Wednesday, 17 October 2012

खुर्शीद, खेमका, वाड्रा, मीडिया




मेरे एक मित्र का कहना है कि उन्होंने अब टीवी पर समाचार देखना बंद कर दिया है। वे कहते हैं कि तुम पत्रकार हो, समाचार सुनना तुम्हारी मजबूरी हो सकती है लेकिन मैं क्यों अपना समय और दिमाग व्यर्थ की बातों में बर्बाद करूं।  एक और मित्र झल्लाकर कहते हैं कि वे फिज़ूल की बहसों से ऊबकर अब सन्यास ले लेना चाहते हैं। सचमुच, सुबह-शाम अखबार देखो या टीवी पर समाचार सुनो, ऐसा लगता है मानो भ्रष्टाचार के सिवाय अब इस देश में कोई और मुद्दा बचा ही नहीं है। गोया हमने अपनी बाकी तमाम समस्याओं के समाधान खोज निकाले हैं! यह सच है और उचित भी कि सार्वजनिक जीवन में  शुचिता एक  जरूरी और महत्वपूर्ण मुद्दा है, लेकिन बाकी तमाम जरूरी सवालात की अनदेखी करने में कौन सी समझदारी है? जो लोग सिर्फ इसी एक काम में जुटे हुए हैं, उनका मकसद आखिरकार क्या है? वे देश को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं?  और क्या वे सचमुच नहीं जानते कि एक संकीर्ण बिंदु पर चलाये जा रहे आन्दोलन से क्या नफा-नुकसान हो सकता है? इस परिदृश्य में मीडिया की क्या भूमिका है, इस पर भी गौर किये जाने की आवश्यकता है।

सलमान खुर्शीद का मामला ही लें। मेरा मानना है कि देश के कानून मंत्री जैसे बड़े व महत्वपूर्ण  पद पर रहते हुए उन्हें सार्वजनिक जीवन में अन्य कोई  जिम्मेदारी  लेने से बचना चाहिए था। क्या जरूरी था कि वे जाकिर साहब के नाम पर बने ट्रस्ट के अध्यक्ष बनते? इस जगह पर वे अपने किसी विश्वस्त को बैठा सकते थे। लेकिन इस मोहग्रस्तता के वे अकेले उदाहरण नहीं हैं। सोमनाथ चटर्जी लोकसभा अध्यक्ष रहते हुए शान्ति निकेतन-श्रीनिकेतन विकास न्यास के अध्यक्ष बने रहे और प्रणब मुखर्जी ने सरकार में तारनहार मंत्री रहते हुए भी कितने ही छोटे-मोटे अन्य दायित्व किसी अन्य को नहीं सौंपे। इसी तरह अनेक अन्य मंत्री- मुख्यमंत्री क्रिकेट संघ और ओलिंपिक संघ आदि की अध्यक्षता का मोह नहीं छोड़ पाते। आश्चर्य है कि इसका जो नैतिक पहलू है उस पर किसी सुधारक ने आज तक एक शब्द नहीं कहा। बहरहाल, यह तो मानना होगा कि अपनी भाषा व भावों पर संयम न रख पाने के बावजूद श्री खुर्शीद ने विदेश यात्रा से लौटने के कुछ ही घंटों के बाद पत्रवार्ता कर न सिर्फ अपना पक्ष रखा, बल्कि स्वयं होकर जांच करने की मांग भी रख दी। उन्होंने तो एक मीडिया समूह के खिलाफ केस भी दाखिल कर दिया है। इसके बाद क्या अब हमें कानूनी प्रक्रिया के जरिए सच्चाई सामने आने की प्रतीक्षा नहीं करना चाहिए? 

अनेक टीकाकार कानूनी प्रक्रिया की प्रभावशीलता को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। वे तर्क देते हैं कि कानून के रास्ते चलें तो सच्चाई सामने आने में दस-बीस साल लग सकते हैं और इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि दोषी को अंतत: सजा मिल पाएगी या नहीं। यह तर्क अपनी जगह पर सही है, लेकिन अगर कोई अपराध हुआ है या अपराध का आरोप है तो आखिरकार उसकी जांच कानून के दायरे के भीतर ही हो सकती है। जनता की अदालत में फैसला करने की बात अक्सर आकर्षित करती है, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि ऐसा करने में तथ्यों की अनदेखी कर भावावेश के चलते गलत फैसले लिए जा सकते हैं। आश्चर्य तब होता है जब टीवी चर्चाओं में बैठने वाले कानून के बड़े-बड़े जानकार भी निर्धारित प्रक्रिया के बजाय जनभावना के अनुरूप आनन-फानन में फैसला सुना देना चाहते हैं। क्या ऐसा करने के पीछे उनका अपना कोई गोपन एजेंडा है?

इधर हरियाणा के अधिकारी अशोक खेमका के तबादले ने एक बार फिर कांग्रेस विरोधियों की तोपों का मुंह सलमान खुर्शीद से हटाकर राबर्ट वाड्रा की ओर कर दिया है। वाड्रा से हमारी कोई सहानुभूति नहीं है। उनके बारे में अपनी राय मैं 11 अक्टूबर के कॉलम 'रॉबर्ट वाड्रा का तो बहाना है' में व्यक्त कर चुका हूं, किंतु श्री खेमका के तबादले की सच्चाई क्या है? वे एक चैनल पर प्रदेश सरकार के फैसले की तारीफ कर रहे थे तो दूसरे पर अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंतित नजर आ रहे थे, तीसरे चैनल पर उनके वकील उन्हें मिली हत्या की धमकी का मुद्दा उठा रहे थे, तो चौथे चैनल पर वे रोने-रोने को हो गए थे। सारे चैनल उनकी बहादुरी की तारीफ कर रहे थे। उन्हें आश्वस्त कर रहे थे कि देश उनके साथ है परन्तु किसी ने भी यह नहीं कहा कि श्री खेमका को तत्काल कडी सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए और टेलीफोन पर मिल रही धमकियों की अविलंब जांच की जाए।

श्री खेमका के मुताबिक बीस साल में उनके चालीस बार तबादले हो चुके हैं। इसका अर्थ यह है कि सरकार चाहे कांग्रेस की रही हो या गैर-कांग्रेसी, उनकी पटरी अपने आला-अफसरों अथवा मंत्रियों के साथ कभी नहीं बैठी। इतने वर्षों की सेवा के आधार पर वे सचिव पद के अधिकारी हैं, लेकिन उन्हें वर्तमान सरकार ने विशेष जिलाधीश जैसा नया पद सृजित कर उस पर बैठा दिया था। याने वाड्रा प्रकरण के पहले से ही सरकार उनसे नाखुश चली आ रही थी। फिर उन्होंने किसी मामले में फैसला नहीं लिया, इस पर हाईकोर्ट ने उन्हें अवमानना का आरोपी माना, अपनी सफाई में उन्होंने कहा कि उन्हें मंजूर नहीं कि उनके लिए फैसले की अपील कनिष्ठ अधिकारी करें; इस तर्क को उचित मानते हुए हाईकोर्ट ने उनका तबादला करने का आदेश दिया। अब सवाल उठता है कि जब वे तबादले की प्रतीक्षा में थे, तब एक विवादग्रस्त मामले में उन्हें फैसला क्यों लेना चाहिए था। यही नहीं, तबादला आदेश मिल जाने के बाद भी उन्हें एक और नई जांच का आदेश क्यों  देना चाहिए था। क्या यह बेहतर नहीं होता कि हाईकोर्ट के अनुकूल निर्णय के बाद वे हफ्ते दस दिन की छुट्टी पर चले जाते और वे अपनी वरिष्ठता के आधार पर नई पदस्थापना की प्रतीक्षा करते! सब जानते हैं कि सरकार अधिकारियों के तबादले अपनी खुशी-नाखुशी से करती है। उसमें न हरियाणा अपवाद है, न मुख्यमंत्री हुड्डा, न अधिकारी खेमका। इस पृष्ठभूमि में पाठक तय कर सकते हैं कि श्री खेमका ने साहस का परिचय दिया या सुविचारित किंतु अनावश्यक दुस्साहस का।

इस बीच लोकसभा के दो उपचुनाव सम्पन्न हो गए। इन दोनों सीटों पर कांग्रेस की ओर से पुरखों के पुण्य प्रताप पर भरोसा करने वाले उम्मीदवार थे। एक बमुश्किल तमाम जीते और दूसरे बुरी तरह हारे। इसमें उत्तराखंड का मामला कुछ विचित्र है। वहां विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की ले देकर जीत हुई, लेकिन मुख्यमंत्री तय करने की बात हुई तो हरीश रावत की स्वाभाविक प्रबल दावेदारी को दरकिनार कर विजय बहुगुणा को पद सौंप दिया गया। इतने पर भी बात रुक जाती तो गनीमत थी। उनके बेटे को लोकसभा का टिकट देने में कौन सी समझदारी थी? बहुगुणा परिवार ने कांग्रेस की बहुत सेवा की होगी, लेकिन क्या हाईकमान को यह याद नहीं कि विजय और रीता बहुगुणा के पिता हेमवतीनंदन बहुगुणा ने इंदिरा गांधी का साथ छोड़ दिया था! इसी तरह राष्ट्रपति के बेटे अभिजीत मुखर्जी यदि लोकसभा का मोह छोड़ विधानसभा में बने रहते तो मुट्ठी खुलने की नौबत नहीं आती।

इन पंक्तियों के लिखे जाने तक अरविंद केजरीवाल का नया खुलासा सामने नहीं आया है। सुनते हैं कि वह नितिन गडकरी के बारे में होगा। इसके पूर्व श्री केजरीवाल ने दिल्ली में अपना अनशन समाप्त कर फरुर्खाबाद कूच करने का ऐलान कर दिया है। यह समझना मुश्किल हो रहा है कि उनका लक्ष्य अंतत: क्या है। जो भी हो, इस सारे माहौल में मीडिया की जो भूमिका है वह लगातार प्रश्नों के घेरे में आ रही है। कल तक मीडिया अपने आपको संसद के विकल्प के रूप में पेश कर रहा था, अब लगता है कि उसने अपने ऊपर न्यायालय का रोल भी ले लिया है। यह व्यस्त स्वार्थों और पूंजीप्रेरित उद्दण्डता भारतीय जनतंत्र के लिए एक नई चुनौती है, जिस पर आज नहीं तो कल प्रबुध्द समाज को पुनर्विचार करना ही होगा।

देशबंधु में 18 अक्टूबर 2012 को प्रकाशित 

Thursday, 11 October 2012

रॉबर्ट वाड्रा का तो बहाना है



सवाल बहुत सारे हैं व उनका कोई अंत नहीं है। अन्ना हजारे का आंदोलन क्यों टूटा। अरविंद केजरीवाल ने राजनीतिक दल क्यों बनाया। अन्ना और केजरीवाल के बीच संवाद की क्या स्थिति है। केजरीवाल और भाजपा का क्या संबंध है। क्या वे सचमुच भाजपा की बी टीम हैं। जो अफवाह पिछले साल दो साल से हवा में तैर रही थी उसे आज मुद्दा बनाकर सामने रखने का क्या प्रयोजन है। क्या गुजरात और हिमाचल के चुनावों को ध्यान में रखकर आरोप उछाले गए हैं। भाजपा की अपनी क्या स्थिति है। उसके नेता जो बयान दे रहे हैं क्या उनके पीछे गुजरात का चुनावी हिसाब है। राजनेताओं के बीच चल रहे ऐसे आरोप-प्रत्यारोप देश को कहां ले जाकर खड़ा करेंगे। क्या भ्रष्टाचार ही हमारे राष्ट्रीय जीवन का एकमात्र मुद्दा बच गया है। अगर ऐसा है तो सार्वजनिक जीवन में शुचिता कायम करने के नाम पर हाल-हाल में जो आंदोलन हुए वे क्यों असफल हो गए।

कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए केन्द्रीय सत्ता पर काबिज है। स्वाभाविक है कि जनता उससे सुशासन की अपेक्षा करती है और उसके नेताओं से मर्यादापूर्ण आचरण की। अगर इसमें कोई कमी होती है तो जनता में असंतोष तो होगा ही, सरकार के कर्ता-धर्ताओं पर आरोप भी लगेंगे। जब ऐसा हो तो नेताओं से आरोपों के उत्तर देने की अपेक्षा की जाती है। आरोप गलत भी हो सकते हैं, लेकिन उन्हें झेलना ऊंचे पद पर बैठे लोगों के लिए विवशता है। अभी हम नहीं जानते कि सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा पर लगे आरोपों में कोई सच्चाई है या नहीं, लेकिन इस प्रसंग को समझने की एक कोशिश जरूर की जा सकती है।

अब तक जितनी खबरें मिली हैं उनके अनुसार देश में रीयल एस्टेट के सबसे बड़े कारोबारी डीएलएफ ने राबर्ट वाड्रा को संपत्ति अर्जित करने में अनेक तरह से सहायता की, लेकिन यह कॉलम लिखे जाने तक इस बात का कोई सबूत नहीं मिला है कि इसके एवज में वाड्रा ने भी डीएलएफ को कोई फायदा पहुंचाया हो। अगर यह सच है तो डीएलएफ और वाड्रा के आपसी संबंध क्या हैं? यह जानी-मानी बात है कि अपने-अपने स्वार्थों के चलते बहुत से लोग सत्ताधीशों के करीबी लोगों के साथ संबंध विकसित कर लेते हैं। आज नहीं तो कल, जरूरत पड़ने पर ये संबंध काम आएंगे, ऐसी भावना उनके मन में होती है। संभव है कि डीएलएफ ने भी ऐसा ही किया हो। यहां वाड्रा के बुध्दि-विवेक का प्रश्न उठता है। क्या उन्हें ऐसे लोगों से दूरी बनाकर नहीं रखनी चाहिए थी?

इस बारे में हमारी जितनी जानकारी है उसके मुताबिक कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपने बेटे और बेटी दोनों की निजी जिंदगी से एक उचित दूरी बनाकर रखी है। राहुल गांधी को वे अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहती हैं, लेकिन राहुल अपनी माँ के साथ याने 10 जनपथ पर नहीं रहते और उनकी राजनीतिक व निजी गतिविधियां स्वतंत्र रूप से संचालित होती हैं। यही स्थिति प्रियंका गांधी और राबर्ट वाड्रा की भी है। ऐसा अभी तक सुनने में नहीं आया कि सोनिया गांधी ने वाड्रा को कोई राजनैतिक या गैर-राजनीतिक दायित्व सौंपा हो। याने पारिवारिक रिश्ते अपनी जगह पर और सार्वजनिक जीवन अपनी जगह पर। 

इस साल फीरोज गांधी की जन्मशती है। कुछेक टीकाकार फीरोज गांधी और राबर्ट वाड्रा के बीच तुलना करने का लोभ संवरण नहीं कर सके। वे याद दिलाते हैं कि हरिदास मूंधड़ा कांड उजागर करने में फीरोज गांधी ने कितनी महती भूमिका निभाई थी। हम नहीं समझते कि तब और अब में और इन दोनों किरदारों के बीच कोई तुलना की जाना चाहिए। फीरोज गांधी स्वाधीनता सेनानी थे और आज़ादी के बाद वे न सिर्फ संसद सदस्य चुने गए, बल्कि नेहरूजी ने उन्हें नेशनल हेराल्ड का जिम्मा भी सौंप रखा था। जबकि राबर्ट वाड्रा आज के उन लाखों नौजवानों से अलग नहीं हैं जो रातोंरात सफलता के शिखर छूना और तो-रफ्तार जिंदगी जीना चाहते हैं। 

वाड्रा की तुलना यदि करना ही है तो देश के दूसरे दामाद याने पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की दत्तक पुत्री के पति रंजन भट्टाचार्य से शायद की जा सकती है जिनका नाम कुछ वर्ष पूर्व इसी तरह चटखारों के साथ लिया जाता था। वाड्रा की तुलना शायद पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के बेटों के साथ भी की जा सकती है। सच तो यह है कि देश में न सिर्फ राजनेता बल्कि आला अफसर, जज, पत्रकार और अन्य उच्च पदों पर बैठे ऐसे कितने ही सम्मानित जन हैं जिनके बेटे-बेटी, बहू और दामाद, भाई और भतीजे या तो राजनीति में आए हैं या फिर देखते ही देखते सफल, सम्पन्न उद्यमी बन गए हैं। इसके क्या कारण हैं, यह राजनैतिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय विश्लेषण का विषय है।

इस लेख के प्रारंभ में मैंने बहुत से सवाल सामने रखे हैं। यह देखना कठिन नहीं है कि आरोप लगाने के लिए जो वक्त चुना गया है उसके दो अलग-अलग कारण हैं। अरविंद केजरीवाल अपनी राजनीतिक पहचान बनाने के लिए व्यग्र हैं। राबर्ट वाड्रा के बहाने सोनिया गांधी पर हमला करने से उन्हें मीडिया में प्रचार और सस्ती लोकप्रियता मिल सकती है। शायद इसीलिए उन्होंने कानूनी कार्रवाई के बजाय मीडिया ट्रायल का रास्ता चुना। दूसरे गुजरात चुनाव आसन्न हैं। नरेन्द्र मोदी के लिए यह चुनाव जीतना परम आवश्यक है। अगर नहीं जीते तो प्रधानमंत्री बनने का सपना बिखर जाएगा। इसलिए उन्होंने भी पहले राहुल गांधी पर एक भद्दा कटाक्ष किया और फिर सीधे सोनिया गांधी पर एक अनर्गल आरोप मढ़ दिया। वह आरोप झूठा सिध्द हुआ तो नरेन्द्र मोदी ने खुले दिल से माफी मांगने की बजाय मुंह में दही जमा लिया है। इस तरह भाजपा और केजरीवाल दोनों का एजेंडा कहीं न कहीं जाकर एक हो जाता है। सामान्य स्थिति में कांग्रेस को वाड्रा के बचाव में आगे आने की जरूरत नहीं थी, लेकिन सब जानते हैं कि असली निशाने पर तो सोनिया गांधी हैं। जनता इस बात को खूब समझती है। 

हम उल्लेख करना चाहेंगे कि भगवान राम ने अपनी न्यायप्रियता का परिचय देने के लिए भले ही धोबी के कहने से सीता का परित्याग कर दिया था,  लेकिन यह एक ऐसा प्रसंग है जिसके लिए हर युग में जनता ने रामजी को ही दोषी ठहराया। इस आख्यान को भूलकर आज जिसे देखो वही अयोध्या के उस धोबी की भूमिका निभाने आतुर नजर आ रहा है।

 देशबंधु में 11 अक्टूबर 2012 को प्रकाशित 

Thursday, 4 October 2012

क्षेत्रीय दलों की सीमायें





इन  दिनों मीडिया का पूरा ध्यान यूपीए सरकार के आर्थिक निर्णयों पर लगा हुआ है। कोयला घोटाला जो कल तक जलता हुआ अंगारा प्रतीत होता था अब बुझे हुए कोयले की तरह कहीं कोने में डाल दिया गया है। विदेशी मीडिया के लिए डॉ. मनमोहन सिंह एक बार फिर नायक बन गए हैं। उनके साहस, सूझबूझ और निर्णय क्षमता की फिर से तारीफ होने लगी है। देशी चैनलों में अब उद्योगपतियों से साक्षात्कार लिए जा रहे हैं। देश का आर्थिक विकास आने वाले दिनों में कैसे होगा, खुदरा व्यापार में एफडीआई के आने से रोजगार के कितने नए अवसर सृजित होंगे, गांव-गांव तक आधारभूत सुविधाएं कैसे पहुंचेंगी, किसानों को उनकी फसल का बेहतर मूल्य कैसे मिलेगा, उपभोक्ताओं को सस्ता और खरा माल कैसे उपलब्ध होगा आदि तमाम बिन्दुओं पर हम अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं। देशी अखबारों में भी एक तरफ सरकार की प्रशंसा हो रही है तो दूसरी तरफ भाजपा की भर्त्सना कि वह देश को आगे बढ़ने से रोकना चाहती है।

इस बीच प्राकृतिक संसाधनों की नीलामी के मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने राष्ट्रपति को जो सम्मति दी है उसके कारण कांग्रेस के हौसले और बुलंद हो गए हैं। पी.चिदम्बरम, कपिल सिब्बल, सलमान खुर्शीद आदि मंत्रियों ने सीएजी को नसीहत दी है कि वह सुप्रीम कोर्ट की राय की अनदेखी न करें। मंत्रीगण आने वाले दिनों में आर्थिक सुधार के लिए और भी कड़े कदम उठाने के संकेत देने लगे हैं। स्वयं प्रधानमंत्री भी अपने विरोधियों से दो-दो हाथ करने के लिए प्रस्तुत नजर आ रहे हैं। यह जो नया माहौल बना है इसमें ऐसे अनेक प्रसंगों और मुद्दों से जनता का ध्यान हट गया प्रतीत होता है जिन पर कुछ दिन पहले शायद जोरदार चर्चा होने की संभावना होती।

मिसाल के लिए अन्ना हजारे की ही बात करें। एक साल में अन्ना कहां से कहां पहुंच गए। एक दिन ऐसा लग रहा था कि वे हुंकार भरेंगे तो सरकार गिर जाएगी। आज वे अरण्यरोदन कर रहे हैं कि सरकार लाख कोशिशों के बावजूद उनकी टीम को नहीं तोड़ पाई, लेकिन टीम के सदस्यों ने ही अपनी महत्वाकांक्षा के चलते आन्दोलन को बिखेर दिया। सामान्य स्थिति में इस बारे में जनचर्चा होना चाहिए कि अन्ना के आन्दोलन से देश ने क्या पाया और क्या खोया। इस पर भी बहस होना चाहिए थी कि उनके सबसे विश्वस्त और सर्वाधिक सक्रिय शिष्य अरविंद केजरीवाल द्वारा आंदोलन को राजनीतिक दल में तब्दील करने व चुनाव लड़ने की मंशा व्यक्त करने में क्या बुध्दिमानी है, लेकिन ऐसा लगता है कि अन्ना और उनके साथी लोकस्मृति से उसी तरह उतर गए हैं जैसे सिनेमा घर में कोई फिल्म उतर जाने के बाद उसके पोस्टर भी उतार दिए जाते हैं।

इस समय प्रदेशों की राजनीति जिस तरह से करवटें बदल रही हैं उसकी भी सटीक विवेचना अभी देखने नहीं मिली है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अभी हाल में प्रदेशव्यापी अधिकार यात्रा निकाली। इस यात्रा के दौरान उन्हें जगह-जगह उग्र विरोध का सामना करना पड़ा। कई जगह पर उन्हें काले झंडे दिखाए गए और जैसी कि खबर है पुलिस ने कोई छह-सात सौ लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। मुझे याद आता है कि अभी चार माह पूर्व रणबीर सेना के प्रमुख ब्रह्मेश्वर सिंह की हत्या के बाद बिहार में जगह-जगह उपद्रव हुए थे। यह स्थिति हैरान करने वाली है। ऐसा सामान्य तौर पर माना जाता है कि नीतीश कुमार ने अपने पहले कार्यकाल में प्रदेश में सुशासन देने के लिए माकूल कदम उठाए थे जिसका पुरस्कार उन्हें दुबारा विजय के रूप में मिला। मीडिया में उन्हें एक लोकप्रिय नेता के रूप में चित्रित किया जाता है, फिर ऐसा क्या हुआ कि उनके खिलाफ लोग सडक़ों पर आ गए। क्या इसके पीछे जदयू की आपसी गुटबाजी है या फिर भाजपा और जदयू के बीच दरार आ गई है या कहीं ऐसा तो नहीं है कि नीतीश विरोधी आंदोलन खड़ाकर उनके प्रधानमंत्री बनने का स्वप्न भंग किया जा रहा हो।

यह भी विचारणीय है कि यूपीए से तृणमूल के अलग हो जाने के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में क्या परिवर्तन आते हैं। विगत एक वर्ष के दौरान प्रदेश की जनता ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के उग्र तेवरों और हठीलेपन को खूब देखा है। ममता बनर्जी अपनी जरा सी भी आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पातीं; यह बात उन सबको नागवार गुजर रही है जो कल तक सीपीआईएम विरोध के चलते उनके पक्ष में खड़े थे। महाश्वेता देवी ने तो अपनी अप्रसन्नता खुलकर जाहिर की है। अब यह सवाल उठाया जा रहा है कि कहीं पश्चिम बंगाल को केन्द्र से मिलने वाली मदद में कटौती तो नहीं होगी। शायद इसीलिए ममता बनर्जी अब राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का सहारा लेने की इच्छुक दिखती हैं। श्री मुखर्जी द्वारा रिक्त सीट पर उनके बेटे के खिलाफ तृणमूल का कोई उम्मीदवार न खड़ा कर मुख्यमंत्री अपनी स्थिति सुधारने में लगी हैं, ऐसा मानना गलत नहीं होगा।

इधर महाराष्ट्र एक बार फिर चर्चा में है। किसी समय देश के सर्वश्रेष्ठ रायों में से एक महाराष्ट्र पिछले कुछ सालों से एक के बाद एक घोटालों के कारण चर्चा में है। प्रदेश की सिंचाई परियोजनाओं में हुए कथित घोटालों में तो उपमुख्यमंत्री की ही बलि ले ली है। शरद पवार के भतीजे व मराठा लॉबी के सशक्त नेता अजित पवार को अपना पद छोड़ना पड़ा है। ऐसी चर्चाएं हैं कि शरद पवार अपना उत्तराधिकार अपनी बेटी सुप्रिया सुले को सौंपना चाहते हैं, जिसके कारण काका-भतीजे में भीतर ही भीतर अनकही लड़ाई चल रही थी जिसकी परिणति पवार जूनियर के इस्तीफे से हुई है। यह स्थिति हमें तमिलनाडु की याद दिलाती है। करुणानिधि के सामने विकट समस्या है कि अपनी तीन संतानों में से वे किसे युवराज या युवराज्ञी बनाएं।

ये तमाम प्रसंग प्रकारान्तर से क्षेत्रीय दलों की सीमाओं को प्रकट करते हैं। यह स्पष्ट होता है कि इन दलों के राजनीतिक हित सीमित और संकीर्ण हैं। ये अपनी शक्ति प्रादेशिक और क्षेत्रीय भावनाओं के उभार से पाते हैं और इनका समूचा तंत्र उस एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमता है, जिसे स्वयं को सुप्रीमो कहे जाने में आनंद प्राप्त होता है और इनमें उस राजनैतिक प्रतिभा का अभाव है जो राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को समझने व उनमें हस्तक्षेप करने में कारगर हो सकेंगे।मैंने ऊपर सिर्फ तीन प्रांतों के उदाहरण दिए हैं, लेकिन अन्य प्रांतों में भी स्थिति बहुत अलग नहीं है। भारतीय जनता पार्टी जो स्वयं को कांग्रेस का विकल्प मानती है, में भी एक व्यापक सोच का अभाव परिलक्षित हो रहा है। देश की भावी राजनीति निर्धारित करने के लिए यह आवश्यक है कि छुटपुट घटनाओं पर ध्यान केन्द्रित करने के बजाय बुनियादी प्रश्नों पर विचार किया जाए। खोखले भाषणों और कोरी नारेबाजी से कुछ हासिल होने वाला नहीं है।

देशबंधु में 4 अक्टूबर 2012 को प्रकाशित 
 

Saturday, 29 September 2012

सरकार गिरने-टिकने के आगे





जैसे ही केन्द्र सरकार ने खुदरा व्यापार में एफडीआई की अनुमति सहित अन्य आर्थिक कदम उठाए, वैसे ही चर्चा निकल पडी क़ि यूपीए सरकार अब सुरक्षित नहीं है। कुछ ऐसा माहौल बना मानो कि सरकार अब गिरी कि तब गिरी। टीवी पर वार्ताकारों की टीकाएं सुनो तो लगता था कि मनमोहन सिंह की कुर्सी खिसकने में ज्यादा देर नहीं है, लेकिन सारी अटकलबाजियां निर्मूल साबित हुईं। जिस दिन ममता बनर्जी के मंत्री इस्तीफा सौंपने वाले थे, उसके एक दिन पहले ही सरकार ने एफडीआई के संबंध में औपचारिक अधिघोषणा भी कर दी। संदेश साफ था- हम तो वही करेंगे जो तय कर चुके हैं, अब तुमसे जो बने सो कर लो।

इस समूचे घटनाचक्र में सबसे पहले तो यह वास्तविकता प्रगट हुई कि ममता बनर्जी अपराजेय नहीं हैं। कांग्रेस ने पिछले तीन सालों में लगातार उनकी धौंस सही, लेकिन अंतत: उसे तय करना पड़ा कि सरकार चलाना है, तो कठोर निर्णय लेना ही पडेंग़े और राजनीतिक ब्लैकमेल एक सीमा से आगे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। सच कहें तो इसमें एक व्यापक संदेश छुपा हुआ है कि गठबंधन की राजनीति की भी अपनी सीमाएं होती हैं और हर वक्त बहला-फुसला कर मान-मनोव्वल कर काम चला लेना उचित नहीं है। इस सच्चाई को दोनों बड़े दल याने कांग्रेस और भाजपा के साथ-साथ सारे क्षेत्रीय दलों को भी समझ लेना चाहिए।

अभी यह कहना मुश्किल है कि 2014 के आमचुनाव के बाद राजनीति का गणित क्या होगा, किंतु यह मान लिया जाए कि अगली सरकार भी गठबंधन से ही बनेगी तब उस स्थिति के लिए अभी से खेल के नियम तय कर लिए जाना चाहिए।  दोनों बड़ी पार्टियों को यह दृढ़ता दिखाने की आवश्यकता है कि वे किसी भी छोटे दल के साथ सिध्दांतविहीन एवं कार्यक्रमविहीन गठजोड़ नहीं करेंगे। इस लिहाज से कांग्रेस व भाजपा दोनों को चाहिए कि वे शीघ्र ही अपने चुनावी घोषणापत्र का प्रारूप तैयार करें; जिन दलों को वे समझते हैं कि साथ आएंगे, उनसे इस प्रारूप पर चर्चा करें और चुनाव के पहले अपने साझा न्यूनतम कार्यक्रम की घोषणा कर दें। इसमें परिस्थिति के अनुसार छोटे-मोटे संशोधन तो शायद होंगे, लेकिन बुनियादी मुद्दों पर कोई हीला-हवाला नहीं होना चाहिए।

अगर ऐसी प्रक्रिया अपनाई जाती है तो उसमें दो शर्ते और होना चाहिए। एक- जो दल नेतृत्व कर रहा है उसे आवश्यकता के अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता हो, यद्यपि ऐसा अपवादस्वरूप ही होगा। दो- मंत्रिमण्डल में विभागों का वितरण प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार है और किसी भी सहयोगी दल को यह छूट नहीं होना चाहिए कि वह इस मामले में प्रधानमंत्री पर दबाव डाले। यह सचमुच अफसोस की बात है कि पिछले पन्द्रह सालों में गठबंधन के छोटे दलों ने अपने सहयोग की कीमत मनचाहा विभाग हासिल करने में वसूली तथा ऐसा करते हुए व्यापक देशहित को ध्यान में नहीं रखा। ममता बनर्जी ने जिस तरह से दिनेश त्रिवेदी को रेल मंत्री पद से हटवाया और अनुभवहीन मुकुल रॉय को उस पद पर आसीन किया, ऐसे उदाहरण अब और नहीं दोहराए जाना चाहिए।

पिछले एक सप्ताह के घटनाचक्र के दौरान पाठकों का ध्यान भारतीय जनता पार्टी के उस बयान की ओर भी गया होगा जिसमें उसने खुदरा बाजार के एफडीआई के मामले पर संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग की। यह एक हास्यास्पद, अतार्किक और अवास्तविक मांग थी। जिस भाजपा ने संसद का पूरा का पूरा मानसून सत्र नहीं चलने दिया वह एक खास मुद्दे पर विशेष सत्र बुलाने की मांग करे तो इसे और क्या कहा जाए? इसी तरह कुछ एक नेताओं ने मनमोहन सिंह को चुनौती दी है कि वे विश्वास मत हासिल करके दिखाएं। यह मांग भी उतनी ही बेढब है। विपक्ष के सामने पर्याप्त अवसर था कि वह कोयला घोटाले पर संसद में खुली बहस कर सरकार की नाक में दम कर देता। उस अवसर को गंवा दिया, तो अब शीतकालीन सत्र तक इंतजार कर लेने में ही बुध्दिमानी होगी।

इस घटनाक्रम में विरोधी दलों द्वारा बीस सितम्बर को भारत बंद रखने के आह्वान पर भी गौर करने की जरूरत है। भाजपा के एक प्रवक्ता ने टीवी बहस के दौरान कहा कि विरोध दर्ज कराने के लिए इस चरम-सीमा तक जाना आवश्यक था। कुछ समय पूर्व संसद न चलने देने पर भी भाजपा का तर्क बिलकुल यही था। इन बयानों से क्या अर्थ निकाला जाए। एक तरफ तो आप संसद से किनाराकशी कर रहे हैं और दूसरी तरफ बंद के आह्वान से आम जनता को जो तकलीफें होती हैं उसे स्वीकार करने को भी आप तैयार नहीं हैं। बहरहाल जैसा कि मैं समझ पाया यह भारत महाबंद सफल नहीं रहा। जिन किराना व्यापारियों को विशेषकर तकलीफ होने की बात कही जा रही है, उन्होंने ही दिल्ली जैसे शहर में अपना व्यापार जारी रखा। बाकी की तो बात ही क्या। मतलब यह कि आज की परिस्थिति में बंद एक निष्प्रभावी अस्त्र हो गया है। पहले जब बंद का आह्वान होता था, तो साल में कभी एकाध बार। उस समय राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता पहले से वातावरण बनाते थे तथा दुकानदारों का सहयोग लेने में सफल हो जाते थे। अब बंद की रणनीति ही बदल चुकी है। उच्छृंखल युवाओं को आगे कर धमकी-चमकी से दुकानें बंद करवाने को स्वस्थ राजनीति नहीं माना जा सकता।

कुल मिलाकर पिछले कुछ सप्ताहों में देश के राजनीतिक फलक पर जो दृश्य देखने मिले हैं वे जागरूक समाज को गंभीर विचार मंथन का अवसर देते हैं। सरकार ने जो ताबड़तोड़ निर्णय लिए, वे प्रत्यक्ष तौर पर अर्थनीति से संबंधित है, लेकिन उनकी पृष्ठभूमि और भविष्य दोनों घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय राजनीति के साथ-साथ सामाजिक परिदृश्य से भी ताल्लुक रखते हैं और सरकार गिरने-टिकने के आगे जहां और भी है, की हकीकत की ओर नागरिकों का ध्यान आकृष्ट करते हैं।

देशबंधु में 27 सितम्बर 2012 को प्रकाशित 



 
 

Thursday, 20 September 2012

क्या गाँधी के विचार जीवित हैं?

 
 
 
प्रिय दीपक जी,

आपके
पत्र से जानकारी मिली कि आप किसी खास प्रयोजन से उन व्यक्तियों की सूची तैयार कर रहे हैं, जिन्होंने किसी न किसी रूप में गांधीजी के विचारों को जीवित रखा है। आपको उचित ही इस बात का एहसास है कि संपूर्णता अपने आप में एक भ्रम है इसलिए ऐसे व्यक्तियों को भी आप सूची में शामिल करना चाहते हैं जो आंशिक रूप से ही सही, इस प्रयत्न में जुटे हैं। यहां तक तो बात ठीक है, लेकिन इसके आगे मुझे आपने यह कहकर भारी उलझन में डाल दिया है कि मैं ऐसे व्यक्तियों के नाम आपको सुझाऊं। आपका पत्र मुझे करीब तीन हफ्ते पूर्व मिला था और तब से मैं लगातार सोच रहा हूं कि क्या मैं सचमुच इस योग्य हूं कि आपके इस महत्तर उद्देश्य में किसी तरह से सहयोग कर सकूं!

आपका संदेश मिलने के बाद मैंने अपने आसपास देखना प्रारंभ किया। अविभाजित मध्यप्रदेश पर नजर दौड़ाई। पूरे देश के नक्शे में ढूंढने की कोशिश की और विश्व के मानचित्र को भी सामने रखकर अपनी बुध्दि और स्मृति दोनों को कुरेदने का यत्न किया। यूं तो वर्तमान समय में गांधीवादियों की एक अच्छी-खासी सूची तैयार हो सकती है कि वे गांधी के विचारों को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं, लेकिन मैं यह साहस नहीं जुटा पा रहा हूं कि आपकी सूची में शामिल करने के लिए उनके नाम प्रस्तावित करूं। दरअसल सबसे पहले तो हमें यह तय करना चाहिए कि गांधी के विचार क्या थे और उन्हें हम किस रूप में ग्रहण करते हैं। ऐसा करते हुए यह ध्यान अवश्य देना होगा कि गांधी महासागर की तरह विस्तृत और विराट व्यक्तित्व के धनी थे।  उनके कामों और विचारों को हम चाहें जितनी कोशिश कर लें, संपूर्णता में परखने का दावा नहीं कर सकते।

आज इसलिए गांधीजी पर चर्चा करते हुए हमें वे निकष सामने रखना चाहिए जिन पर गांधीजी ने स्वयं को निर्ममतापूर्वक कसा। मोटे तौर पर ये हैं- सत्य, अहिंसा, निर्भीकता, अपरिग्रह, श्रम की महत्ता, मनुष्य मात्र की प्रतिष्ठा, समरसता, सामाजिक न्याय, स्वाधीनता इत्यादि। इन मूल्यों के आधार पर गांधीजी ने अपना जीवन कैसे जिया और उसमें कौन से अवसर थे जो इस दृष्टि से रेखांकित करने योग्य हैं, यह भी देखना होगा। यह उचित होगा कि अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए मैं कुछ उदाहरण रखूं।

गुजरात गांधीजी का गृह प्रदेश है। गांधीजी के विचारों के अनुसरण में ही पिछले साठ साल से वहां मद्यनिषेध लागू है। अगर मान लिया जाए कि गुजरात में एक भी व्यक्ति मदिरापान नहीं करता, तब भी क्या हम कह सकते हैं कि वहां का हर निवासी गांधीवादी है? इसी तरह देश में बहुत बड़ी संख्या में लोग गांधी टोपी पहनते हैं, लेकिन क्या वे गांधी के विचारों को जीवित रखने का कोई यत्न कर रहे हैं? मैं ऐसे लोगों को भी जानता हूं जो पारिवारिक संस्कारों के चलते आज भी चरखा कातते हैं, उन्हें अपने आप गांधीवादी होने का खिताब भी मिल जाता है, लेकिन क्या चरखा कातना पर्याप्त है? हमारे एक मित्र हैं जो स्वयं को गांधीवाद का बहुत बड़ा अध्येता मानते हैं: उन्हें इस नाते व्याख्यान देने जगह-जगह बुलाया जाता है, लेकिन वही मित्र इन दिनों कभी भगतसिंह के रास्ते पर, तो कभी नेताजी के रास्ते पर चलने की सलाह देने लगे हैं। तो क्या गांधी के विचार सिर्फ सभा-समितियों तक सीमित रखना पर्याप्त है? एक और सज्जन  हैं जिन्होंने उड़ीसा में फादर ग्राह्म स्टेन्स की नृशंस हत्या के कुछ दिनों बाद एक पुस्तिका प्रकाशित कर यह सिध्द करने का प्रयत्न किया कि गांधीजी ईसाइयत के कितने खिलाफ थे। क्या ऐसे व्यक्ति को गांधीवादी माना जा सकता है?

ये तमाम उदाहरण देने का मेरा आशय यह है कि आप जो सूची बना रहे हैं उसमें कोई भी नाम शामिल करने से पहले यह जरूर देखें कि वह व्यक्ति गांधी की कसौटी पर कितना खरा उतरता है, फिर भले ही वह अपने आपको गांधीवादी न मानता हो; या सामान्य तौर पर जिसका कोई संबंध गांधीवाद से न जुड़ता हो। मैं आपको 1946 में वापिस ले जाना चाहता हूं। कृपया विचार करें कि गांधीजी ने पंडित नेहरू को ही अपना उत्तराधिकारी घोषित क्यों किया।  उन्होंने यह क्यों कहा कि मेरे बाद जवाहर मेरी भाषा बोलेगा। मैं इस बात पर गौर करता हूं तो मुझे लगता है कि गांधीजी से अनेक मुद्दों पर असहमति रखने के बावजूद पंडित नेहरू में वे अनेक गुण थे जो बापू के अपने चरित्र का हिस्सा थे। पिछले पचास-साठ साल के दौरान बहुत से विद्वानों ने गांधी और नेहरू के बीच द्वैत स्थापित करने की कोशिश की है, लेकिन मेरी समझ में वे सच्चाई से मुंह मोड़ लेते हैं।

बहरहाल, आपके पत्र पर विचार करते हुए एक वृहत्तर फलक पर सिर्फ दो नाम स्मरण आते हैं, जिन्हें सच्चे अर्थों में गाँधी का उत्तराधिकारी माना जा सकता है- एक नेल्सन मंडेला और दूसरी आंग सान सू ची। इनके बाद भारत से मेरे सामने कुछ नाम आते हैं जिन्हें आप शायद गांधीजी के विचारों का पोषक न मानें, लेकिन मेरी राय में जो सचमुच गांधी के विचारों पर चलते रहे हैं। मैं सबसे पहले वे चार नाम लेना चाहता हूं जिनके बारे में मैं एकाधिक बार अपने कॉलमों में लिख चुका हूं ये हैं- डॉ. कुरियन, प्रोफेसर यशपाल, जस्टिस कृष्णा अय्यर और ई. श्रीधरन। दुर्भाग्य से डॉ. कुरियन अब हमारे बीच नहीं हैं। इन्होंने ध्येय के प्रति एकांतिक निष्ठा रखी, संकटों से विचलित होकर समझौते नहीं किए, अग्रिम पंक्ति में रहकर डटकर नेतृत्व किया, जिनके बीच ये रहे उनका आत्मबल बढ़ाने का काम किया, उन्हें विपरीत परिस्थितियों में भी अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ रहना सिखाया और सत्यनिष्ठा व अपरिग्रह के साथ पूरा जीवन जिया। इस सूची में और नाम भी जुड़ सकते हैं बशर्ते आपको मेरी बात जंच रही हो।

यदि आप मेरे दृष्टिकोण से सहमत न हों तब एक दूसरी सूची बनाई जा सकती है। इसमें आप निम्नांकित श्रेणियों से चयन कर सकते हैं- खादी पहनने वाले, गांधी टोपी पहनने वाले, लंगोटी पहनने वाले, शराब न पीने वाले, गांधीजी पर कविता, लेख और पुस्तकें लिखने वाले, गांधीदर्शन के अध्यापकगण, गांधी के नाम पर बनी संस्थाओं के प्रमुख, गांधी जयंती और पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रमों के सूत्रधार और वित्तीय मददगार, गांधी के नाम पर वोट मांगने वाले, स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने का दावा करने वाले, सेवाग्राम और साबरमती में धूनी रमाकर बैठे लोग, स्वदेशी के मंत्रोच्चाटक, गांधीजी की मूर्तियां बनाने वाले, नीलामी में उनकी चिट्ठियां, चश्मा और घड़ी खरीदने वाले, गांधी का नाम लेकर अनशन करने वाले, मुन्नाभाई से प्रेरित गांधीगिरी करने वाले आदि-आदि। इनमें से हरेक इस बात का श्रेय ले सकता है कि वह गांधी के विचारों को जीवित रखने का काम कर रहा है।

अगर आपको मेरी बात न रुची हो तो मैं क्षमाप्रार्थी हूं।

आपका

ललित सुरजन
देशबंधु में 20 सितम्बर 2012 को प्रकाशित


 

Wednesday, 12 September 2012

पन्द्रह मिनट की बहस





इस अखबार के पाठकों में काफी संख्या में ऐसे व्यक्ति होंगे जो टीवी के समाचार चैनलों पर प्रसारित होने वाली बहसें सुनते हैं। अगर कोई न भी सुनना चाहे तो अपने पसंदीदा कार्यक्रम के लिए सर्फिंग करते हुए किसी न किसी चैनल पर कोई न कोई बहस अनायास ही देखने-सुनने मिल जाती है। कुछ बहसें तो ऐसा होती हैं जो दिन में दस बार दिखाई जाती हैं। मसलन बीते शुक्रवार की रात महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के जोशीले सेनापति राज ठाकरे के साथ ''टाइम्स नाउ'' के अर्णब गोस्वामी ने जो साक्षात्कार लिया, पहले तो उसकी झलकियां या ट्रेलर ही-तीन बार दिखाया गया, फिर प्राइम टाइम में साक्षात्कार प्रसारित हुआ और फिर अगले दिन याने शनिवार को दिन में शायद बारह बार उसे प्रसारित किया गया। ऐसा करके ''टाइम्स नाउ'' राज ठाकरे का प्रचार कर रहा था या खुद अपना, यह सवाल पूछा जा सकता है।

बहरहाल ऐसी तमाम बहसों को जब आप देखते सुनते हैं तो कुछ बारीकियों पर आपका ध्यान जरूर जाता होगा। एक तो कोई भी बहस आधा घंटे से ज्यादा की नहीं होती, बल्कि बाइस या चौबीस मिनट की ही होती है। इसमें भी कम से कम चार-चार मिनट के दो ब्रेक लिए जाते हैं। कोई वक्ता अपनी बात कहने को होता है कि उसे रोक दिया जाता है कि हम ब्रेक के बाद इस पर बात करेंगे। फिर ऐसी बहसों में अमूमन चार से ज्यादा भागीदार आमंत्रित होते हैं कई बार तो छह या सात भी। अब आप हिसाब लगाकर देखिए कि किसी गंभीर मुद्दे पर ज्यादा से ज्यादा पन्द्रह मिनट बात हो रही है तो उसमें एक प्रतिभागी के हिस्से में तीन या चार मिनट से ज्यादा का समय कहां मिलता होगा।

यह टीवी बहसों की तकनीकी सच्चाई है। एक पार्टी प्रवक्ता या विषय विशेषज्ञ से उम्मीद की जाती है कि वह लोकमहत्व के बडे से बड़े प्रश्न पर तीन मिनट में अपना पक्ष प्रस्तुत कर दे। इसमें भी यह पेंच छिपा हुआ है कि चैनल जिस पार्टी या व्यक्ति को पूर्व-निर्धारित सोच से कटघरे में खड़ा करना चाहता है, उसे कार्यक्रम का सूत्रधार अधिक बोलने ही नहीं देता, बीच-बीच में रोक देता है और कई बार तो सूत्रधार के बजाय वह जज बन जाता है। इसमें यह भी होता है कि जिस पार्टी पर आक्रमण किया गया है उसका प्रवक्ता एक होता है, जबकि बाकी तीन-चार या पांच प्रतिभागी विपक्ष के होते हैं। कुल मिलाकर एक को मिलते हैं दो या तीन मिनट और बाकी को बारह या तेरह मिनट। स्पष्ट है कि इस तरह की आभासी बहस में संतुलन और निष्पक्षता की कोई गुंजाइश नहीं होती। इस सच्चाई को जानने के बावजूद इसे हमारे राष्ट्रीय जीवन की विडम्बना ही मानना चाहिए कि जिन मुद्दों पर जनता व्यथित और चिंतित है, उनके स्पष्टीकरण अथवा निराकरण के लिए वह टीवी जैसे एक घोर अगंभीर माध्यम पर भरोसा किए बैठी रहती है। इसके चलते हम समय-सिध्द संस्थाओं, मंचों और अवसरों की ओर दुर्लक्ष्य करने लगे हैं। 

फिलहाल हम यदि संसद और विधानसभाओं की बात न भी करें तो भी यह याद कर लेना अच्छा होगा कि एक समय विश्वविद्यालय, छात्रसंघ, श्रमिक संघ, यहां तक कि गणेशोत्सव और दुर्गोत्सव जैसे मंच नागरिकों को उपलब्ध थे, जिनमें वलंत मुद्दों पर खुली व खरी चर्चा हो सकती थी। अपने ही प्रमाद में हमने इन्हें तिरस्कृत कर दिया है। हमारी व्यवस्था में इस बात की भी भरपूर गुंजाइश है कि राजनीतिक दल  आम सभाएं करें और उनके माध्यम से समाज के जरूरी प्रश्नों पर लोक शिक्षण करें। ऐसी सभाएं जब आम चुनाव के पहले होती हैं तब उनका स्वर अलग होता है। उस समय वोट बटोरने के लिए लच्छेदार बातें की जाती हैं, लेकिन जब चुनाव का मौका न हो तब इन मंचों का उपयोग तर्कपूर्ण बहसों के लिए होना चाहिए। लेकिन हमें याद नहीं पड़ता कि पिछले बीस साल में कम्युनिस्ट पार्टियों के अलावा अन्य किसी दल ने इन अवसरों का उपयोग लोक शिक्षण अथवा जनजागरण के लिए किया हो। इस अवधि के दौरान कांग्रेस, भाजपा व क्षेत्रीय दलों ने अगर आम सभाएं की हैं तो संकीर्ण और तात्कालिक लाभ पाने की दृष्टि से।

अब हम अपना ध्यान संसद और विधानसभाओं पर केन्द्रित कर सकते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि इन निर्वाचित सदनों की कार्यप्रणाली पर विगत तीन दशकों के दौरान लगातार सवाल उठाए जाते रहे हैं। ये हमारी अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर रहे, इनकी विश्वसनीयता क्षीण होती गई है और इनकी कार्यप्रणाली को लेकर प्रबुध्द वर्ग ही नहीं, आम जनता में भी गहरा असंतोष पनपने लगा है। हम जब सांसदों और विधायकों को चुनते हैं तो उनसे सहज उम्मीद करते हैं कि वे सदन में जन आकांक्षाओं को वाणी देंगे तथा देश-प्रदेश की प्रगति के लिए ईमानदारी के साथ अपना कर्तव्य निभाएंगे, लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा है। साल दर साल सत्र छोटे होते गए हैं, बैठकों के दिनों में कटौती होती गई है और जितने दिन सदन बैठता है उसका एक बड़ा हिस्सा निरर्थक बहसों और अवांछनीय दृश्यों में चला जाता है। तिस पर यह विरोधाभास कि सांसद और विधायक अपने लिए सुविधाएं साल-दर-साल बढ़ाते गए हैं। गोया, जिस जनता ने उन्हें चुनकर भेजा है उसके प्रति अब उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है।

संसद के हाल में सम्पन्न मानसून सत्र के दौरान हमने इसका प्रत्यक्ष अनुभव किया। सत्र प्रारंभ होने के पहले विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने टि्वटर पर लिखा था कि वे कौन-कौन से मुद्दे सदन में उठाने वाली हैं। मैंने इस पर उन्हें अपनी टिप्पणी भेजी थी कि कृपया सुनिश्चित कीजिए कि सदन की कार्रवाई चलती रहे। इसका कोई उत्तर पाने की अपेक्षा मैंने नहीं की थी, और वह आया भी नहीं। लेकिन जो हुआ वह सबके सामने है। कोयला घोटाले पर सत्तारूढ़ दल को बहुत अच्छे से घेरा जा सकता था। सरकारी पक्ष याने यूपीए का जितना संख्या बल है लगभग उतना ही संख्या बल संयुक्त विपक्ष का भी है: अगर सदन का बहिष्कार न कर बहस की जाती तो सरकार पर आक्रमण करने में भाजपा का साथ वामदलों ने व बीजू जनतादल ने भी दिया होता। लेकिन हुआ यह कि मात्र 140 सदस्य संख्या वाली भाजपा ने संसद को एक तरह से बंधक बना लिया। इस कारण न सिर्फ सत्तारूढ़ यूपीए अपना पक्ष प्रस्तुत नहीं कर पाया, बल्कि वामदल, बीजद, जदयू, झारखण्ड विकास पार्टी आदि भी अपनी बात सदन में सामने नहीं रख पाए। भाजपा की इस हठधर्मिता का परिणाम यह हुआ कि जनता को अंतत: पन्द्रह मिनट बहस वाले टीवी चैनल पर निर्भर करना पड़ा। इससे चैनलों को चाहे जो फायदा हुआ हो, भाजपा को तो बिलकुल नहीं हुआ। प्रधानमंत्री ने सत्र समाप्ति के बाद सच ही कहा कि यह सत्र पूरी तरह से व्यर्थ चला गया। यह सोचकर तकलीफ होती है कि आगे भी ऐसा ही होगा।

देशबंधु में 13 सितम्बर 2012 को प्रकाशित 


Thursday, 6 September 2012

विदेशी मीडिया बनाम प्रधानमंत्री




कुछ हफ्ते पहले ही अमेरिका की बहुप्रसारित 'टाइम' पत्रिका ने प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की काबिलियत पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए एक मुख्य लेख (कवर स्टोरी) छापा था। अब अमेरिका के ही एक बड़े अखबार 'वाशिंगटन पोस्ट' ने भी लगभग उन्हीं विचारों को अनुमोदित करते हुए भारत के प्रधानमंत्री की जमकर आलोचना की है। इस बीच इंग्लैण्ड और अमेरिका के कुछ और पत्रों ने इसी के अनुसरण में अनेक लेख छापे हैं। यह विचारणीय है कि विदेशी मीडिया की भारत की राजनीतिक सेहत के बारे में चिंता एकाएक कैसे बढ़ गई है और इसके पीछे क्या प्रयोजन है। खासकर जबकि यह मीडिया कुछ समय पहले तक यूपीए सरकार और विशेषकर डॉ. सिंह की तारीफ के पुलिंदे बांध रहा था।

इसका एक सरल कारण शायद यह है कि आर्थिक नवउदारवाद के इस दौर में विदेशी मीडिया प्रतिष्ठान भारत में अपने लिए मुनाफे की ठोस जमीन तलाश रहे हैं। अमेरिका, इंग्लैण्ड में अखबारों की प्रसार संख्या निरंतर गिर रही है। वे घाटे में भी चल रहे हैं। कितने सारे अखबार तो बंद हो चुके हैं। ऐसे में अनेक अखबारों ने विभिन्न देशों के लिए अपने विशेष संस्करण निकालना प्रारंभ कर दिया है। भारत तो इस दृष्टि से उर्वर प्रदेश तो है ही। फिर केन्द्र सरकार की आलोचना करने से कोई भी बाहरी अखबार यहां अपनी बिक्री और छवि में इजाफा कर सकता है। 'टाइम' और 'वाशिंगटन पोस्ट' ने भी यही किया हो, तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 
यह भी सबको पता है कि विदेशी पूंजी निवेशकों और कारपोरेट घरानों को भारत का वर्तमान राजनीतिक माहौल पसंद नहीं आ रहा है। वे चाहते हैं कि भारत रातोंरात उनके मनोनुकूल आर्थिक नीतियां लागू कर दे- जैसे बैंक व बीमा क्षेत्र का पूर्ण निजीकरण, खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी प्रवेश, पेंशन का जिम्मा निजी क्षेत्र को देना आदि। डॉ. सिंह यह सब नहीं कर पा रहे हैं या नहीं कर रहे हैं, इससे विदेशी पूंजीपतियों का कुंठित होना स्वाभाविक है। संभव है कि वे अपनी भड़ास को पूंजी-आश्रित मीडिया के माध्यम से निकाल रहे हों। 

यूं तो भारत में विदेशी मीडिया के अनेक पत्रकार कार्यरत हैं, लेकिन उनमें से अधिकतर का भारत के बारे में ज्ञान उथला और एकतरफा है। ऐसे कम ही लोग हैं, जो दूरदराज के इलाकों में जाकर भारत की समग्र तस्वीर देखने की कोशिश कर रहे हों, वरना यादातर तो भारत के महानगरों के अभिजात वर्ग की कॉकटेल पार्टियों या व्यक्तिगत चर्चाओं से ही अपनी कलम के लिए मसाला जुटाते हैं। मुझे तो यह देखकर हैरानी होती है कि मार्क टली जैसे नामीगिरामी पत्रकार जो भारत में ही बस गए हैं, भी कई बार एकतरफा कांग्रेस विरोध और अक्सर हिन्दुत्ववादी ताकतों के पक्ष में खड़े नजर आते हैं।

इन दिनों भाजपा जिस आक्रामक मूड में है उसमें उसे वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट से प्रधानमंत्री पर वार करने का एक और अच्छा मौका लग गया है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी को बहुत यादा खुश होने की जरूरत नहीं है। उसके नेताओं को नहीं भूलना चाहिए कि इसी विदेशी मीडिया ने एक समय के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई पर गंभीर आरोप लगाए थे और इसके बाद प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का भी सुरुचिहीन उपहास 'टाइम' पत्रिका में देखने मिला था। दुश्मन का दुश्मन आपका दोस्त हो, यह बात हमेशा लागू नहीं होती। भाजपा यह भी याद रखे कि जिस अमेरिका के पत्रों ने डॉ. सिंह की आलोचना की है, उसी अमेरिका ने भाजपा के महान नेता नरेन्द्र मोदी को आज तक वीजा नहीं दिया है और उसी देश में एनडीए के रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडीस के कपड़े विमानतल की सुरक्षा जांच में उतरवा लिए गए थे।

'वाशिंगटन पोस्ट' प्रसंग में कांग्रेस पार्टी ने भी अपेक्षित संयम नहीं बरता। अखबारों में सरकार के खिलाफ सामग्री छपते ही रहती है। उसको लेकर हाय-तौबा मचाने की जरूरत नहीं थी। भारत के पत्र सूचना कार्यालय से एक उत्तर अखबार को भेज दिया जाता, इतना पर्याप्त होता। कांग्रेस के प्रवक्ताओं को भी इस बारे में टीवी बहस में भाग लेने से इंकार कर देना चाहिए था। हर क्रिया की प्रतिक्रिया- न्यूटन का यह सिध्दांत भौतिकशास्त्र तक सीमित रहे तो बेहतर। 

 देशबंधु में 7 सितम्बर 2012 को प्रकाशित सम्पादकीय