Tuesday, 15 May 2012

छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद - 10


                                                     विनायक सेन: कुछ वृहत्तर प्रश्न 


डॉ. विनायक सेन को रायपुर की एक अदालत ने राजद्रोह का अपराधी करार देते हुए जो उम्रकैद की सजा दी है, उसकी देश-विदेश में व्यापक प्रतिक्रिया हो रही है। 

इस फैसले ने भारत के वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य, प्रशासनतंत्र एवं न्याय व्यवस्था के बारे में एक साथ अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं; यहां तक कि भारतीय लोकतंत्र के भविष्य को लेकर भी किसी कदर चिंता सामने आ रही है। न्यायाधीश बी.पी. वर्मा द्वारा सुनाए गए फैसले को निश्चित ही उच्च न्यायालय में चुनौती दी जाएगी, जहां उसके वैधानिक आधारों का परीक्षण होगा; लेकिन यह कल्पना स्वयं विद्वान न्यायाधीश ने नहीं की होगी कि अपने इस निर्णय से उन्होंने देश के न्यायिक इतिहास में एक ऐसा अध्याय जोड़ दिया है जिसे लंबे समय तक न सिर्फ याद रखा जाएगा, बल्कि बारंबार उध्दृत भी किया जाएगा। इतना ही नहीं, उन्होंने इस संभावना के द्वार खोल दिए हैं कि किसी दिन सर्वोच्च न्यायालय भारत के संविधान में विहित मौलिक अधिकारों में एक-व्यक्ति स्वातंत्र्य के अधिकार- को नए सिरे से परिभाषित कर सके। अंग्रेजी राज में बने कानूनों और छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा कानून की समीक्षा करने की बात तो तुरंत ही उठ गई है। विधि-विधान की बारीकियां मेरी समझ से परे हैं, इसलिए अदालती फैसले पर कोई भी टिप्पणी करना मेरे लिए संभव नहीं है, किंतु एक आम नागरिक के नाते (जो स्वयं जीवन की संध्या में है) मैं इतना  ज़रूर समझना चाहता हूं कि 74 साल के बूढ़े एवं अशक्त नारायण सान्याल तथा जीवन के साठ पतझड़ देख चुके विनायक सेन को उम्रकैद, वह भी बामशक्कत, देने से किस न्यायिक उद्देश्य की पूर्ति हुई है?

बहरहाल, इस फैसले पर जो प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं, उन्हें विभिन्न श्रेणियों में विभक्त कर देखने की आवश्यकता है। सबसे पहिले वे लोग हैं जो मानते हैं कि नक्सलवाद अथवा माओवाद मुख्यत: कानून-व्यवस्था का मसला है, जिसका समाधान गोली का जवाब गोली से देकर ही किया जा सकता है। इनकी दिलचस्पी समस्या की जड़ में जाने एवं मूलभूत कारणों की विवेचना करने में नहीं है। कहना न होगा कि यह सोच न सिर्फ दक्षिणपंथी पार्टियों की है, वरन् अपने आप को उदारवादी राजनीति का उत्तराधिकारी मानने वाली कांग्रेस पार्टी में भी बड़ी हद तक मान्य है। यह अकारण नहीं है कि यूपीए सरकार के बड़े-बड़े नेता माओवाद को देश के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं; और यह विडंबना ही है कि जब उसी यूपीए की कर्णधार तथा उनके वारिस समस्या को आर्थिक-सामाजिक दृष्टि से देखने की वकालत करते हैं तो सरकार द्वारा उसके अनुरूप ठोस नीतिगत कदम उठाने की कोई पहल नहीं की जाती। इस सोच का प्रतिबिंब कांग्रेस प्रवक्ता के बयान में तब झलकता है, जब वे न्यायालय के निर्णय का सम्मान करने के आगे कुछ भी कहने से इंकार कर देते हैं। यहां इतना जोड़ना लाजिमी है कि हाल के समय में माओवादियों ने जैसी कू्र, अकारण व अविचारित हिंसक कार्रवाईयाँ की हैं, उसने इस विचार को तार्किक आधार पर मजबूत ही किया है।

डॉ. सेन के अलावा अन्य दो आरोपियों को भी आजीवन कारावास दिया गया है। इस निर्णय का स्वागत करने वालों का मानना है कि देश से माओवाद का खात्मा करने के लिए इतने कठोर दण्ड की ही आवश्यकता थी। उनको उम्मीद है कि माओवादियों अथवा उनके समर्थकों के हौसले इसके बाद पस्त हो जाएंगे। अगर ऐसा हो सकता तो क्या बात थी! लेकिन राजनीति का सामान्य अध्येता भी जानता है कि बात इतनी आसान नहीं है। सन् 1967 में नक्सलबाड़ी से जिस आंदोलन की शुरूआत हुई थी वह आज देश के विभिन्न हिस्सों में फैल चुका है। 1967 और 2010 के बीच माओवादी आंदोलन में जो विकृतियां आईं हैं, वह अलग विवेचना का विषय है। मैं स्वयं इस पर काफी कुछ लिख चुका हूं, किंतु यहां यह सोचने की आवश्यकता है कि आखिर इस आंदोलन का लगातार विस्तार कैसे होते गया। 1972 से 77 के बीच सिध्दार्थ शंकर राय के मुख्यमंत्रित्व काल में पश्चिम बंगाल में जिस तरह नक्सलवाद के नाम पर पुलिस दमन हुआ, वह अभूतपूर्व था। इसके बाद भी तो इस विचार को पनपने से नहीं रोका जा सका: यह एक सच्चाई है जिसे याद रखना उचित होगा।

एक बड़ी संख्या उन लोगों की है जो मानते हैं कि माओवाद एक विदेशी विचारधारा है और वह भारत पर राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करना चाहती है। इसमें संदेह नहीं कि अपने प्रारंभिक दौर में नक्सलवाद को साम्यवाद के चीनी मॉडल से प्रेरणा मिली थी। लेकिन हमने देखा कि आगे चलकर इस आंदोलन से जुड़े कुछ प्रमुख नाम जैसे कनु सान्याल व ए.के. राय के विचारों में परिवर्तन आया और उन्हें यह लगने लगा कि इस देश में गांधीवाद ही सबसे श्रेयस्कर मार्ग है। दूसरा ध्यान देने योग्य तथ्य यह भी है कि आज का माओवाद 1948 के तेलंगाना आंदोलन तथा 1967 के नक्सलबाड़ी आंदोलन से भिन्न प्रकृति का है। जैसा कि मैं सोचता हूं कि वर्तमान आंदोलन का राजनीतिक आधार सुदृढ़ व सुचिंतित नहीं है। इसके बावजूद इस बुनियादी प्रश्न पर विचार करना होगा कि आखिरकार आदिवासी समाज स्थापित राजनीतिक दलों से विमुख होकर माओवाद की ओर आकर्षित क्यों हो रहा है! यह इतिहास-सम्मत तथ्य है कि विभिन्न, समाजों व राष्ट्रों के बीच विचारों का आदान-प्रदान अनादिकाल से होते आया है। 21वीं सदी का पहला दशक इसका अपवाद नहीं है। भारत के दो प्रमुख राजनीतिक दलों याने कांग्रेस और भाजपा ने अपने-अपने समय में जिस तरह से देश के बाजार बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खोल दिए अथवा अमेरिका के साथ एटमी करार करने में जिस तरह दोनों एक हो गए, वे नवपूंजीवादी विचाराधारा को स्वीकार करने के ही तो उदाहरण हैं। दूसरे शब्दों में प्रभुत्वशाली वर्ग अपने लाभ-लोभ में अगर किसी आयतित विचारधारा को अपनाए तो वह स्वीकार्य है। किंतु यदि वंचित समाज आत्मसम्मान व आत्मरक्षा के लिए किसी विचारधारा से प्रेरणा ले तो वह आज के भारत में दंडनीय है।

इस अदालती फैसले का विरोध प्रमुख रूप संवेदी समाज याने सिविल सोसायटी संगठनों ने किया है जिसमें एमनेस्टी इंटरनेशनल तक शामिल है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी एवं मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने भी न्यायाधीश के फैसले को सही नहीं माना है, जबकि दोनों पार्टियों का माओवादियों से निरंतर विरोध चलते रहा है। सब जानते हैं कि पश्चिम बंगाल में माकपा की सीधी-सीधी लड़ाई माओवादियों के साथ है, और यह तथ्य भी याद रख लेना चाहिए कि  बस्तर में भाकपा का साथ न देकर भाजपा प्रत्याशियों को जिताने में माओवादियों की प्रमुख भूमिका रही है। इसके बाद भी यदि ये दोनों वामपंथी दल अदालती फैसले को ठीक नहीं मानते हैं तो इसका अर्थ यही है कि एक तो उनकी निगाह में विनायक सेन माओवादी नहीं हैं और दूसरे यह कि विचारों के संघर्ष में व्यक्ति को मोहरा बनाना उन्हें नागवार है। यह एक और राजनीतिक विडंबना है कि विनायक सेन जिस पीसीयूएल नामक संस्था से जुड़े हैं, वह मूलत: कम्युनिस्ट विरोधी संस्था है।

जहां तक सिविल सोसायटी का मामला है, इस फैसले से उसके भीतर गहरी बैचेनी और क्षोभ का वातावरण है। यह स्वाभाविक है। डॉ. विनायक सेन पिछले पैंतीस साल से सिविल सोसायटी में विभिन्न मोर्चों पर काम करते रहे  हैं। उनकी गिरफ्तारी के बाद जो अंतर्राष्ट्रीय सम्मान आदि दिए गए, उन्हें छोड भी दें तो भी वे एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में देश भर में जाने जाते थे। यह बात उन्हें जानने वाले किसी भी व्यक्ति के गले नहीं उतर रही कि उनका कोई संबंध माओवादियों के साथ रहा होगा। डॉ. सेन पर सिविल सोसायटी कार्यकर्ताओं का विश्वास एवं उनके प्रति सद्भावना के बावजूद याद रखना होगा कि  अदालती फैसले का सामना अदालत में ही किया जा सकता है। अभी उनके समर्थन में जो विज्ञप्तियां जारी हो रही हैं वे मनोबल बढ़ाने के काम तो आ सकती हैं, लेकिन अभियोजन के जिन साक्ष्यों को न्यायाधीश वर्मा ने पर्याप्त माना, वे उच्च न्यायालय में किस बिना पर खारिज होंगे, इस पर गौर करने की ज्रूरत है। दूसरी ओर यह भी विचारणीय है कि विनायक सेन पहिले ही दो साल जेल में बिता चुके हैं, और हाईकोर्ट से या फिर सुप्रीम कोर्ट से कोई राहत मिलती है, तब तक न जाने कितना समय और गुजर जाएगा।

30 दिसंबर 2010 को देशबंधु में प्रकाशित