Wednesday, 23 May 2012

आम खाने का सुख



एक हाथ में आम, दूसरे में मोबाइल। आम चूसते हुए ही मैंने रवि श्रीवास्तव को फोन कर धन्यवाद दिया कि उन्होंने ऐसे उम्दा स्वादिष्ट आम भिजवाए। भिलाई में रवि भाई के आंगन में आम के 2-3 पेड़ हैं, जिनके फलों पर मुख्य रूप से मुहल्लावासियों का अधिकार बनता है, लेकिन हम जैसे साथियों को भी कभी-कभार उनका स्वाद पाने का सौभाग्य मिल जाता है। सच बताऊं तो मैं हमेशा इस ताक में रहता हूं कि किस-किस मित्र के बागीचे में आम फल रहे हैं। (उनके नाम नहीं बताऊंगा, ताकि मेरा हिस्सा बाँटने कोई और मित्र न आगे आ जाए)  बाज़ार  से खरीदकर भी आम खाए जाते हैं, लेकिन मित्रों-पड़ौसियों के यहां धावा बोलकर जो फल मिलें, उनका स्वाद कई गुना बेहतर होता है। मैं बचपन के उन दिनों को याद करता हूं जब पचमढ़ी की पगडंडियों पर घूमते हुए हम आम बीना करते थे। देसी आम के ऊंचे-ऊंचे वृक्ष। हवा चलती थी तो छोटे-छोटे फल टूटकर गिरते थे। घर लाए, कुछ देर मटके के पानी में उन्हें ठंडा किया और फिर खूब लालच के साथ आम चूसे, इस तरह कि छिलके में एक भी रेशा बाकी न रह जाए और गुठली पूरी तरह सफेद हो जाए। कितने भी आम खा लो, मन कहां भरता था!

अब देसी आम लुप्त होते जा रहे हैं। बांजार में विदेशी फलों की बहार है। ये मलेसिया की लीची तो यह आस्ट्रेलिया का सेब तो यह अमेरिका का संतरा। जो फल जितना नायाब, वह उतना ही महंगा और उसे खाने में स्वाद आए न आए, शान जरूर बढ़ जाती है। पहिले ये विदेशी फल दिल्ली-मुम्बई की आला दर्जे की दूकानों की शोभा बढ़ाते थे, अब रायपुर-बिलासपुर में भी मिलने लगे हैं। ठीक भी है, जब इतना कुछ विदेशी हमारे जीवन में आकर पैठ गया है तो फल भला पीछे क्यों रहें? संभव है कि यही फल कुछ साल बाद भारत के देसी फल बन जाएं। आखिरकार, सेब भी तो विदेशों से ही आया था और अंगूर भी।  यहां तक कि बिही (अमरूद), चीकू और टमाटर भी सात समंदर पार से यहां आए और यहीं के होकर रह गए। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। विभिन्न समाजों के बीच ऐसा विनिमय शताब्दियों से चलते आया है। जो कुछ रसमय, स्वादिष्ट और स्वास्थ्यकारक है, वह कहीं से भी आए, उसे अपनाने में कैसा संकोच? फिर वह चाहे फल हो या कोई सुन्दर विचार।

यह समाज के अपने सामूहिक विवेक पर निर्भर करता है कि वह किसे अपनाए और किसे खारिज करे। यदि कोई फल- आम, केला या अन्य कुछ- कार्बाइड में पकाकर बांजार में बिके और उसका सेवन करने से शरीर को नुकसान होता हो, जीभ में छाले पड़ते हों, पेट में मरोड़ उठती हो, तो उसे स्वीकार करने में कौन सी बुध्दिमानी होगी? उचित तो यही होगा कि ऐसे फलों की बिक्री बंद की जाए, ऐसी दूकानें उठा दी जाएं। मुश्किल यही है कि जिस तरह खोटा सिक्का खरे सिक्के को चलन से बाहर कर देता है, उसी तरह नकली मिठास वाले फलों के चलते सच्ची मिठास जीवन से गायब होते जा रही है। यह नकली मिठास कार्बाइड से पकाने से पैदा होती है तो मानना होगा कि व्यापार-कुशलता भी एक तरह का कार्बाइड है। भोले-भाले ग्राहक से मीठी-मीठी बात करो और उसे अपना नकली या घटिया माल बेच दो। इस कार्बाइड को अन्तरराष्ट्रीय संबंधों में देखा जा सकता है और राजनेताओं की जुबान तो निश्चित ही उसी में पगी-पकी होती है।

मैं देख रहा हूं कि अब बांजार में लाख ढूंढने पर भी ऐसे फल नहीं मिलते, जो प्राकृतिक रूप से पके हों।  दूसरी तरफ अखबारों में छपने वाले कॉलम पढ़ें तो उनमें निरोग रहने के लिए फल और सलाह ज्यादा से ज्यादा सेवन करने की सलाह दी जाती है। इन डॉक्टरों और आहार-विशेषज्ञों से कोई पूछे कि हानिकारक रसायनों से युक्त फल या सलाद खाने से कोई भी कैसे निरोग रह सकता है।  हम तो देखते हैं कि सम्पन्न किसान (याने जिनका मुख्य व्यवसाय कुछ और है, वरना खेती और सम्पन्नता?) बांजार में बेचने के लिए रसायनों का उपयोग करते हैं और स्वयं अपने उपभोग के लिए जैविक कृषि करते हैं। इधर आर्थिक उदारीकरण के इस युग में यह भी हो रहा है कि फलों का जूस, सॉस, मुरब्बा इत्यादि बनाने वाली कंपनियां किसानों से किराए पर खेत ले लेती हैं और वहां अपने मानकों के अनुसार बीज, खाद, कीटनाशक का प्रयोग करती हैं।  उनका सोचना है कि आलू पैदा हो तो हर आलू का वजन, आकार, रंग एकरूप हो; टमाटर हो तो वह भी वैसा ही और पपीता भी वैसा ही। याने प्रकृति में जो अन्तर्निहित विविधता है, उसे खत्म कर दिया जाए। प्राकृतिक सुन्दरता का तिरस्कार कर अब कृत्रिम लुभावनापन पैदा किया जा रहा है। सब कुछ फेयर एवं लवली होना चाहिए।

ऐसे वातावरण में बांजार से फल खरीदने में तिहरा नुकसान होता है। पैसे भी गए और स्वाद भी नहीं मिला, सेहत पर बुरा असर तो पड़ना ही है। इसलिए मन फिर भटकता है, खोजता है उस मौलिक रस-रूप-गंध (ओरिंजनल टेस्ट) को, जो खत्म होने के कगार पर है। पिछले साल इसी मौसम में सतपुड़ा अंचल में कुछ दिनों की सड़क यात्रा का योग बना तो रास्ते के दृश्य देखकर मन प्रफुल्लित हो उठा- कवर्धा से आगे मंडला, वहां से लखनादौन-नरसिंहपुर होकर पिपरिया, आगे मटकुली-तामिया-छिंदवाड़ा-सौंसर-पाँढुरना से वरुड़ (अमरावती जिला) तक।  दोनों तरफ देसी आम के वृक्ष फलों से लदे झुके जा रहे थे। न जाने कितने बरसों बाद यह स्वर्गोपम दृश्य देखने का सौभाग्य मिला। गर्मी का समय था, इसलिए बरसाती झरनों में पानी की जगह रेत बिछी थी, लेकिन झरनों के किनारे जहां भी अर्जुन के पेड़ थे, वहां पानी अवश्य था। गुलमोहर तथा अमलतास के वृक्ष भी अपने लाल-पीले फूलों की छटा बिखेर रहे थे। पूरे रास्ते हरियाली थी, छाया थी और आंखों को ठंडक मिल रही थी। यात्रा के अंतिम चरणों में तामिया के डाक बंगले के बाहर देसी आम का एक पिटारा भी, किस्मत अच्छी थी तो मिल गया, जैसे बचपन ही वापिस लौट आया।

ऐसा ही एक अनुपम दृश्य देखा इसी साल होली के आसपास। रायपुर से बिलासपुर-अमरकंटक-शहडोल होकर चुरहट। पांच सौ कि.मी. के इस मार्ग पर टेसू के फूलों की जो बहार देखी तो मन उमग उठा। कोटा के आगे जहां तक नंजर जाए, वहीं फूलों से लदे पलाश के वृक्ष, जिनके बारे में माखनलाल चतुर्वेदी ने लिखा था- वन के तरुओं को क्या देखें, उनके फूल लाल अंगारे हैं। इस अंचल में आम के वृक्ष भी खूब हैं और उन पर बौर आने लगे थे। इसी तरह जनवरी-फरवरी के महीनों में दो-एक बार मालवा अंचल में यात्रा करने का अवसर मिला। सर्दी के मौसम में वहाँ जो इंद्रधनुषी नज़ारा  देखने मिला, उसका कहना ही क्या? अलसी और लहसुन की नीलिमा, सरसों  का पीतांबर, धनिया व प्याज की श्वेताभा, ऊपर टेसू के फूलों की रक्ताभा, शिशिर के आकाश से उतरती कुनकुनी धूप और खेतों में यहां-वहां दिख जाते मोर।

ऐसे तमाम दृश्य हमारे जीवन से धीरे-धीरे विदा होते जा रहे हैं। इन्हें बचाना चाहिए या नहीं? यदि बचाना है तो जिम्मेदारी किसकी है? गाड़ियों की संख्या बढ़ी है तो हमें फोर-लेन और सिक्स-लेन सड़कों की आवश्यकता पड़ रही है, लेकिन क्या इसके लिए सड़क किनारे के वृक्षों की बलि देना अपरिहार्य है? बढ़ती आबादी की जरूरतों के लिए नई-नई इमारतें बनना है तो क्या इसके लिए खेतों को उजाड़ना, तालाबों को पाटने के सिवाय और कोई उपाय नहीं है? हमारे तमाम योजनाविद्, इंजीनियर, नगर निवेशक, वन अधिकारी, मेयर, मंत्री ने किस स्कूल में पढ़ाई की है कि वे आम के रस की मिठास भूलने लगे हैं? क्या बेईमानी से कमाए हुए पैसे में, पद के अहंकार में, पूंजीपतियों से मिली सौगातों में ज्यादा मिठास होती है? अगर उन्हें ऐसा ही लगता है तो मैं कहूंगा कि उन्होंने अपना भारत के नागरिक होने का अधिकार खो दिया है। ऐसे व्यक्ति को भला कैसे भारतीय माना जाए जो आम के पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलाता हो!


 4 जून 2011 को देशबंधु में प्रकाशित