देशबन्धु में 29 मई 2014 को प्रकाशित
Wednesday, 28 May 2014
Wednesday, 21 May 2014
कुछ यात्रा चित्र : 2
Tuesday, 20 May 2014
अब्बास और कृश्न चन्दर
इस वर्ष जिन रचनाकारों की
जन्मशती है उनमें से दो मेरे प्रिय लेखक हैं- ख्वाजा अहमद अब्बास व कृश्न
चंदर। इनका स्मरण करते हुए यह भी ध्यान आता है कि इसी माह पं.जवाहरलाल
नेहरू की पचासवीं पुण्यतिथि आएगी और सितंबर में गजानन माधव मुक्तिबोध की।
आज के समय में इन्हें याद करना पहले की अपेक्षा कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है
और आवश्यक भी। ये सब एक नए भारत और एक नई दुनिया के न सिर्फ स्वप्नदृष्टा
थे बल्कि इन्होंने अपना समूचा जीवन स्वप्न को यथार्थ में बदलने के लिए
समर्पित कर दिया। पंडित नेहरू और मुक्तिबोध जी का जहां तक सवाल है, पिछले
पचास बरस के दौरान उन पर लगातार चर्चाएं होती रही हैं, उन पर पुस्तकें लिखी
गई हैं, उनके योगदान व इतिहास में उनके स्थान पर विश्लेषण भी अपनी-अपनी
तरह से करने का प्रयत्न व्यापक स्तर पर हुआ है। इस वर्ष भी उन पर केन्द्रित
आयोजन होंगे ही होंगे। मैं फिलहाल अपनी बात अब्बास साहब और कृश्न चंदर तक
सीमित रखना चाहता हूं।
ख्वाजा अहमद अब्बास की जन्मशती पहले आएगी- 7 जून को। सत्तर के दशक में उनकी आत्मकथा ''आई एम नॉट एन आइलैण्ड" शीर्षक से प्रकाशित हुई थी। इसके एक प्रसंग की मुझे धुंधली स्मृति है। युवा अब्बास तब की बंबई में ''बॉम्बे क्रॉनिकल" नामक अखबार के नौसिखिया रिपोर्टर थे और साइकिल की सवारी कर शहर के थानों में खबरें जुटाने के लिए जाया करते थे। उन दिनों थानों में टेलीफोन भी नहीं हुआ करते थे। अपने पत्रकार जीवन के प्रारंभिक दिनों का एक और प्रसंग उन्होंने लिखा था कि जब उन्होंने एक रिपोर्ट लच्छेदार भाषा में कई पन्नों में लिख डाली तो संपादक ने उसे रद्दी की टोकरी में डाल दिया और उन्हें छोटी, फिर छोटी, फिर और छोटी रिपोर्ट बनाने के लिए कहा। यह उनके लिए एक सबक था कि पत्रकार को कम से कम शब्दों में अपनी बात कहने का अभ्यास होना चाहिए। बहरहाल उनकी आत्मकथा में जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित और प्रभावित किया वह पुस्तक का शीर्षक ही था।
सत्रहवीं सदी के प्रसिद्ध कवि जॉन डन की एक कविता की कुछ पंक्तियां इस प्रकार है -
''नो मेन इज़ एन आइलैण्ड
एन्टायर टू हिमसेल्फ एवरी मेन इज़ ए
पार्ट ऑफ द होल"
श्री अब्बास ने इस कविता से प्रेरित होकर ही अपनी पुस्तक का शीर्षक रखा था। उन्होंने पुस्तक के पहले-दूसरे पन्ने पर इन पंक्तियों को उद्धृत भी किया था। ये अर्थ प्रगल्भ पंक्तियां मनुष्य जीवन की सार्थकता को परिभाषित करती हैं।
हमने स्कूल के दिनों में पढ़ा था कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी होता है। यह कविता इस कहावत का मर्म खोलती है। संसार में कोई भी व्यक्ति द्वीप बनकर नहीं रह सकता। वह समष्टि का अंश है, अपने आप में संपूर्ण व स्वतंत्र नहीं। आज की दुनिया में जब वैयक्तिकता पर बहुत अधिक जोर दिया जा रहा है तब जॉन डन की यह कविता जीवन का दिशाबोध करवाती है। कहना न होगा कि ख्वाजा अहमद अब्बास का पूरा जीवन अपने आपको समष्टि का हिस्सा समझने में ही बीता। अपनी कलम और अन्य विधाओं के माध्यम से उन्होंने लगतार एक ऐसे समाज की रचना के लिए प्रयत्न किए जहां जन-जन के बीच भाईचारा, समता और सौहाद्र्र का भाव हो।
ख्वाजा अहमद अब्बास बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने एक पत्रकार के रूप में कैरियर की शुरूआत की और वे जीवन के अंतिम समय तक पत्रकारिता ही करते रहे, लेकिन इस बीच उन्होंने अन्य रचनात्मक विधाओं में भी अपनी प्रतिभा का भरपूर परिचय दिया। उन्होंने मुंबई के ही एक अखबार से ''द लास्ट पेज नाम से एक साप्ताहिक स्तंभ लिखना प्रारंभ किया था, जो बाद में चर्चित साप्ताहिक ब्लिट्ज में छपने लगा। यह कॉलम दोनों पत्रिकाओं में मिलाकर पचास साल से अधिक समय तक छपा। यह अपने आप में एक विश्व रिकॉर्ड है। लेकिन यहां रिकॉर्ड बनाने से ज्यादा महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि न तो अब्बास की लेखनी की धार में इस सुदीर्घ अवधि में कोई कमी आई और न ही लोकप्रियता में। सप्ताह-दर सप्ताह पाठक कॉलम के छपने का बदस्तूर इंतजार करते रहे। एक पत्रकार के रूप में उनकी लेखन क्षमता का यह एक ज्वलंत प्रमाण था। पत्रकारिता के अलावा उन्होंने कहानियां लिखीं, फिल्मों की पटकथाएं भी, फिल्म भी बनाईं और नाटक भी लिखे। दरअसल यह तय करना मुश्किल है कि एक फिल्मकार के रूप में उनका योगदान बड़ा है या पत्रकार के रूप में!
अभी पिछले साल देश में भारतीय सिनेमा की शताब्दी मनाई गई। इस पृष्ठभूमि में उल्लेख करना मुनासिब होगा कि जिस पहली भारतीय फिल्म को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति और सम्मान मिला उसके निर्माण से अब्बास जुड़े हुए थे। यह फिल्म 1946 में आजादी के एक साल पहले चेतन आनंद ने ''नीचा नगर" नाम से बनाई थी। इसकी पटकथा अब्बास ने लिखी थी। कार्लोवीवेरी अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में इसे सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए ''गोल्डन पाम" पुरस्कार मिला था। अब्बास साहब ने खुद भी फिल्में बनाई जिनमें ''शहर और सपना को 1964 की सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए ''स्वर्ण मयूर" प्राप्त हुआ था। इस फिल्म में उन लोगों की कहानी थी जो देश के दूरदराज के कोनों से रोजी-रोटी की तलाश में महानगर बंबई आते हैं अैार वहां हर मोड़ पर विपरीत परिस्थितियों से सामना करते हैं, किन्तु हार नहीं मानते। सच पूछें तो यह उनकी प्रिय थीम है जिसका परिचय उस हर फिल्म से मिलता है जिसके निर्माण से वे संलग्न रहे। पाठकों को यह पता ही है कि राजकपूर की अधिकतर फिल्मों से अब्बास साहब जुड़े हुए थे।
यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि ख्वाजा अहमद अब्बास वामपंथी विचारों के रचनाशिल्पी थे। इसलिए उनकी फिल्मों में एक ओर जहां मनुष्य जीवन की विसंगतियों और संघर्षों के वस्तुगत चित्र देखने मिलते हैं, वहीं वे इस आदर्श को लेकर आगे बढ़ती हैं कि अन्याय व शोषण के खिलाफ लड़ते हुए अंतत: विजय मनुष्यता की ही होगी। यह संदेश श्री-420 में है, बूटपालिश में है, 'जागते रहो में है और उनकी अन्य फिल्मों में भी। इसीलिए अगर एक ओर उनकी यह कहकर आलोचना की गई कि वे प्रचारात्मक फिल्में बनाते हैं, तो दूसरी ओर यह भी कहा गया कि राजकपूर की वे ही फिल्में अच्छी हैं जिनमें पटकथा अब्बास ने लिखी है। मुझे अभी ''जागते रहो" का ध्यान आ रहा है। रात के अंधेरे में किस तरह काला कारोबार पनपता है, किस तरह सफेदपोश लोग भी अपराधों में शामिल होते हैं इसका प्रामाणिक चित्रण इस फिल्म में हुआ था। एक रात में ही इस सारे गोरखधंधे को देखकर घबराया नायक बेचैन होकर भटकता-भागता है, लेकिन फिर अब्बास उसका हाथ थाम लेते हैं। मनुष्य जीवन में आशा हमेशा विद्यमान है- यह संदेश फिल्म के अंत में बहुत प्रभावी ढंग से हमें उस सुंदर गीत की पंक्तियों के साथ प्राप्त होता है- ''जागो मोहन प्यारे जागो, नवयुग चूमे नयन तुम्हारे...।"
27 मई 1964 को पंडित जवाहरलाल नेहरू का निधन हुआ था। मैं इस तिथि को स्वतंत्र भारत की राजनीति के एक परिवर्तनकारी मोड़ के रूप में देखता हूं। यह बात फिर कभी। पंडित जी की मृत्यु के कुछ समय बाद अब्बास साहब ने एक नाटक तैयार किया- ''लाल गुलाब की वापसी"। इस नाटक का प्रदर्शन देश के अनेक नगरों में हुआ। वे इसे लेकर रायपुर भी आए। इस नाटक के माध्यम से उन्होंने यही कहा कि- सामाजिक न्याय, जनतंत्र और धर्मनिरपेक्षता जैसे मूल्य इस देश की मिट्टी में रचे-बसे हैं और भारतवासी अपने संविधान में निहित इन मूल्यों पर हमेशा चलते रहेंगे।
ख्वाजा अहमद अब्बास अपने समय में उर्दू के एक जाने-माने कथाकार भी थे, इस तथ्य को लगभग भुला दिया गया है। उनकी एक कहानी ''सरदारजी" विभाजन की पृष्ठभूमि पर लिखी गई थी। इसमें उन्होंने अपनी धर्मनिरपेक्ष सोच के अनुसार ही वर्णन किया था कि एक सिख नागरिक दंगा पीडि़त मुसलमानों को बचाते हुए अपनी जान से हाथ धो बैठता है। यह कहानी बरसों बाद कमलेश्वर ने सारिका में प्रकाशित की थी। उन दिनों पंजाब में उग्रवाद चरम सीमा पर था। इस कहानी का मर्म न समझने वाले लोगों ने अब्बास साहब पर सिख विरोधी होने का आरोप लगाया व लेखन व पत्रिका दोनों के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। अब्बास साहब ने जब सार्वजनिक माफी मांगी तब मामला ठंडा पड़ा। मैंने उस समय उन्हें पत्र लिखा था कि उन्हें माफी नहीं मांगनी चाहिए थी। इसके उत्तर में उन्होंने मुझे लिखा कि कनाडा में उनके पौत्र को जान से मारने की धमकी दी गई है इसलिए वे माफी मांगने पर मजबूर हुए। आज उनकी जन्मशती पर इस कहानी को फिर से पढऩा और उसकी अन्तर्वस्तु को समझना समीचीन होगा।
कृश्न चंदर मूलत: उर्दू के लेखक थे, लेकिन वे हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में इतना छपे कि पाठकों को कभी इस सच्चाई का भान ही नहीं हुआ और वे उन्हें हिन्दी का लेखक ही मानते रहे। इसमें शायद कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि पचास व साठ के दशक में कृश्न चंदर भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय लेखक थे। उनके बाद अमृता प्रीतम का नाम लिया जा सकता है। कृश्न चंदर ने यूं तो ढेरों कहानियां, लघु उपन्यास और उपन्यास लिखे, लेकिन उनको सबसे ज्यादा लोकप्रियता हासिल हुई ''एक गधे की आत्मकथा" से। यह व्यंग्य उपन्यास 1963-64 के आसपास हाल-हाल में स्थापित हिन्द पॉकेट बुक्स से प्रकाशित हुआ था। कीमत थी मात्र एक रुपया। अनुमान ही लगाया जा सकता है कि पुस्तक की कितनी हजार प्रतियां बिकी होंगी! एक दौर था जब उर्दू जगत में तीन लेखकों का दबदबा था। सआदत हसन मंटो, राजेन्द्र सिंह बेदी और कृश्न चंदर। एक और लेखक का नाम इसी तिकड़ी के साथ जुड़ता है... अहमद शाह बुखारी का जो ''पतरस" के नाम से लिखा करते थे। श्री बुखारी इनमें वरिष्ठ थे। वे ऑल इंडिया रेडियो के डायरेक्टर जनरल थे और विभाजन के समय ही पाकिस्तान चले गए थे। इन तीनों लेखकों को रेडियो में लाने का श्रेय उनको ही जाता है। मंटो पाकिस्तान से भारत आए और फिर पाकिस्तान गए थे। उनकी जन्मशताब्दी भी पिछले साल मनाई गई थी।
उर्दू और पंजाबी के अनेक लेखकों की रचनाएं हिन्दी में लगातार छपी हैं। उन्हें पढ़कर समझ आता है कि इन भाषाओं में जो वाक् विदग्धता, वक्रोक्ति, हास्य का पुट और शब्दों का खिलवाड़ है वह ऐसा आस्वाद देती है जो हिन्दी साहित्य में सामान्यत: उपलब्ध नहीं है। हिन्दी ने गंभीरता का जो लबादा ओढ़ रखा है वह तो हरिशंकर परसाई को भी कथाकारों की पंक्ति से बाहर कर देता है, लेकिन उर्दू-पंजाबी के रचनाकारों को संभवत: इन्हीं गुणों के कारण अपार लोकप्रियता मिली है जिसका सबसे बड़ा प्रमाण कृश्न चंदर हैं। वे समाज में व्याप्त विसंगतियों, कुरीतियों, भ्रष्टाचार, धोखेबाजी, पाखंड, सफेदपोश अपराध, राजनीति के कुकर्म, सांप्रदायिकता इत्यादि का खेल-खेल में ही पर्दाफाश कर देते हैं। उनकी रचनाएं सिर्फ हंसाने और गुदगुदाने के लिए नहीं है बल्कि वे पाठक का अपने समय से साक्षात्कार कराती हैं।
मुझे कृश्न चंदर की जो पहली पुस्तक याद आती है वह है ''बावन पत्ते"। यह शायद उनका एकमात्र पूर्णाकार उपन्यास है, अन्यथा उनके बाकी उपन्यासों को लंबी कहानी की श्रेणी में भी रखा जा सकता है। ''बावन पत्ते" में उन्होंने बंबई के फिल्म जगत याने आज के बॉलीवुड में जो प्रपंच होते हैं उनका वर्णन किया है। याद रखिए कि लेखक उस दौर का बयान कर रहा है जब बॉलीवुड में आज जैसी बेहूदा और उटपटांग फिल्में नहीं बनती। इस उपन्यास में फिल्म के फाइनेंसर और प्रोड्यूसर किस तरह से कलाकारों का शोषण करते हैं, कैसे डायरेक्टर को अपने इशारों पर नचवाते हैं, कैसे अभिनेता और एक्स्ट्रा की विवशता का फायदा उठाया जाता है, ऐसी तमाम सच्चाइयों का वर्णन उपन्यास में हुआ था। इसी थीम पर उन्होंने बाद में एक-दो उपन्यास और भी लिखे। उनकी परवर्ती रचनाओं में हमें भारत के अभिजात समाज की तस्वीरें देखने मिलती हैं। इनमें कहीं नैनीताल का बोट क्लब है, कहीं महालक्ष्मी रेसकोर्स, कहीं हांगकांग में हीरों के तस्कर, तो कहीं बड़े-बड़े सटोरिए और जुए के अड्डे चलाने वाले लोग। इनके सामने दिखने वाले सभ्य-सभ्रांत जीवन के पीछे कितनी कुरूपता है पाठक उसे देख सकता है।
कृश्न चंदर की कुछ और रचनाएं महत्वपूर्ण हैं- जैसे- "हम वहशी हैं", "जब खेत जाग उठे" और "दादर पुल के बच्चे". दादर में मुंबई महानगरी की जगमगाहट के पीछे छुपे अंधेरे की कहानी है। इस उपन्यास की अंतिम पंक्ति ही पढ़ लीजिए- ''जीवन में अंतिम बार जब मैंने भगवान को देखा तो वे छ: वर्ष के एक अंधे, कमजोर बच्चे थे और शाम की लालिमा के ढलते सायों में दोनों हाथ फैलाए हुए रोते हुए पुल पर खड़े भीख मांग रहे थे।"
''हम वहशी हैं" कृश्न चंदर का कहानी संग्रह है। इसमें सात कहानियां हैं और विभाजन के दौर में हिन्दुस्तान का वर्णन करती हैं। इस संकलन की एक कहानी है- ''पेशावर एक्सप्रेस"। बंटवारे के बाद हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच आबादी का पलायन हो रहा है। हिन्दू और सिख पाकिस्तान से भागकर हिन्दुस्तान आ रहे हैं और मुसलमान हिन्दुस्तान छोड़कर पाकिस्तान की राह पकड़ रहे हैं। ऐसा माहौल है जिसमें किसी का किसी पर भरोसा नहीं है। पीढिय़ों के पड़ोसी एक-दूसरे के जान की ग्राहक हो गए हैं। जिस पेशावर एक्सप्रेस में अपनी जान की खैर मनाते लोग सवार हैं वह लाशों का बोझ ढोते हुए आपबीती सुना रही है। रामानंद सागर के उपन्यास ''और इंसान मर गया", खुशवंत सिंह के ''अ ट्रेन टू पाकिस्तान", भीष्म साहनी के ''तमस" और मंटों की ''टोबा टेकसिंह" जैसी कहानियों के समकक्ष ही इस कहानी को रखा जाना चाहिए।
कृश्न चंदर का उपन्यास ''जब खेत जागे" सुप्रसिद्ध शायर मखदूम मोइनुद्दीन को समर्पित है और तेलंगाना आंदोलन पर आधारित है। पुस्तक की भूमिका में कृश्न चंदर स्पष्ट लिखते हैं कि ''जब खेत जागे ऐसी ही क्रांतिकारी चेतना रखने वाले किसानों की कहानी है, जो अपनी धरती की रक्षा के लिए अत्याचारियों की हिंसा के विरुद्ध उठ खड़े होते हैं". इस उपन्यास में कृश्न चंदर तेलंगाना आंदोलन को नष्ट करने के लिए विनोबा भावे द्वारा चलाए गए भूदान आंदोलन की खुली आलोचना करते हैं। दूसरी ओर वे उम्मीद करते हैं कि गांव के किसान और शहर के मजदूर मिल जाएं तो अन्याय और शोषण का सिलसिला रोका जा सकता है। उपन्यास का नायक राघव किसानों का नेतृत्व करते हुए फांसी पर चढ़ जाता है, लेकिन उपन्यास इस उम्मीद के साथ खत्म होता है कि उसका बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा।
कृश्न चंदर की कृतियों से गुजरते हुए हमें उनकी लेखनी के दो रूप देखने मिलते हैं- एक- जहां वे उस पारंपरिक शिल्प का सहारा लेते हैं जो हिन्दी के अपने मुहावरे के करीब बैठता है और दो- जहां वे उर्दू-पंजाबी की बिंदास शैली का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन वे अपना वैचारिक आधार कहीं भी नहीं छोड़ते। ख्वाजा अहमद अब्बास और कृश्न चंदर दोनों के रचना संसार से गुजरते हुए यह सोचने पर मजबूर होता हूं कि एक वह दौर था जब लेखक कोरी साहित्यिक बहसों से आगे निकलकर जनसमाज के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होने में अपना श्रेय मानता था और अब यह सोचकर मन उदास हो जाता है कि आज का लेखक अपने आप में कितना सिमट गया है कितना आत्ममुग्ध, कितना आत्मकेन्द्रित, कितना प्रचारप्रिय, कितना यशलोभी। ऐसे में अब्बास और कृश्न चंदर की जन्मशती किस रूप में मनेगी?
ख्वाजा अहमद अब्बास की जन्मशती पहले आएगी- 7 जून को। सत्तर के दशक में उनकी आत्मकथा ''आई एम नॉट एन आइलैण्ड" शीर्षक से प्रकाशित हुई थी। इसके एक प्रसंग की मुझे धुंधली स्मृति है। युवा अब्बास तब की बंबई में ''बॉम्बे क्रॉनिकल" नामक अखबार के नौसिखिया रिपोर्टर थे और साइकिल की सवारी कर शहर के थानों में खबरें जुटाने के लिए जाया करते थे। उन दिनों थानों में टेलीफोन भी नहीं हुआ करते थे। अपने पत्रकार जीवन के प्रारंभिक दिनों का एक और प्रसंग उन्होंने लिखा था कि जब उन्होंने एक रिपोर्ट लच्छेदार भाषा में कई पन्नों में लिख डाली तो संपादक ने उसे रद्दी की टोकरी में डाल दिया और उन्हें छोटी, फिर छोटी, फिर और छोटी रिपोर्ट बनाने के लिए कहा। यह उनके लिए एक सबक था कि पत्रकार को कम से कम शब्दों में अपनी बात कहने का अभ्यास होना चाहिए। बहरहाल उनकी आत्मकथा में जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित और प्रभावित किया वह पुस्तक का शीर्षक ही था।
सत्रहवीं सदी के प्रसिद्ध कवि जॉन डन की एक कविता की कुछ पंक्तियां इस प्रकार है -
''नो मेन इज़ एन आइलैण्ड
एन्टायर टू हिमसेल्फ एवरी मेन इज़ ए
पार्ट ऑफ द होल"
श्री अब्बास ने इस कविता से प्रेरित होकर ही अपनी पुस्तक का शीर्षक रखा था। उन्होंने पुस्तक के पहले-दूसरे पन्ने पर इन पंक्तियों को उद्धृत भी किया था। ये अर्थ प्रगल्भ पंक्तियां मनुष्य जीवन की सार्थकता को परिभाषित करती हैं।
हमने स्कूल के दिनों में पढ़ा था कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी होता है। यह कविता इस कहावत का मर्म खोलती है। संसार में कोई भी व्यक्ति द्वीप बनकर नहीं रह सकता। वह समष्टि का अंश है, अपने आप में संपूर्ण व स्वतंत्र नहीं। आज की दुनिया में जब वैयक्तिकता पर बहुत अधिक जोर दिया जा रहा है तब जॉन डन की यह कविता जीवन का दिशाबोध करवाती है। कहना न होगा कि ख्वाजा अहमद अब्बास का पूरा जीवन अपने आपको समष्टि का हिस्सा समझने में ही बीता। अपनी कलम और अन्य विधाओं के माध्यम से उन्होंने लगतार एक ऐसे समाज की रचना के लिए प्रयत्न किए जहां जन-जन के बीच भाईचारा, समता और सौहाद्र्र का भाव हो।
ख्वाजा अहमद अब्बास बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने एक पत्रकार के रूप में कैरियर की शुरूआत की और वे जीवन के अंतिम समय तक पत्रकारिता ही करते रहे, लेकिन इस बीच उन्होंने अन्य रचनात्मक विधाओं में भी अपनी प्रतिभा का भरपूर परिचय दिया। उन्होंने मुंबई के ही एक अखबार से ''द लास्ट पेज नाम से एक साप्ताहिक स्तंभ लिखना प्रारंभ किया था, जो बाद में चर्चित साप्ताहिक ब्लिट्ज में छपने लगा। यह कॉलम दोनों पत्रिकाओं में मिलाकर पचास साल से अधिक समय तक छपा। यह अपने आप में एक विश्व रिकॉर्ड है। लेकिन यहां रिकॉर्ड बनाने से ज्यादा महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि न तो अब्बास की लेखनी की धार में इस सुदीर्घ अवधि में कोई कमी आई और न ही लोकप्रियता में। सप्ताह-दर सप्ताह पाठक कॉलम के छपने का बदस्तूर इंतजार करते रहे। एक पत्रकार के रूप में उनकी लेखन क्षमता का यह एक ज्वलंत प्रमाण था। पत्रकारिता के अलावा उन्होंने कहानियां लिखीं, फिल्मों की पटकथाएं भी, फिल्म भी बनाईं और नाटक भी लिखे। दरअसल यह तय करना मुश्किल है कि एक फिल्मकार के रूप में उनका योगदान बड़ा है या पत्रकार के रूप में!
अभी पिछले साल देश में भारतीय सिनेमा की शताब्दी मनाई गई। इस पृष्ठभूमि में उल्लेख करना मुनासिब होगा कि जिस पहली भारतीय फिल्म को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति और सम्मान मिला उसके निर्माण से अब्बास जुड़े हुए थे। यह फिल्म 1946 में आजादी के एक साल पहले चेतन आनंद ने ''नीचा नगर" नाम से बनाई थी। इसकी पटकथा अब्बास ने लिखी थी। कार्लोवीवेरी अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में इसे सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए ''गोल्डन पाम" पुरस्कार मिला था। अब्बास साहब ने खुद भी फिल्में बनाई जिनमें ''शहर और सपना को 1964 की सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए ''स्वर्ण मयूर" प्राप्त हुआ था। इस फिल्म में उन लोगों की कहानी थी जो देश के दूरदराज के कोनों से रोजी-रोटी की तलाश में महानगर बंबई आते हैं अैार वहां हर मोड़ पर विपरीत परिस्थितियों से सामना करते हैं, किन्तु हार नहीं मानते। सच पूछें तो यह उनकी प्रिय थीम है जिसका परिचय उस हर फिल्म से मिलता है जिसके निर्माण से वे संलग्न रहे। पाठकों को यह पता ही है कि राजकपूर की अधिकतर फिल्मों से अब्बास साहब जुड़े हुए थे।
यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि ख्वाजा अहमद अब्बास वामपंथी विचारों के रचनाशिल्पी थे। इसलिए उनकी फिल्मों में एक ओर जहां मनुष्य जीवन की विसंगतियों और संघर्षों के वस्तुगत चित्र देखने मिलते हैं, वहीं वे इस आदर्श को लेकर आगे बढ़ती हैं कि अन्याय व शोषण के खिलाफ लड़ते हुए अंतत: विजय मनुष्यता की ही होगी। यह संदेश श्री-420 में है, बूटपालिश में है, 'जागते रहो में है और उनकी अन्य फिल्मों में भी। इसीलिए अगर एक ओर उनकी यह कहकर आलोचना की गई कि वे प्रचारात्मक फिल्में बनाते हैं, तो दूसरी ओर यह भी कहा गया कि राजकपूर की वे ही फिल्में अच्छी हैं जिनमें पटकथा अब्बास ने लिखी है। मुझे अभी ''जागते रहो" का ध्यान आ रहा है। रात के अंधेरे में किस तरह काला कारोबार पनपता है, किस तरह सफेदपोश लोग भी अपराधों में शामिल होते हैं इसका प्रामाणिक चित्रण इस फिल्म में हुआ था। एक रात में ही इस सारे गोरखधंधे को देखकर घबराया नायक बेचैन होकर भटकता-भागता है, लेकिन फिर अब्बास उसका हाथ थाम लेते हैं। मनुष्य जीवन में आशा हमेशा विद्यमान है- यह संदेश फिल्म के अंत में बहुत प्रभावी ढंग से हमें उस सुंदर गीत की पंक्तियों के साथ प्राप्त होता है- ''जागो मोहन प्यारे जागो, नवयुग चूमे नयन तुम्हारे...।"
27 मई 1964 को पंडित जवाहरलाल नेहरू का निधन हुआ था। मैं इस तिथि को स्वतंत्र भारत की राजनीति के एक परिवर्तनकारी मोड़ के रूप में देखता हूं। यह बात फिर कभी। पंडित जी की मृत्यु के कुछ समय बाद अब्बास साहब ने एक नाटक तैयार किया- ''लाल गुलाब की वापसी"। इस नाटक का प्रदर्शन देश के अनेक नगरों में हुआ। वे इसे लेकर रायपुर भी आए। इस नाटक के माध्यम से उन्होंने यही कहा कि- सामाजिक न्याय, जनतंत्र और धर्मनिरपेक्षता जैसे मूल्य इस देश की मिट्टी में रचे-बसे हैं और भारतवासी अपने संविधान में निहित इन मूल्यों पर हमेशा चलते रहेंगे।
ख्वाजा अहमद अब्बास अपने समय में उर्दू के एक जाने-माने कथाकार भी थे, इस तथ्य को लगभग भुला दिया गया है। उनकी एक कहानी ''सरदारजी" विभाजन की पृष्ठभूमि पर लिखी गई थी। इसमें उन्होंने अपनी धर्मनिरपेक्ष सोच के अनुसार ही वर्णन किया था कि एक सिख नागरिक दंगा पीडि़त मुसलमानों को बचाते हुए अपनी जान से हाथ धो बैठता है। यह कहानी बरसों बाद कमलेश्वर ने सारिका में प्रकाशित की थी। उन दिनों पंजाब में उग्रवाद चरम सीमा पर था। इस कहानी का मर्म न समझने वाले लोगों ने अब्बास साहब पर सिख विरोधी होने का आरोप लगाया व लेखन व पत्रिका दोनों के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। अब्बास साहब ने जब सार्वजनिक माफी मांगी तब मामला ठंडा पड़ा। मैंने उस समय उन्हें पत्र लिखा था कि उन्हें माफी नहीं मांगनी चाहिए थी। इसके उत्तर में उन्होंने मुझे लिखा कि कनाडा में उनके पौत्र को जान से मारने की धमकी दी गई है इसलिए वे माफी मांगने पर मजबूर हुए। आज उनकी जन्मशती पर इस कहानी को फिर से पढऩा और उसकी अन्तर्वस्तु को समझना समीचीन होगा।
कृश्न चंदर मूलत: उर्दू के लेखक थे, लेकिन वे हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में इतना छपे कि पाठकों को कभी इस सच्चाई का भान ही नहीं हुआ और वे उन्हें हिन्दी का लेखक ही मानते रहे। इसमें शायद कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि पचास व साठ के दशक में कृश्न चंदर भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय लेखक थे। उनके बाद अमृता प्रीतम का नाम लिया जा सकता है। कृश्न चंदर ने यूं तो ढेरों कहानियां, लघु उपन्यास और उपन्यास लिखे, लेकिन उनको सबसे ज्यादा लोकप्रियता हासिल हुई ''एक गधे की आत्मकथा" से। यह व्यंग्य उपन्यास 1963-64 के आसपास हाल-हाल में स्थापित हिन्द पॉकेट बुक्स से प्रकाशित हुआ था। कीमत थी मात्र एक रुपया। अनुमान ही लगाया जा सकता है कि पुस्तक की कितनी हजार प्रतियां बिकी होंगी! एक दौर था जब उर्दू जगत में तीन लेखकों का दबदबा था। सआदत हसन मंटो, राजेन्द्र सिंह बेदी और कृश्न चंदर। एक और लेखक का नाम इसी तिकड़ी के साथ जुड़ता है... अहमद शाह बुखारी का जो ''पतरस" के नाम से लिखा करते थे। श्री बुखारी इनमें वरिष्ठ थे। वे ऑल इंडिया रेडियो के डायरेक्टर जनरल थे और विभाजन के समय ही पाकिस्तान चले गए थे। इन तीनों लेखकों को रेडियो में लाने का श्रेय उनको ही जाता है। मंटो पाकिस्तान से भारत आए और फिर पाकिस्तान गए थे। उनकी जन्मशताब्दी भी पिछले साल मनाई गई थी।
उर्दू और पंजाबी के अनेक लेखकों की रचनाएं हिन्दी में लगातार छपी हैं। उन्हें पढ़कर समझ आता है कि इन भाषाओं में जो वाक् विदग्धता, वक्रोक्ति, हास्य का पुट और शब्दों का खिलवाड़ है वह ऐसा आस्वाद देती है जो हिन्दी साहित्य में सामान्यत: उपलब्ध नहीं है। हिन्दी ने गंभीरता का जो लबादा ओढ़ रखा है वह तो हरिशंकर परसाई को भी कथाकारों की पंक्ति से बाहर कर देता है, लेकिन उर्दू-पंजाबी के रचनाकारों को संभवत: इन्हीं गुणों के कारण अपार लोकप्रियता मिली है जिसका सबसे बड़ा प्रमाण कृश्न चंदर हैं। वे समाज में व्याप्त विसंगतियों, कुरीतियों, भ्रष्टाचार, धोखेबाजी, पाखंड, सफेदपोश अपराध, राजनीति के कुकर्म, सांप्रदायिकता इत्यादि का खेल-खेल में ही पर्दाफाश कर देते हैं। उनकी रचनाएं सिर्फ हंसाने और गुदगुदाने के लिए नहीं है बल्कि वे पाठक का अपने समय से साक्षात्कार कराती हैं।
मुझे कृश्न चंदर की जो पहली पुस्तक याद आती है वह है ''बावन पत्ते"। यह शायद उनका एकमात्र पूर्णाकार उपन्यास है, अन्यथा उनके बाकी उपन्यासों को लंबी कहानी की श्रेणी में भी रखा जा सकता है। ''बावन पत्ते" में उन्होंने बंबई के फिल्म जगत याने आज के बॉलीवुड में जो प्रपंच होते हैं उनका वर्णन किया है। याद रखिए कि लेखक उस दौर का बयान कर रहा है जब बॉलीवुड में आज जैसी बेहूदा और उटपटांग फिल्में नहीं बनती। इस उपन्यास में फिल्म के फाइनेंसर और प्रोड्यूसर किस तरह से कलाकारों का शोषण करते हैं, कैसे डायरेक्टर को अपने इशारों पर नचवाते हैं, कैसे अभिनेता और एक्स्ट्रा की विवशता का फायदा उठाया जाता है, ऐसी तमाम सच्चाइयों का वर्णन उपन्यास में हुआ था। इसी थीम पर उन्होंने बाद में एक-दो उपन्यास और भी लिखे। उनकी परवर्ती रचनाओं में हमें भारत के अभिजात समाज की तस्वीरें देखने मिलती हैं। इनमें कहीं नैनीताल का बोट क्लब है, कहीं महालक्ष्मी रेसकोर्स, कहीं हांगकांग में हीरों के तस्कर, तो कहीं बड़े-बड़े सटोरिए और जुए के अड्डे चलाने वाले लोग। इनके सामने दिखने वाले सभ्य-सभ्रांत जीवन के पीछे कितनी कुरूपता है पाठक उसे देख सकता है।
कृश्न चंदर की कुछ और रचनाएं महत्वपूर्ण हैं- जैसे- "हम वहशी हैं", "जब खेत जाग उठे" और "दादर पुल के बच्चे". दादर में मुंबई महानगरी की जगमगाहट के पीछे छुपे अंधेरे की कहानी है। इस उपन्यास की अंतिम पंक्ति ही पढ़ लीजिए- ''जीवन में अंतिम बार जब मैंने भगवान को देखा तो वे छ: वर्ष के एक अंधे, कमजोर बच्चे थे और शाम की लालिमा के ढलते सायों में दोनों हाथ फैलाए हुए रोते हुए पुल पर खड़े भीख मांग रहे थे।"
''हम वहशी हैं" कृश्न चंदर का कहानी संग्रह है। इसमें सात कहानियां हैं और विभाजन के दौर में हिन्दुस्तान का वर्णन करती हैं। इस संकलन की एक कहानी है- ''पेशावर एक्सप्रेस"। बंटवारे के बाद हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच आबादी का पलायन हो रहा है। हिन्दू और सिख पाकिस्तान से भागकर हिन्दुस्तान आ रहे हैं और मुसलमान हिन्दुस्तान छोड़कर पाकिस्तान की राह पकड़ रहे हैं। ऐसा माहौल है जिसमें किसी का किसी पर भरोसा नहीं है। पीढिय़ों के पड़ोसी एक-दूसरे के जान की ग्राहक हो गए हैं। जिस पेशावर एक्सप्रेस में अपनी जान की खैर मनाते लोग सवार हैं वह लाशों का बोझ ढोते हुए आपबीती सुना रही है। रामानंद सागर के उपन्यास ''और इंसान मर गया", खुशवंत सिंह के ''अ ट्रेन टू पाकिस्तान", भीष्म साहनी के ''तमस" और मंटों की ''टोबा टेकसिंह" जैसी कहानियों के समकक्ष ही इस कहानी को रखा जाना चाहिए।
कृश्न चंदर का उपन्यास ''जब खेत जागे" सुप्रसिद्ध शायर मखदूम मोइनुद्दीन को समर्पित है और तेलंगाना आंदोलन पर आधारित है। पुस्तक की भूमिका में कृश्न चंदर स्पष्ट लिखते हैं कि ''जब खेत जागे ऐसी ही क्रांतिकारी चेतना रखने वाले किसानों की कहानी है, जो अपनी धरती की रक्षा के लिए अत्याचारियों की हिंसा के विरुद्ध उठ खड़े होते हैं". इस उपन्यास में कृश्न चंदर तेलंगाना आंदोलन को नष्ट करने के लिए विनोबा भावे द्वारा चलाए गए भूदान आंदोलन की खुली आलोचना करते हैं। दूसरी ओर वे उम्मीद करते हैं कि गांव के किसान और शहर के मजदूर मिल जाएं तो अन्याय और शोषण का सिलसिला रोका जा सकता है। उपन्यास का नायक राघव किसानों का नेतृत्व करते हुए फांसी पर चढ़ जाता है, लेकिन उपन्यास इस उम्मीद के साथ खत्म होता है कि उसका बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा।
कृश्न चंदर की कृतियों से गुजरते हुए हमें उनकी लेखनी के दो रूप देखने मिलते हैं- एक- जहां वे उस पारंपरिक शिल्प का सहारा लेते हैं जो हिन्दी के अपने मुहावरे के करीब बैठता है और दो- जहां वे उर्दू-पंजाबी की बिंदास शैली का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन वे अपना वैचारिक आधार कहीं भी नहीं छोड़ते। ख्वाजा अहमद अब्बास और कृश्न चंदर दोनों के रचना संसार से गुजरते हुए यह सोचने पर मजबूर होता हूं कि एक वह दौर था जब लेखक कोरी साहित्यिक बहसों से आगे निकलकर जनसमाज के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होने में अपना श्रेय मानता था और अब यह सोचकर मन उदास हो जाता है कि आज का लेखक अपने आप में कितना सिमट गया है कितना आत्ममुग्ध, कितना आत्मकेन्द्रित, कितना प्रचारप्रिय, कितना यशलोभी। ऐसे में अब्बास और कृश्न चंदर की जन्मशती किस रूप में मनेगी?
अक्षर पर्व मई २०१४ में प्रकाशित
Sunday, 18 May 2014
विपक्ष : आत्ममंथन का समय
भारतीय जनता पार्टी की विजय के बाद कांग्रेस व कुछ अन्य दलों ने अपनी हार पर आत्ममंथन करना प्रारंभ कर दिया है। बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सही समय पर कदम उठाते हुए शनिवार को ही अपना इस्तीफा राज्यपाल को सौंप दिया। उसके बाद जदयू के अध्यक्ष शरद यादव ने साफ-साफ कहा कि बदले हुए हालात में वे लालूप्रसाद के साथ मतभेद समाप्त करने के लिए तैयार हैं। इस बारे में जो भी फैसला होगा, वह आज का अंक छपने के पहले ही पाठकों के सामने आ जाएगा। मैं नीतीश कुमार की उनकी पहल के लिए सराहना करता हूं। उन्होंने संदेश दिया है कि सत्ता से परे भी राजनीति होती है। अगर जदयू व राजद के बीच समझौता होता है तो वह भी स्वागतयोग्य होगा। सच पूछिए तो विभिन्न समाजवादी धड़ों के बीच व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की ही लड़ाइयां थीं। उनके बीच कोई नीतिगत मतभेद तो थे नहीं। यह सच्चाई मुलायम सिंह को भी समझ आ जाए तो बेहतर है। मेरा समाजवादी पार्टी के मित्रों से आग्रह है कि उन्हें अब लोहियावादी रास्ता छोड़कर आचार्य नरेन्द्रदेव व आचार्य कृपलानी जैसों के बताए पथ पर चलना चाहिए जहां व्यक्तिगत कुंठा की नहीं, बल्कि विचारों की राजनीति हो सकती है।
बहुजन समाज पार्टी को भी इस बार भारी निराशा हाथ लगी है। लेकिन जहां मायावती ही प्रथम एवं अंतिम नेता हों, वहां कौन तो इस्तीफा देगा और कौन आत्ममंथन करेगा? कांशीरामजी ने बहुत मेहनत से, बहुत धीरज से पार्टी को खड़ा किया था और दलित समाज में उसके माध्यम से स्वाभिमान व समर्थता का बोध जाग्रत किया था। यदि बसपा अपने आपको फिर से खड़ा नहीं कर पाई तो यह एक दुर्भाग्यपूर्ण विडंबना होगी। इससे सदियों से चली आ रही रूढि़वादी मानसिकता को और पुष्ट होने का अवसर मिलेगा। मायावती ने अपने मुख्यमंत्री काल में निश्चित रूप से कुछ क्षेत्रों में प्रशासनिक क्षमता का परिचय दिया था, आज उसकी जरूरत पहले से कहीं ज्यादा है। मायावती को एक बार फिर दलित समाज के बीच जाकर अपनी पैठ बनानी होगी। उन्हें इस बात की प्रतीक्षा नहीं करना चाहिए कि दलित समाज का भाजपा से मोहभंग होगा और वे उनके पास अपने आपसे लौटकर आएंगे। हम मायावती की कार्यप्रणाली के बारे में ज्यादा नहीं जानते इसलिए बस इतना कह सकते हैं कि कांग्रेस पर या अन्य किसी पर दोष मढऩे के बजाय वे इस वक्त आत्मपरीक्षण करें।
कांग्रेस में भी सुनने आ रहा है कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी दोनों ने ही पार्टी पद छोडऩे की इच्छा जाहिर की है। मुझे लगता है कि आज की कठिन परिस्थिति में उन्हें यह कदम नहीं उठाना चाहिए। यह संभव है कि स्वास्थ्य संबंधी कारणों से सोनिया गांधी आने वाले दिनों में कोई सक्रिय भूमिका निभाने के लिए अनिच्छुक हों, लेकिन कांग्रेस का जैसा आंतरिक ढांचा है उसमें राहुल गांधी की उपस्थिति आवश्यक है। मैंने पिछले दो सालों में दो-तीन बार यह लिखा है कि राहुल गांधी संभवत: प्रधानमंत्री पद के इच्छुक नहीं हैं। मेरा अपना अनुमान था कि कांग्रेस की जीतने की स्थिति में वे प्रधानमंत्री नहीं बनते। यह बात अलग है कि मीडिया ने बार-बार राहुल को नरेन्द्र मोदी के प्रतिस्पर्धी के रूप में खड़ा कर उनका उपहास करने की कोशिश की और यह सिलसिला कांग्रेस के हार जाने के बाद भी चल रहा है। ऐसे में राहुल को रणछोड़दास नहीं बनना चाहिए। वे बार-बार अपनी दादी का जिक्र करते हैं तो उन्हें अवश्य ही यह पता है कि 1977 की हार, शाह आयोग, लोकसभा की सदस्यता समाप्त होने और जेल भेजने जैसी विपरीत परिस्थितियों का उन्होंने डटकर मुकाबला किया व 1980 में विजयी होकर वापिस लौटीं।
राहुल गांधी के पास फिलहाल अवसर है कि वे शांतचित्त होकर कांग्रेस की हार का विश्लेषण कर सकते हैं और आने वाले समय के लिए स्वयं अपनी भूमिका परिभाषित करने के साथ अपनी पार्टी के लिए भी एक नई कारगर रणनीति बना सकते हैं। इसके लिए उन्हें क्या करना होगा। शायद सबसे पहले राहुल को यह देखना चाहिए कि पहले जो गल्तियां हुईं उसके क्या कारण थे? मेरी समझ में उत्तर नेहरू युग में कांग्रेस ने तीन बड़ी गलतियां कीं। पहली, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट का विपरीत फैसला आने पर इंंदिरा गांधी ने इस्तीफा नहीं दिया। वे अगर उस दिन प्रधानमंत्री की कुर्सी छोड़ जगजीवनराम या अन्य किसी वरिष्ठ सहयोगी को प्रधानमंत्री बना देतीं तो इससे उनकी प्रतिष्ठा कई गुना बढ़ जाती। यह सब जानते हैं कि एक बहुत छोटे तकनीकी बिन्दु पर उनका चुनाव निरस्त हुआ था तथा उच्च न्यायालय का फैसला बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने पलट दिया था। वह एक पल था जहां इंदिरा गांधी चूक गईं।
कांग्रेस ने दूसरी बड़ी गलती तब की जब 1987 में हरियाणा के चुनाव हारने के बाद राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा नहीं दिया। तब 'देशबन्धु' ने अपने अग्रलेख में उन्हें पद छोडऩे की सलाह दी थी। उस दिन संयोग से राजीव गांधी की रायपुर में सभा होने वाली थी वह निरस्त हो गई। अग्रलेख पढ़कर सुबह-सुबह प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दिग्विजय सिंह और अनेक कांग्रेसी मुझे उलाहना देने घर आए कि आपसे ऐसे संपादकीय की उम्मीद नहीं थी। मेरा उत्तर था कि हम आपके शुभचिंतक हैं इसीलिए ऐसा कह रहे हैं। आज यदि राजीवजी इस्तीफा देकर नए चुनाव की सिफारिश कर दें तो कुछ घटी हुई सीटों के साथ सही कांग्रेस को फिर बहुमत मिल जाएगा। स्पष्ट है कि न तो नेताओं को हमारी सलाह पसंद आई और न ही ये बात राजीव गांधी तक पहुंच पाई।
तीसरी बड़ी गलती उस समय हुई जब टीवी चैनलों पर दिन-रात यूपीए सरकार की भ्रष्टाचार के किस्से बखाने जाने लगे और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस्तीफा नहीं दिया। दुर्भाग्य से पार्टी के अधिकतर प्रवक्ता वकील हैं तो सबके सब ''लॉ विल टेक इट्स ओन कोर्स' याने कानून अपना काम करेगा कहकर अपने नैतिक दायित्व से पल्ला झाड़ते नज़र आए। मैं डॉ. सिंह की मन:स्थिति को समझ सकता हूं कि मैदानी राजनीति से उनका कोई लेना-देना नहीं था, लेकिन आसन्न खतरे को वे सोनिया गांधी भी क्यों नहीं समझ पाईं जो लगातार जनता के बीच जाती रही हैं। क्या वे डॉ. सिंह को इस्तीफा देने की सलाह सौजन्य के वशीभूत होकर नहीं दे रही थीं या फिर उनके अपने सलाहकार उन्हें कोई दूसरी ही तस्वीर समझा रहे थे?
पिछले तीन सालों के दौरान देश के विभिन्न प्रांतों में अनेक वरिष्ठ कांग्रेसजनों के साथ मेरी निजी चर्चाएं हुईं। इन सबका कहना था कि सोनिया गांधी से उन्हें भेंट के लिए समय ही नहीं मिलता। सोनिया गांधी नहीं तो राहुल के साथ भेंट होने में क्या अड़चन थी? तो बताया गया कि वे भी लोगों से नहीं मिलते। मैं इसका एक ही अर्थ निकालता हूं कि सोनिया और राहुल के इर्द-गिर्द कुछ ऐसे लोग जमा हो गए थे जो पार्टी के नेताओं व कार्यकर्ताओं से मिलने से रोकते थे अन्यथा सोनिया, राहुल, प्रियंका तीनों का स्वभाव कुछ ऐसा है कि वे जनता के बीच जाकर प्रफुल्लता का अनुभव करते हैं। इसी बिन्दु पर आकर आज राहुल गांधी को कुछ कड़े कदम उठाने की जरूरत है, यदि वे कांग्रेस के अच्छे दिन लौटने की उम्मीद करते हैं।
यह बहुत अच्छा हुआ कि बहुत सारे कांग्रेसी तो हवा का रूख देखकर कांग्रेस छोड़कर भाजपा में चले गए। अब यह नरेंद्र मोदी का सिरदर्द है कि उनसे कैसे निपटते हैं। बहुत से नाकारा कांग्रेसी चुनाव हार भी गए हैं। इन्हें नाकारा कहना गलत होगा। असल में इनकी सारी काबलियत सिर्फ अपनी स्वार्थपूर्ति तक सीमित है जिसे देर-सबेर मतदाताओं ने पहचान ही लिया। इस तरह राहुल गांधी के पास एक अच्छा मौका है कि वे नई पीढ़ी के ऊर्जावान कांग्रेसियों को लेकर नए सिरे से अपनी टीम का गठन करें। दरअसल यूपीए-1 में भी कांग्रेस ने एक गलती की थी कि युवाओं को मनमोहन सरकार में जगह नहीं दी गई। इनमें से भी कुछ लोग हाल के चुनावों में हार चुके हैं, लेकिन राहुल को इनके साथ मिलकर एक मजबूत टीम बनाना चाहिए। सचिन पायलट, मीनाक्षी नटराजन, जितेन्द्र प्रसाद, आरपीएन सिंह इत्यादि नाम यहां ध्यान आते हैं। लेकिन इसके साथ-साथ यह परम आवश्यक है कि दिग्विजय सिंह, सलमान खुर्शीद, अजीत जोगी, सुशील कुमार शिंदे इत्यादि नेताओं को घर पर रहकर आराम करने की सलाह दी जाए। दिग्विजय सिंह और अजीत जोगी चाहे जितने वाकपटु हों, लेकिन आम जनता की छोडि़ए, स्वयं कांग्रेसी उनके उद्गारों से बेचैनी अनुभव करने लगे हैं। ऐसे नेता जिनका वाणी पर संयम न हो और जिनके वचनों पर विश्वास न बैठता हो वे पार्टी का नुकसान ही कर सकते हैं।
राहुल गांधी को नई टीम बनाने के अलावा सघन जनसंपर्क करने की भी आवश्यकता है। उन्हें चाहिए कि दिल्ली से बाहर निकलें, पूरे देश का दौरा करें, जगह-जगह लोगों से मिलें, जनता के साथ नए सिरे से संवाद स्थापित करें और मीडिया से मिलने में परहेज न करें। हां, वे मनीष तिवारी, अभिषेक मनु सिंघवी व संजय झा जैसे प्रवक्ताओं को भी थोड़ा आराम करने का मौका दें। अगले कदम के रूप में उन्हें समानधर्मा पार्टियों के साथ मिलकर एक साझा कार्यक्रम बनाना चाहिए। अगर वे ऐसा कर सके तो अगले एक साल के भीतर जो विधानसभा चुनाव होंगे उनमें कांग्रेस को सफलता मिलने की उम्मीद बन सकती है!
देशबन्धु में 19 मई 2014 को प्रकाशित
प्रधानमंत्री मोदी: प्रारंभिक चुनौतियॉं
नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि राजनीति में कोई दुश्मन नहीं होता। केवल प्रतिस्पर्धा होती है। यह बात उन्होंने समयानुकूल की है और वास्तव में उनके द्वारा ऐसा कहे जाने की आवश्यकता थी। इसलिये कि सोलहवीं लोकसभा के चुनाव अभियान में मर्यादा और शिष्टाचार को पूरी तरह से ताक पर रख दिया गया था। इस बार के चुनावों में जिस तरह से व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप लगाये गये थे वैसा पहले कभी नहीं देखा गया था और हमें यह कहने में संकोच नहीं है कि इसका दोष मुख्यत: श्री मोदी और उनकी पार्टी का ही था। श्री मोदी ने स्वयं भी अपनी ओर से विरोधियों पर निजी वार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। यहां तक कि उन्होंने बीच-बीच में चुनाव आयोग की न सिर्फ आलोचना की बल्कि उसे धमकी भी दी। आज जब श्री मोदी चुनाव जीत चुके हैं तब वे शायद यह पुनर्विचार कर रहे होंगे कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर प्रश्र चिन्ह लगाकर उन्होंने भूल तो नहीं की थी!
बहरहाल नरेन्द्र मोदी द्वारा अहमदाबाद की अभिनंदन सभा में दिये गये इस वक्तव्य के बाद उनके अति उत्साही समर्थकों को भी अब थोड़ा शांत हो जाना चाहिये। विजय के उल्लास में अगर वे मर्यादा का पालन नहीं करेंगे तो इससे उनकी साख में कमी आयेगी। मैं देख रहा हूँ कि सोशल मीडिया में सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह और राहुल गांधी पर अभद्र टिप्पणियों, अपशब्दों व कटाक्षों का अनवरत सिलसिला चला हुआ है। ऐसा करके उन्हें किस आनंद की प्राप्ति हो रही है यह समझ से परे है। भारतीय संस्कृति के झंडाबरदारों को याद रखना चाहिए कि महाभारत युद्ध भी सूर्यास्त के बाद रोक दिया जाता था। अश्वत्थथामा ने रात के समय पांडवों के खेमे में प्रवेश कर द्रौपदी के पुत्रों को मारा था जिसके फलस्वरूप उसकी आत्मा आज भी भटक रही है, ऐसा माना जाता है। मतलब यह है कि राजनैतिक लड़ाई में भी एक सीमा होती है जहां आकर हर एक को रुक जाना चाहिये।
श्री मोदी व भारतीय जनता पार्टी के लोगों को इस समय पूरा हक है कि वे जीत की खुशियाँ मनाएं, आतिशबाजी चलाएं, मिठाई बांटें लेकिन दो-चार दिन में ही सत्तारूढ़ दल को शासन की कठोर वास्तविकताओं का सामना करना पड़ेगा। भाजपा ने जनता के मन में ढेर सारी उम्मीदें जगायीं हैं। अब उन्हें इन उम्मीदों को पूरा करने के लिये नीतियां व कार्यक्रम बनाने पड़ेंगे व उन्हें लागू भी करना होगा। एक तो मोदीजी ने भ्रष्टाचार मुक्त भारत का सपना दिखलाया है। यह एक ऐसा वादा है जिस पर अमल करना बेहद कठिन क्या, लगभग असंभव है। लोकपाल वगैरह से भी इसमें कुछ ज्यादा होना जाना नहीं है। श्री मोदी शायद इतना तो कर सकते हैं कि केन्द्र सरकार के कामकाज में भ्रष्टाचार सीमित हो जाये लेकिन जिन मंत्रियों, अधिकारियों व बाबूओं पर सरकार चलाने की जिम्मेदारी है, क्या रातों-रात उनका हृदय परिवर्तन हो जायेगा? जिन कार्पोरेट घरानों ने श्री मोदी पर दांव लगाया है, क्या वे अपने समर्थन की कीमत नहीं वसूलेेंगे? फिर प्रदेशों के स्तर पर जो भ्रष्टाचार व्याप्त है उसे कौन दूर करेगा?
जीत की खुशी में इस तथ्य को नहीं भूलना चाहिये कि भाजपा से ही श्री येदियुरप्पा व श्री श्रीरामलु जैसे उम्मीदवार जीत कर आये हैं। कांग्रेस से भी महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने जीत दर्ज की है जिन्हें आदर्श घोटाले के कारण पद छोडऩा पड़ा था। यह तो दो-तीन नाम याद आ गये लेकिन इनके जैसे और भी बहुत से लोग चुने गये हैं जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। इसी क्रम में यह भी ध्यान दें कि कितने सारे दलबदलू मोदीजी की कृपा से चुनाव जीते हैं। जैसे होशंगाबाद से राव उदय प्रताप सिंह, भिंड से भागीरथ प्रसाद, बाड़मेर से कर्नल सोनाराम, डुमरिया गंज से जगदम्बिका पाल इत्यादि। ऐन चुनाव के समय पार्टी बदलने वाले इन लोगों को अवसरवादी ही कहना होगा तथा उनके ऐसा करने का मकसद यही था कि जहाँ मलाई मिल रही है वहाँ चले चलो। जाहिर है कि भ्रष्टाचार दूर करना एक बहुत बड़ी चुनौती होगी।
श्री मोदी के सामने दूसरी बड़ी चुनौती मंहगाई कम करने की है। मेरा सामान्य ज्ञान कहता है कि मंहगाई दो तरह से है। एक तो खाद्यान्न की मंहगाई, दूसरी अन्य जरूरतों की - जिसमें बच्चों की शिक्षा, मोबाईल फोन, बाइक का पेट्रोल आदि शामिल है। खाद्यान्न की कीमतें बढऩे का एक बड़ा कारण किसानों को बेहतर समर्थन मूल्य मिलना है। पिछले सालों में गेहूं, चावल आदि जिन्सों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में लगातार वृद्धि हुई है जिसके कारण अनाज मंहगा हुआ है। अब सरकार समर्थन मूल्य तो घटा नहीं सकती तब खाद्यान्न पर सब्सिडी देना ही एक विकल्प दिखाई देता है। देखना यह होगा कि क्या केन्द्र सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली में वांछित सुधार ला सकती है। फिर इस सब्सिडी का बोझ कितना होगा व वह कैसे पूरा किया जायेगा? याद रखें कि सस्ते अनाज के कारण छत्तीसगढ़ जैसे उच्च राजस्व प्राप्ति वाले प्रदेश पर भी भारी कर्ज लद गया है।
जहॉं तक खाद्यान्नेतर वस्तुओं और सुविधाओं से मंहगाई का सवाल है इस में भी पेचीदगी है। आर्थिक उदारीकरण के दौर में पिछले 25 सालों में लगातार शिक्षा और स्वास्थ्य याने दो अत्यंत जरूरी सेवाओं में निजीकरण बढ़ता जा रहा है। निजी क्षेत्र के स्कूलों व अस्पतालों को न तो बंद किया जा सकता है और लाख कोशिशें की जायें उन पर कोई नियंत्रण भी संभव दिखाई नहीं देता है। आज के समय में बाइक व मोबाईल फोन शान की नहीं, एक तरह से दैनंदिन जीवन की आवश्यकता बन चुकी है। इसके अलावा उपभोग की ललचाने वाली नई-नई सामग्रियाँ बाजार में आ गई हैं। इनके कारण परिवारों का बजट जिस तरह बिगड़ रहा है क्या उसे सरकार संभाल सकती है? इसी तरह दो अन्य बिंदु विचारणीय हैं। एक तो देश को अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत पेट्रोलियम आयात करना पड़ता है। याने इसके भावों में वृद्धि पर सरकार का कोई नियंत्रण हो ही नहीं सकता। दूसरे मनमोहन सरकार ने सातवां वेतन आयोग स्थापित कर दिया है। इसकी सिफारिशें जिस दिन आयेंगी, कहर बरपा हो जायेगा। वेतन आयोग से सिर्फ कुछ लाख सरकारी कर्मचारियों को फायदा होता है लेकिन उससे जो मंहगाई बढ़ती है उसका खामियाजा न्यूनतम आय वर्ग को भी भुगतना पड़ता है। क्या श्री मोदी सातवें वेतन आयोग को समाप्त करने का निर्णय ले सकेंगे?
श्री मोदी के सामने तीसरी बड़ी चुनौती बेरोजगारी दूर करने की है। इसका वायदा भी उन्होंने जगह-जगह किया है। आने वाले दिनों में हम देखना चाहेंगे कि नये प्रधान मंत्री इस मोर्चे पर क्या कर दिखाते हैं? यदि उद्योगों को देखें तो वहां रोजगार के नये अवसर बेहद कम हैं। नई से नई तकनीकी से काम होता है जिसमें श्रमिकों की न्यूनतम आवश्यकता पड़ती है। इसके अलावा कारखानेदार हमेशा सस्ती मजदूरी पर काम करवाना चाहते हैं। भारत के उद्यमी इसीलिये चीन जाकर कारखाने डाल रहे हैं।
उद्योग लॉबी अभी से बहुत सारे श्रमिक सुरक्षा कानूनों को खत्म करने की मांग कर रही है। यही लॉबी श्री मोदी की सबसे मजबूत समर्थक है। ऐसे में यह द्विविधा स्वाभाविक ही होगी कि उद्योगों की मांगें किस हद तक मानी जायें? सरकार सड़कें और भवन निर्माण आदि की बड़ी योजनाएं हाथ में लेकर रोजगार के नये अवसरों का बड़ी मात्रा में सृजन कर सकती है, लेकिन भाजपा सरकार यह काम निश्चित रूप से निजी क्षेत्र की भागीदारी में ही करेंगी। ऐसे में जो रोजगार मिलेगा वह कितना पर्याप्त और संतोषदायी होगा इस बारे में शंका होती है। फिलहाल हम अपनी बात यहीं रोक रहे हैं। अन्य चुनौतियों की बात आगे करेंगे।
Friday, 16 May 2014
नरेन्द्र मोदी की प्रामाणिक जीत
सोलहवीं लोकसभा के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने प्रामाणिक व असंदिग्ध रूप से जीत हासिल की है तथा कांग्रेस को शोचनीय ढंग से पराजय का सामना करना पड़ा है। भाजपा (जनसंघ) के बासठ साल के जीवन में यह पहला अवसर है जब उसे ऐसा स्पष्ट जनादेश प्राप्त हुआ है। जबकि कांग्रेस को इतनी कम सीट मिलना आश्चर्यजनक ही नहीं, अप्रत्याशित भी है। पहली नज़र में ऐसा प्रतीत होता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व भारतीय जनता पार्टी ने नरेन्द्र मोदी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में सामने करने की जो रणनीति बनाई यह जीत उसका परिणाम है। श्री मोदी को एक कुशल प्रशासक व एक दृढ़निश्चयी नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिसका लाभ इस जीत के रूप में मिला। दूसरी तरफ कांग्रेस व अन्य विपक्षी दलों ने श्री मोदी को रोकने के लिए जो भी दांव चले वे एक के बाद एक उल्टे पड़ते गए। इसके साथ यह ध्यान देने योग्य है कि नरेन्द्र मोदी को देश के कारपोरेट घरानों का व पूंजीमुखी मीडिया का भी खुला समर्थन मिला। संघ के सदस्यों ने भी पूरे उत्साह के साथ रणनीति के तहत काम किया एवं कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी।
कांग्रेस की जो दुर्गति हुई है उसके लिए वह स्वयं जिम्मेदार है, ऐसा कहना गलत नहीं होगा। हमने पिछले सालों में बार-बार कहा है कि कांग्रेस जब हारती है तो हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाती है कि जनता खुद-ब-खुद किसी दिन उसके पास आएगी और गद्दी सौंप देगी। और जब जीतती है तो उसके नेताओं का अहंकार सिर चढ़ कर बोलने लगता है। यूपीए-1 और यूपीए-2 की तुलना करें तो यही समझ आता है कि 2009 की जीत के बाद कांग्रेस के अहंकार की मानो कोई सीमा ही नहीं रही थी। 2010-2011 में भ्रष्टाचारों के अभूतपूर्व प्रकरण सामने आने पर हमने एकाधिक बार लिखा था कि डॉ. मनमोहन सिंह को नैतिकता के आधार पर प्रधानमंत्री पद छोड़ देना चाहिए, लेकिन वैसा नहीं हुआ। इसके अलावा न कांग्रेस अध्यक्ष और न प्रधानमंत्री दोनों ही ने जनता के साथ सीधे संवाद करने की, यहां तक कि पत्रवार्ता करने की, कोई जरूरत समझी। कुल मिलाकर वे अपने ही बनाए घेरे में कैद होकर रह गए, जिसकी पहरेदारी कुछ चाटुकार कांग्रेसी करते रहे। परिणाम सामने है।
नरेन्द्र मोदी की ऐतिहासिक जीत के तीन प्रमुख तथ्य दिखाई देते हैं। एक तो ये चुनाव संसदीय प्रणाली के बजाय राष्ट्रपति प्रणाली की शैली में हुए हैं। ऐसा पहली बार हुआ। पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों में भी कद्दावर छवि के नेता हुए, लेकिन श्री मोदी ने जिस तरह पार्टी को अप्रासंगिक बना दिया वैसा पहली बार हुआ। इससे आशंका उपजती है कि आगे चलकर कहीं संविधान संशोधित करने की बात तो नहीं होगी! यह तथ्य गौरतलब है कि देश के सबसे बड़े प्रांत उत्तरप्रदेश में नरेन्द्र मोदी ने चुनाव की कमान किसी स्थानीय नेता के बजाय अपने विश्वस्त अमित शाह को दी। इसके अलावा उन्होंने पार्टी के पुराने अनुभवी नेताओं की एक तरह से लगातार अनसुनी की और यह सिद्ध किया कि वे अपनी मर्जी के मालिक हैं। दूसरे शब्दों में चुनाव व्यक्ति-केन्द्रित सिद्ध हुए। दूसरे, युवा मतदाताओं ने नरेन्द्र मोदी की बदलाव लाने की क्षमता पर विश्वास करते हुए उन्हें भरपूर समर्थन दिया। कहना होगा कि कांग्रेस युवा पीढ़ी की भावनाएं समझने में असफल हुई।
तीसरे, श्री मोदी ने प्रसार माध्यमों व सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल किया। यह काम बहुत योजनाबद्ध तरीके से हुआ। कांग्रेस ने इसका जवाब देने की कोशिश की, लेकिन आधे-अधूरे ढंग से। कांग्रेस के प्रवक्ता आत्मुग्धता की स्थिति से बाहर नहीं निकल पाए। मोदी टीम के आक्रमणों का जवाब विचार और भाषा दोनों स्तर पर कैसे दिया जाए यह उनको आखरी तक समझ नहीं पड़ा। कांग्रेस से सहानुभूति रखते हुए इतना जरूर कहा जा सकता है कि समाचार चैनलों ने उसका साथ नहीं दिया। यूं इसमें शिकायत की कोई बात नहीं होना चाहिए। चैनल को अधिकार है कि वह अपनी इच्छा से किसी पार्टी या दल का समर्थन या विरोध करे, लेकिन फिर उसे निष्पक्षता का नाटक नहीं करना चाहिए।
बहरहाल, 1984 के बाद याने पूरे तीस साल बाद कोई एक पार्टी पूर्ण बहुमत लेकर लोकसभा में आ रही है। यह किसी हद तक संतोषदायक है। भाजपा को अथवा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अब अपनी नीतियों और सिद्धांतों के अनुसार दैनंदिन निर्णय लेने में सुविधा होगी व समर्थक दलों के हस्तक्षेप अथवा भयादोहन (ब्लैकमेल) की आशंका नहीं रहेगी। चूंकि भाजपा ने एनडीए के बैनर तले चुनाव लड़ा था इसलिए सरकार में सहयोगी दलों का प्रतिनिधित्व तो रहेगा, किन्तु अनुचित दबाव की क्षमता नहीं होगी। यह अवसर भी बीस साल बाद आया है कि क्षेत्रीय दल अपने प्रदेश के बाहर और अपने को मिले जनादेश के बाहर जाकर व्यर्थ की उलझनें खड़ी करने की स्थिति में नहीं होंगे। (ममता बनर्जी जैसे उद्धत नेता का स्मरण यहां अनायास हो आता है।) क्या आज के नतीजों से द्विदलीय राजनीति की बुनियाद पड़ेगी? अभी कुछ नहीं कहा जा सकता।
आज वामपंथी दलों व आम आदमी पार्टी के रोल की भी चर्चा कर लेना चाहिए। यह स्पष्ट दिख रहा है कि 'आप के कारण कांग्रेस को कई जगहों पर सीधे-सीधे नुकसान उठाना पड़ा है। यूं तो इस पार्टी के उंगलियों पर गिने जाने वाले उम्मीदवार जीत कर आ गए हैं, लेकिन पूछना लाजिमी है कि आखिर आपका उद्देश्य क्या था और आप चुनाव क्यों लड़ रहे थे? आम आदमी पार्टी के प्रमुख भाष्यकार लोहियावादी योगेन्द्र यादव हैं। सर्वप्रथम डॉ. लोहिया ने ही गैर-कांग्रेसवाद का नारा दिया था। ऐसा अनुमान लगाने को मन होता है कि उनकी इस इच्छा की पूर्ति के लिए ही 'आप' का गठन किया गया था! बदली हुई परिस्थिति में अरविंद केजरीवाल कांग्रेस के सहयोग से दिल्ली में फिर सरकार बना लें तो अलग बात है।
भारत में वामपंथी दलों ने जनतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए लंबी लड़ाईयां लड़ीं। आज नवसाम्राज्यवाद के दौर में जनसंघर्ष की आवश्यकता पहले से कहीं ज्यादा है, लेकिन इन चुनावों में वामदलों ने जो प्रदर्शन किया है उसके बाद यह समझ नहीं आता कि सामाजिक न्याय की लड़ाई अब कौन लड़ेगा? ऐसा कहना गलत नहीं होगा कि सिर्फ कांग्रेस के नेता ही प्रमाद में नहीं थे, वामदलों के नेताओं ने भी खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने में कोई कमी नहीं की। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इन दलों में अब न तो युवा नेतृत्व बचा है और न ही ऐसे कार्यकर्ता जो किसी जन आंदोलन में प्राण फूंक सकते हों।
यह विश्लेषण तो आगे भी चलता रहेगा। आज भावी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बधाई के हकदार हैं। वे जनतांत्रिक, यद्यपि गैर-पारंपरिक तरीके से निर्वाचित होकर आए हैं। उम्मीद उनसे यही है कि अपनी नई भूमिका में संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता रखते हुए वे इस देश को आगे ले जाने का काम करेंगे। आंतरिक शांति, बाह्य सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग-व्यापार बहुत सारे मोर्चे हैं जिन पर उनकी कार्ययोजना हमें शायद जल्दी ही देखने मिलेगी तभी उन पर कोई टिप्पणी करना मुनासिब होगा। हर भारतवासी की तरह फिलहाल हमें भी इस बात की प्रसन्नता है कि देश ने लोकतंत्र का एक और इम्तिहान पास कर लिया है।
देशबन्धु में 17 मई 2014 को प्रकाशित विशेष सम्पादकीय
Wednesday, 14 May 2014
कुछ यात्रा चित्र-1
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महाकवि रॉॅबर्ट फ्रॉस्ट का कथन है
कि ''शिक्षक दो तरह के होते हैं, एक वे जो विद्यार्थी को खूंटे से बांध कर
रख देते हैं और दूसरे वे जो कुछ ऐसा करते हैं कि विद्यार्थी आकाश में
उड़ान भरने के योग्य हो जाएं। दूसरे प्रकार के एक शिक्षक हैं- खूबचंद
मंडलोई। मंडलोई गुरुजी जयप्रकाश प्राथमिक शाला पिपरिया (मप्र) में 1952 से
1954 तक मेरे कक्षा शिक्षक थे। अपने चालीस साल के अध्यापक जीवन में
उन्होंने मुझ जैसे हजारों विद्यार्थियों को पढ़ाया। मंडलोईजी ने मात्र
उन्नीस वर्ष की आयु में अध्यापन कार्य प्रारंभ किया था। उन्हें सेवानिवृत्त
हुए भी दो दशक बीत चुके हैं, लेकिन विद्यार्थियों में ही नहीं, पिपरिया के
नागरिकों के बीच वे उसी तरह सम्मान के पात्र व लोकप्रिय हैं जैसे कि वे
शुरू से रहे आए हैं। मुझसे तो पिपरिया कब की छूट गई, लेकिन उनके जो विद्यार्थी आज भी वहीं हैं उन्होंने गुरुजी का नागरिक अभिनंदन करना तय किया। मुझे भी आदेश मिला कि मैं 10 मई को आयोजित नागरिक सम्मान में अवश्य शामिल होऊं। ऐसे अवसर पर मना तो खैर कर ही नहीं सकता था, लेकिन अपने शिक्षक के नागरिक अभिनंदन में उपस्थित रहना सचमुच एक आह्लादकारी अनुभव था। कार्यक्रम तीन घंटे चला व इसमें पिपरिया की नगरपालिका अध्यक्ष सहित समाज के सभी वर्गों के लोग शामिल हुए। हम पूर्व विद्यार्थी अपने गुरु का ऐसा सम्मान देखकर गद्गद् हुए जा रहे थे। तिरासी वर्षीय मंडलोईजी स्वयं भी अभिभूत थे। आज जब भारतीय समाज में शिक्षकों का तिरस्कार व अवमानना हो रही है उस समय एक गुणी शिक्षक का सम्मान होना विरल अपवाद ही था। एक और महान लेखक जॉन स्टाइनबैक ने कहा था कि ''दुनिया की तमाम कलाओं में अध्यापन शायद सबसे बड़ी कला है और शिक्षक एक महान कलाकार ही होता है। मैं सोचता हूं कि यह कथन भी मंडलोईजी पर खरा उतरता है। इस अभिनंदन समारोह के दौरान ही मंडलोईजी द्वारा लिखित खंड काव्य ''अपयश का आचमन; कैकेयी उत्कर्ष का भी लोकार्पण हुआ। उन्होंने अपनी इस सुदीर्घ रचना में कैकेयी को एक नए नजरिए से देखने की कोशिश की है। उनकी स्थापना है कि राम का जन्म रावण-राज्य की समाप्ति के लिए हुआ था। वे अगर अयोध्या का राजपाट संभाल लेते तो कथा वहीं समाप्त हो जाती व उनके जीवन का महत्तर लक्ष्य पूरा न हो पाता। इसलिए कैकेयी ने स्वयं को अपयश का पात्र बना राम को कर्तव्यपथ पर प्रवृत्त किया। हम जानते हैं कि पूर्व में भी अनेक लेखकों ने इसी भांति साहित्य में उपेक्षित विस्मृत या लांछित पात्रों के प्रति न्याय करने का प्रयत्न किया है- जैसे मैथिलीशरण गुप्त ने 'साकेत में उर्मिला को नए आलोक में देखा, हरिऔध ने 'प्रिय प्रवास' में यशोधरा को व शिवाजी सावंत ने मृत्युंजय की कर्ण को। मंडलोईजी की भावना भी ऐसी ही रही है। मैं उनकी इस रचना को एक और दृष्टिकोण से देखने का प्रयास करता हूं। भारतीय समाज में व उसी के अनुरूप भारतीय साहित्य में औरत जात का एक तरह से लगातार निरादर ही होते आया है। बात चाहे शकुंतला की हो, सीता की हो, द्रौपदी की हो एक पुरुषवादी मानसिकता साहित्य में निरंतर दिखाई पड़ती है। इस रूढि़ को सबसे पहले शरतचंद्र ने तोड़ा, जिसका अनुसरण उनके जीवनीकार 'अवारा मसीहा के लेखक विष्णु प्रभाकर ने किया। इस दौर में जबकि नवपूंजीवाद ने सारी चीजों की पवित्रता नष्ट कर दी है तथा स्त्री हर तरह से भोग्या बना दी गई है तब बहुत जरूरी हो गया है कि बुद्धिजीवी समाज में स्त्री की प्रतिष्ठा कायम करने के लिए हर संभव उपाय करें और इसमें साहित्य पीछे क्यों रहे। समाज में स्त्री के हक में सिर्फ लेेेखिकाएं ही आवाज उठाएं यह भी पर्याप्त नहीं है। पुरुषों को भी आगे आना चाहिए और यह काम मंडलोईजी ने किया है। मैंने पिपरिया का निमंत्रण तो खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया था, लेकिन यह ध्यान नहीं था कि छुट्टियों और शादी के मौसम में रेलगाड़ी में आरक्षण मिल पाएगा या नहीं। परिणाम यह हुआ कि मुझे पांच सौ पैसठ किलोमीटर की यात्रा सड़क मार्ग से करनी पड़ी। अमरकंटक एक्सप्रेस में सोते-सोते आना-जाना होता; यहां दिन में सफर करना पड़ा, क्योंकि अब रात को सड़क यात्रा में असुविधा महसूस होती है। यह लेकिन अच्छा ही हुआ। मैं पिपरिया कोई चार-पांच साल बाद जा रहा था। उस इलाके की दृश्यावली देखे लंबा समय बीत गया था सो पुरानी स्मृतियों को ताजा करने का एक अच्छा मौका मिल गया। कुछ नई छवियां भी स्वाभाविक रूप से देखने-समझने मिल गईं। इस सफर की सबसे बढिय़ा बात तो यह थी कि रायपुर से पिपरिया तक का रास्ता जैसा कि बोलचाल की भाषा में कहेंगे ए-वन था। रायपुर से देवरी तक फोरलेन है। राजनांदगांव में पूरब से पश्चिम तक शहर की लंबाई में फ्लाईओवर बन गया है। देवरी से गोंदिया होकर मध्यप्रदेश की सीमा तक महाराष्ट्र के लोक निर्माण विभाग की सड़क चुस्त-दुरुस्त है। वहां से सिवनी तक टोल रोड है। उसका भी रख-रखाव बढिय़ा है। सुना था कि नागपुर-जबलपुर के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग-7 दुर्दशाग्रस्त है, लेकिन मुझे जिस सिवनी-लखनादौन खंड पर चलना था वह हिस्सा एकदम बढिय़ा था। सबसे ज्यादा मजा आया लखनादौन से नरसिंहपुर तक फोरलेन वाले एनएच-26 पर। यह हिस्सा कुछ समय पहले ही बनकर तैयार हुआ है। चिकनी-सपाट सड़क पर गाड़ी दौड़ रही है और कुछ भी पता नहीं चलता। नरसिंहपुर से पिपरिया तक टोल टैक्स वाले प्रादेशिक राजमार्ग-22 का भी रख-रखाव ठीक था। यह तो ठीक था कि यहां से वहां तक सड़क अच्छी थी, लेकिन रास्ते में पांच या छह जगह पर टोल टैक्स देना पड़ा। आते-जाते में पांच सौ रुपए तो खर्च हो ही गए। जहां सड़क नई बनी है वहां टैक्स लेना समझ आता है, लेकिन जहां लागत निकल चुकी हो वहां टोल टैक्स क्यों जारी रहना चाहिए? यह सवाल भी मन में उठता है कि जब निजी ठेकेदारों को ही सड़कें बनाना है तो पीडब्ल्यूडी में इतने सारे इंजीनियरों की फौज से क्या काम लिया जा रहा है? इस यात्रा में इस तथ्य पर भी ध्यान गया कि अब नगरों के बाहर जगह-जगह बाईपास बन गए हैं याने यात्री को शहर की भीड़-भाड़ से नहीं गुजरना पड़ता। इसका एक नुकसान भी हुआ है। बाहर-बाहर निकल गए तो न तो लखनादौन में रुककर खोए की जलेबी का स्वाद चख सके और न किसी छोटे गांव में रुककर इस मौसम में चूसने वाले देशी आम भी देखने मिले। रफ्तार ने इत्मीनान को छीन लिया है। इन दिनों शादियों का सीजन है तो जगह-जगह उनके नजारे देखने मिले। लखनादौन के पास किसी गांव से एक दामाद अपने ससुरजी को लेकर डेढ़ सौ किलोमीटर दूर गाडरवारा के पास किसी गांव मोटर सायकल पर लिए जा रहे थे। टोल-टैक्स नाके पर वे मिल गए तो फिर बुजुर्गवार हमारी कार में थोड़ी देर के लिए सहयात्री हो लिए। एक और युवक अपनी पत्नी और दो बच्चों को बाइक पर लेकर कहीं शादी में जा रहा था। पत्नी अपने हाथों में सूटकेस को संभाल रही थी। ऐसे लोग भी क्या करें? बसों का ठिकाना है नहीं, फिर बाइक में समय और पैसा तो बचता ही है। रतन टाटा ने शायद इन्हीं के लिए नैनो कार बनाई थी। इस यात्रा का बड़ा हिस्सा ग्राम्यांचल में था इसलिए एक और रोचक दृश्य देखने मिला कि जगह-जगह खेतों में शामियाने तने हुए हैं और आती-जाती बारात का स्वागत हो रहा है। ज्यादातर बाराती या तो सूमोनुमा गाडिय़ों में यात्रा कर रहे हैं या ट्रेक्टर ट्रालियों मेें। (अगले सप्ताह जारी) |
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