Monday, 21 May 2012

कलम पर भरोसा रखने की ज़रुरत



अगर हमें ठीक-ठीक याद है तो 1908 में कांग्रेस पार्टी के सूरत अधिवेशन में नरमपंथियों और गरमपंथियों के बीच जूते चले थे। यह देश की राजनीति में जूते के इस्तेमाल की शायद पहली घटना मानी जाएगी। इसके कुछ साल बाद अपने तीखे व्यंग्य के लिए मशहूर शायर अकबर इलाहाबादी ने लिखा था कि डासन कंपनी का बनाया जूता चल गया लेकिन मेरी कलम से निकला लेख नहीं चला। इससे अनुमान लगता है कि राजनीति में जूते का प्रयोग उनके समय तक आकर मान्य हो गया होगा। इसके बाद हमने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ही जूते का प्रयोग होते देखा जब अक्टूबर 1969में संयुक्त राष्ट्रसंघ महासभा में भाग लेते हुए रूसी राष्ट्रपति निकिता कु्रश्चेव ने अपना जूता दिखलाते हुए अमेरिकी प्रतिनिधि को धमकाया। उसके कुछ समय बाद ही मध्यप्रदेश विधानसभा में ऐसा ही नजारा देखने मिला जब धमतरी के जनसंघी विधायक पंडरीराव कृदत्त ने सदन के भीतर जूता फेंका। छत्तीसगढ़बल्कि अविभाजित मध्यप्रदेश के लोग इस तरह स्वतंत्र भारत में जूता संस्कृति का पहला उदाहरण पेश करने का श्रेय ले सकते हैं।

पत्रकार जरनैल सिंह के जूता प्रकरण की मीमांसा करते हुए उपरोक्त जानकारी को संदर्भ सामग्री के रूप में देखा जा सकता है। इस प्रकरण पर हल्की-फुल्की और गंभीर दोनों तरह की चर्चाएं हो रही हैं। एक पत्रकार द्वारा कलम की बजाए जूते का उपयोग करने पर हिन्दी पत्रकार चाहें तो संतोष कर सकते हैं। टीवी के मुकाबले अखबार तथा अंग्रेजी के मुकाबले हिन्दी को सामान्य रूप से कमजोर ही माना जाता है। बेचारे हिन्दी वाले बिना 'जीलगाए किसी बड़े आदमी से बात नहीं करते जबकि अंग्रेजी वाले मणिशंकर अय्यर को मणि और रविशंकर प्रसाद को सिर्फ रवि कहकर संबोधित करते हैं। अंग्रेजी वालों के सामने हमेशा दयनीय स्थिति में रहने वाले हिन्दी पत्रकारों ने बता दिया है कि हम इतने कमजोर नहीं हैं। हमने बल्कि अंग्रेजी पत्रकारों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। यह तो हुई मजाक की बात।

इस पर गंभीरतापूर्वक विचार करें तो कुछ सवाल खड़े होते हैं जिन्हें तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है। पहला हिस्सा पत्रकारिता का है। जरनैलसिंह ने भले ही भावावेश में जूता फेंका होलेकिन उसने ऐसा करके अपने पत्रकार होने का अधिकार खो दिया है। एक पत्रकार से भीषण से भीषण परिस्थिति में शांत और संयत रहकर अपना दायित्व निभाने की अपेक्षा की जाती है। दंगेअकालबाढ़ याने हर तरह की त्रासद स्थिति में एक सच्चा पत्रकार अपने मनोभावों को नियंत्रण में रखते हुएकई बार अपने आंसू पीते हुए काम करता है। अगर पत्रकार अपने को न संभाल पाए तो वह इन दारूण सच्चाइयों की तस्वीरें पाठकों के सामने प्रस्तुत करने में असफल हो जाएगा। हमारी अपनी पक्षधरता नि:संदेह होती हैलेकिन हमें निस्पृह होकर काम करना पड़ता है। दुर्भाग्य से पिछले कुछ वर्षों में पत्रकारिता में गंभीरता का जिस तरह से क्षरण हुआ है और गिरावट आई है,जरनैल किसी हद तक इन टूटते हुए मूल्यों का प्रतीक बनकर ही उभरा है। इसी सिलसिले में दूसरा महत्वपूर्ण बिन्दु यह भी है जिस मसले पर जरनैल ने अपना जूता चलाया क्या वह सिर्फ उनकी अपनी लड़ाई थी। क्या इस पत्रकार को यह मालूम नहीं है कि पत्रकार बिरादरी में ऐसे लोग गिने-चुने ही होंगे जिन्हें 1984 के सिख विरोधी दंगों ने मर्माहत न किया होगा। दूसरे शब्दों में वे तमाम पत्रकार जो न्याय और व्यवस्था के मुद्दे पर धर्म व जाति के परे एकजुट होकर अपनी आवाज उठा रहे थे वे यहां दरकिनार कर दिए गए और कुछ ऐसी तस्वीर बन गई मानो कि एक समुदाय की लड़ाई उस समुदाय विशेष के पत्रकार को ही लड़ना चाहिए।


इस प्रकरण का दूसरा पहलू इसके राजनीतिकरण का है। इसमें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने जो भूमिका निभाई है उस पर भी विचार करने की जरूरत है। यह सचमुच अफसोसजनक है कि क्षणिक उत्तेजना में कही गई बातों को लेकर तिल का ताड़ बनाने की कोशिश इन दिनों प्रायहर रोज हो रही है। मीडिया इन्हें ऐसे उछालता है मानो तूफान आ गया हो और अपने को पवित्रतम से ज्यादा पवित्र सिध्द करने की कोशिश में लगा चुनाव आयोग इन पर आनन-फानन कार्रवाई करने लगता है। जबकि हर चुनाव के दौरान ऐसे कड़वे-मीठे प्रसंग घटित होते रहते हैं। आग में घी डालने का काम वे दो दर्जन राजनीतिक प्रवक्ता करते हैं जिन्हें उनकी पार्टियों ने इसी काम के लिए खुला छोड़ा है कि जाओ और टीवी पर बहस में ज्यादा से ज्यादा अंक बटोर कर लाओ। ऐसा करने में मूल मुद्दा गायब हो जाता है। अनावश्यक चर्चाएं होने लगती हैं। संदर्भों से कटी हुई बातें उठती हैं। किसी हद तक संयम और सावधानी को जानबूझकर ताक पर रख दिया जाता है। अब तक 1984 की त्रासदी को 'सिख विरोधी दंगों'के रूप में ही जाना जा रहा था। जरनैल के जूते के बाद अब उसके लिए नई-नई संज्ञाएं गढ़ी जा रही हैं। एक पत्रकार ने 1984 की चर्चा करते हुए साठ साल के दंगों की सूची गिना दी और हरेक के लिए कांग्रेस को कसूरवार ठहरा दिया। दूसरी तरफ से बार-बार 2002 के गुजरात को उछाला जाता रहा। ऐसे प्रायोजित विमर्शों से देश को क्या लाभ हो रहा हैकहना कठिन है।

इस प्रकरण का तीसरा और बेहद महत्वपूर्ण अंश 1984 का त्रासद घटनाचक्र है। यह लगभग निर्विवाद है कि दिल्ली के कतिपय कांग्रेसी नेता इस अपराध में लिप्त थे। तकनीकी आधार पर किसी पर दोष सिध्द न हो पाया हो यह अलग बात है। एक राजनीतिक पार्टी से जनभावनाओं को समझने और उनका आदर करने की अपेक्षा की जाती हैलेकिन इस मामले में कांग्रेस अपेक्षा पर खरी नहीं उतरी। 2004 में भी जब टाइटलर और सान कुमार को टिकट दिए गए थे तो उसे आमतौर पर पसंद नहीं किया गया था। जगदीश टाइटलर का मंत्री बनना तो और भी नागवार गुजरा था। इसे समझने के लिए न तो किसी नानावटी कमीशन की जरूरत थी और न सीबीआई की क्लीनचिट की। इस पूरे प्रसंग में कहना गलत न होगा कि कांग्रेस ने संवेदनहीनता का परिचय दिया। दूसरी तरफ यह भी उतना ही गलत है कि गुजरात नरसंहार की बात उठने पर 1984 से उसकी तुलना की जाए। दूसरेइस मामले में राजीव गाँधी का नाम लपेटने की कोशिश की जाती हैउस पर भी विचार होना चाहिए। यह स्मरणीय है कि पीवी नरसिंहराव उस समय केंद्रीय गृहमंत्री थे और दिल्ली की पुलिस उनके आदेश पर चलती थी। बाद में श्री राव के कार्यकाल में ही बाबरी मस्जिद तोड़ी गई। इन दोनों अवसरों पर उनकी भूमिका पर प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है कि हकीकतन वे किस विचारधारा से जुड़े थे। खैरएक पाप दूसरे पाप को काटता नहीं है। आज फिजूल की बहस करने के बजाए देखना यह चाहिए कि कानून कितनी मुस्तैदी के साथ काम कर पा रहा है। अगर उसमें कहीं गतिरोध आया है तो वह कैसे दूर होइस पर विचार करना ज्यादा जरूरी है। लेकिन पत्रकार हों या राजनेताअगर भावनाएं उभाड़ने के काम में ही लगे रहेंगे तो कहना होगा कि वे अपने बुनियादी दायित्व से मुकर रहे हैं।

 मेरी समझ में यहां पत्रकारों की जिम्मेदारी अधिक बड़ी है। वे यदि किसी अप्रकट एजेंडे को बढ़ाने में लगे हैंजैसा कि इस प्रकरण में मुझे साफ तौर पर नजर आया तो यह जूता फेंकने से कहीं ज्यादा गर्हित कृत्य है। हमारा पत्रकार साथियों से कहना है कि वे अपनी कलम पर भरोसा रखें व उसका सही इस्तेमाल करें।


 15 अप्रैल 2009 को देशबंधु में प्रकाशित