत्तीस करोड़ थी वह आज बढक़र एक अरब तीस करोड़ हो गई है याने चार गुने से अधिक। इस बढ़ी हुई आबादी के लिए भी सब तरह की व्यवस्थाएं चाहिए। अन्न और जल से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, यातायात और मनोरंजन तक। देश का क्षेत्रफल तो वही है जो सत्तर साल पहले था। इसका अर्थ यह हुआ कि अब प्रत्येक के हिस्से में पहले के मुकाबले एक चौथाई जमीन है। जहां एक मकान था वहां अब चार मकान चाहिए, जिसके पास एक एकड़ जमीन है अनाज और पानी की व्यवस्था करने में कोई भी योजना कारगर नहीं हो रही है, घातक रासायनिक तत्वों का प्रयोग बढ़ते जा रहा है, जंगल कट रहे हैं, यातायात व्यवस्था चरमरा रही है। नई-नई मशीनों के कारण रोजगार के अवसर घट रहे हैं और ऐसी तमाम बातें हैं। दिल्ली का धुआं एक दिन की समस्या नहीं है। इस पर सर्वांग दृष्टि से विचार करेंगे तभी हल खोज पाएंगे।

देशबंधु में 10 नवम्बर 2016 को प्रकाशित 

Wednesday, 2 November 2016

गुरु ऋण ! ये क्या होता है?



भारतीय संस्कृति में तीन ऋणों की बात कही गई है,  जिनका शोधन हर मनुष्य को अपने जीवनकाल में करना चाहिए- देवऋण, पितृऋण और गुरुऋण। देवऋण से मुक्त होने के लिए व्यक्ति अनेक उपाय करता है। पूजा-पाठ, हवन-पूजन, मंदिर जाना, तीर्थाटन करना, धर्म-अनुकूल आचरण करना याने सत्य, न्याय, विवेक के पथ पर चलना इत्यादि बातें इसमें आती हैं। विद्वान पाठक अपनी जानकारी के अनुसार इस सूची को बढ़ा सकते हैं। पितृऋण में वर्तमान समय की मान्यताओं के अनुकूल इसमें मातृऋण जोड़ लेना उचित होगा। इसके अंतर्गत माता-पिता की सेवा करना, श्रवणकुमार को अपना आदर्श मानना, वृद्धावस्था में उनके सुख का ध्यान रखना आदि का समावेश होगा। यहां भी पाठक चाहें तो संशोधन करते हुए वृद्ध, असहाय माता-पिता को वृद्धाश्रम में छोडक़र आना, वहां बीच-बीच में जाकर उनकी खोज-खबर लेने को भी उऋण होने की प्रक्रिया का अंग मान सकते हैं। अवतार, बागवान जैसी फिल्में न चाहकर भी यहां ख्याल आ जाती हैं।

अब बच गया गुरुऋण। गुरु की महिमा से भला कौन परिचित नहीं है। गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पाँय/बलिहारी गुरु आपकी, गोविंद दियो बताय, यह दोहा भला किस हिन्दी पढ़े व्यक्ति को याद न होगा। इसका उपयोग स्कूल में पढ़ते हुए निबंध लेखन में भी किया होगा, वाद—विवाद, तात्कालिक भाषण प्रतियोगिता में और बड़े होने पर शिक्षक दिवस पर लेख लिखने या स्कूल में अतिथि की आसंदी से उद्बोधन देते हुए। पश्चिमी देशों में मनाते होंगे टीचर्स डे, लेकिन हम तो 5 सितंबर को बाकायदा शिक्षक दिवस का आयोजन करते ही करते हैं। कोई-कोई गुरुजी के पास इतने शाल-श्रीफल इकट्ठे हो जाते हैं कि समझ नहीं आता, इनका क्या करें। यह गुरुऋण से मुक्त होने की सालाना जुगत है। जिनका मन इतने से नहीं भरता, वे गुरु पूर्णिमा के अवसर पर कसर पूरी कर देते हैं। इन दिनों जिसे देखो वह किसी न किसी आध्यात्मिक गुरु का शिष्य या शिष्या  नज़र आता या आती है। गुरु की सेवा कर ये शिष्य अक्सर इहलोक-परलोक दोनों की सुध ले लेते हैं।

एक ओर यह गुरुभक्ति है तो दूसरी ओर वह कहावत भी है- गुरु गुड़ रह गए, चेला शक्कर बन गया। यह कहावत शक्कर का आविष्कार होने के उपरांत चलन में आई होगी। शक्कर को वैसे उत्तर भारत में चीनी कहा जाता है। इसलिए कि इस मीठे पदार्थ का आविष्कार चीन में हुआ था, वैसे ही जैसे बारूद का। लेकिन फिलहाल उस पर बात करना ठीक नहीं। चीनी वस्तुओं का बहिष्कार करते-करते चीनी या शक्कर तक पहुंच गए तो दैनंदिन जीवन से मिठास गायब न हो जाएगी? बहरहाल, हमारी जिज्ञासा यह है कि किन परिस्थितियों में चेला शक्कर बनता है और गुरु गुड़ ही रह जाता है। गुड़ का परिष्कार करने से शक्कर निर्मित होती है। गुड़ होता है चिपचिपा, बेढब, देखो तो ढेले जैसा, रंग किसी बूढ़े की त्वचा जैसा, खाओ तो दांतों में चिपक भी जाता है। उसके मुकाबले चीनी सफेद झक्क, दाना-दाना खिला हुआ, क्या रूप, क्या सज-धज। सवाल उठता है कि यह परिष्कार कौन करता है? ऐसा क्यों होता है कि चेले का व्यक्तित्व तो निखर जाता है, लेकिन गुरु जहां  था, वहीं छोड़ दिया जाता है। तो फिर भारतीय समाज में गुरु का सही स्थान कहां है? क्या गुरु का ऋणी होना, तदनंतर उससे मुक्त होने के उपाय करना- ये सारी बातें सिर्फ कहने के लिए हैं और व्यवहार में उनका कोई उपयोग नहीं है?

एक उदाहरण से बात कुछ स्पष्ट होगी। छत्तीसगढ़ में सभी विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में नए शैक्षणिक सत्र में छात्र संघ के चुनाव संपन्न हुए। चुनावों के परिणाम 2 सितम्बर को आ गए। सहज कल्पना होती है कि विजयी छात्र नेताओं ने बिना देर किए अपना पदभार ग्रहण कर लिया होगा। लेकिन ऐसा सर्वत्र नहीं हुआ और कुछ स्थानों पर तो हास्यास्पद स्थितियां बन गईं। एक संस्थान में शपथ ग्रहण का कार्यक्रम दो बार हुआ, क्योंकि छात्रसंघ के सभी विजयी प्रत्याशी किसी एक धारा के न होकर बंटे हुए थे। छत्तीसगढ़ में लगभग हर जगह मुकाबला भाजपा की अखिल भारतीय छात्र परिषद एवं कांग्रेस के राष्ट्रीय छात्र संगठन के बीच था। जहां इनके दो, उनके दो इस तरह मिले-जुले परिणाम आए वहां शपथ ग्रहण में मुख्य अतिथि किसे बुलाया जाए, इस पर एका कायम न हो सका। दोनों छात्र संगठन, अपने-अपने राजनैतिक संरक्षकों की उपस्थिति में ही समारोह करना चाहते थे। शिक्षा परिसर में दलीय राजनीति इस हद तक हावी हो गई।

इसमें सबसे उल्लेखनीय और कदाचित शोचनीय स्थिति प्रदेश के सबसे बड़े और बावन साल पुराने पं. रविशंकर शुक्ल वि.वि. में हुई। यहां भाजपा का छात्र दल विजयी हुआ। उसने तय किया कि जिस विधानसभा क्षेत्र में वि.वि. परिसर अवस्थित है, उसके भाजपा विधायक एवं प्रदेश के रसूखदार मंत्री राजेश मूणत के मुख्य आतिथ्य में शपथ ग्रहण समारोह होगा। लेकिन जो काम 2 सितंबर याने नतीजे आने के दो-चार दिन बाद हो जाना चाहिए थे, उसमें ये दो माह लग गए। धनतेरस के दिन कार्यक्रम रखा गया। एक तो दो माह का विलंब क्यों हुआ, यही  अजब घटना थी, फिर कार्यक्रम रखना तो था तो एक बड़े त्यौहार का दिन ही क्यों चुना? यह किसी ने नहीं सोचा कि धनतेरस के दिन कितने लोग आ पाएंगे। वैसे भी चुनाव हो जाने के बाद शपथ ग्रहण में दर्शक बनने में कितने छात्रों की रुचि होती? दूसरे, मंत्रीजी जनता के आदमी हैं। उनके भाषण सब लोग आए दिन सुनते रहते हैं। घर का त्यौहार छोड़ कौन विश्वविद्यालय जाता? परिणाम? कार्यक्रम में कुल जमा दो दर्जन लोग पहुंचे। क्षीण उपस्थिति से नाराज मंत्री महोदय ने कार्यक्रम स्थगित करवा दिया और अखबारी रिपोर्ट के अनुसार कुलपति पर अपना गुस्सा उतारा।

 आप कहेंगे- इन बातों का गुरु ऋण से क्या संबंध, जिसकी खासी भूमिका मैं ऊपर बांध आया हूं। सोचकर देखिए- संबंध है कि नहीं। मैं मानता हूं कि कॉलेज के विद्यार्थियों को दलीय राजनीति में भाग लेना चाहिए। वे बालिग हंै। उन्हें मताधिकार प्राप्त है। अगर वे राजनीति में आगे नहीं आएंगे तो समाज में बदलाव कैसे आएगा। लेकिन छात्रसंघ के शपथ ग्रहण में राजनेता को बुलाने की आवश्यकता कहां है? क्या हमारे विद्यार्थियों का ध्यान अपने शैक्षिक उन्नयन पर नहीं होना चाहिए? शपथ ग्रहण एक तरह से सक्रिय राजनीति की राह पर पहला कदम है। इस अवसर पर क्या किसी विद्वान या विदुषी को नहीं बुलाया जा सकता? जो कुलपति आपके स्नातक बनने पर आपको उपाधि एवं मार्गदर्शन देकर बाहर की दुनिया में भेजता है, क्या वह या आपके महाविद्यालय का प्राचार्य शपथ ग्रहण का मुख्य अतिथि नहीं हो सकता। अपने अंचल के किसी प्रबुद्ध व्यक्ति को, किसी लेखक या कलाकार को बुलाने के बारे में क्यों नहीं सोचा जाता जिसके जीवन के विविध अनुभव ज्ञान-समृद्ध बना सकते हैं।

मुझे यह भी समझ नहीं आता कि नेतागण हर समय, हर जगह मंच पर विराजमान होने के लिए क्यों लालायित रहते हैं। ऐसा लगता है कि सत्तामोह ने अजगर की तरह इन्हें बुरी तरह से जकड़ लिया है। आप जब तक नहीं आएंगे तो नाटक शुरु नहीं होगा, संगीत सभा रुकी रहेगी; जिन पुस्तकों को आपने न पढ़ा है और न पढ़ेंगे, उनका लोकार्पण आपके करकमलों से होगा, यह कहां का न्याय है। विश्वविद्यालयों के दीक्षांत समारोह में स्थानीय विधायक, सांसद या महापौर का मंच पर क्या काम? आप श्रोताओं के साथ प्रथम पंक्ति में बैठकर समारोह की शोभा क्यों नहीं बढ़ा सकते? अभी जो प्रसंग पं. रविशंकर शुक्ल वि.वि. में हुआ, उसमें कुलपति पर मंत्री के नाराज़ होने में क्या औचित्य था? कार्यक्रम छात्रसंघ का था, वह भी आपकी पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं का।  उनकी तैयारियों में कोई कमी थी तो मंत्री उनको आगे के लिए सावधान करते। फिर वे तो अनुभवी व्यक्ति हैं। खुद क्यों नहीं सोचा कि धनतेरस के दिन कितने लोग आ पाएंगे। बल्कि उन्हें सबसे पहले तो यही विचार करना चाहिए था कि शपथ ग्रहण में दो माह का विलंब क्यों हुआ और उसकी जिम्मेदारी किसकी है?
अभी कुछ माह पूर्व भाजपा की मातृसंस्था याने संघ के प्रदेश प्रमुख ने कुलपतियों की बैठक बुलाई थी, जिस पर काफी बवाल मचा। वे श्रीमान ही शपथ ग्रहण में संघ के किसी विद्वान को मुख्य अतिथि बनाकर भेज देते तो बात बन जाती। यह पुराना प्रसंग अनायास ध्यान आ गया तो यह पूछने को भी मन कर रहा है कि कार्यवाहजी, आपको कुलपतियों की बैठक बुलाने की इतनी ही आवश्यकता थी तो उसके लिए कोई और रास्ता नहीं था। मसलन, शिक्षामंत्री के बंगले पर बैठक हो जाती। दूसरे, कुलपतियों को उनके बुलावे पर जाना भी क्यों चाहिए था। यह तो खुद होकर अपनी प्रतिष्ठा गिराना हुआ। लेकिन मैं एक बुनियादी बात समझना चाहता हूं। आजकल अधिकतर नेता पढ़े-लिखे ही होते हैं। उनके पास वि.वि. की उपाधि भी होती है। अनेक युवा नेता मौका मिलने से विधायक-मंत्री बन जाते हैं। जबकि उनके शिक्षक उसी महाविद्यालय या शाला में सेवा दे रहे होते हैं। आपका पद आपके पास, उनका पद उनके पास। क्या चुनाव जीतने मात्र से (भले ही वह छात्रसंघ का क्यों न हो) आपको इतनी बुद्धि प्राप्त हो जाती है कि आप अपने गुरुओं का अपमान या तिरस्कार करने लगें? क्या वाकई आप परिशोधित शक्कर की अवस्था को प्राप्त हो गए हैं और गुरु गुड़ से आगे नहीं बढ़ सके हैं। तब तो फिर सारे स्कूल, कॉलेज विश्वविद्यालय बंद कर सिर्फ चुनाव लडऩे के स्कूल खोल देना चाहिए।
 
देशबंधु में 03 नवम्बर 2016 को प्रकाशित 

Wednesday, 26 October 2016

उत्तर प्रदेश : कुणाल की आँखें



 हमारी पुराकथाओं में वर्णन मिलता है कि कैसे राजा ययाति ने अपनी अतृप्त वासनाओं को पूरा करने के लिए बेटे पुरु से उसका यौवन मांग लिया था। इसी सप्ताह साथी स्तंभकार प्रभाकर चौबे ने इस कथा को आधार बनाकर अपनी बात कही है। मुझे एक अन्य कथा का स्मरण हो आता है। कहा जाता है कि सम्राट अशोक की दूसरी पत्नी तिष्यरक्षिता ने अपने बेटे को राजगद्दी पर बैठाने के उद्देश्य से सौतेले बेटे कुणाल से उसकी आंखें मांगीं तो कुणाल ने विमाता की इच्छा का सम्मान करते हुए स्वयं होकर अपनी आंखें गर्म छड़ से फोड़ ली थीं। इन कथाओं में हम रामायण का प्रसंग भी जोड़ सकते हैं जब कैकेयी ने दशरथ को बाध्य कर रामचन्द्र को वनवास पर भेज दिया था। यह बात अलग है कि कैकेयी पुत्र भरत ने ज्येष्ठ भ्राता के अधिकार का हनन कर स्वयं राजा बनना मंजूर नहीं किया। यह त्रेतायुग की कथा है तो द्वापर में भी कृष्ण के देखते-देखते द्धारिका में उनके सत्तालोलुप संबंधियों के बीच युद्ध हुआ, जिसकी छाया आज भी यादवी संग्राम मुहावरे में देखी जा सकती है।

भारतीय समाज का एक मुखर वर्ग मानता है कि भारत किसी समय में विश्वगुरु था और उसने जो संस्कृति विकसित की वह अतुल्य और अद्वितीय है। किन्तु उपरोक्त चारों कथाएं कुछ और ही हकीकत बयां करती है।  भारत में सतयुग कब से कब तक था यह हमें पता नहीं, किन्तु जिस वीर बालक भरत के नाम पर इस देश का नामकरण हुआ उसके पिता दुष्यंत ने अपनी पत्नी शकुंतला को पहचानने से एक बार तो इंकार कर ही दिया था। अगर उस प्राचीन समय में सतयुग था तो वहां से त्रेता और द्वापर होते हुए हम कलयुग तक आते हैं और पाते हैं कि बहुत सारी गड़बडिय़ां अनादिकाल से ही चली आ रही है। प्रबुद्ध समाज उनका परिमार्जन कर एक आदर्श वातावरण निर्मित करने की कोशिशों में जुटा रहता है और कई बार असफल होने के बाद भी सफलता पाने के स्वप्न को छोड़ता नहीं है।

मेरे ध्यान में अचानक यह बात आई है कि श्रीकृष्ण को पूर्णपुरुष क्यों कहा जाता है? क्या इसलिए कि उन्होंने कई बार युद्धों में भाग लिया, अपने बलबूते पर विजय प्राप्त की, किन्तु सत्ता का मोह कभी नहीं पाला? मथुरा को कंस से मुक्ति दिलाई तो नाना उग्रसेन को वापिस गद्दी पर बैठाया; महाभारत में पांडवों की विजय के प्रणेता बने, लेकिन तुरंत बाद द्वारिका चले गए; वहां राज्य स्थापित किया, तो राजतिलक अग्रज बलराम का किया। यह ख्याल शायद मुझे इसलिए भी आ गया कि कल से ही दीवाली का पांच दिवसीय पर्व प्रारंभ हो रहा है। इसमें एक दिन यदि भगवान राम को समर्पित है तो तीन दिन किसी न किसी रूप में कृष्ण से जुड़े हुए हैं। नरक चौदस को उन्होंने नरकासुर का वध कर कितनी सारी महिलाओं को कैद से मुक्त करवाया था। दीपमालिका के अगले दिन याने गोवर्धन पूजा और अन्नकूट कृषि संस्कृति के देवता कृष्ण को ही समर्पित है और भाई दूज का दिन यमुना के मानवीय रूप की कथा से संबंधित है। हो सकता है कि मेरी जानकारियाँ अधूरी हों, लेकिन मैं एक तरफ जहां अनायास ही पुराकथाओं और मिथकों के संसार में भटक गया हूं वहीं दूसरी ओर इन कथाओं में कितनी सारी बातें हैं जो वर्तमान की सच्चाईयों से साक्षात्कार करवा रही हैं जैसे सत्तामोह, राजसी षडय़ंत्र, परिवारवाद इत्यादि।

उत्तर प्रदेश में चल रहे नाटक को ही देखिए। मुलायम सिंह ने 2012 में अखिलेश को क्या सोच कर मुख्यमंत्री बनाया और आज वे उनसे खफा क्यों हैं? 2010 में अमर सिंह को पार्टी से निकाला और छह साल बाद उन्हें न सिर्फ वापिस ले लिया बल्कि राज्यसभा में भी भेज दिया। मुलायम परिवार में हर बालिग व्यक्ति सत्ता के किसी न किसी पद पर है, फिर भी इतनी कलह क्यों मची हुई है? नेताजी की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता की भूमिका क्या है? उनके पुत्र को सक्रिय राजनीति से दूर क्यों रखा गया? ऐसे तमाम प्रश्न राजनीतिक गलियारों में गूंज रहे हैं। उत्तर भी तरह-तरह के सुनने मिलते हैं, लेकिन इनमें सच क्या है यह कोई भी ज्ञानी नहीं बता पा रहा है। फिर भी मुलायम सिंह के पुत्र अखिलेश सिंह से नाराजगी का एक बड़ा कारण हमारे अनुमान में है। मुलायम सिंह ने शायद सोचा था कि अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने से युवावर्ग बड़ी संख्या में सपा की ओर आकृष्ट होगा जिसका लाभ 2014 के लोकसभा चुनावों में मिलेगा और वे प्रधानमंत्री बनने के लिए सौदेबाजी करने की स्थिति में आ जाएंगे।

मुलायम सिंह यादव की प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा नई नहीं है। वे पिछले तीस साल से इसकी जुगत में लगे रहे हैं। अपने चरम लक्ष्य की पूर्ति के लिए उन्होंने बार-बार विरोधियों से भी समझौते किए हैं। एक समय जो मुलायम सिंह धर्मनिरपेक्षता पर अपने अडिग कौल के कारण व्यंग्य में मौलाना मुलायम कहकर पुकारे जाने लगे थे, आज उन्हीं पर भाजपा से भीतर-भीतर हाथ मिला लेने का संदेह किया जाता है। इसमें कोई शक नहीं कि 2014 के लोकसभा चुनावों में सपा को अपेक्षित सफलता मिलती तो वे प्रधानमंत्री पद के दावेदार हो जाते। दुर्भाग्य से यशवंतराव चव्हाण, अर्जुन सिंह, शरद पवार और मायावती की तरह वे भी राज्य की सफलता को केन्द्र में नहीं भुना सके। जयललिता, नीतीश, ममता, चन्द्राबाबू आदि नाम भी इस सूची में जोड़ सकते हैं। अब जो नहीं हुआ सो नहीं हुआ, उसके लिए अखिलेश पर गुस्सा करने से क्या फायदा?

अखिलेश यादव के सामने बहुत सारी मूर्तिमान परेशानियां हैं। ये मूर्तियां  पिता के अलावा चाचा शिवपाल, चचेरे चाचा रामगोपाल, संकटमोचक चाचा अमरसिंह, विमाता इत्यादि के रूप में हैं। इतना हम जानते हैं अखिलेश स्वयं ही मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहते थे, लेकिन जब बना दिए गए तो उन्हें सरकार चलाने के लिए पार्टी की ओर से यथेष्ट स्वतंत्रता भी मिलना चाहिए थी। जाहिर है कि इसमें उनकी राह में बार-बार रोड़े अटकाए गए, बात चाहे अधिकारियों की नियुक्ति की रही हो, चाहे मंत्री बनाने अथवा उनके विभाग तय करने की। इन बाधाओं का मुकाबला करने में अखिलेश अनेक बार असमर्थ सिद्ध हुए। उनके सामने बहुत बड़ी द्विविधा इस बात को लेकर अवश्य होगी कि पिता से कैसे टकराएं, वह भी उस पिता से जिसने उन्हें मुख्यमंत्री पद पर आसीन किया। उन्होंने जब चाचा शिवपाल तथा अन्य विरोधियों से मोर्चा लिया तो वहां भी मुलायम सिंह ढाल बनकर खड़े हो गए। ऐसे में अखिलेश को ही कई बार हथियार डालने पड़े।

स्पष्ट है कि अखिलेश के साथ पार्टी सुप्रीमो और अन्य नेतागण अन्याय कर रहे हैं किन्तु इसके लिए अखिलेश स्वयं किसी हद तक जिम्मेदार हैं। आज यदि वे मुख्यमंत्री पद छोड़ दें तो इसमें उनका नुकसान नहीं, बल्कि फायदा ही है। सच पूछें तो यह इस्तीफा उन्हें लोकसभा चुनावों में मिली करारी हार के बाद नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए दे देना चाहिए था। उस समय नहीं दिया तो अभी कुछ हफ्ते पहले जब उन्हें गायत्रीप्रसाद प्रजापति और शिवपाल सिंह को मंत्रिमंडल में वापिस लेने के लिए बाध्य किया गया तब दे देना चाहिए था। इस युवा नेता को शायद समझ नहीं आया कि अगर वह मंत्री पद छोड़ दे तो इससे उसकी प्रतिष्ठा में वृद्धि ही होगी। जो लोग पद से चिपके रहते हैं उन्हें आगे चलकर कोई भी नहीं पूछता, लेकिन जो सत्ता को ठुकराते हैं उनका सम्मान जनता की निगाह में कई गुना बढ़ जाता है। अखिलेश यहां शायद अपने आराध्य भगवान कृष्ण से प्रेरणा ले सकते थे!

खैर! अब सवाल इस बात का है कि उत्तर प्रदेश में होगा क्या? चुनाव के लिए मात्र तीन-चार माह ही बचे हैं। इस मोड़ पर समाजवादी पार्टी को यदि ययाति, तिष्यरक्षिता और कंस ही अपने आदर्श प्रतीत हो रहे हैं तो इस स्थिति में पार्टी की दुर्गति होना स्वाभाविक है। यह संभव है कि मुलायम सिंह प्रधानमंत्री न सही, राष्ट्रपति बनने के लिए भारतीय जनता पार्टी से समझौता कर लें। उनकी वे जानें। अखिलेश के रूप में उत्तर प्रदेश को एक ऊर्जावान युवा नेतृत्व प्राप्त हुआ है। इस पूंजी के भरोसे उन्हें आगे बढऩा चाहिए। अगर वे कांग्रेस और जदयू और संभव हो तो बसपा के साथ मिलकर गठजोड़ बना सकें, तो एक बेहतर तस्वीर सामने आ सकेगी। इस बीच में वरुण गांधी का चरित्र हनन करने के प्रयास हुए हैं जिसके पीछे उनकी ही पार्टी के लोगों का हाथ बतलाया जा रहा है, तो क्या वरुण अपने पुरखों की पार्टी में वापिस लौटेंगे? इस संभावना पर भी बातें हो रही हैं। उत्तर प्रदेश में यदि देशज  नेतृत्व का उभार होता है और पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर धर्मनिरपेक्ष ताकतें एक साथ आती हैं तो यह उत्तर प्रदेश की नहीं, देश की बेहतरी की बात होगी।

देशबंधु में 27 अक्टूबर 2016 को प्रकाशित 

Wednesday, 19 October 2016

बॉब डिलन : जन कवि, नोबल विजेता


 बॉब डिलन को साहित्य के लिए 2016 का नोबल पुरस्कार दिए जाने की घोषणा सुनी तो मन आनंद से भर उठा। नोबल पुरस्कार एक यूरोपीय देश स्वीडन की संस्था द्वारा दिए जाते हैं और उसके निर्णायक मंडल के अधिकतर सदस्य यूरोप की  विशिष्ट संवेदनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। यद्यपि इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए पूरी दुनिया से अनुशंसाएं आमंत्रित की जाती हैं और यह भी सच है कि पुरस्कार अनेक बार गैर-यूरोपीय लेखकों को भी दिया गया है तथापि एशिया विशेषकर दक्षिण एशिया अथवा भारतीय उपमहाद्वीप की दृष्टि से कई बार इस पुरस्कार का औचित्य समझना कठिन हो जाता है। लेखन में श्रेष्ठता के प्रति हमारा अपना नजरिया है जो देशज परिस्थितियों, निजी अनुभवों व जातीय स्मृतियों से मिलकर बना है। जो साहित्य के उत्कट अनुरागी हैं वे भले ही रसास्वाद करते हों, अधिकतर लोगों को न तो नोबल पुरस्कार विजेताओं के नाम पता होते, न उनकी पुस्तकें पढऩे में रुचि होती।

यहां स्पष्ट करना उचित होगा कि साहित्य के लिए दिया जाने वाला पुरस्कार अन्य क्षेत्रों के पुरस्कारों से सर्वथा भिन्न होता है। भौतिकशास्त्र, रसायनशास्त्र, अर्थशास्त्र में जो नोबल पुरस्कार दिए जाते हैं उनका महत्व विशेषज्ञों के बीच होता है। वे ही उसकी मीमांसा करने में समर्थ होते हैं। नोबल विजेताओं द्वारा किए गए आविष्कारों अथवा स्थापनाओं का व्यापक समाज के लिए क्या महत्व हो सकता है यह भी वे ही बताते हैं। साहित्य का मामला बिल्कुल अलहदा है क्योंकि साहित्यिक रचनाएं जनता तक पहुंचाने के लिए लिखी व प्रकाशित की जाती हैं। पाठक उनमें अपने जीवन के प्रतिबिंब तलाशते हैं, पात्रों, घटनाओं और विचारों के साथ पहचान कायम करते हैं, किसी हद तक एकसूत्रता का अनुभव करते हैं। दूसरी ओर पुरस्कार का महत्व इस बात में भी है कि प्राप्तकर्ता की उपलब्धियों से समाज व्यापक तौर पर परिचित हो सकता है। यदि किसी पुरस्कृत रचना को पाठक न मिले तो थोड़ी निराशा होना स्वाभाविक होगी।

बॉब डिलन को पुरस्कार मिलने पर आनंदित होने का कारण यही है कि वे एक विश्व-ख्याति प्राप्त कवि, संगीतकार और गायक हैं। यह प्रसिद्धि उन्हें यूं ही नहीं मिल गई है। अपने देश की सीमाओं से परे जाकर यदि उनके नाम और काम से करोड़ों लोग परिचित और प्रभावित हैं तो इसका कारण है कि वे अपनी रचनाओं में वैश्विक संवेदनाओं को समेटते और मुखरित करते हैं। अगर कहा जाए कि बॉब डिलन एक विश्व नागरिक हैं, तो गलत नहीं होगा। पचहत्तर वर्षीय बॉब डिलन पचास वर्षों से अपनी रचनात्मक प्रतिभा का परिचय देते आए हैं। उनकी कविताओं में एक ओर युवकोचित विद्रोह का स्वर है, व्यवस्था बदलने की बेचैनी है तो दूसरी ओर वे विश्व शांति का गायक बनकर उभरते हैं और तीसरी ओर उनकी कृतियों में पीडि़त मानवता के प्रति पुरजोर पक्षधरता है। दूसरे शब्दों में वे कविता या गायन को स्वान्त: सुखाय न मानकर वृहत्तर लोक कल्याण का माध्यम मानते हैं।

जैसा कि हर पुरस्कार के साथ होता है बॉब डिलन को पुरस्कार देने के निर्णय की भी कहीं-कहीं आलोचना की गई है। कुछ का कहना है कि नोबल कमेटी ने सस्ती लोकप्रियता भुनाने के चक्कर में यह पुरस्कार दे दिया है। अन्य का कहना है कि बॉब तो पहले से ही इतने लोकप्रिय हैं उन्हें पुरस्कार देने की क्या आवश्यकता थी। अप्रसन्न कुछ विद्वान कह रहे हैं कि बॉब डिलन ने जो लिखा है वह साहित्य है ही नहीं, वे तो सिर्फ एक गायक हैं। इनके अनुसार बॉब डिलन की रचनाओं को साहित्य के दायरे में मान्य करना एक अतिरेक भरा कदम है। इनमें से किसी ने कहा कि यह वैसा ही निर्णय है जैसा विंस्टन चर्चिल को साहित्य का नोबल देते समय किया गया था। चर्चिल के इतिहास लेखन व मुहावरेदार अंग्रेजी भाषणों को ही साहित्य मान लिया गया था। इस निर्णय से पुस्तक प्रकाशकों को भी बहुत निराशा हुई है।  उनके किसी लेखक को पुरस्कार मिलता तो उसकी पुस्तकों की भारी बिक्री होती और वह प्रकाशक अच्छा खासा मुनाफा कमा लेता।

बहरहाल बॉब डिलन प्रशंसा और आलोचना से परे इस घोषणा के उपरांत अमेरिका के किसी नगर में कार्यक्रम देने के लिए चले गए। उन्होंने पत्रकारों आदि से बातचीत करने में भी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। यह उनकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने पुरस्कार पर खुशी जाहिर करते हुए लिखा कि बॉब से उनकी सिर्फ एक बार मुलाकात हुई। वे अपना एक कार्यक्रम देकर मंच से उतरे, दर्शकों में बैठे, राष्ट्रपति से हाथ मिलाया और बाहर चले गए। उन्होंने राष्ट्रपति के साथ बैठने, फोटो खिंचाने आदि की जरूरत नहीं समझी। ओबामा ने लिखा कि बॉब डिलन ने वही बर्ताव किया, जो कि उन्हें करना चाहिए था। एक सृजनशील व्यक्ति के रूप में बॉब डिलन के व्यक्तित्व का सहज परिचय राष्ट्रपति ओबामा के इस संस्मरण से मिलता है। साहित्यकार अपना काम कर रहा है, सरकार अपना काम। दोनों के बीच दुआ-सलाम हो गई तो ठीक और नहीं तो उसके लिए अवसर ढूंढने की आवश्यकता भी नहीं। भारत में राजाश्रय अथवा सेठाश्रय की निरंतर तलाश में लगे लेखकों को बॉब डिलन के इस व्यवहार से आश्चर्य हो सकता है।

पुरस्कार घोषित होने के दो-तीन घंटे बाद ट्विटर पर एक रोचक टिप्पणी आई कि हो सकता है कि बॉब डिलन इस पुरस्कार को अस्वीकार कर दें। उनकी जो छवि है उसे देखकर अगर ऐसा होता  तो आश्चर्य की कोई बात न होती। किन्तु संभव है कि नोबल कमेटी ने घोषणा करने के पूर्व उनकी सहमति हासिल कर ली हो। याद कीजिए कि 1964 में महान लेखक ज्यां पाल सात्र को नोबल पुरस्कार देने की घोषणा हुई थी, जिसे उन्होंने यह कहते हुए ठुकरा दिया था कि उनके लिए इस पुरस्कार का महत्व आलू के बोरे से अधिक नहीं है। नोबल कमेटी शायद तब से सतर्कता बरत रही होगी कि उसके सामने ऐसी अनपेक्षित और अप्रिय स्थिति दुबारा न आए! प्रशंगवश भारत में सिर्फ कृष्णा सोबती का ही नाम याद आता है, जिन्होंने पद्मभूषण या पद्मविभूषण लेने से ही साफ-साफ इंकार कर दिया।

यह सही है कि बॉब डिलन को एक गायक के रूप में अधिक ख्याति प्राप्त हुई है। इसमें आश्चर्य नहीं। यदि बॉब की रचना यात्रा पर गौर किया जाए तो वे हमारे सम्मुख  एक कवि और  जनगायक के रूप में उभरते हैं। नोबल पुरस्कार विगत एक सौ सोलह वर्षों में तीन बरस छोडक़र निरंतर दिया गया है। इसे पाने वालों में अधिकतर उपन्यासकार या कथाकार ही रहे हैं। विंस्टन चर्चिल इसमें एक अपवाद हैं। दूसरा अपवाद रवीन्द्रनाथ ठाकुर हैं जिन्हें कविता संकलन गीतांजलि के लिए 1913 में पुरस्कृत किया गया। रवीन्द्रनाथ भारत ही नहीं एशिया से नोबल पुरस्कार प्राप्त करने वाले पहले व्यक्ति बने। उनकी कविताएं आज भी हमें स्पंदित करती हैं। कवि गुरु की कविताओं में मानवता, प्रकृति, लोकजीवन, बहुलतावाद का जो चित्रण हुआ है वह अद्भुत और अपूर्व है। उनकी कविताओं के गायन के लिए रवीन्द्र संगीत के नाम से एक अलग ही विधा प्रचलित हो गई है जो सुगम संगीत से ऊपर उठकर है।

बॉब डिलन की तुलना रवीन्द्रनाथ ठाकुर से करने का मन सहज हो आता है लेकिन यह तुलना बहुत दूर तक नहीं जाती। मेरी राय में बॉब डिलन के समानांतर भारत में अगर किसी को रखा जा सकता है तो वर्तमान समय में तेलगु के क्रांतिकारी कवि गदर को। वे अपनी उग्र वामपंथी राजनीति के कारण विवादों में भी रहते हैं, लेकिन उनकी कविता और गायन में जनसमुदाय को आंदोलित करने की अपार क्षमता है। अतीत में शायद मराठी के लोक गायक अमर शेख का भी स्मरण कर सकते हैं। किन्तु एक बहुभाषी देश में इनकी अपनी सीमाएं थीं-भाषा, भूगोल और राजनीति की। इसलिए कहना होगा कि नोबल कमेटी ने सचमुच पहली बार जन-जन को आंदोलित करने वाले एक लोक कवि और गायक को पुरस्कार देकर एक नई परिपाटी डाली है।

बॉब डिलन वह व्यक्ति हैं जिन्होंने बंगलादेश में मुक्ति संग्राम के दौर में 1 अगस्त 1971 को न्यूयॉर्क के मैडीसन स्क्वायर गार्डन में अपने मित्रों के साथ कंसर्ट में भाग लेकर बंगलादेश के विस्थापितों के लिए लाखों डालर की सहायता राशि एकत्र की थी। इसमें रविशंकर, अली अकबर खान, जार्ज हैरिसन, एरिक क्लेप्टन, रिंगो स्टार इत्यादि थे। यह वह समय था जब निक्सन का अमेरिका बंगलादेश में हो रहे नरसंहार से आंख मूंदे पाकिस्तान के तानाशाह याह्या खां का समर्थन कर रहा था।

अंत में बॉब डिलन की मुझे प्रिय चार पंक्तियां जिनका भावानुवाद करने का प्रयत्न मैंने किया है-
हाऊ मैनी ईयर्स मस्ट वन मैन हैव
बिफोर ही कैन हीयर पीपुल क्राई?
हाउ मैनी डैथ्स विल इट टेक टिल ही नोज
दैट टू मैनी पीपुल हैव डाइड?

(कितने कान हों एक मनुष्य के पास
इसके पहले कि सुन सके वह पीडि़तों का आर्तनाद?
कितनी मौतें हों उसके जान पाने के लिए
कि बेशुमार लोगों पर हुआ है मृत्यु का प्रहार?)

देशबंधु में 20 अक्टूबर 2016 को प्रकाशित 

Wednesday, 12 October 2016

लक्ष्यवेध पर वितंडा जारी है




भारतीय सेना ने नियंत्रण रेखा के पार जाकर 28 सितंबर को लक्ष्यवेध याने सर्जिकल स्ट्राइक की कार्रवाई को अंजाम दिया था। इस घटना को दो सप्ताह से अधिक का समय बीत गया है, किन्तु इस पर बहसों का दौर लगातार चला हुआ है। पक्ष और विपक्ष दोनों तरफ से जो बातें की जा रही हैं उन्हें देख-सुन कर कुछ धारणाएं बनती हैं। यह साफ तौर पर समझ आता है कि भारतीय जनता का सामरिक मामलों में ज्ञान लगभग नहीं के बराबर है। अधिकतर लोग यह भी नहीं जानते कि किसी देश को युद्ध की कीमत तत्काल और कालांतर में किस तरह चुकाना पड़ती है। इसके अलावा हम तर्कसंगत तरीके से यह समझने में असमर्थ हैं कि पड़ोसी देशों के साथ संबंधों में संतुलन कैसे स्थापित किया जाए। यहां हम भूगोल की सच्चाई को भुला देते हैं, इतिहास के सबक याद नहीं रखते हैं तथा भावनाओं के वशीभूत हो जाते हैं।

भारत यद्यपि अपने आपको एक शांतिप्रिय और सहिष्णु देश कहने में गौरव अनुभव करता है, लेकिन ऐसा लगता है कि अपने इन गुणों को हम धीरे-धीरे तिलांजलि दे रहे हैं। यदि हम भारत को एक सैन्य दृष्टि से मुस्तैद और सैन्य शक्तिसम्पन्न देश के रूप में देखना चाहते हैं जिससे कि सारा विश्व भय करे तो यह एक विचार अवश्य हो सकता है, लेकिन क्या भारतीय समाज इसके लिए मानसिक रूप से तैयार है? आज अमेरिका और चीन दो प्रमुख राष्ट्र हैं जिनकी आक्रामक सैन्य शक्ति से विश्व परिचित है। अतीत में जर्मनी और जापान को भी हमने देखा है। हिटलर की नाज़ी फौजों का मुकाबला जिस हिम्मत के साथ सोवियत संघ ने किया था वह भी बहुत पुरानी बात नहीं है। इन सहित कई देशों में युवाओं को अनिवार्य रूप से सेना में एक-दो साल के लिए सेवाएं देना होती हैं, लेकिन भारत में ऐसे कितने परिवार हैं जो स्वेच्छा से अपने बच्चों को मिलिटरी में भेजने को तैयार हों?

1947 से अब तक का इतिहास देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि लड़ाई का खामियाजा मुख्य तौर पर सीमावर्ती प्रदेश के परिवारों को ही भुगतना पड़ता है याने राजस्थान, पंजाब और जम्मू-कश्मीर। जो नौजवान सेना में भर्ती होते हैं उनमें से अधिकांश पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, उत्तराखंड और राजस्थान से आते हैं। मोर्चे पर वीरगति प्राप्त होने वालों में बहुतायत इनकी ही होती है। यह इनकी हिम्मत और बहादुरी है जिनके दम पर शेष भारत चैन से रह पाता है। लेकिन युद्ध का समय छोडक़र बाकी समय इनके प्रति हमारा क्या रवैया होता है? क्या यह एक कड़वी सच्चाई नहीं कि हम फिल्मी नायकों और विश्व सुंदरियों के पीछे पागलों की तरह भागते हैं, लेकिन अपने सैनिकों का पर्याप्त सम्मान कभी नहीं करते? यह एक विचित्र स्थिति है कि इस सच्चाई के बरक्स देश में युद्ध को लेकर एक उन्माद का माहौल बनाया जा रहा है। इसमें सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी के नुमाइंदे, कुछ रिटायर्ड फौजी अफसर और मीडिया का एक बड़ा हिस्सा काफी हद तक जिम्मेदार हैं। पाकिस्तान के साथ हमारे संबंध अच्छे नहीं हैं। इसके लिए स्वयं पाकिस्तान  ही मुख्यत: दोषी है। यह तथ्य छुपा नहीं है कि पाकिस्तान की ओर से जो आतंकी कार्रवाईयां या सैनिक घुसपैठ होती हैं वे निर्वाचित सरकार के कारण नहीं, बल्कि सैन्य प्रतिष्ठान के द्वारा संचालित की जाती हैं। इसकी जवाबी कार्रवाई भारत को करना पड़ती है और यह हम 1947 से अब तक लगातार करते आ रहे हैं। यह बात दीगर है कि 2014 के पहले इसका ढिंढोरा कभी नहीं पीटा गया। हमारी सेना ने अपना काम किया, बात वहीं समाप्त। चूंकि इस बार सरकार ने सर्जिकल स्ट्राइक का प्रचार किया इस वजह से यह वितंडा खड़ा हुआ। अगर सरकार संयम से काम लेती तो अनावश्यक बहसबाजी से बचा जा सकता था।

स्मरणीय है कि सभी विपक्षी दलों ने प्रारंभ में सैन्य कार्रवाई का अनुमोदन किया था। कांग्रेस के एक-दो प्रवक्ताओं ने पार्टी लाइन से हटकर बात की तो सोनिया गांधी ने दुबारा वक्तव्य जारी कर सरकार का समर्थन किया। इसके बाद भाजपा को क्या आवश्यकता थी कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भगवान राम के रूप में चित्रित करते हुए उत्तर प्रदेश में बड़े-बड़े पोस्टर चिपकाए जाते? इसमें यह भी खेदजनक था कि अरविंद केजरीवाल को विभीषण बतलाया गया। स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश और अन्य प्रदेशों में आसन्न विधानसभा चुनावों को लेकर भाजपा इस सैन्य कार्रवाई का महिमामंडन कर राजनीतिक लाभ हासिल करना चाहती है। राहुल गांधी ने इसीलिए अगर पलटवार किया तो वह भी एक राजनीतिक कदम था। इससे राहुल देशद्रोही नहीं हो जाते। सबसे घृणास्पद टिप्पणी भाजपा के एक सांसद ने की जिसमें उन्होंने राहुल गांधी की वल्दियत पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया। क्या राजनीति अब इतने  निचले स्तर पर ही होगी?

उधर संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन ने मसूद अजहर के मामले में वीटो इस्तेमाल किया तो हमारे यहां देशभक्ति के प्रमाण बतौर चीनी सामानों का बहिष्कार करने की अपीलें आने लगीं। इसके अलावा पाकिस्तानी कलाकारों को देश छोडऩे का फरमान शिवसेना ने दे दिया। उग्र भावनाओं में बहते हुए ऐसा कहने वालों ने जमीनी सच्चाई पर ध्यान नहीं दिया। अगर चीन के सामान का बहिष्कार करना है, तो फिर अमेरिका का क्यों नहीं जो विगत साठ वर्षों से पाकिस्तान को हर किस्म की इमदाद देते आया है। अमेरिका में बसे सारे भारतीय लौटकर अपने देश क्यों नहीं आ जाते?वे क्यों ग्रीनकार्ड की लालसा में लगे रहते हैं? और क्या चीन से सिर्फ दिए, पटाखे, झालर, बस यही सामान आता है? अपने इस पड़ोसी के साथ हमारा व्यापार कितना लंबा-चौड़ा है, इस पर बहिष्कार की अपील करने वालों ने गौर फरमाने की जहमत नहीं उठाई।

इन भले लोगों को कोई बताए कि मोदीजी सरदार पटेल की जो विश्व में सबसे ऊंची प्रतिमा बनवा रहे हैं, उसका लोहा चीन से आ रहा है, उसकी पूरी डिजाइन भी चीन के तकनीकीविदों ने तैयार की है। निजी क्षेत्र में लग रहे बिजली कारखानों में बड़ी संख्या में चीनी इंजीनियर काम कर रहे हैं व तकनीक भी उन्हीं की है। इन सबका क्या करेंगे? और यह कोई बहुत पुरानी बात नहीं है जब हमारे प्रधानमंत्री अहमदाबाद में चीनी राष्ट्रपति के साथ झूला झूल रहे थे। इसी तरह आप पाकिस्तानी कलाकारों को धमका कर वापिस तो भेज सकते हैं, लेकिन क्या इससे पाकिस्तानी जनता के मन में भारत के प्रति जो सदाशय है और जो लोग वहां जनतंत्र बहाली में जुटे हुए हैं उनका पक्ष कमजोर नहीं पड़ता? फिर यदि कलाकारों का आदान-प्रदान रोकना है तो पाकिस्तान के साथ हमारा जो व्यापार विनिमय चलता है उसे भी रोक देना चाहिए। उसकी बात तो कोई नहीं करता।

एक चिंताजनक बात केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने की है। उन्होंने भारत-पाक सीमा को पुख्ता तौर पर सील करने और उसमें इजराइल का सहयोग लेने की घोषणा की है। हम जानते हैं कि फिलीस्तीन की धरती पर अवैध कब्जा कर इजराइल ने वहां कांक्रीट की दीवाल खींच दी है ताकि यहूदी और मुसलमान, इजराइली और फिलीस्तीनी  दोनों एक- दूसरे से पृथक रहें। अगर भारत भी इसी रास्ते पर चलता है तो इसमें हमें आश्चर्य नहीं होगा। हमारे देश में ऐसे उदाहरण हैं जहां सवर्णों और दलितों की बस्तियों के बीच ईंट-पत्थर की दीवारें खड़ी हैं। निजी क्षेत्र में इन दिनों जो कालोनियां और अपार्टमेंट बन रहे हैं उनमें जाति और धर्म को जोड़ दिया गया है। कुछ समय पहले एक विज्ञापन था कि सिर्फ ब्राह्मणों के लिए एक नई कालोनी बन रही है। ऐसा शायद ही कोई गांव हो जहां दलितों की बस्ती सवर्ण रिहाइश से दूर न हो। अनेक समाजों ने जातिगत आधारों पर कालोनियां बनाई हैं। मुंबई महानगर में एक अपार्टमेंट बिल्डिंग में किसी मुसलमान ने मकान खरीद लिया तो उस पर आपत्ति उठ गई। यह घेट्टो या दड़बाई मानसिकता है, जो असुरक्षा व अपवित्रता के भय से उपजती है। पहले भी व्यवसाय या जाति के आधार पर मुहल्ले बसते थे लेकिन वह समय और था। आज के वैज्ञानिक युग में जहां संकुचित मानसिकता से निकलना चाहिए वहां मध्ययुग में लौटने की बात हो रही है। राजनाथ जी बताएं कि पाक सीमा पर तो कांक्रीट की दीवाल खड़ी हो जाएगी, लेकिन क्या देश के भीतर भी हर गांव और शहर में इजराइल की सलाह से ऐसी ही दीवालें खड़ी की जाएंगी?  

देशबंधु में 13 अक्टूबर 2016 को प्रकाशित 
 

Wednesday, 5 October 2016

लक्ष्यवेध पर संदेह क्यों?




लक्ष्यवेध या लक्ष्यभेद याने ‘सर्जिकल स्ट्राइक’।  इस अंग्रेज़ी संज्ञा का हिन्दी में समानार्थी शब्द ढूंढना आसान नहीं था। हमारे अंग्रेजीदां अफसर अधिकतर अंग्रेजी पदावली का ही प्रयोग करते हैं और हम मेहनत से बचने के लिए उसे यथावत उठा लेते हैं। ऐसी स्थिति बीस साल पहले नहीं थी। अब यह है कि नाम हिन्दी का लो और काम अंग्रेज़ी में करो। बहरहाल सर्जिकल स्ट्राइक पर यह चर्चा सिर्फ इसके सही अर्थ को समझने के लिए है। एक शल्य चिकित्सक याने सर्जन की कोशिश यह होती है कि रोगी का आपरेशन करते समय जितनी आवश्यक हो उससे अधिक चीरफाड़ बिल्कुल भी न की जाए। इसी विचार के कारण एंडोस्कोपी व लेज़र प्रक्रिया आदि का आविष्कार एवं प्रचलन हुआ। जब भारत ने 28 सितंबर को रात बीतने के पहले सर्जिकल स्ट्राइक करने का फैसला लिया तो उसमें यही सोच थी कि कुछ चुनिंदा आतंकी ठिकानों को नष्ट कर पाकिस्तान को संदेश दिया जाए कि उसकी ओर से हो रही आक्रामक कार्रवाईयां अब बर्दाश्त नहीं। मैंने अंग्रेज़ी संज्ञा का अनुवाद लक्ष्यभेदी आक्रमण अथवा  लक्ष्यवेध यही सोच कर किया कि जितना आवश्यक है उतना ही करना या, उससे आगे नहीं।

भारत ने इस साल जनवरी से अब तक लगातार पाकिस्तान की तरफ से हो रही आतंकी कार्रवाईयों को झेला है। इसकी शुरूआत नए वर्ष में पठानकोट में आक्रमण के साथ ही हो गई थी और वह अभी तक चालू है। इसी सप्ताह बारामूला और गुरुदासपुर में भी हमले हुए। इस पृष्ठभूमि में यदि भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ सीमित जवाबी कार्रवाई करने का फैसला किया तो उसका स्वागत होना ही चाहिए था। मीडिया में तो स्वागत हुआ ही। जैसे ही खबर फैली आम जनता ने भी खुलकर उसका स्वागत किया। कांग्रेस, कम्युनिस्ट, जदयू आदि दलों ने भी इस कार्रवाई पर भारत सरकार का समर्थन करने में कोई कमी नहीं की। सोनिया गांधी ने तत्काल एक संजीदगी भरा वक्तव्य जारी किया जिसमें उन्होंने अपने सैनिकों की भी प्रशंसा की। राहुल गांधी ने कहा कि मोदीजी ने पहली बार प्रधानमंत्री लायक काम किया है तथा कांग्रेस राष्ट्रहित में सरकार के साथ है। शरद यादव ने भी तारीफ की व सैनिकों को बधाई भेजी। सीताराम येचुरी ने स्वागत करते हुए इतना जोड़ा कि इसके आगे बातचीत से रास्ता निकालना चाहिए।

यह सब तो बहुत अच्छा हुआ। इससे पता चला कि अगर देश में कोई संकट आएगा तो राजनीतिक दल अपने मतभेद भुलाकर सरकार व सेना के साथ होंगे। यह स्वाभाविक था कि भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं, समर्थकों व चाकर पत्रकारों को सबसे ज्यादा खुशी होती। टीवी चैनल तो जैसे पागल हो गए हैं। एक सीमित कार्रवाई पर भाजपा के लोगों ने मोदीजी की प्रशंसा में जो अतिरंजना की वह आश्चर्यजनक तो नहीं किन्तु कहीं-कहीं हास्यास्पद अवश्य थी। जैसे शिवराज सिंह चौहान को यह क्यों कहना चाहिए था कि मोदीजी की छाती छप्पन इंच की नहीं, बल्कि सौ इंच की है।  इसी तरह रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर ने मोदीजी को राम, सेना को हनुमान व खुद को जामवंत बता दिया कि जामवंत ने हनुमान को उनकी शक्ति का स्मरण कराया था। श्री पार्रिकर के बयान का यह अर्थ भी निकलता है कि उनके रक्षा मंत्री बनने के पहले तक भारतीय सेना सोई हुई थी। यह अनजाने में या अतिउत्साह में सेना को कमजोर सिद्ध करने वाली बात हो गई। डॉ. रमन सिंह ने कहा कि सबसे पहले सर्जिकल स्ट्राईक हनुमानजी ने की थी। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री स्वयं अनुभवी चिकित्सक हैं, लेकिन यह तुलना उन्होंने न जाने क्या सोचकर की। इस घटनाचक्र के बीच प्रशांत भूषण का वह बयान दब गया जिसमें उन्होंने एक उच्चाधिकारी बंसल के पूरे परिवार द्वारा आत्महत्या कर लेने के मामले में उस सुसाइड नोट का मुद्दा उठाया था जिसमें प्रभावशाली व्यक्तियों पर गंभीर आरोप लगाए गए थे।

बहरहाल, ध्यातव्य है कि भारतीय सेना द्वारा किए गए लक्ष्यभेदी आक्रमण पर ऐसा नहीं है कि अनुकूल प्रतिक्रियाएं ही आई हों। देश में ही राजनीति, कूटनीति और सैन्य नीति  के अनेक अध्येताओं ने इस आक्रमण के बारे में अनेक तरह के प्रश्न उठाए हैं।  एक सवाल तो यही पूछा जा रहा है कि अगर भारतीय सेना ने सचमुच ऐसा कोई आक्रमण किया था तो उसके सबूत कहां हैं? हमारे स्पेशल कमांडो फोर्स के सैनिक सीमा पार तीन किलोमीटर तक रेंगते हुए गए और काम तमाम कर दो-ढाई घंटे के भीतर उसी तरह लौट आए, यह बात हर किसी के गले नहीं उतर रही है। इस पर भी आश्चर्य है कि भारत का एक भी सैनिक हताहत नहीं हुआ। जबकि पाकिस्तान ने हमारे एक सैनिक को पकड़ा, उसकी पहचान जारी की, जिस पर हमारा जवाब था कि सैनिक धोखे से सीमा-पार चला गया था। ऐसी सफाई पर विश्वास करना कठिन है।

पाकिस्तान ने तो भारत की ओर से ऐसी कोई कार्रवाई होने से स्पष्ट इंकार किया है। उसका कहना है कि भारत सरकार अपनी जनता को मूर्ख बना रही है। पाकिस्तान से तो खैर, इस तरह के ही वक्तव्यों की उम्मीद थी, लेकिन क्या वजह है कि देश के भीतर अनेक विशेषज्ञ और जानकार लोग लक्ष्यवेध पर संदेह प्रकट कर रहे हैं। ये लोग न तो भाजपा के विरोधी हैं, और न मोदीजी के, किन्तु मिलिट्री ऑपरेशनों के बारे में उतना ज्ञान रखते हैं जो हम जैसे सामान्य लोगों को नहीं होता। इसलिए इन्हें हम देशद्रोही वगैरह कहकर खारिज नहीं कर सकते बल्कि इनके विचारों को शांतिपूर्वक समझने की आवश्यकता है। अगर सरकार की ओर से कोई विस्तृत स्पष्टीकरण आता तब भी ठीक होता, लेकिन सरकार का तो कहना यह है कि वह समय आने पर सबूत प्रस्तुत करेगी याने सरकार की ओर से जो कहा गया है उस पर विश्वास किया जाए।

एक टीकाकार ने लिखा है कि  मोदी सरकार ने सर्जिकल स्ट्राइक के माध्यम से एक मनोवैज्ञानिक खेल खेला है। ऐसा कोई ऑपरेशन वास्तव में  हुआ या नहीं इसे कुछ देर के लिए भूल जाएं। यदि भारत की जनता इस बात से प्रसन्न और आश्वस्त होती है कि मोदी सरकार पाकिस्तान से बदला लेने में सक्षम है व हाथ पर हाथ धरे रहने की बजाय कार्रवाई कर रही है तो यही सही। कुछ अन्य टीकाकारों ने इस तथ्य की ओर ध्यान दिलाया है कि बीते वर्षों में अनेक बार ऐसे सीमित आक्रमण भारत करते रहा है, लेकिन पूर्व में इसका ढिंढोरा कभी नहीं पीटा गया। इस संबंध में पूर्व प्रसंगों के विवरण भी दिए गए हैं। कहने का आशय यह कि मोदी जी इससे राजनीतिक लाभ उठाने का प्रयत्न कर रहे हैं।

हम मानते हैं कि अगर सचमुच यह लक्ष्यभेदी आक्रमण किया गया था और वर्तमान सरकार इससे लाभ उठा रही है तो यह एक स्वाभाविक राजनीतिक प्रक्रिया है। किन्तु इसमें अगर सिर्फ प्रचार पाने की चाहत है तो आगे चलकर इसका विपरीत असर पड़ सकता है। हम उम्मीद करते हैं कि ऐसा नहीं है। इस घटनाचक्र का एक अन्य पहलू भी नज़र आता है जो शायद दूर की कौड़ी हो! पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल राहिल शरीफ तीन-चार हफ्ते बाद रिटायर हो रहे हैं। उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हैं जिसका पर्याप्त परिचय मिल चुका है। प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ऊपर से चाहे जितना खंडन करें, क्या भीतर-भीतर वे जनरल शरीफ को इस सर्जिकल स्ट्राइक के लिए दोषी ठहराकर उन्हें आगे बढऩे से रोक सकते हैं? अगर ऐसा हुआ तो क्या इसके बाद नरेन्द्र मोदी और नवाज शरीफ दोनों मिलकर बेहतर संबंधों की एक इबारत लिखेंगे?
 
देशबंधु में 06 अक्टूबर 2016 को प्रकाशित