Thursday, 19 April 2012

उसमें प्राण जगाओ साथी- 8


सच्चाई के पाठ
मुझे    बचपन में सड़क पर कहीं दो रुपए का नोट पड़ा मिला। घर आकर दादी को बताया तो वे तुरंत मुझे लेकर मंदिर गईं और नोट ठाकुरजी को अर्पित करवा दिया। एक बार और ऐसा हुआ। माँ (दादी के लिए हमारा यही संबोधन था। बाबूजी उन्हें बाई कहते थे) ने यही सीख अपनी इकलौती संतान मायाराम को उसके बचपन में दी होगी।
हम सपरिवार वृंदावन में छुट्टियाँ मना रहे थे। बुआजी मंदिर गईं। लौटीं तो उनके पैरों में दूसरी चप्पलें थीं। बाबूजी की नज़र
पड़ी। ''विमल! ये किसकी चप्पलें पहिन आईं।''
''भैया! मेरी चप्पलें शायद कोई और पहिनकर चला गया। ढूंढ़ी, नहीं मिलीं। मैं भी जो पैरों में फिट आईं, पहिनकर आ गई।''
बाबूजी इस पर नाराज हुए। ''जाओ, अभी, वापिस रखकर आओ। चोरी, वह भी मंदिर में जाकर।''
रुऑंसी बुआजी (स्व.विमल पुरोहित) उल्टे पैर मंदिर गईं। उनके पीछे-पीछे बाबूजी भी गए। मंदिर से नंगे पैर लौटते वक्त बराबर में नई चप्पलें दिलवाईं।
ऐसे ही एक प्रसंग में मुझे बाबूजी से एक करारा थप्पड़ खाना पड़ा। ऋषिकेश में पैदल घूमते-घूमते आम के पेड़ों पर कैरियाँ लदी दिखीं। अनुपम भैया और मैंने 4-6 कैरियाँ तोड़ लीं कि शाम के भोजन में चटनी बनाएंगे। बाबूजी इस बीच आगे बढ़ गए थे। हम लोगों को साथ न देखकर वापिस लौटे। कैरियाँ देखीं और माजरा समझ आ गया। पहिले बरसे- कैरियाँ वापिस पेड़ में लगाकर आओ। हम हतप्रभ। दंड मिला। फिर चौकीदार को ढूंढा। उसे कैरी की अनुमानित कीमत चुकाई। उसके बाद हमें सीख- पेड़ सरकार के हैं। तुम्हारा उन पर अधिकार नहीं है। आगे से ऐसी गलती मत करना।
उनके व्यक्तित्व का एक और पहलू ध्यान आता है। 1961-62 डाक से अखबार भेजने पर मात्र दो पैसे का टिकिट लगता था। मैंने अंतर्देशीय या लिफाफे पर 2-2 पैसे के पाँच टिकिट लगा दिए। बाबूजी की नज़र पड़ गई। बहुत शांति से उन्होंने समझाया- डाक टिकिट विदेश से छपकर आते हैं। इसमें बहुमूल्य विदेशी मुद्रा लगती है। बाजू में पोस्ट ऑफिस है। तुम वहां जाकर दस पैसे का एक टिकिट खरीद सकते थे। चार टिकिट में जो कागज- छपाई लगी, वह बच जाती। जरा  से आलस में तुमने देश का नुकसान कर दिया। उनकी सीख आज भी कानों में गूंजती है, लेकिन फिर मन खुद से पूछता है- कोई है जो आज की नई पीढ़ी को ऐसी मूल्यवान शिक्षा दे सके।
यह तो विदेशी मुद्रा बचाने की बात थी, लेकिन अपव्यय उन्हें बिलकुल बर्दाश्त नहीं था। प्रेस में आते-जाते उन्हें एक पिन भी फर्श पर गिरी दिखती तो उसे उठाकर पिनकुशन में लगा देते। दूसरी तरफ रोजाना आने वाली डाक में यदि किसी पत्र पर डाकखाने की मोहर लगना छूट जाती तो वे तुरंत स्याही से काट देते कि कोई दोबारा उस टिकिट का उपयोग न करे। उनका तर्क बहुत सीधा था। टिकिट का प्रयोजन पूरा हो गया है। उसे दुबारा उपयोग में लाना देश के साथ धोखाधड़ी है।
बाबूजी स्वाधीनता संग्राम के संस्कारों में पगे हुए व्यक्ति थे। अपनी पीढ़ी के लाखों देशवासियों की भांति उन्होंने भी अपने मन में स्वाधीन भारत के निर्माण अथवा विकास के प्रति ढेरों कल्पनाएं की थीं, कितने ही सपने संजोए थे। यह निष्ठा अंतिम समय तक उनके साथ बनी रही। मैं जब सातवीं में पढ़ रहा था, तब उन्होंने ''आई.एन.एस. डफरिन'' का दाखिला फार्म मंगवाया। भारतीय नौसेना के इस प्रशिक्षण पोत पर संभवत: 12 साल की आयु में कैडेट भर्ती किए जाते थे, जिन्हें अन्य विषयों के साथ सामरिक प्रशिक्षण भी दिया जाता और पढ़ाई पूरी होने पर जो नौसेना अधिकारी बन जाते। बाबूजी मुझे वहां भेजना चाहते थे, लेकिन उसी समय कुछ ऐसे कारण बने कि मैं ''डफरिन'' पर जाने की बजाय नागपुर पहुंच गया। कुछ साल बाद ही भारत पर चीनी आक्रमण हुआ तो बाबूजी ने तत्काल जबलपुर में सेना भरती कार्यालय में अपना आवेदन जमा किया कि देश पर आए इस अभूतपूर्व संकट के समय वे अपनी सेवाएं एक सैनिक के रूप में देना चाहते हैं। बाबूजी की उम्र तब 40 वर्ष के लगभग थी। उनका आवेदन खारिज कर दिया गया तो उन्होंने सैनिक मुख्यालय दिल्ली को अपील की, लेकिन वहां से भी धन्यवाद पत्र के साथ मनाही आ गई।
इसके बाद एक लंबा अरसा गुजर गया। 1977 के आसपास नागार्जुन ने तीखे स्वर में एक कविता लिखी- ''किसकी है छब्बीस जनवरी किसका पंद्रह अगस्त है सब यहाँ मस्त हैं लोग यहाँ मस्त हैं।'' किसी पत्रिका में यह कविता पढ़ी। हमारे संपादकीय सहयोगियों को पसंद आई और संभवत: 1979 के गणतंत्र दिवस परिशिष्ट में उसे हमने प्रमुखता के साथ, बल्कि विशेष साज-सज्जा के साथ पुनर्प्रकाशित कर दिया। जब यह अंक बाबूजी ने देखा तो मर्माहत हुए। उन्हें यह कतई अच्छा नहीं लगा कि 26 जनवरी अथवा 15 अगस्त जैसे राष्ट्रीय पर्व को हम उल्लास के बजाय शंकाकुल दृष्टि से देख रहे हैं। उनकी पीड़ा कविता को लेकर नहीं, 26 जनवरी पर उसके छपने को लेकर थी। वे ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में इस महान दिन को देख रहे थे और जाहिर है कि राजनैतिक जीवन में आई गिरावट के बावजूद जनतांत्रिक व्यवस्था के प्रति उनकी आस्था में कोई कमी नहीं आई थी।
साध्य और साधन दोनों की पवित्रता के प्रति बाबूजी के मन में गाँधीवादी आग्रह था। यहाँ मैं उन दो प्रसंगों का उल्लेख करना चाहूंगा जो मेरी बी.ए. अंतिम की परीक्षा से ताल्लुक रखते हैं। बाबूजी के परम् मित्र अजय चौहान के छोटे भाई विजय चौहान ने 1964 की बी.ए. परीक्षा का राजनीतिशास्त्र का द्वितीय प्रश्नपत्र तैयार किया। उन्होंने स्नेहवश मुझे कुछ प्रश्नों के संकेत दे दिए। बाबूजी ने देखा कि कल पेपर है और मैं पढ़ नहीं रहा हूं। उन्होंने मुझे पूछा तो मैंने बता दिया कि मुझे छोटे भैया (विजय चौहान) ने महत्वपूर्ण प्रश्न तैयार करवा दिए हैं। वे माजरा समझ गए। बड़े भैया, छोटे भैया की खूब खबर ली कि लड़के को बिगाड़ते हो। रातोंरात पेपर बदला गया और अगले दिन मुद्रित की जगह साइक्लोस्टाइल्ड पर्चा हमें हल करना पड़ा। गनीमत है कि मैं पढ़ाई में अच्छा था।
1964 में ही मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन में जबलपुर विश्वविद्यालय में बी.ए. हिन्दी में सर्वाधिक अंक पाने वाले विद्यार्थी को सुभद्रा कुमारी चौहान स्वर्णपदक देने का निर्णय लिया। परीक्षा परिणाम आया तो मुझे ही सर्वोत्तम अंक मिले थे-150 में 117 याने प्रावीण्य। बाबूजी ने उस वक्त स्वर्णपदक देने का निर्णय स्थगित करवा दिया कि वे स्वयं सम्मेलन की कार्यकारिणी के सदस्य थे और उनके पुत्र को स्वर्णपदक मिलने से गलत संदेश जाएगा।