Thursday, 14 May 2015

ग्रेट ब्रिटेन के आखिरी (?) चुनाव




 ग्रेट ब्रिटेन अथवा यूके के घटनाचक्र में भारत की दिलचस्पी मुख्यत: दो कारणों से रहती है। एक तो इसलिए कि अंग्रेजों के साथ हमारे संबंधों की एक लंबी ऐतिहासिक कड़ी जुड़ी हुई है। दूसरे इसलिए कि पिछले तीन दशकों के दौरान ब्रिटिश समाज में भारतवंशियों ने अच्छी खासी पैठ बना ली है। यही वजह थी कि ग्रेट ब्रिटेन में हाल में सम्पन्न आम चुनावों के प्रति भी भारत में काफी उत्सुकता देखी गई। इसके पीछे एक और कारण भी था। भारतीय मीडिया में इन चुनावों के बारे में कुछ ऐसी तस्वीर पेश की गई मानो भारतवंशी वोटर ही चुनावों में निर्णायक भूमिका अदा करेंगे। इसमें जो अतिरंजना थी उसका विश्लेषण करने की आवश्यकता नहीं समझी गई। इतना अवश्य था कि पिछली बार के मुकाबले इस बार अधिक संख्या में भारतीय मूल के ब्रिटिश नागरिक चुनावी मैदान में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।

बहरहाल चुनाव परिणाम सामने आ चुके हैं और इनसे ऐसे कुछ तर्क उभरते हैं जो भारतवासियों के लिए दिलचस्पी का सबब होने के साथ-साथ विचार मंथन का अवसर भी प्रदान करते हैं। सबसे पहले नोट करने लायक तथ्य तो यही है कि पूरे देश में एक साथ साढ़े छ: सौ सीटों पर 7 मई को चुनाव सम्पन्न हुए और उसी रात नतीजे आना भी शुरु हो गए। चौबीस घंटे बीतते न बीतते सारे परिणाम घोषित हो चुके थे। हमारे देश में जहां चुनाव प्रक्रिया सम्पन्न होने में डेढ़-दो माह का समय लग जाता है यह एक आश्चर्यजनक खबर ही है। हमारा चुनाव आयोग जो तैयारियां करता है वे हनुमान की पूंछ की तरह कभी खत्म होने में ही नहीं आती। उम्मीदवार और वोटर दोनों थकने और ऊबने लगते हैं। कई-कई हफ्तों तक जरूरी सरकारी काम भी ठप्प पड़ जाते हैं। ब्रिटेन के चुनावों से क्या हम अपनी चुनावी प्रक्रिया को अधिक सुगम बनाने की कोई तरकीब हासिल कर सकते हैं?

यह सही है कि ब्रिटेन की आबादी कम है, मतदाताओं की संख्या भी उस अनुपात में भारत के मुकाबले कहीं नहीं ठहरती, सुरक्षा प्रबंध भी देखना पड़ते हैं, किन्तु प्रश्न उठता है कि अपने लोकतंत्र के परिपक्व होने का प्रमाण हम कब दे पाएंगे? यह भी गौरतलब है कि हाउस ऑफ कॉमन्स के लिए छह सौ पचास सीटों पर चुनाव होता है। मोटे तौर पर एक-सवा लाख आबादी के लिए एक संसद सदस्य। जबकि हमारे यहां प्रति लोकसभा सीट मतदाताओं की संख्या औसतन दस लाख से अधिक ही होती है। मैं लंबे समय से वकालत करते आया हूं कि हमारी लोकसभा में कम से कम एक हजार सदस्य होना चाहिए याने आज की संख्या से दुगुने। तभी संसद सदस्य मतदाताओं के साथ किसी हद तक न्याय कर पाएगा तथा भ्रष्टाचार व लापरवाही पर भी अंकुश लगाने में कुछ मदद मिलेगी।

इन चुनावों में एक बेहद महत्वपूर्ण तथ्य और उभरा है कि सारे चुनाव पूर्व सर्वेक्षण ध्वस्त हो गए। सामान्य तौर पर माना जाता है कि इंग्लैंड, अमेरिका आदि में चुनावी सर्वेक्षण खरे उतरते हैं क्योंकि मतदाता वहां शिक्षित हैं तथा अपनी राय बेबाकी से प्रकट करने में हिचकते नहीं। यह धारणा इस बार टूट गई। ऐसा क्यों हुआ इसका विश्लेषण अभी मेरी निगाह से गुजरा नहीं है, लेकिन इतना तो तय है कि सर्वेक्षण करने वाली एजेंसियों की विश्सनीयता पर प्रश्नचिन्ह लग गया है। इसमें भारत के लिए सबक छुपा हुआ है। हमारे यहां चुनावी सर्वेक्षण को अपने पक्ष में प्रदर्शित करने के लिए राजनीतिक दल, खासकर भाजपा, जिस तरह का व्यायाम करते हैं वह जनता के सामने है। चुनावी सर्वेक्षण एजेंसी व उसे प्रकाशित करने वाले मीडिया दोनों की साख पर बार-बार धब्बा लगता है, लेकिन वे लोभ से बच नहीं पाते। आज एक बार फिर सोचने का वक्त है कि इन सर्वेक्षणों और भविष्यवाणियों पर पूरी तरह से पाबंदी क्यों न लगा दी जाए?

इस बार भारतवंशियों में चुनाव लडऩे के प्रति बेहद उत्साह था। भारतीय मूल के 59 प्रत्याशी चुनाव में खड़े हुए थे। इनमें से मात्र दस ही विजयी हुए, जबकि पिछली संसद में इनकी संख्या आठ थी। पारंपरिक तौर पर भारतवंशी लेबर पार्टी के साथ रहते आए हैं, लेकिन अब कईयों का रुख कंजर्वेटिव पार्टी या टोरियों की तरफ मुड़ गया है। प्रधानमंत्री कैमरन ने तो यहां तक उन्हें कहकर बहलाया कि आने वाले समय में कंजर्वेटिव पार्टी से ही कोई एशियाई या अश्वेत प्रधानमंत्री बनेगा। खैर! इसमें नोट करने लायक यह भी है कि भारतवंशियों के अलावा पाकिस्तानी, चीनी तथा अन्य आप्रवासी समुदायों के लोग चुनाव जीतकर संसद में पहुंचे। पाकिस्तानी मूल की एक उम्मीदवार ने तो वरिष्ठ एवं चर्चित नेता जॉन गॉलवे को ही करारी मात दी।  इस बार भारतवंशी कीथ वाज तो फिर से चुने ही गए। उनकी बहन वैलेरी वाज पहली दफा संसद में आ गईं। क्या इसे वंशवाद माना जा सकता है?

ऐसा अनुमान लगाया जा रहा था कि लेबर पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरेगी और सरकार उसकी ही बनेगी। उसके मत प्रतिशत में खासी बढ़ोतरी होने का अनुमान था। कंजर्वेटिव पार्टी को भी मत प्रतिशत में हल्की बढ़ोतरी, लेकिन सीट संख्या में कमी आने की भविष्यवाणी की गई थी। अभी डेविड कैमरन लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ मिलकर साझा सरकार चला रहे थे। इसके बरक्स कयास लगाए जा रहे थे कि लेबर पार्टी के नेता एड मिलिबैंड किस दल के साथ गठबंधन करेंगे। ये सारे अनुमान धरे के धरे रह गए। लेबर पार्टी की सीटें बढऩे के बजाय कम हो गईं और कंजर्वेटिव पार्टी ने स्पष्ट बहुमत से आगे बढ़कर पांच अधिक सीटें जीत लीं। अब कैमरन देश को किए गए अपने वायदों पर बिना किसी दबाव के निर्णय ले सकते हैं।

दरअसल, लेबर पार्टी को सबसे बड़ा झटका स्काटलैंड में लगा जहां अलगाववादी स्कॉटिश नेशनल पार्टी ने 59 में से 56 सीटें पाकर लेबर का सूपड़ा साफ कर दिया। अभी एक साल पहले ही स्कॉटिश जनता ने जनमत संग्रह में ग्रेट ब्रिटेन के साथ बने रहने का फैसला किया था। इन नतीजों के बाद आशंका उभरती है कि क्या स्कॉटलैंड में स्वतंत्र सार्वभौम देश बनने की मांग फिर से उठेगी? प्रधानमंत्री कैमरन ने जीत के तुरंत बाद वायदा किया कि ग्रेट ब्रिटेन के सभी राष्ट्रों अर्थात् वेल्स, उत्तर आयरलैंड और स्कॉटलैंड को अधिकतम स्वायत्तता दी जाएगी तथा चारों राष्ट्र (इंग्लैंड सहित) मिलकर एक देश बने रहेंगे, लेकिन इस पर विश्वास करने के  लिए राजनीतिक पर्यवेक्षक फिलहाल तैयार नहीं हैं। कईयों का कहना है कि यह शायद ग्रेट ब्रिटेन का आखिरी आम चुनाव सिद्ध हो सकता है।

डेविड कैमरन ने चुनाव के दौरान मतदाताओं से यह वायदा भी किया था कि वे यूरोपीय संघ की सदस्यता छोडऩे पर गंभीरतापूर्वक विचार करेंगे। यह एक बड़ा कूटनीतिक निर्णय होगा किन्तु अपनी घोषणा पर अमल करना प्रधानमंत्री के लिए शायद बहुत आसान न हो। यूरोप के सम्पन्न देशों में एक भावना बलवती होती जा रही है कि उन्हें कमजोर देशों का बोझ उठाने के लिए मजबूर किया जा रहा है। ग्रीस, पुर्तगाल तथा पूर्वी यूरोप के अनेक देश निर्धन की श्रेणी में आ जाते हैं। इनके विरुद्ध जर्मनी और फ्रांस में भी आवा•ों उठ रही हैं। अगर ग्रेट ब्रिटेन इस दिशा में पहल करता है तो एक यूरोप का सपना बिखरते देर न लगेगी। किन्तु इससे स्वयं ब्रिटेन को क्या फायदा होगा यह अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। अगर स्कॉटलैंड अलग हो गया तो उसका विपरीत प्रभाव इंग्लैंड की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

यह विचारणीय है कि लेबर पार्टी के हाथों में विजय आते-आते कैसे फिसल गई। एक तो स्कॉटलैंड के मतदाताओं ने उसका साथ नहीं दिया, दूसरे यह भी कहा जा रहा है कि लेबर पार्टी ने इंग्लैंड के ग्रामीण श्रमिक वर्ग की ओर ध्यान देना पिछले कई सालों से छोड़ दिया था। ये दोनों उसके पारंपरिक गढ़ थे। मोहभंग होने पर हार होना ही थी। युवा एड मिलिबैंड ने अपने सगे भाई डेविड मिलिबैंड को नेता पद के चुनाव में हराया था, लेकिन वे अपने पारंपरिक मतदाताओं का विश्वास जीतने में असफल सिद्ध हुए।

चलते-चलते यह खबर कि पुनर्निर्वाचित प्रधानमंत्री डेविड कैमरन अपनी पत्नी सामन्था कैमरन के साथ जीत की खुशी मनाने लंदन के सबसे महंगे और संभ्रांत वर्ग के लिए सुरक्षित मेफेयर क्लब में रात्रि भोज पर गए। पूंजीवादी जनतंत्र में नेतृत्व की दिशा का संकेत इसमें मिलता है।
देशबन्धु में 14 मई 2014 को प्रकाशित

Wednesday, 6 May 2015

राजनीति बनाम व्यापार


 भारत के व्यापारी वर्ग में एक मान्यता लंबे समय से चली आ रही है- कोऊ हो नृप हमें का हानि। तुलसीकृत मानस में मंथरा के इस कथन का आगे चलकर यही अर्थ लगाया गया कि व्यापारी राजनीति के प्रपंचों में पड़े बिना अपना धंधा करता रहे। सच पूछें तो यह उक्ति पूरे विश्व के व्यापारी समाज पर लागू होती है। राजतंत्र हो या जनतंत्र, अधिनायकवाद हो या सैन्य शासन, व्यापारी अपनी भलाई इसी में देखता है कि जो सत्ता में बैठे हैं उन्हें समय-समय पर भेंट-पूजा चढ़ाकर वह अपना काम निकाल ले। यदि वह राजकाज में सक्रिय दिलचस्पी लेने लगे तो कभी भी राजा के कोप का शिकार बन उसे अपना सर्वस्व गंवाना पड़ सकता है। प्रभा खेतान ने अपने उपन्यास "पीली आंधी" में विस्तारपूर्वक वर्णन किया है कि राजस्थान से वणिकों को समय-समय पर पलायन करने क्यों मजबूर होना पड़ा। वर्तमान समय में सोवियत संघ के विघटन के बाद शेष रूस का उदाहरण हमारे सामने है जहां पूंजीपतियों ने कम्युनिस्ट-विरोधी सत्ता के साथ मिलकर अरबों-खरबों की दौलत इकट्ठा कर ली, किन्तु बाद में उनमें से कई को देश छोड़कर भागना पड़ा, तो कई देश में ही सलाखों के पीछे कैद हैं।

इसके समानांतर एक दूसरी सोच भी काफी लंबे समय से चली आ रही है जो कहती है कि राजा को व्यापार नहीं करना चाहिए। इसके अनुसार राजा या कि सत्ता को, व्यवसायी वर्ग को अपना व्यापार निर्बाध रूप से कर पाने के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराने के अलावा और कुछ नहीं करना चाहिए। जो लोग इस धारणा में विश्वास रखते हैं उनका मानना है कि व्यापार-व्यवसाय पर किसी भी तरह की बंदिश न हो। बाजार अपने नियम खुद ही तय कर लेगा; जिसकी सामथ्र्य होगी उसकी दुकान चलेगी, जो अक्षम होगा वह अपने आप बाहर हो जाएगा। इस सोच के लोग सरकार द्वारा लागू किए गए नियम कायदों की समय-समय पर आलोचना करते हैं। यह सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं कि आयकर, बिक्री कर, प्रवेश कर, लायसेंस, परमिट इत्यादि से व्यापार का ही नहीं, देश का कितना बड़ा नुकसान होता है। छत्तीसगढ़ की जनता को याद होगा कि जब राज्य नया-नया बना था तब यहां बिक्री कर और वाणिज्य कर खत्म करने की मांग इस आधार पर की गई थी कि देवभोग में हीरा उत्खनन से इतना पैसा आएगा कि प्रदेश के विकास के लिए किसी अन्य साधन से पैसा जुटाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। आज पन्द्रह साल बाद छत्तीसगढ़ चेंबर ऑफ कॉमर्स जैसी संस्थाओं से यह प्रश्न पूछा जा सकता है कि देवभोग के हीरों का और उससे मिलने वाले राजस्व का क्या हुआ? खासकर तब जबकि प्रदेश में व्यापारियों का हितचिंतक माने जाने वाली पार्टी की सरकार चल रही है।

भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने तब प्रकारांतर से उन्होंने भी व्यापार-व्यवसाय को निर्बाध रूप से चलने की वकालत की। उन्होंने ''अधिक सुशासन और कम शासन" जैसा कोई नारा दिया था। उनका मंतव्य यही था कि सरकार किसी भी क्षेत्र में अनावश्यक रूप से हस्तक्षेप न करे। वे अपनी पार्टी की प्रारंभ से चली आ रही सोच को ही प्रतिध्वनित कर रहे थे। जनता को याद होगा कि वाजपेयी सरकार के समय एक विनिवेश मंत्रालय भी बनाया गया था जिसने सार्वजनिक क्षेत्र की खरबों की संपदा निजी क्षेत्र को मानो कौडिय़ों के मोल बेच दी थी। यह एक राजनीतिक प्रहसन ही है कि वाजपेयी सरकार के अर्थविशेषज्ञ अरुण शौरी आज नरेन्द्र मोदी के कटु आलोचक बन गए हैं। कृपया यह न समझें कि मैं विषयांतर कर रहा हूं बल्कि मेरी कोशिश कुछ विलुप्त कडिय़ों को जोडऩे की है।

वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर एक निगाह डालने से समझ आ जाता है कि बाबा तुलसीदास ने पांच सौ साल पहले जो बात कही थी उस पर अमल करने में ही व्यापारी समाज की भलाई निहित है। व्यापारी अपने आपको सक्रिय राजनीति से जितना दूर रखे उसके लिए उतना ही अच्छा है। एक व्यापारी के अपने राजनीतिक उसूल हो सकते हैं, लेकिन वह सामान्य तौर पर सभी राजनीतिक दलों को चंदा देता है, मना शायद किसी को भी नहीं करता। संभव है कि जिस पार्टी के विचार उसे अधिक अनुकूल लगते हैं वह उसके प्रति दूसरी पार्टी के मुकाबले ज्यादा उदारता दिखाता हो। हमने ऐसे उदाहरण भी देखे हंै कि एक व्यापारी किसी राजनीतिक दल का सक्रिय कार्यकर्ता है, किन्तु वह अन्य दलों से भी मधुर संबंध बनाकर चलता है। याने उसे पता है कि सबको मिलाकर चलने में ही फायदा है।

यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि राजनीति और व्यापार दोनों किसी हद तक एक-दूसरे पर आश्रित हैं, इसके बावजूद दोनों के बीच एक अदृश्य रेखा है जिसका उल्लंघन करना अभी हाल तक ठीक नहीं माना जाता था। कोई भी देशकाल हो, व्यापार उसमें एक अनिवार्य गतिविधि की तरह होगा तथा सत्ताधीशों को पूंजीपतियों से समय-असमय सहयोग लेने की भी आवश्यकता होगी। दूसरी तरफ उद्यमी वर्ग अपने कामकाज के लिए बेहतर परिस्थितियां मांगने के लिए सरकार पर जब-तब दबाव और प्रलोभन का भी सहारा लेगा, लेकिन पारंपरिक सोच कहती है कि बात इसके आगे नहीं बढऩा चाहिए। यही कारण है कि सामान्य तौर पर व्यापारी अपने आपको राजनीति से दूर रखते आया है। चुनावी राजनीति उसे अक्सर रास नहीं आती तथा राजनीति में किसी बड़े पद पर पहुंचने की वह इच्छा भी नहीं रखता। यही कारण है कि हमारे अधिकतर चुने हुए नेता या तो किसान हैं या वकील या अध्यापक या फिर शुद्ध राजनेता।

यह स्थिति अब बदलने लगी है। उद्योगपतियों और व्यापारियों के बीच एक नयी सोच विकसित होने लगी है कि वे जब दूसरों को चंदा देकर चुनाव लड़वाते हैं तो खुद क्यों चुनाव नहीं लड़ सकते। यह सोच उन बाहुबलियों की सोच से अलग नहीं है जो चुनाव के वक्त नेताओं की मदद करने के बदले खुद विधायक, सांसद, मंत्री बनने का सपना देखने लगते हैं। इस नयी बयार में हमने देखा कि कितने सारे उद्योगपति और व्यापारी राज्य सभा के रास्ते से राजनीति में आ गए। इनमें विजय माल्या जैसे लोग भी शामिल हैं जिन्हें राज्य सभा के सभापति के निधन के दिन भी अपनी भव्य दावत निरस्त करने का ध्यान नहीं आया। उन्हें देश आज दिवालिया उद्यमी के रूप में जान रहा है।  हमारे सामने उन चुने गए राजनेताओं के उदाहरण भी हैं जो संदिग्ध व्यापारों में संलिप्त होने के कारण जेल की हवा खा रहे हैं।

इस नयी सोच ने राजनेताओं के मन में भी व्यापारी बनने की लालसा जागृत कर दी है जिसका सबसे ताजा एवं ज्वलंत उदाहरण पंजाब के उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल के रूप में जनता के सामने है। बादल परिवार के दर्जन भर सदस्य राजनीति में लाभ के पदों पर हैं, लेकिन इतने से उनका मन नहीं भरा। सुखबीर सिंह बादल को बस ऑपरेटर बन जाने की ऐसी क्या जरूरत आन पड़ी थी? वह भी ऐसी जिसका संचालन प्राप्त जानकारी के अनुसार हर तरह के नियम कायदे तोड़कर हो रहा है। ऐसे और भी दृष्टांत काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक एवं गुवाहाटी से लेकर गोवा तक जनता के समक्ष हैं। देश को याद दिलाने की जरूरत नहीं है कि लाल बहादुर शास्त्री ने 1954 में रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए मंत्री पद त्याग दिया था। इस तरह की आशा श्री बादल जैसे व्यक्तियों से रखना व्यर्थ ही होगी। विजय माल्या और सुखबीर सिंह बादल एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक व्यक्ति ने व्यवसाय से राजनीति में पदार्पण किया और दूसरे ने राजनीति का उपयोग व्यापार करने के लिए किया। दोनों की सोच में हमें कोई अंतर नहीं दिखाई देता। यह एक नया युग है जिसमें लालच ही सबसे बड़ी प्रेरणा है और धनसंग्रह ही अंतिम लक्ष्य।


देशबन्धु में 07 मई 2015 को प्रकाशित

Monday, 4 May 2015

कुछ साहित्यिक यात्रा संस्मरण

 
 
उज्जैन, अवंतिका या उज्जयिनी। महाकाल, कालिदास, भर्तृहरि और चार कुंभों में से एक सिंहस्थ कुंभ की नगरी। जनमान्यता है कि यह विक्रमादित्य की राजधानी भी थी। इसलिए वेताल की नगरी भी! जाहिर है कि देश के प्राचीनतम नगरों में से एक उज्जैन में आकर्षण बहुत है। महाकालेश्वर की गणना बारह ज्योतिर्लिंगों में की जाती है। श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते ही हैं, लेकिन बहुत पहले मैंने किसी कहानी में पढ़ा था (बिलासपुर की स्वर्गीय शशि तिवारी रचित)  कि महाकाल जब बुलाएं तभी उनके दर्शनों का योग बनता है। अगर ऐसा है तो मेरे जीवन में ऐसा एकमात्र योग सन् 1957 में आया था जब मैंने स्कूल के विद्यार्थी के रूप में महाकालेश्वर तथा उज्जैन के अन्य आकर्षण केन्द्रों के दर्शन किए थे। उसके बाद दो-तीन बार अन्य कारणों से उज्जैन जाना तो हुआ, लेकिन बुलावा नहीं था इसलिए दर्शन लाभ नहीं हुआ। इस पृष्ठभूमि में ही कुछ सप्ताह पहले उज्जैन की एक और यात्रा हो गई।

इंदौर में स्वर्गीय सोहनलाल सांघी स्मृति संगीत समारोह विगत पैंतालीस वर्ष से हो रहा है। भारतीय सांस्कृतिक निधि अर्थात् इंटैक के इंदौर अध्याय ने इस आयोजन का जिम्मा ले लिया है। इस नाते इस साल 25-26 मार्च को संपन्न समारोह में इंटैक का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मुझे मिला। आयोजकों ने फोन पर चर्चा करते हुए प्रलोभन दिया कि आप चाहेंगे तो उज्जैन प्रवास की व्यवस्था भी हो जाएगी। मैंने ज्यों ही यह बात सुनी कार्यक्रम में आने के लिए तुरंत हामी भर दी। संस्था के मित्रों ने शायद यह सोचा होगा कि मैं महाकालेश्वर के दर्शन करने जाऊंगा। उनका बुलावा तो था नहीं, किंतु उज्जैन में अपने एक बहुत प्रिय बंधु से मिलने का आकर्षण था और मैं इस अवसर को गंवाना नहीं चाहता था।

हिन्दी कविता को वर्तमान में मध्यप्रदेश के जिन लोगों ने समृद्ध किया है उनमें एक प्रमुख नाम चंद्रकांत देवताले का है और साहित्य रसिक जानते हैं कि वे उज्जैन में वास करते हैं। रायपुर से इंदौर के लिए रवाना होने से पहले ही मैंने देवतालेजी को धमकी दे दी थी कि मैं आपसे मिलने आ रहा हूं और वे भी व्यग्रता से इस धमकी के पूरा होने की राह देख रहे थे। आयु के 79वें वर्ष में स्वाभाविक कारणों से अब उनकी यात्राएं लगभग बंद हो गई हैं, लेकिन मन तो करता ही है कि मित्रों से मुलाकातें होती रहें। देवतालेजी के घर में मेरा सबसे पहले स्वागत तीन-चार श्वानों ने किया। मालूम पड़ा कि राजनीतिशास्त्र की प्रोफेसर उनकी बेटी कनुप्रिया सड़क पर दुर्दशा को प्राप्त श्वान शावकों को उठा लाती हैं  और फिर वे इस छोटे से परिवार के स्थायी सदस्य बन जाते हैं।

मुझे ध्यान आया कि देवतालेजी पिछले दो-तीन सालों से बकु पंडित पर अक्षर पर्व के लिए संस्मरण भेजने का वायदा कर रहे हैं। ये बकु पंडित भी उनके एक प्रिय श्वान थे, जो दिवंगत हो चुके हैं। खैर! इस स्वागत के बाद कवि का हुक्म हुआ कि हम लोग कुछ देर आंगन के छतनार पेड़ की छाया में बैठें। आदेश का पालन करना ही था। हम लोग भरी दोपहरी उस पेड़ की छाया में बैठकर उनके छोटे से बगीचे की शोभा का आनंद लेते रहे। यह देखकर मजा आया कि उस पेड़ पर पान की दो-तीन बेलें चढ़ी हुई हैं। एक बेल बंगला पान की थी, जो स्वाद में काफी तीखा होता है और एक हल्के पीले रंग वाले नाजुक से कपूरी पान की। एक अच्छी दोपहरी चंद्रकांतजी और बेटी के साथ बीती। बरसों बाद हमने दुनिया जहान की बातें कीं, साथ में खाना खाया, उनकी कुछ नई, कुछ अधूरी कविताएं सुनीं। उनकी नई पुस्तक भी भेंटस्वरूप प्राप्त की और हम दोनों के अजीज़  सुदीप बनर्जी को भावुक मन से याद किया। जब वापिस चलने का समय आया तो मैं पान की दोनों बेलों में से पान तोड़कर स्वाद लेने के मोह से नहीं बच सका।

मुझे अपने अग्रज से जल्दी विदा इसलिए भी लेनी पड़ी कि जिस कार्यक्रम के निमित्त इंदौर आया हूं वहां समय पर पहुंच जाऊं। मैं संगीत का ज्ञाता तो नहीं हूं, लेकिन पंडित हरिप्रसाद चौरसिया की दो शिष्याओं मुखर्जी बहनों ने बांसुरी पर जिस कलाकारी का परिचय दिया वह अत्यन्त सराहनीय थी। इंदौर के इस कार्यक्रम के बहाने कई संस्कृतिकर्मियों से परिचय हुआ। गीता सांघी जो कि आयोजन समिति की प्रमुख हैं; हिमांशु दुधवलकर जो आर्किटेक्ट हैं और जिन्होंने इंदौर के प्रसिद्ध राजवाड़े के जल जाने के बाद पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है; संजय पटेल जो एक गुणी कला समीक्षक हैं और जिन्होंने इंदौर का एक नक्शा बनाया है और जो मालवी के जाने-माने गीतकार व लेखक नरहरि पटेल के बेटे हैं। इस तरह जब समान रुचि के मित्रों से मिलना होता है तब आनंद होता ही है।

इंदौर-उज्जैन जाने के कुछ दिन पहले एक संक्षिप्त यात्रा धमतरी की हुई। यूं कार्यक्रम तो मुजगहन नामक गांव में था, लेकिन वह शहर से लगकर इतना विकसित हो चुका है कि धमतरी का नया सर्किट हाउस इस गांव में बनाया गया है। यहां हम लोग याने प्रभाकर चौबे, विनोदशंकर शुक्ल और मैं, अपने एक प्रिय मित्र त्रिभुवन पांडेय पर केन्द्रित एक ग्रंथ के लोकार्पण और लेखक के सम्मान समारोह में अपनी उपस्थिति देने आए थे। हमारे अलावा दुर्ग, भिलाई तथा आसपास के साहित्यकार भी पहुंचे थे। त्रिभुवन अब 77 के हो गए हैं। दो साल पहले उनकी 75वीं वर्षगांठ पर दोस्तों ने तय किया था कि त्रिभुवन पांडेय के व्यक्तित्व और कृतित्व पर एक अभिनंदन ग्रंथ का प्रकाशन किया जाएगा। ऐसे काम में समय लगता भी है, अड़चनें भी पेश आती हैं। किन्तु मुजगहन के निवासी युवा साथी डुमनलाल ध्रुव इस योजना को मूर्तरूप देने में जुटे रहे और अंतत: उनकी मेहनत रंग लाई। 375 पृष्ठ के ग्रंथ में त्रिभुवन पांडेय पर मुझ सहित कुछ मित्रों के संस्मरण हैं, उनके अपने लेखहैं, कविताएं हैं, साक्षात्कार हैं, पत्र हैं। उनके कृतित्व पर सुधी मित्रों द्वारा लिखी गई समीक्षाएं हैं। इस तमाम सामग्री में त्रिभुवन द्वारा व्यंग्य पर लिखे गए जो छह लेख लिए गए हैं वे बहुत महत्वपूर्ण हैं।

त्रिभुवन पाण्डेय अक्षर पर्व के सुपरिचित लेखक हैं। वे एक अच्छे व्यंग्यकार, नवगीतकार और समीक्षक हैं। पिछले पचास साल में उन्होंने बहुत लिखा है और सार्थक लिखा है। व्यंग्य पर लिखे उपरोक्त लेखों से साहित्य के प्रति उनकी सोच का परिचय हमें मिलता है। हम यह भी जान पाते हैं कि धमतरी जैसे एक छोटे कस्बे में, जो अब शहर बन रहा है, रहते हुए भी त्रिभुवन पांडेय का अध्ययन कितना विशाल है। प्रभाकर चौबे की तरह त्रिभुवन भी परसाई की धारा के लेखक हैं। वे कहते हैं कि व्यंग्य बेहद विवेकशील, न्यायबुद्धि तथा निरपेक्ष हृदय की अभिव्यक्ति है। जो लेखक मानवीय संबंधों की तह में नहीं जाता, जो राजनीति का विश्लेषण नहीं कर सकता वह कभी व्यंग्य नहीं लिख सकता, यह उनका मानना है।

पाठकगण आज्ञा दें तो मैं आपका परिचय धमतरी के एक अन्य निवासी से करवाना चाहता हूं। मुजगहन से लौटते हुए हम थोड़ी देर के लिए रमाकांत शर्मा के घर गए। शर्माजी एक शासकीय विद्यालय से प्राचार्य के रूप में कोई पन्द्रह बरस पहले सेवानिवृत्त हो चुके हैं। वे अपनी तरह के एक अनोखे व्यक्ति हैं। शर्माजी को पढऩे का व्यसन है। उन्होंने अपने घर में एक पुस्तकालय बना रखा है। जो पुस्तक उन्हें अच्छी लगती है उसे अपने संग्रह के लिए ले लेते हैं। आज जब पुस्तक पढऩे वालों की ही संख्या घट रही है तब अपने आपमें एक खुशी की बात है कि एक रिटायर्ड व्यक्ति अपनी पेंशन का एक हिस्सा पुस्तकें खरीदने में खर्च करता है। इतना ही नहीं, वे नियमित रूप से कई अखबार भी पढ़ते हैं। उन्हें जो लेख पसंद आते हैं उनकी कतरनें या फोटोकॉपी सहेजकर रख लेते हैं। इस तरह उनके पास हजारों लेखों का संग्रह है। उनका दृढ़ विश्वास है कि जो लोग ऐसे सुंदर लेख लिखते हैं, वे ही समाज को बदल सकते हैं। एक तरह से वे चाहते हैं कि समाज अपने लेखकों का सम्मान करना सीखे और उनसे प्रेरणा ले। उनका यह आदर्शवाद किसी भी लेखक के कानों के लिए मधुर झंकार हो सकता है। मुझे अच्छा लगता है कि हमारे बीच ऐसे व्यक्ति मौजूद हैं जिन्हें आज के विचारशून्य समय में भी शब्द की शक्ति पर ऐसा अटूट विश्वास है।

इस बीच एक शाम भिलाई जाना भी हो गया। भिलाई में लेखकों के अनेक संगठन हैं, पर यह सुखद है कि कार्यक्रम कोई भी करे, सब तरफ से साथी जुट जाते हैं। 25 मार्च को प्रोफेसर कमला प्रसाद की पुण्यतिथि थी। इस अवसर पर प्रगतिशील लेखक संघ की भिलाई इकाई ने अन्य संस्थाओं को साथ लेकर एक आयोजन किया जिसका विषय था- ''प्रगतिशील लेखन की दशा और दिशा"। यह विषय इसलिए प्रासंगिक और महत्वपूर्ण है क्योंकि लेखक संगठनों से जुड़े रचनाकर्मियों के सामने प्रश्न है कि वे क्या करें। इस समय देश में तीन लेखक संगठन समानांतर चल रहे हैं- प्रलेस, जलेस और जसम। एक चौथा संगठन कसम याने क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच भी हाल-हाल में कुछ सक्रिय हुआ है। सवाल है कि वर्तमान परिस्थितियों में लेखक संगठनों की भूमिका क्या हो और किस सीमा तक हो? लेखक की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और संगठन की अपेक्षा क्या किसी बिन्दु पर जाकर मिलती है? यह भी सवाल है कि रचनाकार तो अपने काम में जुटा हुआ है उसे संगठन की क्या आवश्यकता है? बहुत से रचनाकर्मियों के मन में यह आशंका भी है कि वर्तमान परिस्थितियों में किसी मंच पर उपस्थित होना उनके लिए हानिकारक तो नहीं होगा? ऐसी स्थिति भारत में पहली बार उत्पन्न नहीं हुई है तथा अन्य देशों में भी संस्कृतिकर्मियों को इन प्रश्नों का सामना करना पड़ा है।

इस वर्ष भीष्म साहनी की जन्मशताब्दी है। वे प्रगतिशील लेखक संघ से प्रारंभ से जुड़े रहे तथा अपने समय के एक अत्यंत प्रमुख लेखक के रूप में उन्होंने प्रतिष्ठा अर्जित की। अक्षर पर्व उन पर केन्द्रित विशेषांक दो महीने बाद प्रकाशित करने जा रहा है। इधर छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने 5 अप्रैल को भीष्म साहनी जन्मशती पर एक दिन भर का कार्यक्रम आयोजन किया। इस कार्यक्रम में जैसी उपस्थिति थी वैसी रायपुर के साहित्यिक  कार्यक्रमों में अमूमन दिखाई नहीं देती। इससे भीष्म जी की लोकप्रियता का पता चलता है। प्रसंगवश कह देना चाहिए कि संभवत: पूरे देश में भीष्म साहनी जन्मशताब्दी पर आयोजित यह पहला कार्यक्रम था। इसके पूर्व सम्मेलन ने ख्वाजा अहमद अब्बास एवं कृश्न चंदर की जन्मशताब्दी पर भी इसी तरह कार्यक्रम किए थे। कुल मिलाकर बीते दो-तीन सप्ताह पूरी तरह से साहित्य को समर्पित रहे, जिसकी यह झलक आपने शायद पसंद की हो।
अक्षर पर्व मई 2015 अंक की प्रस्तावना

Wednesday, 29 April 2015

उसने कहा था : युद्ध के बीच प्रेम की कथा


 पिछले साल जब प्रथम विश्वयुद्ध की शुरुआत के सौ साल पूरे हुए, तब दुनिया के अनेक देशों में इस ऐतिहासिक घटना को याद करते हुए भांति-भांति के कार्यक्रम आयोजित किए गए जिनका सिलसिला अब तक चला आ रहा है। इस अवसर पर युद्ध के दौरान या युद्ध पर आधारित कविताओं का, कहानियों का पुनर्प्रकाशन हुआ। मोर्चे से सैनिकों द्वारा लिखे गए पत्र खोज-खोज कर अखबारों में छपे और सोशल मीडिया पर प्रकाशित हुए। युद्ध पर बनाई गई फिल्में भी प्रदर्शित की गईं। विजयी मित्र देशों ने एक तरफ अपने सैनिकों को श्रद्धांजलि दी तो दूसरी ओर एक सदी पहले हासिल विजय के उपलक्ष्य में सरकारी और गैरसरकारी पार्टियों का आयोजन हुआ।

इस महायुद्ध में भारत की भी भूमिका थी, उसे भी विधिवत स्मरण किया गया। भारतीय सेना के जिन जांबाज सिपाहियों को विक्टोरिया क्रॉस आदि से अलंकृत किया गया था, उनकी तथा उनके वारिसों की नए सिरे से खोज-खबर ली गई। हमें एक बार फिर ध्यान आया कि देश की राजधानी में स्थापित इंडिया गेट जो आज भले ही सैर-सपाटे का केेंद्र हो, उसका निर्माण प्रथम विश्वयुद्ध में मृत भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए किया गया था। यह एक संयोग है कि इंडिया गेट अब सिर्फ प्रथम महायुद्ध के वीर सैनिकों का स्मारक न होकर गत एक सदी के दौरान अन्य युद्धों में भारतीय सैनिकों द्वारा किए गए बलिदान का प्रतीक बन गया है।

प्रथम विश्वयुद्ध शुरु होने की सौवीं वर्षगांठ का सिलसिला 2014 में जो प्रारंभ हुआ, वह अभी रुका नहीं है। यह युद्ध चार साल चला था। अब जिस तरह से कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं, उन्हें देखकर लगता है कि 2018 तक यह क्रम चलता रहेगा। अगर युद्ध की विभीषिका को याद करने से शांति के पथ पर चलने की प्रेरणा मिलती हो तो ऐसे आयोजनों का स्वागत होना चाहिए। फिलहाल मेरे मन में यह सवाल उठ रहा है कि इस महायुद्ध में भारत की भूमिका की स्मृतियां क्या सैन्य दस्तावेजों के अलावा अन्यत्र कहीं सुरक्षित हैं? यह प्रश्न इसलिए उठा क्योंकि इस साल हिन्दी जगत उस कहानी की जन्म शताब्दी मना रहा है जो प्रथम विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि में रची गई थी। मेरी जानकारी में हिन्दी ही नहीं अन्य किसी भी भारतीय भाषा में और संभवत: अन्य किसी भी लेखक ने प्रथम विश्वयुद्ध पर कोई कविता या कहानी नहीं लिखी। इस नाते अमर मानी जाने वाली यह कहानी कहीं ज्यादा प्रासंगिक हो उठती है तथा जिन सैन्य अधिकारियों ने थोड़ी बहुत भी हिन्दी पढ़ी है उन्हें कम से कम आज इस कहानी को फिर से याद कर लेना चाहिए।

यह एक आश्चर्यजनक सत्य है कि भारतीय भाषाओं में युद्ध से संबंधित साहित्य नहीं के बराबर लिखा गया है। मैं अपने दिमाग पर जोर डालता हूं तो पहले एक उपन्यास याद आता है देवेश दास द्वारा लिखित 'रक्तराग'। यह उपन्यास दूसरे विश्वयुद्ध के बाद लिखा गया था। देवेश दास एक आईसीएस अफसर थे। इस उपन्यास के अलावा उन्होंने अन्य कोई साहित्यिक रचना की हो तो वह मेरी जानकारी में नहीं है। इसके कई साल बाद 1965 के युद्ध पर मनहर चौहान का उपन्यास 'सीमाएं' प्रकाशित हुआ जिसकी बहुत अधिक चर्चा नहीं हो पाई। आगे चलकर जगदीशचंद्र ने सैन्य अधिकारियों के जीवन पर केन्द्रित दो उपन्यास लिखे 'आधा पुल' और 'टुंडा लाट'। आधा पुल में सैनिक छावनी का विवरण है और 1971 के युद्ध की कुछ छवियां भी हैं। इस दुखांत उपन्यास के नायक का एक मार्मिक कथन बार-बार ध्यान आता है- जिस गोली पर मेरा नाम लिखा होगा, वह जब तक नहीं लगेगी, तब तक मैं नहीं मरूंगा। जगदीशचंद्र भारतीय सेना में जनसंपर्क अधिकारी थे, इस नाते उनके ब्यौरों में प्रामाणिकता का पुट मिलता है।

इस तरह इक्का-दुक्का कृतियों को छोड़ दिया जाए तो कहा जा सकता है कि हमारे देश में युद्ध साहित्य का सर्वथा अभाव है। यह तब जबकि प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में भाग लेने के अलावा हम पांच लड़ाइयां और लड़ चुके हैं। इसकी क्या वजह हो सकती है? शायद यही कि भारतीय लेखक पारंपरिक विषयों से हटकर लिखने में, उसके लिए सामग्री जुटाने में, आïवश्यक शोध करने के लिए जो कष्ट उठाने की आवश्यकता होती है, उससे बचना चाहता है! इसकी एक और वजह हो सकती है कि युद्ध की छाया हमारे भूगोल के एक छोटे हिस्से पर ही पड़ती है; सरहदी इलाकों से वह आगे नहीं बढ़ पाती और तात्कालिक भावोद्रेक के बाद समाज उस ओर से निर्लिप्त हो जाता है।

इस पृष्ठभूमि में यह तथ्य अपने आप में दिलचस्प है कि आज से सौ साल पहले चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने 'उसने कहा था' जैसी कहानी लिखी जो पाठक को युद्ध के मोर्चे तक ले जाती है। पाठकों को पता है कि गुलेरीजी देश के महान कथाकार माने जाते हैं, जबकि उन्होंने कुल तीन कहानियां लिखींऔर उनमें भी 'उसने कहा था' को एक बेजोड़ रचना माना जाता है। पांचवींकक्षा से लेकर हिन्दी साहित्य में एम.ए. करने तक यह कहानी न जाने कितनी बार पाठ्यक्रम में शामिल की जाती है। 'उसने कहा था' की जो व्याख्या कक्षाओं में की जाती है उसके अनुसार यह प्रेम कहानी है जो आत्मोसर्ग की कसौटी पर प्रेम को परखती है। यह तो ठीक है कि कुमारवय के प्रेम से प्रारंभ हुई यह कहानी प्रौढ़ावस्था में किए गए बलिदान पर जाकर समाप्त हो जाती है लेकिन मेरा मानना है कि इस केन्द्रीय कथानक से हटकर भी 'उसने कहा था' का अध्ययन किया जाना चाहिए।

सबसे पहली बात तो यही है कि यह संभवत: हिन्दुस्तानी फौजियों के जीवन पर लिखी गई पहली कहानी है। दूसरी नोट करने लायक बात यह है कि कहानी में मोर्चे का वर्णन है। तीसरा तथ्य यह है कि यह मोर्चा भारत की सरहद पर नहीं बल्कि सुदूर फ्रांस में है। इसे पढ़कर स्वाभाविक रूप से मन में सवाल उठना चाहिए था कि आखिर भारतीय सैनिक सात समंदर पार फ्रांस की भूमि पर लडऩे क्यों गए थे और किसके लिए गए थे? इस सवाल में ही यह जवाब भी निहित है कि भारत एक गुलाम देश था और ये सिपाही ब्रिटिश फौज में सेवाएं दे रहे थे। यहां एक नया प्रश्न भी उठता है कि बीसवींसदी के प्रारंभ में पंजाब में ऐसी कौन सी स्थितियां थीं जिसके कारण उस प्रदेश के नौजवान सेना में न सिर्फ भरती हो रहे थे बल्कि हजारों मील दूर जाकर लड़ भी रहे थे। इन्हें इसके लिए क्या कहकर समझाया गया होगा? उन्हें क्या प्रलोभन दिए गए होंंगे?

हिन्दी साहित्य के गंभीर विद्यार्थी जानते हैं कि 'उसने कहा था' के पहले जो कहानियां लिखी जा रही थीं, वे सामान्यत: नीति कथाएं ही थीं। तब ऐसी क्या बात थी जिसने गुलेरी जी को 'उसने कहा था' लिखने के लिए प्रेरित किया। इस कहानी में अमृतसर की गलियों का ऐसा प्रामाणिक विवरण है जो आज भी अमृतसर की पुरानी बसाहट से गुजरते हुए महसूस किया जा सकता है। इस दृश्यविधान को लेकर गुलेरीजी कुछ और भी लिख सकते थे। लहना सिंह और सूबेदारनी की प्रेमकथा के लिए कोई और घटनाचक्र भी रचा जा सकता था। इस कहानी में ही सूबेदारनी कहती है कि तुमने मुझे बचपन में बचाया था। आशय यह कि प्रेम की परीक्षा देने के लिए लहना सिंह को मोर्चे पर जाने की आवश्यकता नहींथी। अगर किसी शोधकर्ता ने गुलेरीजी की रचना प्रक्रिया का अध्ययन करते हुए इस ओर ध्यान दिया हो तो उसे जानने में मेरी रुचि होगी। अभी तो इतना ही कहना उचित होगा कि प्रथम विश्वयुद्ध पर रचे गए अपार साहित्य में हिन्दी की इस कहानी की भी गणना की जानी चाहिए और इसके लिए मैं चाहूंगा कि साहित्य अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी अपनी ओर से कोई पहल करें।
देशबन्धु में 30 अप्रैल 2015 को प्रकाशित

Thursday, 23 April 2015

साझा मोर्चे की उम्मीद!


 


भारतीय राजनीति के रंगमंच पर विगत सप्ताह दो प्रमुख घटनाएं घटीं। एक तो छह समाजवादी पार्टियों ने आपस में विलय करने का फैसला कर लिया और दूसरे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने अंतत: सीताराम येचुरी को अपना नया महासचिव चुन लिया। मैं समझता हूं कि इन दोनों घटनाओं का देश की राजनीति पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा और इसीलिए इनका नोटिस लिया जाना चाहिए। जैसा कि हम देख रहे हैं इस समय देश पांच राजनीतिक धाराओं में बंटा हुआ है। सबसे पहले भाजपा है और उसके साथ महाराष्ट्र में शिवसेना व पंजाब में अकालीदल। ये तीनों दल संकीर्ण राष्ट्रवाद व धार्मिक आस्था से पोषित हैं। दूसरी धारा कांग्रेस की है जिसके वर्तमान और भविष्य को लेकर गंभीर चर्चाएं कम और अटकलबाजियां ज्यादा हो रही हैं। क्षेत्रीय दल अपनी सोच में एक समान नहीं है, फिर भी उन्हें सुविधा के लिए तीसरी धारा माना जा सकता है। चौथी और पांचवीं धारा के रूप में समाजवादी और साम्यवादी क्रमश: उपस्थित हैं। इन सबके विश्लेषण से ही बात आगे स्पष्ट होगी।

सबसे पहले भारतीय जनता पार्टी की बात करें। यह तथ्य अपनी जगह पर है कि लोकसभा में भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत है और इस नाते मोदी सरकार को अगले चार साल कोई खतरा नहीं है। लेकिन क्या सिर्फ इसी से पार्टी और सरकार को मनमानी का अधिकार मिल जाता है? यह प्रश्न भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को अपने आप से पूछना चाहिए। आम जनता महसूस कर रही है कि केन्द्र ही नहीं, प्रदेशों में भी जहां-जहां भाजपा सरकार है वहां उसका अहंकार दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। पार्टी के नेता अब अधिकतर आक्रामक मुद्रा में दिखाई देते हैं और संवाद का स्थान एकालाप ने ले लिया है। ऐसा अनुमान होता है कि भाजपा का गढ़ इस समय तीन रक्षा पंक्तियों के घेरे में है। एक रक्षा पंक्ति कारपोरेट पूंजी की है, दूसरी संघ के कार्यकर्ताओं की और तीसरी मीडिया की। भाजपा के लिए यह उचित होगा कि वह जांच लें कि ये रक्षा पंक्तियां क्या सचमुच अभेद्य हैं?

जहां तक कारपोरेट पूंजी की बात है उसका अति उत्साह अब डगमगाता प्रतीत होता है। वरना रतन टाटा को कारपोरेट भारत से यह कहने की आवश्यकता क्यों पड़ती कि वह मोदी सरकार पर भरोसा रखे! जाहिर है कि उसने नई सरकार से जो उम्मीदें बांध रखी थीं वे पूरी नहीं हो रही हैं। ऐसे में यह रक्षा पंक्ति कभी भी चरमरा सकती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवकसंघ के लिए स्वाभाविक है कि वह मोदी सरकार की प्राणपण से रक्षा करें किन्तु संघ के कार्यकर्ता वे चाहे मुख्यमंत्री हों या संसद सदस्य या पार्टी पदाधिकारी, जिस तरह के फैसले ले रहे हैं, जैसी बातें कर रहे हैं उससे देश का जनसामान्य ही अचंभित और भयभीत होने लगा है। वह समझ नहीं पा रहा है कि सुशासन के बुनियादी मुद्दों को छोड़कर पार्टी व सरकार यहां वहां क्यों भटक रही है। दूसरे शब्दों में इस रक्षा पंक्ति को आगे-पीछे देश की बहुसंख्यक जनता के क्रोध का सामना करना पड़ सकता है। रही बात मीडिया की तो यह रक्षा पंक्ति वास्तविक न होकर आभासी है और इसकी विश्वसनीयता में तेजी के साथ गिरावट आई है।

क्षेत्रीय दलों का मामला विचित्र सा है। नवीन पटनायक का बीजू जनता दल कारपोरेट उद्यम को बढ़ावा देने में केन्द्र में भाजपा के साथ है, लेकिन ओडिशा में सांप्रदायिक के मुद्दे पर वह भाजपा से दूर है। आंध्रप्रदेश में चंद्राबाबू के सामने भाजपा का साथ देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। गोकि अगले चुनाव के पहले वे पलटी मार सकते हैं। तेलंगाना में टी.एस.आर. सुप्रीमो चंद्रशेखर राव पर अब शायद किसी को भी भरोसा नहीं है। असम में प्रफुल्ल महंता पूरी तरह चुक गए हैं। तमिलनाडु में जयललिता का रुख लगभग वही है जो ओडिशा में नवीन पटनायक का है। जम्मू-काश्मीर में पीडीपी-भाजपा दोस्ती कब तक चलेगी कहा नहीं जा सकता। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी अकेले चलने में  ही विश्वास करती हैं। कुल मिलाकर क्षेत्रीय दलों की राजनीति तात्कालिक और सीमित एजेंडे की है। 

कांग्रेस देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी है और चुनावी हार के बावजूद वह इतनी कमजोर नहीं है कि उसे चुटकी बजाकर खारिज किया जा सके। पार्टी ने लोकसभा चुनाव हारने के बावजूद पिछले एक साल में समय-समय पर संघर्षशीलता का परिचय दिया है। यह भी नोट करने योग्य है कि उसने समय की आवश्यकता को समझते हुए गैर-भाजपाई दलों का सहयोग लेने में कोई संकोच नहीं दिखाया। यह बिल्कुल संभव है कि आने वाले दिनों में वह इन दलों के साथ सहयोग मजबूत करने की दिशा में कदम उठाए। यहां आकर समाजवादी दल और वामपंथी दलों की भूमिका महत्वपूर्ण हो उठती है। एक तरफ भाजपा और दूसरी तरफ गैर-भाजपाई दल, इनके बीच शक्ति परीक्षण का पहला अवसर कुछ माह बाद ही आएगा जब बिहार में विधानसभा चुनाव होंगे। 

आज विभिन्न समाजवादी दलों ने आपस में विलय का जो फैसला किया है उसका स्वागत होना चाहिए। विशेषकर इसलिए कि यह आमधारणा बनी हुई है कि समाजवादी कभी एकजुट नहीं रह सकते। यह एक ऐतिहासिक सच्चाई है और समाजवादियों की वर्तमान पीढ़ी के सामने चुनौती है कि वे कम से कम एक बार इस धारणा को मिथ्या साबित कर दें। बीते वर्षों में समाजवादियों के बीच एका नहीं रहा तो उसकी एक बड़ी वजह नेताओं की निजी महत्वाकांक्षा थी। आज मुलायम सिंह अपने बेटे को मुख्यमंत्री बना चुके हैं; लालू प्रसादजी की संतानों के लिए भी बेहतर अवसर दिख रहे हैं; शरद यादव और नीतीश कुमार के समक्ष ऐसी कोई समस्या नहीं है तब इनकी एकजुटता आसन्न बिहार चुनाव में और उसके आगे भी रंग ला सकती है। मोदी सरकार की साख में जो कमी आई है तथा पड़ोसी झारखंड में विधानसभा के नतीजे भाजपा के मनोनुकूल नहीं आए। ये दोनों बातें भी समाजवादियों को बेहतर भविष्य के प्रति आश्वस्त कर सकती हैं।

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने आखिरकार अपना नया महासचिव चुन लिया। राजनीतिक प्रेक्षकों को उम्मीद थी कि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों में मिली करारी पराजय के बाद अपने ऊपर जिम्मेदारी लेते हुए प्रकाश करात महासचिव पद छोड़ देंगे। किन्तु तब उन्होंने इस अनुमान को झुठला दिया। केरल में भी माकपा की पराजय श्री करात की हठधर्मी से हुई तथा लोकसभा चुनावों में भी उन्होंने दीवार पर लिखी इबारत पढऩे से इंकार कर दिया। इसके बावजूद वे अपने पद पर कायम रहे आए। बहरहाल सीताराम येचुरी के महासचिव बनने के बाद यह उम्मीद की जा सकती है कि वे आज की वास्तविकताओं को समझबूझ कर ही पार्टी को आगे ले जाने की रणनीति तैयार करेंगे। उधर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में भी सुधाकर रेड्डी दुबारा महासचिव बने हैं। ऐसे में वाम समर्थक आशा कर रहे हैं कि ये दोनों दल नए सिरे से राजनीति के वामपक्ष को मजबूत करने के लिए व्यवहारिक और प्रभावी कदम उठाएंगे।

एक समय था जब डॉ. लोहिया ने गैर-कांग्रेसवाद का नारा दिया था। उस समय कांग्रेस के खिलाफ जो साझा मोर्चा बना था उसमें तत्कालीन जनसंघ के साथ समाजवादी और साम्यवादी भी शामिल थे। वह तब जबकि जनसंघ के साथ इन दलों की कोई सैद्धांतिक मैत्री नहीं थी। बाद में हमने देखा कि जनसंघ ने कैसे इन दलों की कीमत पर अपनी ताकत बढ़ाई। आज स्थिति बदल चुकी है। आज जब भाजपा सत्ता में है तब आवश्यकता इस बात की है कि गैर-भाजपावाद या गैर-संघवाद की रणनीति बनाई जाए। इसमेंं सफलता तभी मिल सकती है जब कांग्रेस, समाजवादी और साम्यवादी तीनों मिलकर साझा मोर्चा बनाएं। यद्यपि कांग्रेस में एक खेमा है जो कारपोरेट पूंजी का पक्षधर है; वह इसमें बाधा उत्पन्न कर सकता है। इस पर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को ही विचार करना होगा। इस एक बड़े मुद्दे को छोड़कर कांग्रेस व अन्य गैर-भाजपाई दलों के बीच ऐसे कोई सैद्धांतिक मुद्दे नहीं हैं जिन पर आम राय न बन सके। यह देखना होगा कि बिहार में विधानसभा चुनाव के पहले क्या कोई ऐसा गठजोड़ बन पाएगा?

देशबन्धु में 23 अप्रैल 2015 को प्रकाशित 

Thursday, 16 April 2015

शिक्षा: सरकार बनाम समाज

 



एक
सज्जन कुछ दिन पहले मिलने आए। उनका एक बेटा शहर के किसी नामी स्कूल में पढ़ता है। इस साल उन्हें अपने दूसरे बच्चे को स्कूल में दाखिला दिलाना है। उन्होंने सहज ही सोचा कि जहां पहले से एक संतान पढ़ रही है वहीं दूसरी को भी प्रवेश मिल जाएगा। वे जब इस कार्य के लिए प्राचार्य से मिले तो सुनकर हैरान रह गए कि पहली कक्षा के लिए दिसम्बर-जनवरी में ही प्रवेश की प्रक्रिया समाप्त हो चुकी थी। यह इस तरह का इकलौता प्रकरण नहीं है। मां-बाप अपने बच्चों को अपनी जेब के मुताबिक बेहतर से बेहतर शाला में दाखिल करवाना चाहते हैं, लेकिन जिन स्कूलों ने अपनी श्रेष्ठता की छवि गढ़ ली है वहां किसी का भी वश नहीं चलता। यह छवि पैसे, प्रचार और संबंधों के बल पर गढ़ी जाती है तथा संचालक जानते हैं कि उनकी मनमानी रोकने का हौसला किसी में नहीं है।

इन दिनों एक तरफ जब स्कूली परीक्षाएं लगभग खत्म हो चुकी हैं और नतीजे आने लगे हैं तो वहीं दूसरी तरफ नामी स्कूलों में प्रवेश पाने के लिए लंबी कतारें लगी हुई हैं। कहीं बच्चों की परीक्षा ली जा रही है, तो कहीं पालकों की। नियमित फीस तो लगना ही है, इसके अलावा अन्य मदों में भी पैसे की उगाही हो रही है, फिर वह जायज हो या न हो। सवाल उठना लाजिमी है कि अभिभावकगण अपने पाल्यों को इन शालाओं में पढ़ाने के लिए ही इस कदर परेशान क्यों हैं। सामान्य तौर पर उत्तर यही मिलता है कि अच्छे स्कूल में पढ़ेंगे तो बच्चे की जिन्दगी संवर जाएगी। वे यह जानने की कोशिश नहीं करते कि यह वास्तविकता है या उनका भ्रम। मुझे ध्यान नहीं आता अगर किसी संस्था ने यह शोध की हो कि इन स्कूलों से पढ़कर निकले बच्चे क्या सचमुच अपने अभिभावकों के सपनों को साकार करने में कामयाब हो सके और इससे जुड़ा हुआ दूसरा सवाल यह भी है कि आखिरकार कामयाबी का पैमाना क्या है?

प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में जब शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकारों में शामिल करने की पहल की गई और जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में इस अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए कानून बनाया गया तो मुझ जैसे लोगों को बेहद खुशी हुई थी क्योंकि इसके साथ देश की नई पीढ़ी के लिए विराट संभावनाएं खुलती प्रतीत हो रही थीं। मैंने पांच साल पहले जितनी प्रसन्नता अनुभव की थी आज उतनी ही हताशा महसूस कर रहा हूं। मैं देख रहा हूं कि न सरकार, न समाज, न अध्यापक, न अभिभावक- किसी की भी दिलचस्पी शिक्षा का अधिकार कानून की भावना को समझकर उसे सही तरह से लागू करने में नहीं है। इस कानून की जब भी बात होती है तो सबका ध्यान सिर्फ एक बिन्दु पर जाकर रुक जाता है तथा कानून के बाकी प्रावधान अनछुए रह जाते हैं।

यह बात लगभग सबको पता है कि शिक्षा का अधिकार कानून में निजी स्कूलों में पहली कक्षा से शुरु होकर पच्चीस प्रतिशत स्थान सुविधाहीन परिवारों के बच्चों के लिए आरक्षित किए गए हैं। हो यह रहा है कि हर अभिभावक अपने पाल्य को इस प्रावधान के अंतर्गत किसी निजी स्कूल में येन-केन-प्रकारेण प्रवेश दिलाना चाहते हैं। वे इसके लिए दौड़ धूप करने में कोई कसर बाकी नहीं रखते। सरकार ने नियम तो बनाए हैं कि सरकारी स्कूल के प्राचार्य नोडल अधिकारी होंगे और सुनिश्चित करेंगे कि आस-पास के निजी स्कूलों में पच्चीस प्रतिशत सीटें उन बच्चों को दी जाएं जो फीस नहीं भर सकते।  इससे निजी स्कूल को जो आर्थिक क्षति होगी उसकी भरपाई करने का नियम भी सरकार ने बनाया है, लेकिन इस प्रावधान का लगातार उल्लंघन हो रहा है और छत्तीसगढ़ सरकार ने तो कानून को सिर के बल खड़ा कर दिया है। वह भी तब जबकि शिक्षामंत्री स्वयं एक आदिवासी युवक हैं।

पिछले पांच साल से पूरे देश से लगातार खबरें आ रही हैं कि निजी स्कूल गरीब बच्चों को अपने यहां प्रवेश नहीं देते। इन शालाओं की फीस पचास-साठ हजार साल से लेकर पांच लाख रुपए साल तक की होती है। कानून का पालन करने में उन्हें घाटा ही घाटा न•ार आता है। अर्थहानि तो खैर है ही, क्योंकि सरकार उनकी फीस का कुछ हिस्सा ही वापिस लौटाती है; किन्तु इससे बढ़कर उनका डर है कि गरीबों के बच्चे अगर इनके स्कूलों में पढ़ेंगे तो दूसरे बच्चे बिगड़ जाएगे। स्कूल का प्रबंधन और शिक्षक तो ऐसा मानते ही हैं, सम्पन्न अभिभावकों के मन में भी यही भावना होती है। इन सबके मन में दुराग्रह है कि गरीबों के बच्चे अनिवार्यत: बिगड़े  हुए होते हैं। भारतीय समाज में आदिवासी, दलित, किसान, मजदूर- इन सबके प्रति जो घृणा का भाव कथित सभ्य समाज में है यह उसका ज्वलंत उदाहरण है।  इसके अलावा अपने बच्चों को महंगे, निजी, विशिष्ट स्कूलों में पढ़ाने और गरीब बच्चों को उनसे दूर रखने के पीछे यह प्रयोजन भी है कि उनके अभिजात्य की दीवार न टूटने पाए।

यह सचमुच एक दु:खद स्थिति है, खासकर तब जब यही अभिजात समाज इस गर्व से इठला रहा है कि एक चाय बेचने वाला आज देश का प्रधानमंत्री है। हम नहीं सोचते कि प्रधानमंत्री ने अपनी भांति-भांति की व्यस्तताओं के बीच इस ओर कभी ध्यान दिया होगा, लेकिन अगर वे अब भी इस बारे में विचार करने के लिए कुछ समय निकाल सकते तो अच्छा होता। भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी के प्रति भाजपा द्वारा सच्चा सम्मान भी तभी व्यक्त होगा जब उनकी भावना के अनुरूप देश के हर बच्चे को बिना किसी भेदभाव के अनिवार्य और नि:शुल्क शिक्षा प्राप्त होगी। प्रधानमंत्री मेक इन इंडिया का नारा बुलंद किए हुए है किंतु भारत की नई पीढ़ी का एक बहुत बड़ा भाग सही ढंग से शिक्षित नहीं होगा तब तक उनका यह नारा भी कार्यरूप में परिणित नहीं हो पाएगा। हम यह भी याद दिला दें कि अमेरिका में तो राष्ट्रपति के बच्चे भी सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं, चाहे क्लिंटन हो या ओबामा।

दरअसल शिक्षा और शिक्षा का अधिकार कानून को लेकर समाज में भी कुछ गलत धारणाएं व्याप्त हैं और कुछ अपने उत्तरदायित्व को सरकार पर मढ़ देने की प्रवृत्ति भी है। यह तथ्य स्मरणीय है कि देश के नब्बे प्रतिशत स्कूल सरकारी क्षेत्र में है।  याने निजी शालाओं का आंकड़ा दस प्रतिशत के आस-पास है। यदि हर अभिभावक अपने बच्चे को निजी शाला में ही दाखिला कराना चाहेगा, तो यह असंभव स्थिति होगी। निजी स्कूल पालकों की इस भावना का शोषण करने से बाज नहीं आते। इस सच्चाई को समझकर पालकों को भी अपने विचारों में परिवर्तन करने की आवश्यकता है। अपने बच्चों को किसी निजी शाला में ले जाने से पहले उन्हें यह पूछताछ भी कर लेना चाहिए कि उस स्कूल से पढ़ कर निकले बच्चों ने आगे चलकर क्या उपलब्धियां हासिल कीं। सिर्फ गलत अंग्रेजी बोलने और टाई लगाने से बच्चे काबिल नहीं बन जाते।

शिक्षा के क्षेत्र में जो सिविल सोसायटी संगठन काम कर रहे हैं जैसे आरटीई फोरम (राइट टु एजुकेशन फोरम) इत्यादि। उन्हें भी इस बारे में नए सिरे से सोचने और नई रणनीति तैयार करने की सलाह मैं दूंगा। यह नहीं भूलना चाहिए कि कार्पोरेट के दबाव में सरकार शिक्षा के निजीकरण की ओर कदम बढ़ा रही है। पिछले दो-तीन साल से किसी संस्था द्वारा जारी 'असर' नामक रिपोर्ट भी प्रकारांतर से निजीकरण की वकालत करती है। अगर शिक्षा का अधिकार कानून को सही तरीके से लागू करना हो तो उसके लिए जो सबसे बड़ा कदम उठाया जा सकता है वह है कि सरकारी स्कूलों की दशा सुधारी जाए। इसके लिए हर गांव और हर मुहल्ले के नागरिकों को आपस में बैठकर तय करना होगा कि वे अपने पुरा-पड़ोस के स्कूल को बेहतर बनाने के लिए क्या कर सकते हैं।

मेरा मानना है कि सरकार की मंशा चाहे जो हो, कार्पोरेट चाहे जो चाहे, उत्तम शिक्षा की चाबी तो समाज के हाथों में है। अगर निजी स्वार्थ से उठकर नागरिक अपने नजदीकी स्कूल की उन्नति करने का बीड़ा उठा लें, तो उन्हें सफलता निश्चित ही मिलेगी। इसमें उन्हें शिक्षकों का भी योगदान मिलेगा और उन नागरिकों का भी जिनके बच्चे वहां नहीं पढ़ते। जनप्रतिनिधियों को अगर वोट चाहिए तो उन्हें भी विवश होकर ऐसे प्रयोगों में सहयोग देना होगा।

देशबंधु में 16 अप्रैल 2015 को प्रकाशित

Wednesday, 8 April 2015

चाय का स्वाद


 



कहा
जाता है कि अखबार पढऩे का आनंद सुबह चाय की चुस्कियों के साथ ही मिलता है। हो सकता है कि इस समय जब आप इस लेख को पढ़ रहे हैं, चाय का प्याला बाजू में तिपाई पर रखा हो। यूं  तो चाय को भारत में आए सौ साल ही हुए हैं लेकिन वह इस कदर हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन गई है कि उसके बिना दिन अधूरा लगता है। वे जन जो आए दिन उपवास करते हैं,  उन्हें भी चाय से सामान्यत: परहेज नहीं होता। घर आए मेहमान को चाय ऑफर करना आज का सामान्य शिष्टाचार है। इसका पालन नहीं किया तो पीठ पीछे बुराई होती है- एक कप चाय के लिए भी नहीं पूछा। अहमदाबाद और पुणे जैसे नगरों में चाय पिलाने को लेकर जो चुटकुले प्रचलित हैं वे आप किसी गुजराती या पुणेरी मित्र से जान सकते हैं।

जैसा कि हम जानते हैं चाय भारत में चीन से आई है, लेकिन जैसी चाय हम पीते हैं वह चीन वालों को रास नहीं आएगी। वे या तो हरी चाय याने ग्रीन टी पीते हैं जिसमें न दूध होता  है न शक्कर। बस पत्ती का कड़वा कसैला स्वाद ही मुख में आता है। इसका दूसरा पहलू है कि पर्यटकों के लिए चीन ने टी सेरिमनी की अपनी परिपाटी विकसित कर ली है जिसमें आपको गुलाब, बेला, चमेली, जवा कुसुम आदि फूलों की खुशबू और स्वाद वाली चाय परोसी जाती है। चीन से ही चाय जापान भी गई होगी। वहां जो टी सेरिमनी होती है उसके बारे में लेख तो क्या पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। जापान की सुरुचि-सम्पन्नता और कलाप्रियता, सुघड़ता और नज़ाकत जैसे कितने ही गुणों का परिचय उस सुदीर्घ चाय पार्टी से मिल जाता है। चीन और जापान से ही प्रेरणा लेकर हमारे यहां भी विभिन्न फ्लेवरों वाली चाय मिलने लगी है। सेहत के लिए फिक्रमंद लोग अब ग्रीन टी की खूबियों का बखान करते भी आपको मिल जाएंगे।

सात समंदर पार अंग्रेजों ने भी चाय पीने की आदत चीन से ही सीखी है। अभिजात ब्रिटिश घरों में शाम को चार बजे ''टी" का आयोजन उनकी विशिष्ट जीवन शैली का हिस्सा है। भारत तो खैर चाय का दीवाना है ही लेकिन चाय पीने का सलीका सीखना हो तो मौलाना अबुल कलाम आजाद से बेहतर कोई नहीं बता सकता। उन्होंने चालीस-पचास के दशक में अपने एक ललित निबंध में बताया था कि चाय किस न फासत के साथ पी जाना चाहिए। वे दूध, पानी, चाय, शक्कर एक साथ डालकर उबालने के हिमायती न होकर सेपरेट चाय की खूबियां गिनाते हैं। वे कहते हैं कि जब प्याला होठों से लगाया जाए तो चीनी मिट्टी का स्वाद बीच में बाधा नहीं बनना चाहिए। छत्तीसगढ़ के पाठकों के लिए यह जानना दिलचस्प हो सकता है कि पूर्व मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल कुछ इसी अंदाज में चाय पीते थे।

पाठकगण! आप के मन में यह सवाल उठ रहा होगा कि मैं आज यह विषय क्यों ले बैठा। सो पहले तो यह स्पष्ट कर दूं कि प्रधानमंत्री की चाय की चर्चा से इसका कोई ताल्लुक नहीं है। दरअसल कुछ दिन पहले सुबह चाय के प्याले के साथ-साथ कोई पत्र-पत्रिका पढ़ते हुए मेरी निगाह एक समाचार पर जाकर ठिठक गई। वह समाचार चाय पर ही था और उसने मुझे चाय के बारे में मन भटकाने के लिए एक बड़ा विस्तार दे दिया। खबर अच्छी है और यह है कि गुवाहाटी के किसी शिक्षण संस्थान ने एक ऐसी डलिया का निर्माण किया है जो चाय बागानों में पत्तियां तोडऩे वाली मजदूर औरतों के लिए ज्यादा आरामदायक है। उससे उनकी पीठ पर और रीढ़ की हड्डी पर कम वजन पड़ेगा। जबकि दूसरी ओर वे डलिया में लगभग ड्योढ़ी मात्रा में पत्तियां संचित कर सकेंगी। यह आविष्कार सुनने में छोटा लगता है लेकिन लाखों मेहनतकश स्त्रियों को इसका जो लाभ होगा, वह बड़ी खुशी की बात है।

मैंने जब इस आविष्कार की खबर पढ़ी तो विचार आया कि चाय बागानों में काम करने वाले मजदूरों का जीवन कितना दूभर होता है। असम और बंगाल में इन मजदूरों को टी गार्डन ट्राइबल या चाय बागान आदिवासी की संज्ञा से जाना जाता है। इनमें से अधिकतर मजदूरों के पुरखे छत्तीसगढ़ और झारखंड से ले जाए गए थे। हमारी मिनीमाता के पुरखे भी उन्हीं में से थे। इन लोगों ने बागान मालिकों और मैनेजरों के हर तरह के अत्याचार बर्दाश्त किए। मेहनत का जितना मुआवजा मिल जाए उसी को गनीमत जानो। लेकिन आज जनतांत्रिक व्यवस्था में इन्हें जिस तरह संदेह की दृष्टि से देखा जाता है और आज भी जब उन पर अत्याचार होता है तो मन को क्लेश पहुंचता ही है। हम सुबह, दोपहर, शाम जब कभी भी चाय का प्याला हाथ में लेते हैं, उसकी खूशबू से मगन होते हैं, एक घूंट पीकर ताजगी का अहसास करते हैं तब शायद कभी भी यह ध्यान नहीं आता कि यह चाय हम तक पहुंची कैसे?

मुल्कराज आनन्द ने 1937 में लिखे अपने उपन्यास 'दो पत्ती और एक कली' में चाय बागानों के मजदूरों की दारुण दशा का वर्णन किया है। इस उपन्यास पर  ही पंद्रह साल बाद ख्वाजा अहमद अब्बास ने 'राही' फिल्म बनाई जिसके नायक देवानन्द थे। उस समय चाय बागानों के मालिक अंग्रेज थे और आज हिंदुस्तानी हैं, लेकिन परिस्थितियों में कोई बहुत फर्क नहीं आया है। हो सकता है कि आज मजदूरी की शर्तों में कुछ सुधार हुआ हो, लेकिन यह जितना हाड़ तोड़ देने वाला काम है वह सच्चाई तो अपनी जगह कायम है। ये जहां रह रहे हैं वहां इन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक माना जाता है यह बात भी कम दर्दनाक नहीं है। ऐसे में यदि एक छोटा सा आविष्कार इन श्रमशील महिलाओं को यदि थोड़ी राहत दे पाता है तो मैं समझता हूं कि हमारी चाय कुछ ज्यादा स्वादिष्ट हो सकेगी।

चाय के बारे में सोचते-सोचते मेरा ध्यान नर्मदा कछार की ओर चला गया। जबलपुर से लेकर नरसिंहपुर, गाडरवारा, होशंगाबाद तक नर्मदा के किनारे ठंड के दिनों में मटर की खेती होती है। दिसम्बर-जनवरी में उस तरफ निकले तो खेतिहर महिलाएं साथ में टोकरी रखे मटर तोड़ते नज़र आ जाएंगी। मीलों तक यही दृश्य चला आता है। मन ललचाता है कि खेत में उतरकर मटर की कच्ची मीठी फलियां तोड़कर खाई जाएं, लेकिन हम यह कहां जानने की कोशिश करते हैं कि दिनभर खेत में मटर की फली तोडऩे का काम करते हुए इन महिलाओं की पीठ किस तरह दुखती होंगी। यह सच्चाई सतपुड़ा के जंगलों में साल और महुआ बीनने वाले आदिवासियों पर भी तो लागू होती है। मैं कभी विद्यार्थियों से बात करता हूं तो उन्हें कहता हूं, यह मत भूलना कि तुम जिस चाकलेट को पंसद करते हो, उसमें साल बीज का तेल है और ये साल बीज बस्तर या सरगुजा के जंगल में किसी आदिवासी ने बड़ी मेहनत से इकट्ठे किए हैं।

साल बीज के तेल से बनी चॉकलेट, डिब्बाबंद मटर और चायपत्ती इनके चित्ताकर्षक विज्ञापन टीवी पर देखने मिलते हैं। चॉकलेट का विज्ञापन युवा पीढ़ी को भरमाता है कि उन्हें यदि प्रेम में सफल होना है तो फलानी चॉकलेट को माध्यम बनाना चाहिए। इसी तरह अमिताभ बच्चन त्यौहार पर देसी मिठाई के बजाय चॉकलेट उपहार में देने की वकालत करते हैं। मटर के विज्ञापन में उसके सूप के सेहतकारी गुण बताए जाते हैं। चायपत्ती के एक विज्ञापन में ट्रेन के ड्रायवर और गार्ड भी ट्रेन को भूलकर चाय पीने के लिए रुक जाते हैं, तो दूसरे विज्ञापन में उस्ताद जाकिर हुसैन अपनी पसंदीदा चाय का गुणगान करते हैं। नवपूंजीवाद ने बाजार का रूप जिस तरह से बदला है, उसमें यह सब होना ही था। उसकी बात करने का अभी कोई अर्थ नहीं है। किंतु फिलहाल हम इतना तो कर ही सकते हैं कि गुवाहाटी के उन युवा आविष्कारकों को बधाई दें जिनकी खोजी निगाह चाय बागान के मजदूरों पर जा टिकी और जिन्होंने उनके प्रति संवेदना अनुभव करते हुए अपने ज्ञान का इस्तेमाल इस सुंदर और उपयोगी आविष्कार के लिए किया।
देशबन्धु में 09 अप्रैल 2015 को प्रकाशित