Monday, 21 May 2012

प्रायोजित पत्रकारिता की चुनौतियां- 2



इन दिनों नीरा राडिया के टेपों के संदर्भ से मीडिया की नैतिकता पर मीडिया के भीतर ही खूब बहस छिड़ी हुई है।
पत्रकारों के बीच अपने ही आचरण को लेकर ऐसी बहस पहले कभी देखने नहीं मिली। बहस है तो जाहिर है कि इसके दो पक्ष भी हैं। एक पक्ष है जो कहता है कि कारपोरेट घरानों या उनके बिचौलियों के साथ बात करके अथवा राजसत्ता के समक्ष उनकी पैरवी करके पत्रकारों ने मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया। वे यहां तक कहते हैं कि खबरें जुटाने के लिए इनके साथ इस स्तर के संपर्क बनाना ही पड़ते हैं। वे कारपोरेट घरानों और राजसत्ता के बीच संदेशवाहक बनने में भी कोई बुराई नहीं देखते।  गनीमत है कि इस तरह की सोच रखने वाले पत्रकार फिलहाल अल्पमत में दिखाई दे रहे हैं। जब एडीटर्स गिल ऑफ इंडिया के वर्तमान अध्यक्ष राजदीप सरदेसाई ने गत सप्ताह एक कार्यक्रम में टेपकांड से जुड़े पत्रकारों की वकालत की तो वहां उपस्थित लगभग सारे पत्रकार एक सिरे से उखड़ गए, और श्री सरदेसाई को अपना वक्तव्य वापस लेना पड़ा।

यह एक शुभ संकेत है कि देश के अधिकतर पत्रकार टेपकांड से विचलित हैं। वे इस प्रकरण से जुड़े पत्रकारों को संदेह का लाभ देने के लिए तैयार नहीं है। उनका मानना है कि इससे पत्रकारिता की पेशे की छवि धूमिल हुई है। टेप वार्तालाप छापने वाले 'आउटलुक' के प्रधान संपादक विनोद मेहता ने स्पष्ट कहा कि इस प्रकरण में काला और सफेद  साफ-साफ दृष्टिगत है। 'हिन्दू' के प्रधान संपादक एन. राम की भी राय यही है। यह देखा जा सकता है कि पहले वर्ग में अधिकतर वे पत्रकार हैं जो अपेक्षाकृत सम्पन्न और शक्तिशाली मीडिया घरानों से जुड़े हुए हैं जबकि दूसरे पक्ष में अधिकतर वे लोग हैं जो सत्ता केन्द्र से दूरी बनाए रखने में विश्वास रखते हैं। 

इस तरह नीरा राडिया टेप प्रकरण भारतीय मीडिया की वर्तमान स्थिति का अध्ययन करने में सहायक हो सकता है। यह पता चलता है कि पिछले बीस साल में भारत में सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक परिदृश्य में जो परिवर्तन आया है मीडिया उससे अछूता नहीं है।  हमने देखा है कि पिछले दो दशकों के दौरान भारत में पूंजीवाद का शिकंजा किस तरह कसा है। इसके चलते एक ऐसा सम्पन्न वर्ग तैयार हुआ है जो शेष समाज के साथ न तो किसी तरह की सहानुभूति रखता है और न जिसके साथ संबंध बनाने में उसकी कोई रुचि है। यह सम्पन्न वर्ग पूरी आबादी को दो ही श्रेणियों में बांटकर देखता है -उत्पादक और उपभोक्ता अथवा विक्रेता और ग्राहक। जिसके पास क्रयशक्ति नहीं है उसका इनकी नजरों में कोई अस्तित्व ही नहीं है। मेरा अनुमान है कि ऐसे सम्पन्न लोगों की संख्या देश की आबादी के बीस प्रतिशत के आसपास होगी। एक समय इस वर्ग का आदर्श हर्षद मेहता था, तो आज उसकी जगह सत्ताइस मंजिल का महल बनाने वाला मुकेश अंबानी है। नेता, अफसर, व्यापारी और अपराधियों की इस चौकड़ी ने मीडिया को भी अपने में शामिल कर लिया है। इसके प्रमाण आए दिन सामने आते रहते हैं। वर्तमान प्रकरण उसकी एक ताजा कड़ी है।

कहना होगा कि मीडिया को साथ मिलाने अथवा खरीदने का उपक्रम पहले भी होता रहा है। इसके भी ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे, लेकिन जैसा कि मैंने पहले भी कहा, बीते दिनों में स्थिति इतनी भयावह मालूम नहीं देती थी। उसके कई कारण हैं जिनके विस्तार में जाना यहां जरूरी नहीं है। जहां तक मुझे याद है, 1946 में अखिल भारतीय समाचारपत्र संपादक सम्मेलन ने पत्रकारों के लिए पहली बार आचार संहिता प्रस्तावित की थी। परवर्ती काल में यह प्रक्रिया कई बार दोहराई गई। फिर भारतीय प्रेस परिषद याने कि प्रेस काउंसिल ने भी अपनी ओर से पत्रकारों के लिए आचार संहिता प्रस्तावित की। इसका अर्थ यही है कि आचरण में स्खलन का खतरा हर समय मौजूद था और उसे रोकने की कोशिशें बराबर हो रही थीं;  यद्यपि इसका जैसा अनुकूल प्रभाव पड़ना चाहिए था, वह नहीं हुआ और भांति-भांति के प्रलोभनों में पड़कर जो गिरावट आना शुरू हुई वह आज इस स्तर तक पहुंच गई।

इस खतरे को प्रथम और द्वितीय प्रेस आयोग ने भी ठीक-ठीक भांप लिया था। इसीलिए उनकी ओर से समाचार और विज्ञापन का अनुपात, वाजिब मूल्य पर अखबार की बिक्री, पृष्ठ संख्या के आधार पर कीमत का निर्धारण, प्रेस में पत्रकारों की भागीदारी तथा पूंजी घरानों से प्रेस को मुक्त रखने जैसे अनेक प्रस्ताव सामने आए, जिन्हें या तो अदालत ने खारिज कर दिया या फिर स्वयं पत्रकारों ने।  इंदिरा गांधी की एक समय सूचना प्रसारण मंत्री रही नंदिनी सतपथी ने भी अखबारों को पूंजी घरानों से मुक्त रखने (डिवाल्यूशन ऑफ् ओनरशिप) का सुझाव पेश किया था, जो पत्र जगत को ही कबूल नहीं हुआ। उस दौर के मुकाबले आज की स्थिति कहीं ज्यादा पेचीदी है। उस समय पत्रकारिता और समाचारपत्र समानार्थी थे। आज टीवी न्यूज चैनलों के चलते ''पत्रकारिता'' संज्ञा ही लुप्त हो गई है व उसका स्थान ''मीडिया'' ने ले लिया है। निजी रेडियो पर अभी समाचार प्रसारित करने की अनुमति नहीं है, लेकिन वह एक संभावना तो है ही। फिर इंटरनेट पत्रकारिता भी दिनोंदिन बढ़ रही है। इन सब विधाओं का समावेश करते हुए पत्रकारिता अथवा मीडिया के सामने जो चुनौतियां हैं, उनको ताजा संदर्भों में परिभाषित किए जाने की महती आवश्यकता है। यह बेहतर होगा कि मीडिया जगत स्वयं ही इस पर आत्मावलोकन का साहस जुटाकर आगे का रास्ता तय करें।

मेरा स्पष्ट मत है कि मीडिया जनतंत्र का चौथा स्तंभ नहीं है। ऐसा मानकर हम अपने आपको भुलावे में रख रहे हैं। हमारी भूमिका प्रतिष्ठान से दूर रहकर, उसके जो तीन स्तंभ हैं उन पर नजर रखने और उनके क्रियाकलापों की विवेचना करने की है। चूंकि हम ऐसा नहीं कर रहे हैं इसलिए हमारी विश्वसनीयता पर आंच आ रही है। टेप प्रकरण ने अवसर दिया है कि हम इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार कर लें। यदि हम ऐसा नहीं करते हैं तो भारतीय मीडिया जिस दलदल में फंस चुका है उससे उबरने का फिर कोई उपाय नहीं है।


9 दिसंबर 2010 को देशबंधु में प्रकाशित