Monday, 23 April 2012

भ्रष्टाचार-10


 अन्ना, बाबा, भाजपा और सरकार

यह निर्विवाद सत्य है कि हमारे देश में भ्रष्टाचार विकराल रूप से व्याप्त है। इस पर विजय पाने के लिए सुतार्किक एवं समयबध्द योजना बनाने की आवश्यकता है,जबकि अभी जैसी हायतौबा मचाई जा रही है उसमें भ्रष्टाचार को महज एक भावनात्मक मुद्दे के रूप में उभारा जा रहा है। जो इसे उछाल रहे हैं, वे स्वयं भी शायद नहीं चाहते कि भ्रष्टाचार दूर हो। हम अपने पाठकों को एक बार फिर याद दिलाना चाहते हैं कि देश में इस मसले पर  पहले भी दो बड़े भावनात्मक आन्दोलन हुए हैं। पहला- 1973-74 में गुजरात के ''नवनिर्माण आंदोलन'' के रूप में जिसकी परिणिति जयप्रकाश नारायण की ''संपूर्ण क्रांति'' में हुई और दूसरा- बोफोर्स के खिलाफ विश्वनाथ प्रताप सिंह का जनमोर्चा जिसका प्रसाद उन्हें प्रधानमंत्री पद के रूप में मिला।

उपरोक्त दोनों आन्दोलनों के बारे में देखना कठिन नहीं है कि भ्रष्टाचार को भावनात्मक मुद्दे के रूप में खूब उछाला गया, लेकिन इसका नतीजा कुछ नहीं निकला। भ्रष्टाचार नहीं मिटना था सो नहीं मिटा, क्योंकि आन्दोलन करने वालों के इरादे ही नेक नहीं थे। उनका मकसद येन-केन-प्रकारेण राजनैतिक सत्ता हासिल करने का था, जिसके लिए जनता को प्यादों की तरह इस्तेमाल किया गया।  आज जब अन्ना हजारे तथा बाबा रामदेव जैसे व्यक्ति आन्दोलन कर रहे हैं तो पूर्व अनुभवों के आधार पर मेरा शंकालु मन उनके इरादों के बारे में आश्वस्त नहीं हो पाता। मेरा कहना है कि हमें अतीत से सबक लेकर किसी की भी बात पर एकाएक विश्वास नहीं करना चाहिए। अन्ना हजारे ने इसके पहले भी प्रादेशिक स्तर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन किए, लेकिन एक दो मंत्रियों को हटाए जाने से अधिक वे कुछ भी हासिल न कर सके। अभी लोकपाल बिल को लेकर भी वे हर रोज अपना रवैय्या बदल रहे हैं और इससे उनकी साख को धक्का ही लग रहा है।

यह कहना मुश्किल है कि अन्ना हजारे को राजनीति की कितनी समझ है, लेकिन भ्रष्टाचार के मोर्चे पर उनके प्रबल प्रतिद्वंद्वी के रूप में बाबा रामदेव जिस तरह उदित हुए हैं उसमें राजनैतिक समीकरणों को तलाश पाना बहुत कठिन नहीं है। साफ दिख रहा है कि इनका आन्दोलन संघ परिवार के आशीर्वाद से ही खड़ा हुआ है। इसमें कोई नई बात नहीं है। संघ परिवार प्रारंभ से ही भावना की राजनीति करते रहा है। जयप्रकाश नारायण तथा वीपी सिंह को नायक बनाने में संघ ने खासी सक्रिय भूमिका निभाई थी। अभी हाल में सम्पन्न विधानसभा चुनावों में भाजपा किसी भी किनारे नहीं लग पाई और अब उसे आगे के चुनावों का इंतजार है; खासकर अगले साल उत्तरप्रदेश और फिर लोकसभा का। यह उल्लेखनीय है कि भाजपा कार्यसमिति की लखनऊ बैठक बहुत ही ढीले-ढाले ढंग से सम्पन्न हुई और इस तरह भाजपा की आंतरिक कमजोरियां प्रकट हुर्इं। इस पृष्ठभूमि में स्वाभाविक है कि आने वाले समय में सफलता पाने के लिए कोई न कोई भावनात्मक मुद्दा छेडा जाए।

पिछले 3-4 दिनों के घटनाचक्र से इसकी पुष्टि होती है। आडवाणीजी के नेतृत्व में भाजपा का प्रतिनिधिमंडल राष्ट्रपति से मिला और मांग की कि संसद का विशेष सत्र तुरन्त बुलाया जाए। भाजपा बताए कि यदि संसद ही सार्वजनिक बहस का उचित मंच है तो वह बार-बार संसद की कार्रवाई क्यों नहीं चलने देती? दूसरे, राष्ट्रपति से मिलने के पूर्व आडवाणीजी ने एक चैनल को साक्षात्कार दिया कि राष्ट्रपतिजी सिर्फ सुनती हैं, करती कुछ नहीं हैं। क्या यह शिष्टाचार का उल्लंघन तथा राष्ट्रपति पर दबाव बनाने की नीति नहीं थी? तीसरे, जब भाजपा आधी रात रामलीला मैदान में पुलिस की दबिश और बाबा रामदेव को वहां से हटाए जाने की तुलना आपात्काल से करती है तब क्या उसे बाबा की शतरंजी चालें दिखाई नहीं देतीं? बाबा ने किस प्रयोजन से रामलीला मैदान किराए पर लिया था और उन्होंने क्या किया? उन्हें 4 जून को गृह मंत्रालय से दिन भर में जितने नोटिस भेजे गए, उनकी चर्चा भी कोई क्यों नहीं करता? 5 हजार योगोत्सुकों के बजाय 50 हजार आंदोलनकारी थे। अगले दिन उनकी संख्या बढ़कर कितनी होती और वे क्या करते, न करते उस समय क्या होता?

इधर अन्ना हजारे एवं उनके साथियों ने जो रुख अपनाया है, वह भी आश्चर्य में डालता है। जब आप लोकपाल विधेयक की मसौदा कमेटी में सरकार के साथ काम कर रहे हैं तो दिन-प्रतिदिन सरकार की आलोचना करने का क्या प्रयोजन है? कमेटी की बैठकों का टीवी पर जीवंत प्रसारण क्यों होना चाहिए? फिर आपने 6 जून की बैठक का बहिष्कार क्यों किया? कुल मिलाकर लगता है कि अन्ना हजारे, बाबा रामदेव, संवेदी समाज (सिविल सोसायटी) के प्रतिनिधि सबने अपने आपको देश की संसद से ऊपर समझ लिया है। इस अहंकार के चलते इनकी साख कब तक टिकेगी? मनमोहन सरकार ने इस प्रकरण में जो रीति-नीति अपनाई, वह भी सत्ता के अविचारित दंभ का प्रमाण देने के साथ-साथ गंभीर मसलों को हल्के-फुल्के ढंग से टाल देने की मानसिकता का परिचय देती है।

भ्रष्टाचार की चर्चा करते हुए यह स्मरण रखना आवश्यक है कि यह एक अनिवार्य सामाजिक बुराई है। चाणक्य नीति में साम-दाम-दंड-भेद की बात कही गई है जिसमें दाम का तात्पर्य भ्रष्टाचार से ही है।  संस्कृत विश्व की प्राचीनतम भाषाओं में से एक है और उसमें घूस के लिए ''उत्कोच'' शब्द दिया गया है। यह मान लेना चाहिए कि यह शब्द जब गढ़ा गया होगा, तब से भ्रष्टाचार चला आ रहा होगा।  दरअसल, सत्तातंत्र किसी भी प्रकार का हो, उसमें भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त करने का कोई उपाय नहीं है। राजतंत्र में राजा घूस न लेकर जबराना और नाराना लेता था, लेकिन उसके मंत्री से लेकर संतरी तक रिश्वत लेते ही थे। समुद्र की लहर गिनने के नाम पर भ्रष्टाचार करने की  कथा बहुत से पाठकों को स्मरण होगी। सैन्यतंत्र में भ्रष्टाचार कितना व्यापक हो सकता है इसकी मिसाल पड़ोसी पाकिस्तान है और भारतीय सेना के अफसरों के किस्से भी कम नहीं है। यह जनतंत्र ही है, जिसमें भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सकता है, लेकिन यह काम सजग नागरिक ही कर सकते हैं। बाबा की सभा में तालियां बजाने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। 

मैं अपनी बात कुछ दूसरे देशों के उदाहरण देकर स्पष्ट करना चाहूंगा। जापान में भारत से कई गुना ज्यादा भ्रष्टाचार है, लेकिन वहां इसके लिए कोई आन्दोलन नहीं होता। पिछले साठ साल में जापान में चालीस-पचास प्रधानमंत्री बदल चुके हैं। जैसे ही भ्रष्टाचार का आरोप लगता है, प्रधानमंत्री इस्तीफा दे देता है और स्थिति संभालने के लिए उसके उत्तराधिकारी को समय मिल जाता है। इंग्लैण्ड में भ्रष्टाचार के कितने ही किस्से हाल-हाल में सामने आए हैं, लेकिन हर प्रकरण में मंत्री या संसद सदस्य को तुरंत पद छोड़ना पडा और उसका सार्वजनिक जीवन समाप्त हो गया। ऐसा ही किसी हद तक अमेरिका में भी है। वहां राज्य के गवर्नर और सीनेटर जैसे प्रभावशाली व्यक्तियों को तुरंत पद छोड़ना पड़े। इतना ही नहीं, इन सारे देशों में भ्रष्टाचारी नेताओं पर मुकदमे भी चले हैं और उन्हें कठोर सजाएं भी हुईं। हमने यह भी देखा है कि इन देशों में भ्रष्टाचार करने वाले पूंजीपतियों अथवा कारपोरेट अधिकारियों पर भी कानून की गाज गिरी है। अच्छे-अच्छे नामी लोगों को भी वहां जेल भेज दिया जाता है। वहां का कानून कोई रियायत नहीं बरतता और कानूनी कार्रवाई में अकारण देर भी नहीं लगती। 

यदि भारत में भ्रष्टाचार को नियंत्रित करना है तो उसके लिए तीन शर्तें हैं। पहली शर्त है नागरिकों की जागरूकता, दूसरी राजनीतिक पार्टियों का संकल्प कि वे संविधान और कानून का सम्मान करेंगे तथा उन लोगों को टिकट या पद नहीं देंगे जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। तीसरी शर्त है कि कानून और पुलिस को अपना काम निर्भयतापूर्वक करने दिया जाएगा तथा नेताओं के साथ-साथ अफसरों, ठेकेदारों और दलालों को भी नहीं बख्शा जाएगा।

 9 जून 2011 को प्रकाशित