Sunday, 9 November 2014

छत्तीसगढ़: वर्तमान सांस्कृतिक परिदृश्य



छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक परिदृश्य की चर्चा करते हुए कुछ बिन्दु स्पष्टता के साथ उभरते हैं-
 
1. यह प्रदेश एक लंबे समय से संस्कृति की विभिन्न विधाओं का धनी रहा है। विगत अनेक शताब्दियों के दौरान समय-समय पर यहां रचनाशीलता का जैसा उन्मेष हुआ और जिसकी परंपरा आज तक चली आ रही है, वह किसी भी अन्य प्रदेश से कम नहीं है।
2. इस सांस्कृतिक वैभव की जो पहचान राष्ट्रीय स्तर पर बनना चाहिए थी, वह नहीं बन पाई है।
3. प्रदेश में इस संबंध में जिस व्यवस्थित तरीके से अध्ययन, शोध व प्रसार होना चाहिए था, वह भी नहीं हो सका है।
4. मध्यप्रदेश से पृथक हो एक स्वतंत्र इकाई बन जाने के बाद प्रदेश की रचनाशीलता पर एक तरफ शासकीय संरक्षण की अभिलाषा व दूसरी ओर उपभोक्ता संस्कृति का प्रभाव- इस तरह राहू-केतु की छाया पड़ गई है। अगले अनुच्छेदों में हम इन बिन्दुओं की विस्तार से व्याख्या करने का प्रयत्न करेंगे।

छत्तीसगढ़ का चालीस प्रतिशत से अधिक भूभाग यद्यपि वनों से आच्छादित है, किन्तु यहां विकसित नागर सभ्यता होने के चिन्ह लगभग दो हजार वर्ष पूर्व से मिलते हैं। सर्वविदित है कि मल्हार में प्राप्त विष्णु प्रतिमा लगभग इतनी ही पुरानी है। इसके बाद सिरपुर, रतनपुर, बारसूर आदि स्थान हैं, जो छत्तीसगढ़ के प्राचीन सांस्कृतिक वैभव के साक्ष्य हैं। यहां हम सिर्फ उदाहरण के लिए कुछ नाम दे रहे हैं ताकि पाठकों के सामने एक रूपरेखा रखी जा सके। ये प्राचीन मंदिर किस राजा ने बनवाए थे, इनके स्थपति कौन थे, इन मूर्तियों को किन्होंने गढ़ा था, यह सब विशद विवेचन का विषय है। फिलहाल इतना जान लेना रोचक है कि दो हजार वर्ष से छत्तीसगढ़ में सभ्यता का विकास व प्रकृति का संरक्षण समानांतर होते आया है। इस मायने में छत्तीसगढ़ की स्थिति अन्य प्रदेशों से भिन्न कही जा सकती है।
यह अनुभव अपने आप में मुग्ध कर देने वाला है कि आप प्रदेश के उत्तरी भाग में याने सरगुजा अंचल में घने जंगलों के बीच किसी निर्जन सी सड़क पर प्रकृति की शोभा निहारते चले जा रहे हैं और अचानक आपके सामने कहीं महेशपुर तो कहीं डीपाडीह के ध्वंसावशेष सामने आ गए हैं। ऐसा अनुभव आपको बस्तर में भी हो सकता है या कवर्धा, राजनांदगांव, महासमुंद, सारंगढ़, धमतरी या गरियाबंद में भी। फिंगेश्वर के प्राचीन फणेश्वर महादेव मंदिर को देखकर मेरे मित्र त्रिभुवन पांडेय ने अनुमान लगाया था कि प्राचीन समय में मंदिर शिल्पियों का कोई बड़ा कुनबा रहा होगा, जिसने देशाटन करते हुए राजाओं के आदेश-अनुग्रह से इन मंदिरों का निर्माण किया होगा। बड़े राजा के यहां बड़ा मंदिर, छोटे राजा के यहां छोटा। भाई त्रिभुवन के अनुसार ये उस समय के मंदिर ''कांट्रेक्टर" रहे होंगे। है न बात विचार करने योग्य!

जाहिर है कि यह सांस्कृतिक वैभव सिर्फ मंदिर निर्माण तक सीमित नहीं रहा होगा। उसके साथ-साथ रचनाशीलता के नए आयामों को प्रस्फुटित होने का अवसर मिला ही होगा। यह भी मानना चाहिए कि जैसे-जैसे यात्राएं सुगम हुई होंगी, विभिन्न प्रदेशों के बीच संपर्कों में भी वृद्धि हुई होगी तथा आज छत्तीसगढ़ के जिन कलारूपों को हम देख रहे हैं वे बाह्य प्रभाव से मुक्त नहीं रहे होंगे। इसी तरह छत्तीसगढ़ की रचनाशीलता ने अन्य प्रदेशों को भी प्रभावित किया होगा। मुझे लगता है कि छत्तीसगढ़ के कथागीत इसका प्रमाण हैं। मसलन, गुजरात में ''जसमा-ओढन" की कथा व छत्तीसगढ़ में ''दसमत-कैना" की कथा में अद्भुत साम्य है। डॉ. रमाकांत श्रीवास्तव ने छत्तीसगढ़ के कथागीतों पर जो गंभीर शोध कार्य किया है वह इस बारे में अधिक जानकारी के लिए पठनीय है। शास्त्रीय नृत्य में कत्थक के रायगढ़ घराने से भी कलावंत परिचित हैं। ऐसे सांस्कृतिक विनिमय को विजयदान देथा की राजस्थानी लोककथा तथा हबीब तनवीर की नाट्यकृति ''चरणदास चोर" में भी देखा जा सकता है।

मैं दाऊ रामचंद्र देशमुख की रंगमंचीय प्रस्तुति ''चंदैनी गोंदा" का विशेष रूप से जिक्र करना चाहूंगा। 1970 के दशक में लोकमंच पर प्रस्तुत इस कृति ने समूचे छत्तीसगढ़ को एक तरह से झकझोर दिया था। उस दौर में जब डॉ. खूबचंद बघेल के छत्तीसगढ़ भ्रातृसंघ के माध्यम से प्रदेश की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान अंकित करने का प्रयत्न हो रहा था उस समय चंदैनी गोंदा ने स्थानीय समाज को अपनी जीवन परिस्थितियों का पुनरावलोकन करने के लिए उत्तेजित किया था। चंदैनी गोंदा से प्रेरित होकर आगे और भी मंचीय उपक्रम हुए लेकिन दाऊ जी अपनी एकांतिक निष्ठा के बल पर जो जादू जगा सके थे वैसा वे दूसरे लोग नहीं कर पाए, जिनके लिए लोकमंच निजी ख्याति मात्र पाने का माध्यम था।

हिन्दी साहित्य का आधुनिक काल माने जाने वाले समय में भी छत्तीसगढ़ का जो योगदान है वह इतिहास में दर्ज है। मुकुटधर पांडेय की कविता ''कुररी के प्रति" को छायावाद की पहली कविता माना जाता है। इस नाते पांडेय जी को छायावाद का प्रणेता भी कहा गया है। यद्यपि पांडेय जी स्वयं श्रेय न लेते हुए महाकवि जयशंकर प्रसाद को इसका अधिकारी मानते हैं। ठाकुर जगमोहन सिंह की कृति ''श्यामा स्वप्न"  को राज्य बनने के बाद हिन्दी का पहला उपन्यास सिद्घ करने के स्वार्थ-प्रेरित किन्तु असफल प्रयत्न हुए। इसी तरह माधवराव सप्रे की  ''टोकरी भर मिट्टी" को एक बड़े तबके में हिन्दी की पहली कहानी मान लिया गया है यद्यपि वह एक लोककथा है। जो भी हो, ये दोनों रचनाएं आधुनिक हिन्दी के प्रारंभकाल में छत्तीसगढ़ की उपस्थिति को दर्ज कराती हैं। एक स्मरणीय तथ्य यह भी है कि पदुमलाल-पुन्नालाल बख्शी को ''सरस्वती" का संपादन करने का सम्मान मिला। माखनलाल चतुर्वेदी ने ''पुष्प की अभिलाषा" जैसी अमर कविता बिलासपुर जेल की कोठरी में बैठकर लिखी व गजानन माधव मुक्तिबोध के अंतिम वर्ष यहीं बीते।

भारतीय रंगमंच को जिन प्रतिभाओं ने समृद्ध किया, उनमें से दो प्रमुख नाम हबीब तनवीर व सत्यदेव दुबे छत्तीसगढ़ के हैं ही। इसके अलावा अन्य विधाओं में भी देवदास बंजारे, तीजन बाई, झाड़ूराम देवांगन, जयदेव बघेल, गोविंदराम झारा, सोनाबाई जैसे कितने ही नाम उल्लेखनीय हैं। लेखकों की तो एक सुदीर्घ सूची है ही जिससे पाठकगण परिचित हैं। भारतीय सिनेमा में भी छत्तीसगढ़ का महत्वपूर्ण योगदान है। सुप्रसिद्ध फिल्म निदेशक एवं अभिनेता किशोर साहू इसी प्रदेश के थे। आगे चलकर रायपुर के कांतिलाल पटेल ने अपनी गुजराती में बनी फिल्म "कंकू" के लिए वर्ष की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार हासिल किया। उन्होंने "परिणय" आदि अन्य स्मरणीय फिल्में भी बनाईं। इसी तरह रायपुर के दयाराम चावड़ा ने फोटोग्राफी के क्षेत्र में महारत हासिल की। छत्तीसगढ़ की संस्कृति की चर्चा के संदर्भ में ये सारे तथ्य ध्यान रखने योग्य है।

यह स्मरण कराने की आवश्यकता नहीं कि किसी भी समाज की संस्कृति शून्य में विकसित नहीं होती। भूगोल, इतिहास, अर्थशास्त्र, पर्यावरण, सामाजिक परंपराएं इत्यादि का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव कला सर्जना पर पड़ता है। इस प्रभाव से ही प्रारंभ में लोक संस्कृति का निर्माण होता है एवं कालांतर में उसका ही एक अंश शास्त्रीय रूप में ढल जाता है। यहां मैं विशेषकर छत्तीसगढ़ की एक सामाजिक परंपरा की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। छत्तीसगढ़ को यदि तालाबों का प्रदेश कहा जाए तो किंचित भी अतिशयोक्ति नहीं होगी। आज भी प्रदेश में ऐसे तालाब विद्यमान हैं जिनकी आयु हजार-आठ सौ वर्ष की है। ये तालाब, इनकी पार पर लगे आम, अर्जुन, गूलर आदि वृक्षों की छाया में ही यहां संस्कृति का बीजारोपण हुआ होगा। ध्यान रहे कि ये तालाब हमारे सयानों ने बनवाए थे इसलिए जिस विषय पर आज हम चर्चा कर रहे हैं इसमें इस तथ्य को नहीं भुलाना चाहिए।
  

यह कटु सत्य है कि इतना सब कुछ होने के बावजूद देश के सांस्कृतिक नक्शे पर छत्तीसगढ़ की विशिष्ट छवि आज तक नहीं बन पाई है। इसका एक प्रबल कारण तो शायद यह है कि प्रदेश के बाहर का समाज हमेशा से छत्तीसगढ़ को एक पिछड़ा प्रदेश मानते आया है। 1956 में जब छत्तीसगढ़ नए मध्यप्रदेश का हिस्सा बना शायद तब से यह स्थिति चली आ रही है। मैं समझता हूं कि 1956 से पहले के सीपी एंड बरार राज्य की ऐसी स्थिति नहीं थी। उस समय छत्तीसगढ़, विदर्भ और महाकौशल इन तीनों में कोई बड़ा-छोटा नहीं था और न किसी तरह का भेदभाव होता था। नए मध्यप्रदेश के निर्माण के ठीक दो माह बाद 31 दिसंबर 1956 को प्रथम मुख्यमंत्री व कद्दावर नेता पंडित रविशंकर शुक्ल के निधन के साथ एक नया माहौल बनना शुरू हुआ, जिसमें महाकौशल, बुंदेलखंड व बघेलखंड के साथ-साथ छत्तीसगढ़ को भी हाशिए पर डाल दिया गया। छत्तीसगढ़ के साथ दूसरी विडंबना यह हुई कि नए प्रदेश के सत्ता केंद्र भोपाल से उसकी भौगोलिक दूरी भी काफी थी। इसमें करेला और नीम चढ़ा की कहावत तब चरितार्थ हुई जब छत्तीसगढ़ के प्रभावी राजनेताओं ने भी इस प्रदेश को अपना प्राप्य दिलवाने में जबानी जमाखर्च से ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखलाई। जब 1 नवंबर 2000 को नया छत्तीसगढ़ प्रदेश बना तब मोमबत्ती की लौ की तरह क्षणिक आशा जगी कि अब छत्तीसगढ़ की सही पहचान बन पाएगी लेकिन ऐसा नहीं हो सका। जो सत्ता में बैठे थे उनकी प्राथमिकताएं कुछ और थीं। कला, साहित्य व संस्कृति से उनका कोई खास लेना-देना नहीं था और न इस बारे में पिछले डेढ़ दशक में कोई सुविचारित पहल ही की गई। हमारे कलाकार और हुनरकार बीच-बीच में दिल्ली वगैरह बुलाए जाते हैं वे वहां जाकर कुछ फुलझडिय़ां बिखेर कर वापस अपने अंधेरे में लौट आते हैं।

मैं यह मानता हूं कि जनतांत्रिक व्यवस्था में जनकल्याणकारी राज्य का दायित्व है कि वह कला-साहित्य का संवर्धन व संरक्षण करें। इसके लिए अव्वल तो दृष्टि की जरूरत होती है, फिर राजनीतिक इच्छाशक्ति की। अगर छत्तीसगढ़ में इन बुनियादी शर्तों की ही पूर्ति होते दिखाई नहीं देती तो इसके लिए हम स्वयं को दोष दे सकते हैं। रचनाशीलता को लोक, आदिवासी, नागर आदि खांचों में न बांटकर समग्रता में देखते हुए यह जरूरी है कि राज्य में ऐसा वातावरण, ऐसी संस्थाएं व ऐसा विधान हो, जिसमें हर विधा, हर शैली में सृजनात्मकता का विकास होने के लिए अनुकूल वातावरण हो। छत्तीसगढ़ जैसे नए राज्य के लिए तो यह और भी ज्यादा जरूरी है, जबकि इस प्रदेश की छवि आंतरिक अशांति याने नक्सलवादी खून-खराबे से घायल स्थान की बन गई हो। दिल्ली में गणतंत्र दिवस की परेड में छत्तीसगढ़ की एकाध झांकी शामिल हो जाए, पुरस्कृत हो जाए, उस पर सत्ताधीश गर्व भी कर लें, लेकिन साल में तीन सौ चौसठ दिन तो दिल्ली में बात छत्तीसढ़ में नक्सल समस्या की ही होती है।

छत्तीसगढ़ में प्रदेश सरकार द्वारा स्थापित दस विश्वविद्यालय हैं। इनमें 1954 में स्थापित कला व संगीत विश्वविद्यालय भी है, लेकिन इनमें से एक में भी छत्तीसगढ़ की संस्कृति को लेकर कोई गंभीर काम नहीं होता। यह ऐसा प्रदेश है जहां छुटभैये नेता अपने ऊपर पीएचडी करवा लेते हैं। यहां के लेखक और कलाकार पद्मश्री पाने के लिए खुद होकर आवेदन करते हैं और सिफारिशी चिट्ठियां लिखवाते इस-उस की ड्योढ़ी पर माथा टेकते हैं। यहां साल के प्रत्येक दिन कोई न कोई उत्सव, कोई न कोई सांस्कृतिक आयोजन होते रहता है, लेकिन जब तक मंत्री न आ जाएं कार्यक्रम शुरू नहीं होता। उनके आने से आयोजक धन्य होते हैं। कार्यक्रम के बीच में उठकर चले जाएं तो भी कोई बुरा नहीं मानता।

यह मजे की बात है कि 1964 में रायपुर में रविशंकर वि.वि. स्थापित हुआ। इसमें हिन्दी विभाग नहीं है। ललित कलाओं के लिए भी कोई विभाग नहीं है। यहां अपने पैसे से दो-चार किताबें छपवा लेने वाले अधकचरे साहित्यकार भी अपने ऊपर शोध कार्य करवा लेते हैं। इनकी गुणवत्ता का परीक्षण करने की कोई व्यवस्था नहीं है। एक तरफ अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की संख्या लगातार बढ़ रही है, दूसरी ओर सरकारी गैर-सरकारी स्कूलों में ऐसे अध्यापक नहीं हैं जो बच्चों को शुद्ध हिन्दी लिखना सिखा सकें। नतीजतन जो हिन्दी में एम.ए., पी.एच.डी. कर लेते हैं उन्हें भी अच्छी हिन्दी लिखना नहीं आता। प्रदेश के संस्कृति विभाग के हाल बेढब हैं। विगत तेरह वर्षों में इस विभाग का ठीक से ढांचा नहीं बन पाया और विभाग की दिशा क्या होगी यह भी आज तक नहीं पता। इसीलिए बख्शीजी और मुक्तिबोध के नाम पर साहित्य के लिए नहीं, बल्कि शिक्षक पुरस्कार दिए जाते हैं।

प्रदेश में फिलहाल जो सांस्कृतिक परिदृश्य बना हुआ है, उसमें एक तो संस्कृति कर्मियों की लंबी कतार दिखाई देती है। इनमें से प्रत्येक को या तो कोई पुरस्कार चाहिए या पुस्तक प्रकाशन के लिए आर्थिक सहायता या फिर अपनी बनाई किसी जेबी संस्था के लिए सरकारी अनुदान। यह शायद इस प्रदेश में ही होता है कि सरकारी स्तर पर आयोजित कवि सम्मेलन में अपना नाम जुड़वाने के लिए कविगण आयोजक अधिकारी को पत्र-पुष्प देने के लिए तैयार रहते हैं। इसके चलते किसी महोत्सव में आप मंच पर सौ-सौ कवियों को बैठा देख सकते हैं। प्रदेश में जो सृजनपीठ हैं अथवा जो साहित्य अकादमी जैसी संस्था में प्रदेश का प्रतिनिधित्व करते हैं उनके नाम-काम मन में किसी प्रकार का उत्साह नहीं जगाते।

बात यहां समाप्त नहीं होती। प्रदेश तीजन बाई जैसे कलाकारों पर उचित ही गर्व करता है वहीं छत्तीसगढ़ की संस्कृति के नाम पर अब जो फूहड़पन परोसा जा रहा है वह असहनीय है। कुछ व्यापारी लोक कलाओं के स्वयंभू संरक्षक बन गए हैं। लोक गीतों के नाम पर अब अश्लील गीतों के कैसेट बाजार में बिक रहे हैं, भक्ति गीतों के नाम पर बहरा कर देने वाला शोर-शराबा है, सुआगीत आदि के नाम पर सिर्फ एक नकलीपन है, छत्तीसगढ़ी में बनने वाली फिल्मों में छत्तीसगढ़ कहीं नहीं है, आदिवासी कलाकारों के शिल्प से मौलिकता और उनके अपने जीवन अनुभव लगभग लुप्त हो चुके हैं। छत्तीसगढ़ में जो लोग साहित्य व कला में सक्रिय हैं, आज उनकी चिंता यही है कि कैसे अपनी सहज प्रेरणा को बचा कर रखें, कैसे अपनी कल्पनाशीलता को मरने से बचाएं और कैसे लोभ-लालच के इस वातावरण में अपने आपको सुरक्षित रख सकें। 
अक्षर पर्व नवंबर 2014 अंक की प्रस्तावना

नोट-प्रस्तुत आलेख कुछ माह पूर्व बिलासपुर से प्रकाशित वार्षिक पत्रिका मड़ई के लिए लिखा गया था एवं मड़ई अंक-2013 में ''छत्तीसगढ़ : वर्तमान सांस्कृतिक परिदृश्य'' शीर्षक से संकलित है। अक्षर पर्व के लोकसंस्कृति पर केन्द्रित उत्सव अंक के लिए अलग से प्रस्तावना न लिखकर यही लेख प्रसंगानुकूल समझकर पुनप्र्रकाशित किया जा रहा है।



Wednesday, 5 November 2014

नेहरू बनाम पटेल क्यों?


 प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 31 अक्टूबर को सरदार पटेल की जयंती पर कहा कि महात्मा गांधी सरदार पटेल के बिना अधूरे थे। इस वक्तव्य का निहितार्थ समझना कठिन नहीं है। श्री मोदी प्रधानमंत्री बनने के पहले से सरदार पटेल का पुनराविष्कार और पुनप्र्रतिष्ठा स्थापित करने के अभियान में लगे हुए हैं। गोया कि ऐसा करने की कोई आवश्यकता थी! वे सरदार सरोवर के बीच लौहपुरुष की लौह प्रतिमा लगवाने जा रहे हैं जो विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा होगी। उन्होंने 31 अक्टूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस भी घोषित कर दिया है और जिस तरह गांधी जयंती पर प्रधानमंत्री के आह्वान पर देशवासी झाड़ू लेकर सड़क पर निकल आए थे उसी तरह 31 अक्टूबर को वे राष्ट्रीय एकता हेतु दौडऩे के लिए एक बार फिर सड़कों पर उतर आए। इसके अलावा नागरिकों ने राष्ट्रीय एकता कायम करने के लिए शपथ भी ली। अगर इस तरह दौडऩे और शपथ लेने मात्र से कोई उद्देश्य पूरा हो सकता हो तो फिर कहना ही क्या है। हमें ध्यान आता है कि राजीव गांधी की जयंती पर भी सरकारी कर्मचारी शपथ लेते हैं और दौडऩे का आयोजन तो साल भर बदस्तूर कहीं न कहीं चलते रहता है। कभी-कभी लगता है कि सरकारी ईवेन्ट मैनेजरों की कल्पनाशक्ति चुक गई है।

खैर! प्रधानमंत्री का यह भावातिरेक गौरतलब है कि गांधीजी सरदार के बिना अधूरे थे। दूसरे शब्दों में सरदार पटेल महात्मा गांधी के पूरक थे। हमारी समझ में यह सोच तो स्वयं सरदार की कभी नहीं रही होगी। हम जितना जानते हैं उसके अनुसार वे गांधीजी के प्रिय और विश्वस्त साथी बल्कि शिष्य थे। लेकिन क्या यही बात पंडित नेहरू पर लागू नहीं होती? महात्मा गांधी ने आज़ादी  की लड़ाई में हिस्सा लेने के लिए यूं तो करोड़ों लोगों को प्रेरित किया था, लेकिन उनका जो हरावल दस्ता था उसमें नेहरू, पटेल, राजाजी, मौलाना आज़ाद, सुभाषचंद्र बोस, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद व विनोबा भावे जैसे कुछ नाम प्रमुखता के साथ लिए जा सकते हैं। इस अग्रिम पंक्ति में से एक नेताजी थे जिन्होंने कतिपय कारणों से अपना अलग रास्ता चुन लिया था, लेकिन बाकी सब तो बापू के साथ अंत तक रहे और जिसको जैसी जिम्मेदारी मिली उसका निर्वाह उसने किया।

पंडित नेहरू व सरदार पटेल के आपसी संबंधों तथा राजनीतिक कौशल अथवा क्षमताओं को लेकर कुछ भ्रांत धारणाएं जनमानस में फैलाने की कोशिश लंबे समय से की जा रही है। जो लोग इस उपक्रम में लगे हैं उनसे सबसे पहले तो यही पूछा जाना चाहिए कि महात्मा गांधी ने सरदार पटेल को अपना उत्तराधिकारी घोषित क्यों नहीं किया? या उन्हें प्रथम प्रधानमंत्री क्यों नहीं बनाया? यह सवाल भी उठता है कि यदि पंडित नेहरू और सरदार पटेल के बीच ऐसे गहरे मतभेद थे, तो फिर दोनों ने सरकार में साथ-साथ काम क्यों किया? यह ठीक है कि इन दोनों महान नेताओं के बीच राजकाज को लेकर विचार-वैभिन्न्य होता होगा, लेकिन यह भी देखना चाहिए कि नवस्वतंत्र देश के सामने उपस्थित बड़े मसलों पर दोनों ने एकराय होकर निर्णय लिए और उन्हें लागू किया।

सरदार पटेल को उचित ही श्रेय दिया जाता है कि उन्होंने देशी रियासतों के विलीनीकरण में दृढ़ भूमिका निभाई जिसके चलते ही उन्हें लौहपुरुष के विशेषण से सम्मानित करते हैं। इसकी पृष्ठभूमि में दो कारकों का उल्लेख करना उचित होगा। एक तो यह कि सरदार पटेल स्वतंत्र भारत की सरकार के प्रतिनिधि के रूप में इस प्रक्रिया को अंजाम दे रहे थे याने शासन की शक्ति उनके पास थी। दूसरे, देशी रियासतों में लंबे समय से प्रजामंडल आंदोलन चल रहा था, जिसके अधिकतर कार्यकर्ता कम्युनिस्ट थे। रियासत में रहते हुए इन लोगों ने जो संघर्ष किया उससे भी राजे-रजवाड़े हिल चुके थे। आशय यह कि उनके सामने भारत संघ में विलय करने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा था।

यह आरोप भी लगाया जाता है कि नेहरू जी के कारण कश्मीर का मामला उलझ गया। जिन्हें इतिहास की जानकारी नहीं है वे ही ऐसा कह सकते हैं। कश्मीर में राजा हिन्दू, बहुसंख्यक प्रजा मुस्लिम; इसके विपरीत हैदराबाद में निजाम याने राजा मुसलमान और प्रजा हिन्दू। यदि राजा द्वारा विलय पत्र पर हस्ताक्षर को पूर्ण मान्यता दी जाती तो निजाम को पाकिस्तान के साथ मिलने से कैसे रोका जाता? यदि हैदराबाद की हिन्दू प्रजा भारत में मिलने की इच्छुक थी तो कश्मीर की मुस्लिम आबादी को पाकिस्तान के साथ जाने से कैसे रोका जाता? इसके अलावा एक और उल्लेखनीय तथ्य है कि आज जिसे हम पाक अधिकृत कश्मीर कहते हैं उसे राजा हरिसिंह ने चंद बरस पहिले 1938-39 में खरीदा था। याने उस इलाके की जनता का इधर के कश्मीर के साथ या भारत के साथ कोई भावनात्मक रिश्ता नहीं था। पंडित नेहरू और सरदार पटेल दोनों इन सारे तथ्यों को जानते थे। उन्हें यह भी पता था कि उस तरफ के हिस्से को अगर सैन्य बल से जीत भी लेते तो उसे ज्यादा दिन साथ नहीं रख सकते थे। याद कीजिए कि 1971 में भारतीय सेनाएं लाहौर के दरवाजे तक पहुंच चुकी थीं, फिर भी उसे लौटना पड़ा।

एक अन्य आरोप बार-बार लगाया जाता है कि नेहरू-गांधी परिवार के शासनकाल में सरदार पटेल और नेताजी जैसे शीर्ष नेताओं की जानबूझ कर उपेक्षा की गई क्योंकि वे नेहरूजी के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी थे। यह भी एक अनर्गल आरोप है। नेताजी ने तो गांधीजी से नाराज होकर कांग्रेस से अपना नाता तोड़ लिया था। फिर वे भारत की आज़ादी में सहयोग लेने के लिए जर्मनी में हिटलर और जापान में जनरल तोजो के पास भी चले गए थे। 1945 में विमान दुर्घटना में उनका निधन हो गया था। इन तथ्यों की रोशनी में पंडित नेहरू के साथ उनकी प्रतिद्वंद्विता का कोई प्रश्न ही नहीं था। सरदार पटेल और नेहरूजी के संबंधों की चर्चा हम ऊपर कर आए हैं। यहां एक स्मरणीय तथ्य है कि सरदार पटेल की सेवाएं स्वतंत्र देश को मात्र तीन वर्ष तक ही मिल सकीं। 1950 में तो उनका निधन ही हो गया। फिर भी सरदार पटेल हों या नेताजी, मैं नहीं समझता कि इन दोनों का सम्मान करने में देश की जनता ने या जनता के द्वारा चुनी सरकार ने कोई कोताही बरती हो। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि कांग्रेस ने सरदार पटेल की सुपुत्री मणिबेन एवं सुपुत्र डाह्या भाई पटेल दोनों को पहिले लोकसभा में फिर राज्यसभा में भेजा। मणिबेन तो गुजरात प्रदेश कांग्रेस की उपाध्यक्ष भी रहीं। आज से पैंसठ साल पहले मैं जब स्कूल का विद्यार्थी था तब भी इन दोनों महापुरुषों की जीवनी सरकारी स्कूल की पाठ्य पुस्तकों में शामिल थीं और जहां तक मेरी जानकारी है आज भी वही स्थिति है।

इन दोनों का उल्लेख सिर्फ पाठ्य पुस्तकों में होता हो यह भी नहीं है। स्कूल, कॉलेज, सरकारी दफ्तर इत्यादि अनेक सार्वजनिक स्थानों पर गांधीजी के साथ नेहरू, पटेल और सुभाष- इन तीनों की मढ़ी हुई तस्वीरें पहले भी देखने मिल जाती थीं और आज भी। इनके अलावा भगत सिंह और विवेकानन्द के चित्र भी देखने मिलते हैं। इनकी प्रतिमाएं भी देश के कोने-कोने में स्थापित की गई हैं। रायपुर में तो गांधीजी के पहले सुभाष बाबू की प्रतिमा लग चुकी थी, जबकि नेहरूजी की प्रतिमा बहुत बाद में लगी। याद कीजिए, कि मध्यप्रदेश में सचिवालय का नया परिसर निर्मित हुआ तो उसका नाम वल्लभ भवन रखा गया। राष्ट्रीय पुलिस अकादमी का नामकरण भी उनकी स्मृति में किया गया है। गुजरात में वल्लभ विद्यानगर बसाया गया है। कुल मिलाकर इनके योगदान को भुलाने के लिए, इन्हें जनस्मृतियों से विलोपित करने के लिए कोई षडय़ंत्र किया गया हो, ऐसा मुझे नहीं लगता। फिर भी मैं माननीय प्रधानमंत्रीजी का आभार मानना चाहता हूं कि उनके कारण मुझे इन प्रात: स्मरणीय नेताओं के बारे में एक बार फिर विचार करने का अवसर मिला।
देशबन्धु में 06 नवंबर 2014 को प्रकाशित

Wednesday, 29 October 2014

वंशवाद चिरजीवी हो ! - 2


 वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी. चिदम्बरम ने यह कहकर थोड़ी सी हलचल मचा दी है कि कांग्रेस का अध्यक्ष नेहरू-गांधी परिवार के बाहर से भी हो सकता है। श्री चिदम्बरम ने वक्तव्य देने के लिए यही अवसर क्यों पसंद किया यह हम नहीं जानते, लेकिन वे ऐसे नेता के रूप में सामने आते हैं, जो कंबल छोडऩा चाहते हैं किन्तु जिन्हें कंबल नहीं छोड़ता। लोकसभा चुनाव न लड़कर उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूर रहने का इरादा जाहिर किया था, लेकिन कमबख्त राजनीति ही कुछ ऐसी शै है जो ऐसे भले इरादे वाले नेताओं को चैन से नहीं बैठने देती। खैर, श्री चिदम्बरम ने अपने बयान में यह स्पष्ट करना आवश्यक समझा  कि सोनिया गांधी का नेतृत्व फिलहाल कायम रहेगा, कि वे भविष्य की संभावनाओं की तरफ इशारा कर रहे हैं। ऐसा कहकर उन्होंने अपनी सुरक्षा का प्रबंध करने का प्रयत्न किया है।

यह जानी-मानी बात है कि भारतीय राजनीति में वंशवाद की जब भी बात होती है तो उसका एकमात्र निशाना गांधी-नेहरू परिवार ही होता है। पंडित नेहरू से लेकर राहुल गांधी बल्कि प्रियंका गांधी और उनके बच्चों तक को लेकर लक्ष्य कर जितनी भी फिकरेबाजी की जाती है उसमें कुछ प्रासंगिक तथ्यों को अनदेखा कर दिया जाता है। कांग्रेसविरोधी आरोप लगाएं, फिकरेबाजी करें, चुटकुले बनाएं, यह सब एक हद तक समझ आता है, लेकिन जब चिदम्बरम जैसे कांग्रेसी भी उसी रौ में बहने लगे तो फिर शंका होती है कि राजनीति इनके लिए साधन है या साध्य? कांग्रेस-विरोधियों द्वारा कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगे तो कांग्रेसियों के पास पलटवार करने के लिए मसाले की कोई कमी नहीं होना चाहिए। वे सही तरीके से अपने तीर क्यों नहीं चला पाते या चलाना नहीं चाहते, यह तो स्वयं कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के ही विचार करने का विषय है। दरअसल कांग्रेस की सबसे बड़ी दुर्बलता यही है कि वह अपने बड़े-बड़े नेताओं की स्वेच्छाचारिता पर अंकुश नहीं लगा पाती।

कांग्रेस का भविष्य क्या है इस बारे में हम कोई अटकलबाजी नहीं करना चाहते और न कोई तात्कालिक निर्णय देना ही उचित समझते। तथापि वंशवाद को लेकर भ्रम का जो कुहासा रचा गया है उसे साफ करना इसलिए जरूरी है कि राजनीतिक इतिहास की सही तस्वीर सामने आ सके। जो लोग पंडित नेहरू से लेकर अब तक की चर्चा उठाते हैं वे एक लंबी श्रृंखला की कुछ कडिय़ों को या तो भुला देते हैं या उनके बारे में अनजान बने रहते हैं। हमारा मानना है कि गत सड़सठ वर्षों में ऐसे कम से कम दर्जन मौके आए हैं जब नेहरू-गांधी परिवार के वंशवाद को चुनौती दी गई या राजनीतिक परिदृश्य पर परिवार ने कोई भूमिका नहीं निभाई। इन कडिय़ों को जोडऩे से बात साफ हो सकेगी।

1. इतिहास के अध्येता जानते हैं कि कांग्रेस के 1950 के नासिक अधिवेशन के दौरान पंडित नेहरू के नेतृत्व को चुनौती देने की पूरी तैयारी कर ली गई थी। उस वक्त बंबई से नासिक की यात्रा करते हुए जनता ने पंडितजी का जैसा अद्भुत स्वागत किया उससे सबको यह समझ आ गया कि पंडित नेहरू अप्रतिम जननायक हैं एवं उन्हें अपदस्थ करना कांग्रेस के लिए अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा।

2. सन् 1951 में एक बार फिर पंडित नेहरू के नेतृत्व को चुनौती देने की योजना बनी। तत्कालीन सीपी एंड बरार प्रांत के गृहमंत्री पं. द्वारिका प्रसाद मिश्र ने पंडित नेहरू के खिलाफ खुला बयान दिया।  योजना थी कि आठ मुख्यमंत्री उनके समर्थन में सामने आएंगे और बदलाव को अंजाम दिया जा सकेगा, लेकिन जनसामान्य में एवं कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच मिश्राजी के बयान की प्रतिकूल प्रतिक्रिया हुई। उन्हें पीछे से प्रश्रय देने वाले नेताओं के हाथ-पांव फूल गए। परिणामत: मिश्रजी को बलि का बकरा बनाते हुए पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। वे 1952 में कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़े और बुरी तरह हारे। आगे चलकर 1962 में इंदिराजी ने उनका पुनर्वास किया।

3. 1954 व 56 इत्यादि वर्षों में भी पंडित नेहरू ने स्वेच्छा से पद त्याग की पेशकश की। भारतीय जनमानस ने इसे स्वीकार नहीं किया। उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहोवर तक ने नेहरूजी को निजी पत्र लिखा कि विश्व के राजनीतिक मंच पर आपकी सेवाओं की आवश्यकता है और आपको  इस्तीफा देने के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए।  अमेरिकी और सोवियत- इन दो ध्रुवों के बीच नेहरू के नेतृत्व में भारत जो संतुलनकारी भूमिका निभा रहा था उसका महत्व विश्व समुदाय जान रहा था।

4. 1962 के आम चुनावों के पहले चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने स्वतंत्र पार्टी खड़ी कर ली थी। उसे टाटा-बिड़ला जैसे उद्योगपतियों और राजा-महाराजाओं का सक्रिय समर्थन प्राप्त था। राजाजी तो स्वयं प्रकाण्ड विद्वान और चतुर राजनीतिज्ञ थे। वे गांधीजी के समधी भी थे। मीनू मसानी जैसे बहुत से पुराने कांग्रेसी उनके साथ आ गए थे। इस सबके बावजूद स्वतंत्र पार्टी कांग्रेस की सत्ता समाप्त नहीं कर सकी। पंडित नेहरू का नेतृत्व कायम रहा आया।

5. 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद देश का मनोबल गिरा हुआ था। उस गंभीर घड़ी में भी पंडित नेहरू को हटाने की बात किसी ने नहीं सोची।

6. ठीक पचास साल पहले 27 मई 1964 को पंडित नेहरू का निधन हुआ। यह सामान्य सोच थी कि नेहरूजी के बाद लाल बहादुर शास्त्री ही उनके उत्तराधिकारी बनेंगे और वही हुआ। उस समय इंदिराजी की सत्ता की राजनीति में आने की कोई इच्छा नहीं थी, लेकिन उन्होंने मंत्री पद सिर्फ इसलिए स्वीकार किया कि वे उसके  वेतन से अपना परिवार चला सकेंगी। इसके तमाम साक्ष्य प्रकाशित हैं।

7. अगर 11 जनवरी 1966 को ताशकंद में शास्त्रीजी का आकस्मिक निधन न हुआ होता तो इंदिराजी के प्रधानमंत्री बन पाने का सवाल ही नहीं उठता था। यह भी प्रकट तथ्य है कि इंदिराजी को प्रधानमंत्री बनाया कामराज एवं अन्य वरिष्ठ कांग्रेसियों ने क्योंकि वे मोरारजी भाई को इस पद पर नहीं देखना चाहते थे।

8. तीन साल बीतते न बीतते इंदिराजी के इन्हीं प्रस्तावकों ने उन्हें प्रधानमंत्री पद से हटाने का खेल रचा।  लेकिन इसमें वे सफल नहीं हो पाए। डॉ. जाकिर हुसैन की मृत्यु से रिक्त राष्ट्रपति पद पर इंदिरा समर्थित उम्मीदवार वी.वी. गिरी ने कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी नीलम संजीव रेड्डी को थोड़े से अंतर से पराजित कर दिया और इंदिराजी का सिक्का चलने लगा।

9. 1977 में गैरकांग्रेसियों के हाथ एक बड़ा मौका लगा जब आम चुनाव में इंदिराजी पराजित हुईं और मोरारजी देसाई जनता पार्टी के प्रधानमंत्री बने। वे अपनी सरकार पूरे पांच साल क्यों नहीं चला पाए और नेहरू-गांधी वंश को  हाशिए से बाहर क्यों न कर पाए? इसका जवाब जनता सरकार में शामिल नेताओं से पूछा जाना चाहिए।

10. 1989 में राजीव गांधी चुनाव हार चुके थे। पहले वी.पी. सिंह, फिर चन्द्रशेखर प्रधानमंत्री बने। ये अगर अपनी सरकार पूरे पांच साल नहीं चला पाए तो इसमें किसका दोष है?

11. 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद पी.वी. नरसिम्हाराव प्रधानमंत्री बने। वे पूरे पांच साल काबिज भी रहे। इसके बावजूद कथित वंशवाद क्यों समाप्त नहीं हुआ?

12. 1996 से 99 के बीच अटल बिहारी वाजपेयी, एच.डी. देवेगौड़ा और इंद्रकुमार गुजराल प्रधानमंत्री हुए- इन सबने  क्या किया?

13. सोनिया गांधी तो सक्रिय राजनीति से कोसों दूर थीं। उन्होंने 1998 में आकर अध्यक्ष पद संभाला। उनके पहले सीताराम केसरी अध्यक्ष थे। उधर 1999 में वाजपेयीजी पांच साल के लिए आ चुके थे। फिर ऐसा क्या हुआ कि 2004  में और दुबारा 2009 में सोनिया गांधी के नेतृत्व में यूपीए की सरकार बनी?


उपरोक्त तथ्य सिद्ध करते हैं कि यदि नेहरू-गांधी परिवार का कथित वंशवाद चल रहा है तो उसका श्रेय परिवार को नहीं, बल्कि उन लोगों को है जिनकी अपनी संकुचित राजनीति से जनता का मोहभंग होकर ''परिवार" को बार-बार आगे आने का मौका मिल जाता है।

प्रसंगवश यह कह देना चाहिए कि मोतीलाल नेहरू से लेकर सोनिया गांधी तक स्वाधीनता आंदोलन में और फिर स्वाधीन भारत की राजनीति में इस परिवार ने बढ़-चढ़ कर भूमिका निभाई है, तकलीफें उठाई हैं, कुर्बानियां भी दी हैं; जब जनता उनसे नाखुश हुई है तो उसने इनके नेतृत्व को खारिज करने में भी कोई संकोच नहीं किया, लेकिन उन नेताओं को क्या कहिएगा जिन्होंने मात्र दस-बीस साल के राजनैतिक कॅरियर का उपयोग अपने परिवारजनों को सत्तासुख हासिल करवाने में बेशर्मी के साथ किया? कांग्रेस, भाजपा, समाजवादी पार्टियां और क्षेत्रीय दल- सब इस व्याधि से ग्रस्त हैं।
देशबन्धु में 30 अक्टूबर 2014 को प्रकाशित

Friday, 24 October 2014

वंशवाद चिरजीवी हो!

 

महाराष्ट्र
और हरियाणा- इन दोनों के विधानसभा चुनावों के नतीजे लगभग वैसे ही हैं जिसका लोग पहले से अनुमान लगा रहे थे। यद्यपि चुनाव सर्वेक्षण करने वाली एजेंसियों ने एक बार फिर सिद्ध किया है कि वे सही भविष्यवाणी करने में समर्थ नहीं हैं। किसी का एक अनुमान सच निकला, तो किसी का दूसरा, लेकिन संपूर्ण, सटीक पूर्वानुमान कोई भी नहीं लगा सका। अब इनकी उपयोगिता सिर्फ इतनी है कि निठल्ले लोगों का वक्त इनको देखते हुए और इन पर बहस करते हुए कट जाता है। यही स्थिति उन कथित विशेषज्ञों की भी है, जो टी.वी. के पर्दे पर कुछ देर के लिए आकर अपने आपको गौरवान्वित कर लेते हैं। बहरहाल, भाजपा ने उपचुनावों में मिली हार को दरकिनार करते हुए विधानसभा चुनावों में विजय हासिल की है और स्वाभाविक रूप से उसके कार्यकर्ता और समर्थक उत्साहित हैं।

चुनाव परिणाम आने के बाद विशेषज्ञों ने जो विश्लेषण किया उसमें तीन बातें मुख्य रूप से कही गईं। एक तो यह दावा किया गया कि भारत से वंशवाद की राजनीति अब समाप्त हो चुकी है। दूसरे यह कि मतदाताओं ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपना निर्णय सुनाया है और अंतिम कि कांग्रेस पार्टी अपनी प्रासंगिकता खो चुकी है। मैंने इन नतीजों को जितना समझा है उसके आधार पर उपरोक्त निष्कर्षों से सहमत होना संभव नहीं है। चूंकि वंशवाद के मुद्दे को कुछ प्रमुखता के साथ ही उठाया गया है अत: पहले उसे ही देख लिया जाए। एक सरसरी निगाह से देखने से ही पता चल जाता है कि भारतीय राजनीति में वंशवाद खत्म होना तो दूर, बल्कि तेजी के साथ बढ़ रहा है। विधानसभा के साथ-साथ लोकसभा का एक उपचुनाव भी हुआ और उसमें गोपीनाथ मुंडे की बेटी प्रीतम मुंडे ने रिकार्ड बहुमत याने लगभग सात लाख अंतर के साथ विजय हासिल की। कह सकते हैं कि मतदाताओं ने श्री मुंडे की वंश-परंपरा जारी रखने के लिए ही यह उपहार दिया है।

महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे भले ही चुनाव हार गए हों, लेकिन उनके बेटे नितेश को विजयी बनाने में मतदाताओं ने संकोच नहीं किया। सुशील कुमार शिंदे की बेटी भी दुबारा विधायक चुन ली गई हैं। भले ही इसके पूर्व उनके माता-पिता दोनों चुनाव हार चुके हैं। विलासराव देशमुख के बेटे भी जीत गए हैं, जबकि छगन भुजबल एवं उनके पुत्र दोनों एक साथ विधानसभा में होंगे। इन सबसे अधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि स्वर्गीय गोपीनाथ मुंडे की दूसरी बेटी पंकजा न सिर्फ चुनाव जीत गई हैं बल्कि वे पिछले दो माह से लगातार दावा कर रही हैं कि महाराष्ट्र के युवा मतदाता उनको ही मुख्यमंत्री की गद्दी पर आसीन देखना चाहते हैं। यह कुछ वैसी ही बात हुई जैसे मेनका गांधी ने अपने बेटे वरुण को उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने का दावा ठोक रखा है।

अब तक कांग्रेस पर वंशवाद को बढ़ावा देने का एकांगी आरोप लगता रहा है, लेकिन ये तथ्य बतलाते हैं कि भारतीय जनता पार्टी भी इस रवायत से मुक्त नहीं है। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में शिवसेना भाजपा से युति तोड़कर दूसरे नंबर की पार्टी बन कर उभरी है। इसका अर्थ यह हुआ कि बाल ठाकरे की राजनैतिक विरासत लुप्त नहीं हुई है। विद्रोही राज ठाकरे की मनसे को सिर्फ एक सीट पर विजय मिली वह भी संकेत करती है कि लोग राज को नहीं बल्कि उद्धव को ही सही वारिस मानते हैं। उधर हरियाणा में भी जो राजनीतिक परिवार हैं उनका दबदबा कमोबेश पहले की तरह कायम है। सुषमा स्वराज की बहन की पराजय को अपवाद स्वरूप देखा जा सकता है। संभव है कि इसके लिए पार्टी की अंदरूनी खींचतान जिम्मेदार हो। याने इस तरह सुषमा स्वराज का प्रभाव कम करने की कोशिश की गई है! कुल मिलाकर देखा जा सकता है कि राजनीति में वंशवाद समाप्त होने की कल्पना फिलहाल एक असंभव कल्पना ही है।

इसी तरह भ्रष्टाचार का मुद्दा है।  एक टीकाकार ने निवर्तमान मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण की जीत पर उत्साहपूर्ण टिप्पणी की कि राजनीति में व्यक्तिगत ईमानदारी की कद्र अभी बाकी है। यह कथन आंशिक रूप से सही है। पृथ्वीराज चव्हाण निष्कलंक व्यक्तित्व के धनी हैं। उनकी विजय का स्वागत है। लेकिन क्या हर ईमानदार उम्मीदवार जीत पाता है और क्या वोटर बेईमान उम्मीदवार को सचमुच नापसंद करता है? अगर पृथ्वीराज चौहान की जीत ईमानदारी की जीत है तो फिर अजीत पवार की जीत को किस रूप में देखा जाएगा, जिनके ऊपर तमाम आरोप लगे और जिन्हें कुछ समय के लिए उपमुख्यमंत्री पद भी छोडऩा पड़ा? ऐसे अन्य उदाहरण महाराष्ट्र में भी हैं और हरियाणा में भी। इनको देखकर यही धारणा बनती है कि चुनाव जीतने या हारने के लिए कोई एक कारण जिम्मेदार नहीं होता।

जहां तक कांग्रेस पार्टी के दिन लदने की बात है तो आज के माहौल में इस तरह की प्रतिक्रिया आश्चर्यजनक नहीं है। यह तो दिख ही रहा है कि कांग्रेस का जनाधार सिमटा है और पार्टी के सामने नेतृत्व का संकट  है। लेकिन अगर जनतांत्रिक राजनीति में विपक्षी दल की कोई भूमिका है तो राष्ट्रीय स्तर पर इसके लिए कांग्रेस के अलावा दूसरी कौन सी पार्टी है? समाजवादियों के बीच नए-नए समीकरण बन रहे हैं। पुराने गिले-शिकवे मिटाकर बड़े नेता हाथ भी मिलाकर रहे हैं, गले भी लग रहे हैं, लेकिन एक शरद यादव के अलावा कौन है, जो राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय राजनीति की समझ रखता हो?  वैसे भी हिन्दी प्रदेशों के बाहर समाजवादी पार्टियां फिलहाल कहां हंै? कुछ ऐसी ही स्थिति कम्युनिस्ट पार्टियों की भी है। इसलिए कांग्रेस की सत्ता से बेदखली से भले ही लोगों को खुशी हो, देश की राजनीतिक सेहत के लिए विपक्ष के रूप में आज भी उसकी प्रासंगिकता बरकरार है।

इन दो राज्यों के चुनावी नतीजों से जुड़े दो-तीन और बिन्दु हैं जिन्हें ध्यान में रखना उचित होगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वयं धुंआधार चुनावी सभाएं दोनों राज्यों में कीं। ऐसा पहली बार हुआ है कि प्रधानमंत्री विधानसभा चुनावों में इतनी दिलचस्पी ले। फिर भाजपा की रणनीति की बात भी सामने आती है। बहुत से विश्लेषक मानते हैं कि महाराष्ट्र में भाजपा ने शरद पवार की राकांपा के साथ कोई गुप्त समझौता कर लिया था। अगर यह सच है तो, इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। दूसरी तरफ हरियाणा में भाजपा ने डेरा सच्चा सौदा से खुला समर्थन हासिल किया। ज्ञातव्य है कि शिरोमणि अकाली दल और डेरा सच्चा सौदा के बीच भारी कटुता है। इसका अर्थ यह हुआ कि हरियाणा और महाराष्ट्र दोनों प्रदेशों में भाजपा ने अपने पूर्व सहयोगियों का साथ छोड़ दिया। यही नहीं, एक तरफ नरेंद्र मोदी ने महाराष्ट्र के अखंड रहने की सिंह गर्जना की तो देवेंद्र फडऩवीस ने पृथक विदर्भ का मुद्दा उठाने में कोई संकोच नहीं किया। इन कलाबाजियों के क्या परिणाम होते हैं यह भविष्य बताएगा।

कांग्रेस का जहां तक सवाल है उसके चुनाव अभियान में कोई गर्माहट नहीं थी। क्या इसकी वजह यह है कि सोनिया गांधी स्वास्थ्य के चलते संगठन पर अपेक्षित ध्यान नहीं दे पा रहीं हैं? राहुल गांधी की सक्रिय राजनीति से वितृष्णा दिनोंदिन ज्यादा प्रकट होती जा रही है। प्रियंका गांधी बड़ी जिम्मेदारी लेने से बार-बार इंकार कर चुकी हैं। ऐसे में कांग्रेस अध्यक्ष के लिए यह उचित होगा कि वे चाटुकारों, अवसरवादियों और जमीन से कट चुके नेताओं को रिटायर कर नयी टीम को जिम्मेदारी सौंप दें ताकि पार्टी अपनी ऐतिहासिक भूमिका की अर्थवत्ता को कायम रख सके।
देशबन्धु में 23 अक्टूबर 2014 को प्रकाशित

Thursday, 16 October 2014

'निर्मल' बनाम 'स्वच्छ' भारत


 महात्मा गांधी के जन्मदिन 2 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत कर एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर देशवासियों का ध्यान आकृष्ट किया है। उस दिन स्वयं प्रधानमंत्री  हाथ में झाड़ू लेकर सड़क पर आए जिसका अनुसरण उनके मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और सरकारी अफसरों ने भी कर सांकेतिक रूप से सही संदेश दिया। हम इस पहल की सराहना करते हैं यद्यपि शुरूआती उत्साह के बाद अभियान की क्या गति होगी और क्या परिणाम निकलेंगे, पूर्व अनुभवोंं के आधार पर इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। दरअसल, भारत एक उत्सवप्रिय देश है जहां अवसर कोई भी हो, उसे आनन-फानन में आडंबर में तब्दील किया जा सकता है। ऐसे  मौकों पर फोटोग्राफरों, पत्रकारों और टी.वी. कैमरों के जमावड़े से माहौल एक दिव्य अनुभूति में परिणत हो जाता है। सवाल यही है कि क्या प्रधानमंत्री की इस पहल को पर्याप्त गंभीरता से अमल में लाया जा सकता है?

हमारे देश को स्वच्छ-निर्मल बनाने का, गंदगी और कूड़ा-करकट से मुक्त करने का, जनता में नागरिकता बोध जागृत करने का यह पहला प्रयत्न नहीं हैं। पाठकों को स्मरण कराने की आवश्यकता नहीं है कि यूपीए सरकार के दौरान विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने की लिए अतुल्य भारत नाम से जो अभियान चलाया गया था उसमें आमिर खान बार-बार लोगों को सभ्य आचरण करने के लिए प्रेरित करते नजर आते थे। यह अभियान लंबे समय तक चला, लेकिन इसका वांछित असर नहीं हुआ। यूपीए सरकार ने ही निर्मल भारत अभियान की भी शुरूआत की थी। हर साल राष्ट्रपति के हाथों देश के दर्जनों कथित निर्मल ग्रामों को पुरस्कृत भी किया जाता था, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही होती थी। मैंने सुना है कि अब एक सरकारी आदेश के द्वारा निर्मल भारत का ही नाम बदलकर स्वच्छ भारत कर दिया गया है। उस मद में जो बजट प्रावधान किया गया था, वह नए नाम पर हस्तांतरित कर दिया गया है। दूसरे शब्दों में योजना वही पुरानी, नाम नया!

प्रधानमंत्री अभियान को एक नया नाम देकर श्रेय लेना चाहते हैं तो इसमें कोई खास बुराई नहीं है, क्योंकि कुछ भी हो समस्या तो गंभीर है और उस पर ध्यान देना भी उतना ही आवश्यक है। श्री मोदी ने गांधी जयंती के बाद नेहरू जयंती और इंदिरा जयंती से भी इस कार्यक्रम को जोड़ दिया है। उसके राजनीतिक निहितार्थ हैं जिनका संज्ञान लेना चाहिए। श्री मोदी पर यह आरोप लग सकता है कि वे गांधी, नेहरू और इंदिरा जैसी महान शख्सियतों के योगदान को एक छोटे से दायरे में समेट कर उनका कद छोटा करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसा करने से श्री मोदी का कद नहीं बढ़ेगा। उनकी राजनीति इन राष्ट्रीय नेताओं से एकदम विपरीत दिशा में है। इसलिए वे इनका नाम न भी लेते तो काम चल जाता। भाजपा के प्रधानमंत्री ने अपने प्रेरणा पुरुषों याने वी.डी.सावरकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी अथवा दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर अभियान की शुरूआत की होती तो शायद उनकी पार्टी के भीतर भी बेहतर संदेश जाता।

बहरहाल, आइए इस मुद्दे पर राजनीति से अलग हटकर विचार करें। महात्मा गांधी के बारे में पूरी दुनिया जानती है कि वे आधी धोती पहनकर रहते थे। वे कागज के छोटे-से-छोटे पुर्जे को भी संभालकर रखते थे ताकि छोटे-मोटे संदेश उस पर लिख सकें। वे जमीन पर गिरी आलपिन भी उठाकर सहेज कर रख देते थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में हजारों पत्र लिखे होंगे किन्तु अधिकतर पत्र पोस्टकार्ड पर लिखे जाते थे। उनके जीवन का एक रोचक प्रसंग यहां एक बार फिर याद कर लेना उचित होगा। सुप्रसिद्ध लेखक जैनेन्द्र कुमार ने देश और समाज की स्थितियों पर चिंता व्यक्त करते हुए एक लंबा पत्र जब उन्हें लिखा तो बापू ने पोस्टकार्ड पर दो लाइन में उन्हें उत्तर लिखा भेजा कि- तुम अपने हाथों से पाखाने की सफाई शुरू कर दो, तुम्हारी सारी चिंताएं समाप्त हो जाएगी और आगे की राह मिल जाएगी। कहने का आशय यह कि गांधीजी की कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था। यह सत्य उनके नाम की माला जपने वाले हर व्यक्ति को याद रखना चाहिए।

यह देखें  कि भारत में स्वच्छता की समस्या इतनी बड़ी क्यों है और क्या यह सिर्फ भारत में ही है? इस समस्या के मूल में कौन से कारण हैं और क्या यह इनका निदान सिर्फ सार्वजनिक स्थलों पर झाड़ू लगाने से किया जा सकता है? गांधीजी ने तो कहा था कि यह धरती हर व्यक्ति की आवश्यकताओं को तो पूरी कर सकती है, लेकिन एक व्यक्ति के भी लालच को पूरा करने के लिए यह पर्याप्त नहीं है। उनका आशय था कि हर व्यक्ति को अपनी आवश्यकता सीमित रखना चाहिए ताकि पृथ्वी के संसाधनों का अनावश्यक दोहन न हो। लेकिन आज इस बात को कौन मान रहा है और क्या यही सबसे बड़ा कारण नहीं है कि भारत और अन्य देशों में कचरों के पहाड़ दिन पर दिन ऊंचे होते जा रहे हैं?

एक सामान्य उदाहरण लीजिए। पहले हम बाजार जाते थे तो हाथ में या सायकल के हैंडिल में टांग कर एक झोला अवश्य ले जाते थे। उसी में सब्जी-किराना आ जाता था। आज हर जगह, हर वक्त प्लास्टिक की थैलियां हमें क्यों चाहिए? मैं देखता हूं कि रेडीमेड कपड़ों की पैकिंग में दुनिया भर का फिजूल सामान लगता है। झिल्ली वाला कागज, आलपिन, क्लिप, पॉलीथीन, मोटे कागज पर छपे टेग, कार्ड बोर्ड- इन सबकी क्या  जरूरत है? घर आकर इन्हें फेंकना ही पड़ता है। शादी-ब्याह की साडिय़ों आदि में भी तरह-तरह से सजावट की जाती है। उसमें भी फालतू सामान लगता है। अगर यह तय कर लिया जाए कि कपड़े हों या अन्य कोई सामग्री, उसकी पैकिंग न्यूनतम की जाएगी तो समय बचेगा, साधन बचेंगे और पैसा भी बचेगा। एक छोटा सा उदाहरण और लीजिए। शोरूम से जब नई कार बाहर निकलती है तो उसमें रिबिन क्यों लगाए जाते हैं। ये रिबिन बाद में किस काम में आते हैं?

इस तथ्य पर गौर करना उचित होगा कि पिछले पच्चीस-तीस वर्षों में दुनिया में पैकेजिंग व्यवसाय बहुत तेजी के साथ बढ़ा है। इसके चलते कागज, एल्युमीनियम, लकड़ी, प्लास्टिक और भांति-भांति के रसायन- इनके उपभोग में भी बहुत ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। जो कपनियां पैकेजिंग में काम आने वाली सामग्री का निर्माण या उत्पादन करती हैं वे तो अरबपति और खरबपति हो गए हैं, लेकिन इन तमाम सामग्रियों का एक बार के बाद दुबारा उपयोग संभव नहीं होता और वही सारा कचरा नालियों में सड़क किनारों पर, रेल पटरियों के किनारे बिखरा हुआ देखने मिलता है। यूं तो रिसाइक्ंिलग की बहुत बात की जाती है, लेकिन उसका शायद पांच प्रतिशत भी रिसाइकल नहीं हो पाता। फिर सवाल यह भी उठता है कि इन कचरे को आप इकट्ठा कर भी लें तो उसे आगे कहां भेजा जाए। आजकल विशालकाय गड्ढे खोदकर उनमें कचरा भरा जा रहा है, लेकिन वह भी कब तक? उसमें भी वायु प्रदूषण व जल प्रदूषण फैलने का खतरा विद्यमान है।

इधर गांवों में शौचालय निर्माण की बात जोर-शोर से हो रही है। उसकी शहरों में जरूरत तो निश्चित है, लेकिन गांवों में खेतों के बीच रहने वालों के लिए पक्के शौचालय एक छोटी सीमा तक ही उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं। शहरों की समस्या यह है कि नगरपालिकाओं का काम-काज बेढब चलता है। उन्हें प्रदेश सरकार के इशारों पर नाचना पड़ता है। सही अर्थों में स्वायत्तता नहीं है इसलिए नगरपालिका या नगरनिगम में कहीं भी जिम्मेदारी का अहसास देखने नहीं मिलता। फिर सफाई कर्मचारियों के प्रति समाज का जो रवैया है वह भी किसी से छुपा नहीं है। जहां तक गांव की बात है वहां खेतों में विसर्जित मलमूत्र खाद के काम आता है यह सामान्य समझ है। कुल मिलाकर यदि प्रधानमंत्री अपने स्वच्छ भारत अभियान को सफल होते देखना चाहते हैं तो इसके लिए उन्हें समारोहप्रियता छोड़कर ठोस और दूरगामी नीति बनाने पर ध्यान देना होगा।
देशबन्धु में 16 अक्टूबर 2014 को प्रकाशित

Sunday, 12 October 2014

नवसाक्षर साहित्य लेखन की चुनौतियां


 राष्ट्रीय पुस्तक न्यास याने नेशनल बुक ट्रस्ट और छत्तीसगढ़ राज्य संसाधन केंद्र ने पिछले दिनों रायपुर के निकट चंपारन में नवसाक्षर साहित्य लेखन पर एक कार्यशाला का आयोजन किया। मुझे इसका निमंत्रण मिला तो इस बहाने एक लगभग अछूते विषय पर विचार करने का अवसर भी हाथ आया। भारत में साक्षरता अभियान एक लंबे समय से चल रहा है। बहुत पहले याने लगभग साठ वर्ष पूर्व राज्यों में प्रौढ़ शिक्षा का कार्यक्रम चलता था। ऐसा मुझे ध्यान आता है कि पुराने मध्यप्रदेश (तब के सीपी एवं बरार) में नवसाक्षर प्रौढ़ों के लिए प्रदीप नाम की पत्रिका भी प्रकाशित होती थी। तीन-चार दशक तक तो यह कार्यक्रम लस्टम-पस्टम चलता रहा। इसमें गति आई 1990 के आसपास जब केरल के एर्नाकुलम जिले के उत्साही युवा जिलाधीश ने अपने जिले को संपूर्ण साक्षर करने की मुहिम शुरू की तथा इसमें केरल शास्त्र साहित्य परिषद का सहयोग हासिल किया। जैसा कि हम जानते हैं बहुत जल्दी ही एर्नाकुलम को देश का पहला संपूर्ण साक्षर जिला व केरल को पहला संपूर्ण साक्षर प्रांत बनने का गौरव हासिल हुआ।

एर्नाकुलम की सफलता से उत्साहित होकर देश में साक्षरता अभियान को एक नई ऊर्जा मिली। इस काम को गति देने के लिए एक सुव्यवस्थित ढांचा बनाया गया। अनिल बोर्डिया, लक्ष्मीधर मिश्रा, सुदीप बनर्जी तथा जगमोहन सिंह राजू जैसे ध्येयनिष्ठ अधिकारियों ने अपने-अपने समय में देश को संपूर्ण साक्षर बनाने के अभियान पर अथक परिश्रम किया। अभियान का नाम समय-समय पर बदलता रहा। स्वरूप में भी यदाकदा परिवर्तन हुए, लेकिन अभियान की मूल भावना को बरकरार रखा गया। इसका ही परिणाम है कि साक्षरता दर में निरंतर वृद्धि हो रही है। यह दर पुरुषों में ज्यादा है, लेकिन महिलाएं भी अब बहुत पीछे नहीं हैं। आदिवासी अंचलों में, पहाड़ी इलाकों में, घुमंतू समाज में वृद्धि की दर अपेक्षित स्तर पर नहीं है, लेकिन इस ओर केन्द्र और राज्य सरकारों का ध्यान लगातार बना हुआ है। शासकीय योजनाओं में जो कमजोरियां अन्य क्षेत्रों में अमूमन देखने मिलती हैं वे कुछ हद तक यहां भी विद्यमान हैं लेकिन स्थिति निराशाजनक नहीं है।

यदि प्रारंभिक काल में साक्षरता का लक्ष्य व्यक्ति को महज अक्षर ज्ञान और अंक ज्ञान कराने तक सीमित था तो आज उसने एक बड़ा और महत्वाकांक्षी रूप ले लिया है। अब सिर्फ प्रौढ़ साक्षरता की बात नहीं होती। उसके साथ सतत् शिक्षा का मूल्य भी जोड़ दिया गया है। अनुभव से यह पाया गया कि अक्षर ज्ञान के बाद यदि नवसाक्षर की रुचि आगे पढऩे में न हुई तो वह वापस निरक्षरता की अंधेरी गुफा में लौट सकता है। दूसरे शब्दों में साक्षरता अभियान में जुटे कार्यकर्ताओं के सामने यह चुनौती भी है कि वे नवसाक्षरों को आगे पढऩे के लिए लगातार प्रोत्साहित करते रहें। ताकि एक बार साक्षर हमेशा के लिए शिक्षित। इसके साथ यह भी माना गया कि पढऩा-लिखना सीख जाना ही अपने आप में उद्देश्य नहीं है, बल्कि साक्षर होने का लाभ व्यक्ति के कौशल विकास में अर्थात् बेहतर आजीविका हासिल करने की भावना से युक्त होना चाहिए। इधर दो-तीन वर्षों में विशेषज्ञों ने साक्षरता के भीतर निहित अन्य संभावनाओं की भी पड़ताल की। फलस्वरूप चुनावी साक्षरता, वित्तीय साक्षरता, विधिक साक्षरता जैसी संज्ञाएं अभियान में प्रचलित हुईं।

कुल मिलाकर भारत में साक्षरता अभियान एक बुनियादी चुनौती का सामना करने के स्तर से उठकर नवसाक्षरों के लिए बेहतर संभावनाओं के द्वार खोलने वाले कार्यक्रम में परिवर्तित हो गया है। मुझे लगता है कि इतनी प्रगति के बाद भी चुनौतियों का अंत नहीं है। जिस समय दुनिया में लिपि का आविष्कार नहीं हुआ था उस समय निरक्षरता जैसी कोई समस्या भी नहीं थी। लिपि और उसके बाद छापाखाने के आविष्कार के बाद समाज दो हिस्सों में बंटने लगा-साक्षर और निरक्षर। फिर वाचिक परंपरा और लिखित परंपरा दोनों अपने-अपने तरीके से विकसित होते गईं। आज के दौर में उपलब्ध तकनीकों के चलते एक नए किस्म का अलगाव पैदा हो गया है। एक बड़ा वर्ग है जो कम्प्यूटर-अज्ञानी है। जिसे कम्प्यूटर, इंटरनेट और स्मार्ट फोन का इस्तेमाल करना न आए वह आधुनिक समय का निरक्षर कहलाने लगा है। इसीलिए इन दिनों शिक्षा और साक्षरता दोनों क्षेत्रों में सूचना प्रौद्योगिकी पर जोर दिया जाने लगा है।

जब बात नवसाक्षरों के लिए साहित्य रचने के लिए हो तो उसमें उपरोक्त बिन्दुओं का ध्यान रखना आवश्यक है। नवसाक्षरों के लिए साहित्य सृजन कार्य में अंतर्निहित और भी जटिलताएं हैं जिनको समझे बिना उनके लिए पाठ्य सामग्री सही ढंग से तैयार नहीं की जा सकती। भारत में खासकर हिन्दी भाषा में एक बड़ी कठिनाई है। अधिकतर हिन्दी लेखक हाथीदांत की मीनारों में रहते हैं। उनका लेखन जनसामान्य के लिए नहीं होता। यही वजह है कि हमारी अपनी भाषा में बच्चों तक के लिए रचनाएं लिखने को निकृष्ट कार्य माना जाता है और जो बाल साहित्य लिखते हैं उनकी कहीं कोई गिनती ही नहीं होती। इस मानसिकता के चलते नवसाक्षरों के लिए लिखना तो और भी बड़ी जोखिम उठाना है।

नवसाक्षर अबोध बालक नहीं होता। जिनके लिए साक्षरता अभियान चलाया गया है वे पन्द्रह से पैंतीस वर्ष तक या उससे भी अधिक आयु के होते हैं। जाहिर है कि ये नवसाक्षर वैचारिक परिपक्वता एवं अनुभव के भिन्न-भिन्न स्तरों पर हैं। इनके लिए उस तरह से पठन सामग्री तैयार नहीं की जा सकती जो स्कूल में कक्षा विशेष या आयु समूह विशेष के लिए तैयार होती है। ऐसे में प्रश्न उपस्थित होता है कि पन्द्रह और पैंतीस के आयु के बीच संतुलन कैसे साधा जाए। इन्हें अब क ख ग अथवा अमर घर चल के स्तर की पढ़ाई भी नहीं करवा सकते। इनके पास अनुभवों की थोड़ी बहुत पूंजी है। जीवन और जगत को इन्होंने खुली आंखों से देखा है। इनकी रुचि ऐसा साहित्य पढऩे में ही होगी जिसका तादात्म्य वे अपने अनुभव के साथ बैठा सकें। मुझे ध्यान आता है कि 1991-1992 में जब संपूर्ण साक्षरता अभियान की शुरूआत हुई थी तब पढ़ाई अ अनार का से न होकर म मकान का से शुरू होती थी। कालांतर में इसमें और भी परिवर्तन हुए।

नवसाक्षरों के अनुभव स्तर और मनोविज्ञान को समझकर लिखना एक सीढ़ी पार कर लेना है। इसके बाद सवाल पैदा होता है कि नवसाक्षर साहित्य में किस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया जाए। अनेक अध्यापकनुमा लेखक संस्कृतनिष्ठ, गरिष्ठ हिन्दी का प्रयोग करते हैं। इससे लेखक की विद्वता का आतंक भले ही तारी होता हो, पाठक के पल्ले कुछ नहीं पड़ता। आवश्यकता इस बात की है कि विशेष कर नवसाक्षरों के लिए लिखते हुए आमफहम शब्दावली में अपनी बात कही जाए। मैं इस दृष्टि से प्रेमचंद और हरिशंकर परसाई को आदर्श मानता हूं। उनके लिखे में एक ओर जहां विचारों की गहराई है, वहीं दूसरी ओर उनकी भाषा तरल-सरल और बोधगम्य है। नवसाक्षर को लिखित भाषा से डर नहीं लगना चाहिए बल्कि वह उसमें डूब सके ऐसा आकर्षण होना चाहिए। यदि ऐसा कर लिया तो दूसरी सीढ़ी पार कर ली।

नवसाक्षर के लिए विषय चयन में भी रोचकता का ध्यान रखना आवश्यक है। वह जिन अनुभवों से दिन-प्रतिदिन गुजरता है उनके बारे में पढऩे में उसे अधिक रुचि होती है। वह अपने स्थानीय परिवेश को जानता है। अपने नदी-पहाड़ खेत-खलिहान, पशु-पक्षी इनसे उसका आत्मीय परिचय है। इनको अवलंब बना किस तरह की कहानियां लिखी जा सकती है यह विचार करना होगा। प्रेमचंदजी की पंच परमेश्वर, दो बैलों की कहानियां, बड़े भाईसाहब, ईदगाह और पंडित मोटे राम शास्त्री की कहानी इस दिशा में लेखकों का मार्गदर्शन कर सकती है। एक बार जब नवसाक्षर का मन पढऩे में लग जाए, वह किताबों से प्रेम करने लगे, तब उसे कुछ गंभीर प्रश्नों पर किए लेखन की ओर प्रवृत्त किया जा सकता है। जब कौशल विकास अथवा चुनावी साक्षरता आदि  की बात हो तब सबसे पहले ध्यान शायद स्वराज्य और जनतंत्र जैसे अहम् मुद्दों पर देना चाहिए जो कि एक बेहतर नागरिक होने के लिए बेहद आवश्यक है।
लेखकगण विचार करें कि त्रिस्तरीय पंचायतीराज व्यवस्था के प्रावधानों के बारे में नवसाक्षरों की रुचि कैसे जगाई जा सकती है। वे प्रतिनिधि जनतंत्र और सहभागी जनतंत्र का फर्क समझने लगें; पंचायतीराज व्यवस्था को मजबूत करने की ओर उनका ध्यान जाए; यहां से वे अन्य विषयों की ओर आएं। इन सबके अलावा एक विशेष बात ध्यान रखने की यह भी है कि नवसाक्षर के पास, वह स्त्री हो या पुरुष, समय की कमी है। वह गृहिणी हो सकती है या फिर किसान या मजदूर या कारीगर। दिन भर की मेहनत से थकने के बाद उसे पुस्तकों की ओर आकर्षित करना आसान काम नहीं है। ये कुछ बातें हैं जो नवसाक्षर साहित्य लिखने वालों के सामने एक कठिन चुनौती के रूप में उपस्थित हैं।

 (16 सितम्बर को दिए गए उद्घाटन वक्तव्य का परिवर्धित रूप)
देशबन्धु में 8 अक्टूबर 2014 को प्रकाशित

Friday, 3 October 2014

माधवराव सप्रे



 यह सन् 1965 की बात है। रायपुर के दुर्गा महाविद्यालय ने प्रदेश के पांच मूर्धन्य साहित्यकारों का सम्मान करने का निर्णय लिया, वे थे- मुकुटधर पाण्डेय, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, मावलीप्रसाद श्रीवास्तव, बलदेव प्रसाद मिश्र एवं सुंदरलाल त्रिपाठी। इसी अवसर पर छत्तीसगढ़ के साहित्य एवं संंस्कृति पर केन्द्रित एक स्मारिका ''व्यंजना'  शीर्षक से प्रकाशित करने का निर्णय भी लिया गया। महाविद्यालय में एक वर्ष पूर्व ही एम.ए. की पढ़ाई शुरू हुई थी। मैं अंतिम वर्ष का विद्यार्थी था। साथ ही हिन्दी साहित्य परिषद का अध्यक्ष भी। मेरे अध्यापकों ने मुझ पर विश्वास रखते हुए स्मारिका के छात्र संपादक का दायित्व भी मुझे सौंप दिया था। उस समय मैंने अपने सहपाठियों से साहित्य-संस्कृति के विभिन्न पहलुओं पर लेख लिखवाए, और स्वयं भी एक-दो लेख लिखे। इस निजी संस्मरण के बाद मैं आज के विषय पर आता हूं।

मैंने स्वयं व्यंजना में छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता पर निबंध लिखने का निश्चय किया था। इस सिलसिले में जब सामग्री जुटाना प्रारंभ किया तो बहुत से अन्य तथ्यों के अलावा यह भी मालूम पड़ा कि छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता का श्रीगणेश नई सदी की दहलीज पर याने सन् 1900 में माधवराव सप्रे ने प्रदेश के एक छोटे से ग्राम पेण्ड्रारोड से ''छत्तीसगढ़ मित्र" नामक मासिक पत्रिका निकालकर किया था। मेरी पीढ़ी को सामान्यत: सप्रेजी के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं थी। इतना अवश्य हम जानते थे कि एक अंग्रेज अफसर के नाम पर रखे गए लॉरी स्कूल का नाम नगरपालिका ने बदलकर माधवराव सप्रे शाला कर दिया था। मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा 1950 में प्रकाशित गोविन्दराव हार्डिकर द्वारा लिखित व सप्रेजी की जीवनी घर की लाइब्रेरी में थी, लेकिन उसकी ओर मेरा ध्यान पहले नहीं गया था।

इस तरह सप्रेजी को मैंने सबसे पहले छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता के अग्रपुरुष के रूप में जाना।  गो कि उनकी रचनाओं से मैं बहुत ज्यादा वाकिफ नहीं हो सका था फिर भी उनके प्रति एक आदर का भाव तो मन में विकसित हो ही चुका था। आज भी छत्तीसगढ़ सप्रेजी को प्रदेश में पत्रकारिता के जनक के रूप में ही मुख्य तौर पर जानता है और उनके इस योगदान के प्रति उचित ही गर्व करता है। यह बात अलग है कि जब नया राज्य बना तो प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने उन्हें एक पितृपुरुष के रूप में स्मरण किया, किन्तु जब एक दर्जन से ज्यादा पुरस्कार स्थापित किए तो उनमें से सप्रेजी का नाम नदारद था। उनके पश्चात भाजपा सरकार आई और पत्रकारिता एवं जनसंचार वि.वि. की स्थापना होने लगी तो उसका नामकरण माधवराव सप्रे के नाम पर न कर कुशाभाऊ ठाकरे के नाम पर किया गया। यह देखकर नागार्जुन की पंक्ति बरबस याद आती है- शासन के सत्य कुछ और हैं, जनता के कुछ और।

खैर! इस लंबे अंतराल में माधवराव सप्रे के व्यक्तित्व और कृतित्व को लेकर बहुत कुछ कहा और लिखा गया है। सप्रेजी का नाम राष्ट्रव्यापी चर्चा में उस समय एकाएक उभर कर आया जब ''टोकरी भर मिट्टी का" पुनप्र्रकाशन सारिका में इस दावे के साथ हुआ कि यह हिन्दी की पहली कहानी है। यह कहानी एक पुरानी लोककथा पर आधारित थी एवं उसका प्रथम प्रकाशन अप्रैल 1901 में ही छत्तीसगढ़ मित्र में हुआ था। रायपुर के चर्चित साहित्यकार देवीप्रसाद वर्मा (बच्चू जांजगीरी) ने इसका पुनप्र्रकाशन करवाया था और तब एक तरह से सारिका के संपादक कमलेश्वर व बच्चू भाई दोनों को हिन्दी की पहली कहानी की खोज करने का श्रेय संयुक्त रूप से मिला। इस स्थापना से मेरी प्रारंभ से असहमति रही है। एक लोककथा जो सप्रेजी के समय में भी प्रचलित रही होगी, को लिपिबद्ध कर देने मात्र से क्या उसे मौलिक रचना माना जा सकता है? ऐसा कोई श्रेय स्वयं सप्रेजी ने भी नहीं लिया।

बहरहाल सप्रेजी के लेखन से मैंने कुछ बेहतर परिचय प्राप्त किया सन् 1979 में जब मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन से एक पुस्तक माला के अंतर्गत ''माधवराव सप्रे के निबंध" शीर्षक पुस्तक प्रकाशित हुई। यह पहल सम्मेलन के अध्यक्ष मेरे स्व. पिता मायाराम सुरजन की थी। इस पुस्तक का संपादन बच्चू जांजगीरी ने किया। यद्यपि सप्रेजी ने अपने जीवनकाल में सैकड़ों निबंध लिखे, लेकिन बच्चू भाई ने अलग-अलग विषयों से चयन कर चौदह लेखों का संकलन तैयार किया ताकि उससे सप्रेजी के विस्तृत विचार संसार की एक झलक पाठकों को मिल सके। मुझे इस पुस्तक में छठवें क्रम पर प्रकाशित ''हड़ताल" शीर्षक लेख ने तुरंत ही प्रभावित किया। यह निबंध प्रथमत: 1907 में प्रकाशित हुआ था और मेरे लिए यह विस्मयजनक था कि सौ वर्ष पूर्व इस विषय पर कोई लेख लिखा जा सकता था ! इसमें हड़ताल के बारे में सप्रेजी ने जो विचार व्यक्त किए उनसे यह अनुमान भी हुआ कि वे अपने समय से आगे एक उदारवादी दृष्टिकोण रखते थे, मुझे इस बात ने और भी आकर्षित किया।

इस निबंध के कुछ अंश यहां प्रस्तुत हैं -


''जब किसी देश में सम्पत्ति थोड़े-से पूंजी वालों के हाथ में आ जाती है और अन्य लोगों को मजदूरी से अपना निर्वाह करना पड़ता है तब पूंजी वाले अपने व्यापार का सब नफा स्वयं आप ही ले लेते हैं और जिन लोगों के परिश्रम से यह सम्पत्ति उत्पन्न की जाती है, उनको वे पेट भर खाने को नहीं देते। ऐसी दशा में श्रम करने वाले मजदूरों को हड़ताल करनी पड़ती है।"

''मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा है कि वह अपने नफे का हिस्सा किसी दूसरे को देना नहीं चाहता। जो पूंजी वाले अपनी पूंजी लगाकर, बड़े-बड़े व्यवसाय करते हैं, वे यही चाहते हैं कि सब नफा अपने ही हाथों में बना रहे, जिन मजदूरों के श्रम से व्यवसाय किया जाता है, उनको उस नफे का कुछ भी हिस्सा न मिले। इसी को अर्थशास्त्र में 'पूंजी और श्रम का हित-विरोध' कहते हैं।"


''यदि मजदूर अपने श्रम को कारखाने वालों के मुंहमांगे दाम पर न बेचे तो क्या वे दोषी या अपराधी हो सकते हैं? कदापि नहीं। नीति-दृष्टि से वे किसी प्रकार दोषी नहीं कहे जा सकते। अत: जब एक श्रम करने वाले मजदूर अधिक तनख्वाह पाने, या अपनी तनख्वाह की दर घटने न देने, या अपने अन्य दुखों को दूर करने के लिए एकत्र होकर हड़ताल करते हैं, तब (जब
तक वे औरों की स्वाधीनता को भंग न करें, तब तक) उन्हें किसी तरह दोषी समझना न चाहिए।"

 जैसा कि हमने ऊपर उल्लेख किया है माधवराव सप्रे पर इस बीच बहुत काम हुआ है। उनके पौत्र भौतिकीविज्ञानी डॉ. अशोक सप्रे ने रायपुर में पंडित माधवराव सप्रे साहित्य शोध केन्द्र की स्थापना की। यहां से छत्तीसगढ़ मित्र के पुराने अंक तो दुबारा छपे ही, नए कलेवर में पत्र का पुनप्र्रकाशन भी प्रारंभ हुआ। सप्रेजी की कृतियों का पुनर्मुद्रण भी अपनी गति से यहां से हो रहा है। यही नहीं, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार वि.वि. में भी माधवराव सप्रे शोधपीठ स्थापित कर दी गई है। इस पीठ की अपनी महत्वाकांक्षी योजनाएं हैं। लेकिन इन सारी गतिविधियों का अवलोकन करते हुए मेरी यह धारणा बन रही है कि हमने एक ओर तो सप्रेजी को छत्तीसगढ़ तक सीमित करके रख दिया है और दूसरे यह कि उनकी कृतियों की जैसी सम्यक् विवेचना होना चाहिए उसका अभाव बना हुआ है।

ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखने पर ज्ञान होता है कि सप्रेजी ने अपने रचनात्मक जीवन का एक बहुत छोटा हिस्सा छत्तीसगढ़ में व्यतीत किया। छत्तीसगढ़ मित्र को वे कोई तीन साल ही चला सके। इसके बाद उन्होंने नागपुर और जबलपुर में लंबा समय बिताया। यह दु:खद तथ्य है कि इन नगरों में सप्रेजी के योगदान को चिरस्थायी बनाने के लिए कोई विशेष प्रयत्न नहीं हुए। जब सप्रेजी छत्तीसगढ़ मित्र निकाल रहे थे उसी समय 1902  में नागरी प्रचारिणी सभा ने हिन्दी विज्ञान कोश प्रकाशन करने का निर्णय लिया था। पांच खण्डों के इस ग्रंथ में सप्रेजी को अर्थशास्त्र खंड संपादित करने का दायित्व सौंपा गया था। उनके साथी संपादकों में महावीर प्रसाद द्विवेदी और बाबू श्याम सुंदर दास जैसे विद्वान भी थे। इससे सप्रेजी की बौद्धिक क्षमता का अनुमान किया जा सकता है।

माधवराव सप्रे 1903 के आसपास नागपुर चले गए थे। यहां उन्होंने 1905 में हिन्दी ग्रंथ प्रकाशक मंडली की स्थापना में सहयोग दिया तथा ''हिन्दी ग्रंथमाला" शीर्षक से पुस्तकों की श्रंखला प्रकाशित करने की योजना बनाई। इस ग्रंथमाला के अंतर्गत ही महावीर प्रसाद द्विवेदी के शिक्षा विषयक वे निबंध क्रमश: प्रकाशित हुए जो उन्होंने अंग्रेजी से रूपांतरित किए थे। इसके पश्चात 1907 में उन्होंने ''हिन्दी केसरी" का प्रकाशन प्रारंभ किया। कहने की आवश्यकता नहीं कि माधवराव सप्रे लोकमान्य तिलक से बहुत अधिक प्रभावित थे। वह दौर ही तिलक महाराज का था। वे कांग्रेस के सबसे बड़े नेता और स्वाधीनता संग्राम के अग्रणी नायक थे।  हिन्दी केसरी के प्रकाशन का उद्देश्य ''केसरी" में मूलरूप में प्रकाशित मराठी सामग्री को हिन्दीजनों के सामने लाना था। यह अपने आप में ऐसा महत्तर कार्य था जिसकी उपयोगिता स्वयंसिद्ध थी। यह संभवत: लोकमान्य के क्रांतिकारी व्यक्तित्व का ही असर रहा होगा कि 1906 में सप्रेजी ने ''स्वदेशी आंदोलन और बायकाट" शीर्षक पुस्तिका प्रकाशित की, जिसे अंगे्रज सरकार ने तीन साल बाद जब्त कर लिया।

माधवराव सप्रे के व्यक्तित्व का अनुशीलन करने से ऐसे संकेत मिलते हैं कि वे नई-नई योजनाएं बनाने में तो प्रवीण थे, लेकिन योजना प्रारंभ करने के बाद उसे आगे संभालना उनके लिए टेढ़ी खीर थी। जो हाल छत्तीसगढ़ मित्र का हुआ वही हिन्दी ग्रंथमाला का और हिन्दी केसरी का भी। वे कोई भी योजना प्रारंभ करने के लिए साधन तो जुटा लेते थे, लेकिन काम चलते रहने के लिए क्या प्रबंध हो इस बारे में उनकी असफलता ही देखने मिलती है। वे जब नागपुर में थे तभी उन्हें राजद्रोह के अपराध में जेल यात्रा भी करनी पड़ी, लेकिन तीन महीने बाद ही वे माफीनामा दे जेल से बाहर आ गए। इसमें भी हमें लगता है कि सप्रेजी किसी भी कार्य में प्रारंभिक उत्साह दर्शाने के बाद बहुत जल्दी विरक्त या विचलित होने लगते थे। वे जब एक के बाद एक उपरोक्त रचनात्मक गतिविधियों में व्यस्त थे, तभी उन्होंने वीर शिवाजी के गुरु समर्थ रामदास रचित ''दास बोध" की हिन्दी टीका भी प्रकाशित की। इसके कुछ वर्ष बाद वे जबलपुर चले आए। जबलपुर में उन्होंने हिन्दी के दो महत्वपूर्ण पत्र स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1920 की जनवरी में सिमरिया वाली रानी की कोठी से कर्मवीर का प्रकाशन हुआ। (प्रसंगवश मेरे शैशव का कुछ समय इस स्थान पर बीता)। माखनलाल चतुर्वेदी इसके प्रधान संपादक बनाए गए व लक्ष्मण सिंह चौहान उपसंपादक। यद्यपि प्रेरणा पुरुष सप्रेजी ही थे। यह वह पत्र है जिसमें तपस्वी सुंदरलाल जैसी विभूति ने भी काम किया। इसी वर्ष अप्रैल में ''श्री शारदा" का शुभारंभ हुआ। इन दोनों पत्रों को प्रकाशित करने में जबलपुर के कांग्रेसजन व अन्य उदारमना व्यक्तियों ने भरपूर सहयोग दिया। ''श्री शारदा" में मुख्यरूप से सेठ गोविंददास का योगदान था। कर्मवीर में छत्तीसगढ़ के जांजगीर के कुलदीप सहाय भी सहायक संपादक थे। उनके योगदान का भी समुचित मूल्यांकन अभी तक नहीं हुआ है। इस परिदृश्य में सप्रेजी हमारे सामने एक कल्पनाशील वास्तुकार के रूप में सामने आते हैं।

यह तो हमने देखा कि सप्रेजी ने अपने जीवनकाल में बहुत सारे विषयों पर लिखा, लेकिन आज उसका शोधपरक विश्लेषण एवं पुनर्मूल्यांकन करने की आवश्यकता है। सप्रेजी के समय देश का जो राजनैतिक, सामाजिक वातावरण था उसका भी ध्यान इस हेतु रखना होगा। सप्रेजी के समकालीन महावीर प्रसाद द्विवेदी इत्यादि की लेखनी की दिशा क्या थी इसका भी संज्ञान लिया जाना मैं आवश्यक समझता हूं। सप्रेजी के निबंधों में ऐसे अनेक विचार व्यक्त किए गए हैं जिन्हें वर्तमान की कसौटियों पर स्वीकार करने में हमें हिचक होती है। वे भारत का उल्लेख अनेक स्थानों पर आर्यभूमि के रूप में करते हैं। क्या यह विचार उनके मन में लोकमान्य की पुस्तक ''द आर्कटिक होम ऑफ वेदाज़" से मिला? वे हिन्दी और उर्दू को बिल्कुल अलग-अलग भाषा मानते हैं तथा धर्म से भी उसे जोड़ते हैं। उनके लेख में वर्ण व्यवस्था का समर्थन भी पढऩे मिलता है। एक बात हमें समझ आती है कि सप्रेजी का महात्मा गांधी के साथ नैकट्य स्थापित नहीं हुआ अन्यथा शायद उनके विचारों को हम एक नई दिशा में विकसित होते देख पाते। यूं दावा तो किया गया है कि महात्मा गांधी ने ''हिंद स्वराज" लिखने की प्रेरणा सप्रेजी के लेख ''स्वदेशी आंदोलन और बायकॉट" से प्राप्त की, किंतु हम इसे भक्ति भाव से उपजा कल्पना-कुसुम ही मानते हैं।

(रायपुर में 8 सितंबर 2014 को माधवराव सप्रे पर आयोजित विचार गोष्ठी में प्रस्तुत आलेख का परिवद्र्धित रूप)  
 
अक्षर पर्व अक्टूबर 2014 अंक की प्रस्तावना