Monday, 21 May 2012

प्रायोजित पत्रकारिता की चुनौतियां- 3

खरीद-फरोख्त ने जो विकराल रूप धारण कर लिया है वह सबके सामने है। ऐसी नौबत क्यों कर आई, इसे समझने के लिए कुछ उदाहरण काम आ सकते हैं।

प्रसंग-1
समय-जुलाई-अगस्त 1990। स्थान-भोपाल-दिल्ली के बीच शताब्दी एक्सप्रेस। यात्रा में एक पूर्व मुख्यमंत्री और एक पत्रकार टकरा गए। दोनों के बीच कुछ इस तरह वार्तालाप हुआ:-
पत्रकार- आपने अपने दौर में फलाने अखबार  पर बहुत मेहरबानियां कीं, लेकिन आज वही आपके खिलाफ लगातार 
 हर उगल रहा है। 
पूर्व मुख्यमंत्री- ऐसा ही होता है। हम जब वापिस आएंगे तो वह फिर हमारी खुशामद करने लगेगा।

प्रसंग-2समय- सन् 96-97 में कभी। किसी प्रदेश के मुख्यमंत्री ने एक अखबार के संपादक को फोन करके आग्रह किया कि अमुक हिल स्टेशन पर उनकी पार्टी का वृहद अधिवेशन हो रहा है। उसमें अखबार की तरफ से एक लंच या डिनर हो जाए।
संपादक ने कहा- आप तो उल्टी गंगा बहा रहे हैं। अखबार वाले क्यों राजनैतिक पार्टियों को डिनर देंगे?  डिनर तो हमें आपसे खाना चाहिए।
मुख्यमंत्री ने खुलासा किया कि दो-तीन अन्य अखबार इसके लिए हामी भर चुके हैं।
संपादक का उत्तर था- उन्हें राज्यसभा की सीट चाहिए होगी मुझे नहीं। बात इस तरह खत्म हुई कि  उस अखबार के विज्ञापनों में शीघ्र ही भारी कटौती कर दी गई।


प्रसंग-3समय- जुलाई 2000। स्थान- रायपुर के आसपास। एक कद्दावर नेता ने एक संपादक को व्यक्तिगत चर्चा हेतु आमंत्रित किया। पत्रकार ने बातचीत के दौरान नेताजी से कहा कि पहले आप जनता से बहुत सघन संपर्क रखते थे, अब दूर-दूर रहने लगे हैं। आपके व्यवहार में भी सहजता के बजाय नंफासत आ गई है।
नेता- समय-समय की बात है। यदि राजनीति के तौर-तरीके में फर्क आ गया है तो पत्रकारिता में भी तो वही हो रहा है। अब पहले जैसी पत्रकारिता कहां रह गई है!


प्रसंग-4
समय- सन् 1975। एक प्रदेश के सबसे प्रभावशाली और राजनैतिक रसूख रखने वाले उद्योगपति ने अपना अखबार प्रारंभ किया। उसके कुछ दिन बाद एक युवा पत्रकार से उन्होंने कहा कि तुम लोग जब-तब हमारे खिलाफ छापते हो, इसीलिए हमने अपना अखबार निकाल लिया है।


इन प्रसंगों के साथ-साथ एक परिदृश्य पर भी नार डाल लीजिए कि किस पार्टी ने किस पत्रकार को राज्यसभा में भेजकर उपकृत किया है: कांग्रेस से गिरीश सांघी, प्रफुल्ल माहेश्वरी, विजय दर्डा आदि; भाजपा से नरेन्द्र मोहन, दीनानाथ मिश्र, बलबीर पुंज, चंदन मित्रा, तरुण विजय आदि; शिवसेना से संजय निरुपम, प्रीतिश नंदी आदि; समाजवादी पार्टी से महेन्द्र मोहन गुप्त। इनमें भाजपा के बारे में इतना कहा जा सकता है कि उसने ज्यादातर अपने निष्ठावान कार्यकर्ताओं को ही राज्यसभा में भेजा, जबकि अन्य की सामान्यत: कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं थी। यहां प्रश्न उठता है कि जो पत्रकार राजनीति में सक्रिय हैं क्या वे स्वतंत्र और निष्पक्ष रह सकते हैं। दूसरा प्रश्न यह भी उठता है कि पत्रकार राज्यसभा में जाने के लिए ऐसे लालायित क्यों रहते हैं। क्या इसका यह अर्थ नहीं है कि उन्होंने अपनी कलम से पार्टी अथवा उसके नेताओं की सेवा की होगी जिसका मेहनताना उन्हें राज्यसभा की सदस्यता के रूप में दिया गया। दूसरे शब्दों में यह प्रायोजित पत्रकारिता का ऐसा उदाहरण है जिसमें धनराशि के बजाय एक ऊंचा पद दे दिया गया। जो बात राज्यसभा की सदस्यता के बारे में है, वह किसी हद तक पुरस्कार व सम्मान को लेकर भी उठाई जा सकती है। किसी सरकार से जब आप कोई पुरस्कार अथवा अलंकरण पाते हैं तो वह आपकी पत्रकारिता का मूल्यांकन है या फिर आप अपनी बिकने की कीमत पा रहे हैं?


मुझे अशोक वाजपेयी का एक लेख ध्यान आता है। दो-एक साल पहले प्रकाशित इस लेख में उन्होंने सवाल उठाया था कि अधिकतर साहित्यकारों के बेटे-बेटियाँ साहित्य में प्रवृत्त होने के बजाय अन्य दिशा में क्यों मुड़ जाते हैं। इस प्रश्न को लेखक के अलावा पत्रकार व शिक्षक समुदाय पर भी लागू किया जा सकता है। ये तीनों अपने आपको सरस्वती का आराधक मानते हैं, लेकिन जैसा कि वाजपेयीजी ने लिखा, इनमें से कोई भी नहीं चाहता कि उनके बच्चे उनका अनुसरण करें। इससे स्पष्ट होता है कि इस देश में सरस्वती के ये आराधक लगातार हीनभावना से ग्रस्त हैं। उन्हें अपने आप पर भरोसा नहीं है, अत: इस वातावरण में उनकी अगली पीढ़ी का झुकाव सरस्वती को छोड़कर लक्ष्मीपूजा की ओर हो जाए तो क्या आश्चर्य! मुझे लगता है कि अपनी इस मानसिक दुर्बलता के कारण ही पत्रकार प्रायोजित पत्रकारिता की ओर आकर्षित होते हैं।


यूं तो यह स्थिति लंबे समय से चली आ रही है, लेकिन अभी हाल में इसका ज्यादा खुला रूप सामने आया है। इसकी एक वजह तो यही है कि राजनीति में मूल्यों का ह्रास बहुत तेजी के साथ हुआ है। दूसरे, टी.वी. आने के बाद मीडिया में पूंजी और ग्लैमर दोनों की भूमिका बहुत अधिक बढ़ गई है। तीसरे, पहले के पत्रकार या तो स्वाधीनता सेनानी थे या फिर उनके भीतर नेहरू युग के संस्कार थे जो उन्हें पत्रकारिता के सामाजिक दायित्व से जोड़ते थे। अब पत्रकारिता की नई पीढ़ी का मूल्यबोध पूरी तरह बदल गया है। आपको ऐसे उदाहरण पूरे देश में मिल जाएंगे कि एक ओर जहां अखबार मालिक कारखाने खोल रहे हैं, जमीनों पर कब्जा कर रहे हैं या फिर अफी
म की तस्करी कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर पत्रकार बस, ट्रक और टैक्सियाँ चला रहे हैं, पेट्रोल पंप के मालिक हैं, दो-तीन मकान किराए पर उठा रखे हैं, जमीन दलालों के साथ बेनामी भागीदारी कर रहे हैं या फिर रेस्तराँ और क्लब चला रहे हैं। अगर पहले भी यह सब होता था तो आज कई गुना बढ़कर हो रहा है। इसीलिए अब मीडिया की विश्वसनीयता पर बार-बार प्रश्नचिन्ह लग रहा है। आम जनता समझती है कि शराब की एक बोतल में पत्रकार को खरीदा जा सकता है। धन्ना सेठों की निगाह में उनकी कीमत कुछ ज्यादा होती है। पुलिस उन्हें मुखबिरी के लिए इस्तेमाल करती है। अफसरों के लिए वे मुसाहिब होते हैं और सत्ता में बैठे लोग उन्हें अपनी देहरी पर जंजीर में बांधकर रखना चाहते हैं।

यह सब इसलिए है कि जैसा समाज है वैसे ही अखबार हैं। जब आप अखबार खरीदने के पहले रद्दी बेचने पर उसका कितना पैसा मिलेगा इसका हिसाब लगाते हैं, बाल्टी, सूटकेस, कुर्सी और सॉस की बोतल मुफ्त मिलने के लालच में अखबार के ग्राहक बनते हैं तो फिर आपको शिकायत करने का हक ही कहां रह जाता है?



16 दिसंबर 2010 को देशबंधु में प्रकाशित