Monday, 14 May 2012

छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद - 4

                                             छत्तीसगढ़ के बुद्धिजीवियों को आह्वान- 1

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह ने दो दिन पूर्व दिल्ली के एक कार्यक्रम में कहा कि नक्सल समस्या पर चुनाव आयोग या किसी निष्पक्ष संस्था से पूरे राज्य में जनमत संग्रह करवा लिया जाए। कल उन्होंने फिर कहा कि शांतिवार्ता की बात जो बुध्दिजीवी कर रहे हैं वे ही जनमत संग्रह करवाएं। इधर छत्तीसगढ़ में शांति यात्रा पर आए स्वामी अग्निवेश ने जानकारी दी कि केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम् नक्सलियों से बातचीत के लिए तैयार हैं बशर्ते नक्सली 72 घंटे के लिए शस्त्रविराम घोषित कर दें. श्री अग्निवेश के अनुसार उन्होंने दिल्ली में माओवादियों के समर्थकों से बात की और वे 72 घंटे तो क्या 72 दिन के शस्त्रविराम के लिए तैयार हैं। पेंच यह है कि इसकी पहल कौन करे। अग्निवेश जी का कहना है कि दोनों पक्ष अपनी-अपनी ओर से पहल कर दें।

डॉ. रमनसिंह तथा स्वामी अग्निवेश ने दोनों के वक्तव्यों से आशा बंधी है कि नक्सल समस्या हल करने के लिए रास्ता खुल सकता है। यह सच्चाई हर व्यक्ति जानता है कि बड़ी से बड़ी समस्या के लिए आज नहीं तो कल संवाद स्थापित करके ही हल निकाला जा सकता है। इसलिए हम इन दोनों महानुभावों के बयानों का स्वागत करते हैं। डॉ. रमनसिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं और इस भयावह समस्या पर उनकी चिंता समझी जा सकती है। लेकिन उन्होंने जो जनमत संग्रह की बात की है उसके निहितार्थ क्या हैं और इसके दूरगामी प्रभाव क्या होंगे इस बारे में स्वयं डॉ. साहब को गंभीर रूप से विचार करने की आवश्यकता है। जनमत संग्रह एक ऐसा राजनैतिक अस्त्र है जिसका भारत में अभी तक उपयोग नहीं किया गया है। इसमें बहुत सारी जटिलताएं हैं। जो छत्तीसगढ़ के संदर्भ में भी निरपवाद लागू होती हैं।

मुख्यमंत्री ने इस संबंध में बुध्दिजीवियों का आह्वान किया है। मेरा मानना है कि न तो ''बुध्दिजीवी'' की व्याख्या सीमित अर्थों में करना चाहिए; न ही इस आह्वान को जनमत संग्रह तक सीमित रखना चाहिए। यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है कि सारे बुध्दिजीवी एक तरीके से नहीं सोचते। बुध्दिजीवियों के राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक या अन्य किसी विषय पर विचार अलग-अलग हो सकते हैं और होते हैं। इस समय छत्तीसगढ़ में शांतियात्रा पर जो बुध्दिजीवी आए हैं, उनमें अकेले प्रो. यशपाल हैं जो नेहरूवादी परंपरा से हैं। जबकि नारायण देसाई उत्कट गांधीवादी हैं। बाकी में अधिकांश जेपी आंदोलन की देन हैं। स्वामी अग्निवेश तो आर्य समाजी हैं और सर्वधर्म समभाव के लिए निरंतर काम कर रहे हैं, जबकि प्रो. यशपाल अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के वैज्ञानिक व शिक्षाविद् हैं। इन सबको आप एक ही गज से नहीं नाप सकते।

बुध्दिजीवी तो छत्तीसगढ़ में भी हैं। कुलपति, अध्यापक, साहित्यकार, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, डॉक्टर, इंजीनियर- ये सब बुध्दिजीवी नहीं तो और क्या हैं। इनमें से बहुत से लोग  नक्सल समस्या पर अपने-अपने तरीके से सोच रहे हैं। अगर मुख्यमंत्री आह्वान करें और ये सब मिल बैठकर सोचें तो शायद कोई अच्छी बात सामने आए। लेकिन इन्हें भी क्यों किसी के आह्वान का इंतजार करना चाहिए। हम लोग खुद अपनी पहल पर अपने बीच में ही इस गंभीर समस्या पर बातचीत की शुरुआत क्यों नहीं कर सकते? राजनीति और प्रशासन को बीच में लाए बिना अगर हम लोग ही आपस में बात करें तो क्या यह उचित नहीं होगा? अन्यथा फिर हमें अपने आपको बुध्दिजीवी कहने का क्या हक है? मैं समझता हूं कि अगर ऐसा हो तो बुध्दिजीवी शब्द को लेकर जो अनावश्यक हंगामा खड़ा किया जा रहा है वह भी रुक जाएगा। मैं अपने साथी वरिष्ठ संपादकों एवं वरिष्ठ पत्रकारों से निवेदन करता हूं कि आइए! हम लोग ही इस पर जल्दी ही किसी दिन बैठें, अपने तईं प्रारंभिक रूपरेखा तैयार करें और फिर अन्य मित्रों  को व्यापक चर्चा हेतु आमंत्रित करें, जिसके आधार पर आगे बढ़ा जा सके। इस बारे में मेरे अपने जो विचार हैं उन्हें मैं ऐसी किसी संभावित बैठक में व्यक्त करूं, यही उचित होगा।

इसके बाद हम स्वामी अग्निवेश के वक्तव्य पर गौर करें। यह आवश्यक है कि केन्द्र सरकार इस बारे में बिना समय गंवाए स्पष्ट घोषणा करे। उसे अपनी ओर से दिन और समय निर्धारित कर देना चाहिए। अगर माओवादी नेता इस पहल को स्वीकार करने की घोषणा करते हैं तब तो ठीक है। अगर वे साथ-साथ शस्त्रविराम की घोषणा नहीं करते तो वार्ता का आधार भी नहीं बन पाएगा। गौतम नवलखा, कुमार संजय सिंह या अन्य ऐसे व्यक्ति जो मोटे तौर पर नक्सल समर्थक माने जाते हैं, उन्हें यहां आगे बढ़कर पहल करना होगी।

मैंने 10 अप्रैल को इसी स्थान पर लिखा था कि जनतांत्रिक विमर्श से ही समस्या का हल निकलेगा। मैं एक बार फिर कहना चाहता हूं कि एक खूनी खेल खेलकर नक्सलवादियों ने जनता और जनतंत्र का नुकसान किया है और आदिवासियों को प्रवक्ता होने का अधिकार भी खो दिया है। उन्हें अपने रवैये पर फिर विचार करने की जरूरत है। दूसरी तरफ सरकार की भी जिम्मेदारी बनती है कि वह अपनी ओर से जनतांत्रिक प्रक्रिया के तहत फैसले लिए जाने का वातावरण बनाने के लिए हर संभव प्रयत्न करे।
मई 2010 को देशबंधु में प्रकाशित