Saturday, 21 April 2012

भ्रष्टाचार-5



काली कमाई के खिलाफ कुछ कहानियां 

इस सप्ताह का कॉलम किस विषय पर लिखा जाए, कुछ समझ नहीं आ रहा था। आजकल देश में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सबसे ज्यादा बहस हो रही है,

 लेकिन सारे विद्वानों के लिख चुकने के बाद अब और क्या लिखना बाकी है? इसी उधेड़बुन से गुजरते हुए मुझे अपने महान साहित्यकार प्रेमचंद का ध्यान आ गया। ये वही रचनाएं हैं जिन्हें आपने हमने स्कूल, कॉलेज के दिनों में अवश्य पढा होगा। इधर हमारी शिक्षा पध्दति में जो परिवर्तन हुए हैं उनके चलते पर्यावरण, मानव अधिकार, नैतिकता इन सब पर बेहद यांत्रिक, रूखे और उबाऊ ढंग से पाठयपुस्तकों में अध्याय शामिल किए जाने लगे हैं। जबकि प्रेमचंद जैसे गुणी रचनाकारों की कहानियों में इन सब विषयों पर अर्थ गंभीर संदेश विद्यमान हैं, उन पर अब हमारा ध्यान नहीं जाता। साहित्य से दूर अनपढ़ मां-बाप अपने बच्चों को पैकेज उगलने वाली मशीन बनाने में जो लगे हुए हैं।

बहरहाल प्रेमचंद की अत्यंत प्रसिध्द कहानी ''नमक का दारोगा'' मुझे सबसे पहले याद आई। स्कूल में इस कहानी को पढ़ाते हुए हमेशा से यही बताया गया कि यह कथा असत् पर सत की विजय का संदेश देती है। बेईमान लाला अलोपीदीन दारोगा पंडित बंशीधर की सत्यनिष्ठा से प्रभावित होकर उन्हें अपनी फर्म में मैनेजर बनने का प्रस्ताव देते हैं; इसकी व्याख्या ईमानदारी की जीत और बेईमानी की हार के रूप में अब तक की जाती रही है, लेकिन यह निष्कर्ष मुझे लंबे समय से परेशान करते रहा है। कुछ विस्तार में जाकर समझने की कोशिश करें तो एक दूसरा ही निष्कर्ष सामने आता है। यह क्यों हुआ कि पंडित बंशीधर ने लाला अलोपीदीन का प्रस्ताव ठुकराने के बजाय स्वीकार कर लिया। क्या वे नहीं जानते थे कि अलोपीदीन का कारोबार बेईमानी का है और संभव है कि कल को चलकर उन्हें ही किसी दूसरे ईमानदार को बेईमान बनाने का माध्यम बनाया जाए! देश के वर्तमान माहौल में यह कहानी बहुत सटीक बैठती है। बेईमानों ने ईमानदारी को किस तरह खरीद लिया है, यह रोज-रोज देखने मिल रहा है। जो लोग बेईमानी और काली कमाई के सूत्रधार हैं वे मजे में इठला रहे हैं, भारत पर ''बनाना रिपब्लिक'' होने का विशेषण जड़ रहे हैं और जिन्हें सत्यनिष्ठा के साथ अपना कर्तव्य निर्वाह करना चाहिए था वे इनके सामने कठपुतलियों की तरह नाच रहे हैं या फिर सत्येन्द्र दुबे की मौत मारे जा रहे हैं।

प्रेमचंद की ही दूसरी कहानी है ''परीक्षा''। इसमें किसी रियासत के बूढ़े दीवान रिटायर होने लगते हैं। नए दीवान की नियुक्ति के लिए दौड़-धूप होती है। चुने हुए उम्मीदवारों की भांति-भांति से परीक्षा ली जाती है। चतुर सुजान बूढ़े दीवान साहब गुप्त परीक्षा लेकर एक ऐसे युवा को चुनते हैं जिसके हृदय में मानवता, सानता, परदु:खकातरता जैसे गुण कूट-कूट कर भरे हैं। इसकी तुलना आज के भारत से करें। आई.ए.एस. सहित तमाम सरकारी पदों पर बड़ी कठिन परीक्षा के बाद योग्य उम्मीदवार चुने जाते हैं। लेकिन उनकी सारी किताबी योग्यता दो-चार साल में दगा दे जाती हैं, क्योंकि उनमें बौध्दिक ईमानदारी और सत्यनिष्ठा का परीक्षण तो कभी किया ही नहीं गया। वे मसूरी, हैदराबाद, माऊंट आबू और न जाने कहां-कहां से प्रशिक्षण लेकर आते हैं और बहुत जल्दी भूल जाते हैं कि इस देश व देशवासियों के साथ इनका कोई रिश्ता है। ये अधिकारी ही आपसी बातचीत में बताते हैं कि बड़े पद पर चयन हो जाने के बाद दहेज बाजार में उनकी कीमत कितनी गुना बढ़ जाती है।

मैं अब प्रेमचंद के उपन्यास ''गबन'' की चर्चा करना चाहता हूं। इस रचना में पचास-पचपन साल पहले मेरे मन पर जो छाप छोड़ी थी वह आज भी कायम है। जालपा नई नवेली अल्हड़ दुल्हन है। सखी-सहेलियों ने जैसा समझाया या किशोर मन पर जैसी लहर उठी, उसने अपने पति रमाकांत से नौलखा की जड़ाऊ हार की मांग की। रमाकांत छोटी सी नौकरी करता है। जो वेतन मिलता है उसमें जालपा की मांग पूरी करने का इंतजाम नहीं हो सकता। नई-नई गृहस्थी है, नए-नए चाव और उमंगें हैं। नवोढ़ा को वह दु:खी नहीं देखना चाहता। उसे खुश करने के लिए दफ्तर से रकम गबन करके हार बनवा देता है, लेकिन चोरी ज्यादा दिन छुपी नहीं। रमाकांत गिरफ्तार होता है। उसे जेल की सजा हो जाती है। इस घटनाक्रम के बीच कच्ची समझ वाली जालपा में एकाएक प्रौढ़ता आती है। वह अपनी गलती समझती है। अपने किए पर पछताती है और अपनी जिद के कारण गलत रास्ते पर चले गए पति को वापिस संभालती है। दोनों के जीवन में नए सिरे से उजाला आता है। दोनों समझ जाते हैं कि मेहनत और ईमानदारी की कमाई में ही जीवन का सुख है। काश कि दो चार दिन पूर्व गिरफ्तार हुए नाल्को के चेयरमैन और उनकी पत्नी ने इस उपन्यास को पढ़ा होता तो रिश्वत में सोने की ईंट तो क्या, घास का  एक तिनका भी लेने का विचार कभी मन में न आया होता। एक तरफ पूंजी की जांच करने के लिए जेपीसी बन रही है और दूसरी तरफ रिश्वत और काली कमाई के प्रकरण हर बड़े-छोटे दफ्तर में बदस्तूर चल रहे हैं। तो क्या इस दुष्चक्र से उबरने का कोई उपाय नहीं है?

यहां मुझे प्रेमचंद की एक हास्यकथा ''छींटें'' का स्मरण हो आता है। एक कोई रईस अपनी मोटर गाड़ी लेकर किसी बस्ती के बीच से गुजर रहा है। बस्ती की सड़क पर गङ्ढे हैं, जिनमें पानी-कीचड़ भरा है। कार चालक इस बात का ध्यान किए बिना गाड़ी भगाए जा रहा है और गङ्ढों से उछलकर कीचड़ आसपास से गुजरते लोगों के कपड़ों और शरीर पर पड़ रहा है। बस्ती वाले इस हिमाकत को बर्दाश्त नहीं करते। थोड़ी देर बाद जब कारवाला वापिस लौटता है तो लोग उसकी कार पर पत्थर फेंककर उसे सजा देते हैं। वे निर्जीव पुतले नहीं हैं। अनाचार का विरोध करना जानते हैं। कीचड़ से छींटें उछालने का जवाब पत्थर से। यह कहानी प्रेमचंद ने लगभग सौ साल पहले लिखी थी। कहना चाहिए कि प्रेमचंद सौ साल बाद भी उतने ही प्रासंगिक हैं।

 3 मार्च 2011 को प्रकाशित