Tuesday, 15 May 2012

छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद - 11


                                                     कैद में कलेक्टर: मुख्यमंत्री को खुला पत्र 


मुख्यमंत्री जी,
इस समय आप अपने राजनीतिक जीवन की संभवत: सबसे बड़ी परीक्षा से गुजर रहे हैं। सुकमा के युवा कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन का अपहरण ऐसी विषम चुनौती है जिसके चलते आप स्वाभाविक ही गहरे अंतर्द्वन्द्व से गुजर रहे होंगे। ऐसे नाजुक अवसर पर मुझ जैसा व्यक्ति जिसे शासन-प्रशासन की पेचीदगियों का पता न हो, कोई सलाह-सुझाव दे तो शायद उस पर गौर करने के लिए आप समय न निकाल पाएं या उसे आप पसंद भी न करें। फिर भी अपने पत्रकार और नागरिक होने के हक से मैं चंद बातें आपके सामने रखना चाहता हूं।

सबसे पहले मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं कि श्री मेनन की सकुशल घर वापसी के लिए आप जो भी प्रयत्न कर रहे हैं उसमें आपको पूरी सफलता मिले। आपने सर्वदलीय बैठक बुलाने और अपनी ओर से मध्यस्थ मनोनीत करने के जो कदम उठाए, वे सही दिशा में हैं। राज्य के बड़े पुलिस अधिकारियों की दिल्ली में गृहमंत्रालय के आला अफसरों के साथ बैठक और समन्वय स्थापित करने का कदम भी स्थिति के अनुकूल ही था। आपने इस प्रकरण में अब तक प्रशंसनीय धैर्य और संयम का परिचय दिया है जिसका सुपरिणाम मिलना चाहिए। यह अच्छी बात है कि इधर जो अतिवादी विचार नेताओं, पत्रकारों अथवा नागरिकों के एक वर्ग द्वारा प्रकट किए गए हैं उनका आपकी कार्ययोजना पर कोई असर नहीं पड़ा है।
माओवाद प्रभावित क्षेत्र में ऑपरेशन ग्रीन हंट या नक्सल-विरोधी अभियान पर तुरंत रोक लगाना एक उचित निर्णय था। श्रीमती निर्मला बुच और एस.के. मिश्र को मध्यस्थ बनाने के संकेत भी स्पष्ट हैं। इससे देश-प्रदेश के शासकीय सेवकों खासकर आइएएस बिरादरी के बीच सही संदेश गया होगा। ये दोनों अधिकारी प्रशासन के दृष्टिकोण को सही ढंग से रख पाएंगे और एक युवा अधिकारी के प्रति वांछित सहानुभूति का परिचय देते हुए निर्णय लेने में सक्षम होंगे, यह आशा सहज ही की जा सकती है। दूसरी तरफ अपहरणकर्ता माओवादियों से उनकी ओर से मध्यस्थों के नाम तय करने में चूक हुई है, यह स्पष्ट दिख रहा है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी माओवादियों की रीति-नीति से सहमत नहीं है, इसके बाद भी अपहरणकर्ताओं ने मनीष कुंजाम का नाम आगे कर जो चाल चलने की कोशिश की उसमें भी वे सफल नहीं हो सके। 

श्री मेनन सकुशल वापिस घर आएंगे, यह विश्वास सबको है लेकिन दक्षिण-मध्य-पूर्व भारत याने झारखंड, ओडिशा, विदर्भ, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में जो राजनीतिक दुष्चक्र निर्मित हो चुका है, वह इससे समाप्त नहीं हो जाएगा। माओवादियों द्वारा पूर्व में किए गए अपहरण और रिहाई के जो प्रसंग घटित हो चुके हैं, वे इसका सबूत हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस चक्रव्यूह को कैसे तोड़ा जाए। मैं सोचता हूं कि आज आपके सामने जो गंभीर प्रकरण है उसको प्रस्थान बिन्दु बनाकर आदिवासी अंचलों को माओवाद से मुक्त कर दीर्घकालीन रणनीति बनाने पर आप विचार कर सकते हैं।
मेरा आपसे जो भी सीमित सम्पर्क रहा है उसके आधार पर मैं इतना कह सकता हूं कि आपके मन में आम जनता के प्रति और खासकर आदिवासियों के प्रति गहरी सहानुभूति है। बात चाहे किसानों को न्यूनतम ब्याज दर पर ऋण देने की हो, चाहे आदिवासियों पर वन विभाग द्वारा चलाए जा रहे मुकदमों को उठाने की हो- आपके निर्णयों में संवेदनशीलता का अनुभव मैंने किया है। इसी को प्रमाण मानकर आपसे यह अनुरोध करना संभवत: प्रासंगिक और उचित होगा कि बीते सालों के दौरान सलवा जुड़ूम से हुए लाभ-हानि पर आप तटस्थ भाव से पुनरावलोकन करें। 

एक साधन-सम्पन्न प्रदेश के मुख्यमंत्री होने के नाते आप पर स्वाभाविक रूप से तरह-तरह के दबाव आते होंगे- पार्टी के, नेताओं के, विचारधारा के, कार्यकर्ताओं के। छत्तीसगढ़ को एक उद्योग-प्रमुख प्रदेश बनाकर जनता के लिए खुशहाली लाने का विचार भी कहीं काम कर रहा होगा। इन सबके चलते प्रदेश में जगह-जगह पर जो अप्रिय और अवांछनीय स्थितियां जब-तब बनती रही हैं, वे भी आपके ध्यान में आई होंगी। यह सब देखते हुए आज शायद एक बड़ा फैसला ले सकते हैं कि नक्सलवाद से निपटने के नाम पर जो पुलिस अथवा सशस्त्र बलों की मुहिम चलाई जा रही है, वह एक साल नहीं तो कम से कम छह महीने के लिए पूरी तरह स्थगित कर दी जाए। इसके साथ पुलिस और प्रशासन को आपकी सख्त से सख्त हिदायत हो कि आदिवासी एवं आम जनता पर किसी भी तरह का दमन और अत्याचार आपको स्वीकार नहीं होगा। आशय यही कि माओवादियों को संदेश जाए कि इस प्रदेश के आदिवासियों को अपनी खैरियत और बेहतरी के लिए उनकी पैरवी की जरूरत नहीं है। इसी के समानांतर अगले छह माह में आपको एक ऐसी मुकम्मल विकास नीति बनाने की जरूरत होगी जो आम जनता की भागीदारी से बने, जिसमें पंचायती राज संस्थाओं (खासकर पेसा क्षेत्र में) की सक्रिय भूमिका हो। इसके लिए देश भर से अपने-अपने विषय के विद्वानों की सेवाएं नि:संकोच ली जाएं। प्रदेश में जो शासकीय कर्मचारी हैं उन्हें भी प्रोत्साहित किया जाए कि एक संवेदनशील प्रशासनिक ढांचा बनाने के लिए वे निर्भय होकर अपना सुझाव दे सकें और फिर उन पर समुचित ध्यान देकर निर्णय लिए जाएं।

देश-प्रदेश का जैसा राजनीतिक माहौल है, जैसी राजनीतिक संस्कृति विकसित हुई है, उसके चलते इन सुझावों को अव्यवहारिक मानकर खारिज किया जा सकता है, लेकिन जिन डॉ. रमनसिंह ने सन् 2003, 2004, 2008 और 2009 में अपनी पार्टी के विजयी होने के लिए सफल रणनीति बनाई, क्या वह प्रदेश में स्थायी सुख शांति की स्थापना के लिए कोई रणनीति नहीं बना सकेंगे!
भवदीय
ललित सुरजन


 26 अप्रैल  2012 को देशबंधु में प्रकाशित