Tuesday, 29 May 2012

शहर या मुसाफिरखाना





अभी कुछ साल पहले भारत में नगर नियोजन के लिए दो महत्वाकांक्षी योजनाएं सामने आई। इनमें से पहली योजना 'पुरा' तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. कलाम द्वारा प्रस्तावित की गई थी, जिसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में नगर-सुलभ सुविधाएं जुटाने का था। दूसरी योजना यूपीए सरकार ने पेश की जवाहर लाल नेहरू स्मृति शहरी नवीनीकरण मिशन के रूप में। यह दूसरी योजना मनमोहन सिंह सरकार के पांच प्रमुख कार्यक्रमों में से एक है। इसका उद्देश्य भारत के चुनिंदा नगरों में विश्व स्तर का वातावरण तथा सुविधाएं निर्मित करना है। इन चुनिंदा नगरों में सभी प्रादेशिक राजधानियों के साथ-साथ ऐतिहासिक, धार्मिक अथवा आर्थिक महत्व के नगर शामिल हैं। ये दोनों योजनाएं सुनने में अच्छी लगती हैं लेकिन कितनी व्यवहारिक हैं, इस पर विचार करना जरूरी है।

जहां तक 'पुरा' का सवाल है यह योजना आगे बढ़ती नजर नहीं आती। अन्य प्रदेशों के साथ-साथ छत्तीसगढ़ में भी रायपुर के पास ही ग्रामीण क्षेत्र में इसकी आधारशिला रखी गई थी, लेकिन आगे कोई बहुत ज्यादा काम इस पर नहीं हुआ। कलाम साहब के पद से हटने के बाद उनकी यह योजना उनके द्वारा प्रस्तावित अन्य योजनाओं, जैसे नदी जोड़ योजना, की तरह अपदस्थ कर दी गई। एक तरह से यह ठीक हुआ। अगर योजना लागू हो जाती तो कहने को तो गांव होता लेकिन वास्तविक रूप में वह शहरी रईसों का उपनिवेश बनकर रह जाता। तथाकथित जनभागीदारी याने पी-पी-पी के अंतर्गत होने वाले विकास में सिर्फ आला दर्जे के नागरिकों के कल्याण की ही यह योजना थी। इसमें महंगे अस्पताल बनते, महंगे स्कूल खुलते, शापिंग मॉल बनते याने वहां सब कुछ होती जो भारत के एक सामान्य देहाती की पहुंच और क्रय क्षमता से परे होता। यह कहने की हिमाकत की जा सकती है कि ''पुरा'' योजना राजनीतिक संयोग से सर्वोच्च पद पर पहुंच गए एक अव्यवहारिक चिंतक की अव्यवहारिक सोच से ज्यादा कुछ नहीं थी। यूपीए सरकार के द्वारा संचालित योजना जवाहरलाल नेहरू के नाम पर है, यह एक विडम्बना है। वर्ल्ड बैंक जैसी संस्थाओं के परामर्श व उनके आर्थिक सहयोग (सस्ती ब्याज दर पर लंबी अवधि का कर्ज) से प्रारंभ की गई है। इसमें शहरों की दशा सुधारने के लिए बहुत सारे उपाय किए गए हैं। लेकिन यह संशय बना हुआ है कि क्या ये कभी ठीक तरह से लागू हो सकेंगे या नहीं।

इसमें भी पी-पी-पी का प्रावधान अनेक स्तरों पर किया गया है। यह हम अतीत में देख चुके हैं कि वर्ल्ड बैंक आदि से अनुमोदित योजनाओं के लिए जो धनराशि आती है उसमें भारी मात्रा में भ्रष्टाचार व अपव्यय होता है। अधिकतर योजनाएं फर्जी आंकड़ों पर आधारित होती हैं जो आगे चलकर टांय-टांय फिस्स हो जाते हैं। रायपुर में तीस साल पहले प्रारंभ की गई भूमिगत नाली योजना इसका उम्दा उदाहरण है। योजना पार नहीं लगना थी, सो नहीं लगी। वर्तमान योजना में ग्राम सभा की तर्ज पर वार्ड सभा गठित करने का अनिवार्य प्रावधान है। योजना के हर चरण में जनता के अनुमोदन को वांछित ही नहीं, अपरिहार्य माना गया है। अगर रायपुर के उदाहरण को सामने रखकर देखें तो यहां उसका किंचित भी पालन नहीं किया गया। सारा जनानुमोदन कागजों में हो गया। जो यहां हाल है वही देश के अन्य नगरों में भी होगा। कहीं कम कहीं ज्यादा।

हमारी सरकारों का जो रवैय्या है उसके बारे में ज्यादा क्या लिखें। लेकिन नगर नियोजन की बात चलने पर जनता के रवैय्ये पर भी गौर कर लेना चाहिए। इस संदर्भ में कुछ घटनाओं का जिक्र करना प्रासंगिक होगा। कुछ दिन पहले मुझे एक गृह प्रवेश में जाने का अवसर आया। मेरा ध्यान इस बात पर गया कि आजकल देशी नामों को भुला दिया गया है और कॉलोनियों का नामकरण एकदम पाश्चात्य शैली में होने लगा है, मसलन गोल्डन पॉम, सिल्वर सैंड्स, पार्क रेसिडेन्सी आदि-आदि। ऐसे नामों से जैसे निवासियों को अतिरिक्त सम्मान या गौरव मिल जाता है। इन कॉलोनियों में भांति-भांति के, विदेशी समझी जाने वाली प्रजातियों के, पौधे लगाए जाते हैं तथा उनमें ज्यामितीय संतुलन का ख्याल रखा जाता है। अरेका पाम व ड्रूपिंग अशोका (अशोक नहीं) जैसे वृक्ष आप यहाँ देख सकते हैं। दूसरी तरफ लगभग हर फ्लैट में पूजा का कमरा या एक कोना निर्धारित तो होता ही है। आजकल भक्तिभाव भी कुछ ज्यादा बढ़ गया है। कितने ही घरों में हर पूनम सत्यनारायण की कथा होने लगी है। लेकिन यह नहीं होता कि कॉलोनी के सुरक्षित परिवेश में लाल-पीला कनेर, कागजी मोगरा या चाँदनी, जवाकुसुम या गुड़हल अथवा बेल के पौधे लगाए जाएं जिनसे पूजा के लिए फूल-पत्ती मिलने में दिक्कत न हो। 

इस तरह से तथाकथित आधुनिक विधि से जो मकान इन दिनों बन रहे हैं, उनमें स्थानीय आबोहवा व परिस्थितियों का ध्यान बिलकुल भी नहीं रखा जाता। इमारतों में बिजली की खपत कम से कम कैसे हो, धूप और प्राकृतिक रौशनी कैसे मिले, ताजा हवा लगातार मिलती रहे, पानी का इस्तेमाल युक्तियुक्त रूप से हो, इस सब पर न तो वास्तुशिल्पी ध्यान देते, न मकान मालिक। घर से बाहर निकलो तो भी वही हालात। सौंदयीकरण के नाम पर पैसे की बरबादी। शहर को एक रहने लायक इकाई कैसे बनाया जाए, इस पर नगरपिताओं और नगरमाताओं का ज्ञान शून्य ही होता है। एक विचित्र बात और देखने मिल रही है। आजकल हर घर में बाउंड्रीवाल बनाना अनिवार्य हो गया है। इसमें कितना लोहा, सीमेंट लगता है इसका हिसाब नहीं लगाया जाता। पहले घरों में चारदीवारियां नहीं होती थीं। बहुत हुआ तो मेहंदी की बाड़ लगाने से काम चल जाता था। आज उठ रही ये दीवालें हमारे भय और बेगानेपन को ही दर्शाती है। यह सर्वविदित है कि हम अपने पुरखों का बहुत सम्मान करते हैं। शहर हो या गांव- मूर्ति स्थापना, सड़कों-गलियों का नामकरण, मोहल्ले या संस्थाओं का नामकरण कर श्रध्दा व्यक्त करके इतिश्री मान ली जाती है। किंतु यह हमारी सोच का हिस्सा नहीं है कि समाज को खासकर नई पीढ़ी को ऐसे नामित व्यक्ति के व्यक्तित्व और कृतित्व से परिचित कराया जाए। इतिहास पुरुषों की बात जाने दीजिए, लेकिन नई दिल्ली में हरिश्चन्द्र माथुर लेन जिनके नाम पर है ये कौन थे? अथवा रायपुर में शासकीय कन्या विद्यालय को जगन्नाथराव दानी का नाम क्यों दिया गया? ये मामूली से लगने वाले प्रश्न हैं जिनका उत्तर हमारे नगर नियोजन की कार्यनीति से मिलना चाहिए। 


दरअसल यदि समाज अपने वृहत्तर परिवेश के प्रति जागरूक नहीं है तो वह उसके साथ एक स्थायी और आत्मीय रिश्ता नहीं जोड़ सकता। अगर मुझे नहीं पता कि रायपुर में रहते हुए मैं खारून नदी का जल पी रहा हूं तो खारून के प्रति मेरे मन में आदर कभी नहीं जागेगा। दूसरे शब्दों में अपने पर्यावास के प्रति गहरी समझ और संवेदना ही एक जीवंत नगर को रच सकती है अन्यथा हमारे तमाम शहर आज की तरह मुसाफिर खाने बनकर ही रह जाएंगे।




 30 जनवरी 2009 को देशबंधु में प्रकाशित