Saturday, 21 April 2012

भ्रष्टाचार- 4


  विदेशों में कालाधन 

हम भारत के लोग एक मायने में दुनिया के तमाम लोगों से अनूठे हैं। हर छठे-छैमासे हमें किसी न किसी ऐसे मुद्दे की जरूरत पड़ जाती है जिस पर सार्वजनिक रूप से हल्ला मचाया जा सके।

मजे की बात है कि ऐसे मुद्दे हमें आराम से मिल भी जाते हैं। अपना बहुत सा कीमती वक्त हम इन पर बहसों में बीता देते हैं और फिर एक दिन सब कुछ भूल-भालकर वापिस अपने कामधाम में लग जाते हैं। ऐसे मुद्दों पर जब बहस होती है तो उसमें कल्पना की असीमित उड़ान भरने की छूट रहती है और तथ्यों व तर्कों से कोई खास वास्ता नहीं रखा जाता। ये बहसें हमें एक संशयग्रस्त समाज के रूप में प्रस्तुत करती हैं जिसका अपने आप पर से विश्वास उठ चुका है। इन दिनों जो मुद्दा गरमागरम समोसों की तरह हमें लुभा रहा है वह है विदेशी बैंकों में जमा देश का धन। 

ऐसा बताया जा रहा है कि भारत का जो धन विदेशों में जमा है वह अरबों-खरबों में है तथा राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का लगभग पचास प्रतिशत है। इस धन को वापिस लाने की मांग उठ रही है तथा देश को यह समझाने की कोशिश हो रही है कि जिस दिन यह पैसा वापिस आ जाएगा, उस दिन भारत एक सुखी सम्पन्न देश बन जाएगा। एक तरह से देशवासियों की भावनाओं को भड़काने का काम चल रहा है एवं वास्तविकता क्या है, इसे जानने-समझने के प्रयत्न नहीं के बराबर हो रहे हैं। इस विषय को थोड़ा-बहुत समझने में मुझे दो जिम्मेदार -जानकार नागरिकों से मदद मिली। पहले सुरजीत भल्ला जो देश में आर्थिक मामलों के जाने-माने विशेषज्ञ हैं तथा जिन पर कांग्रेस या सरकार से सहानुभूति रखने का आरोप नहीं लगाया जा सकता। दूसरे हैं छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ कर-विशेषज्ञ किशोर देशपांडे जिनके राजनैतिक विचार वर्तमान सरकार से मेल नहीं खाते। आशय यह है कि दोनो सरकार के तरफदार नहीं हैं। 

सुरजीत भल्ला ने कुछ दिन पहले एक लेख में बताया कि विदेशों में जमा काले धन को लेकर बढ़-चढ़कर दावे किए जा रहे हैं, लेकिन वास्तविकता में वह धन राष्ट्रीय सकल उत्पाद के एक-डेढ़ प्रतिशत से ज्यादा नहीं है। इसी तरह किशोर देशपांडे ने रायपुर की एक सभा में अपने व्याख्यान में बताया कि विदेशी बैंकों में भारतवासियों का पैसा जमा तो है, लेकिन उसका आकार क्या है यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। धन जितना भी है उसे वापिस लाना आसान नहीं है। इसके लिए यह साबित करना होगा कि उन देशों के कानून के अनुसार अपराध करके यह पैसा लाया गया है। यह धन अगर वापस आता भी है तो इससे टैक्स के रूप में सरकारी खजाने को होने वाली प्राप्ति बहुत ज्यादा नहीं होगी। इन दोनों विशेषज्ञों के विचारों का जो सार मैं ग्रहण कर पाया वह यही है कि बात जितनी बड़ी है उसे कई गुना बड़ा करके बताया जा रहा है।

इस बारे में मैं अभी तक जितना कुछ समझ पाया हूं उसके अनुसार विदेशी बैंकों में गुप्त खाते खोलकर धन जमा करने की यह प्रवृत्ति सिर्फ भारत में ही नहीं, दुनिया के लगभग हर देश में है तथा यह सिलसिला सौ साल से भी ज्यादा समय से चले आ रहा है। सच तो यह है कि स्विट्जरलैण्ड जैसे देशों की अर्थव्यवस्था इसी पर टिकी हुई है। दुनिया के सबसे सम्पन्न माने जाने वाले देश अमेरिका के नामीगिरामी फिल्मी सितारे, गायक, कलाकार, लेखक, खिलाड़ी इत्यादि भी टैक्स बचाने के लिए दूसरे देशों के नागरिक बन जाते हैं। प्रशांत महासागर के अनेक द्वीप देशों का सारा दारोमदार इन सम्पन्न अमेरिकी नागरिकों पर है। भारत की ही बात लें तो जैसा कि श्री देशपांडे ने अपने भाषण में बताया आजादी के समय राजे-महाराजाओं ने अपना पैसा बाहर भेज दिया था यह सोचकर कि जनतांत्रिक भारत में पता नहीं उनका गुजारा हो पाएगा या नहीं। दूसरे, जब इंदिरा जी के कार्यकाल में एक समय आयकर की दर 97 प्रतिशत तक पहुंच गई थी तब भी धनिकों ने अपनी आय बाहर भेज दी हो, तो कोई आश्चर्य नहीं।

विदेशों में जमा धन को वापिस लाने की जो मुहिम चल रही है वह मुख्य तौर पर और शायद जानबूझकर, वर्तमान सरकार को कटघरे में खड़ा करती है। ऐसा आभास दिया जा रहा है कि विदेशी बैंकों में यदि भारतीय धन है तो वह कांग्रेस नेतृत्व के चलते है। विपक्ष के लिए सत्तारूढ़ गठबंधन पर आक्रमण करने का यह एक और अच्छा मौका है, लेकिन विपक्ष से जिस जिम्मेदारी और ईमानदारी की अपेक्षा की जाती है, उसका यहां अभाव परिलक्षित होता है। एक तो ज्ञातव्य है कि जिन भारतीयों ने विदेशी बैंकों में पैसा जमा किया है वे एनआरआई अथवा पीआईओ हो सकते हैं और भारत के कानून संभवत: इस मामले में लागू उन पर न होते हों। दूसरे, राजनीतिक दलों का जो पैसा इस तरह से जमा होगा वह मुख्य रूप से सैन्य सामग्री की खरीद पर  मिले कमीशन का होगा, जिसका एक अच्छा-खासा हिस्सा आम चुनावों के समय किसी न किसी तरीके से देश में आता होगा। तीसरे, अनेकानेक वाणिज्यिक प्रतिष्ठान आयात-निर्यात की प्रक्रिया में विदेशों में गुप्त रूप से लेनदेन करते हैं तथा स्वीट्जरलैण्ड या अन्यत्र जमाधन में बहुत बड़ा हिस्सा इस तरह से बनाया गया होगा। चौथे, भारत ने मॉरीशस तथा कुछ अन्य देशों के साथ दोहरे कराधन से बचने के लिए संधियां की हैं, उसके माध्यम से जो काला धन आज आ रहा है वह पूरी तरह से वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों का ही है। पांचवी बात यह है कि क्या देश के भीतर कालाधन नहीं है और क्या हर रोज देश के भीतर ही कालाबाजारी, जमाखोरी, गबन और घूस के नए-नए प्रकरण रोज सामने नहीं आ रहे हैं! सरकारी एजेंसियों के द्वारा छापे मारे जाते हैं, संपत्तियां जब्त की जाती हैं और फिर चुपचाप कुछ दिनों बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है। 

मुझे यह देखकर हैरत होती है कि विदेशों में जमाधन वापिस लाने की मुहिम का नेतृत्व बाबा रामदेव कर रहे हैं। उनके साथ श्री श्री रविशंकर भी जुड़ गए हैं और किरण बेदी जैसे अनेक भूतपूर्व नौकरशाह भी। ये जो आरोप लगा रहे हैं उसकी पुष्टि में ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल तथा ग्लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रिटी जैसी संस्थाओं की रिपोर्ट्स को आधार बनाते हैं। ट्रांसपेरेंसी का कामकाज भारत में पूर्व नौसेना अध्यक्ष एडमिरल टहलियानी संभालते हैं। ऐसे तमाम लोगों का एक मंच पर आना मुझे चकित करता है। मैं देखता हूं कि भारत का अपराधबोध से ग्रस्त उच्च मध्यम वर्ग समय-समय पर ऐसे प्रतीक खड़े कर लेता है जिनके वक्तव्यों व उद्गारों पर तालियां बजाकर ग्लानि मुक्त हो सके। महाकवि तुलसीदास कह गए हैं''एक घड़ी, आधी घड़ी आधी में पुनि आध, तुलसी संगत साधु की, हरै कोटि-कोटि अपराध।''

भारत के नागरिकों ने यदि अवैध रूप से धनसंचय किया है तो वह विदेशी बैंक में हो या देशी बैंक के लॉकर में, वह चाहे बेनामी संपत्ति के रूप में, या कम मूल्य पर रजिस्ट्री की गई सम्पत्ति के रूप में हो, चाहे कथित रूप से पत्नी या बहू को मायके से मिले आभूषणों के रूप में हो, सबका खुलासा होना चाहिए। सेवानिवृत्त नौकरशाहों के बारे में क्या कहें, उन्हें तो किसी न किसी रूप में शक्ति चाहिए ही; लेकिन जब साधु-महात्मा ऐसे आन्दोलनों की अगुवाई करें तो सबसे पहले उन्हें अपने भक्तों का कालाधन खुले में लाने के लिए प्रेरणा देना चाहिए।
गुरू नानकदेव के बारे में एक कथा प्रचलित है- उन्होंने गरीब की रोटी स्वीकार की और अमीर की नहीं। कारण पूछने पर उन्होंने गरीब की रोटी को दबाया तो उसमें से दूध की बूंदें टपकीं और अमीर की रोटी दबाने पर खून की बूंदें। बाबा रामदेव ने यह कथा जरूर सुनी होगी!

 10 फ़रवरी 2011 को प्रकाशित 

भ्रष्टाचार- 3

 माला की माया, मेम्बरी की मणि 


इस लेख के शीर्षक में यूं तो उलटबासी नजर आती है, लेकिन यह आप जान ही गए हैं कि आज की चर्चा किस दिशा में बढ़ रही है। अगर शीर्षक को बढ़ाने की गुंजाइश होती तो मैं इसमें एक अंश और जोड़ता जो शायद इस तरह होता-मनमर्जी के मंत्री अथवा मर्यादा का मंत्रित्व। शीर्षक के इन तीनों हिस्सों का एक दूसरे से संबंध स्पष्ट है और देश के वर्तमान राजनीतिक माहौल पर अपने आप में एक टिप्पणी है।

वैसे तो कहा जा रहा है कि मायावती ने मालाएं पहनीं, लेकिन हम तो कहेंगे कि मालाओं ने मायावती का वरण किया। वे किसी और के गले में न जाकर मायावती के गले में ही क्यों पड़ीं, इस पर विचार करने की जरूरत है। इस सच्चाई से सब वाकिफ हैं कि राजनीति चलाने के लिए धन की जरूरत होती है। जितनी बड़ी राजनीतिक इच्छा, उतनी ही बड़ी धन की जरूरत। राजाओं और तानाशाहों के धन उगाही के तरीके अलग किस्म के थे। उसमें केंद्रीकरण और किसी हद तक क्रूरता होती थी। जनतंत्र की जरूरतें विकेंद्रीकृत हैं और धन संग्रह की प्रक्रिया संकोच के आवरण में चलती है। यह धनसंग्रह आज की जरूरतों के लिए तो होता ही है, भविष्य की अनहोनियों का भी ध्यान इसमें रखा जाता है।  यह डर सबको बना रहता है कि कल अगर पद न रहा तो काम कैसे चलेगा।  

हमारे छत्तीसगढ क़े ही एक मंत्री थे। यह मध्यप्रदेश के दिनों की बात है। उनके बेटे या बेटी के विवाह में उनके विधानसभा क्षेत्र से भेंट स्वरूप हजारों मनीआर्डर पहुंचे। जानकारों ने शंका जतलायी कि इस बहाने मंत्री जी ने अपने काले धन को सफेद कर लिया। मंत्री जी का मासूम उत्तर था कि मतदाता मुझे चाहते हैं इसलिए उन्होंने मुझे ये मनीआर्डर भेजे। ऐसा ही तर्क तो मायावती जी का है। उनकी द्विविधा हमें समझ आती है। देश की दो बड़ी पार्टियों के पास लंबे अनुभव के चलते भांति-भांति की व्यवस्थाएं हैं। उनका पैसा विदेशी बैंकों में जमा हो सकता है; उद्योगपतियों के पास चल सकता है; यहां तक कि घर में बोरों में भरकर भी रखा जा सकता है। उन्हें कोई कुछ नहीं कहता। यदि मायावती भी ऐसा करने लगें तो मुसीबतें ही मुसीबतें होंगी। उन्हें स्विस बैंक का रास्ता नहीं मालूम; उद्योगपतियों के साथ अभी तक शायद उनके परस्पर विश्वास के रिश्ते नहीं होंगे; घर में रखेंगी तो आयकर नहीं तो प्रवर्तन निदेशालय, नहीं तो सीबीआई-कोई न कोई आ धमकेगा। सबसे अच्छा है कि जो चुनावी चंदा आ रहा है, उसे अपने नाम से बैंक में जमा रखो। टैक्स देना है तो वह भी भर दो। राशि सुरक्षित तो हुई। मायावती के आयकर वकील जो भी हों, उनके दिमाग की दाद देनी होगी। जो लोग फूल की माला पहनते हैं उनके यहां नोटों के सूटकेस और बोरे बिना जांच पड़ताल के सुरक्षित पहुंच जाते हैं। बसपा के लिए दिया गया चंदा अगर माला की शक्ल में मायावती के पास पहुंच रहा है तो इसमें इतनी हाय तौबा मचाने की क्या जरूरत है। जो मायावती को दौलत की बेटी कहकर धिक्कार रहे हैं वे गलती कर रहे हैं। दलित की बेटी को यदि लंबे समय तक राजनीति करना है तो दौलत जिस रूप में भी आए लेना ही पड़ेगी। नैतिकता की दुहाई देना सिर्फ ढकोसला है।

इस किस्से को यही छोड़ दूसरी बात करें। राष्ट्रपति जी ने राज्यसभा की मेंबरी मणिशंकर अय्यर को दे दी, इस पर हो हल्ला हो रहा है, लेकिन ऐसा क्या गलत हो गया? हमारी राजनीतिक परंपराएं ही इस रूप में विकसित हो रही हैं कि जो सत्ता में है वह जैसा चाहे वैसा कर ले। परिपाटियों को मानने की तो बात ही नहीं है। कानून आड़े आए तो उसको भी बदल देते हैं। मनमोहन सिंह बिना चुनाव लड़े प्रधानमंत्री बने हुए हैं। राज्यसभा की सदस्यता के नियम बदल दिए गए। सोमनाथ चटर्जी लोकसभा अध्यक्ष जैसे बड़ी कुर्सी पर बैठकर भी शांति निकेतन विकास प्राधिकरण की अध्यक्षता का मोह नहीं छोड़ पाए।  जनप्रतिनिधित्व कानून में परिवर्तन कर दिया गया। अकेली सोनिया गांधी ने इस्तीफा देकर दुबारा चुनाव लड़ने की हिम्मत जुटाई। आज भी किसी ने यह नहीं पूछा कि शबाना आजमी के बाद जावेद अंख्तर को ही राज्यसभा के लिए मनोनीत क्यों किया गया। क्या यह वंशवाद को बढ़ावा देना नहीं है? क्या वे भारतीय साहित्य के प्रतिनिधि कहे जा सकते हैं! मणिशंकर अय्यर का अपराध सिर्फ इतना है कि अतीत में मंत्री रह चुके हैं। वरना कांग्रेस और भाजपा दोनों ने राष्ट्रपति के कोटे से मनोनयन में अपनी मनमानी करने में कमी नहीं की। मणिशंकर अय्यर राज्यसभा में रहेंगे तो कुछ ठीक-ठिकाने की बात ही करेंगे।

तीसरी बात। छत्तीसगढ़ के मंत्री रामविचार नेताम ने कथित तौर पर बिलासपुर के प्रोटोकॉल अधिकारी को तमाचा मार दिया। नेताम जी का क्या दोष। वे ऐसा करने वाले पहले राजनेता नहीं हैं। उनकी अपनी पार्टी में उनके ही वरिष्ठ नेता अतीत में ऐसा कर चुके हैं। सत्ता मद के ऐसे प्रदर्शन से कोई भी पार्टी ऐसी बची नहीं है। यहां तक कि साम्यवादी दल भी नहीं। अफसोस इस बात का कि पीड़ित अधिकारी ने तमाचा मारने के लिए उठा हाथ बीच में ही क्यों नहीं रोक लिया। यह घटना जांच की नहीं, व्याख्या की मांग करती है। राजनेताओं और अधिकारियों के बीच किस तरह के संबंध बन रहे हैं और क्यों बन रहे हैं। दोनों के बीच जो सम्मानजनक दूरी होनी चाहिए वह क्यों कर खत्म हो गई है। 1977-78 के दौरान इंदौर में मंत्री रामानंद सिंह ने निगम आयुक्त सुदीप बैनर्जी पर साबुन-तौलिए के इंतजाम को लेकर रुतबा झाड़ने की कोशिश की थी और सुदीप ने मंत्री जी को वहीं के वहीं मर्यादा में रहने का पाठ सिखा दिया था। ज़ाहिर है कि डिप्टी कलेक्टर देवांगन या उनके जैसे अन्य में सुदीप बनर्जी की राह पर चलने का नैतिक बल नहीं है।
ऐसे किस्से हजार हैं। इन पर चटखारे लेकर चर्चा करने के बजाय यह विचार करना होगा कि स्वस्थ परंपराएं विकसित करने के लिए क्या उपाय किए जाएं।


 25 मार्च 2010 

भ्रष्टाचार- 2

असत्य का पारावार-2


सत्यम घोटाले ने देश के प्रधानमंत्री से लेकर छोटे शेयरधारक तक को अच्छी खासी परेशानी में डाल दिया है। देश के कॉरपोरेट इतिहास के इस सबसे बड़े अपराध का असर विदेशों में भी पड़ा है। जैसे-जैसे बातें खुल रही हैं समझ आ रहा है कि यह लंबे समय से चला आ रहा एक योजनाबध्द अपराध है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि विदेश में जेल न भुगतना पड़े इस डर से कंपनी के मालिक राजू ने स्वदेश की जेल में समय काटना बेहतर समझा और इसीलिए एक मासूम सा दिखने वाला पत्र लिखकर अपना अपराध स्वीकार कर लिया। अब लोग जानना चाहते हैं कि राजू को अपने किए की सजा कैसे मिलती है। वे सत्यम कंपनी के भविष्य के बारे में भी कयास लगा रहे हैं। लेकिन इनसे बढ़कर जनता की उत्सुकता यह जानने में भी है कि इस अपराध में राजू के साथी कौन-कौन थे। साथियों से मतलब कंपनी के अफसर, ऑडिटर, बैंक अधिकारी, निवेशक मंडल के सदस्य के अलावा प्रशासन और राजनीति में शीर्ष स्थानों पर बैठे व्यक्तियों से भी है। एक तरफ जनता की सोच है तो दूसरी तरफ कारपोरेट जगत के नेताओं, प्रवक्ताओं और उससे हित साधन करने वाली जमात की सोच है। सत्यम पर सुबह-शाम बहसें हो रही हैं और इसमें इस जमात का जनविरोधी चरित्र खूब खुलकर सामने आ रहा है। यह देख-सुनकर हैरत होती है कि कारपोरेट जगत के लोग अब अपनी तुलना बाकी देशवासियों से करने लगे हैं। इन दिनों वे यह कहते नजर आते हैं कि जैसा बाकी समाज है, वैसे ही उद्योगपति हैं। वे बड़े भोले अंदाज में कहते हैं कि राजू बाकी लोगों से अलग नहीं है। ये वही लोग हैं जो कल तक स्वयं के श्रेष्ठ होने का दावा करते थे।शेष समाज से अपने आपको अलग रखते थे, और क्लबों और कॉकटेल पार्टियों में राजनीतिज्ञों को कोसते जिनकी जबान नहीं थकती थी। ये देश को ठीक करने के लिए नेताओं को गोली मार देने की बात शराब या पैसे के नशे में धुत होकर किया करते थे। अब जब इन पर आन पड़ी है तो ये एकाएक आम जनता बन गए हैं।


इस अपराध पर और भी जो प्रतिक्रियाएं आ रही हैं वे अचरज में डालती   है। सबको पता है कि इस अपराध पर सीधी-सीधी कानूनी कार्रवाई चलना चाहिए और वह जितनी गति से चले उतना अच्छा है। लेकिन हम देख रहे हैं कि रामलिंगा राजू पुलिस की हिरासत की बजाय पहले कई हफ्तों तक न्यायिक हिरासत में रखे गए। कोई छोटी चोरी करे तो पुलिस की हिरासत और थर्ड डिग्री की मारपीट। अरबों का घोटाला करे तो न्यायिक अभिरक्षा याने पुलिस के हाथों से दूर। इस पर भी बहुत लोगों को दुख है कि राजू को कारागार में सी श्रेणी दी गई है और जेल की पतली दाल खाने को उन्हें मजबूर होना पड़ रहा है। राजनीतिक पार्टियों को इस प्रकरण पर जिस गंभीरता का परिचय देना चाहिए था उसका भी अभाव साफ-साफ परिलक्षित हो रहा है। यद्यपि प्रधानमंत्री कठोर शब्दों में इस पर बेबाक राय दे चुके हैं, लेकिन कांग्रेस, भाजपा और तेलगुदेशम के नेता व प्रवक्ता इसे भी एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने के सुनहरे अवसर के रूप में देख रहे हैं। यह तय है कि इन तीनों पार्टियों को राजू ने समय-समय पर उपकृत किया होगा। अगर ऐसा न होता तो भारत रत्न के योग मैट्रोमैन श्रीधरन के आरोपों पर कार्रवाई करने के बजाय आंध्र सरकार उन पर मानहानि का मुकदमा क्यों चलाती। अब शामत आई है तो सब अपना पल्ला झाड़ लेना चाहते हैं। 

एक मुद्दा सत्यम के कर्मचारियों के भविष्य का है। कारपोरेट जगत के बहुत से लोग अब कर्मचारियों के हित की दुहाई दे रहे हैं। उनकी मदद के लिए कुछ एक केन्द्रीय मंत्री भी सामने आ गए। इसे मुख्य मुद्दा बनाकर बेल आउट पैकेज देने की वकालत की जा रही है। पुरानी कहावत है- ''मुफ्त का चंदन घिस मेरे नंदन''। सरकार पैसा दे और कंपनी को बचाए, लेकिन कंपनी में जो पैसा आया था वह कहां गया? इस पर ये लोग मौन साध लेते हैं। भाकपा के राष्ट्रीय सचिव डी राजा ने उचित ही कहा है कि अगर कंपनी को धनराशि की आवश्यकता है तो वह उसकी सम्पत्ति बेचकर जुटाई जाए। यह तो दिख ही रहा है कि कंपनी से अवैध रूप से धनराशि निकाल-निकालकर ही राजू परिवार ने अनेक नई कंपनियां खड़ी की और उनका उपयोग निजी मुनाफा कमाने के लिए किया। इसलिए सरकार को सत्यम और राजू परिवार की सारी कंपनियों का बेहिचक अधिग्रहण कर लेना चाहिए। दूसरे शब्दों में अगर कंपनी का राष्ट्रीयकरण करना पड़े तो इसमें डॉ. मनमोहन सिंह को पीछे नहीं हटना चाहिए।

मैं यहां अमरीका के एक ताजा प्रसंग को याद करना चाहूंगा। आर्थिक मंदी का दौर शुरू होने पर डेट्रायट की तीनों बड़ी कार कंपनियों ने सरकार से बेल आउट पैकेज मांगा। सीनेट कमेटी के सामने उनकी सुनवाई हुई। तीनों कंपनियों के अध्यक्ष इस गिरी अवस्था में भी अपने-अपने चार्टर विमान लेकर वाशिंगटन गए। इस पर सीनेट के सदस्यों ने उन्हें बेहद खरी-खोटी सुनाई और उम्मीद की कि वे अब शेयर धारकों के धन का बेजा इस्तेमाल करने से बचेंगे। यानी इसी तर्ज पर भारत में भी बड़ी कंपनियों द्वारा सार्वजनिक धन का निजी उपयोग में अपव्यय करने पर पाबंदी लगना चाहिए। इतना याद करना प्रासंगिक व आवश्यक है कि पहले भी हमारे यहां उद्योगपति इसी तरह से कंपनी की जमा पूंजी पर ऐश करते रहे हैं। एक दौर में तमाम कपड़े कारखाने बीमार घोषित कर दिए गए और तब इंदिरा गांधी ने साहसिक कदम उठाते हुए नेशनल टेक्सटाइल्स कंपनी का गठन कर उनका राष्ट्रीयकरण किया। निजी क्षेत्र की अन्य कंपनियों के मामले में भी इसी तरह के कदम उठाए गए। अगर आगे ये ठीक से नहीं चल सके तो वह मिलीभगत के कारण। अगर सरकार सच में चाहे तो सत्यम को इस उपाय से अभी भी बचाया जा सकता है। सत्यम के ऑडिटर प्राइस वॉटरहाऊस कूपर का भी जिक्र करना यहां लाजिमी है। इस फर्म ने सार्वजनिक पत्र जारी किया है कि उसकी ऑडिट रिपोर्ट पर एतबार ना किया जाए। यह विचित्र तर्क है। अगर इसे मान लें तो फर्म अनेकानेक सवालों के घेरे में आ जाती है। हमारी चिंता इस बिन्दु पर है कि ऐसा अनेक फर्मों को विभिन्न केन्द्रीय विभागों और विभिन्न प्रदेश सरकारों ने तगड़ी फीस देकर परामर्शदाता नियुक्त किया हुआ है। हम मांग करना चाहेंगे कि इनके द्वारा दी गई रिपोर्टों पर जो भी काम चल रहा हो उसे तत्काल रोक दिया जाए। कल इनके सुझाए रास्ते पर चलकर कोई गड़बड़ होगी तो ये अपना पल्ला झाड़ लेंगे कि हमारी रिपोर्ट पर विश्वास ना किया जाए।
मुझे सबसे ज्यादा चिंता उन नौजवानों के बारे में है जो ऊंची-ऊंची डिग्रियां हासिल करते हैं और फिर सत्यम या प्राइसवॉटर हाऊस कूपर जैसी कंपनियों में आकर्षक पैकेज की नौकरी पाकर अपने जीवन को धन्य मानते बैठते हैं, जबकि इस तरह की कंपनियां इन युवाओं को बेईमान बना रही हैं, पैसे का गुलाम बना रही हैं और इनके आत्मिक बल को खोखला कर रही हैं। स्वर्णमृग के पीछे भागने से कितने दुख मिलते हैं- यह नए सिरे से याद करने का अवसर है। 

भ्रष्टाचार- 1

मैंने भ्रष्टाचार के विभिन्न पहलुओं एवं घटनाओं पर जो लेख लिखे हैं, उन्हें यहाँ एक के बाद एक प्रस्तुत करने का इरादा है. ये सभी लेख देशबंधु में मेरे नियमित कॉलम के अंतर्गत प्रकाशित हो चुके हैं.


असत्य का पारावार-1


स्वतंत्र भारत में आर्थिक घोटाले का पहला बड़ा प्रसंग 1957-58 में मूंदड़ा प्रकरण के रूप में सामने आया था जब तत्कालीन वित्तमंत्री टी.टी. कृष्णमाचारी को नैतिक आधार पर अपना पद छोड़ना पड़ा था तथा उद्योगपति हरिदास मूंदड़ा को लंबी सजा हुई थी। दिलचस्प तथ्य यह है कि संसद सदस्य फीरोज गांधी ने इस घोटाले को उजागर करने में बड़ी भूमिका निभाई थी। उसी दौर में प्रख्यात उद्योगपति रामकृष्ण डालमिया को भी जेल जाना पड़ा था तथा एक जहाज कंपनी के बहुचर्चित मालिक जयंती धर्मतेजा को भी। 
आज सत्यम घोटाला देखकर ये पुराने प्रकरण सहसा याद आ गए। उस पुराने दौर का यह प्रसंग भी याद आता है कि रेलमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने ट्रेन दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते हुए पदत्याग कर दिया था। यदि इतिहास के किसी दौर का कोई प्रसंग वर्तमान को समझने में सहायक हो सके तो हमें एक कालखण्ड का स्मरण और कर लेना चाहिए। यह दौर 1991 के आसपास प्रारंभ हुआ था। इसी दौरान हर्षद मेहता का शेयर घोटाला सामने आया था। शेयर मार्केट में भारी अफरा-तफरी मच गई थी। इस कांड ने कितने ही लोगों को अपनी साख खत्म होते देख आत्महत्या तक करने को मजबूर कर दिया था। 
यह पी.वी. नरसिम्हराव का समय था तथा उनके परिजनों पर भी एकाधिक घोटालों में शामिल होने के आरोप लगे थे। हर्षद मेहता कांड के दौरान तत्कालीन वित्तमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की एक उक्ति ने जनमानस को उद्वेलित कर दिया था। डॉ. सिंह ने कहा था कि शेयर मार्केट के उतार-चढ़ाव के लिए वे अपनी रात की नींद बर्बाद नहीं कर सकते। आज जो परिदृश्य हमारे सामने है उसे चाहे तो एक नया दौर मान सकते हैं, लेकिन इसे 1991 में प्रारंभ हुए दौर का तार्किक विस्तार भी माना जा सकता है। जिन दो कालखण्डों का हमने ऊपर जिक्र किया उनमें एक बड़ा फर्क देखा जा सकता है। सन् 50 और 60 के दशक में भी अपने समय के हिसाब से वैभव- विलास कम नहीं था, लेकिन उस दौर के धनपति आडंबर और दिखावे से किसी हद तक बचने की कोशिश करते थे, कभी-कभार वे ग्लानि का बोध भी करते थे, और राजनेताओं का जहां तक सवाल है उनमें अधिकतर की छवि पूरी तरह से उावल न सही, उन पर ''दाग अच्छे हैं'' वाला विज्ञापनी जुमला लागू नहीं होता था। इन दोनों के बीच बोफोर्स कांड भी सामने आया था। 

उसका सच-झूठ शायद कभी उजागर नहीं हो पाएगा, लेकिन यह तो हमारे सामने है कि राजीव गांधी को इसकी कीमत प्रधानमंत्री पद गंवा कर ही चुकानी पडी थी। आज की बात करें तो जनता का विश्वास किसी पर भी नहीं है। यह आम धारणा बन चुकी है कि इस देश का शासन-प्रशासन सिर्फ उनके लिए है जो तथाकथित रूप से बडे लोग माने जाते हैं। इसका प्रतिबिंब पिछले दस-पंद्रह साल में बनी बंबईया फिल्मों में बखूबी देखा जा सकता है। यदि हम पुरानी फिल्मों को देखें तो वहाँ हमारा नायक अकसर एक साफ-सुथरे चरित्र का सरल हृदय व्यक्ति होता था। इस छवि में बदलाव संभवत: ''नमकहराम'' फिल्म के साथ आना शुरु हुआ जहां पहली बार राजेश खन्ना की छवि अमिताभ बच्चन के सामने फीकी पड़ गई। इसके बाद तेजी के साथ भारतीय फिल्मों में प्रतिनायक अथवा एंटी हीरो की स्थापना होनी शुरु हुई जो ''सरकार'' जैसी फिल्मों तक लगातार चली आई है। इस बीच में ''हम आपके हैं कौन'' शैली की फिल्में भी आईं हैं जो निजी सुख भोग को सर्वोपरि सिध्द करती हैं और जहां वृहत्तर समाज के सुख-दु:ख हाशिए से भी बाहर कर दिए जाते हैं। 

यह उस बदलते भारत की तस्वीर है जिसे विलास की संस्कृति में अथवा ''कारपोरेट कल्चर'' में बुरी तरह से अपनी जकड़ में ले लिया है। यहां धन अर्जित करना प्रथम और अंतिम उद्देश्य है। इसमें साधन की पवित्रता पर कोई विचार नहीं है। इस अर्जित धन का अश्लील प्रदर्शन करने में कोई संकोच नहीं है। इसे विलासिता में व्यय करने में कोई ग्लानि नहीं है। एक समय बंबई के एक डॉक्टर दंपत्ति ने संजीवनी नामक संस्था बनाई थी। वे पार्टियों का बचा खाना मांग-मांग कर लाते थे और उसे गरीब बस्तियों में जाकर भूखे पेट सोने वालों को खिलाते थे। अब ऐसी विगलित दया भी नवधनिक वर्र्ग में नहीं है। कहना न होगा कि सत्यम में जो कुछ हुआ है इस नई संस्कृति की ही देन है। दुर्भाग्य का विषय यह है कि इस प्रकरण का जो वृहत्तर सामाजिक पक्ष है उसके बारे में सोचने के लिए कोई अभी तैयार नहीं है। हम रेखांकित करना चाहेंगे कि सत्यम प्रकरण सिर्फ एक आर्थिक घोटाला नहीं है। उसका नाभि-नाल संबंध उस विकृत सोच से है जिसे मोटे तौर पर हम वैश्वीकरण के नाम पर जानते हैं। 

हमारे लिए यह बिलकुल भी महत्वपूर्ण नहीं है कि सत्यम के मालिक राजू तथा इस षडयंत्र में अन्य भागीदारों को कब और कितनी सजा होती है। यह प्रश्न भी निरर्थक है कि 53 हजार कर्मचारियों का क्या होगा? वे सब पढ़े-लिखे, सॉफ्टवेयर इंजीनियर, एमबीए, एमटेक आदि-आदि हैं। उन्हें नई नौकरी मिलने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। 
कंपनी के शेयरधारकों के बारे में तो कोई चिंता ही नहीं करना चाहिए। शेयर बाजार में पैसा असीमित लालच के वशीभूत हो लगाया जाता है, सो लोगों को अपने लालच का फल भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए। सत्यम को नहीं बचाया गया तो विश्व बाजार में साख गिर जाएगी यह बात भी बेमानी है। एनरॉन और वर्ल्डटेल के डूबने से अमेरिका नहीं डूबा। आज इस घोटाले की पृष्ठभूमि में देश के सामने दो अहम् प्रश्न हैं। एक तो यह कि सरकार अंधाधुंध निजीकरण की वर्तमान नीति पर कायम रहती है या सार्वजनिक क्षेत्र के अनिवार्य महत्व को वापिस स्वीकार करती है। आखिरकार ईसीआईएल, केलट्रॉन, अपट्रॉन जैसी सरकारी कंपनियों से ही भारत में आईटी युग का पदार्पण हुआ था। प्राइस वाटर हाउस कूपर जैसी विदेशी फर्मों का भारत में क्या काम है, इस पर भी पुनर्विचार होना चाहिए। दूसरे, आज भारतीय समाज को इस बिन्दु पर नए सिरे से मंथन करने की जरूरत है कि हम किस दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं? हम जब तक विदेशी ब्रांड, विदेशी कंपनी, आकर्षक पैकेज, लक्जरी कार, लक्जरी अपार्टमेंट और इस तरह की ढेर सारी इच्छाओं से प्रेरित होते रहेंगे तब तक सत्यम जैसे प्रकरण भी नित्य घटित होते रहेंगे। आज सत्यम का असत्य उजागर हो चुका है लेकिन झूठ और धोखाधड़ी का पारावार सतह के नीचे लहरा रहा है- इसे भूलने से काम नहीं चलेगा।

 2 फ़रवरी 2009 को प्रकाशित 

Friday, 20 April 2012

उसमें प्राण जगाओ साथी- 19

संपादक सम्मेलन में सक्रियता
मायाराम सुरजन अपने पत्रकार जीवन की शुरूआती दौर से ही पत्रकारिता से संबंधित संगठनों में दिलचस्पी लेने लगे थे। इंडियन एंड ईस्टर्न न्यूजपेपर्स सोसायटी (आईईएनएस, आजकल आईएनएस) भारतीय भाषायी समाचार पत्र संगठन, (इलना) व अखिल भारतीय समाचार पत्र संपादक सम्मेलन (एआईएनईसी) की बैठकों व सम्मेलनों में वे नवभारत के प्रतिनिधि के रूप में अक्सर शामिल हुआ करते थे। उन दिनों याने 1945-55 के बीच आयोजित ऐसी बैठकों में वे संभवत: सबसे कम उम्र के प्रतिनिधि हुआ करते थे। इस नाते उन्हें जहां अपने अनुभव और ज्ञान को विकसित करने के अवसर मिले वहीं वे अनेक वरिष्ठ संपादकों या संचालक संपादकों का स्नेहपात्र भी सहज ही बन सके। इन कार्यक्रमों के दौरान ही देवदास गांधी, रामनाथ गोयनका, दुर्गादास जैसे प्रतिष्ठित पत्रकारों के साथ उनके संबंध बने।

इन तीन संगठनों के अलावा जब 1962-63 में प्रेस इंस्टीटयूट ऑफ इंडिया की स्थापना हुई तो बाबूजी उसके साथ भी जुड़े। यद्यपि उस समय ऐसी कुछ आपाधापी थी कि वे इस संस्था में सक्रिय नहीं हो सके। आगे चलकर प्रेस इंस्टीटयूट में प्रशिक्षण पाने के लिए उन्होंने मुझे देशबन्धु की ओर से तीन-चार बार भेजा। बहरहाल इन संस्थाओं के बीच जिस एक संस्था से उनका जीवनभर जुड़ाव रहा वह संपादक सम्मेलन याने एआईएनईसी ही थी। इसके लगभग हर कार्यक्रम में वे शामिल होते थे। ऐसा शायद ही कोई वार्षिक अधिवेशन हो जिसमें उन्होंने शिरकत न की हो। अनेक वर्षों तक वे सम्मेलन की कार्यकारिणी में भी विभिन्न जिम्मदारियां निभाते रहे। दो प्रसंगों का उल्लेख यहां अवश्य करना होगा। एक सम्मेलन का पचमढ़ी अधिवेशन व दूसरा लघु व मध्यम समाचार पत्रों की दशा पर तैयार की गई रिपोर्ट। यह नि:संकोच कहा जा सकता है कि इन दोनों से सम्मेलन की गरिमा व प्रतिष्ठा बढ़ी।

1966 के अप्रैल माह में पचमढ़ी में अखिल भारतीय समाचार पत्र संपादक सम्मेलन का अधिवेशन आयोजित हुआ। तत्कालीन केन्द्रीय सूचना मंत्री राजबहादुर इसमें मुख्य अतिथि के रूप में आए। मुख्य मंत्री पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र उद्धाटनकर्ता के तौर पर उपस्थित थे। बाबूजी इस अधिवेशन के स्वागताध्यक्ष थे। मेरी एम.ए. अंतिम की परीक्षा कुछ दिन पहले ही समाप्त हुई थी और एक जिज्ञासु युवा पत्रकार के बतौर मुझे इस अधिवेशन में भाग लेने का सुयोग मिला था। 1958 में आयोजित हिन्दी साहित्य सम्मेलन के भोपाल अधिवेशन के ही समतुल्य यह अधिवेशन भी बाबूजी के जीवन का गौरवपूर्ण क्षण था। सारे देश से हिन्दी, अंग्रेजी तथा अनेक भारतीय भाषाओं के पत्रकार पचमढ़ी में जुटे थे। अक्षय कुमार जैन, कुलदीप नैय्यर, इंद्रजीत, कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरी, डोरीलाल अग्रवाल, सतीशचंद्र काकती, बालेश्वर अग्रवाल जैसे कुछ नाम ही अभी याद आ रहे हैं। तीन दिन का सम्मेलन चला। उसके बाद राज्य सरकार के सौजन्य से अतिथि संपादकों के भेड़ाघाट भ्रमण आदि का कार्यक्रम भी बना। एक सप्ताह तक खूब गहमागहमी रही। प्रतिनिधियों का ऐसा स्वागत सत्कार न इसके पहले कहीं हुआ और न बाद में। मेरी मित्रता अपने से उम्र में कुछ बड़े एक युवक के साथ इसी सम्मेलन में हुई। जनसंपर्क विभाग में कुछ ही दिन पहले नियुक्त यह नवयुवा अधिकारी चकरघिन्नी की तरह घूम-घूम कर काम कर रहा था और मिनिट-मिनिट पर उसे कोई पुकार लेता था- रज्जू ये करो, रज्जू वो करो। ये रज्जू और कोई नहीं, हमारे सुपरिचित डॉ. सुशील त्रिवेदी हैं जो आगे चलकर छत्तीसगढ़ के राज्य निर्वाचन अधिकारी बने। थोड़ा विषयांतर हो गया लेकिन इस प्रसंग का उल्लेख करने का यह उचित मौका जान पड़ा।

यह स्वाभाविक था कि सम्मेलन के साथियों के बीच बाबूजी की धाक इससे और मजबूत हुई। कुछ सालों के बाद बाबूजी के प्रस्ताव पर ही लघु व मध्यम समाचार पत्रों की स्थिति का अध्ययन करने के लिए एक उपसमिति गठित की गई तथा प्रस्तावक को ही उसका संयोजक बना दिया गया।  मुझे स्मरण आता है कि इस समिति के काम को अंजाम देने के लिए बाबूजी ने एक साल से भी ज्यादा समय दिया। यह वह समय था जब भाषायी समाचार पत्र भीषण संकट से गुजर रहे थे। बाबूजी ने एक वृहत प्रश्नावली तैयार की। उसे देश के तमाम समाचार पत्रों को भेजा। बारम्बार संपर्क कर प्रश्नावली को भरवाया। सरकारी-गैरसरकारी सूत्रों से अन्य आवश्यक आंकड़े जुटाए। दो-तीन बार उपसमिति की बैठकें हुईं। कड़ी मशक्कत के बाद रिपोर्ट तैयार होकर छपी और 1972 में जालंधर अधिवेशन में मुख्य अतिथि इंद्रकुमार गुजराल को सौंपी गई। इस अधिवेशन में अपने मित्र श्री गुजराल से बाबूजी की कुछ तकरार भी हुई। गुजराल जी का कहना था कि संपादक सम्मेलन में पत्र के व्यवस्था संबंधी प्रश्नों को क्यों उठाया जा रहा है। जबकि बाबूजी का उत्तर था कि जिन लघु व मध्यम समाचार पत्रों की समस्या पर यह रिपोर्ट केन्द्रित है उनमें पत्र के संचालन व संपादक के बीच कोई फर्क नहीं है। बहरहाल इस रिपोर्ट में जो सिफारिशें की गई थीं उनमें से अनेक पर आगे चलकर केन्द्र सरकार ने अनुकूल कार्रवाई की तथा समाचार पत्र उद्योग में, कम से कम उस समय, एकाधिकारवाद पनपने से बचा लिया।

ऐसे सक्रिय व्यक्ति को सम्मेलन का अध्यक्ष बनाया जाए, यह इच्छा बाबूजी के अनेक साथियों की थी। लेकिन इस बीच किसी पुरानी चोट के कारण रीढ़ की हड्डी में टी.बी. हो जाने के कारण बाबूजी को कई माह बिस्तर पर रहना पड़ा। उन्होंने अपने स्थान पर वरिष्ठ पत्रकार प्रेम भाटिया का नाम सामने किया। लेकिन कांग्रेसी राजनीति की दखलंदाजी के चलते भाटिया जी चुनाव नहीं जीत पाए। कांग्रेस नेता विश्वबंधु गुप्ता उस समय जो अध्यक्ष बने तो पच्चीस साल से बने ही हुए हैं।    

उसमें प्राण जगाओ साथी- 18

''हमारे राजनैतिक संवाददाता''
मायाराम सुरजन के विपुल लेखन का पुस्तक रूप में पहला संकलन ''मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश के'' माध्यम से सामने आया। इसलिए हमारी स्वाभाविक इच्छा थी कि इस पुस्तक का लोकार्पण जरा धूमधाम से हो। यूं तो कार्यक्रम रायपुर अथवा भोपाल में भी किया जा सकता था लेकिन हमारे संपादक मंडल की इच्छा दिल्ली में कार्यक्रम करने की थी। उपराष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा मना कर चुके थे। केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री अर्जुनसिंह से हमने संपर्क किया तथा उनके सुझाव पर लोकसभा अध्यक्ष शिवराज पाटिल को मुख्य अतिथि की हैसियत से आमंत्रित किया गया। लेखक और पुस्तक दोनों का परिचय देने के लिए डॉ. नामवर सिंह से संपर्क किया, उन्होंने भी अपनी सहमति दे दी। अर्जुनसिंह कार्यक्रम की अध्यक्षता करेंगे यह बात भी तय हो गई।
12 दिसम्बर 1992 को नई दिल्ली के आईफैक्स सभागार में कार्यक्रम रखा गया। मप्र से जुड़े अनेक राजनेता, अधिकारी, पत्रकार व साहित्यकार कार्यक्रम में आए। दिल्ली में बाबूजी के मित्र मंडली के बहुत सारे साथी भी जुटे तथा साहित्य व पत्रकारिता के अनेक नामचीन व्यक्ति भी। बाबूजी जैसे निस्संग व्यक्ति ने इस पूरे कार्यक्रम को सहज भाव से लिया, लेकिन इस अवसर पर में काफी रोमांचित था। मुख्य अतिथि शिवराज पाटिल ने पुस्तक पढ़ ली थी तथा उन्होंने बहुत सुन्दर तरीके से पुस्तक पर अपने विचार व्यक्त किए। अर्जुन सिंह तो कम शब्दों में ही ज्यादा बात कर जाते हैं, लेकिन नामवर जी ने निराश किया। उन्होंने शुरुआत ही इस बात से की कि मायाराम जी की पुस्तक मुझे मिल तो गई थी, लेकिन इसे मैं पढ़ नहीं पाया हूं। इसके बाद वे शब्दाडम्बर रचते रहे। उनसे ऐसे हल्के व्यवहार की उम्मीद नहीं थी।
जब नामवर जी की बात निकली है तो बाबूजी के साथ जुड़े एक और प्रसंग का उल्लेख कर देना उचित  होगा। अभी डेढ़-दो साल पहले किसी पत्रिका को दिए साक्षात्कार में नामवर सिंह ने बाबूजी पर सीधे-सीधे आरोप लगाया कि वे राजा राममोहन राय लायब्रेरी के अध्यक्ष बनना चाहते थे, इसलिए अर्जुनसिंह के कान भर कर नामवर जी को उस पद से हटवा दिया। यह वक्तव्य न सिर्फ असत्य है वरन् एक स्वर्गीय मित्र की स्मृति का अपमान भी है। दरअसल नामवरजी के कार्य से मंत्री जी संतुष्ट नहीं थे, उन्हें शिकायतें मिल रही थीं। नामवरजी को सीधे कुछ कहने के बजाय अर्जुन सिंह ने बाबूजी को माध्यम बनाया कि आप नामवर जी को इस्तीफा देने के लिए राजी कर लें वरना सरकार को उन्हें हटाने अपनी कार्रवाई करनी पड़ेगी। यानी अर्जुनसिंह नामवरजी की प्रतिष्ठा पर आंच नहीं आने देना चाहते थे। बाबूजी ने यह संदेशा यथास्थान पहुंचा दिया। वे जो दैनंदिन डायरी लिखा करते थे उसमें इस प्रसंग का उल्लेख है। इन दोनों प्रसंगों से मुझे धनंजय बैरागी के बंगला उपन्यास का शीर्षक याद आता है- ''नमक का पुतला सागर में''। इस प्रसंग को यहीं छोड़ बाबूजी के लेखन के एक और पक्ष पर आगे बात करें।
जैसा कि हम देख आए हैं मप्र की राजनीति की जैसी समझ  बाबूजी को थी वैसी उनके समकालीन किसी भी पत्रकार को नहीं थी। उनके संपर्कों का दायरा विशाल था तथा वे रायपुर, भोपाल, जबलपुर जहां भी हों, राजनेताओं के साथ उनकी भेंट मुलाकातों का सिलसिला लगातार चलता रहता था। आम चुनाव के पहले गहमागहमी कुछ और बढ़ जाती थी। कांग्रेस के टिकटार्थी यह आशा लेकर उनके पास आते थे कि वे अपने संपर्कों का उपयोग कर उन्हें टिकट दिलवा सकेंगे। बाबूजी ने इसमें कभी खास दिलचस्पी नहीं ली लेकिन एक काम वे अवश्य करते थे। इन भेंट मुलाकातों से उन्हें चुनाव पूर्व की स्थिति का काफी कुछ सही अनुमान हो जाता था। इसके आधार पर वे टिकट वितरण के पहले दस-पन्द्रह लेखों की एक श्रृंखला ''हमारे राजनीतिक संवाददाता'' अथवा ''विशेष संवाददाता'' के नाम से लिखा करते थे। इसमें वे मप्र की तीन सौ बीस (पहले 294) विधानसभा सीटों का विश्लेषण कर बतलाते थे कि कांग्रेस का कौन सा उम्मीदवार जीतने की स्थिति में है। वे हर सीट के लिए अपनी ओर से दो या तीन नामों का प्रस्ताव करते थे और हमने देखा कि कांग्रेस की चयन समिति अधिकांशत: इन्हीं नामोें में से उम्मीदवार चुनती थी। यह पंचवर्षीय आकलन वे उस समय तक करते रहते जब तक कांग्रेस पार्टी में ऊपर से उम्मीदवार थोपने की प्रथा शुरू नहीं हो गई। जब उन्हें लगा कि पार्टी में आंतरिक जनतंत्र कमजोर हो गया है तब उन्होंने अपनी राय देना बंद कर दिया।
अपने गांधी-नेहरूवादी संस्कारों के कारण कांग्रेस पार्टी का यह क्षरण उन्हें व्यथित करता था तथा अपने कई लेखों में उन्होंने इस अवांछित परिपाटी के खिलाफ लिखा है। 1971 में जब श्यामाचरण शुक्ल को हटाकर प्रकाशचंद्र सेठी को मुख्यमंत्री बनाया गया तब भी बाबूजी ने उसके विरूध्द लिखा। उनका साफ कहना था कि मुख्यमंत्री के चयन का अधिकार विधायक दल को ही होना चाहिए तथा ऊपर की मर्जी इस तरह लादे जाने से आगे चलकर पार्टी को नुकसान होगा। वे एक गंभीर समाजचिंतक के रूप में दीवार पर लिखी इबारत को पढ़ पा रहे थे लेकिन इसकी कांग्रेस को जरूरत नहीं थी।
1972 के विधानसभा चुनावों में एक और रोचक प्रसंग घटित हुआ। इस साल कांग्रेस और सीपीआई के बीच चुनावी समझौता हुआ तथा साम्यवादी दल के लिए कांग्रेस ने पांच सीटें छोड़ दी। इसमें रायपुर की सीट भी शामिल थी। यहां से सीपीआई के उम्मीदवार लोकप्रिय जननेता सुधीर दादा याने सुधीर मुखर्जी पार्टी के चुनाव चिन्ह के बजाय निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में शेर छाप चुनाव चिन्ह पर खड़े हुए। देशबन्धु के संपादक मंडल ने उन्हेें अपना खुला समर्थन देना तय किया। यद्यपि बाबूजी उस समय रायपुर से बाहर थे और हमने उनसे राय नहीं कर सके। जब बाबूजी लौटकर आए तो मैदानी स्थिति का जायजा लेने के बाद उन्हें ऐसा लगा कि देशबन्धु का समर्थन तभी सफल हो पाएगा जब चुनाव संचालन व्यवस्थित तरीके से हो। यह जिम्मेदारी उन्होंने अपने ऊपर ली व रायपुर में पूरे समय बैठकर चुनाव संचालन किया। यह पहला और आखिरी अवसर था जब किसी उम्मीदवार के लिए उन्हें अपना काम-धाम छोड़कर इस तरह मैदान में उतरना पड़ा हो।

उसमें प्राण जगाओ साथी- 17


 'मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश के' 

देशबन्धु में स्तंभ लेखन की सुदीर्घ परंपरा है। परसाई जी के 'सुनो भाई साधो' व 'पूछिए परसाई से' जैसे नियमित स्तंभों ने अपार लोकप्रियता हासिल की। जबलपुर संस्करण में मूलत: प्रकाशित स्वाधीनता सेनानी महेशदत्त मिश्र का ''ंखत जिनमें खुशबू फूलों की'' एवं अध्यापक चिंतक हनुमान प्रसाद वर्मा का ''टिटबिट की डायरी'' आदि स्तंभों को भी पाठकों से भरपूर सराहना मिली। सतना संस्करण प्रारंभ हुआ तो वरिष्ठ राजनेता जगदीश जोशी, संस्कृति कर्मी प्रो. कमलाप्रसाद व लेखक देवीशरण ग्रामीण इत्यादि के नियमित कॉलम छपना प्रारंभ हो गए। यही नहीं, पत्र के रविवासरीय संस्करण के माध्यम से स्थानीय प्रतिभाओं को सामने लाने का काम देशबन्धु ने किया। ऐसे अनेक सुख्यात रचनाकार हैं जो ''बाबूजी'' को अपनी पहिली रचना छापने का  उल्लेख करने के साथ स्मरण करते हैं। मध्यप्रदेश के किसी अन्य संपादक का ऐसा जीवंत संपर्क साहित्यिक बिरादरी के साथ नहीं रहा। राजेन्द्र अवस्थी, मलय, सोमदत्त, पुरुषोत्तम खरे, मोहन शशि इत्यादि लेखकों के बीच के कुछ ऐसे नाम हैं, जिन्होंने मायाराम सुरजन से पत्रकारिता के पाठ सीखे। इस पृष्ठभूमि को देखते हुए पाठकों एवं सहकर्मियों की यह अपेक्षा स्वाभाविक ही थी कि स्वयं बाबूजी विशेष अवसरों पर नहीं, बल्कि नियमित रूप से लेखन करें।
हम सबकी यह इच्छा 1983 में जाकर पूरी हो सकी जब ''दरअसल'' का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। समसामयिक प्रश्नों पर केंद्रित इन लेखों में विषय की जो विविधता है वह विस्मित करने वाली है। उनके लिए कोई विषय असाध्य नहीं था। जितनी सहजता से वे स्थानीय और गैर महत्वूपर्ण समझे जाने वाले मुद्दों की टीका करने में सक्षम थे, उतनी ही सहजता से उनकी लेखनी राष्ट्रीय व वैश्विक घटनाचक्र की व्याख्या करने में भी समर्थ थी। बाबूजी के लेखन की सबसे बड़ी खूबी भाषा की सादगी और सहज संप्रेषणीयता थी, यद्यपि समय-समय पर शैलीगत प्रयोग करने में भी उन्होंने संकोच नहीं किया। स्थानीय मुद्दे पर स्तंभ लेखन का एक उदाहरण हमें रायपुर के छात्रनेता अंजय शुक्ल से संबंधित किसी प्रसंग पर की गई टिप्पणी से मिलता है। सामान्य तौर पर कोई वरिष्ठ पत्रकार ऐसे विषय की अनदेखी ही करता, लेकिन बाबूजी ने इसे युवा पीढ़ी से संवाद स्थापित करने के एक उचित अवसर के रूप में लिया। उन्होंने ऐसा महसूस किया कि अगर युवा पीढी में दिशाहीनता और उच्छृंखलता आ रही है तो उस पर न तो मूकदर्शक बनकर रहा जा सकता है और न ही एकतरफा फैसला ही दिया जा सकता है। यहां मायाराम सुरजन एक पत्रकार के रूप में नहीं बल्कि एक बार फिर शिक्षक और अभिभावक की भूमिका में सामने आते हैं। एक और अन्य प्रसंग का जिक्र मैं करना चाहूंगा जो बिल्कुल अलग किस्म का था। रायपुर के व्यापारी नेता लूनकरण पारख ने अपना नाम परिवर्तित कर लूनकरणसिंग पारख कर लिया। इसकी सूचना अखबारों में प्रकाशित हुई। यूं तो यह एक चर्चित व्यक्ति से जुड़ी छोटी सी खबर थी, लेकिन इसके राजनीतिक निहितार्थ क्या थे इसे बाबूजी ने ही समझा और शेक्सपियर के अंदाज में ''नाम में क्या रखा है'' की व्याख्या कर दी।
एक समय रायपुर में एक गंभीर स्थिति उत्पन्न हो गई। बंजारी बाबा के नाम से प्रसिध्द औघड फ़कीर के निधन के बाद उन्हें कहां दफनाया जाए उसे लेकर तनाव का वातावरण बन गया। जिले के स्वच्छ छवि वाले तेजतर्रार युवा कलेक्टर नजीब जंग पर धार्मिक पूर्वाग्रह से प्रेरित आरोप लगाए जाने लगे। उस कठिन समय में बाबूजी ने अपनी कलम उठाई और ''सबको सन्मति दे भगवान'' के नाम से दस दैनिक लेखों की एक श्रृंखला लिख डाली। इसका रायपुर के सार्वजनिक वातावरण पर अपेक्षित प्रभाव पड़ा तथा सौहार्द्र भाव टूटने से बच गया। उपरोक्त तीनों प्रसंग स्थानीय हैं लेकिन विषय अलग-अलग हैं। इनके अवलोकन से बाबूजी की विश्लेषण क्षमता और संपादकीय विवेक का अनुमान लगाया जा सकता है। दूसरी तरफ व्यापक मुद्दों पर भी वे लगातार लिखते रहे। अमेरिका का राष्ट्रपति चुनाव हो या कोरिया प्रायद्वीप में विमान गिराने की घटना या फिर संघ परिवार की एकात्मता यात्रा- बाबूजी की पैनी दृष्टि से कुछ भी बचता नहीं था। ''दरअसल'' के प्रकाशन से जुड़े हुए एक तथ्य का उल्लेख करना प्रासंगिक होगा। अपने लिखे पर असहमति को बाबूजी भरपूर सम्मान देते थे। छत्तीसगढ़ के बागबाहरा निवासी पुरुषोत्तमलाल व्यास उनके लेखों पर लंबी-लंबी प्रतिक्रियाएं भेजते थे। आवश्यक समझा तो बाबूजी ऐसे पत्र को अपने कॉलम में उद्धृत कर देते थे और नहीं तो व्यासजी को पत्र का जवाब अवश्य लिखकर भेजते थे। ऐसे सुधी पाठकों से संवाद बनाए रखना पत्रकारिता के बुनियादी मूल्यों के अनुकूल ही था।
''दरअसल'' के समानांतर एक और नियमित कॉलम लिखना बाबूजी ने 1985 में प्रारंभ किया। भोपाल से हमने ''साप्ताहिक देशबन्धु'' शीर्षक से एक पत्र इस वर्ष प्रारंभ किया। इसे लोकप्रिय बनाने के लिए बाबूजी अगर नियमित कॉलम लिख सकें तो बहुत अच्छा होगा, यह विचार मन में आया। यह संभवत: साप्ताहिक देशबन्धु के संपादक गिरिजाशंकर का ही सुझाव था कि बाबूजी के निकट संपर्क प्रदेश के मुख्यमंत्रियों के साथ रहे हैं तो उन पर संस्मरण लिखने  का लाभ पत्र को मिलेगा। बाबूजी कॉलम लिखने राजी हो गए तथा इस तरह से ''मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश के'' लेखमाला की शुरुआत हुई। नए और पुराने मध्यप्रदेश के हर मुख्यमंत्री के साथ बाबूजी का संपर्क रहा। 1939 से 94 तक विदर्भ, मध्यप्रदेश, विंध्यप्रदेश, मध्यभारत और भोपाल रियासत इन सबको मिलाकर पन्द्रह या सोलह मुख्यमंत्री हुए। इनमें से अंतिम याने दिग्विजय सिंह को छोड़कर बाबूजी ने बाकी सब पर लिखा। श्री सिंह के कार्यकाल का आकलन करने के लिए उन्हें पर्याप्त समय नहीं मिल पाया। पत्रकारिता के इतिहास की दृष्टि से यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि मायाराम सुरजन प्रदेश के अकेले पत्रकार थे, जिन्होंने डॉ. एन.बी. खरे से लेकर सुन्दरलाल पटवा और दिग्विजय सिंह तक के कार्यकाल का अध्ययन और विश्लेषण किया। इस नाते ''मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश के'' (जो बाद में पुस्तकाकार भी प्रकाशित हुई) के लेख इस प्रदेश की राजनीति का अध्ययन करने के लिए अनिवार्य संदर्भ सामग्री बन चुके हैं।
इन लेखों में बाबूजी ने संस्मरण शैली का प्रयोग किया है। जिसके बारे में वे लिख रहे हैं उससे व्यक्तिगत भेटों के चित्र उन्होंने उकेरे हैं तथा समय विशेष की उल्लेखनीय घटनाओं को एक वृहत्तर पृष्ठभूमि में देखने की कोशिश उन्होंने की है। अपनी रचना के इन जीवंत पात्रों में से कुछ के साथ बाबूजी के संबंध कुछ ज्यादा निकटता के रहे तो कुछ के साथ काम चलाऊ। किंतु अपने अध्ययन में उन्होंने तटस्थता का ही परिचय दिया है। जब इन लेखों की पुस्तक तैयार हुई तब बाबूजी अपने पुराने मित्र डॉ. शंकरदयाल शर्मा से उसका लोकार्पण करवाना चाहते थे जो उस समय उपराष्ट्रपति थे। शर्मा जी ने पुस्तक देखी, अपने ऊपर लिखा अध्याय पढ़ा; अपने बारे में लिखी कुछ बातें उन्हें प्रतिकूल लगी, उन्हें हटाने का मंतव्य प्रगट किया, लेकिन बाबूजी इस पर राजी नहीं हुए तो उन्होंने लोकार्पण करने से असमर्थता प्रगट कर दी।