Thursday, 28 February 2013

भारत में आतंकवाद की जड़ कहां है?





सब कुछ अपनी रफ्तार से चलते रहता है, फिर कोई ऐसी घटना घट जाती है, जिससे पूरा देश दहल उठता है। कुछ दिन तक बड़ी-बड़ी बातें होती हैं और फिर जीवन अपनी पटरी पर लौट आता है। देश में आतंकवाद को लेकर कुल मिलाकर दृश्य कुछ इस तरह का है। न तो हम समस्या की गंभीरता को पहचान पा रहे हैं और न उसकी जड़ में जाने की कोई ईमानदार कोशिश ही नजर आती है। अभी पिछले हफ्ते हैदराबाद में बम विस्फोट हुए जिसमें सोलह लोग मारे गए। यह त्रासद वाकया क्यों हुआ, कैसे हुआ, किसने किया, इसके लिए सबके अपने-अपने जवाब हैं। अधिकतर लोग पाकिस्तान को और उसके साथ देश के भीतर मुसलमानों को दोषी ठहराने में एक पल भी जाया नहीं करते। पुलिस की अपनी सोच भी इसी तरह की है। आनन-फानन में कुछ अल्पसंख्यक युवाओं को गिरफ्तार कर अपराधियों को पकड़ने का दावा कर लिया जाता है। (और जैसा कि हैदराबाद में हुआ, एक मृत व्यक्ति को ही आतंकी बता दिया गया) 

काश कि बात इतनी सीधी सरल होती! मुझे हैरत इस पर है कि हाल के वर्षों में देश में आतंकवाद की समस्या को लेकर जो नए तथ्य सामने आए हैं उन पर गौर करने के बजाय पुरानी धारणाओं को ही दोहरा दिया जाता है। दुर्भाग्य की बात है कि अपने पूर्वाग्रहों के चलते पुलिस ने कितने ही निर्दोष अल्पसंख्यक नौजवानों को ऐसी आतंकी घटनाओं का आरोपी बनाकर उन्हें जेल में ठूंस दिया और उनके जीवन के कीमती वर्ष जेल में ही बीत गए। वे अतत: भले ही निर्दोष साबित हुए हों लेकिन ये गुजरे वर्ष उन्हें कौन लौटा सकता है?

इधर एक चिंताजनक प्रवृत्ति और पनप रही है कि निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन और उसकी प्रतीक्षा करने का धैर्य चुकते जा रहा है। देश में सौ-पचास लोगों का एक विचित्र समूह तैयार हो गया है, जिसके सदस्य छोटे पर्दे पर स्वयं को रक्षा विशेषज्ञ घोषित करते हुए ऐसी किसी भी घटना पर तुरंत फैसला करने बैठ जाते हैं। यह कतई आवश्यक नहीं है कि एक रिटायर्ड फौजी या एक रिटायर्ड पुलिस अफसर रक्षा विशेषज्ञ भी हो। ठीक वैसे ही जैसे कि कोई शिक्षक शिक्षाविद् हो या साहित्य का कोई अध्यापक अनिवार्य रूप से साहित्यकार हो। इन कथित रक्षा विशेषज्ञों की अपनी राजनीतिक पृष्ठभूमि और अपनी राजनीतिक अथवा आर्थिक स्वार्थ भी हैं जिनका खुलासा करने की ईमानदारी वे शायद ही कभी बरतते हों। शायद इसीलिए कुछ दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अल्तमस कबीर ने देश में बढ़ रहे मीडिया ट्रायल की प्रवृत्ति पर चिंता जाहिर की है।

देश में आतंकवाद और आतंकी घटनाओं का विश्लेषण करने में पर्याप्त सावधानी और संतुलन बरतना आवश्यक है। एक बुनियादी तथ्य सदैव याद रखना जरूरी है कि पाकिस्तान का निर्माण भले ही धार्मिक आधार पर हुआ हो, लेकिन भारत अपनी स्वतंत्रता के पहले दिन से ही एक धर्मनिरपेक्ष देश रहा है और उस दिन भी ऐसे करोड़ों मुसलमान थे, जिन्होंने अपना वतन छोड़कर पाकिस्तान जाना स्वीकार नहीं किया था। इसके बाद इन पैंसठ सालों में ऐसे इक्के-दुक्के प्रसंग ही होंगे जिनमें किसी भारतीय मुसलमान पर देशद्रोह का आरोप सिध्द हुआ हो!

हम यह कैसे भूल सकते हैं कि अक्टूबर 1947 में पाकिस्तानी सेना के सहयोग से जब काश्मीर पर कबाईली हमला हुआ था तब इस देश के लिए अपनी जान देने वाला पहला व्यक्ति काश्मीर का ही एक मुस्लिम नौजवान था- बारामूला का शहीद मकबूल शेरवानी। भारत-पाक के बीच इस पहली लड़ाई में भारतीय सेना के एक जांबाज अफसर की भी शहादत हुई थी जिनका नाम ब्रिगेडियर उस्मानी था। इस तरह के कितने ही दृष्टांत हैं जो हमारे मध्यमवर्गीय समाज में पनप रहे पूर्वाग्रह को दूर करने के लिए जनता के सामने रखे और याद दिलाए जाना चाहिए।  तभी जाहिर होगा कि देश में ऐसी कुछ शक्तियां हैं जिन्हें भारत की धर्मनिरपेक्षता रास नहीं आती और वे सारे प्रकरणों और तर्कों को झुठलाते हुए किसी न किसी तरह पाकिस्तान की ही तर्ज पर भारत को एक धर्म-आधारित राय बना देना चाहती हैं।

यूं तो विश्व के अनेक देशों में इस्लाम, ईसाइयत, बौध्द और यहूदी धर्म को राजकीय मान्यता मिली हुई है, लेकिन इजराइल जैसे अपवाद को छोड़कर बाकी में व्यवहारिक जीवन में धर्मनिरपेक्षता के सिध्दांत का पालन किया जाता है। आज के समय में जब देशों के बीच परस्पर संपर्कों की सघनता और गति बढ़ रही है, तब राजकाज और व्यक्ति के धार्मिक विश्वास के बीच यह अंतर बनाए रखना ही सबके लिए श्रेयस्कर है। देखना कठिन नहीं है कि जिन देशों में ऐसा नहीं हो रहा है, वे फिरकापरस्ती व आंतरिक अशांति के चलते वांछित प्रगति हासिल नहीं कर पा रहे हैं।

पाकिस्तान का ही उदाहरण लें। जिस धार्मिक विश्वास पर इस नए राष्ट्र का गठन हुआ उससे क्या हासिल हुआ? राजनीतिक स्वायत्तता और भाषायी अस्मिता के नाम पर पाकिस्तान टूटा और बंगलादेश बनकर रहा। पाकिस्तान में न सिर्फ अल्पसंख्यक हिन्दुओं और ईसाइयों को प्रताड़नाएं झेलनी पड़ीं, इस्लाम के ही अन्य समुदायों यथा शिया, अहमदिया आदि पर भी लगातार हमले हो रहे हैं। जिस दिन हैदराबाद में बम विस्फोट हुआ, उसके एक-दो दिन पहले ही क्वेटा में शिया समुदाय के कोई सौ लोग ऐसे ही हमले में मारे गए। इस्लाम की ही विभिन्न शाखाओं के बीच यह झगड़ा अनेक अरब देशों में भी देखने मिल रहा है। जाहिर है कि ऐसी अशांति के चलते किसी भी देश का भला नहीं होना है।

बीसवीं सदी में साम्रायवादी शक्तियों की प्रेरणा से धार्मिक आधार पर दो देश बने- एक पाकिस्तान और दूसरा इजरायल। पाकिस्तान का हाल सबके सामने है। इजरायल की पीठ पर अमेरिका की कारपोरेट शक्तियों का हाथ है, इसलिए वह मनमानी करते जा रहा है। भारत ने लंबे समय तक इजराइल के साथ कूटनीतिक संबंध नहीं रखे, बल्कि पश्चिम एशिया में इजरायल देशों की दादागिरी का हमने विरोध ही किया और अरब देशों के साथ दोस्ताना संबंध कायम किए। इसका फायदा हमें अरब देशों से तेल की आपूर्ति और खाड़ी देशों में रोजगार के रूप में मिला। लेकिन हाल के वर्षों में हमने अपनी ही समयसिध्द नीति के प्रति बेरुखी अपना ली। इसका कोई असर हैदराबाद जैसी घटनाओं पर तो नहीं पड़ा, लेकिन यह स्वीकार करने में संकोच नहीं करना चाहिए कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के कारण देश के भीतर मुसलमानों के मन में असुरक्षा का भाव पैदा हुआ है और पश्चिम एशिया में मित्र राष्ट्रों के बीच भी हमारी साख में कमी आई है। काश्मीर को लेकर भी अखण्ड भारत का सपना देखने वाली ताकतों ने जो उध्दत रुख लगातार अपनाया है उसके कारण काश्मीर घाटी में स्वयं को दोयम दर्जे का नागरिक माने जाने की पीड़ा व असुरक्षा का भाव पनपा है।  हमारे राजनीतिक दल तात्कालिक लाभ के लिए नीतियां बनाना और बयानबाजी बंद कर इन मसलों पर गंभीर मनन कर समन्वित नीति बनाने राजी हो जाएं, तभी भारत की आंतरिक सुरक्षा सौ फीसदी सुनिश्चित हो सकेगी। अन्यथा हवा में तीर चलाने से कुछ आना-जाना नहीं है।
 
देशबंधु में 2 फरवरी 2013  को प्रकाशित 

Wednesday, 20 February 2013

रक्षा सौदों का सच




इन
 दिनों भारत में भ्रष्टाचार को लेकर खबरों और बहसों का एक अंतहीन सिलसिला चल रहा है। हमने मानो ठान ली है कि अपने देश को दुनिया का सबसे भ्रष्ट देश सिध्द करने के बाद ही दम लेंगे। संभवत: आशीष नंदी जैसा कोई परम विद्वान समाज मनोविज्ञानी ही इस प्रश्न का उत्तर दे सकता है कि हम इस तरह आत्मनिंदा और आत्मधिक्कार करने में कौन सा सुख पा रहे हैं! अपने इस शगल में हमें न तो सत्य का संधान करने का धीरज है, और न अपनी अभिव्यक्ति में वाणी और लेखनी का संयम। स्थिति यह है कि जिसकी जो मर्जी आए वैसी बात कर रहा है। और समाज है  कि कौआ कान ले उड़ा की तर्ज पर हर आरोप को साबित होने के पहले ही सच मानने लगता है। यह स्थिति किसी भी तरह से सुखद नहीं कही जा सकती। इसमें एक बड़ा खतरा भी सन्निहित है कि राज्य की सभी संस्थाएं यदि जनता का विश्वास खो बैठती हैं तो फिर देश में जंगल राज कायम होने में कितना वक्त लगेगा!

यह माहौल इसलिए भी चिंतनीय है कि राजनीतिक दल भी उनसे अपेक्षित मर्यादाओं का पालन करने के बजाय भीड़ की मनोवृत्ति के अनुरूप चल रहे हैं। ऐसा करते हुए वे भूल जाते हैं कि जो आज सत्ता में है वह कल विपक्ष में हो सकता है और जो आज विपक्ष में है कल वह सत्तासीन हो सकता है। राजनीतिक दलों से प्राथमिकत: उम्मीद की जाती है कि वे अपनी नीतियां और सिध्दांत लेकर जनता के बीच में जाएंगे, लेकिन फिलहाल जो मंजर दिखाई दे रहा है उसमें इस प्राथमिक दायित्व को मानो कूड़ेदान में डाल दिया गया है। भ्रष्टाचार के राग अलापने के अलावा और कोई मुद्दा जैसे बात करने के लिए बचा ही नहीं है। इस नए माहौल में एक अन्य प्रकट सच्चाई की ओर जनता का ध्यान ठीक से नहीं जा रहा है। भ्रष्टाचार को दस क्या, सौ सिर वाला रावण बनाकर पेश कर दिया गया है और उससे लड़ने के नाम पर राम के नए-नए अवतार भी हर-दूसरे चौथे दिन प्रकट हो रहे हैं, लेकिन क्या किसी ने पलभर के लिए सोचा कि अंतत: इनका क्या हश्र होता है। सब देख रहे हैं कि अन्ना हजारे हों या बाबा रामदेव, किरण बेदी हो या अरविन्द केजरीवाल- एक के बाद एक सब दीवाली के पटाखों की तरह थोड़ी देर के लिए चमक पैदाकर बुझ जा रहे हैं; फिर भी यह जानने की ईमानदार कोशिश कहीं भी दिखाई नहीं देती कि ऐसे तमाम लोगों ने पृथक या संयुक्त रूप से जो भी आन्दोलन चलाए उनका असली मकसद क्या था।

अभी फिर इटली की सरकारी कंपनी फिनमैकानिका से हेलीकाप्टर खरीदने को लेकर भ्रष्टाचार की एक नई कहानी सामने आई है। फर्क सिर्फ इतना है कि भ्रष्टाचार के इस कथित प्रकरण का रहस्योद्धाटन और उस पर कानूनी कार्रवाई इटली में शुरु हुई न कि भारत में। अब उसे लेकर अपने देश में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है और तरह-तरह की बातें कही जा रही हैं। भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस पर उंगली उठाने में जरा भी वक्त नहीं गंवाया और लगे हाथ कांग्रेस अध्यक्ष की ओर भी संदेह की सुई घुमा दी।  दूसरी ओर कांग्रेस ने वाजपेयी सरकार को कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है कि अगर कहीं कोई गड़बड़ी हुई भी है तो वह एनडीए के कार्यकाल में हुई थी। यूपीए सरकार ने अपनी ओर से त्वरित कार्रवाई करते हुए सौदे पर जांच चलने तक रोक लगा दी है और सीबीआई को जांच भी सौंप दी है।

यह निश्चित है कि आरोप-प्रत्यारोप का यह सिलसिला जल्दी नहीं रुकेगा और आने वाले दिनों में इस प्रकरण को लेकर हमें नई-नई कहानियां सुनने को मिलेंगी। आम जनता को उन किस्सों को पढ़ने में चाहे जितना रस मिले और चर्चा करने के लिए चाहे जितना मसाला, लेकिन एक बार फिर कोई नहीं पूछेगा कि इसमें सच क्या है और झूठ क्या है, और न इस बुनियादी मुद्दे की ओर किसी का ध्यान जाएगा कि अपुष्ट और अप्रामाणिक चर्चाओं के कारण देश के प्रशासनतंत्र में किस तरह से अनचाही शिथिलता और गिरावट घर कर सकती है, और न इस बात पर कि इस तरह से निर्दोष व्यक्तियों का भी चरित्र हनन और जीवन नष्ट हो सकता है।

इस बात को हमें समझना चाहिए कि सैन्य उपकरणों की खरीदारी एक समयसाध्य, व्ययसाध्य एवं अत्यंत जटिल प्रक्रिया है। इसमें अरबों-खरबों के सौदे होते हैं और एक-एक सौदा पूरा करने में दस-दस साल लग जाते हैं। इसका मतलब है कि सैन्य साजो-सामान की खरीद-फरोख्त अथवा उत्पादन के लिए एक दीर्घकालीन प्रक्रिया अपनाने की जरूरत होती है। उसमें अगर बीच में कोई बाधा आ जाए तो जो समय और साधन लगे वे तो गए ही गए; नए सिरे से फिर उतना समय व साधन लगाने की जरूरत होती है। दूसरे शब्दों में देश अपनी प्रतिरक्षा की तैयारियों में पांच-दस साल पीछे ढकेल दिया जाता है। ऐसा होने देने में किसकी रुचि हो सकती है यह सवाल उठाना लाजिमी है। एक तो हमारे दुश्मन कभी नहीं चाहेंगे कि भारत की प्रतिरक्षा अभेद्य हो, दूसरे इसमें उन लोगों की भी रुचि हो सकती है, जो भारत को अपना मुवक्किल राय बनाना चाहते हैं।

इस बारे में यह भी याद कर लेना ठीक होगा कि रक्षा सौदों में कमीशन दिए जाने का चलन दुनिया के हर देश में है। इसकी वैधता या अवैधता, नैतिकता या अनैतिकता की चर्चा करने का अधिकारी वही हो सकता है, जो प्रतिरक्षा मामलों की जटिलताओं को बखूबी जानता हो। हम इतना कह सकते हैं कि अगर अरबों-खरबों के इन सौदों में राजनीतिक दलों अथवा व्यक्तियों को चंदा दिया जा रहा है तो वह विश्व के हर देश की राजनीतिक प्रणाली का एक अनिवार्य अंग है तथा भारत भी उससे अलग नहीं है। राजतंत्र अथवा सैन्यतंत्र में ऐसा चंदा या घूस सीधे एक व्यक्ति के खाते में जमा होती है, लेकिन लोकतंत्र में इस तरह से लिया गया पैसा चुनाव लड़ने के समय काम आता है। गठबंधन की राजनीति को चलाने में इसकी जरूरत कुछ ज्यादा ही पड़ती है! यह अटल सत्य है कि कोई भी राजनीतिक दल इससे मुक्त नहीं है। 

यह भी समझना आवश्यक है कि रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार के मामले कब, क्यों और कैसे उजागर होते हैं। इतना तो तय है कि न तो रिश्वत देने वाला इस बारे में अपनी जबान खोलेगा और न लेने वाला। अपवाद स्वरूप कोई एकाध व्यक्ति ऐसा हो सकता है, जिसे इस तरह का लेनदेन नागवार गुजरता है, लेकिन जिस ऊंचे स्तर पर यह प्रक्रिया चलती है वहां बैठे हुए साधु प्रवृत्ति के लोग भी यह जानते ही हैं कि चुप रहने में समझदारी है। तब फिर कौन है जो इन सौदों को उजागर करता है? जाहिर है कि सैन्य सामग्री बनाने वाली जिन कम्पनियों के टेंडर अस्वीकार हो जाते हैं, जिनका भारी मुनाफा कमाने का अवसर हाथ से निकल जाता है, वे ही जमीन-आसमान एक कर सबूत जुटाती हैं और फिर सुर्खियों के लिए बेताब मीडिया को यह सामग्री परोस देती हैं। याने सवाल इस बात का नहीं है कि भ्रष्टाचार हुआ या नहीं, बल्कि इस बात का है कि एक कंपनी को मौका मिल गया और दूसरी को नहीं। यह एक आदर्श स्थिति तो नहीं है लेकिन एक व्यवहारिक सच्चाई है एवं इसे वस्तुगत रूप से समझने की आवश्यकता है

देशबंधु में 21 फरवरी 2013 को प्रकाशित 

Thursday, 14 February 2013

अफजल गुरु को फांसी के निहितार्थ






13
 दिसम्बर 2001 को भारत की संसद पर आतंकवादी हमला हुआ। यह देश की सार्वभौमिकता और संविधान को चुनौती देने वाला  एक कल्पनातीत दुस्साहस और भीषणतम अपराध था। जिन्होंने यह साजिश रची और अपराध को अंजाम दिया उन्हें कठोरतम सजा मिलना ही चाहिए थी। अदालती कार्रवाई के हर चरण पर इस अपराध की गंभीरता का संज्ञान लिया गया और उसी के अनुसार फैसला भी सुनाया गया। राष्ट्रपति द्वारा अफजल गुरु की प्राणदान की याचिका को खारिज करना न्यायिक प्रक्रिया का अंतिम बिन्दु था। जो सुरक्षाकर्मी इस आतंकी हमले के दौरान शहीद हुए उनके परिजन अफजल गुरु को फांसी दिए जाने से इसलिए संतुष्ट हैं कि उनके पिता या पति की शहादत का सम्मान हुआ है। हमले में तीन आतंकियों को मार गिराने वाले सुरक्षाकर्मी संतोष कुमार का मानना है कि इससे सुरक्षा बलों का मनोबल कायम रहेगा।

देश में अधिकतर लोगों ने फांसी दिए जाने पर स्वागत किया है। काश्मीर घाटी में अभी (कॉलम लिखे जाने तक) कर्फ्यू और सेंसर लागू है इसलिए वहां जनसामान्य में जो प्रतिक्रिया हुई है वह सामने नहीं आई है, लेकिन देश के बाकी हिस्सों में सामान्य तौर पर संतोष ही प्रकट किया गया है।  नोट करने लायक है कि आम जनता ने फांसी दिए जाने को इस निर्विकार भाव से ही लिया है कि अंतत: पटाक्षेप हो गया। जो शक्तियां राजनीतिक लाभ उठाने की दृष्टि से फांसी देने की मांग चिल्ला-चिल्लाकर कर रही थीं उन्हें जनता की संयत प्रक्रिया से शायद कुछ निराशा ही हुई हो। एक अल्पमत उनका है जो मानते हैं कि अफजल गुरु के प्रकरण में न्याय प्रक्रिया के पालन में कमी थी और उसे सुनवाई का एक अंतिम मौका और मिलना चाहिए था।

उल्लेखनीय है कि राजीव गांधी हत्या प्रकरण में जिन तीन लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई वे राष्ट्रपति से याचिका खारिज होने के बाद फिर अदालत में गए और मद्रास उच्च न्यायालय ने इस तर्क के आधार पर उनकी फांसी पर रोक लगा दी कि फांसी सुनाए जाने के इतने लंबे अरसे बाद याचिका खारिज करना न्यायोचित नहीं था। जब यह तर्क 1991 के आरोपियों के लिए लागू हो सकता है तो 2001 के आरोपी को भी अपने प्राण बचाने के लिए यह अवसर दिया जाना संभवत: न्यायोचित ही होता! इस बारे में दूसरा तर्क यह भी दिया गया कि पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के आरोपी सिख आतंकवादियों की प्राणदान याचिका पर अब तक विचार क्यों नहीं किया गया।

अफजल गुरु को फांसी देने पर इस तरह कुछेक न्यायविदों ने अपनी असहमति न्याय संहिता से दृष्टांत देते हुए व्यक्त की। इनके अलावा एक खासी संख्या में उन व्यक्तियों की भी है जो सैध्दांतिक आधार पर एक लंबे समय से मृत्युदंड का प्रावधान ही खत्म करने की मुहिम चलाए हुए हैं। विश्व के अनेक देशों में सजा-ए-मौत को कानून की किताब से हटा दिया गया है। यह उम्मीद की जाती थी कि भारत भी जल्द ऐसा करेगा, लेकिन फिलहाल भारत ने इस उम्मीद पर पानी फेर दिया है। तीन-चार महीने के अंतराल में दो फांसियां दी जा चुकी हैं और इसी तरह के भीषण अपराधों के अनेक दोषी काल-कोठरी में अपनी बारी आने का इंतजार कर रहे हैं। राजीव गांधी हत्याकांड के अपराधी हों या पंजाब के भुल्लर या रजौना। इनकी जिंदगी बचने की अब कोई उम्मीद नहीं लगती याने आने वाले दिनों में देश को कुछ और लोगों को फांसी पर लटकाए जाने की घटनाओं से रूबरू  होना पड़ सकता है। भारतीय समाज पर इसका क्या मनोवैज्ञानिक असर पड़ेगा एवं विश्व समाज में भारत की क्या छवि बनेगी, यह कल्पना करने से ही डर लगता है।

यह तथ्य ध्यान में रखना जरूरी है कि फांसी की सजा को आजन्म कारावास में बदल देने का अर्थ यह नहीं होता कि कैदी चौदह साल या बीस साल बाद जेल से छोड़ दिया जाएगा। इसके विपरीत उसे आखिरी सांस तक एक-एक पल काल कोठरी में बिताना होगा याने उसने जो जघन्य अपराध किया है उसका अहसास उसे पल-पल होते रहेगा। दूसरे न्याय प्रणाली में यह छोटी सी गुंजाइश हमेशा बनी रहती है कि किसी को गलत तरीके से सजा दे दी गई हो। अगर मृत्युदंड का अपराधी आगे चलकर कभी निर्दोष साबित हुआ तो उसके प्राण कैसे लौटाए जाएंगे? इसीलिए पिछले साल जुलाई में 14 सेवानिवृत्त जजों ने उदाहरण देते हुए अपील जारी की थी कि मृत्युदंड क्यों समाप्त कर देना चाहिए। इस अपील की अनदेखी कर दी गई। हमारा समाज आज भी मृत्युदंड समाप्त करने के पक्ष में नजर नहीं आता; फिर भी चूंकि मनुष्य जीवन से बहुमूल्य दुनिया में कुछ भी नहीं है इसलिए इस बारे में समाज को आज नहीं तो कल गंभीरतापूर्वक विचार करना ही पड़ेगा।

अफजल गुरु को फांसी देने के राजनीतिक निहितार्थ खोजे जा रहे हैं। कोई यह कह रहा है कि बजट सत्र ठीक से चल जाए इसलिए यह किया गया, तो कोई भाजपा की हवा निकलने की बात कह रहा है, तो तीसरा कोई इसे सुशील कुमार शिन्दे की छवि सुधारने के रूप में देख रहा है। कुछेक ने तो भविष्यवाणी ही कर दी कि कांग्रेस समय पूर्व लोकसभा चुनाव करवाने जा रही है। राजनीति के गलियारों में ऐसी सच्ची-झूठी बातें उड़ाना कोई नई बात नहीं है, लेकिन यदि मान भी लें कि कांग्रेस ने राजनीतिक लाभ उठाने की दृष्टि से फांसी देने के लिए यह वक्त चुना तो व्यवहारिक राजनीति के धरातल पर इसमें गलत क्या है? आखिरकार भाजपा उठते-बैठते अफजल गुरु को फांसी देने की मांग कांग्रेस को असुविधा में डालने और खुद को देशभक्त सिध्द करने के लिए ही न कर रही थी! इसीलिए तो नेशनल कांफ्रेंस के सांसद महबूब बेग ने सीधे-सीधे सवाल उठाया कि भाजपा ने पंजाब व तमिलनाडु के आतंकी हत्यारों को फांसी देने की मांग क्यों नहीं उठाई। प्रश्न यह भी उठता है कि भाजपा अकाली दल के साथ गठबंधन से बाहर क्यों नहीं आ जाती। जाहिर है कि तत्काल लाभ लेने में भाजपा कांग्रेस से आगे ही है।

देश में आम चुनाव समय पूर्व होंगे या समय पर कांग्रेस को इसका क्या लाभ मिलेगा  इत्यादि प्रश्नों का उत्तर तो समय आने पर मिल जाएगा, लेकिन भाजपा और हिन्दुत्व के ठेकेदारों को खासकर इस बारे में गंभीरतापूर्वक आत्मचिंतन करने की जरूरत है कि शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में महाराजा हरिसिंह की इच्छा के विपरीत काश्मीर की जिस जनता ने भारत में विलय स्वीकार किया था आज वही काश्मीर भारत से इतना दूर क्यों चला गया है? प्रजा परिषद के जमाने से चली आ रही साम्प्रदायिक राजनीति क्या इसके लिए जिम्मेदार नहीं है? अगर आप समझते हैं कि काश्मीर भारत का अभिन्न अंग है तो वहां की जनता के साथ धर्म के आधार पर बना दोयम दर्जे का बर्ताव करना कहां तक उचित है और यदि आपको उन पर भरोसा नहीं है तो सैन्य बल से आप उनको कब तक दबाकर रख पाएंगे? क्या आप इस कड़वे सच को सुनने के लिए तैयार हैं?

देशबंधु में 14 फरवरी 2013 को प्रकाशित 

Thursday, 7 February 2013

वेलेंटाइन डे के लिए कुछ विचार





आज
 जब यह कॉलम छपेगा तब वेलेंटाइन डे लिए ठीक एक सप्ताह बाकी बचेगा। यह रोचक संयोग है कि  इस वर्ष वेलेंटाइन डे  और बसंत पंचमी दोनो पर्व एक साथ पड़ रहे हैं। जो ''भारत कुमार'' मानते हैं कि पूरब और पश्चिम का कभी मेल नहीं हो सकता, उन्हें कुछ तकलीफ हो सकती है कि बसंत पंचमी को इसी दिन क्यों पड़ना था? वैसे उनके लिए तसल्ली की बात यह हो सकती है कि इस दिन बहुत से नौजवान या तो किसी बारात की  तैयारी कर रहे होंगे या फिर किसी बारात की अगवानी के इंतजाम में व्यस्त होंगे। याने ऐसे बहुत से युवा जिन्हें वेलेन्टाइन डे प्रिय है, कम से कम इस साल वे तो इस आयातित पर्व से बचे रहेंगे। 
 
वेलेन्टाइन डे की उत्पत्ति क्यों और कैसे हुई, इस दिन मित्रों या सखियों को गुलाब का फूल भेंट करने का तरीका किसने ईजाद किया, यह दिन भारतीय संस्कारों के अनूकूल है या प्रतिकूल- ऐसे तमाम सवाल खडे क़रने वाले अनेक लोग हैं, लेकिन जिन्हें यह पर्व मनाना है, वे इन सवालों की परवाह नहीं करते। सच तो यह है कि इस दिन का भारतीयकरण प्रारंभ हो चुका है। इस मामले में भारतवासियों का कोई मुकाबला नहीं हैं। मदर्स डे, फादर्स डे इत्यादि कितने ही पश्चिमी पर्व हमारे देश में मनाए जाने लगे हैं और वही इस दिन के साथ भी हो रहा है। हिन्दी अखबारों में वेलेन्टाइन डे पर जो संदेश छपते हैं जरूरी नहीं कि वे किसी प्रेमी या प्रेमिका को ही संबोधित हों, बल्कि उनमें माता-पिता, भाई-बहन, शिक्षक, मित्र, पति-पत्नी सब आ जाते हैं। यह एक  सच्चाई हैं, जिसे जानकर धर्म के रक्षकों को संतोष हासिल करना चाहिए।  वे यदि ऐसा नहीं करते हैं तो उनके जड़बुध्दि होने में कोई संदेह बाकी नहीं रहता।

भारत में अंग्रेजीदां बुध्दिजीवियों का एक अच्छा खासा वर्ग है जो वेलेन्टाइन डे के बारे में उठाई गई आपत्तियों को अपनी तरह से खारिज करने की कोशिश करता है। इस वर्ग के प्रवक्ता भारत के क्लासिक साहित्य, चित्रकला, मंदिर-शिल्प आदि से उदाहारण खोज कर लाते हैं और सिध्द करने का प्रयत्न करते हैं कि प्रेम का यह पर्व भारतीय परंपरा के विरुध्द नहीं है। वे नाहक अपने दिमाग को तकलीफ देते हैं। प्रेम किसी भी रूप में हो समयसिध्द है एवं उसके लिए बौध्दिक बहसों की इतनी जरूरत नहीं पड़ना चाहिए, किन्तु हमारे मन में यहां एक शंका उपजती है। यूं तो  मनुष्य की जीवनचर्या में  बाजार का स्थान आरंभ  से ही रहा है, लेकिन इधर सौ साल में यह दखल कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। इसलिए लगता है कि वेलेन्टाइन डे को स्थापित करने के तर्कों  के पीछे कहीं न कहीं बाजार की शक्तियां काम कर रही हैं!

यह कोई नई बात नहीं है। क्रिसमस पर सांताक्लाज का रोल भी कोकाकोला कंपनी की ईजाद है। इसी तरह हम जिन त्यौहारों को भारतीय परंपरा का अंग मानते हैं उनमें भी बाजार का कुछ न कुछ हस्तक्षेप रहा ही है। हमारे प्रमुख त्योहारों का सीधा संबंध फसल कट कर बिकने के बाद किसानों के हाथ में आई रकम से है। बाजार ताकते रहता है कि इधर घर में पैसा आए और उधर वह धावा बोले। दीपावली इसका सबसे बड़ा उदाहारण है। यहीं नहीं, जितने तीर्थ हैं वे भी बाजार के भरोसे चलते हैं और ऐसा कौन सा मेला है जिसमें दुकानें न सजती हों! प्रेमचंद की कहानी ईदगाह याद कीजिए। जिन बच्चों के पास पैसे हैं वे मेले में मनचाहे खिलौने खरीद रहे हैं और उनके सामने गरीब दादी की आंख का तारा हमीद है जो हाथ में महज तीन पैसे लिए हमजोलियों की खरीदारी को हसरत भरी निगाह से देखता रहता है। 

यह भी देखिए कि त्यौहार मनाने में बाजार ने ग्रीटिंग्स कार्ड के माध्यम से क्या भूमिका निभाई है। दीवाली और नववर्ष पर तो ग्रीटिंग्स कार्ड भेजने का चलन लंबे समय से चला आ रहा है। इसके अलावा और भी बहुत से अवसर हैं जैसे जन्मदिन, विवाह की वर्षगांठ आदि जब ये शुभकामना पत्र भेजे जाते हैं। इसमें आर्ची और हॉलमार्क जैसे कार्ड निर्माताओं की भूमिका प्रेरक की रही है। वेलेन्टाइन डे को लोकप्रिय बनाने का प्रथम श्रेय भी इन्हीं को दिया जाना चाहिए, लेकिन समय बदला तो कार्डों का चलन कम हो गया  उनकी जगह एसएमएस ने ले ली। इससे डाकघर को भले ही नुकसान हुआ हो, मोबाइल फोन कंपनियों की तो चांदी हो गई। जो एसएमएस पर शुभकामनाएं भेजते हैं वे भले ही इससे आनंदित होते हैं, लेकिन इन संदेशों को पढ़ना और उनका उत्तर देना खासी मशक्कत का काम हो जाता है। 

इस तरह देखें तो वेलेन्टाइन डे मनाना न तो कोई अनहोनी है और न अवांछित। अगर युवा जगत अपने मनोभावों को व्यक्त करने के लिए उन्मुक्ति के कुछ क्षण पा लेते हैं तो इसमें इतनी हाय तौबा मचाने की कोई जरूरत नहीं होना चाहिए थी। लेकिन मुश्किल यह है कि भारतीय समाज न तो पुरानी रूढ़ियों को पूरी तरह तोड़ पा रहा है और न जमाने के साथ कदम मिलाकर चलने के लिए पूरी तरह साहस जुटा पा रहा है। इसे यूं भी कहा जा सक ता है कि हमारा समाज विगलित सामंती मानसिकता से प्राप्त विशेषाधिकारों का त्याग किए बिना पूंजीवादी औद्योगिक व्यवस्था के सारे लाभ हथिया लेना चाहता है याने दोनों हाथ चाशनी में और सिर कढ़ाही में। यहां समाज से हमारा आशय उस प्रभुत्वशाली वर्ग से है, जो समाज के बाकी अंगों को लंबे समय से दबाकर रखते आया है। इसकी मानसिकता लगभग निरपवाद ही पुरुषवादी है और इसके सदस्य वही हैं जो हर तरह से अधिकार सम्पन्न हैं।

वेलेन्टाइन डे का विरोध, नववर्ष का विरोध; इसके बरक्स सड़ी-गली मान्यताओं को पुनर्जीवित करने के उपक्रम- ये सभी काम स्वस्फूर्त नहीं, बल्कि किसी सोची-समझी योजना के अंतर्गत होते हैं। इन्हें डर लगता है कि जनतांत्रिक, समतापूर्ण, खुले वातावरण में इनकी दादागिरी समाप्त हो जाएगी। इसी भय से संचालित होकर ये अपनी योजनाएं गढ़ते हैं। इस मानसिकता को मजबूत करने में धर्म का पाखंड काफी काम आता है। ये जो नए-नए अवतारी पुरुष एक के बाद एक प्रकट हो रहे हैं वे इस योजना की ही उपज हैं। इनके प्रवचन पहली बार में तो लुभाते हैं, लेकिन तह में एकाध इंच भी भीतर जाएं तो पता चलता है कि ये वर्चस्ववाद को ही पुख्ता करने का काम कर रहे हैं। इसीलिए आसाराम बापू जैसे लोग सामने आते हैं जो अपने एक बयान से मचे बवाल के बाद भी अपनी भाषा पर संयम नहीं रख पाते और कुछ ही दिन बाद जबलपुर में अपने दूसरे प्रवचन में सवाल उठाने वाली युवतियों को 'मनचली' की संज्ञा दे देते हैं। ऐसे ही उद्गार अन्य कथित साधु-संतों से सुनने मिलते हैं।

राजसत्ता व संगठित धर्म का यह जो गठजोड़ है वह जानता है कि सिर्फ प्रचवनों से बात नहीं बनती इसलिए वह लुम्पेन युवाओं के दस्ते तैयार करता है और उन्हें सड़कों पर निकलकर उत्पात मचाने के लिए छोड़ देता है। यह आज के भारत की एक बड़ी विडम्बना है कि जिनका अपना आचरण अनैतिक है वे ही पोंगापंथी नैतिकता का पालन करवाने के लिए बाहुबल  का प्रयोग करने में भी नहीं हिचकते।  लेकिन जैसा कि हम समझते हैं देश की युवा पीढ़ी इस पाखंड को खूब समझती है और जरूरत पड़ने पर वही इसका माकूल उत्तर देगी।

देशबंधु में 7 फरवरी 2013 को प्रकाशित 

 

Wednesday, 30 January 2013

राजनाथ की चुनौतियाँ



भारतीय जनता पार्टी के हक़ में यह अच्छा ही हुआ कि नितिन गडकरी दुबारा पार्टी अध्यक्ष नहीं बन पाए। अगर तटस्थ भाव से विवेचन किया जाए तो श्री गडकरी इस महत्वपूर्ण पद के लिए कभी भी योग्य प्रत्याशी नहीं थे। वे विदर्भ में पार्टी के एक स्थानीय नेता मात्र थे। शिवसेना-भाजपा गठबंधन सरकार में लोक निर्माण मंत्री रहते हुए उन्होंने फ्लाईओवर जैसी खर्चीली व महत्वाकांक्षी योजनाएं हाथ में लेकर शहरी मध्यवर्ग की प्रशंसा बटोरने में अवश्य सफलता हासिल की थी तथा इसी कारण से व्यापारियों एवं ठेकेदारों के एक वर्ग विशेष का समर्थन हासिल कर लिया था। उनकी नेतृत्व क्षमता पर यदि किसी को थोड़ा विश्वास भी था तो वह स्वयं उन्होंने उस वक्त तोड़ दिया जब उन्होंने आयकर अधिकारियों को भाजपा राज आने पर देख लेने की धमकी दे डाली। यह तो ज्ञात है ही कि उनके ऊपर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शीर्ष नेतृत्व का वरदहस्त भी था। उन्हें ऐसे समय पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया था जब लालकृष्ण अडवानी जैसे वरिष्ठ नेता पर भी संघ शंका करने लगा था और उसे पार्टी में अन्य कोई विश्वसनीय व्यक्ति नज़र नहीं आ रहा था। संघ नेतृत्व की यह सीमा ही कहना चाहिए कि वह अक्सर राजनीतिक आदर्श व व्यावहारिक राजनीति के बीच के अंतर को समझ नहीं पाता। इस कारण से अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल में संघ उनसे कभी पूरी तरह खुश नहीं रहा। 

बहरहाल गडकरी की विदाई के बाद राजनाथ सिंह के हाथों एक बार फिर पार्टी की कमान सौंप दी गई है। श्री सिंह राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं, देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और वर्तमान में उत्तरप्रदेश की ही गाजियाबाद जैसी  शहरी सीट से लोकसभा के सदस्य हैं। अडवानी-वाजपेयी-जोशी के बाद एक तरह से वे भाजपा के सर्वाधिक वरिष्ठ नेता हैं। इस लिहाज से वे अध्यक्ष पद के लिए एक बेहतर उम्मीदवार थे  इसी लिए   जब उनका नाम सामने किया गया तो इस पद की उम्मीद लगाए बैठे अन्य प्रत्याशियों ने अपनी दावेदारी बिना ना-नुकुर के छोड़ दी। श्री सिंह आयु, अनुभव और पार्टी आदर्शों के प्रति प्रतिबध्दता के पैमानों पर खरे उतरते हैं, लेकिन अपने दूसरे कार्यकाल में उन्हें कुछ पुरानी एवं कुछ नई चुनौतियों से जूझना पड़ेगा। इसमें वे कहां तक सफल हो पाएंगे इसका अंदाज लगा पाना फिलहाल मुश्किल है। 

श्री सिंह जब 2005 में पहली बार भाजपा के अध्यक्ष बने थे तब मेरी दृष्टि में उनकी सबसे बड़ी कमजोरी अंतरराष्ट्रीय राजनीति एवं विदेश नीति की सीमित जानकारी की थी। विगत चार वर्षों में संसद सदस्य रहते हुए वे इस सीमा को तोड़ पाए हैं या नहीं, यह हम नहीं जान पाए हैं। ऐसे समय जब भारतीय जनता पार्टी 2014 में अपनी सरकार बनाने का सिर्फ सपना ही नहीं देख रही है, बल्कि दावा भी ठोक रही है तब पार्टी प्रमुख से यह अपेक्षा करना स्वाभाविक है कि वह वैश्वीकरण के इस दौर की राजनीतिक बुनावट से भली-भांति परिचित हो। यह भी ध्यान देने योग्य है कि 2005 के मुकाबले आज वैश्विक अर्थव्यवस्था राजनीति पर कहीं ज्यादा हावी हो चुकी है। यह कहना ज्यादा सटीक होगा कि आज अंतरराष्ट्रीय धरातल पर राजनीति और अर्थनीति दोनों एकाकार हो चुके हैं। प्रश्न उठता है कि क्या राजनाथ सिंह इस चुनौती का सामना कर पाएंगे।

भाजपा के नए अध्यक्ष के सामने एक नई चुनौती युवा पीढ़ी का विश्वास जीतने की है। उन्हें यह सिध्द करना होगा कि वे अपने वक्तव्यों और कार्यक्रमों से युवा मतदाताओं को लुभा सकते हैं। इसके लिए उन्हें पार्टी की पारंपरिक रीति-नीति में आमूल-चूल बदलाव लाने की जरूरत होगी। यह हम देख रहे हैं कि आज नई पीढ़ी के सामने कोई आदर्श, कोई आईकॉन नहीं है। उसकी राजनीतिक समझ भी तात्कालिक भावनाओं से संचालित होती है, क्योंकि युवा पीढ़ी की राजनैतिक समझ विकसित करने के दायित्व से सभी पार्टियों ने हाथ धो लिए हैं। यह पीढ़ी नई तकनीकी, नए औजारों और नए संसाधनों से व्यवस्था को बदल डालने का स्वप्न देख रही है। इसको आप कैसे समझाएंगे कि भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस के मुकाबले न सिर्फ एक बेहतर विकल्प है, बल्कि यह भी कि उसमें युवजनों की आशाओं, आकांक्षाओं को फलीभूत करने की सामर्थ्य है!

राजनाथ सिंह के सामने एक और नई चुनौती नरेन्द्र मोदी के रूप में सामने है। यह सबको पता है कि भाजपा का पितृसंगठन याने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ मोदी को कोई खास पसंद नहीं करता है। पार्टी में भी जो लोग शीर्ष स्थानों पर बैठे हैं वे भी मोदी को प्रधानमंत्री बनते नहीं देखना चाहते। एक अरुण जेटली ही हैं जिनके बारे में अनुमान होता है कि उन्होंने नरेन्द्र मोदी के साथ तालमेल बना रखा है, वह भी शायद इसलिए कि जेटली गुजरात सेराज्यसभा सदस्य हैं। अन्यथा सुषमा स्वराज, यशवन्त सिन्हा, जसवंत सिंह - इनमें से प्रत्येक संगठन में वरिष्ठता और सरकार चलाने का अनुभव इन दोनों आधारों पर प्रधानमंत्री पद के अभिलाषी है, लेकिन यह ऐसा मामला नहीं है जिसका निपटारा पार्टी के भीतर हो जाए। कारपोरेट भारत ने तो नरेन्द्र मोदी पर दांव लगाया हुआ है। इसलिए आज गडकरी के हटने से जो खुश हैं, कल उन्हें इस प्रश्न से जूझना होगा कि श्री मोदी को गुजरात में ही कैसे बांधकर रखा जाए। 

इस पृष्ठभूमि के मद्देनजर एक और अहम् सवाल उभरता है कि क्या भारतीय जनता पार्टी आगामी लोकसभा चुनाव के लिए तैयार है। पार्टी अध्यक्ष के रूप में राजनाथ सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका अवश्य होगी, लेकिन वह अपने आप में पर्याप्त नहीं है। भाजपा के सामने असली सवाल तो स्वयं को नए सांचे में ढालने का है। जैसा कि हम जानते हैं कांग्रेस और भाजपा की आर्थिक नीतियों में अब कोई ज्यादा मतभिन्नता नहीं है। संघ परिवार के पुराने निष्ठावान लोग भले ही स्वदेशी की बात करते रहें, भाजपा की व्यापक सोच में उसके लिए कोई स्थान नहीं है। अब जो फर्क कांग्रेस व भाजपा में है वह मुख्यत: धर्मनिरपेक्षता बनाम सांप्रदायिकता का है। इस मुद्दे पर भाजपा को संघ के निर्देशों पर ही चलना होता है। 

पिछले एक दशक के दौरान अनेक राजनैतिक अध्येताओं ने यह उम्मीद जाहिर की है कि भाजपा संकीर्णता का परित्याग कर एक समावेशी पार्टी बन जाएगी, लेकिन यह उम्मीद निकट भविष्य में तो पूरी होती नार नहीं आती। अटल बिहारी वाजपेयी के क्षेत्रसन्यास के बाद पार्टी में ऐसा कोई नेता नहीं है जो संघ परिवार की रूढ़िवादी सोच को चुनौती दे पार्टी को आगे ले जाने के लिए एक नया रास्ता तलाश कर सके। हमें यहां 1959 में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी द्वारा स्थापित स्वतंत्र पार्टी का ध्यान आता है। उन दिनों जब कांग्रेस समाजवाद की बात कर रही थी तब स्वतंत्र पार्टी उन्मुक्त पूंजीवाद के प्रवक्ता के रूप में उभरी थी, लेकिन उसमें धार्मिक संकीर्णता के लिए जगह नहीं थी। इसी की बदौलत 1962 के आम चुनाव में स्वतंत्र पार्टी संसद में दूसरे सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी। यदि भाजपा चाहे तो देश के संसदीय इतिहास के इस अध्याय से आज कुछ प्रेरणा ले सकती है, अन्यथा भावना की राजनीति करते रहने से वह आज जहां है, उससे आगे नहीं जा पाएगी।
 
देशबंधु में 31 जनवरी 2013 को प्रकाशित 

Wednesday, 23 January 2013

राहुल गांधी : बदलाव की अपेक्षा





राहुल गांधी औपचारिक तौर पर कांग्रेस पार्टी के उपाध्यक्ष निर्वाचित कर लिए गए: इस घटना को कमतर आंकना भूल होगी। राहुल गांधी पहले से ही कांग्रेस के सांगठनिक ढांचे में दूसरे नंबर पर थे, 2014 के चुनाव में उनकी क्या भूमिका होगी, वे प्रधानमंत्री बन पाएंगे या नहीं, एक युवा पार्टी नेता के रूप में वे अब तक किस हद तक सफल रहे हैं- ऐसे तमाम मुद्दों पर भारतीय जनता पार्टी, पूंजीवादी मीडिया व लोहियावादी सोच से अनुप्राणित पत्रकारों आदि ने जो ढेरों टिप्पणियां की हैं, वे जल्दबाजी में की गई प्रतीत होती हैं। दरअसल, सवाल यह नहीं है कि अब तक राहुल गांधी का भारतीय राजनीति में क्या स्थान या योगदान रहा है, बल्कि यह कि उनके विधिवत उपाध्यक्ष बन जाने से किन बदलावों की अपेक्षा की जा सकती है। इसके बरक्स यह देखना भी मौजूँ होगा कि भारतीय जनता पार्टी में शीर्ष नेतृत्व को लेकर किस तरह से असमंजस बना हुआ है।

यह उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि आज का भारत एक युवा देश है। देश की जनसंख्या का लगभग आधा हिस्सा अठारह से तीस वर्ष के आयु समूह का है। इस नाते तय है कि 2014 के आम चुनावों में पहली बार वोट डालने वाले युवजन बहुत बड़ी संख्या में होंगे। इन नौजवानों की पहली पसंद कौन हो सकता है? मनमोहन सिंह अस्सी के हैं, सोनिया गांधी पैंसठ की। अडवानीजी अस्सी पार कर चुके हैं, सुषमा स्वराज आदि भी साठ के पेटे में हैं। प्रकाश और वृन्दा करात, सीताराम येचुरी, नवीन पटनायक, मुलायम सिंह, लालू प्रसाद यादव, नीतिश कुमार, जयललिता- ये सब भी या तो साठ पार कर चुके हैं या उसके आसपास हैं। एक ममता बनर्जी हैं जो अपेक्षाकृत युवा हैं। इन सबके मुकाबले बयालिस वर्ष के राहुल गांधी युवा मतदाता के लिए एक बेहतर पसंद हो सकते हैं।

इसी तर्क को आगे बढ़ाया जाए तो यह तथ्य भी सामने आता है कि कांग्रेस की युवतर पीढी में राहुल अकेले नहीं, उनका साथ देने के लिए सचिन पायलट, मीनाक्षी नटराजन, योतिरादित्य सिंधिया, जतिन प्रसाद, मिलिन्द देवड़ा, प्रिया दत्त जैसे अनेकानेक युवा सहयोगी हैं, जिन्होंने अपना-अपना प्रभा मंडल निर्मित करने में सफलता पाई है। इनके मुकाबले दूसरी पार्टियों में युवा पीढी क़हां है? भाजपा में प्रेमकुमार धूमल के बेटे अनुराग ठाकुर अथवा माकपा से निकाले गए प्रसेनजीत बसु जैसे कम्युनिस्ट- ऐसे कुछ नाम लिए जा सकते हैं, लेकिन उनका प्रभाव क्षेत्र फिलहाल सीमित ही दिखाई दे रहा है। जिन वरुण गांधी को भाजपा ने बहुत जोर-शोर से आगे बढ़ाया था, वे भी पिछले कुछ समय से हाशिए पर चले गए नजर आते हैं। समाजवादी पार्टी में अखिलेश यादव हैं, लेकिन मुख्यमंत्री बन जाने के बावजूद उनमें वह चमक दिखाई नहीं दी जो राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित कर सके।

राहुल गांधी को लेकर वंशवाद का मुद्दा बार-बार उठाया जाता रहा है: यह एक सच्चाई तो है, लेकिन इसे पूर्वाग्रह मुक्त होकर परखने की आवश्यकता है। ऐसा कोई भी एशियाई देश नहीं है जहां जनतांत्रिक राजनीति में वंश परम्परा से पूरी तरह मुक्ति पा ली गई हो। भारत में भी वामदलों के अलावा कोई ऐसा दल नहीं है, जिसने वंशवाद को प्रश्रय न दिया हो। अगर भाजपा कहती है कि उसके यहां साधारण कार्यकर्ता भी आगे बढ़ सकते हैं तो कांग्रेस में भी ऐसे नेताओं की कमी नहीं है। ए.के. एंटनी, मोतीलाल वोरा, अशोक गहलोत, वीरप्पा मोइली, किरण कुमार जैसे तमाम नेता आज भी हैं जिन्होंने अपनी कूवत से राजनीति में स्थान बनाया है। दूसरी ओर स्वयं को सामान्य कार्यकर्ताओं की पार्टी मानने वाली भाजपा में वसुंधरा राजे, अनुराग ठाकुर, दुष्यंत सिंह, मानवेन्द्र सिंह, यहां तक कि मेनका गांधी के नाम गिनाए जा सकते हैं, जिन्हें राजनीति में अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण वरीयता मिली। अन्य पार्टियों में भी यही हाल है। अत: इस बिन्दु पर टिप्पणी करना अपना खीज मिटाने से अधिक कुछ नहीं मानना चाहिए।

बहरहाल, राहुल गांधी के पार्टी उपाध्यक्ष बन जाने से एक बड़ी बात तो यह हुई है कि उनके बारे में जो अटकलबाजियां लगाई जा रही थीं, वे अब समाप्त हो जाएगी। राहुल ने यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि राजनीति भले ही जहर का प्याला हो, उसे पीने के लिए वे अपना मन दृढ़ कर चुके हैं। उनके इस निर्णय से कांग्रेस पार्टी में नए सिरे से उत्साह का संचार होना स्वाभाविक है। उम्मीद करना चाहिए कि वे यथाशीघ्र एक नई टीम भी बनाएंगे ताकि कांग्रेस सचमुच नए भारत की नई पीढ़ी की पार्टी बन सके। इस पीढ़ी की आशाएं, आकांक्षाएं पिछली पीढ़ी से बहुत अलग है तथा यह मानने में संकोच नहीं करना चाहिए कि राजनेताओं की पुरानी पीढ़ी नौजवान भारत के सपनों को समझने में बड़ी हद तक नाकाम ही रही है।

ऐसी उम्मीद राजीव गांधी के राजनीति में आने पर भी की गई थी, लेकिन दोनों के बीच एक बड़ा फर्क है। राजीव गांधी को सत्ता और संगठन दोनों स्तर पर जिस अनुभव और प्रशिक्षण की आवश्यकता थी, वह उन्हें बिलकुल नहीं मिला था और न ही उनके निकट मित्रों में ऐसा था जो राजनीतिक समझ का धनी रहा हो। अरुण नेहरू, अरुण सिंह, अमिताभ बच्चन इत्यादि राजनीति के लिए बिलकुल नए थे। इसीलिए राजीव गांधी से अपने तमाम नेक इरादों के बावजूद गलतियां हुईं जिसका खामियाजा 1989 की हार में उन्हें भुगतना पड़ा। इसके बाद उन्होंने विपक्ष में रहते हुए जो कुछ सीखा-समझा, उसके आधार पर दुबारा जीतने के बाद वे देश को नई दिशा देते, उसके पहले ही उनकी हत्या कर दी गई। इस लिहाज से राहुल गांधी बेहतर स्थिति में हैं। वे नौ साल से संसद सदस्य हैं, पार्टी में विभिन्न मोर्चों पर लगातार सक्रिय हैं और अपनी मां की तरह उन्हें भी सत्ता का मोह नहीं है। इस नाते उनमें पार्टी का सफल नेतृत्व करने के लिए आवश्यक गुण हैं। अपनी इन क्षमताओं का उपयोग वे कितना कर पाते हैं यह आने वाले दिनों में देखने को मिलेगा।

राहुल गांधी 2014 के चुनावों के बाद प्रधानमंत्री बन पाएंगे या नहीं, यह बहस अर्थहीन है। भाजपा में उनके सामने मुकाबले के लिए कौन होगा- नरेन्द्र मोदी या कोई और, यह भी बैठे-ठाले की बहस का ही विषय हो सकता है। यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि नरेन्द्र मोदी तो प्रधानमंत्री बनने का सपना देख ही रहे हैं व  देशी-विदेशी कारपोरेट घराने उनके समर्थन में थैलियों का मुंह खोले बैठे हुए हैं। किंतु राहुल गांधी से मुकाबला होने से पहले उन्हें पार्टी के भीतर अपना वर्चस्व सिध्द करना होगा। संघ प्रमुख न जाने क्यों, नितिन गडकरी को ही दोबारा भाजपा अध्यक्ष बनाने पर अड़े हैं। क्या इसलिए कि वे गडकरी को लाल किले की प्राचीर से भाषण देते सुनना चाहते हैं! खैर! भाजपा में जो भी हो, कांग्रेस में यह कहां जरूरी है कि राहुल ही प्रधानमंत्री बनेंगे! अगर सोनिया गांधी के अध्यक्षकाल में मनमोहन सिंह दस साल प्रधानमंत्री रह सकते हैं तो राहुल गांधी भी तो स्वयं को पार्टी तक सीमित रख सरकार चलाने का जिम्मा ए.के. एंटनी, सुशील कुमार शिंदे या अन्य किसी को दे सकते हैं। 

मेरा प्रारंभ से मानना रहा है कि राहुल गांधी को पार्टी अथवा सरकार में बड़ी जिम्मेदारी निभाने के लिए आगे आना चाहिए। मेरा तर्क है कि ऐसा करने से पार्टी की विचार प्रक्रिया और कार्यप्रणाली में एक जरूरी स्पष्टता आएगी। इसी सोच के अनुसार मैं राहुल गांधी के कांग्रेस उपाध्यक्ष बनने का स्वागत करता हूं।

 देशबंधु में 24 जनवरी 2013 को प्रकाशित 

Wednesday, 16 January 2013

स्त्री सुरक्षा और सम्मान : कुछ सुझाव



जब भावनाएं उफान पर हों तब सहज बुद्धि और तर्क किनारे धरे रह जाते हैं। जब भावनाएं खुद होकर उमड़ती हैं तब उनमें आगे का रास्ता बना लेने की क्षमता भी अन्तर्निहित होती है, लेकिन जहां उफान का स्रोत बाहरी हो तब बहाव के बीच भंवर पैदा होने का खतरा भी विद्यमान होता है। दिल्ली के सामूहिक बलात्कार कांड की प्रतिक्रिया में जो वातावरण बना उसमें ऐसी ही कुछ स्थिति देखने में आई। यदि इस पाशविक अपराध की खबर मिलने के बाद दिल्ली के युवा अपने गुस्से का इजहार करने के लिए खुद-ब-खुद सड़कों पर उतर आए तो छद्म विद्रोहियों व देश को दुर्दशा से उबारने का संकल्प लिए बैठे पेशेवर समूहों ने उस जायज गुस्से को एक तमाशे में तब्दील करने में कोई देरी नहीं की।
बहरहाल अब पूरे देश में इस त्रासद वाकये को लेकर जो क्रोध है वह लोगों के हृदय में भीतर ही भीतर भले ही सुलग रहा हो, उसके साथ-साथ एक संकल्प भी सामूहिक रूप से बन रहा है कि दुबारा ऐसा न हो इसके लिए विवेकपूर्ण ढंग से सारी स्थितियों पर विचार करके आगे का रास्ता तलाशा जाए। इस बीच में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, पंजाब, पश्चिम बंगाल व अन्य प्रदेश में भी बलात्कार व स्त्रियों पर हो रहे अन्य अत्याचारों की जो खबरें सामने आई हैं उन्होंने भी जनसंकल्प को दृढ़ करने का काम किया है। यह तथ्य भी अब सबकी नजर में है कि स्त्रियों के प्रति हो रहे अपराधों के लिए यदि न्याय व्यवस्था की एजेंसियां बड़ी हद तक जिम्मेदार हैं तो देश की रूढि़वादी सामाजिक व्यवस्था और इसके अलावा अर्थनीति का कारपोरेटीकरण भी उतने ही जिम्मेदार हैं।
इस पृष्ठभूमि में हम विचार कर सकते हैं कि ऐसे कौन से कदम उठाए जाएं जिनसे भारत में स्त्रियों का सम्मान व गरिमा सुनिश्चित की जा सके। न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा कमेटी के सामने इस बीच सैकड़ों सुझाव विभिन्न व्यक्तियों, दलों  व समूहों द्वारा पेश किए गए हैं। उनके आधार पर निश्चित ही कुछ ठोस कदम उठाने की पहल आने वाले दिनों में होगी, किंतु जितना मैं देख सका हूं उससे लगता है कि वर्मा कमेटी के सामने रखे गए ज्यादातर सुझाव कानून व्यवस्था से संबंधित है तथा अन्य पहलू काफी हद तक अलक्षित रह गए हैं। अनेक समाज विज्ञानियों व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने दूसरे पहलुओं पर अपने विचार प्रकाशित किए हैं, तथापि एक नया वातावरण बनाने के लिए क्या-क्या कदम अपनाए जाएं इस बारे में कुछ और स्पष्टता के साथ बात करना अभीष्ट है।
मेरा मानना है कि भारत में औरत के साथ दोयम दर्जे का बर्ताव आज नहीं, अनादिकाल से होते आया है। उसे जन्म से लेकर मृत्यु तक किसी न किसी रूप में पुरुष के संरक्षण में रहना चाहिए, यह भारतीय समाज की मान्यता है। स्त्री-पुरुष संबंधों में जब सामाजिक रूढिय़ों के अनुसार कुछ भी अवांछनीय घटता है तब उसमें हमेशा स्त्री को ही दोषी ठहरा दिया जाता है। ऐसे में पहला प्रश्न तो यही है कि समाज में नई सोच कैसे पैदा हो। दूसरे- भारत में ही नहीं लगभग सारी दुनिया में स्त्री को भोग्या ही माना जाता रहा है और पूंजीवादी शक्तियां इसी मानसिकता का लाभ उठाकर बाजार के एक बड़े हिस्से को संचालित करते आई हंै। अत: इस बात पर भी गौर करना आवश्यक है कि बाजार को किस रूप में नियंत्रित किया जाए। तीसरे- वर्तमान दौर में तकनीकी विकास के चलते जनसंचार माध्यम जिस तरह से पनपे हैं उसमें भी स्त्री की उस रुढिग़्रस्त छवि को ही पुष्ट किया जा रहा है याने यहां भी नई सोच की जरूरत है। अंतिमत:  इन सबके अलावा न्याय व्यवस्था के तंत्र को भी संवेदनशील बनाने और उसमें नवाचार लाने के प्रयत्न करना भी बेहद आवश्यक है। मैं कुछ बिन्दुवार और बेतरतीब सुझाव सामने रखने की हिमाकत करना चाहता हूं-
1. मेरी राय में सबसे बड़ी जिम्मेदारी हमारे लेखकों, अध्यापकों और अन्य बुद्धिजीवियों पर है। आज का बच्चा जो, कुछ घर में सीखता है उससे कहीं ज्यादा वह बाह्य परिवेश याने स्कूल, कॉलेज, मित्रमण्डली, सिनेमा और टीवी से ग्रहण करता है। इसे ध्यान में रखकर देखना चाहिए कि हमारी पाठ्यपुस्तकें उसे क्या सिखा रही हंै। जरूरी होगा कि पुरुष वर्चस्व को स्थापित करने वाले पाठ हटाए जाएं और उसकी जगह वह सामग्री दी जाए जो आदमी और औरत की समानता को प्रतिष्ठित करती हैं।
2. टीवी सीरियल, सिनेमा व अखबारों में भी उस सामग्री पर रोक लगना लाजिमी है जो पुरुषवादी मानसिकता को बढ़ावा देती व स्त्री को दोयम दर्जे पर खड़ा करती हंै। अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर आप कुछ भी लिखें और कुछ भी दिखाएं इस तर्क को बहुत लंबा नहीं खींचना चाहिए। एक पत्रकार होने के नाते मुझे सेंसरशिप की वकालत नहीं करना चाहिए, लेकिन जो सामग्री इन दिनों परोसी जा रही है, उससे स्पष्ट है कि हमारे भीतर स्वविवेक से निर्णय लेने की क्षमता का अभाव हो चला है।
3. यह जाहिर है कि अधिकतर साहित्य पुरुषों द्वारा रचा गया है। भारत के जिस मूर्तिशिल्प का इतना बखान होता है वह भी पुरुषों ने ही उकेरा है। हमें यह सच्चाई स्वीकार कर लेना चाहिए कि अतीत में विलासी राजाओं के आदेश से ये रचनाएं हुई थीं। हरिमोहन झा के खट्टर काका श्रृंखला के निबंधों में इसका प्रमाण मिलता है। जो है उसे मिटाने की बात तो नहीं है, लेकिन यह तो हम मानें कि देहराग की ये कृतियां सृजन क्षमता का नहीं, बल्कि भोगवादी मानसिकता का उत्स हंै।
4. जो भी पाठ्यपुस्तकें लिखी जाएं, जो सीरियल व फिल्में बनें उनका परीक्षण करने के लिए बनी कमेटियों में स्त्रियों का समुचित प्रतिनिधित्व होना चाहिए।
5. एडवरटाइजिंग स्टैण्डर्स कौंसिल ऑफ इंडिया जैसी संस्थाओं में विज्ञापनों के परीक्षण के लिए बनी समितियों में महिलाओं को समुचित स्थान दिया जाए। ये समितियां शिकायत मिलने पर नहीं, बल्कि खुद संज्ञान लेकर परीक्षण करें।
6. यदि सीरियल लेखक, गीतकार, संवाद लेखक, विज्ञापन लेखक, हास्य कवि और पत्रकार तय कर लें कि उन्हें स्त्री का अपमान करने वाली बातें नहीं लिखना है और इसके लिए अपनी कलम नहीं बेचेेंगे तो वे भूखे नहीं मर जाएंगे।
7. भारत में साल में 365 दिन औरतों के लिए किसी न किसी उपवास का प्रावधान रहता है। यह पिता, पति और पुत्र का दायित्व है कि वह इसके खिलाफ आवाज उठाए।  जिस समाज में औरत के लिए एक जन्म भारी पड़ता है वहां सात जन्मों तक वही पति पाने की मनौती क्यों मानी जाए? मेरी राय में करवा चौथ, तीज, छठ जैसे पर्वों का स्वरूप बदल देना चाहिए।
8. जहां तक कानून व्यवस्था की बात है, सिपाहियों को उनकी ट्रेनिंग के दौरान सबसे पहले यही सिखाया जाना चाहिए कि वे स्त्री जाति व वंचित समूहों का सम्मान करना सीखें व उसके साथ अदब के साथ पेश आए। उन्हें संवेदनशील बनाने के लिए तत्काल बड़े पैमाने पर विशेष प्रशिक्षण आयोजित किए जाएं।
9. जिस तरह मायावती ने घोषणा की है कि वे किसी बलात्कारी को आगे टिकट नहीं देंगी उसी तरह सारे राजनीतिक दल शपथ लें कि स्त्रियों के अपमान के किसी भी आरोपियों को कोई भी पद नहीं दिया जाएगा।
10. राजनीतिक दलों को अपने संसद सदस्यों से लेकर ग्राम स्तर तक के कार्यकर्ताओं तक के लिए प्रशिक्षण आयोजन करना चाहिए जहां उन्हें रुढि़वादी, ओछी, पूर्वाग्रह से ग्रस्त मानसिकता से मुक्त होने का पाठ पढ़ाने के साथ तमीज़ से बात करना भी सिखाया जाए।

देशबंधु में 17 जनवरी 2013 को प्रकाशित