Wednesday, 11 April 2012

उसमें प्राण जगाओ साथी- 5


गीतकार मायाराम

पत्रकारिता में मायाराम सुरजन के अवदान से मोटे तौर पर लोग परिचित हैं, यद्यपि इस तस्वीर में रंग भरे जाना अभी बाकी है। किंतु बाबूजी के कृतित्व का एक दिलचस्प पहलू अभी तक लगभग अनजाना है। यह तथ्य उनके अनेक मित्रों को शायद मालूम नहीं था कि वे एक अच्छे गीतकार भी थे। मेरे पास बाबूजी की जो डायरियां हैं, उनसे पता चलता है कि 1939 के आसपास उन्होंने गीत लिखना प्रारंभ किया था। यह गीत यात्रा कोई पच्चीस वर्ष तक चलती रही। उनकी तीसरी और आखिरी कविता डायरी में 1952 से 62 के बीच लिखे एक गीत हैं और उसके बाद सिर्फ कोरे पन्ने हैं। अंतिम गीत की पंक्तियां कुछ इस प्रकार हैं-
''आज अकेले चलो पांव रे! वे दिन बीत गए
सुख-सुहाग के दिन थोड़े थे जब बारात सजी
हर पड़ाव पर नेह निहोरे, यश सौगात बंटी''... आदि
मैं जहां तक समझ पाया हूं 1962 के अंत में जब वे जबलपुर नई दुनिया से पृथक हुए, उसके बाद लंबे समय तक उन्हें जो भीषण संघर्ष झेलना पड़े, उसमें वे अपने कवि को हाशिए पर डालकर भूल गए। मैं जब-तब एक पाठक की दृष्टि से इन गीतों को देखता हूं तो लगता है अगर बाबूजी निरंतर लिखते रहते तो समकालीन परिदृश्य पर एक समर्थ गीतकार के रूप में अपनी अलग पहिचान बना सकते थे।
यूं मुझे अक्सर यह सोचकर हैरानी होती है कि बाबूजी ने एक साहित्यिक के रूप में गीत विधा को क्यों चुना। क्या शायद इसलिए कि उनके विद्यार्थी जीवन में समर्थ गीतकारों की एक पूरी पीढ़ी दृश्य पर मौजूद थी! और किसी भी नए रचनाकार पर उनका प्रभाव न पड़ना असंभव था। बाबूजी के समकालीनों में भवानीप्रसाद मिश्र, मुक्तिबोध व धर्मवीर भारती आदि थे जिन्होंने गीत से ही अपनी साहित्य यात्रा प्रारंभ की थी। ऐसे में मायाराम सुरजन नामक तरुण भी गीत लिखे तो अचरज नहीं होना चाहिए, लेकिन मेरी हैरानी एक तो इस कारण से है कि जब वे अन्य मित्रों की भांति नई कविता की ओर बढ़ सकते थे, उन्होंने ऐसा नहीं किया। दूसरे, वे जिस रचना मंडल के सदस्य थे, उसमें उनके सहित लगभग सभी साहित्य को एक महत्तर उद्देश्य का माध्यम मानने वाले थे। वे सब शाश्वत साहित्य, रचना की स्वायत्तता जैसी धारणाओं से दूर थे तथा कविता उनके लिए मनोरंजन का शगल नहीं थी। और फिर, बाबूजी कविता के बजाय गद्य साहित्य ही प्रमुख रूप से पढ़ना पसंद करते थे।
जो भी हो बाबूजी की गीत पंक्तियां रह-रहकर मेरे ओठों पर आ जाती हैं। उनका एक गीत है- ''पल-प्रतिपल गलती काया को जीने का विश्वास चाहिए।'' इसे डॉ. चितरंजन कर ने कुछ अन्य गीतों के साथ बेहद खूबसूरत ढंग से स्वरबध्द किया है। सुनो तो रोम-रोम झनझना उठता है। मनुष्य जीवन की सार्थकता का पुरजोर शब्दों में प्रतिपादन इस कविता में है। ऐसी ही उनकी एक अन्य कविता है- ''जो जीवन से हार गया हो उसमें प्राण जगाओ साथी।'' इसी कविता से मैंने अपनी लेखमाला का शीर्षक उठाया है। मुझे विशेष तौर पर उनका एक गीत पसंद है जो कुछ-कुछ प्रेमगीत सा है- ''तुम्हें लिखूं क्या पत्र, हृदय की भाषा पढ़ लो।'' इसमें आगे चलकर एक पंक्ति आती है- ''मैं हीरे सी हृदय मणि, तुम मन-मुंदरी में जड़ लो।'' अफसोस कि मुझे सिर्फ यत्र-तत्र पंक्तियां ही ध्यान आती हैं।
1961-62 में बाबूजी ने एक सुदीर्घ कविता लिखी। इसे उन्होंने प्रकशित भी किया- ''अपयश'' के छद्मनाम से। इस मार्मिक कविता के कुछ बंध प्रस्तुत हैं-
''यह तो प्रीति तुम्हारी ही थी जैसा चाहा मुझे बनाया
यह भी रीति तुम्हारी ही है कभी हंसाया कभी रुलाया...''
''तुम खुश तो निशिचर रावण भी सोने की लंका का स्वामी
तुम नाखुश तो दशरथ नंदन हुए राजपथ से वनगामी''
''तुमने सोचा सृष्टि तुम्हारी माया की मजबूर नहीं अब
र् ईष्या जब विवेक पर हावी कोई निर्णय क्रूर नहीं तब''
अंतिम पंक्तियां हैं-
''इसलिए तुम अपने भेद न देना जग तो माया का विश्वासी
मैं अपने कांधे ओढ़ूंगा छलनामय निर्दोष उदासी।''  मैंने जितना समझा यह गीत मानवीय रिश्तों की जटिल बनावट को खोलकर सामने रख देता है।
यह तो मेरी राय हुई। बाबूजी को स्वयं अपना जो गीत प्रिय था, उसकी शुरुआत इस तरह से होती है- ''बांधो री सखि! नेहदान की सीमा मेरी प्यास सदा अनबुझी रहेगी।'' जब कभी फुर्सत के क्षणों में हम बाबूजी के साथ बैठते और कुछ सुनाने की फरमाइश करते तो अक्सर बाबूजी यही गीत ठेठ कवि सम्मेलनी अंदाज में सुनाते। अगर कुछ और सुनाने की मांग होती तो वे ''अंदांज'' फिल्म में मुकेश का गाया गीत- ''झूम-झूम के नाचो आज आज किसी की हार हुई है, आज किसी की जीत'' ही सुनाते या फिर कुंदनलाल सहगल का ''एक बंगला बने न्यारा।''
बाबूजी ने अपने गीतों के प्रकाशन में कभी रुचि नहीं ली। मैंने ही बीच-बीच में उनसे बिना पूछे डायरी से कविताएं निकालकर दीपावली विशेषांक जैसे अवसरों पर छाप दीं। वे कवि सम्मेलनों व गोष्ठियों में श्रोता के रूप में तो अक्सर जाते थे, लेकिन खुद का कवि रूप में परिचय कभी नहीं दिया। इसमें एक अपवाद हुआ। 22 जनवरी 1969 को मेरे विवाह की संध्या पर नागपुर में। गोधूलि वेला में बारात स्वागत की औपचारिकताओं के बाद बाबूजी सहित सारे लेखक-बाराती चले गए विदर्भ हिंदी साहित्य सम्मेलन के ''मोर भवन'' में। वहां सम्मेलन की ओर से इन सबके सम्मान में काव्य गोष्ठी रखी गई थी। मध्यप्रदेश और विदर्भ से आए इतने सारे लेखकों के जुटने का यह अद्भुत अवसर था। बाबूजी के कवि होने का रहस्य जानने वाले किसी मित्र ने राज खोल दिया तो उन्हें कविता सुनाना ही पड़ी। वही- ''बांधो री सखि! नेहदान की सीमा।'' अगले दिन स्थानीय समाचार में खबर छपी तो सबने आनंद लिया।
बाबूजी ने एक कविता मुझ पर भी लिखी। मैं ग्वालियर में था। 14 नवंबर याने बाल दिवस। बुआजी पाँच माह अस्पताल में बिताकर घर लौट रही थीं। उसी दिन मकान मालिक के बेटे का जन्मदिन था। अनुपम भैया और मैं उसमें चले गए। बुआजी घर आईं तो हम नदारद थे। फूफाजी और बाबूजी दोनों बहुत बिगड़े। बाबूजी ने मुझे गुस्से में एक चाँटा भी जड़ दिया। वे उसके बाद भोपाल रवाना हो गए। रास्ते में कविता लिखी और भोपाल पहुँचते साथ अगले दिन मुझे पोस्ट कर दी। पहिली पंक्ति है-''दिल के टुकड़े, परम लाड़ले बहुत दु:खी जो तुमको मारा।'' इसके आगे इसमें आगे बाल दिवस का जिक्र है कि चाचा नेहरू के जन्मदिन पर ऐसा नहीं करना था। अपनी यात्राओं के अकेलेपन में किसी शाम मुंबई की चौपाटी पर बैठे-बैठे उन्होंने सारे परिवार के लिए एक गीत रचा-''सब अपनों से दूर यहाँ मैं शून्य गगन में देखा करता।'' इसमें उन्होंने  अपने माता-पिता, पत्नी और चारों बच्चों (1956) को एक-एक पद समर्पित किया।