Wednesday, 11 April 2012

उसमें प्राण जगाओ साथी- 3


ललित सुरजन

मुझे बाबूजी के साथ लंबी-लंबी यात्राएं करने के अनेक अवसर मिले। उन्हें एक अच्छी पुस्तक पढऩे में जितना आनंद आता था, मन की मौज में की गई एक अच्छी यात्रा से भी वे उतने ही उत्फुल्ल होते थे। उन्हें अपने बचपन से लेकर तरुणाई तक पढ़ाई जारी रखने के लिए यहां-वहां भटकना पड़ा था। यह विवशता ही यदि आगे चलकर प्रिय व्यसन में परिवर्तित हो गई तो क्या आश्चर्य! जो कोई भी यात्रा पर उनके साथ हो तो, उसके लिए यह हमेशा एक अनूठा अवसर होता था। दैनंदिन जीवन की आपाधापी और अनथक तकलीफों से बाबूजी निश्चित रूप से थक जाते थे। यात्राएं उन्हें अपने आपको सहेजने, अपने स्वभाव में लौटने और आगे के लिए शक्ति संचित करने का अवसर देती थीं। उन्हें अखबारी काम के सिलसिले में अक्सर महानगरों के दौरे करना पड़ते थे। इस एकाकीपन का उपयोग वे ज्यादातर पुस्तकें पढऩे में करते थे। लेकिन वे जब हम लोगों के या मित्र मंडली के साथ निकलते थे तो मानों उनके व्यक्तित्व का रूपांतरण हो जाता था।

यात्रा चाहे सड़क मार्ग से हो रही हो या रेल मार्ग से। उन्हें यहां से वहां तक का रास्ता ज्यों कंठस्थ होता था। कहाँ अच्छी चाय मिलती है, कहाँ गुलाब जामुन और कहा आलू बोंडे- उन्हें सब पता था। अगर ट्रेन से जा रहे हों तो ऐसा कोई स्टेशन आने पर वे खुद उतरकर हम लोगों के लिए व्यंजन लाने चले जाते थे। फिर भले ही डिब्बे तक वापिस आते-आते ट्रेन क्यों न चल पड़ी हो। सड़क मार्ग से जाने पर यह खतरा नहीं था। एक बार कार द्वारा पूरे परिवार के साथ भोपाल से ब्यावर-अजमेर-चित्तौड़ होते हुए नाथद्वारा जा रहे थे। रात को ब्यावर की एक धर्मशाला में रुके। सुबह चले तो उन्होंने बताया कि आगे सिरवाड़ नामक गांव में बहुत अच्छे परांठे बनते हैं। गांव आया। परांठे वाले भोजनालय में पहुंचे। शुद्ध घी नहीं था तो मुझे बस्ती में भेजा। मात्र 3 रुपए का शुद्ध एक सेर घी लेकर मैं आया तब थाल के आकार के परांठे सिंके और सबने आनंद उठाया। जबलपुर-दमोह के बीच कटंगी के रसगुल्ले, बिलासपुर-कटनी के बीच खोडरी व खोंगसरा की चाय और बड़े, मंडला के पास बिछिया में खोवे की जलेबी और शिकारा में सुबह के नाश्ते का स्वाद सबसे पहिले बाबूजी के साथ ही मैंने लिया।

जब 1959 में नई दिल्ली के प्रगति मैदान (अब) पहिले-पहल विश्व व्यापार मेला का आयोजन हुआ तो बाबूजी हम सबको वहां ले गए। नई दिल्ली स्टेशन के सामने लेडी हार्डिंग सराय में ठहरे। फरवरी की कड़कड़ाती ठंड में नहाने के लिए गरम पानी खरीदना पड़ता था। रोज शाम को मेला खुलते साथ हम वहां पहुंच जाते थे। सोवियत संघ, अमेरिका, ब्रिटेन के पंडालों के सामने लंबी-लंबी कतारें लगती थीं। चिकने मोटे कागज पर रंगीन छपे ब्रोशर मिलते थे। उनसे कागज व स्याही दोनों की सुगंध उठती थी। सोवियत पंडाल में स्पुतनिक का मॉडल भी था। यह शैक्षणिक यात्रा ही थी जिसमें शिक्षक के रूप में बाबूजी साथ थे। उसी समय अशोका होटल नया-नया बना था। बाबूजी हमें वहां लेकर भी गए और चाणक्यपुरी भी घुमाई। संसद भवन, राष्ट्रपति भवन, तीन मूर्ति व राजघाट तो देखे ही देखे। इसके पहिले 1957 में देहरादून से लौटते हुए हम पहिली बार दिल्ली में रुके थे। एक रात दरियागंज में मोतीमहल में बिताई थी। वही जिसका बटर मसाला चिकन आज विश्वप्रसिद्ध है। तब लालकिला, कुतुबमीनार देखे और पहिली बार परांठावाली गली के परांठे चखे। उस समय यह हम म.प्र. वालों के लिए एक दुर्लभ व नया व्यंजन था।

ट्रेन से यात्रा साथ करने में कुछेक मज़ेदार प्रसंग घटित हुए। उज्जैन से टे्रन चली तो रात का समय लेकिन डिब्बे में रौशनी नदारद। बाबूजी ने चेन खींची। गार्ड आया। पहिले लाइट सुधारो, फिर गाड़ी आगे बढ़ाओ। यात्रियों की जान-माल का सवाल है। गार्ड ने विनती की- रतलाम जंक्शन आने दीजिए। खबर भेजता हूं। लाईट सुधर जाएगी। तब तक रेलवे पुलिस के दो सिपाही डिब्बे में तैनात कर देते हैं। इस पर बात बनी। एक बार हम मथुरा जंक्शन पर उतरे। टिकिट मथुरा कैंट याने एक स्टेशन बाद का था। टिकिट चैकर ने सोचा परिवार के साथ कोई तीर्थयात्री है। इससे रकम ऐंठी जाए। तुम्हारा टिकिट दूसरे स्टेशन का है। यहां कैसे उतरे। जुर्माना लगेगा। बाबूजी ने कुर्ते की बांहें मोड़ीं। चलो स्टेशन मास्टर के पास। वहीं जुर्माना पटाऊंगा। तीर्थयात्री समझकर ठगना चाहते हो। सजग नागरिक मायाराम सुरजन ने बाकायदा शिकायत पुस्तिका में शिकायत दर्ज की। बाद में खबर आई उस टिकिट चैकर पर आवश्यक कार्रवाई विभाग ने की। ऐसे कोई एक दर्जन भर किस्से होंगे।

ऐसी ही किसी यात्रा में दौलतराम सिंधी नामक एक गार्ड से उनकी मित्रता हो गई। इष्टï दर्शन के लिए दादा-दादी के साथ मैंने ही अनेक बार नाथद्वारा तक की यात्रा की तो बाबूजी तो और ज्यादा जाते होंगे। दौलतरामजी शायद नाथद्वारा के पास उदयपुर-मावजी जंक्शन-आबू रोड के पथ पर चलते थे। उनका घर आबू रोड में था। वे विभाजन के बाद पाकिस्तान से आए थे। बाबूजी को अच्छी अंग्रेजी में अक्सर पत्र लिखा करते थे। मेरे विवाह पर उन्हें कार्ड गया। वे नहीं आ पाए, लेकिन आशीर्वाद का पत्र आया। इस मित्रता में बाबूजी एक बार आबू रोड गए। दौलतरामजी के घर रुके। एक समय का भोजन करके यात्रा के अगले पड़ाव की ओर बढ़े।

एक बार जबलपुर से हमें लेकर वे नैनीताल के लिए निकले। दमोह-कुंडलपुर होकर छतरपुर पहुंचते तक शाम हो गई। वह बुंदेलखंड में दस्यु सम्राट देवीसिंह के बारे में प्रचलित दंतकथाओं का दौर था। सारे परिवार के साथ रात को यात्रा करना उचित नहीं था। छतरपुर में तब कोई लॉज भी नहीं था। बाबूजी ने कार का रुख पुलिस थाने की ओर किया। थानेदार से बात की और रात को दरी बिछाकर गर्मी के दिनों में हमने थाने में लगे पेड़ों की छाया में रात्रि विश्राम किया। यह किस्सा 1962 की मई का है। दूसरा किस्सा 1959 की दीवाली की छुट्टियों का। ग्वालियर से शिवपुरी पहुंचे। वहां से कोटा जाना था। रास्ते में काली सिंध नदी पड़ी। रात का समय। पुल पर पानी। मारूति राव ड्राइवर जिन्हें हम मारुति मामा कहते थे साथ थे। बाबूजी ने कहा- मारुति! तुम आगे चलो। पानी ज्यादा समझ में आए तो बताना। वापिस आ जाएंगे। मारुति मामा ने पेड़ की टहनी को छड़ी बनाया। पुल पर पानी का अनुमान करते-करते आगे बढ़े। बाबूजी स्टीयरिंग पर। पांच मिनिट में गाड़ी पार हो गई। मैं आज तक तय नहीं कर पाया कि यह साहस था या दुस्साहस !

बाबूजी के साथ एक यात्रा प्रसंग का मनोरंजक जिक्र परसाईजी ने साप्ताहिक हिन्दुस्तान में छपी कहानी में किया था। दोनों मित्र बुंदेलखंड में कहीं कार्यक्रम के लिए बस से जा रहे थे। खचाखच भीड़ में जगह मिलना मुश्किल थी। बाबूजी खादी के धवल धोती-कुर्ता में और परसाईजी कुर्ता-पायजामा में। परसाईजी ने बस स्टेशन मैनेजर से कहा कि धोती कुर्ता वाले सज्जन महेश दत्त मिश्र लोकसभा सदस्य हैं, मैं उनका सचिव हूं। फिर क्या था। सामने की सीट उन्हें तुरंत दे दी गई। रास्ते में ड्राइवर-कंडक्टर ने अलग खातिर की।

यह जानना दिलचस्प है कि देश के किसी भी महानगर में बाबूजी बनते तक किसी होटल में नहीं ठहरते थे। तमाम शहरों में उनके मित्र थे और उन्हें बाबूजी को अतिथि बनाने में सुख ही मिलता था। दिल्ली में पीएस शेट्टी, बंबई में कीर्तिकृष्ण लडिय़ा, कलकत्ता में रामनिवास ढंढारिया और मद्रास में किशोरीलाल आसेरा के घर वे ठहरते थे। सबकी अलग-अलग रुचियां व स्वभाव, अलग-अलग पृष्ठभूमि व काम थे। लेकिन बाबूजी जितने आराम से टाइम्स ऑफ इंडिया के शेट्टी चाचा के साथ रह लेते थे, उतने ही मजे में राधावल्लभ संकीर्तन मंडली के संरक्षक ढंढारियाजी के घर ठहर जाते थे। बाबूजी के इन दूरवासी मित्रों के बारे में एक स्वतंत्र लेख ही लिखना होगा। दरअसल यात्रा के दौरान बाबूजी सुख-सुविधा को लेकर कभी भी अतिरिक्त चिंता नहीं करते थे। पैर फैलाने को जगह मिल जाए, इतना ही उनके लिए पर्याप्त था। पलंग-बिस्तर है तो ठीक, वरना उसकी भी जरूरत नहीं। ग्वालियर में प्रगतिशील लेखक संघ के महेश कटारे आदि मित्र यह देखकर चकित रह गए थे कि ग्वालियर के पास किसी गांव में रात को साहित्यिक कार्यक्रम समाप्त होने के बाद बाबूजी एक चबूतरे पर पेड़ के नीचे दरी बिछाकर ही सो गए थे, जब उनकी आयु 70 वर्ष के लगभग थी।