Tuesday, 29 May 2012

मेघना और सोनू


छत्तीसगढ़ में कोरबा के डॉक्टर दम्पत्ति मोहन और अंजली सूबेदार की बेटी मेघना सारी दुश्चिंताओं को झुठलाते हुए घर लौट आई है। स्मरणीय है कि पिछले छह माह से कोरबा की यह होनहार युवती लापता थी और उसकी मृत्यु होने की खबरें तक प्रसारित हो चुकी थीं। यहां अंत भला सो सब भला कहकर चैन की सांस ली जा सकती है। इसके विपरीत एक दु:खद समाचार आगरा का है जहां सैनिकों की अनथक मेहनत के बावजूद बोरवेल के लिए किए गए गङ्ढे में गिरे दो वर्षीय बालक सोनू को नहीं बचाया जा सका। इन दोनों खबरों में प्रत्यक्ष तौर पर कोई समानता नहीं है। एक खबर उत्तरप्रदेश की, दूसरी छत्तीसगढ़ की। एक में सम्पन्न व सुशिक्षित परिवार की उच्च शिक्षा प्राप्त विवाहित बेटी, दूसरी में एक निर्धन परिवार की नन्ही सी जान। एक खबर का अंत सुखद, दूसरी का दु:खद। इन अंतरों के बावजूद दोनों खबरें एक ही दिशा में सोचने पर विवश करती है। 

मेघना सूबेदार का प्रसंग अभी भी रहस्य के आवरण में है। पुलिस की छानबीन जारी है। उसके माता-पिता भी अंधेरे में है। मेघना खुद पिछले छह माह के बारे में अभी तक कुछ बता पाने में समर्थ नहीं है। मीडिया में अवश्य तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। दूसरी तरफ सोनू को न बचा सकने की गहरी निराशा के साथ उस प्रसंग का मानो पटाक्षेप भी हो गया है। फिर भी यह विचारणीय है कि आज के भारत में नई पीढ़ी की परवरिश, सुरक्षा और भविष्य को लेकर समाज की क्या सोच है? अगर हम अपने आसपास के बच्चों को ही देखते चलें तो इस निष्कर्ष पर पहुंचना कठिन नहीं होगा कि नई पीढ़ी के प्रति जिस जिम्मेदारी का अहसास होना चाहिए, वह हममें नहीं है। इसके विपरीत एक किस्म की आपराधिक और अक्षम्य लापरवाही का भाव उनके प्रति है।

यह सच है कि माता-पिता अमीर हो या गरीब, बच्चों को अच्छे से अच्छा वातावरण देने की कोशिश करते हैं। लेकिन एक तबके को शायद यह पता ही नहीं है कि अच्छे वातावरण की परिभाषा क्या है; तो दूसरे के पास उस अच्छे वातावरण तक पहुंचने के लिए आवश्यक साधनों का ही अभाव है। आज जो परिवार सक्षम है वे अपने बच्चों को उन शालाओं में भेज रहे हैं जहां छात्रावास में एसी लगे हैं, पहली कक्षा से ही क्लासरूम में एसी हैं, हजारों रुपयों में सालाना फीस है और बच्चों के विकास के नाम पर बेहूदे कार्यक्रम। इन स्कूलों पर बाजार का बहुत सीधा-सीधा कब्जा हो गया है जहां बच्चों को अखबार, टूथपेस्ट, साबुन जैसी वस्तुएं भी क्लासटीचर के माध्यम से शाला प्रबंधक के निर्देश पर खरीदनी पड़ती है। इन स्कूलों के व्यापारी मालिक अपना जन्मदिन मनाते हैं और उसके लिए भी बच्चों से पैसा वसूल किया जाता है। यह सब हमारे सम्पन्न अभिभावक खुशी-खुशी कबूल कर लेते हैं, क्योंकि वे अपने बच्चों को गरीबों से अलग रखना चाहते हैं। भारतीय समाज की दारुण सच्चाईयों से दूर रखना चाहते हैं।

 वे अपने बच्चों को बड़े होकर भारत का जिम्मेदार नागरिक बनाने के बजाय किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में क्रीतदास बनते देखना ज्यादा पसंद करते हैं। उनके लिए बच्चों की प्रगति का एकमात्र पैमाना वह पैकेज है जो किसी भी दिन ''पिंक स्लिप'' में तब्दील हो सकता है। इस पैकेज को पाने के लिए भारत का सम्पन्न समाज अपने बच्चों को घर से दूर कोटा, बेंगलुरु और पुणे जैसे शहरों तक भेज रहा है। इन अपरिचित स्थानों का माहौल कैसा है और वहां बच्चे किसी दुष्चक्र का शिकार तो नहीं हो जाएंगे- इस बारे में बहुत ज्यादा सोचने की जरूरत अधिकतर मां-बाप को नहीं होती। इन नवयुवाओं को यदि उनके बाल्यकाल में आसपास की सच्चाईयों से वंचित नहीं कराया गया है तो उनका गुमराह होना आसान हो जाता है। जो नौजवान पढ़ाई-लिखाई पूरी कर देश के साइबर शहरों में नौकरी कर रहे हैं, उनका जीवन भी काफी हद तक एकरस और मशीनी है। ऐसे में वे कभी भी कुंठित होकर टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर कदम रख सकते हैं।

गरीब परिवारों का सवाल जहां तक है उनकी उलझनें अलग तरह की हैं। उनके प्रति हमारे समाज और हमारी व्यवस्था दोनों का रूख निर्मम है। भारत का प्रभुताशाली वर्ग चाहता ही नहीं है कि गरीब घर का बच्चा ठीक से पढ़-लिख ले। यदि उसे अच्छा माहौल मिल गया, उसने पढ़ाई-लिखाई ठीक से कर ली, आगे चलकर ठीकठाक नौकरी मिल गई तो फिर वह उन लोगों पर राज करने की क्षमता हासिल कर लेगा जो अब तक उस पर राज करते आए हैं। इसीलिए कागज पर सुन्दर-सुन्दर योजनाएं होने के बावजूद हकीकत कुछ और ही होती है। 

काम की जगह पर दूध पीते बच्चों के लिए झूलाघर नहीं होता। उनके लिए स्कूल नहीं होते। स्कूल का भवन होता है तो शिक्षक नहीं होते। और यदि शिक्षक होते हैं तो वे महज शिक्षाकर्मी होते हैं जो खुद किसी हद तक अनपढ़ होते हैं। प्रिंस और सोनू जैसे बच्चे बोरवेल में इसलिए गिरते हैं क्योंकि उनके मां-बाप की झोपड़ी वहीं पास में होती है और गङ्ढों को ढंकना जरूरी नहीं समझा जाता। हमारे पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम दूसरे चाचा नेहरू बनना चाहते थे लेकिन वे हमेशा वैभवशाली स्कूलों में पढ़ रहे सम्पन्नघरों के बच्चों से ही मिले और अगवानी के लिए झुलसती धूप में झंडे लेकर सड़क पर खड़े कर दिए गए बच्चों से मिलने के बारे में उन्होंने कभी नहीं सोचा। यही रवैया अभिजात सोच के हर व्यक्ति का है। इसीलिए आंगनबाड़ी हो या मध्यान्ह भोजन- जहां कर्मचारियों के मन में दया-ममता है वहां तो ठीक लेकिन बाकी जगह बच्चों को सिर्फ तिरस्कार ही मिलता है।

आज ये दोनों प्रसंग यह सोचने के लिए मजबूर कर रहे हैं कि बच्चों के प्रति हमें अपने विचारों में परिवर्तन लाने की जरूरत है। इसकी शुरुआत तब होगी जब भेदभावपूर्ण शिक्षा व्यवस्था को समाप्त कर देश के तमाम बच्चों के लिए एक समान स्कूली शिक्षा की व्यवस्था की जाएगी, ताकि हर बालक और बालिका का विकास उसकी अन्तर्निहित क्षमताओं के अनुरूप हो सके तथा बच्चों को उनकी जाति, धर्म अथवा मां-बाप के वैभव के आधार पर न तौला जाए।  


प्रकाशन वर्ष  2008