Monday, 14 May 2012

छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद - 6

                                                 छत्तीसगढ़ के बुद्धिजीवियों को आह्वान- 3




रविवार 16 मई के 'देशबन्धु' में तीसरे पन्ने पर कोलकाता  की खबर छपी है। शीर्षक है ''बुध्दिजीवियों की चुप्पी पर माकपा बिफरी''। इस समाचार में कहा गया है कि पश्चिम बंगाल में माओवादी लगातार माकपा कार्यकर्ताओं की हत्याएं कर रहे हैं और प्रबुध्द समाज इस पर मौन धारण किए हुए है। इसे पढ़ने से लगता है मानो छत्तीसगढ़ की सोच पश्चिम बंगाल के दर्पण में प्रतिबिंबित हो रही है। तो क्या यह माना जाए कि बुध्दिजीवी या तो पूरी तरह से चुप्पी साध कर बैठे हैं या फिर वे नक्सलियों के साथ हो लिए हैं! अगर ऐसा नहीं है तो वे कौन हैं जिन पर पश्चिम बंगाल की मार्क्सवादी सरकार और छत्तीसगढ़ की भाजपाई सरकार दोनों ने निशाना साध रखा है?

जहां तक मैं समझता हूं कि बुध्दिजीवी आमतौर पर नक्सली हिंसा के खिलाफ हैं। बुध्दिजीवियों का एक छोटा तबका है जो नक्सलियों से बात करने की सलाह दे रहा है। फिर उंगलियों पर गिने जा सकें ऐसे बुध्दिजीवी हैं जो नक्सलियों को निरपराध साबित करने में जुटे हैं। इन तीनों में फर्क करने की जरूरत हैं। जो सबसे छोटा समूह है, उसके बयानों से सनसनी फैलती है, इसलिए मीडिया में उसे जरूरत से ज्यादा महत्व मिल जाता है। फिर जब समाज में उसकी प्रतिक्रिया होती है तो तमाम बुध्दिजीवी ''सब धान बाईस पसेरी'' की तरह चपेट में आ जाते हैं। यह इसलिए भी हो रहा है क्योंकि जो बीच का रास्ता खोजने या बातचीत करने की बात कहते हैं, वे अपना पक्ष अपेक्षित मजबूती के साथ सामने नहीं रख पाए हैं। लेकिन इससे भी बड़ा कारण है कि बुध्दिजीवियों का जो सबसे बड़ा वर्ग है, उसकी आवाज कहीं सुनाई नहीं पड़ रही है।

नक्सली हिंसा को समाप्त कर शांति स्थापना करना है तो सरकार द्वारा अपनाए गए उपायों के अलावा और क्या हो सकता है, यह राय तो बुध्दिजीवियों को ही देना होगी। वे अध्यापक, लेखक, समाजशास्त्री, इतिहासवेत्ता, राजनैतिक अध्येता, नेतृत्वशास्त्री, विधिवेत्ता आदि-आदि कोई  भी हो सकते हैं। ऐसा नहीं कि ये लोग समस्या पर विचार न कर रहे हों। दिक्कत यह है कि इस सोच को व्यापक विमर्श के द्वारा जो सार्वजनिक रूप मिलना चाहिए वह नहीं हो पा रहा है। इतना बड़ा समुदाय है; उसमें मतभिन्नताएं भी होंगी, फिर भी न्यूनतम सहमति के बिंदु खोजकर एक दिशा तो तय की ही जा सकती है। अन्यथा अकेला चना कब तक भाड फ़ोड़ेगा! 

मैंने इस श्रृंखला में दो लेख पहले लिखे हैं, उन पर पाठकों का ध्यान गया है तथा सकारात्मक प्रतिक्रियाएं मिली हैं। गत सोमवार दूसरी किश्त छपी तो एक वरिष्ठ पत्रकार साथी ने सुबह-सुबह फोन करके कहा ''बात तो ठीक लिखी है, लेकिन पहल कौन करेगा?'' मैंने उत्तर दिया- ''आपने फोन किया है तो मान लेना चाहिए कि पहल तो हो ही गई है। अब आप ही अन्य साथियों से बात क्यों नहीं करते।'' इसके बाद दो और फोन आए। एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी का, दूसरा एक सेवानिवृत्त प्राध्यापक का। दोनाें ने पूछा कि इस माहौल में नक्सलियों से बात क्यों की जाए? मैंने स्पष्ट किया कि मेरी सलाह नक्सलियों से संवाद स्थापित करने की नहीं है, बल्कि हम लोगों के मन के एकांत में जो वैचारिक उथल-पुथल मची है उसे सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने की बात है। मैंने इन दोनों मित्रों को अपनी ओर से परामर्श दिया कि वे अपने विचार लेख के रूप में क्यों नहीं प्रस्तुत करते।

एक अन्य मित्र ने पते के दो मुद्दे उठाए। एक तो उन्होंने कहा कि बस्तर के मैंने जितने नाम लिखे हैं उनमें एक भी आदिवासी नहीं हैं। उनका कहना बिल्कुल सही था। यह सचमुच मुश्किल हो जाता है कि जब हम आदिवासी अंचल और खासकर बस्तर की बात करते हैं तो एक भी ऐसे आदिवासी का ध्यान नहीं आता जिसने राजनीति के बाहर अपना स्थान बनाया हो। समाज में राजनेताओं का अपना स्थान है, लेकिन जब आपको नीतियां और योजनाएं बनाना हो तो यह काम उन विशेषज्ञों व जानकारों को ही करना होगा, जिनकी प्राथमिक रुचि चुनावी जोड़-तोड़ में न हो। बस्तर में यह रिक्ति क्यों है? इसका जवाब अरविंद नेताम, बलिराम कश्यप और महेन्द्र कर्मा जैसे राजनेताओं को देना चाहिए। उनके साथ-साथ जिन दो राजपरिवारों ने लंबे समय तक बस्तर में शासन किया याने बस्तर और कांकेर, उनकी भी जवाबदेही यहां बनती है।

मित्र की दूसरी बात थी कि बस्तर में शांति स्थापना के लिए ईमानदारी के साथ विकास कार्य किए जाना चाहिए और इसमें ऐसे अधिकारियों की सेवाएं ली जा सकती हैं जिसका बस्तर के साथ लगाव रहा हो। मुझे  यह सुझाव उचित लगा। दरअसल, सलवा जुड़ूम के प्रारंभ में ही इस पत्र ने सुझाव दिया था कि बस्तर में मुख्य सचिव स्तर का कोई अधिकारी नियुक्त किया जाए जो सीधे मुख्यमंत्री के प्रति जवाबदेह हो। उस समय सलवा जुड़ूम के जोश में इस सुझाव पर ध्यान नहीं दिया गया। फिलहाल मेरे ध्यान में तीन नाम आते हैं- एल.के. जोशी, सरजियस मिंज तथा सुनील कुमार। श्री जोशी बस्तर संभाग के आयुक्त थे तथा साइकिल से पूरे संभाग का उन्होंने दौरा किया था। श्री मिंज राज्य की अफसरशाही में दूसरे क्रम में हैं और आदिवासी हैं। सुनील कुमार का बचपन ही आदिवासी अंचल में बीता है और उन्होंने अपने कर्म जीवन की शुरूआत बस्तर से ही की थी। तीनों सान अपनी संवेदनशीलता के लिए जाने जाते हैं। हम जानते हैं कि दक्षिण बस्तर के बीहड़ क्षेत्र में विकास कार्य संपादित करना आज लगभग असंभव है, लेकिन जहां भी नक्सलियों का दबदबा नहीं है वहां यदि स्वच्छ तथा गतिशील प्रशासन दिया जा सके तो आम जनता, खासकर आदिवासियों, के बीच सरकार की विश्वसनीयता कायम हो सकेगी।

मैं देख रहा हूं कि ''नवभारत'', ''जनसत्ता'' तथा ''आज की जनधारा'' में नक्सल समस्या पर निरंतर सामग्री प्रकाशित हो रही है। बाकी समाचार पत्र भी इस पर ध्यान दें तो वे छत्तीसगढ़ की माटी का कर्ज ही चुकाएंगे। अभी कुछ पत्रकार, एक विधिवेत्ता, एक प्राध्यापक, एक पूर्व शिक्षा प्रबंधक और कुछेक नागरिक ही खुलकर अपनी बात लिख रहे हैं। यह संख्या भी बढ़ना चाहिए। अखबारों को भी चाहिए कि वे प्रबुध्द समाज के विभिन्न वर्गों को  अपनी कलम से झकझोरें। मेरा मानना है कि रास्ता इसी तरह से निकलेगा। अंत में युवा पत्रकार पंकज झा को बिन मांगी सलाह कि अपने लेख के साथ यह अवश्य उल्लेख करें कि वे प्रदेश भाजपा के मुखपत्र ''दीपकमल'' के संपादक हैं।


17 मई 2010 को देशबंधु में प्रकाशित