Wednesday, 11 April 2012

उसमें प्राण जगाओ साथी- 2

पुस्तकों से लगाव
मायाराम सुरजन को पुस्तकों से बेहद लगाव था। यह उनका सबसे बड़ा व्यसन था ऐसा भी कहें तो गलत नहीं होगा। इसमें उन्हें अपने पिता से अवश्य प्रेरणा मिली होगी जो अत्यल्प साधनों के बीच भी समय-समय पर पुस्तकें खरीदते थे। 1920-30 के छोटे से गांव पिपरिया में उन दिनों किताब की दुकान भला क्या रही होगी, लेकिन दादाजी बंबई से सीधे अपनी रुचि की पुस्तकें वेंकटेश्वर प्रेस जैसे संस्थानों से बुलाते थे। बाबूजी के जिस ग्रंथ चयन को मैंने अपने बचपन में मात्र दो अलमारियों में देखा था, आज वह कई गुणा बढ़ चुका है और उसे ''देशबन्धु लाइब्रेरी'' नामक सार्वजनिक पुस्तकालय के रूप में जाना जाता है।

बाबूजी के पढ़ने का दायरा यूं तो बहुत विस्तृत था, लेकिन मुख्यत: वे हिन्दी व विश्व साहित्य तथा समकालीन राजनीति व राजनीतिक इतिहास में ज्यादा रुचि रखते थे। अंग्रेजी और हिन्दी में प्रकाशित लगभग हर महत्वपूर्ण साहित्यिक कृति बाबूजी के पुस्तकालय में होती थी। बाद के बरसों में समकालीन घटनाचक्र पर उनका अध्ययन बढ़ते गया था तथा साहित्यिक पुस्तकों को चुनने, खरीदने का जिम्मा एक तरह से मैंने ही ले लिया था। अपनी पसंद की नई से नई पुस्तकों की तलाश में बाबूजी के संपर्क विभिन्न शहरों के श्रेष्ठ पुस्तक भंडारों से विकसित हो गए थे। जबलपुर में सुषमा साहित्य मंदिर के जोरावरमल जैन या जोरजी, यूनिवर्सल बुक डिपो के शेष नारायण राय या राय साहब जैसे प्रबुद्ध पुस्तक विके्रता तो उनके मित्र ही थे। भोपाल में लायल बुक डिपो, इंदौर में रूपायन, बंबई में न्यू एण्ड सेकेण्ड हैण्ड बुक हाउस व दिल्ली में ऑक्सफोर्ड बुक कंपनी के साथ उनका उधारी खाता साल भर चलता रहता था।

स्वाभाविक है कि पुस्तकों के ऐसे घनघोर पाठक की मित्रता अपने जैसे अन्य पुस्तक प्रेमियों से हुई होगी। वे जहां भी रहे हर जगह उनके मित्रों में एक वर्ग ऐसे व्यक्तियों का रहा जो स्वयं अच्छी पुस्तकें खरीदते, पढ़ते और संभाल कर रखते थे। रायपुर में नगर निगम के सचिव शारदाप्रसाद तिवारी के साथ उनके आत्मीय संबंध पुस्तकों के कारण ही बने। यहीं बाबूलाल टॉकीज के कर्ताधर्ता सतीश भैय्या याने स्व. सतीशचंद्र जैन के साथ उनकी हर सुबह की बैठक अधिकतर पुस्तक चर्चा पर ही केन्द्रित होती थी। मेरे लिए यह दु:ख का कारण है कि बाबूजी के द्वारा खरीदी गई पुस्तकों में से एक अच्छी खासी संख्या में नायाब पुस्तकें खो चुकी हैं। यह एक तो इसलिए कि बाबूजी के ठिकाने बार-बार बदलते रहे। एक शहर में रहे तो भी किराए के मकान बदलते रहे। इस आवाजाही में पुस्तकों का क्षतिग्रस्त होना या लापता हो जाना लाज़िमी था। यह भी हुआ कि अनेक पुस्तक प्रेमी मित्रों ने बाबूजी से उधार ली गई पुस्तकों को लौटाना उचित नहीं समझा। शायद ऐसी पुस्तकें उनके ज्यादा काम की रहीं।

1976 में जब मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के विदिशा सम्मेलन में बाबूजी ने अध्यक्ष का भार संभाला तो बिल्कुल शुरूआती दौर में उन्होंने जो कदम उठाए उनमें से एक सम्मेलन का पुस्तकालय स्थापित करने का था। अपने परम मित्र व सम्मेलन के प्रबंध मंत्री हनुमानप्रसाद तिवारी जिन्हें हम हनुमान चाचा कहते थे, के साथ जा जाकर उन्होंने कितने ही प्रबुद्धजनों से उनके पुस्तक संग्रह हासिल किए व सम्मेलन का एक अच्छा खासा पुस्तकालय खड़ा कर दिया। इसे बरकतउल्ला वि.वि. भोपाल से आगे चलकर पीएचडी हेतु अध्ययन करने मान्यता भी मिल गई। यही नहीं सम्मेलन के माध्यम से वे म.प्र. सरकार पर निरंतर दबाव बनाते रहे कि प्रदेश में पुस्तकालय अधिनियम बने ताकि यहां पुस्तकों के विकास को वांछित गति मिल सके। उनकी यह इच्छा अधूरी ही रह गई।

1980 में अर्जुनसिंह म.प्र. के मुख्यमंत्री बने। उनके पास अशोक वाजपेयी व सुदीप बनर्जी जैसे बुद्धिजीवी अधिकारियों की टीम थी। प्रदेश में पुस्तक आंदोलन को बढ़ावा देने के लिए सरकारी स्तर पर पुस्तक खरीद योजना इस अवधि में शुरू की गई। इसके लिए जो समिति बनी, बाबूजी उसके सबसे ज्येष्ठ सदस्य थे। इस समिति ने ऐसी पारदर्शी नीति बनाई कि बिना किसी भेदभाव के अच्छी पुस्तकें उचित दर पर खरीदी जा सकें। श्री सिंह के हटने के बाद यह योजना निरस्त कर दी गई। लेकिन उस अवधि में देश के लगभग हर अच्छे प्रकाशक के साथ बाबूजी का परिचय हुआ और वे आज भी सराहना करते हैं कि बाबूजी के मार्गदर्शन में जो नीति अपनाई गई थी उससे हर प्रकाशक को न्यायपूर्ण ढंग से लाभ हुआ। इसी वर्ष एक महत्वाकांक्षी साहित्यिक कार्यक्रम में दिल्ली के राजकमल प्रकाशन के अशोक महेश्वरी रायपुर आए तो मंच से उन्होंने बाबूजी का भावपूर्ण स्मरण किया। मैं उस कार्यक्रम में नहीं था और यह जानकारी मुझे बाद में मित्रों से मिली।

एक ओर बाबूजी जहां स्वयं श्रेष्ठ साहित्य के पाठक थे वहीं  पुस्तक प्रकाशन क्षेत्र में अगर कोई प्रगति होती थी तो उससे उन्हें प्रसन्नता होती थी। हिन्द पॉकिट बुक्स में जब लेखक गुलशन नंदा का उपन्यास ''झील के उस पार'' का पहला संस्करण पांच लाख कॉपी का छापा तो इसका नोटिस बाबूजी ने लिया तथा एक संपादकीय टिप्पणी स्वयं लिखी कि इससे पुस्तक प्रकाशन में कैसी संभावनाएं बन सकती हैं। यह बात अलग है कि उपन्यास उनकी रुचि के अनुरूप नहीं था और न उन्होंने उसे पढ़ा।

मैं ऊपर इस बात का ज़िक्र करना भूल गया कि म.प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष के रूप में बाबूजी ने एक सहकारी प्रकाशन गृह स्थापित करने की योजना भी बनाई थी। उनकी कल्पना थी कि सम्मेलन के सदस्य व अन्य पुस्तक प्रेमी ऐसी योजना के सदस्य बने तथा वे जो वार्षिक सदस्यता शुल्क दें उसमें उन्हें प्रतिवर्ष एक निश्चित संख्या में नई पुस्तकें मिल जाएं। इसके लिए उन्होंने नियमावली आदि भी बना ली थी। लेकिन उनका यह प्रयोग आकार नहीं ले पाया। सम्मेलन के सदस्यों में अधिकतर ने योजना में दिलचस्पी नहीं ली। उनका ही अनुसरण करते हुए प्रगतिशील लेखक संघ में हमने भी ऐसा एक प्रयत्न किया और सहकारी आधार पर ''सुबह'' श्रृंखला में तीन किताबें छापीं। इसके बाद योजना ठप्प हो गई। बाबूजी ने फिर सम्मेलन के स्तर पर पुस्तक प्रकाशन का सिलसिला प्रारंभ किया उसमें संभवत: एक दर्जन से कुछ ज्यादा पुस्तकें छपीं। बाबूजी के बाद योजना वहीं खत्म हो गई।